05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 821–830
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 821–830
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तब महाबुद्धिमान् इन्द्र हाथ जोड़कर बृहस्पतिजीकी सेवामें उपस्थित हुए और उनसे बोले — ‘ भगवन्! मैं अपने कल्याणका उपाय जानना चाहता हूँ ' ॥ २१
ततो बृहस्पतिस्तस्मै ज्ञानं नैःश्रेयसं परम् ।
कथयामास भगवान् देवेन्द्राय कुरूद्वह ॥ २२ ॥
कुरुश्रेष्ठ! तब भगवान् बृहस्पतिने उन देवेन्द्रको कल्याणकारी परम ज्ञानका उपदेश दिया ॥ २२ ॥
एतावच्छ्रेय इत्येव बृहस्पतिरभाषत ।
इन्द्रस्तु भूयः पप्रच्छ को विशेषो भवेदिति ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् इतना ही श्रेय ( कल्याणका उपाय) है, ऐसा बृहस्पतिने कहा । तब इन्द्रने फिर पूछा— ' इससे विशेष वस्तु क्या है? ' ॥ २३ ॥
बृहस्पतिरुवाच
विशेषोऽस्ति महांस्तात भार्गवस्य महात्मनः ।
अत्रागमय भद्रं ते भूय एव सुरर्षभ ॥ २४ ॥
बृहस्पतिने कहा — तात! सुरश्रेष्ठ! इससे भी विशेष महत्त्वपूर्ण वस्तुका ज्ञान महात्मा शुक्राचार्यको है । तुम्हारा कल्याण हो । तुम उन्हींके पास जाकर पुनः उस वस्तुका ज्ञान प्राप्त करो ॥ २४ ॥
आत्मनस्तु ततः श्रेयो भार्गवात् सुमहातपाः ।
ज्ञानमागमयत् प्रीत्या पुनः स परमद्युतिः ॥ २५ ॥
तब परम तेजस्वी महातपस्वी इन्द्रने प्रसन्नता पूर्वक शुक्राचार्यसे पुनः अपने लिये श्रेयका ज्ञान प्राप्त किया ॥ २५ ॥
तेनापि समनुज्ञातो भार्गवेण महात्मना ।
श्रेयोऽस्तीति पुनर्भूयः शुक्रमाह शतक्रतुः ॥ २६ ॥
महात्मा भार्गवने जब उन्हें उपदेश दे दिया, तब इन्द्रने पुनः शुक्राचार्यसे पूछा — ' क्या इससे भी विशेष श्रेय है '? ॥ २६ ॥
भार्गवस्त्वाह सर्वज्ञः प्रह्लादस्य महात्मनः ।
ज्ञानमस्ति विशेषेणेत्युक्तो हृष्टश्च सोऽभवत् ॥ २७ ॥
तब सर्वज्ञ शुक्राचार्यने कहा- ' महात्मा प्रह्लादको इससे विशेष श्रेयका ज्ञान है । ' यह सुनकर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए ॥ २७ ॥
सततो ब्राह्मणो भूत्वा प्रह्लादं पाकशासनः ।
गत्वा प्रोवाच मेधावी श्रेय इच्छामि वेदितुम् ॥ २८ ॥
तदनन्तर बुद्धिमान् इन्द्र ब्राह्मणका रूप धारण करके प्रह्लादके पास गये और बोले —'राजन्! मैं श्रेय जानना चाहता हूँ' ॥ २८ ॥
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प्रह्लादस्त्वब्रवीद् विप्रं क्षणो नास्ति द्विजर्षभ ।
त्रैलोक्यराज्यसक्तस्य ततो नोपदिशामि ते ॥ २ ९ ॥
प्रह्लादने ब्राह्मणसे कहा— ' द्विजश्रेष्ठ! त्रिलोकीके राज्यकी व्यवस्थामें व्यस्त रहनेके कारण मेरे पास समय नहीं है, अतः मैं आपको उपदेश नहीं दे सकूँगा' ॥ २ ९ ॥
ब्राह्मणस्त्वब्रवीद् राजन् यस्मिन् काले क्षणो भवेत् ।
तदोपादेष्टुमिच्छामि यदाचर्यमनुत्तमम् ॥ ३० ॥
यह सुनकर ब्राह्मणने कहा - ' राजन्! जब आपको अवसर मिले, उसी समय मैं आपसे सर्वोत्तम आचरणीय धर्मका उपदेश ग्रहण करना चाहता हूँ' ॥ ३० ॥
ततः प्रीतोऽभवद् राजा प्रह्लादो ब्रह्मवादिनः ।
तथेत्युक्त्वा शुभे काले ज्ञानतत्त्वं ददौ तदा ॥ ३१ ॥
ब्राह्मणकी इस बातसे राजा प्रह्लादको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने ‘ तथास्तु ' कहकर उसकी बात मान ली और शुभ समयमें उसे ज्ञानका तत्त्व प्रदान किया ॥
ब्राह्मणोऽपि यथान्यायं गुरुवृत्तिमनुत्तमाम् ।
चकार सर्वभावेन यदस्य मनसेप्सितम् ॥ ३२ ॥
ब्राह्मणने भी उनके प्रति यथायोग्य परम उत्तम गुरु- भक्तिपूर्ण बर्ताव किया और उनके मनकी रुचिके अनुसार सब प्रकारसे उनकी सेवा की ॥ ३२ ॥
पृष्टश्च तेन'बहुशः प्राप्तं कथमनुत्तमम् ।
त्रैलोक्यराज्यं धर्मज्ञ कारणं तद् ब्रवीहि मे ।
प्रह्लादोऽपि महाराज ब्राह्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणने प्रह्लादसे बारंबार पूछा - ' धर्मज्ञ! आपको यह त्रिलोकीका उत्तम राज्य कैसे प्राप्त हुआ? इसका कारण मुझे बताइये । महाराज! तब प्रह्लाद भी ब्राह्मणसे इस प्रकार बोले- ॥ ३३ ॥
प्रह्रादउवाच
नासूयामि द्विजान् विप्र राजास्मीति कदाचन ।
काव्यानि वदतां तेषां संयच्छामि वहामि च ॥ ३४ ॥
प्रह्लादने कहा — विप्रवर! ' मैं राजा हूँ' इस अभिमानमें आकर कभी ब्राह्मणोंकी निन्दा नहीं करता; बल्कि जब वे मुझे शुक्रनीतिका उपदेश करते हैं, तब मैं संयमपूर्वक उनकी बातें सुनता हूँ और उनकी आज्ञा शिरोधार्य करता हूँ ॥ ३४ ॥
ते विश्रब्धाः प्रभाषन्ते संयच्छन्ति च मां सदा ।
ते मां काव्यपथे युक्तं शुश्रूषुमनसूयकम् ॥ ३५ ॥
धर्मात्मानं जितक्रोधं नियतं संयतेन्द्रियम् ।
समासिञ्चन्ति शास्तारः क्षौद्रं मध्विव मक्षिकाः ॥ ३६ ॥
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वे ब्राह्मण विश्वस्त होकर मुझे नीतिका उपदेश देते और सदा संयममें रखते हैं । मैं सदा ही यथाशक्ति शुक्राचार्यके बताये हुए नीतिमार्गपर चलता, ब्राह्मणोंकी सेवा करता, किसीके दोष नहीं देखता और धर्ममें मन लगाता हूँ । क्रोधको जीतकर मन और इन्द्रियोंको काबूमें किये रहता हूँ । अतः जैसे मधुकी मक्खियाँ शहदके छत्तेको फूलोंके रससे सींचती रहती हैं, उसी प्रकार उपदेश देनेवाले ब्राह्मण मुझे शास्त्रके अमृतमय वचनोंसे सींचा करते हैं ॥ ३५-३६ ॥
सोऽहं वागग्रविद्यानां रसानामवलेहिता ।
स्वजात्यानधितिष्ठामि नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ॥ ३७ ॥
मैं उनकी नीति- विद्याओंके रसका आस्वादन करता हूँ और जैसे चन्द्रमा नक्षत्रोंपर शासन करते हैं, उसी प्रकार मैं भी अपनी जातिवालोंपर राज्य करता हूँ ॥
एतत् पृथिव्याममृतमेतच्चक्षुरनुत्तमम् ।
यद् ब्राह्मणमुखे काव्यमेतच्छ्रुत्वा प्रवर्तते ॥ ३८ ॥
ब्राह्मणके मुखमें जो शुक्राचार्यका नीतिवाक्य है, यही इस भूतलपर अमृत है, यही सर्वोत्तम नेत्र है । राजा इसे सुनकर इसीके अनुसार बर्ताव करे ॥ ३८ ॥
एतावच्छ्रेय इत्याह प्रह्लादो ब्रह्मवादिनम् ।
शुश्रूषितस्तेन तदा दैत्येन्द्रो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३ ९ ॥
इतना ही श्रेय है, यह बात प्रह्लादने उस ब्रह्मवादी ब्राह्मणसे कहा । इसके बाद भी उसके सेवा- शुश्रूषा करनेपर दैत्यराजने उससे यह बात कही— ॥ ३ ९ ॥
यथावद् गुरुवृत्त्या ते प्रीतोऽस्मि द्विजसत्तम ।
वरं वृणीष्व भद्रं ते प्रदातास्मि न संशयः ॥ ४० ॥
' द्विजश्रेष्ठ! मैं तुम्हारे द्वारा की हुई यथोचित गुरुसेवासे बहुत प्रसन्न हूँ । तुम्हारा कल्याण
हो । तुम कोई वर माँगो । मैं उसे दूँगा । इसमें संशय नहीं है ' ॥ ४० ॥
कृतमित्येव दैत्येन्द्रमुवाच स च वै द्विजः ।
प्रह्लादस्त्वब्रवीत् प्रीतो गृह्यतां वर इत्युत ॥ ४१ ॥
तब उस ब्राह्मणने दैत्यराजसे कहा- ' आपने मेरी सारी अभिलाषा पूर्ण कर दी ' । यह सुनकर प्रह्लाद और भी प्रसन्न हुए और बोले — ' कोई वर अवश्य माँगो ' ॥ ४१ ॥
ब्राह्मणउवाच
यदि राजन् प्रसन्नस्त्वं मम चेदिच्छसि प्रियम् ।
भवतः शीलमिच्छामि प्राप्तुमेष वरो मम ॥ ४२ ॥
ब्राह्मण बोला — राजन्! यदि आप प्रसन्न हैं और मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मुझे आपका ही शील प्राप्त करनेकी इच्छा है, यही मेरा वर है ॥ ४२ ॥
ततः प्रीतस्तु दैत्येन्द्रो भयमस्याभवन्महत् ।
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वरे प्रदिष्टे विप्रेण नाल्पतेजायमित्युत ॥ ४३ ॥
यह सुनकर दैत्यराज प्रह्लाद प्रसन्न तो हुए; परंतु उनके मनमें बड़ा भारी भय समा गया । ब्राह्मणके वर माँगनेपर वे सोचने लगे कि यह कोई साधारण तेजवाला पुरुष नहीं है ॥ ४३ ॥
एवमस्त्विति स प्राह प्रह्लादो विस्मितस्तदा ।
उपाकृत्य तु विप्राय वरं दुःखान्वितोऽभवत् ॥ ४४ ॥
फिर भी ‘ एवमस्तु ' कहकर प्रह्लादने वह वर दे दिया । उस समय उन्हें बड़ा विस्मय हो रहा था । ब्राह्मणको वह वर देकर वे बहुत दुखी हो गये ॥ ४४ ॥
दत्ते वरे गते विप्रे चिन्ताऽऽसीन्महती तदा ।
प्रह्रादस्य महाराज निश्चयं न च जग्मिवान् ॥ ४५ ॥
महाराज! वर देनेके पश्चात् जब ब्राह्मण चला गया, तब प्रह्लादको बड़ी भारी चिन्ता हुई । वे सोचने लगे - क्या करना चाहिये? परंतु किसी निश्चयपर पहुँच न सके ॥ ४५ ॥
तस्य चिन्तयतस्तावच्छायाभूतं महाद्युति ।
तेजो विग्रहवत् तात शरीरमजहात् तदा ॥ ४६ ॥
तात! वे चिन्ता कर ही रहे थे कि उनके शरीरसे परम कान्तिमान् छायामय तेज
मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ । उसने उनके शरीरको त्याग दिया था ॥ ४६ ॥
तमपृच्छन्महाकायं प्रह्लादः को भवानिति ।
प्रत्याहतं तु शीलोऽस्मि त्यक्तो गच्छाम्यहं त्वया ॥ ४७ ॥
प्रह्लादने उस विशालकाय पुरुषसे पूछा — ' आप कौन हैं? ' उसने उत्तर दिया — ' मैं शील हूँ। तुमने मुझे त्याग दिया है, इसलिये मैं जा रहा हूँ' ॥ ४७ ॥
तस्मिन् द्विजोत्तमे राजन् वत्स्याम्यहमनिन्दिते ।
योऽसौ शिष्यत्वमागम्य त्वयि नित्यं समाहितः ॥ ४८ ॥
‘ राजन्! अब मैं उस अनिन्दित श्रेष्ठ ब्राह्मणके शरीरमें निवास करूँगा, जो प्रतिदिन तुम्हारा शिष्य बनकर यहाँ बड़ी सावधानीके साथ रहता था ' ॥ ४८ ॥
इत्युक्त्वान्तर्हितं तद् वै शक्रं चान्वाविशत् प्रभो ।
तस्मिंस्तेजसि याते तु तादृग्रूरूपस्ततोऽपरः ॥ ४ ९ ॥
शरीरान्निःसृतस्तस्य को भवानिति चाब्रवीत् ।
धर्मं प्रह्लाद मां विद्धि यत्रासौ द्विजसत्तमः ॥ ५० ॥
तत्र यास्यामि दैत्येन्द्र यतः शीलं ततो ह्यहम् । प्रभो! ऐसा कहकर शील अदृश्य हो गया और इन्द्रके शरीरमें समा गया । उस तेजके चले जानेपर प्रह्लादके शरीरसे दूसरा वैसा ही तेज प्रकट हुआ । प्रह्लादने पूछा — ' आप कौन हैं? ' उसने उत्तर दिया- ' प्रह्लाद! मुझे धर्म समझो। जहाँ वह श्रेष्ठ ब्राह्मण है, वहीं जाऊँगा । दैत्यराज! जहाँ शील होता है, वहीं मैं भी रहता हूँ' ॥ ४ ९ -५०३ ॥
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ततोऽपरो महाराज प्रज्वलन्निव तेजसा ॥ ५१ ॥
शरीरान्निःसृतस्तस्य प्रह्रादस्य महात्मनः । महाराज! तदनन्तर महात्मा प्रह्लादके शरीरसे एक तीसरा पुरुष प्रकट हुआ, जो अपने तेजसे प्रज्वलित - सा हो रहा था ॥ ५१३ ॥
को भवानिति पृष्टश्च तमाह स महाद्युतिः ॥ ५२ ॥
सत्यं विद्धयसुरेन्द्राद्य प्रयास्ये धर्ममन्वहम् । ' आप कौन हैं? ' यह प्रश्न होनेपर उस महातेजस्वीने उन्हें उत्तर दिया –'असुरेन्द्र! मुझे सत्य समझो! मैं अब धर्मके पीछे - पीछे जाऊँगा' ॥ ५२३ ॥
तस्मिन्ननुगते सत्ये महान् वै पुरुषोऽपरः ॥ ५३ ॥
निश्चक्राम ततस्तस्मात् पृष्टश्चाह महाबलः ।
वृत्तं प्रह्लाद मां विद्धि यतः सत्यं ततो ह्यहम् ॥ ५४ ॥
सत्यके चले जानेपर प्रह्लादके शरीरसे दूसरा महापुरुष प्रकट हुआ । परिचय पूछनेपर उस महाबलीने उत्तर दिया – प्रह्लाद! मुझे सदाचार समझो । जहाँ सत्य होता है, वहीं मैं भी रहता हूँ ॥ ५३-५४ ॥
तस्मिन् गते महाशब्दः शरीरात् तस्य निर्ययौ ।
पृष्टश्चाह बलं विद्धि यतो वृत्तमहं ततः ॥ ५५ ॥
उसके चले जानेपर प्रह्लादके शरीरसे महान् शब्द करता हुआ पुनः एक पुरुष प्रकट हुआ। उसने पूछनेपर बताया-'-' मुझे बल समझो । जहाँ सदाचार होता है, वहीं मेरा भी स्थान है ' ॥ ५५ ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र यतो वृत्तं नराधिप ।
ततः प्रभामयी देवी शरीरात् तस्य निर्ययौ ॥ ५६ ॥
तामपृच्छत् स दैत्येन्द्रः सा श्रीरित्येनमब्रवीत् ।
उषितास्मि स्वयं वीर त्वयि सत्यपराक्रम ॥ ५७ ॥
त्वया त्यक्ता गमिष्यामि बलं ह्यनुगता ह्यहम् । नरेश्वर! ऐसा कहकर बल सदाचारके पीछे चला गया । तत्पश्चात् प्रह्लादके शरीरसे एक प्रभामयी देवी प्रकट हुई । दैत्यराजने उससे पूछा- ' आप कौन हैं? ' वह बोली- ' मैं लक्ष्मी हूँ । सत्यपराक्रमी वीर! मैं स्वयं ही आकर तुम्हारे शरीरमें निवास करती थी, परंतु अब तुमने मुझे त्याग दिया; इसलिये चली जाऊँगी; क्योंकि मैं बलकी अनुगामिनी हूँ ' ॥ ५६-५७३ ॥ ततो भयं प्रादुरासीत् प्रह्रादस्य महात्मनः ॥ ५८ ॥
अपृच्छत् स ततो भूयः क्व यासि कमलालये ।
त्वं हि सत्यव्रता देवी लोकस्य परमेश्वरी ।
कश्चासौ ब्राह्मणश्रेष्ठस्तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ ५ ९ ॥
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तब महात्मा प्रह्लादको बड़ा भय हुआ । उन्होंने पुनः पूछा — ' कमलालये! तुम कहाँ जा रही हो, तुम तो सत्यव्रता देवी और सम्पूर्ण जगत्की परमेश्वरी हो । वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कौन था? यह मैं ठीक - ठीक जानना चाहता हूँ' ॥ ५८-५९ ॥ श्रीरुवाच
स शक्रो ब्रह्मचारी यस्त्वत्तश्चैवोपशिक्षितः ।
त्रैलोक्ये ते यदैश्वर्यं तत् तेनापहृतं प्रभो ॥ ६० ॥
लक्ष्मीने कहा - प्रभो! तुमने जिसे उपदेश दिया है, उस ब्रह्मचारी ब्राह्मणके रूपमें साक्षात् इन्द्र थे । तीनों लोकोंमें जो तुम्हारा ऐश्वर्य फैला हुआ था, वह उन्होंने हर लिया ॥ ६० ॥
शीलेन हि त्रयो लोकास्त्वया धर्मज्ञ निर्जिताः ।
तद्विज्ञाय सुरेन्द्रेण तव शीलं हृतं प्रभो ॥ ६१ ॥
धर्मज्ञ! तुमने शीलके द्वारा ही तीनों लोकोंपर विजय पायी थी । प्रभो! यह जानकर ही सुरेन्द्रने तुम्हारे शीलका अपहरण कर लिया है ॥ ६१ ॥
धर्मः सत्यं तथा वृत्तं बलं चैव तथाप्यहम् ।
शीलमूला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्र संशयः ॥ ६२ ॥
महाप्राज्ञ! धर्म, सत्य, सदाचार, बल और मैं ( लक्ष्मी) – ये सब सदा शीलके ही
आधारपर रहते हैं — शील ही इन सबकी जड़ है । इसमे संशय नहीं है ॥ ६२ ॥
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा गता श्रीस्तु ते च सर्वे युधिष्ठिर ।
दुर्योधनस्तु पितरं भूय एवाब्रवीद् वचः ॥ ६३ ॥
शीलस्य तत्त्वमिच्छामि वेत्तुं कौरवनन्दन ।
प्राप्यते च यथा शीलं तं चोपायं वदस्व मे ॥ ६४ ॥
भीष्मजी कहते हैं— ' युधिष्ठिर! यों कहकर लक्ष्मी तथा वे शील आदि समस्त सद्गुण इन्द्रके पास चले गये । इस कथाको सुनकर दुर्योधनने पुनः अपने पितासे कहा - ' कौरवनन्दन! मैं शीलका तत्त्व जानना चाहता हूँ । शील जिस तरह प्राप्त हो सके, वह उपाय भी मुझे बताइये ' ॥ ६३-६४ ॥ धृतराष्ट्रउवाच
सोपायं पूर्वमुद्दिष्टं प्रह्रादेन महात्मना ।
संक्षेपेण तु शीलस्य शृणु प्राप्तिं नरेश्वर ॥ ६५ ॥
धृतराष्ट्रने कहा- नरेश्वर! शीलका स्वरूप और उसे पानेका उपाय – ये दोनों बातें महात्मा प्रह्लादने पहले ही बतायी हैं । मैं संक्षेपसे शीलकी प्राप्तिका उपायमात्र बता रहा हूँ,
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ध्यान देकर सुनो ॥ ६५ ॥
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत् प्रशस्यते ॥ ६६ ॥
मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दया करना और यथाशक्ति दान देना — यह शील कहलाता है, जिसकी सब लोग प्रशंसा करते हैं ॥ ६६ ॥
यदन्येषां हितं न स्यादात्मनः कर्म पौरुषम् ।
अपत्रपेत वा येन न तत् कुर्यात् कथंचन ॥ ६७ ॥
अपना जो भी पुरुषार्थ और कर्म दूसरोंके लिये हितकर न हो अथवा जिसे करनेमें संकोचका अनुभव होता हो, उसे किसी तरह नहीं करना चाहिये ॥ ६७ ॥
तत्तु कर्म तथा कुर्याद् येन श्लाघ्येत संसदि ।
शीलं समासेनैतत् ते कथितं कुरुसत्तम ॥ ६८ ॥
जो कर्म जिस प्रकार करनेसे भरी सभामें मनुष्यकी प्रशंसा हो, उसे उसी प्रकार करना चाहिये । कुरुश्रेष्ठ! यह तुम्हें थोड़ेमें शीलका स्वरूप बताया गया है ॥ ६८ ॥
यद्यप्यशीला नृपते प्राप्नुवन्ति श्रियं क्वचित् ।
न भुञ्जते चिरं तात समूलाश्च न सन्ति ते ॥ ६ ९ ॥
तात! नरेश्वर! यद्यपि कहीं- कहीं शीलहीन मनुष्य भी राजलक्ष्मीको प्राप्त कर लेते हैं, तथापि वे चिरकालतक उसका उपभोग नहीं कर पाते और जड़मूलसहित नष्ट हो जाते हैं ॥ ६ ९ ॥
एतद् विदित्वा तत्त्वेन शीलवान् भव पुत्रक ।
यदीच्छसि श्रियं तात सुविशिष्टां युधिष्ठिरात् ॥ ७० ॥
बेटा! यदि तुम युधिष्ठिरसे भी अच्छी सम्पत्ति प्राप्त करना चाहो तो इस उपदेशको यथार्थरूपसे समझकर शीलवान् बनो ॥ ७० ॥
भीष्म उवाच
एतत् कथितवान् पुत्रे धृतराष्ट्रो नराधिपः ।
एतत् कुरुष्व कौन्तेय ततः प्राप्स्यसि तत् फलम् ॥ ७१ ॥
भीष्मजी कहते हैं – कुन्तीनन्दन! राजा धृतराष्ट्रने अपने पुत्रको यह उपदेश दिया था । तुम भी इसका आचरण करो, इससे तुम्हें भी वही फल प्राप्त होगा ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि शीलवर्णनं नाम चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें शीलवर्णनविषयक एक सौचौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२४ ॥
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पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरका आशाविषयक प्रश्न - उत्तरमें राजा सुमित्र और ऋषभ नामक ऋषिके इतिहासका आरम्भ, उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके पीछे दौड़ना युधिष्ठिर उवाच
शीलं प्रधानं पुरुषे कथितं ते पितामह ।
कथं त्वाशा समुत्पन्ना या चाशा तद् वदस्व मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! आपने पुरुषमें शीलको ही प्रधान बताया है । अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि आशाकी उत्पत्ति कैसे हुई? आशा क्या है? यह भी मुझे बताइये ॥ १ ॥
संशयो मे महानेष समुत्पन्नः पितामह ।
छेत्ता च तस्य नान्योऽस्ति त्वत्तः परपुरञ्जय ॥ २ ॥
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले पितामह! मेरे मनमें यह महान् संशय उत्पन्न हुआ है ।
इसका निवारण करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है ॥ २ ॥
पितामहाशा महती ममासीद्धि सुयोधने ।
प्राप्ते युद्धे तु तद् युक्तं तत् कर्तायमिति प्रभो ॥ ३ ॥
पितामह! दुर्योधनपर मेरी बड़ी भारी आशा थी कि युद्धका अवसर उपस्थित होनेपर वह उचित कार्य करेगा । प्रभो! मैं समझता था कि वह युद्ध किये बिना ही मुझे आधा राज्य लौटा देगा ॥ ३ ॥
सर्वस्याशा सुमहती पुरुषस्योपजायते ।
तस्यां विहन्यमानायां दुःखो मृत्युर्न संशयः ॥ ४ ॥
प्रायः सभी मनुष्योंके हृदयमें कोई-न -कोई बड़ी आशा पैदा होती ही है । उसके भंग होनेपर महान् दुःख होता है । किसी-किसीकी मृत्युतक हो जाती है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥
सोऽहं हताशो दुर्बुद्धिः कृतस्तेन दुरात्मना ।
धार्तराष्ट्रेण राजेन्द्र पश्य मन्दात्मतां मम ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! उस दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रने मुझ दुर्बुद्धिको हताश कर दिया । देखिये, मैं कैसा मन्दभाग्य हूँ ॥ ५ ॥
आशां महत्तरां मन्ये पर्वतादपि सद्रुमात् ।
आकाशादपि वा राजन्नप्रमेयैव वा पुनः ॥ ६ ॥
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राजन्! मैं आशाको वृक्षसहित पर्वतसे भी बहुत बड़ी मानता हूँ अथवा वह आकाशसे भी बढ़कर अप्रमेय है ॥
एषा चैव कुरुश्रेष्ठ दुर्विचिन्त्या सुदुर्लभा ।
दुर्लभत्वाच्च पश्यामि किमन्यद् दुर्लभं ततः ॥ ७ ॥
कुरुश्रेष्ठ! वह अचिन्त्य और परम दुर्लभ है— उसे जीतना कठिन है । उसके दुर्लभ या दुर्जय होनेके कारण ही मैं उसे इतनी बड़ी देखता और समझता हूँ । भला, आशासे बढ़कर दुर्लभ और क्या है? ॥ ७ ॥
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्यामि युधिष्ठिर निबोध तत् ।
इतिहासं सुमित्रस्य निर्वृत्तमृषभस्य च ॥ ८ ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! इस विषयमें मैं राजा सुमित्र तथा ऋषभ मुनिका
पूर्वघटित इतिहास तुम्हें बताऊँगा । उसे ध्यान देकर सुनो ॥ ८ ॥
सुमित्रो नाम राजर्षिर्हेहयो मृगयां गतः ।
ससार स मृगं विद्ध्वा बाणेनानतपर्वणा ॥ ९ ॥
राजर्षि सुमित्र हैहयवंशी राजा थे । एक दिन वे शिकार खेलनेके लिये वनमें गये । वहाँ उन्होंने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे एक मृगको घायल करके उसका पीछा करना आरम्भ किया ॥ ९ ॥
स मृगो बाणमादाय ययावमितविक्रमः ।
स च राजा बलात् तूर्णं ससार मृगयूथपम् ॥ १० ॥
वह मृग बहुत तेज दौड़नेवाला था । वह राजाका बाण लिये दिये भाग निकला । राजाने भी बलपूर्वक मृगोंके उस यूथपतिका तुरंत पीछा किया ॥ १० ॥
ततो निम्नं स्थलं चैव स मृगोऽद्रवदाशुगः ।
मुहूर्तमिव राजेन्द्र समेन स पथागमत् ॥ ११ ॥
राजेन्द्र! शीघ्रतापूर्वक भागनेवाला वह मृग वहाँसे नीची भूमिकी ओर दौड़ा । फिर दो ही घड़ीमें वह समतल मार्गसे भागने लगा ॥ ११ ॥
ततः स राजा तारुण्यादौरसेन बलेन च ।
ससार बाणासनभृत् सखड्गोऽसौ तनुत्रवान् ॥ १२ ॥
राजा भी नौजवान और हार्दिक बलसे सम्पन्न थे, उन्होंने कवच बाँध रखा था । वे धनुष -बाण और तलवार लिये उसका पीछा करने लगे ॥ १२ ॥
ततो नदान् नदीश्चैव पल्वलानि वनानि च ।
अतिक्रम्याभ्यतिक्रम्य ससारैको वनेचरः ॥ १३ ॥