श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 811–820

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 811–820

पृष्ठ 811

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जागर्ति निरृतिर्देवी ज्योतींषि निर्ऋतेरपि ॥ ४६ ॥

व्यवसायसे दण्ड लेकर तेज जगत्की रक्षा करता हुआ सजग रहता है । तेजसे ओषधियाँ, ओषधियोंसे पर्वत, पर्वतोंसे रस, रससे निर्ऋति और निर्ऋतिसे ज्योतियाँ क्रमशः उस दण्डको हस्तगत करके लोक - रक्षाके लिये जागरूक बनी रहती हैं ॥ ४५-४६ ॥

वेदाः प्रतिष्ठा ज्योतिर्भ्यस्ततो हयशिराः प्रभुः ।

ब्रह्मा पितामहस्तस्माज्जागर्ति प्रभुरव्ययः ॥ ४७ ॥

ज्योतियोंसे दण्ड ग्रहण करके वेद प्रतिष्ठित हुए हैं। वेदोंसे भगवान् हयग्रीव और हयग्रीवसे अविनाशी प्रभु ब्रह्मा वह दण्ड पाकर लोक- रक्षाके लिये जागते रहते हैं ॥ ४७ ॥

पितामहान्महादेवो जागर्ति भगवान् शिवः ।

विश्वेदेवाः शिवाच्चापि विश्वेभ्यश्च तथर्षयः ॥ ४८ ॥

ऋषिभ्यो भगवान् सोमः सोमाद् देवाः सनातनाः ।

देवेभ्यो ब्राह्मणा लोके जाग्रतीत्युपधारय ॥ ४९ ॥

पितामह ब्रह्मासे दण्ड और रक्षाका अधिकार पाकर महान् देव भगवान् शिव जागते हैं । शिवसे विश्वेदेव, विश्वेदेवोंसे ऋषि, ऋषियोंसे भगवान् सोम, सोमसे सनातन देवगण और देवताओंसे ब्राह्मण वह अधिकार लेकर लोक- रक्षाके लिये सदा जाग्रत् रहते हैं । इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो ॥ ४८-४९ ॥

ब्राह्मणेभ्यश्च राजन्या लोकान् रक्षन्ति धर्मतः ।

स्थावरं जङ्गमं चैव क्षत्रियेभ्यः सनातनम् ॥ ५० ॥

तदनन्तर ब्राह्मणोंसे दण्ड धारणका अधिकार पाकर क्षत्रिय धर्मानुसार सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करते हैं । क्षत्रियोंसे ही यह सनातन चराचर जगत् सुरक्षित होता रहा है ॥ ५० ॥

प्रजा जागर्ति लोकेऽस्मिन् दण्डो जागर्ति तासु च ।

सर्वं संक्षिपते दण्डः पितामहसमप्रभः ॥ ५१ ॥

इस लोकमें प्रजा जागती है और प्रजाओंमें दण्ड जागता है । वह ब्रह्माजीके समान तेजस्वी दण्ड सबको मर्यादाके भीतर रखता है ॥ ५१ ॥

जागर्ति कालः पूर्वं च मध्ये चान्ते च भारत ।

ईश्वरः सर्वलोकस्य महादेवः प्रजापतिः ॥ ५२ ॥

भारत! यह कालरूप दण्ड सृष्टिके आदिमें, मध्यमें और अन्तमें भी जागता रहता है ।

यह सर्वलोकेश्वर महादेवका स्वरूप है । यही समस्त प्रजाओंका पालक है ॥ ५२ ॥

देवदेवः शिवः सर्वो जागर्ति सततं प्रभुः ॥

कपर्दी शङ्करो रुद्रः शिवः स्थाणुरुमापतिः ॥ ५३ ॥

इस दण्डके रूपमें देवाधिदेव कल्याणस्वरूप सर्वात्मा प्रभु जटाजूटधारी उमावल्लभ दुःखहारी स्थाणु- स्वरूप एवं लोक- मंगलकारी भगवान् शिव ही सदा जाग्रत रहते

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हैं ॥ ५३ ॥

इत्येष दण्डो विख्यात आदौ मध्ये तथावरे ।

भूमिपालो यथान्यायं वर्तेतानेन धर्मवित् ॥ ५४ ॥

इस तरह यह दण्ड आदि, मध्य और अन्तमें विख्यात है । धर्मज्ञ राजाको चाहिये कि इसके द्वारा न्यायोचित बर्ताव करे ॥ ५४ ॥

भीष्मउवाच

इतीदं वसुहोमस्य शृणुयाद् यो मतं नरः ।

श्रुत्वा सम्यक् प्रवर्तेत सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ ५५ ॥

भीष्मजी कहते हैं — यधिष्ठिर! जो नरेश इस प्रकार बताये हुए वसुहोमके इस मतको सुनता और सुनकर यथोचित बर्ताव करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ५५ ॥

इति ते सर्वमाख्यातं यो दण्डो मनुजर्षभ ।

नियन्ता सर्वलोकस्य धर्माक्रान्तस्य भारत ॥ ५६ ॥

नरश्रेष्ठ! भरतनन्दन! जो दण्ड सम्पूर्ण धार्मिक जगत्के नियमके भीतर रखनेवाला है, उसके सम्बन्धमें जितनी बातें हैं, उन्हें मैंने तुम्हें बता दीं ॥ ५६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दण्डोत्पत्युपाख्याने द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ । इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दण्डकी उत्पत्तिकी कथाविषयक एक सौ बाइसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२२ ॥

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त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः त्रिवर्गका विचार तथा पापके कारण पदच्युत हुए राजाके पुनरुत्थानके विषयमें आंगरिष्ठ और कामन्दकका संवाद युधिष्ठिर उवाच

तात धर्मार्थकामानां श्रोतुमिच्छामि निश्चयम् ।

लोकयात्रा हि कार्त्स्न्येन तिष्ठेत् केषु प्रतिष्ठिता ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — तात! मैं धर्म, अर्थ और कामके सम्बन्धमें आपका निश्चित मत सुनना चाहता हूँ । किनपर अवलम्बित होनेपर लोकयात्राका पूर्ण रूपसे निर्वाह होता है? ॥ १ ॥

धर्मार्थकामाः किंमूलास्त्रयाणां प्रभवश्च कः ।

अन्योन्यं चानुषज्जन्ते वर्तन्ते च पृथक् पृथक् ॥ २ ॥

धर्म, अर्थ और कामका मूल क्या है? इन तीनोंकी उत्पत्तिका कारण क्या है? ये कहीं एक साथ मिले हुए और कहीं पृथक् - पृथक् क्यों रहते हैं? ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

यदा ते स्युः सुमनसो लोके धर्मार्थनिश्चये ।

कालप्रभवसंस्थासु सज्जन्ते च त्रयस्तदा ॥ ३ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! संसारमें जब मनुष्योंका चित्त शुद्ध होता है और वे धर्मपूर्वक किसी अर्थकी प्राप्तिका निश्चय करके प्रवृत्त होते हैं, उस समय उचित काल, कारण तथा कर्मानुष्ठानवश धर्म, अर्थ और काम-तीनों एक साथ मिले हुए प्रकट होते हैं ॥ ३ ॥

धर्ममूलः सदैवार्थः कामोऽर्थफलमुच्यते ।

संकल्पमूलास्ते सर्वे संकल्पो विषयात्मकः ॥। ४ ॥

इनमें धर्म सदा ही अर्थकी प्राप्तिका कारण है और काम अर्थका फल कहलाता है, परंतु इन तीनोंका मूल कारण है संकल्प और संकल्प है विषयरूप ॥ ४ ॥

विषयाश्चैव कार्त्स्न्येन सर्व आहारसिद्धये ।

मूलमेतत् त्रिवर्गस्य निवृत्तिर्मोक्ष उच्यते ॥ ५ ॥

सम्पूर्ण विषय पूर्णतः इन्द्रियोंके उपभोगमें आनेके लिये हैं । यही धर्म, अर्थ और कामका मूल है, इससे निवृत्त होना ही ' मोक्ष' कहा जाता है ॥ ५ ॥

धर्माच्छरीरसंगुप्तिर्धर्मार्थं चार्थ उच्यते ।

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कामो रतिफलश्चात्र सर्वे ते च रजस्वलाः ॥ ६ ॥

धर्मसे शरीरकी रक्षा होती है, धर्मका उपार्जन करनेके लिये ही अर्थकी आवश्यकता

बतायी जाती है तथा कामका फल है रति । वे सभी रजोगुणमय हैं ॥ ६ ॥

संनिकृष्टांश्चरेदेतान् न चैतान् मनसा त्यजेत् ।

विमुक्तस्तपसा सर्वान् धर्मादीन् कामनैष्ठिकान् ॥ ७ ॥

ये धर्म आदि जिस प्रकार संनिकृष्ट अर्थात् अपना वास्तविक हित करनेवाले हों, उसी रूपमें इनका सेवन करे अर्थात् इनको कल्याणसाधन बनाकर ही उपयोगमें लावे । मनद्वारा भी इनका त्याग न करे, फिर स्वरूपसे शरीरद्वारा त्याग करना तो दूरकी बात है । केवल तप अथवा विचारके द्वारा ही उनसे अपनेको मुक्त रखे अर्थात् आसक्ति और फलका त्याग करके ही इन सब धर्म, अर्थ और कामका सेवन करना चाहिये ॥ ७ ॥

श्रेष्ठे बुद्धिस्त्रिवर्गस्य यदयं प्राप्नुयान्नरः ।

कर्मणा बुद्धिपूर्वेण भवत्यर्थो न वा पुनः ॥ ८ ॥

आसक्ति और फलेच्छाको त्यागकर त्रिवर्गका सेवन किया जाय तो उसका पर्यवसान कल्याणमें ही होता है । यदि मनुष्य उसे प्राप्त कर सके तो बड़े सौभाग्यकी बात है । अर्थसिद्धिके लिये समझ- बूझकर धर्मानुष्ठान करनेपर भी कभी अर्थकी सिद्धि होती है, कभी नहीं होती है ॥ ८ ॥

अर्थार्थमन्यद् भवति विपरीतमथापरम् ।

अनर्थार्थमवाप्यार्थमन्यत्राद्योपकारकम् ।

बुद्धयाबुद्धिरिहार्थे न तदज्ञाननिकृष्टया ॥ ९ ॥

इसके सिवा, कभी दूसरे दूसरे उपाय भी अर्थके साधक हो जाते हैं और कभी अर्थसाधक कर्म भी विपरीत फल देनेवाला हो जाता है। कभी धन पाकर भी मनुष्य अनर्थकारी कर्मोंमें प्रवृत्त हो जाता है और धनसे भिन्न जो दूसरे- दूसरे साधन हैं, वे धर्ममें सहायक हो जाते हैं । अतः धर्मसे धन होता है और धनसे धर्म, इस मान्यताके विषयमें अज्ञानमयी निकृष्ट बुद्धिसे मोहित हुआ मूढ़ मानव विश्वास नहीं रखता, इसलिये उसे दोनोंका फल सुलभ नहीं होता ॥ ९ ॥

अपध्यानमलो धर्मो मलोऽर्थस्य निगूहनम् ।

सम्प्रमोदमलः कामो भूयः स्वगुणवर्जितः ॥ १० ॥

फलकी इच्छा धर्मका मल है, संगृहीत करके रखना अर्थका मल है और अमोद - प्रमोद कामका मल है, परंतु यह त्रिवर्ग यदि अपने दोषोंसे रहित हो तो कल्याणकारक होता ॥ १० ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

कामन्दकस्य संवादमाङ्गरिष्ठस्य चोभयोः ॥ ११ ॥

पृष्ठ 815

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इस विषयमें जानकार लोग राजा आंगरिष्ठ और कामन्दक मुनिका संवादरूप प्राचीन इतिहास सुनाया करते हैं ॥ ११ ॥

कामन्दमृषिमासीनमभिवाद्य नराधिपः ।

आङ्गरिष्ठोऽथ पप्रच्छ कृत्वा समयपर्ययम् ॥ १२ ॥

एक समयकी बात है, कामन्दक ऋषि अपने आश्रममें बैठे थे । उन्हें प्रणाम करके राजा आंगरिष्ठने प्रश्नके उपयुक्त समय देखकर पूछा- ॥ १२ ॥

यः पापं कुरुते राजा काममोहबलात्कृतः ।

प्रत्यासन्नस्य तस्यर्षे किं स्यात् पापप्रणाशनम् ॥ १३ ॥

' महर्षे! यदि कोई राजा काम और मोहके वशीभूत होकर पाप कर बैठे, किंतु फिर उसे पश्चात्ताप होने लगे तो उसके उस पापको दूर करनेके लिये कौन- सा प्रायश्चित्त है? ॥ १३ ॥

अधर्मं धर्म इति च योऽज्ञानादाचरेन्नरः ।

तं चापि प्रथितं लोके कथं राजा निवर्तयेत् ॥ १४ ॥

'जो अज्ञानवश अधर्मको ही धर्म मानकर उसका आचरण कर रहा हो, उस लोकविख्यात सम्मानित पुरुषको राजा किस प्रकार उस अधर्मसे दूर हटावे? ॥ १४ ॥

कामन्दक उवाच

यो धर्मार्थौ परित्यज्य काममेवानुवर्तते ।

स धर्मार्थपरित्यागात् प्रज्ञानाशमिहार्च्छति ॥ १५ ॥

कामन्दकने कहा — राजन्! जो धर्म और अर्थका परित्याग करके केवल कामका ही सेवन करता है, उन दोनोंके त्यागसे उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है ॥ १५ ॥

प्रज्ञानाशात्मको मोहस्तथा धर्मार्थनाशकः ।

तस्मान्नास्तिकता चैव दुराचारश्च जायते ॥ १६ ॥

बुद्धिका नाश ही मोह है। वह धर्म और अर्थ दोनोंका विनाश करनेवाला है । इससे मनुष्यमें नास्तिकता आती है और वह दुराचारी हो जाता है ॥ १६ ॥

दुराचारान् यदा राजा प्रदुष्टान् न नियच्छति ।

तस्मादुद्विजते लोकः सर्पाद् वेश्मगतादिव ॥ १७ ॥

जब राजा दुष्टों और दुराचारियोंको दण्ड देकर काबूमें नहीं करता है, तब सारी प्रजा घरमें रहनेवाले सर्पकी भाँति उस राजासे उद्विग्न हो उठती है ॥ १७ ॥

तं प्रजा नानुवर्तन्ते ब्राह्मणा न च साधवः ।

ततः संशयमाप्नोति तथा वध्यत्वमेति च ॥ १८ ॥

उस दशामें प्रजा उसका साथ नहीं देती । साधु और ब्राह्मण भी उसका अनुसरण नहीं करते हैं । फिर तो उसका जीवन खतरेमें पड़ जाता है और अन्ततोगत्वा वह प्रजाके ही हाथसे मारा भी जाता है ॥ १८ ॥

पृष्ठ 816

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अपध्वस्तस्त्ववमतो दुःखं जीवितमृच्छति ।

जीवेच्च यदपध्वस्तस्तच्छुद्धं मरणं भवेत् ॥ १ ९ ॥

वह अपने पदसे भ्रष्ट और अपमानित होकर दुःखमय जीवन बिताता है । यदि पदभ्रष्ट होकर भी वह जीता है तो वह जीवन भी स्पष्टरूपमें मरण ही है ॥ १ ९ ॥

अत्रैतदाहुराचार्याः पापस्य परिगर्हणम् ।

सेवितव्या त्रयी विद्या सत्कारो ब्राह्मणेषु च ॥ २० ॥

इस अवस्थामें आचार्यगण उसके लिये यह कर्तव्य बतलाते हैं कि वह अपने पापोंकी निन्दा करे, वेदोंका निरन्तर स्वाध्याय करे और ब्राह्मणोंका सत्कार करे ॥ २० ॥

महामना भवेद् धर्मे विवहेच्च महाकुले ।

ब्राह्मणांश्चापि सेवेत क्षमायुक्तान् मनस्विनः ॥ २१ ॥

धर्माचरणमें विशेष मन लगावे । उत्तम कुलमें विवाह करे । उदार एवं क्षमाशील ब्राह्मणोंकी सेवामें रहे ॥

जपेदुदकशीलः स्यात् सततं सुखमास्थितः ।

धर्मान्वितान् सम्प्रविशेद् बहिः कृत्वेह दुष्कृतीन् ॥ २२ ॥

वह जलमें खड़ा होकर गायत्रीका जप करे । सदा प्रसन्न रहे । पापियोंको राज्यसे बाहर निकालकर धर्मात्मा पुरुषोंका संग करे ॥ २२ ॥

प्रसादयेन्मधुरया वाचा वाप्यथ कर्मणा ।

तवास्मीति वदेन्नित्यं परेषां कीर्तयन् गुणान् ॥ २३ ॥

मीठी वाणी तथा उत्तम कर्मके द्वारा सबको प्रसन्न रखे, दूसरोंके गुणोंका बखान करे और सबसे यही कहे — मैं आपका ही हूँ– आप मुझे अपना ही समझें ॥ २३ ॥

अपापो ह्येवमाचारः क्षिप्रं बहुमतो भवेत् ।

पापान्यपि हि कृच्छ्राणि शमयेन्नात्र संशयः ॥ २४ ॥

जो राजा इस प्रकार अपना आचरण बना लेता है, वह शीघ्र ही निष्पाप होकर सबके सम्मानका पात्र बन जाता है । वह अपने कठिन से कठिन पापोंको भी शान्त ( नष्ट ) कर देता है— इसमें संशय नहीं है ॥ २४ ॥

गुरवो हि परं धर्मं यं ब्रूयुस्तं तथा कुरु ।

गुरूणां हि प्रसादाद् वै श्रेयः परमवाप्स्यसि ॥ २५ ॥

राजन्! गुरुजन तुम्हारे लिये जिस उत्तम धर्मका उपदेश करें, उसका उसी रूपमें पालन करो । गुरुजनोंकी कृपासे तुम परम कल्याणके भागी होओगे ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कामन्दकाङ्गरिष्ठसंवादे त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥

पृष्ठ 817

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इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कामन्दक और आंगरिष्ठका संवादविषयक एक सौ तेईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १२३ ॥

पृष्ठ 818

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चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः इन्द्र और प्रह्लादकी कथा - शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन युधिष्ठिर उवाच

इमे जना नरश्रेष्ठ प्रशंसन्ति सदा भुवि ।

धर्मस्य शीलमेवादौ ततो मे संशयो महान् ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा – नरश्रेष्ठ! पितामह! भूमण्डलके ये सभी मनुष्य सर्वप्रथम धर्मके अनुरूप शीलकी ही अधिक प्रशंसा करते हैं; अतः इस विषयमें मुझे बड़ा भारी संदेह हो गया है ॥ १ ॥

यदि तच्छक्यमस्माभिर्ज्ञातुं धर्मभृतां वर ।

श्रोतुमिच्छामि तत् सर्वं यथैतदुपलभ्यते ॥ २ ॥

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ! यदि मै उसे जान सकूँ तो जिस प्रकार शीलकी उपलब्धि होती है, वह सब सुनना चाहता हूँ ॥ ॥

कथं तत् प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत ।

किंलक्षणं च तत् प्रोक्तं ब्रूहि मे वदतां वर ॥ ३ ॥

भारत! वह शील कैसे प्राप्त होता है? यह सुननेकी मेरी बड़ी इच्छा है । वक्ताओंमें श्रेष्ठ पितामह! उसका क्या लक्षण बताया गया है? यह मुझसे कहिये ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

पुरा दुर्योधनेनेह धृतराष्ट्राय मानद ।

आख्यातं तप्यमानेन श्रियं दृष्ट्वा तथागताम् ॥ ४ ॥

इन्द्रप्रस्थे महाराज तव सभ्रातृकस्य ह ।

सभायां चाह वचनं तत् सर्वं शृणु भारत ॥ ५ ॥

भवतस्तां सभां दृष्ट्वा समृद्धिं चाप्यनुत्तमाम् ।

दुर्योधनस्तदाऽऽसीनः सर्वं पित्रे न्यवेदयत् ॥ ६ ॥

भीष्मजीने कहा – दूसरोंको मान देनेवाले महाराज! भरतनन्दन! पहले इन्द्रप्रस्थमें ( राजसूययज्ञके समय ) भाइयोंसहित तुम्हारी वैसी अद्भुत श्री- सम्पत्ति, वह परम उत्तम सभा और समृद्धि देखकर संतप्त हुए दुर्योधनने कौरवसभामें बैठकर पिता धृतराष्ट्रसे अपनी गहरी चिन्ता प्रकट की - सारी मनोव्यथा कह सुनायी । उसने सभामें जो बातें कही थीं, वह सब सुनो ॥

पृष्ठ 819

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श्रुत्वा हि धृतराष्ट्रश्च दुर्योधनवचस्तदा ।

अब्रवीत् कर्णसहितं दुर्योधनमिदं वचः ॥ ७ ॥

उस समय धृतराष्ट्रने दुर्योधनकी बात सुनकर कर्णसहित उससे इस प्रकार कहा ॥ ७ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

किमर्थं तप्यसे पुत्र श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।

श्रुत्वा त्वामनुनेष्यामि यदि सम्यग् भविष्यति ॥ ८ ॥

धृतराष्ट्र बोले- बेटा! तुम किसलिये संतप्त हो रहे हो? यह मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ, सुनकर यदि उचित होगा तो तुम्हें समझानेका प्रयत्न करूँगा ॥ ८ ॥

त्वया च महदैश्वर्यं प्राप्तं परपुरञ्जय ।

किंकरा भ्रातरः सर्वे मित्रसम्बन्धिनः सदा ॥ ९ ॥

शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले वीर! तुमने भी तो महान् ऐश्वर्य प्राप्त किया है? तुम्हारे समस्त भाई, मित्र और सम्बन्धी सदा तुम्हारी सेवामें उपस्थित रहते हैं ॥

आच्छादयसि प्रावारानश्नासि पिशितौदनम् ।

आजानेया वहन्त्यश्वाः केनासि हरिणः कृशः ॥ १० ॥

तुम अच्छे - अच्छे वस्त्र ओढ़ते - पहनते हो, पिशितौदन खाते हो और ‘ आजानेय' अश्व ( अरबी घोड़े ) तुम्हारा रथ खींचते हैं, फिर तुम क्यों सफेद और दुबले हुए जाते हो? ॥ १० ॥

दुर्योधन उवाच

दश तानि सहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् ।

भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ॥ ११ ॥

दुर्योधनने कहा - पिताजी! युधिष्ठिरके महलमें दस हजार महामनस्वी स्नातक ब्राह्मण प्रतिदिन सोनेकी थालियोंमें भोजन करते हैं ॥ ११ ॥

दृष्ट्वा च तां सभां दिव्यां दिव्यपुष्पफलान्विताम् ।

अश्वांस्तित्तिरकल्माषान् वस्त्राणि विविधानि च ॥ १२ ॥

दृष्ट्वा तां पाण्डवेयानामृद्धिं वैश्रवणीं शुभाम् ।

अमित्राणां सुमहतीमनुशोचामि भारत ॥ १३ ॥

भारत! दिव्य फल-फूलोंसे सुशोभित वह दिव्य सभा, वे तीतरके समान रंगवाले चितकबरे घोड़े और वे भाँति- भाँतिके दिव्य वस्त्र ( अपने पास कहाँ हैं? वह सब ) देखकर अपने शत्रु पाण्डवोंके उस कुबेरके समान शुभ एवं विशाल ऐश्वर्यका अवलोकन करके मैं निरन्तर शोकमें डूबा जा रहा हूँ ॥ १२-१३ ॥ धृतराष्ट्रउवाच

पृष्ठ 820

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यदीच्छसि श्रियं तात यादृशी सा युधिष्ठिरे ।

विशिष्टां वा नरव्याघ्र शीलवान् भव पुत्रक ॥ १४ ॥

धृतराष्ट्रने कहा - तात! पुरुषसिंह! बेटा! युधिष्ठिरके पास जैसी सम्पत्ति है, वैसी या उससे भी बढ़कर राजलक्ष्मीको यदि तुम पाना चाहते हो तो शीलवान् बनो ॥ १४ ॥

शीलेन हि त्रयो लोकाः शक्या जेतुं न संशयः ।

न हि किंचिदसाध्यं वै लोके शीलवतां भवेत् ॥ १५ ॥

इसमें संशय नहीं है कि शीलके द्वारा तीनों लोकोंपर विजय पायी जा सकती है ।

शीलवानोंके लिये संसारमें कुछ भी असाध्य नहीं है ॥ १५ ॥

एकरात्रेण मान्धाता त्र्यहेण जनमेजयः ।

सप्तरात्रेण नाभागः पृथिवीं प्रतिपेदिरे ॥ १६ ॥

मान्धाताने एक ही दिनमें, जनमेजयने तीन ही दिनोंमें और नाभागने सात दिनोंमें ही इस पृथ्वीका राज्य प्राप्त किया था ॥ १६ ॥

एते हि पार्थिवाः सर्वे शीलवन्तो दयान्विताः ।

अतस्तेषां गुणक्रीता वसुधा स्वयमागता ॥ १७ ॥

ये सभी राजा शीलवान् और दयालु थे । अतः उनके द्वारा गुणोंके मोल खरीदी हुई यह पृथ्वी स्वयं ही उनके पास आयी थी ॥ १७ ॥

दुर्योधनउवाच

कथं तत् प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत ।

येन शीलेन तैः प्राप्ता क्षिप्रमेव वसुन्धरा ॥ १८ ॥

दुर्योधनने पूछा- भारत! जिसके द्वारा उन राजाओंने शीघ्र ही भूमण्डलका राज्य प्राप्त कर लिया, वह शील कैसे प्राप्त होता है? यह मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १८ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

नारदेन पुरा प्रोक्तं शीलमाश्रित्य भारत ॥ १ ९ ॥

धृतराष्ट्र बोले — भरतनन्दन! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसे नारदजीने पहले शीलके प्रसंगमें कहा था ॥ १ ९ ॥

प्रह्रादेन हृतं राज्यं महेन्द्रस्य महात्मनः ।

शीलमाश्रित्य दैत्येन त्रैलोक्यं च वशे कृतम् ॥ २० ॥

दैत्यराज प्रह्लादने शीलका ही आश्रय लेकर महामना महेन्द्रका राज्य हर लिया और तीनों लोकोंको भी अपने वशमें कर लिया ॥ २० ॥

ततो बृहस्पतिं शक्रः प्राञ्जलिः समुपस्थितः ।

तमुवाच महाप्राज्ञः श्रेय इच्छामि वेदितुम् ॥ २१ ॥