श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 831–840

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 831–840

पृष्ठ 831

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 831 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उधर वह वनमें विचरनेवाला मृग अकेला ही अनेकों नदों, नदियों, गड्ढों और जंगलोंको बारंबार लाँघता हुआ आगे - आगे भागता जा रहा था ॥ १३

स तु कामान्मृगो राजन्नासाद्यासाद्य तं नृपम् ।

पुनरभ्येति जवनो जवेन महता ततः ॥ १४ ॥

राजन्! वह वेगशाली मृग अपनी इच्छासे ही राजाके निकट आ- आकर पुनः बड़े वेगसे आगे भागता था ॥

स तस्य बाणैर्बहुभिः समभ्यस्तो वनेचरः ।

प्रक्रीडन्निव राजेन्द्र पुनरभ्येति चान्तिकम् ॥ १५ ॥

राजेन्द्र! यद्यपि राजाके बहुत - से बाण उसके शरीरमें धँस गये थे, तथापि वह वनचारी मृग खेल करता हुआ - सा बारंबार उनके निकट आ जाता था ॥ १५ ॥

पुनश्च जवमास्थाय जवनो मृगयूथपः ।

अतीत्यातीत्य राजेन्द्र पुनरभ्येति चान्तिकम् ॥ १६ ॥

राजेन्द्र! वह मृगसमूहोंका सरदार था । उसका वेग बड़ा तीव्र था । वह बारंबार बड़े वेगसे छलाँग मारता और दूरतककी भूमि लाँघ लाँघकर पुनः निकट आ जाता था ॥ १६ ॥

तस्य मर्मच्छिदं घोरं तीक्ष्णं चामित्रकर्शनः ।

समादाय शरं श्रेष्ठं कार्मुके तु तथासृजत् ॥ १७ ॥

तब शत्रुसूदन नरेशने एक बड़ा भयंकर तीखा बाण हाथमें लिया, जो मर्मस्थलोंको

विदीर्ण कर देनेवाला था । उस श्रेष्ठ बाणको उन्होंने धनुषपर रखा ॥

ततो गव्यूतिमात्रेण मृगयूथपयूथपः ।

तस्य बाणपथं मुक्त्वा तस्थिवान् प्रहसन्निव ॥ १८ ॥

यह देख मृगोंका वह यूथपति राजाके बाणका मार्ग छोड़कर दो कोस दूर जा पहुँचा और हँसता हुआ - सा खड़ा हो गया ॥ १८ ॥

तस्मिन् निपतिते बाणे भूमौ ज्वलिततेजसि ।

प्रविवेश महारण्यं मृगो राजाप्यथाद्रवत् ॥ १ ९ ॥

जब राजाका वह तेजस्वी बाण पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब मृग एक महान् वनमें घुस गया, राजाने उस समय भी उसका पीछा नहीं छोड़ा ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमेंऋषभगीताविषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥

पृष्ठ 832

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 832 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः राजा सुमित्रका मृगकी खोज करते हुए तपस्वी मुनियोंके आश्रमपर पहुँचना और उनसे आशाके विषयमें प्रश्न करना भीष्म उवाच

प्रविश्य स महारण्यं तापसानामथाश्रमम् ।

आससाद ततो राजा श्रान्तश्चोपाविशत् तदा ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उस महान् वनमें प्रवेश करके राजा सुमित्र तापसोंके आश्रमपर जा पहुँचे और वहाँ थककर बैठ गये ॥ १ ॥

तं कार्मुकधरं दृष्ट्वा श्रमार्तं क्षुधितं तदा ।

समेत्य ऋषयस्तस्मिन् पूजां चक्रुर्यथाविधि ॥ २ ॥

वे परिश्रमसे पीड़ित और भूखसे व्याकुल हो रहे थे । उस अवस्थामें धनुष धारण किये राजा सुमित्रको देखकर बहुत-से ऋषि उनके पास आये और सबने मिलकर उनका विधिपूर्वक स्वागत -सत्कार किया ॥ २ ॥

स पूजामृषिभिर्दत्तां सम्प्रगृह्य नराधिपः ।

अपृच्छत् तापसान् सर्वांस्तपसो वृद्धिमुत्तमाम् ॥ ३ ॥

ऋषियोंद्वारा किये गये उस स्वागत- सत्कारको ग्रहण करके राजाने भी उन सब तापसोंसे उनकी तपस्याकी भलीभाँति वृद्धि होनेका समाचार पूछा ॥ ३ ॥

ते तस्य राज्ञो वचनं सम्प्रगृह्य तपोधनाः ।

ऋषयो राजशार्दूलं तमपृच्छन् प्रयोजनम् ॥ ४ ॥

उन तपस्याके धनी महर्षियोंने राजाके वचनोंको सादर ग्रहण करके उन नृपश्रेष्ठके वहाँ आनेका प्रयोजन पूछा ॥ ४ ॥

केन भद्र सुखार्थेन सम्प्राप्तोऽसि तपोवनम् ।

पदातिर्बद्धनिस्त्रिंशो धन्वी बाणी नरेश्वर ॥ ५ ॥

‘ कल्याणस्वरूप नरेश्वर! किस सुखके लिये आप इस तपोवनमें तलवार बाँधे धनुष और बाण लिये पैदल ही चले आये हैं? ॥ ५ ॥

एतदिच्छामहे श्रीतुं कुतः प्राप्तोऽसि मानद ।

कस्मिन् कुले तु जातस्त्वं किंनामा चासि ब्रूहि नः ॥ ६ ॥

‘ मानद! हम यह सब सुनना चाहते हैं, आप कहाँसे पधारे हैं? किस कुलमें आपका जन्म हुआ है? तथा आपका नाम क्या है? ये सारी बातें हमें बताइये ' ॥ ततः स राजा सर्वेभ्यो द्विजेभ्यः पुरुषर्षभ ।

पृष्ठ 833

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 833 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

आचचक्षे यथान्यायं परिचर्यां च भारत ॥ ७ ॥

पुरुषप्रवर भरतनन्दन! तदनन्तर राजा सुमित्रने उन समस्त ब्राह्मणोंसे यथोचित बात कही और अपना कार्यक्रम बताया- ॥ ७ ॥

हैहयानां कुले जातः सुमित्रो मित्रनन्दनः ।

चरामि मृगयूथानि निघ्नन् बाणैः सहस्रशः ॥ ८ ॥

‘ तपोधनो! मेरा जन्म हैहय कुलमें हुआ है । मैं मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाला राजा सुमित्र हूँ और सहस्रों बाणोंके आघातसे मृग- समूहोंका विनाश करता हुआ विचर रहा ॥ ८ ॥

बलेन महता गुप्तः सामात्यः सावरोधनः ।

मृगस्तु विद्धो बाणेन मया सरति शल्यवान् ॥ ९ ॥

' मेरे साथ बहुत बड़ी सेना थी । उसके द्वारा सुरक्षित हो मैं मन्त्री और अन्तःपुरके साथ आया था, परंतु मेरे बाणोंसे घायल हुआ एक मृग बाणसहित इधर ही भाग निकला ॥ ९ ॥

तं द्रवन्तमनुप्राप्तो वनमेतद् यदृच्छया ।

भवत्सकाशं नष्टश्रीर्हताशः श्रमकर्शितः ॥ १० ॥

‘ उस भागते हुए मृगके पीछे मैं अकस्मात् इस वनमें आपलोगोंके समीप आ पहुँचा हूँ । मेरी सारी शोभा नष्ट हो गयी है । मैं हताश होकर भारी परिश्रमसे कष्ट पा रहा हूँ ॥ १० ॥

किं नु दुःखमतोऽन्यद् वै यदहं श्रमकर्शितः ।

भवतामाश्रमं प्राप्तो हताशो भ्रष्टलक्षणः ॥ ११ ॥

‘ मैंने परिश्रमके कारण जो इतना कष्ट पाया है और अपने राजचिह्नोंसे भ्रष्ट होकर एक हताशकी भाँति आपके आश्रममें पैर रखा है, इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है? ॥ ११ ॥

न राजलक्षणत्यागो न पुरस्य तपोधनाः ।

दुःखं करोति तत् तीव्रं यथाऽऽशा विहता मम ॥ १२ ॥

‘ तपोधनो! नगर तथा राजचिह्नोंका परित्याग मुझे वैसा तीव्र कष्ट नहीं दे रहा है, जैसा कि मेरी भग्न हुई आशा दे रही है ॥ १२ ॥

हिमवान् वा महाशैलः समुद्रो वा महोदधिः ।

महत्त्वान्नान्वपद्येतां नभसो वान्तरं तथा ॥ १३ ॥

आशायास्तपसि श्रेष्ठास्तथा नान्तमहं गतः ।

भवतां विदितं सर्वं सर्वज्ञा हि तपोधनाः ॥ १४ ॥

' महान् पर्वत हिमालय अथवा अगाध जलराशि समुद्र अपनी विशालताके द्वारा आशाकी समानता नहीं कर सकते । तपस्यामें श्रेष्ठ तपोधनो! जैसे आकाशका कहीं अन्त नहीं है, उसी प्रकार मैं आशाका अन्त नहीं पा सका हूँ । आपको तो सब कुछ मालूम ही है; क्योंकि तपोधन मुनि सर्वज्ञ होते हैं ॥ १३-१४ ॥

पृष्ठ 834

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 834 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भवन्तः सुमहाभागास्तस्मात् पृच्छामि संशयम् ।

आशावान् पुरुषो यः स्यादन्तरिक्षमथापि वा ॥ १५ ॥

किं नु ज्यायस्तरं लोके महत्त्वात् प्रतिभाति वः ।

एतदिच्छामि तत्त्वेन श्रीतुं किमिह दुर्लभम् ॥ १६ ॥

‘ आप महान् सौभाग्यशाली तपस्वी हैं; इसलिये मैं आपसे अपने मनका संदेह पूछता हूँ । एक ओर आशावान् पुरुष हो और दूसरी ओर अनन्त आकाश हो तो जगत्में महत्ताकी दृष्टिसे आपलोगोंको कौन बड़ा जान पड़ता है? मैं इस बातको तत्त्वसे सुनना चाहता हूँ । भला, यहाँ आकर कौन - सी वस्तु दुर्लभ रहेगी? ॥ १५-१६ ॥

यदि गुह्यं न वो नित्यं तदा प्रब्रूत मा चिरम् ।

न गुह्यं श्रोतुमिच्छामि युष्मद्भ्यो द्विजसत्तमाः ॥ १७ ॥

‘ यदि आपके लिये सदा यह कोई गोपनीय रहस्य न हो तो शीघ्र इसका वर्णन कीजिये । विप्रवरों! मैं आपलोगोंसे ऐसी कोई बात नहीं सुनना चाहता, जो गोपनीय रहस्य हो ॥ १७ ॥

भवत् तपोविघातो वा यदि स्याद् विरमे ततः ।

यदि वास्ति कथायोगो योऽयं प्रश्नो मयेरितः ॥ १८ ॥

एतत् कारणसामर्थ्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।

भवन्तोऽपि तपोनित्या ब्रूयुरेतत् समन्विताः ॥ १ ९ ॥

‘ यदि मेरे इस प्रश्नसे आपलोगोंकी तपस्यामें विघ्न पड़ रहा हो तो मैं इससे विराम लेता हूँ और यदि आपके पास बातचीतका समय हो तो जो प्रश्न मैंने उपस्थित किया है, इसका आप समाधान करें । मैं इस आशाके कारण और सामर्थ्यके विषयमें ठीक- ठीक सुनना चाहता हूँ। आपलोग भी सदा तपमें संलग्न रहनेवाले हैं; अतः एकत्र होकर इस प्रश्नका विवेचन करें ' ॥ १८-१९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमेंऋषभगीताविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥

पृष्ठ 835

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 835 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ऋषभका राजा सुमित्रको वीरद्युम्न और तनु मुनिका वृत्तान्त सुनाना भीष्म उवाच

ततस्तेषां समस्तानामृषीणामृषिसत्तमः ।

ऋषभो नाम विप्रर्षिर्विस्मयन्निदमब्रवीत् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर उन समस्त ऋषियोंमेंसे मुनिश्रेष्ठ ब्रह्मर्षि ऋषभने विस्मित होकर इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

पुराहं राजशार्दूल तीर्थान्यनुचरन् प्रभो ।

समासादितवान् दिव्यं नरनारायणाश्रमम् ॥ २ ॥

नृपश्रेष्ठ! पहलेकी बात है, मैं सब तीर्थोंमें विचरण करता हुआ भगवान् नरनारायणके दिव्य आश्रममें जा पहुँचा ॥ २ ॥

यत्र सा बदरी रम्या ह्रदो वैहायसस्तथा ।

यत्र चाश्वशिरा राजन् वेदान् पठति शाश्वतान् ॥ ३ ॥

' राजन्! जहाँ वह रमणीय बदरीका वृक्ष है, जहाँ वैहायस- कुण्ड है तथा जहाँ अश्वशिरा ( हयग्रीव ) सनातन वेदोंका पाठ करते हैं ( वहीं नरनारायणाश्रम है ) ॥

तस्मिन् सरसि कृत्वाहं विधिवत् तर्पणं पुरा ।

पितॄणां देवतानां च ततोऽऽश्रममियां तदा ॥ ४ ॥

रेमाते यत्र तौ नित्यं नरनारायणावृषी । उस वैहायस कुण्डमें स्नान करके मैंने विधिपवूक देवताओं और पितरोंका तर्पण किया । उसके बाद उस आश्रममें प्रवेश किया, जहाँ मुनिवर नर और नारायण नित्य सानन्द निवास करते हैं ॥ ४३ ॥

अदूरादाश्रमं कञ्चिद् वासार्थमगमं तदा ॥ ५ ॥

तत्र चीराजिनधरं कृशमुच्चमतीव च ।

अद्राक्षमृषिमायान्तं तनुं नाम तपोधनम् ॥६ ॥

उसके बाद वहाँसे निकट ही एक- दूसरे आश्रममें मैं ठहरनेके लिये गया । वहाँ मुझे तनु

नामवाले एक तपोधन ऋषि आते दिखायी दिये, जो चीर और मृगचर्म धारण किये हुए थे ।

उनका शरीर बहुत ऊँचा और अत्यन्त दुर्बल था ॥ ५-६ ॥

अन्यैर्नरैर्महाबाहो वपुषाष्टगुणान्वितम् ।

कृशता चापि राजर्षे न दृष्टा तादृशी क्वचित् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 836

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 836 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

महाबाहो! उन महर्षिका शरीर दूसरे मनुष्योंसे आठ गुना लंबा था । राजर्षे! मैंने उनकी-जैसी दुर्बलता कहीं भी नहीं देखी है ॥ ७ ॥

शरीरमपि राजेन्द्र तस्य कानिष्ठिकासमम् ।

ग्रीवा बाहू तथा पादौ केशाश्चाद्भुतदर्शनाः ॥ ८ ॥

‘ राजेन्द्र । उनका शरीर भी कनिष्ठिका अंगुलीके समान पतला था । उनकी गर्दन, दोनों भुजाएँ, दोनों पैर और सिरके बाल भी अद्भुत दिखायी देते थे ॥ ८ ॥

शिरः कायानुरूपं च कर्णौ नेत्रे तथैव च ।

तस्य वाक्चैव चेष्टा च सामान्ये राजसत्तम ॥ ९ ॥

शरीरके अनुरूप ही उनके मस्तक, कान और नेत्र भी थे । नृपश्रेष्ठ! उनकी वाणी और चेष्टा साधारण थी ॥ ९ ॥

दृष्ट्वाहं तं कृश विप्रं भीतः परमदुर्मनाः ।

पादौ तस्याभिवाद्याथ स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥ १० ॥

मैं उन दुबले - पतले ब्राह्मणको देखकर डर गया और मन- ही- मन बहुत दुखी हो गया; फिर उनके चरणोंमें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उनके आगे खड़ा हो गया ॥ १० ॥

निवेद्य नामगोत्रे च पितरं च नरर्षभ ।

प्रदिष्टे चासने तेन शनैरहमुपाविशम् ॥ ११ ॥

नरश्रेष्ठ! उनके सामने नाम, गोत्र और पिताका परिचय देकर उन्हींके दिये हुए आसन पर धीरेसे बैठ गया ॥ ११ ॥

ततः स कथयामास कथां धर्मार्थसंहिताम् ।

ऋषिमध्ये महाराज तनुर्धर्मभृतां वरः ॥ १२ ॥

महाराज! तदनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तनु ऋषियोंके बीचमें बैठकर धर्म और अर्थसे युक्त कथा कहने लगे ॥ १२ ॥

तस्मिंस्तु कथयत्येव राजा राजीवलोचनः ।

उपायाज्जवनैरश्वैः सबलः सावरोधनः ॥ १३ ॥

उनके कथा कहते समय ही कमलके समान नेत्रोंवाले एक नरेश वेगशाली घोड़ोंद्वारा अपनी सेना और अन्तःपुरके साथ वहाँ आ पहुँचे ॥ १३ ॥

स्मरन् पुत्रमरण्ये वै नष्टं परमदुर्मनाः ।

भूरिद्युम्नपिता श्रीमान् वीरद्युम्नो महायशाः ॥ १४ ॥

उनका पुत्र जंगलमें खो गया था । उसकी याद करके वे बहुत दुखी हो रहे थे । उनके पुत्रका नाम था भूरिद्युम्न और वे उसके महायशस्वी पिता श्रीमान् वीरद्युम्न थे ॥ १४ ॥

इह द्रक्ष्यामि तं पुत्रं द्रक्ष्यामीहेति पार्थिवः ।

एवमाशाहृतो राजा चरन् वनमिदं पुरा ॥ १५ ॥

पृष्ठ 837

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 837 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यहाँ उस पुत्रको अवश्य देखूँगा । यहाँ वह निश्चय ही दिखायी देगा । इसी आशासे बँधे हुए पृथ्वीपति राजा वीरद्युम्न उन दिनों उस वनमें विचर रहे थे ॥ १५ ॥

दुर्लभः स मया द्रष्टुं नूनं परमधार्मिकः ।

एकः पुत्रो महारण्ये नष्ट इत्यसकृत् तदा ॥ १६ ॥

‘ वह बड़ा धर्मात्मा था । अब उसका दर्शन होना अवश्य ही मेरे लिये दुर्लभ है । एक ही बेटा था, वह भी इस विशाल वनमें खो गया' इन्हीं बातोंको वे बार- बार दुहराते थे ॥ १६ ॥

दुर्लभः स मया द्रष्टुमाशा च महती मम ।

तया परीतगात्रोऽहं मुमूर्षुर्नात्र संशयः ॥ १७ ॥

‘ मेरे लिये उसका दर्शन दुर्लभ है तो भी मेरे मनमें उसके मिलनेकी बड़ी भारी आशा लगी हुई है । उस आशाने मेरे सम्पूर्ण शरीरपर अधिकार कर लिया है । इसमें संदेह नहीं कि मैं उसके लिये मौतको भी स्वीकार कर लेना चाहता हूँ' ॥ १७ ॥

एतच्छ्रुत्वा तु भगवांस्तनुर्मुनिवरोत्तमः ।

अवाक्शिरा ध्यानपरी मुहूर्तमिव तस्थिवान् ॥ १८ ॥

राजाकी यह बात सुनकर मुनियोंमें श्रेष्ठ भगवान् तनु नीचे सिर किये ध्यानमग्न हो दो घड़ीतक चुपचाप बैठे रह गये ॥ १८ ॥

तमनुध्यान्तमालक्ष्य राजा परमदुर्मनाः ।

उवाच वाक्यं दीनात्मा मन्दं मन्दमिवासकृत् ॥ १ ९ ॥

उनको चिन्तन करते देख परम दुखी हुए नरेश दीनहृदय हो मन्द मन्द वाणीमें बारंबार इस प्रकार कहने लगे— ॥ १ ९ ॥

दुर्लभं किं नु देवर्षे आशायाश्चैव किं महत् ।

ब्रवीतु भगवानेतद् यदि गुह्यं न ते मयि ॥ २० ॥

‘ देवर्षे! कौन वस्तु दुर्लभ है? और आशासे भी बड़ा क्या है? यदि आपकी दृष्टिमें यह बात मुझसे छिपानेयोग्य न हो तो आप इसे अवश्य बतावें ' ॥ २० ॥

मुनिरुवाच

महर्षिर्भगवांस्तेन पूर्वमासीद् विमानितः ।

बालिशां बुद्धिमास्थाय मन्दभाग्यतयाऽऽत्मनः ॥ २१ ॥

तब मुनिने कहा— राजन्! आपके उस पुत्रने पहले कभी मूढ़ बुद्धिका आश्रय लेकर अपने दुर्भाग्यके कारण एक पूजनीय महर्षिका अपमान कर दिया था ॥ अर्थयन् कलशं राजन् काञ्चनं वल्कलानि च ।

अवज्ञापूर्वकेनापि न सम्पादितवांस्ततः ।

निर्विण्णः स तु विप्रर्षिर्निसशः समपद्यत ॥ २२ ॥

पृष्ठ 838

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 838 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

राजन्! वे उससे एक सुवर्णमय कलश और वल्कल माँग रहे थे । आपके पुत्रने अवहेलना करके भी महर्षिकी वह इच्छा पूरी नहीं की; इससे वे विप्र ऋषि अत्यन्त खिन्न और निराश हो गये थे ॥ २२ ॥

एवमुक्तोऽभिवाद्याथ तमृषिं लोकपूजितम् ।

श्रान्तोऽवसीदद् धर्मात्मा यथा त्वं नरसत्तम ॥ २३ ॥

(ऋषभ कहते हैं— ) नरश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर उन लोकपूजित महर्षिको प्रणाम करके धर्मात्मा राजा वीरद्युम्न तुम्हारे ही समान थककर शिथिल हो गये ॥ २३ ॥

अर्घ्यं ततः समानीय पाद्यं चैव महानृषिः ।

आरण्येनैव विधिना राज्ञे सर्वं न्यवेदयत् ॥ २४ ॥

तत्पश्चात् उन महर्षिने तपोवनमें प्रचलित शिष्टाचारकी विधिसे राजाको पाद्य और अर्घ्य आदि सब वस्तुएँ अर्पित कीं ॥ २४ ॥

ततस्ते मुनयः सर्वे परिवार्य नरर्षभम् ।

उपाविशन् नरव्याघ्र सप्तर्षय इव ध्रुवम् ॥ २५ ॥

पुरुषसिंह! तब वे सभी मुनि नरश्रेष्ठ वीरद्युम्नको सब ओरसे घेरकर उनके पास बैठ गये, मानो सप्तर्षि ध्रुवको चारों ओरसे घेरकर शोभा पा रहे हों ॥ २५ ॥

अपृच्छंश्चैव तं तत्र राजानमपराजितम् ।

प्रयोजनमिदं सर्वमाश्रमस्य निवेशने ॥ २६ ॥

उन सबने वहाँ उन अपराजित नरेशसे उस आश्रमपर पधारनेका सारा प्रयोजन पूछा ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमेंऋषभगीताविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥

* ‘ विहायसा गच्छन्त्या मन्दाकिन्या वैहायस्या अयं वैहायसः ' अर्थात् आकाशमार्गसे गमन करनेवाली मन्दाकिनी या आकाश गंगाका नाम वैहायसी है । वहींके जलसे भरा होनेके कारण वह कुण्ड वैहायस कहलाता है । बदरिकाश्रममें गंगाका नाम अलकनन्दा है ।

पृष्ठ 839

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 839 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना राजोवाच

वरद्युम्न इति ख्यातो राजाहं दिक्षु विश्रुतः ।

भूरिद्युम्नं सुतं नष्टमन्वेष्टुं वनमागतः ॥ १ ॥

राजाने कहा — मुने! मैं सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात वीरद्युम्न नामक राजा हूँ और खोये हुए अपने पुत्र भूरिद्युम्नकी खोज करनेके लिये वनमें आया हूँ ॥ १ ॥

एकः पुत्रः स विप्राग्र्य बाल एव च मेऽनघ ।

न दृश्यते वने चास्मिंस्तमन्वेष्टुं चराम्यहम् ॥ २ ॥

निष्पाप विप्रवर! मेरे एक ही वह पुत्र था । वह भी बालक ही था । इस वनमें आनेपर वह कहीं दिखायी नहीं दे रहा है, उसीको खोजनेके लिये मैं चारों ओर विचर रहा हूँ ॥ २ ॥

ऋषभ उवाच

इत्येवमुक्ते वचने राज्ञा मुनिरधोमुखः ।

तूष्णीमेवाभवत् तत्र न च प्रत्युक्तवान् नृपम् ॥ ३ ॥

ऋषभ कहते हैं - राजन्! राजाके ऐसा कहनेपर वे मुनि नीचे मुँह किये 'चुपचाप बैठे ही रह गये । राजाको कुछ उत्तर न दे सके ॥ ३ ॥

स हि तेन पुरा विप्रो राज्ञा नात्यर्थमानितः ।

आशाकृतश्च राजेन्द्र तपो दीर्घं समाश्रितः ॥ ४ ॥

प्रतिग्रहमहं राज्ञां न करिष्ये कथञ्चन ।

अन्येषां चैव वर्णानामिति कृत्वा धियं तदा ॥ ५ ॥

राजेन्द्र! पूर्वकालमें कभी उसी राजाने उन्हीं ऋषिका विशेष आदर नहीं किया था । उनकी आशा भंग कर दी थी । इससे वे मुनि ' मैं किसी प्रकार भी किसी राजा या दूसरे वर्णके लोगोंका दिया हुआ दान नहीं ग्रहण करूँगा' ऐसा निश्चय करके दीर्घकालीन तपस्यामें लग गये थे ॥ आशा हि पुरुषं बालमुत्थापयति तस्थुषी ।

तामहं व्यपनेष्यामि इति कृत्वा व्यवस्थितः ।

वीरद्युम्नस्तु तं भूयः पप्रच्छ मुनिसत्तमम् ॥ ६ ॥

बहुत कालतक रहनेवाली आशा मूर्ख मनुष्यको ही उद्यमशील बनाती है । मैं उसे दूर कर दूँगा । ऐसा निश्चय करके वे तपस्यामें स्थिर हो गये थे । इधर वीरद्युम्नने उन मुनिश्रेष्ठसे

पृष्ठ 840

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 840 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पुनः प्रश्न किया ॥ राजोवाच

आशायाः किं कृशत्वं च किं चेह भुवि दुर्लभम् ।

ब्रवीतु भगवानेतत् त्वं हि धर्मार्थदर्शिवान् ॥ ७ ॥

राजा बोले- विप्रवर! आप धर्म और अर्थके ज्ञाता हैं, अतः यह बतानेकीकृपा करें कि आशासे बढ़कर दुर्बलता क्या है? और इस पृथ्वीपर सबसे दुर्लभ क्या है? ॥ ७ ॥

ततः संस्मृत्य तत् सर्वं स्मारयिष्यन्निवाब्रवीत् ।

राजानं भगवान् विप्रस्ततः कृशतनुस्तदा ॥ ८ ॥

तब उन दुर्बल शरीरवाले पूज्यपाद ऋषिने पहलेकी सारी बातोंको याद करके राजाको भी उनका स्मरण दिलाते हुए - से इस प्रकार कहा ॥ ८ ॥

ऋषिरुवाच

कृशत्वेन समं राजन्नाशाया विद्यते नृप ।

तस्या वै दुर्लभत्वाच्च प्रार्थिताः पार्थिवा मया ॥ ९ ॥

ऋषि बोले – नरेश्वर! आशा या आशावान्की दुर्बलताके समान और किसीकी दुर्बलता नहीं है । जिस वस्तुकी आशा की जाती है, उसकी दुर्लभताके कारण ही मैंने बहुत - से राजाओंके यहाँ याचना की है ॥ ९ ॥

राजोवाच

कृशाकृशे मया बह्मन् गृहीते वचनात् तव ।

दुर्लभत्वं च तस्यैव वेदवाक्यमिव द्विज ॥ १० ॥

राजाने कहा — ब्रह्मन्! मैंने आपके कहनेसे यह अच्छी तरह समझ लिया कि जो आशासे बँधा हुआ है, वह दुर्बल है और जिसने आशाको जीत लिया है, वह पुष्ट है । द्विजश्रेष्ठ! आपकी इस बातको भी मैंने वेदवाक्यकी भाँति ग्रहण किया कि जिस वस्तुकी आशा की जाती है, वह अत्यन्त दुर्लभ होती है ॥ १० ॥

संशयस्तु महाप्राज्ञ संजातो हृदये मम ।

तन्मुने मम तत्त्वेन वक्तुमर्हसि पृच्छतः ॥ ११ ॥

महाप्राज्ञ! मुने! किंतु मेरे मनमें एक संशय है, जिसे पूछ रहा हूँ । आप उसे यथार्थरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ ११ ॥

त्वत्तः कृशतरं किं नु ब्रवीतु भगवानिदम् ।

यदि गुह्यं न ते किञ्चिद् विद्यते मुनिसत्तम ॥ १२ ॥

मुनिश्रेष्ठ! यदि कोई वस्तु आपके लिये गोपनीय या छिपानेयोग्य न हो तो आप यह बतावें कि आपसे भी बढ़कर अत्यन्त दुर्बल वस्तु क्या है? ॥ १२ ॥