05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 851–860

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 851–860

पृष्ठ 851

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चाहिये ॥ ३१ ॥

कोशं दण्डं बलं मित्रं यदन्यदपि संचितम् ।

न कुर्वीतान्तरं राष्ट्रे राजा परिगतः क्षुधा ॥ ३२ ॥

राजा भूखसे पीड़ित होने — जीविकाके लिये कष्ट पानेपर भी खजाना, राजदण्ड, सेना, मित्र तथा अन्य संचित साधनोंको कभी राज्यसे दूर न करे ॥ ३२ ॥

बीजं भक्तेन सम्पाद्यमिति धर्मविदो विदुः ।

अत्रैतच्छम्बरस्याहुर्महामायस्य दर्शनम् ॥ ३३ ॥

धर्मज्ञ पुरुषोंका कहना है कि मनुष्यको अपने भोजनके लिये संचित अन्नमेंसे भी बीजको बचाकर रखना चाहिये। इस विषयमें महामायावी शम्बरासुरका विचार भी ऐसा ही बताया गया है ॥ ३३ ॥

धिक् तस्य जीवितं राज्ञो राष्ट्रं यस्यावसीदति ।

अवृत्त्यान्यमनुष्योऽपि यो वैदेशिक इत्यपि ॥ ३४ ॥

जिसके राज्यकी प्रजा तथा वहाँ आये हुए परदेशी मनुष्य भी जीविकाके बिना कष्ट पा रहे हों उस राजाके जीवनको धिक्कार है ॥ ३४ ॥

राज्ञः कोशबलं मूलं कोशमूलं पुनर्बलम् ।

तन्मूलं सर्वधर्माणां धर्ममूलाः पुनः प्रजाः ॥ ३५ ॥

राजाकी जड़ है सेना और खजाना । इनमें भी खजाना ही सेनाकी जड़ है । सेना सम्पूर्ण धर्मोंकी रक्षाका मूल कारण है और धर्म ही प्रजाकी जड़ है ॥ ३५ ॥

नान्यानपीडयित्वेह कोशः शक्यः कुतो बलम् ।

तदर्थं पीडयित्वा च दोषं प्राप्तुं न सोऽर्हति ॥ ३६ ॥

दूसरोंको पीड़ा दिये बिना धनका संग्रह नहीं किया जा सकता; और धन - संग्रहके बिना सेनाका संग्रह कैसे हो सकता है? अतः आपत्तिकालमें कोश या धन- संग्रहके लिये प्रजाको पीड़ा देकर भी राजा दोषका भागी नहीं हो सकता ॥ ३६ ॥

अकार्यमपि यज्ञार्थं क्रियते यज्ञकर्मसु ।

एतस्मात् कारणाद् राजा न दोषं प्राप्तमर्हति ॥ ३७ ॥

जैसे यज्ञकर्मोंमें यज्ञके लिये वह कार्य भी किया जाता है जो करनेयोग्य नहीं है ( किंतु वह दोषयुक्त नहीं माना जाता) । उसी प्रकार आपत्तिकालमें प्रजापीडनसे राजाको दोष नहीं लगता है ॥ ३७ ॥

अर्थार्थमन्यद् भवति विपरीतमथापरम् ।

अनर्थार्थमथाप्यन्यत् तत् सर्वं ह्यर्थकारणम् ।

एवं बुद्धया सम्प्रपश्येन्मेधावी कार्यनिश्चयम् ॥ ३८ ॥

आपत्तिकालमें प्रजापीडन अर्थसंग्रहरूप प्रयोजनका साधक होनेके कारण अर्थकारक होता है, इसके विपरीत उसे पीड़ा न देना ही अनर्थकारक हो जाता है । इसी प्रकार जो दूसरे

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अनर्थकारी ( व्यय बढ़ानेवाले सैन्य- संग्रह आदि ) कार्य हैं, वे भी युद्धका संकट उपस्थित होनेपर अर्थकारी ( विजय साधक ) सिद्ध होते हैं । बुद्धिमान् पुरुष इस प्रकार बुद्धिसे विचार करके कर्तव्यका निश्चय करे ॥ ३८ ॥

यज्ञार्थमन्यद् भवति यज्ञोऽन्यार्थस्तथा परः ।

यज्ञस्यार्थार्थमेवान्यत् तत् सर्वं यज्ञसाधनम् ॥ ३ ९ ॥

जैसे अन्यान्य सामग्रियाँ यज्ञकी सिद्धिके लिये होती हैं, उत्तम यज्ञ किसी और ही प्रयोजनके लिये होता है, यज्ञ- सम्बन्धी अन्यान्य बातें भी किसी-न -किसी विशेष उद्देश्यकी सिद्धिके लिये ही होती हैं, तथा यह सब कुछ यज्ञका साधन ही है ॥ ३ ९ ॥

उपमामत्र वक्ष्यामि धर्मतत्त्वप्रकाशिनीम् ।

यूपं छिन्दन्ति यज्ञार्थं तत्र ये परिपन्थिनः ॥ ४० ॥

द्रुमाः केचन सामन्ता ध्रुवं छिन्दन्ति तानपि ।

ते चापि निपतन्तोऽन्यान् निघ्नन्त्येव वनस्पतीन् ॥ ४१ ॥

अब मैं यहाँ धर्मके तत्त्वको प्रकाशित करनेवाली एक उपमा बता रहा हूँ । ब्राह्मणलोग यज्ञके लिये यूप निर्माण करनेके उद्देश्यसे वृक्षका छेदन करते हैं । उस वृक्षको काटकर बाहर निकालनेमें जो - जो पार्श्ववर्ती वृक्ष बाधक होते हैं उन्हें भी निश्चय ही वे काट डालते हैं । वे वृक्ष भी गिरते समय दूसरे - दूसरे वनस्पतियोंको भी प्रायः तोड़ ही डालते हैं ॥ ४०-४१ ॥

एवं कोशस्य महतो ये नराः परिपन्थिनः ।

तानहत्वा न पश्यामि सिद्धिमत्र परंतप ॥ ४२ ॥

परंतप! इस प्रकार जो मनुष्य ( प्रजारक्षाके लिये किये जानेवाले ) महान् कोशके संग्रहमें बाधा उपस्थित करते हैं, उनका वध किये बिना इस कार्य में मुझे सफलता होती नहीं दिखायी देती ॥ ४२ ॥

धनेन जयते लोकावुभौ परमिमं तथा ।

सत्यं च धर्मवचनं यथा नास्त्यधनस्तथा ॥ ४३ ॥

धनसे मनुष्य इहलोक और परलोक दोनोंपर विजय पाता है तथा सत्य और धर्मका भी सम्पादन कर लेता है, परंतु निर्धनको इस कार्यमें वैसी सफलता नहीं मिलती । उसका अस्तित्व नहीं के बराबर होता है ॥ ४३ ॥

सर्वोपायैराददीत धनं यज्ञप्रयोजनम् ।

न तुल्यदोषः स्यादेवं कार्याकार्येषु भारत ॥ ४४ ॥

भरतनन्दन! यज्ञ करनेके उद्देश्यको लेकर सभी उपायोंसे धनका संग्रह करे; इस प्रकार करने और न करने योग्य कर्म बन जानेपर भी कर्ताको अन्य अवसरोंके समान दोष नहीं लगता ॥ ४४ ॥

नैौ सम्भवतो राजन् कथंचिदपि पार्थिव ।

न ह्यरण्येषु पश्यामि धनवृद्धानहं क्वचित् ॥ ४५ ॥

पृष्ठ 853

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राजन्! पृथ्वीनाथ! धनका संग्रह और उसका त्याग–ये दोनों एक व्यक्तिमें एक ही साथ किसी तरह नहीं रह सकते; क्योंकि मैं वनमें रहनेवाले त्यागी महात्माओंको कहीं भी धनमें बढ़ा - चढ़ा नहीं देखता ॥ ४५ ॥

यदिदं दृश्यते वित्तं पृथिव्यामिह किंचन ।

ममेदं स्यान्ममेदं स्यादित्येवं कांक्षते जनः ॥ ४६ ॥

यहाँ इस पृथ्वीपर यह जो कुछ भी धन देखा जाता है, ' यह मेरा हो जाय, यह मेरा हो जाय', ऐसी ही अभिलाषा सभी लोगोंको रहती है ॥ ४६ ॥

न च राज्यसमो धर्मः कश्चिदस्ति परंतप ।

धर्मः संशब्दितो राज्ञामापदर्थमतोऽन्यथा ॥ ४७ ॥

परंतप! राजाके लिये राज्यकी रक्षाके समान दूसरा कोई धर्म नहीं है । अभी जिस धर्मकी चर्चा की गयी है, वह केवल राजाओंके लिये आपत्तिकालमें ही आचरणमें लाने योग्य है; अन्यथा नहीं ॥ ४७ ॥

दानेन कर्मणा चान्ये तपसान्ये तपस्विनः ।

बुद्धया दाक्ष्येण चैवान्ये विन्दन्ति धनसंचयान् ॥ ४८ ॥

कुछ लोग दानसे, कुछ लोग यज्ञकर्म करनेसे, कुछ तपस्वी तपस्या करनेसे, कुछ लोग बुद्धिसे और अन्य बहुत - से मनुष्य कार्यकौशलसे धनराशि प्राप्त कर लेते हैं ॥

अधनं दुर्बलं प्राहुर्धनेन बलवान् भवेत् ।

सर्वं धनवता प्राप्यं सर्वं तरति कोशवान् ॥ ४ ९ ॥

निर्धनको दुर्बल कहा जाता है । धनसे मनुष्य बलवान् होता है। धनवान्‌को सब कुछ सुलभ है । जिसके पास खजाना है, वह सारे संकटोंसे पार हो जाता है ॥

कोशेन धर्मः कामश्च परलोकस्तथा ह्ययम् ।

तं च धर्मेण लिप्सेत नाधर्मेण कदाचन ॥ ५० ॥

धन - संचयसे ही धर्म, काम, लोक तथा परलोककी सिद्धि होती है । उस धनको धर्मसे ही पानेकी इच्छा करे, अधर्मसे कभी नहीं ॥ ५० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें एक सौ तीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १३० ॥

पृष्ठ 854

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(आपद्धर्मपर्व ) एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः आपत्तिग्रस्त राजाके कर्तव्यका वर्णन युधिष्ठिरउवाच

क्षीणस्य दीर्घसूत्रस्य सानुक्रोशस्य बन्धुषु ।

परिशङ्कितवृत्तस्य श्रुतमन्त्रस्य भारत ॥ १ ॥

विभक्तपुरराष्ट्रस्य निर्द्रव्यनिचयस्य च ।

असम्भावितमित्रस्य भिन्नामात्यस्य सर्वशः ॥ २ ॥

परचक्राभियातस्य दुर्बलस्य बलीयसा ।

आपन्नचेतसो ब्रूहि किं कार्यमवशिष्यते ॥ ३ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— भरतनन्दन! जिसकी सेना और धन- सम्पत्ति क्षीण हो गयी है, जो आलसी है, बन्धु - बान्धवोंपर अधिक दया रखनेके कारण उनके नाशकी आशंकासे जो उन्हें साथ लेकर शत्रुके साथ युद्ध नहीं कर सकता, जो मन्त्री आदिके चरित्रपर संदेह रखता है अथवा जिसका चरित्र स्वयं भी शंकास्पद है, जिसकी मन्त्रणा गुप्त नहीं रह सकी है, उसे दूसरे लोगोंने सुन लिया है, जिसके नगर और राष्ट्रको कई भागोंमें बाँटकर शत्रुओंने अपने अधीन कर लिया है, इसीलिये जिसके पास द्रव्यका भी संग्रह नहीं रह गया है, द्रव्याभावके कारण ही समादर न पानेसे जिसके मित्र साथ छोड़ चुके हैं, मन्त्री भी शत्रुओंद्वारा फोड़ लिये गये हैं, जिसपर शत्रुदलका आक्रमण हो गया हो, जो दुर्बल होकर बलवान् शत्रुके द्वारा पीड़ित हो और विपत्तिमें पड़कर जिसका चित्त घबरा उठा हो, उसके लिये कौन - सा कार्य शेष रह जाता है? —उसे इस संकटसे मुक्त होनेके लिये क्या करना चाहिये? ॥ १–३ ॥ भीष्म उवाच

बाह्यश्चेद् विजिगीषुः स्याद् धर्मार्थकुशलः शुचिः ।

जवेन संधिं कुर्वीत पूर्वभुक्तान् विमोचयेत् ॥ ४ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! यदि विजयकी इच्छासे आक्रमण करनेवाला राजा बाहरका हो, उसका आचार- विचार शुद्ध हो तथा वह धर्म और अर्थके साधनमें कुशल हो तो शीघ्रतापूर्वक उसके साथ संधि कर लेनी चाहिये और जो ग्राम तथा नगर अपने पूर्वजोंके

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अधिकारमें रहे हों, वे यदि आक्रमणकारीके हाथमें चले गये हों तो उसे मधुर वचनोंद्वारा समझा- बुझाकर उसके हाथसे छुड़ानेकी चेष्टा करे ॥ ४ ॥

योऽधर्मविजिगीशुः स्याद् बलवान् पापनिश्चयः ।

आत्मनः संनिरोधेन संधिं तेनापि रोचयेत् ॥ ५ ॥

जो विजय चाहनेवाला शत्रु अधर्मपरायण हो तथा बलवान् होनेके साथ ही पापपूर्ण विचार रखता हो, उसके साथ अपना कुछ खोकर भी संधि कर लेनेकी ही इच्छा रखे ॥ ५ ॥

अपास्य राजधानीं वा तरेद् द्रव्येण चापदम् ।

तद्भावयुक्तो द्रव्याणि जीवन् पुनरुपार्जयेत् ॥ ६ ॥

अथवा आवश्यकता हो तो अपनी राजधानीको भी छोड़कर बहुत- सा द्रव्य देकर उस विपत्तिसे पार हो जाय । यदि वह जीवित रहे तो राजोचित गुणसे युक्त होनेपर पुनः धनका उपार्जन कर सकता है ॥ ६ ॥

यास्तु कोशबलत्यागाच्छक्यास्तरितुमापदः ।

कस्तत्राधिकमात्मानं संत्यजेदर्थधर्मवित् ॥ ७ ॥

खजाना और सेनाका त्याग कर देनेसे ही जहाँ विपत्तियोंको पार किया जा सके, ऐसी परिस्थितिमें कौन अर्थ और धर्मका ज्ञाता पुरुष अपनी सबसे अधिक मूल्यवान् वस्तु शरीरका त्याग करेगा? ॥ ७ ॥

अवरोधान् जुगुप्सेत का सपत्नधने दया ।

न त्वेवात्मा प्रदातव्यः शक्ये सति कथंचन ॥ ८ ॥

शत्रुका आक्रमण हो जानेपर राजाको सबसे पहले अपने अन्तःपुरकी रक्षाका प्रयत्न करना चाहिये । यदि वहाँ शत्रुका अधिकार हो जाय, तब उधरसे अपनी मोह - ममता हटा लेनी चाहिये; क्योंकि शत्रुके अधिकारमें गये हुए धन और परिवारपर दया दिखाना किस कामका? जहाँतक सम्भव हो, अपने - आपको किसी तरह भी शत्रुके हाथमें नहीं फँसने देना चाहिये ॥ ८ ॥

युधिष्ठिरउवाच

आभ्यन्तरे प्रकुपिते बाह्ये चोपनिपीडिते ।

क्षीणे कोशे श्रुते मन्त्रे किं कार्यमवशिष्यते ॥ ९ ॥

युधिष्ठिरने पूछा - पितामह! यदि बाहर राष्ट्र और दुर्ग आदिपर आक्रमण करके शत्रु उसे पीड़ा दे रहे हों और भीतर मन्त्री आदि भी कुपित हों, खजाना खाली हो गया हो और राजाका गुप्त रहस्य सबके कानोंमें पड़ गया हो, तब उसे क्या करना चाहिये? ॥ ९ ॥

भीष्मउवाच क्षिप्रं वा संधिकामः स्यात् क्षिप्रं वा तीक्ष्णविक्रमः ।

पृष्ठ 856

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तदापनयनं क्षिप्रमेतावत् साम्परायिकम् ॥ १० ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! उस अवस्थामें राजा या तो शीघ्र ही संधिका विचार कर ले अथवा जल्दी - से -जल्दी दुःसह पराक्रम प्रकट करके शत्रुको राज्यसे निकाल बाहर करे, ऐसा उद्योग करते समय यदि कदाचित् मृत्यु भी हो जाय तो वह परलोकमें मंगलकारी होती है ॥ १० ॥

अनुरक्तेन चेष्टेन हृष्टेन जगतीपतिः ।

अल्पेनापि हि सैन्येन महीं जयति भूमिपः ॥ ११ ॥

यदि सेना स्वामीके प्रति अनुराग रखनेवाली, प्रिय और हृष्ट - पुष्ट हो तो उस थोड़ी - सी सेनाके द्वारा भी राजा पृथ्वीपर विजय पा सकता है ॥ ११ ॥

हतो वा दिवमारोहेद्धत्वा वा क्षितिमावसेत् ।

युद्धे हि संत्यजन् प्राणान् शक्रस्यैति सलोकताम् ॥ १२ ॥

यदि वह युद्धमें मारा जाय तो स्वर्गलोकके शिखरपर आरूढ़ हो सकता है अथवा यदि उसीने शत्रुको मार लिया तो वह पृथ्वीका राज्य भोग सकता है । जो युद्धमें प्राणोंका परित्याग करता है, वह इन्द्रलोकमें जाता है ॥ १२ ॥

सर्वलोकागमं कृत्वा मृदुत्वं गन्तुमेव च ।

विश्वासाद् विनयं कुर्याद् विश्वसेच्चाप्युपायतः ॥ १३ ॥

अथवा दुर्बल राजा शत्रुमें कोमलता लानेके लिये विपक्षके सभी लोगोंको संतुष्ट करके उनके मनमें विश्वास जमाकर उनसे युद्ध बंद करनेके लिये अनुनय - विनय करे और स्वयं भी उपायपूर्वक उनके ऊपर विश्वास करे ॥ १३ ॥

अपचिक्रमिषुः क्षिप्रं साम्ना वा परिसान्त्वयन् ।

विलङ्घयित्वा मन्त्रेण ततः स्वयमुपक्रमेत् ॥ १४ ॥

अथवा वह मधुर वचनोंद्वारा विरोधी दलके मन्त्री आदिको प्रसन्न करके दुर्गसे पलायन करनेका प्रयत्न करे । तदनन्तर कुछ काल व्यतीत करके श्रेष्ठ पुरुषोंकी सम्मति ले अपनी खोयी हुई सम्पत्ति अथवा राज्यको पुनः प्राप्त करनेका प्रयत्न आरम्भ करे ॥ १४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १३१ ॥

पृष्ठ 857

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 857 का मूल पृष्ठ
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द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मणों और श्रेष्ठ राजाओंके धर्मका वर्णन तथा धर्मकी गतिको सूक्ष्म बताना युधिष्ठिरउवाच

हीने परमके धर्मे सर्वलोकाभिसंहिते ।

सर्वस्मिन् दस्युसाद्भूते पृथिव्यामुपजीवने ॥ १ ॥

केन स्विद् ब्राह्मणो जीवेज्जघन्ये काल आगते ।

असंत्यजन् पुत्रपौत्राननुक्रोशात् पितामह ॥ २ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! यदि राजाका सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षापर अवलम्बित परम धर्म न निभ सके और भूमण्डलमें आजीविकाके सारे साधनोंपर लुटेरोंका अधिकार हो जाय, तब ऐसा जघन्य संकटकाल उपस्थित होनेपर यदि ब्राह्मण दयावश अपने पुत्रों तथा पौत्रोंका परित्याग न कर सके तो वह किस वृत्तिसे जीवन - निर्वाह करे? ॥ १-२ ॥ भीष्म उवाच

विज्ञानबलमास्थाय जीवितव्यं तथागते ।

सर्वं साध्वर्थमेवेदमसाध्वर्थं न किंचन ॥ ३ ॥

भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! ऐसी परिस्थितिमें ब्राह्मणको तो अपने विज्ञान - बलका आश्रय लेकर जीवन -निर्वाह करना चाहिये । इस जगत् में यह जो कुछ भी धन आदि दिखायी देता है, वह सब कुछ श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये ही है, दुष्टोंके लिये कुछ भी नहीं है ॥ ३ ॥

असाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यो यः प्रयच्छति ।

आत्मानं संक्रमं कृत्वा कृच्छ्रधर्मविदेव सः ॥ ४ ॥

जो अपनेको सेतु बनाकर दुष्ट पुरुषोंसे धन लेकर श्रेष्ठ पुरुषोंको देता है, वह आपद्धर्मका ज्ञाता है ॥ ४ ॥

आकाङ्क्षन्नात्मनो राज्यं राज्ये स्थितिमकोपयन् ।

अदत्तमेवाददीत दातुर्वित्तं ममेति च ॥ ५ ॥

जो अपने राज्यको बनाये रखना चाहे, उस राजाको उचित है कि वह राज्यकी व्यवस्थाका बिगाड़ न करते हुए ब्राह्मण आदि प्रजाकी रक्षाके उद्देश्यसे ही राज्यके धनियोंका धन मेरा ही है, ऐसा समझकर उनके दिये बिना भी बलपूर्वक ले ले ॥ ५ ॥

पृष्ठ 858

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विज्ञानबलपूतो यो वर्तते निन्दितेष्वपि ।

वृत्तिविज्ञानवान् धीरः कस्तं वा वक्तुमर्हति ॥ ६ ॥

जो तत्त्वज्ञानके प्रभावसे पवित्र है और किस वृत्तिसे किसका निर्वाह हो सकता है, इस बातको अच्छी तरह समझता है, वह धीर नरेश यदि राज्यको संकटसे बचानेके लिये निन्दित कर्मोंमें भी प्रवृत्त होता है तो कौन उसकी निन्दा कर सकता है? ॥ ६ ॥

येषां बलकृता वृत्तिस्तेषामन्या न रोचते ।

तेजसाभिप्रवर्तन्ते बलवन्तो युधिष्ठिर ॥ ७ ॥

युधिष्ठिर! जो बल और पराक्रमसे ही जीविका चलानेवाले हैं, उन्हें दूसरी वृत्ति अच्छी नहीं लगती । बलवान् पुरुष अपने तेजसे ही कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं ॥ ७ ॥

यदैव प्राकृतं शास्त्रमविशेषेण वर्तते ।

तदैवमभ्यसेदेवं मेधावी वाप्यथोत्तरम् ॥ ८ ॥

जब आपद्धर्मोपयोगी प्राकृत शास्त्र ही सामान्यरूपसे चल रहा हो, उस आपत्तिकालमें ‘ अपने या दूसरेके राज्यसे जैसे भी सम्भव हो, धन लेकर अपना खजाना भरना चाहिये ' इत्यादि वचनोंके अनुसार राजा जीवन- निर्वाह करे । परंतु जो मेधावी हो, वह इससे भी आगे बढ़कर ' जो दो राज्योंमें रहनेवाले धनीलोग कंजूसी अथवा असदाचरणके द्वारा दण्ड पानेयोग्य हों, उनसे ही धन लेना चाहिये । ' इत्यादि विशेष शास्त्रोंका अवलम्बन करे ॥ ८ ॥

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान् सत्कृतानभिसत्कृतान् ।

न ब्राह्मणान् घातयीत दोषान् प्राप्नोति घातयन् ॥ ९ ॥

कितनी ही आपत्ति क्यों न हो, ऋत्विक्, पुरोहित, आचार्य तथा सत्कृत या असत्कृत ब्राह्मणोंसे, वे धनी हों तो भी धन लेकर उन्हें पीड़ा न दे । यदि राजा उन्हें धनापहरणके द्वारा कष्ट देता है तो पापका भागी होता है ॥ ९ ॥

एतत् प्रमाणं लोकस्य चक्षुरेतत् सनातनम् ।

तत् प्रमाणोऽवगाहेत तेन तत् साध्वसाधु वा ॥ १० ॥

यह मैंने तुम्हें सब लोगोंके लिये प्रमाणभूत बात बतायी है । यही सनातन दृष्टि है। राजा इसीको प्रमाण मानकर व्यवहारक्षेत्रमें प्रवेश करे तथा इसीके अनुसार आपत्तिकालमें उसे भले या बुरे कार्यका निर्णय करना चाहिये ॥ १० ॥

बहवो ग्रामवास्तव्या रोषाद् ब्रूयुः परस्परम् ।

न तेषां वचनाद् राजा सत्कुर्याद् घातयीत वा ॥ ११ ॥

यदि बहुत- से ग्रामवासी मनुष्य परस्पर रोषवश राजाके पास आकर एक-दूसरेकी निन्दा- स्तुति करें तो राजा केवल उनके कहनेसे ही किसीको न तो दण्ड

पृष्ठ 859

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दे और न किसीका सत्कार ही करे ॥ ११

न वाच्यः परिवादोऽयं न श्रोतव्यः कथञ्चन ।

कर्णावथ पिधातव्यौ प्रस्थेयं चान्यतो भवेत् ॥ १२ ॥

किसीकी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये और न उसे किसी प्रकार सुनना ही चाहिये । यदि कोई दूसरेकी निन्दा करता हो तो वहाँ अपने कान बंद कर ले अथवा वहाँसे उठकर अन्यत्र चला जाय ॥ १२ ॥

असतां शीलमेतद् वै परिवादोऽथ पैशुनम् ।

गुणानामेव वक्तारः सन्तः सत्सु नराधिप ॥ १३ ॥

नरेश्वर! दूसरोंकी निन्दा करना या चुगली खाना यह दुष्टोंका स्वभाव ही होता है । श्रेष्ठ पुरुष तो सज्जनोंके समीप दूसरोंके गुण ही गाया करते हैं ॥ १३ ॥

यथा सुमधुरौ दम्यौ सुदान्तौ साधुवाहिनौ ।

धुरमुद्यम्य वहतास्तथा वर्तेत वै नृपः ॥ १४ ॥

जैसे मनोहर आकृतिवाले, सुशिक्षित तथा अच्छी तरहसे बोझ ढोनेमें समर्थ नयी अवस्थाके दो बैल कंधोंपर भार उठाकर उसे सुन्दर ढंगसे ढोते हैं, उसी प्रकार राजाको भी अपने राज्यका भार अच्छी तरह सँभालना चाहिये ॥ १४ ॥

यथा यथास्य बहवः सहायाः स्युस्तथा परे ।

आचारमेव मन्यन्ते गरीयो धर्मलक्षणम् ॥ १५ ॥

जैसे - जैसे आचरणोंसे राजाके बहुत - से दूसरे लोग सहायक हों, वैसे ही आचरण उसे अपनाने चाहिये । धर्मज्ञ पुरुष आचारको ही धर्मका प्रधान लक्षण मानते हैं ॥ १५ ॥

अपरे नैवमिच्छन्ति ये शंखलिखितप्रियाः ।

मात्सर्यादथवा लोभान्न ब्रूयुर्वाक्यमीदृशम् ॥ १६ ॥

किंतु जो शंख और लिखित मुनिके प्रेमी हैं—उन्हींके मतका अनुसरण करनेवाले हैं, वे दूसरे - दूसरे लोग इस उपर्युक्त मत (ऋत्विक् आदिको दण्ड न देने आदि) को नहीं स्वीकार करते हैं । वे लोग ईर्ष्या अथवा लोभसे ऐसी बात नहीं कहते हैं ( धर्म मानकर ही कहते हैं ) ॥ १६ ॥

आर्षमप्यत्र पश्यन्ति विकर्मस्थस्य पातनम् ।

न तादृक्सदृशं किञ्चित् प्रमाणं दृश्यते क्वचित् ॥ १७ ॥

शास्त्र- विपरीत कर्म करनेवालेको दण्ड देनेकी जो बात आती है, उसमें वे आर्षप्रमाण भी देखते हैं * । ऋषियोंके वचनोंके समान दूसरा कोई प्रमाण कहीं भी दिखायी नहीं देता ॥ १७ ॥

देवताश्च विकर्मस्थं पातयन्ति नराधमम् ।

पृष्ठ 860

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 860 का मूल पृष्ठ
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व्याजेन विन्दन् वित्तं हि धर्मात् स परिहीयते ॥ १८ ॥

देवता भी विपरीत कर्ममें लगे हुए अधम मनुष्यको नरकोंमें गिराते हैं; अतः जो छलसे धन प्राप्त करता है, वह धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ १८ ॥

सर्वतः सत्कृतः सद्भिर्भूतिप्रवरकारणैः ।

हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं व्यवस्यति ॥ १ ९ ॥

ऐश्वर्यकी प्राप्तिके जो प्रधान कारण हैं, ऐसे श्रेष्ठ पुरुष जिसका सब प्रकारसे सत्कार करते हैं तथा हृदयसे भी जिसका अनुमोदन होता है, राजा उसी धर्मका अनुष्ठान करे ॥ १ ९ ॥

यश्चतुर्गुणसम्पन्नं धर्मं ब्रूयात् स धर्मवित् ।

अहेरिव हि धर्मस्य पदं दुःखं गवेषितुम् ॥ २० ॥

यथा मृगस्य विद्धस्य पदमेकं पदं नयेत् ।

लक्षेद् रुधिरलेपेन तथा धर्मपदं नयेत् ॥ २१ ॥

जो वेदविहित स्मृतियोंद्वारा अनुमोदित, सज्जनोंद्वारा सेवित तथा अपनेको प्रिय लगनेवाला धर्म है, उसे चतुर्गुणसम्पन्न माना गया है । जो वैसे धर्मका उपदेश करता है, वही धर्मज्ञ है । सर्पके पदचिह्नकी भाँति धर्मके यथार्थ स्वरूपको ढूँढ़ निकालना बहुत कठिन है । जैसे बाणसे बिंधे हुए मृगका एक पैर पृथ्वीपर रक्तका लेप कर देनेके कारण व्याधको उस मृगके रहनेके स्थानको लक्षित कराकर वहाँ पहुँचा देता है, उसी प्रकार उक्त चतुर्गुणसम्पन्न धर्म भी धर्मके यथार्थ स्वरूपकी प्राप्ति करा देता है ॥ २०-२१ ॥

एवं सद्भिर्विनीतेन पथा गन्तव्यमित्युत ।

राजर्षीणां वृत्तमेतदवगच्छ युधिष्ठिर ॥ २२ ॥

युधिष्ठिर! इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष जिस मार्गसे गये हैं, उसीपर तुम्हें भी चलना चाहिये । इसीको तुम राजर्षियोंका सदाचार समझो ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि राजर्षिवृत्तं नाम द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें राजर्षियोंका चरित्र नामक एक सौ बत्तीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १३२ ॥

O * यथा - गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम् ॥ अर्थात् घमंडमें आकर कर्तव्य और अकर्तव्यका विचार न करते हुए कुमार्गपर चलनेवाले गुरुको भी दण्ड देना आवश्यक है ।