श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 841–850

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 841–850

पृष्ठ 841

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कृशउवाच

दुर्लभोऽप्यथवा नास्ति योऽर्थी धृतिमवाप्नुयात् ।

स दुर्लभतरस्तात योऽर्थिनं नावमन्यते ॥ १३ ॥

दुर्बल शरीरवाले मुनिने कहा - तात! जो याचक धैर्य धारण कर सके अर्थात् किसी वस्तुकी आवश्यकता होनेपर भी उसके लिये किसीसे याचना न करे, वह दुर्लभ है एवं जो याचना करनेवाले याचककी अवहेलना न करे – आदरपूर्वक उसकी इच्छा पूर्ण करे, ऐसा पुरुष संसारमें अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १३ ॥

सत्कृत्य नोपकुरुते परं शक्त्या यथार्हतः ।

या सक्ता सर्वभूतेषु साऽऽशा कृशतरी मया ॥ १४ ॥

जब मनुष्य सत्कार करके याचकको आशा दिलाकर भी उसका शक्तिके अनुसार यथायोग्य उपकार नहीं करता, उस स्थितिमें सम्पूर्ण भूतोंके मनमें जो आशा होती है, वह मुझसे भी अत्यन्त कृश होती है ॥ १४ ॥

कृतघ्नेषु च या सक्ता नृशंसेष्वलसेषु च ।

अपकारिषु चासक्ता साऽऽशा कृशतरी मया ॥ १५ ॥

कृतघ्न, नृशंस, आलसी तथा दूसरोंका अपकार करनेवाले पुरुषोंमें जो आशा होती है, वह ( कभी पूर्ण न होनेके कारण चिन्तासे दुर्बल बना देती है; इसलिये वह ) मुझसे भी अत्यन्त कृश है ॥ १५ ॥

एकपुत्रः पिता पुत्रे नष्टे वा प्रोषितेऽपि वा ।

प्रवृत्तिं यो न जानाति साऽऽशा कृशतरी मया ॥ १६ ॥

इकलौते बेटेका बाप जब अपने पुत्रके खो जाने या परदेशमें चले जानेपर उसका कोई समाचार नहीं जान पाता, तब उसके मनमें जो आशा रहती है, वह मुझसे भी अत्यन्त कृश होती है ॥ १६ ॥

प्रसवे चैव नारीणां वृद्धानां पुत्रकारिता ।

तथा नरेन्द्र धनिनां साऽऽशा कृशतरी मया ॥ १७ ॥

नरेन्द्र! वृद्ध अवस्थावाली नारियोंके हृदयमें जो पुत्र पैदा होनेके लिये आशा बनी रहती है तथा धनियोंके मनमें जो अधिकाधिक धनलाभकी आशा रहती है, वह मुझसे अत्यन्त कृश है ॥ १७ ॥

प्रदानकांक्षिणीनां च कन्यानां वयसि स्थिते ।

श्रुत्वा कथास्तथायुक्ताः साऽऽशा कृशतरी मया ॥ १८ ॥

तरुण अवस्था आनेपर विवाहकी चर्चा सुनकर ब्याहकी इच्छा रखनेवाली कन्याओंके हृदयमें जो आशा होती है, वह मुझसे भी अत्यन्त कृश होती है * ॥ १८ ॥

एतच्छ्रुत्वा ततो राजन् स राजा सावरोधनः ।

पृष्ठ 842

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संस्पृश्य पादौ शिरसा निपपात द्विजर्षभम् ॥ १ ९ ॥ राजन्! ब्राह्मणश्रेष्ठ उस ऋषिकी वह बात सुनकर राजा अपनी रानीके साथ उनके चरणोंका मस्तकसे स्पर्श करके वहीं गिर पड़े ॥ १ ९ ॥ राजोवाच

प्रसादये त्वां भगवन् पुत्रेणेच्छामि संगमम् ।

यदेतदुक्तं भवता सम्प्रति द्विजसत्तम ॥ २० ॥

सत्यमेतन्न संदेहो यदेतद् व्याहृतं त्वया । राजा बोले — भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ । मुझे अपने पुत्रसे मिलनेकी बड़ी इच्छा है । द्विजश्रेष्ठ! आपने मुझसे इस समय जो कुछ कहा है, आपका यह सारा कथन सत्य है, इसमें संदेह नहीं ॥ ततः प्रहस्य भगवांस्तनुर्धर्मभृतां वरः ॥ २१ ॥

पुत्रमस्यानयत् क्षिप्रं तपसा च श्रुतेन च । तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भगवान् तनुने हँसकर अपनी तपस्या और शास्त्रज्ञानके प्रभावसे राजकुमारको शीघ्र वहाँ बुला दिया ॥ २१३ ॥

स समानीय तत्पुत्रं तमुपालभ्य पार्थिवम् ॥ २२ ॥

आत्मानं दर्शयामास धर्मं धर्मभृतां वरः । इस प्रकार उनके पुत्रको वहाँ बुलाकर तथा राजाको उलाहना देकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तनु मुनिने उन्हें अपने साक्षात् धर्मस्वरूपका दर्शन कराया ॥ २२३ ॥

स दर्शयित्वा चात्मानं दिव्यमद्भुतदर्शनम् ।

विपाप्मा विगतक्रोधश्चचार वनमन्तिकात् ॥ २३ ॥

दिव्य और अद्भुत दिखायी देनेवाले अपने स्वरूपका उन्हें दर्शन कराकर क्रोध और पापसे रहित तनु मुनि निकटवर्ती वनमें चले गये ॥ २३ ॥

एतद् दृष्टं मया राजंस्तथा च वचनं श्रुतम् ।

आशामपनयस्वाशु ततः कृशतरीमिमाम् ॥ २४ ॥

ऋषभ मुनि कहते हैं — राजन्! मैंने यह सब कुछ अपनी आँखों देखा है और मुनिका वह कथन भी अपने कानों सुना है । ऐसे ही तुम भी शरीरको अत्यन्त कृश बना देनेवाली इस मृगविषयक दुराशाको शीघ्र ही त्याग दो ॥ २४ ॥

भीष्म उवाच

स तथोक्तस्तदा राजन् ऋषभेण महात्मना ।

सुमित्रोऽपनयत् क्षिप्रमाशां कृशतरीं ततः ॥ २५ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! महात्मा ऋषभके ऐसा कहनेपर सुमित्रने शरीरको अत्यन्त दुर्बल बनानेवाली वह आशा तुरंत ही त्याग दी ॥ २५ ॥

पृष्ठ 843

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एवं त्वमपि कौन्तेय श्रुत्वा वाणीमिमां मम ।

स्थिरो भव महाराज हिमवानिव पर्वतः ॥ २६ ॥

महाराज! कुन्तीकुमार! तुम भी मेरा यह कथन सुनकर आशाको त्याग दो और हिमालय पर्वतके समान स्थिर हो जाओ ॥ २६ ॥

त्वं हि प्रष्टा च श्रोता च कृच्छ्रेष्वनुगतेष्विह ।

श्रुत्वा मम महाराज न संतप्तुमिहार्हसि ॥ २७ ॥

महाराज! ऐसे संकट उपस्थित होनेपर भी तुम यहाँ उपयुक्त प्रश्न करते और उनका योग्य उत्तर सुनते हो; इसलिये दुर्योधनके साथ जो संधि न हो सकी, उसको लेकर तुम्हें संतप्त नहीं होना चाहिये ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमेंऋषभगीताविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२८ ॥

आशाको अत्यन्त कृश कहनेका तात्पर्य यह है कि वह मनुष्यको अत्यन्त कृश बना देती है ।

पृष्ठ 844

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एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः यम और गौतमका संवाद युधिष्ठिर उवाच

नामृतस्येव पर्याप्तिर्ममास्ति ब्रुवति त्वयि ।

यथा हि स्वात्मवृत्तिस्थस्तथा तृप्तोऽस्मि भारत ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने कहा— भरतनन्दन! जैसे अमृतको पीनेसे इच्छा पूर्ण नहीं होती, और भी पीनेकी इच्छा बढ़ती जाती है, उसी प्रकार जब आप उपदेश करने लगते हैं, उस समय उसे सुननेसे मेरा मन नहीं भरता है । जैसे परमात्माके ध्यानमें निमग्न हुआ योगी परमानन्दसे तृप्त हो जाता है, उसी प्रकार मैं भी अत्यन्त तृप्तिका अनुभव करता हूँ ॥ १ ॥

तस्मात् कथय भूयस्त्वं धर्ममेव पितामह ।

न हि तृप्तिमहं यामि पिबन् धर्मामृतं हि ते ॥ २ ॥

अतः पितामह! आप पुनः धर्मकी ही बात बताइये । आपके धर्मोपदेशरूपी अमृतका पान करते समय मुझे यह नहीं अनुभव होता है कि बस, अब पूरा हो गया, बल्कि सुननेकी प्यास और बढ़ती ही जाती है ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

गौतमस्य च संवादं यमस्य च महात्मनः ॥ ३ ॥

भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! इस धर्मके विषयमें भी विज्ञ पुरुष गौतम तथा महात्मा यमके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥

पारियात्रं गिरिं प्राप्य गौतमस्याश्रमो महान् ।

उवास गौतमो यं च कालं तमपि मे शृणु ॥ ४ ॥

पारियात्रनामक पर्वतपर महर्षि गौतमका महान् आश्रम है । उसमें गौतम जितने समयतक रहे, वह भी मुझसे सुनो ॥ ४ ॥

षष्टिं वर्षसहस्राणि सोऽतप्यद् गौतमस्तपः ।

तमुग्रतपसा युक्तं भावितं सुमहामुनिम् ॥ ५ ॥

उपयातो नरव्याघ्र लोकपालो यमस्तदा ।

तमपश्यत् सुतपसमृषिं वै गौतमं तदा ॥ ६ ॥

गौतमने उस आश्रममें साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की । नरश्रेष्ठ! एक दिन उग्र तपस्यामें लगे हुए पवित्र महात्मा महामुनि गौतमके पास लोकपाल यम स्वयं आये । उन्होंने वहाँ आकर उत्तम तपस्वी गौतम ऋषिको देखा ॥ ५-६ ॥

पृष्ठ 845

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स तं विदित्वा ब्रह्मर्षिर्यममागतमोजसा ।

प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा उपविष्टस्तपोधनः ॥ ७ ॥

ब्रह्मर्षि गौतमने वहाँ आये हुए यमराजको उनके तेजसे ही जान लिया । फिर वे तपोधन मुनि हाथ जोड़ संयतचित्त हो उनके पास जा बैठे ॥ ७ ॥

तं धर्मराजो दृष्ट्वैव सत्कृत्यैव द्विजर्षभम् ।

न्यमन्त्रयत धर्मेण क्रियतां किमिति ब्रुवन् ॥ ८ ॥

धर्मराजने विप्रवर गौतमको देखते ही उनका सत्कार किया और मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ऐसा कहते हुए उन्हें धर्मचर्चा सुननेके लिये सम्मति प्रदान की ॥ ८ ॥

गौतम उवाच

मातापितृभ्यामानृण्यं कि कृत्वा समवाप्नुयात् ।

कथं च लोकानाप्नोति पुरुषो दुर्लभान् शुचीन् ॥ ९ ॥

तब गौतमने कहा — भगवन्! मनुष्य कौन - सा कर्म करके माता-पिताके ऋणसे उऋण हो सकता है? और किस प्रकार उसे दुर्लभ एवं पवित्र लोकोंकी प्राप्ति होती है? ॥ ९ ॥

यम उवाच

तपः शौचवता नित्यं सत्यधर्मरतेन च ।

मातापित्रोरहरहः पूजनं कार्यमञ्जसा ॥ १० ॥

यमराजने कहा —ब्रह्मन्! मनुष्य तप करे, बाहर- भीतरसे पवित्र रहे और सदा सत्यभाषणरूप धर्मके पालनमें तत्पर रहे । यह सब करते हुए ही उसे नित्यप्रति माता-पिताकी सेवा - पूजा करनी चाहिये ॥ १० ॥

अश्वमेधैश्च यष्टव्यं बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः ।

तेन लोकानवाप्नोति पुरुषोऽद्भुतदर्शनान् ॥ ११ ॥

राजाको तो पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अनेक अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान भी करना चाहिये । ऐसा करनेसे पुरुष अद्भुत दृश्योंसे सम्पन्न पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि यमगौतमसंवादे एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें यम और गौतमका संवादविषयक एक सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२९ ॥

पृष्ठ 846

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त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः आपत्तिके समय राजाका धर्म युधिष्ठिरउवाच

मित्रैः प्रहीयमाणस्य बह्वमित्रस्य का गतिः ।

राज्ञः संक्षीणकोशस्य बलहीनस्य भारत ॥ १ ॥

यधिष्ठिरने पूछा — भारत! यदि राजाके शत्रु अधिक हो जायँ, मित्र उसका साथ छोड़ने लगें और सेना तथा खजाना भी नष्ट हो जाय तो उसके लिये कौन- सा मार्ग हितकर है? ॥ १ ॥

दुष्टामात्यसहायस्य च्युतमन्त्रस्य सर्वतः ।

राज्यात् प्रच्यवमानस्य गतिमग्ग्रामपश्यतः ॥ २ ॥

दुष्ट मन्त्री ही जिसका सहायक हो, इसीलिये जो श्रेष्ठ परामर्शसे भ्रष्ट हो गया हो एवं राज्यसे जिसके भ्रष्ट हो जानेकी सम्भावना हो और जिसे अपनी उन्नतिका कोई श्रेष्ठ उपाय न दिखायी देता हो, उसके लिये क्या कर्तव्य है? ॥

परचक्राभियातस्य परराष्ट्राणि मृद्नतः ।

विग्रहे वर्तमानस्य दुर्बलस्य बलीयसा ॥ ३ ॥

जो शत्रुसेनापर आक्रमण करके शत्रुके राज्यको रौंद रहा हो; इतनेहीमें कोई बलवान् राजा उसपर भी चढ़ाई कर दे तो उसके साथ युद्धमें लगे हुए उस दुर्बल राजाके लिये क्या आश्रय है? ॥ ३ ॥

असंविहितराष्ट्रस्य देशकालावजानतः ।

अप्राप्यं च भवेत् सान्त्वं भेदो वाप्यतिपीडनात् ।

जीवितं त्वर्थहेतुर्वा तत्र किं सुकृतं भवेत् ॥ ४ ॥

जिसने अपने राज्यकी रक्षा नहीं की हो, जिसे देश और कालका ज्ञान नहीं हो, अत्यन्त पीड़ा देनेके कारण जिसके लिये साम अथवा भेदनीतिका प्रयोग असम्भव हो जाय, उसके लिये क्या करना उचित है वह जीवनकी रक्षा करे या धनके साधनकी? उसके लिये क्या करनेमें भलाई है? ॥ ४ ॥

भीष्म उवाच

गुह्यं धर्मज मा प्राक्षीरतीव भरतर्षभ ।

अपृष्टो नोत्सहे वक्तुं धर्ममेतं युधिष्ठिर ॥ ५ ॥

भीष्मजीने कहा - धर्मनन्दन! भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! यह तो तुमने मुझसे बड़ा गोपनीय विषय पूछा है । यदि तुम्हारे द्वारा प्रश्न न किया गया होता तो मैं इस समय इस संकटकालिक

पृष्ठ 847

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धर्मके विषयमें कुछ भी नहीं कह सकता था ॥

धर्मो ह्यणीयान् वचनाद् बुद्धिश्च भरतर्षभ ।

श्रुत्वोपास्य सदाचारैः साधुर्भवति स क्वचित् ॥ ६ ॥

भरतभूषण! धर्मका विषय बड़ा सूक्ष्म है, शास्त्र- वचनोंके अनुशीलनसे उसका बोध होता है । शास्त्रश्रवण करनेके पश्चात् अपने सदाचरणोंद्वारा उसका सेवन करके साधुजीवन व्यतीत करनेवाला पुरुष कहीं कोई बिरला ही होता है ॥ ६ ॥

कर्मणा बुद्धिपूर्वेण भवत्याढ्यो न वा पुनः ।

तादृशोऽयमनुप्रश्नः संव्यवस्यः स्वया धिया ॥ ७ ॥

बुद्धिपूर्वक किये हुए कर्म ( प्रयत्न ) से मनुष्य धनाढ्य हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है । तुम्हें ऐसे प्रश्नपर स्वयं अपनी ही बुद्धिसे विचार करके किसी निश्चयपर पहुँचना चाहिये ॥ ७ ॥

उपायं धर्मबहुलं यात्रार्थं शृणु भारत ।

नाहमेतादृशं धर्मं बुभूषे धर्मकारणात् ॥ ८ ॥

भारत! उपर्युक्त संकटके समय राजाओंके जीवनकी रक्षाके लिये मैं ऐसा उपाय बताता हूँ जिसमें धर्मकी अधिकता है, उसे ध्यान देकर सुनो । परंतु मैं धर्माचरणके उद्देश्यसे ऐसे धर्मको नहीं अपनाना चाहता ॥ ८ ॥

दुःखादान इह ह्येष स्यात् तु पश्चात् क्षयोपमः ।

अभिगम्यमतीनां हि सर्वासामेव निश्चयः ॥ ९ ॥

आपत्तिके समय भी यदि प्रजाको दुःख देकर धन वसूल किया जाता है तो पीछे वह राजाके लिये विनाशके तुल्य सिद्ध होता है । आश्रय लेने योग्य जितनी बुद्धियाँ हैं, उन सबका यही निश्चय है ॥ ९ ॥

यथा यथा हि पुरुषो नित्यं शास्त्रमवेक्षते ।

तथा तथा विजानाति विज्ञानमथ रोचते ॥ १० ॥

पुरुष प्रतिदिन जैसे -जैसे शास्त्रका स्वाध्याय करता है वैसे - वैसे उसका ज्ञान बढ़ता जाता है फिर तो विशेष ज्ञान प्राप्त करनेमें ही उसकी रुचि हो जाती है ॥ १० ॥

अविज्ञानादयोगो हि पुरुषस्योपजायते ।

विज्ञानादपि योगश्च योगो भूतिकरः परः ॥ ११ ॥

ज्ञान न होनेसे मनुष्यको संकटकालमें उससे बचनेके लिये कोई योग्य उपाय नहीं सूझता; परंतु ज्ञानसे वह उपाय ज्ञात हो जाता है । उचित उपाय ही ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेका श्रेष्ठ साधन है ॥ ११ ॥

अशंकमानो वचनमनसूयुरिदं शृणु ।

राज्ञः कोशक्षयादेव जायते बलसंक्षयः ॥ १२ ॥

पृष्ठ 848

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तुम मेरी बातपर संदेह न करते हुए दोषदृष्टिका परित्याग करके यह उपदेश सुनो ।

खजानेके नष्ट होनेसे ही राजाके बलका नाश होता है ॥ १२ ॥

कोशं च जनयेद् राजा निर्जलेभ्यो यथा जलम् ।

कालं प्राप्यानुगृह्णीयादेष धर्मः सनातनः ।

उपायधर्मं प्राप्येमं पूर्वैराचरितं जनैः ॥ १३ ॥

जैसे मनुष्य निर्जल स्थानोंसे भी खोदकर जल निकाल लेता है उसी प्रकार राजा संकटकालमें निर्धन प्रजासे भी यथासाध्य धन लेकर अपना खजाना बढ़ावे; फिर अच्छा समय आनेपर उस धनके द्वारा प्रजापर अनुग्रह करे, यही सनातनकालसे चला आनेवाला धर्म है। पूर्ववर्ती राजाओंने भी आपत्तिकालमें इस उपायधर्मको पाकर इसका आचरण किया है ॥ १३ ॥

अन्यो धर्मः समर्थानामापत्स्वन्यश्च भारत ।

प्राक्कोशात् प्राप्यते धर्मो वृत्तिर्धर्माद् गरीयसी ॥ १४ ॥

भारत! सार्थ्यशाली पुरुषोंका धर्म दूसरा है और आपत्तिग्रस्त मनुष्योंका दूसरा । अतः पहले कोशसंग्रह कर लेनेपर राजाके लिये धर्मपालनका अवसर प्राप्त होता है; क्योंकि जीवन- निर्वाहका साधन प्राप्त करना धर्मसे भी बड़ा है ॥ १४ ॥

धर्मं प्राप्य न्यायवृत्तिं न बलीयान् न विन्दति ।

यस्माद् बलस्योपपत्तिरेकान्तेन न विद्यते ॥ १५ ॥

तस्मादापत्स्वधर्मोऽपि श्रूयते धर्मलक्षणः ।

अधर्मो जायते तस्मिन्निति वै कवयो विदुः ॥ १६ ॥

दुर्बल मनुष्य धर्मको पाकर भी न्यायोचित्त जीविका नहीं उपलब्ध कर पाता है । धर्माचरण करनेसे बलकी प्राप्ति अवश्य हो जायगी, यह निश्चितरूपसे नहीं कहा जा सकता; इसलिये आपत्तिकालमें अधर्म भी धर्मरूप सुना जाता है । परंतु विद्वान् पुरुष ऐसा मानते हैं कि आपत्तिकालमें भी धर्मके विरुद्ध आचरण करनेसे अधर्म होता ही है ॥ १५-१६ ॥ अनन्तरं क्षत्रियस्य तत्र किं विचिकित्स्यते ।

यथास्य धर्मो न ग्लायेन्नेयाच्छत्रुवशं यथा ।

तत् कर्तव्यमिहेत्याहुर्नात्मानवसादयेत् ॥ १७ ॥

आपत्ति दूर होनेके बाद क्षत्रियको क्या करना चाहिये? वह प्रायश्चित्त करे या प्रजासे कर लेना छोड़ दे; यह संशय उपस्थित होता है । इसका समाधान यह है कि वह ऐसा बर्ताव करे जिससे उसके धर्मको हानि न पहुँचे तथा उसे शत्रुके अधीन न होना पड़े । विद्वानोंने उसके लिये यही कर्तव्य बतलाया है, वह किसी तरह अपने- आपको संकटमें न डाले ॥ १७ ॥

सर्वात्मनैव धर्मस्य न परस्य न चात्मनः ।

पृष्ठ 849

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सर्वोपायैरुज्जिहीर्षेदात्मानमिति निश्चयः ॥ १८ ॥

संकटकालमें मनुष्य अपने या दूसरेके धर्मकी ओर न देखे; अपितु सम्पूर्ण हृदयसे सभी उपायोंद्वारा अपने आपके ही उद्धारकी अभिलाषा करे, यही सबका निश्चय है ॥ १८ ॥

तत्र धर्मविदां तात निश्चयो धर्मनैपुणम् ।

उद्यमो नैपुणं क्षात्रे बाहुवीर्यादिति श्रुतिः ॥ १ ९ ॥

तात! धर्मज्ञ पुरुषोंका निश्चय जैसे उनकी धर्म - विषयक निपुणताको सूचित करता है, उसी प्रकार बाहुबलसे अपनी उन्नतिके लिये उद्योग करना क्षत्रियकी निपुणताका सूचक है; यह श्रुतिका निर्णय है ॥ १ ९ ॥

क्षत्रियो वृत्तिसंरोधे कस्य नादातुमर्हति ।

अन्यत्र तापसस्वाच्च ब्राह्मणस्वाच्च भारत ॥ २० ॥

भरतनन्दन! क्षत्रिय यदि आजीविकासे रहित हो जाय तो वह तपस्वी और ब्राह्मणका धन छोड़कर और किसका धन नहीं ले सकता है ( अर्थात् सभीका ले सकता है ) ॥ २० ॥

यथा वै ब्राह्मणः सीदन्नयाज्यमपि याजयेत् ।

अभोज्यान्नानि चाश्नीयात् तथेदं नात्र संशयः ॥ २१ ॥

जैसे ब्राह्मण यदि जीविकाके अभावमें कष्ट पा रहा हो तो वह यज्ञके अनधिकारीसे भी यज्ञ करा सकता है तथा प्राण बचानेके लिये न खाने योग्य अन्नको भी खा सकता है, उसी प्रकार यह ( पूर्वश्लोकमें) क्षत्रियके लिये भी कर्तव्यका निर्देश किया गया है । इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥

पीडितस्य किमद्वारमुत्पथो विधृतस्य च ।

अद्वारतः प्रद्रवति यदा भवति पीडितः ॥ २२ ॥

आपद्ग्रस्त मनुष्यके लिये कौन -सा द्वार नहीं है? ( वह जिस ओरसे निकल भागे, वही उसके लिये द्वार है ) । कैदीके लिये कौन-सा बुरा मार्ग है ( वह बिना मार्गके भी भागकर आत्मरक्षा कर सके तो ऐसा प्रयत्न कर सकता है ) । मनुष्य जब आपत्तिमें घिरा होता है तब वह बिना दरवाजेके भी भाग निकलता है ॥ २२ ॥

यस्य कोशबलग्लान्या सर्वलोकपराभवः ।

भैक्ष्यचर्या न विहिता न च विट् शूद्रजीविका ॥ २३ ॥

खजाना और सेना न रहनेसे जिस क्षत्रियको सब लोगोंकी ओरसे पराभव प्राप्त होनेकी सम्भावना हो, उसीके लिये उपर्युक्त बातें बतायी गयी हैं । भीख माँगने और वैश्य या शूद्रकी जीविका अपनानेका क्षत्रियके लिये विधान नहीं है ॥ २३ ॥

स्वधर्मानन्तरा वृत्तिर्जात्याननुपजीवतः ।

जहतः प्रथमं कल्पमनुकल्पेन जीवनम् ॥ २४ ॥

परंतु जब अपनी जातिके लिये प्रतिपादित धर्मका अवलम्बन करके जीवन - निर्वाह न कर सके तब उसके लिये स्वधर्मसे विपरीत वृत्ति भी बतायी गयी है । क्योंकि आपत्तिकालमें

पृष्ठ 850

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प्रथम कल्प अर्थात् स्वधर्मानुकूल वृत्तिका त्याग करनेवाले पुरुषके लिये अपनेसे नीचे वर्णकी वृत्तिसे जीविका चलानेका विधान है ॥ २४ ॥

आपद्गतेन धर्माणामन्यायेनोपजीवनम् ।

अपि ह्येतद् ब्राह्मणेषु दृष्टं वृत्तिपरिक्षये ॥ २५ ॥

जो आपत्तिमें पड़ा हो वह धर्मके विपरीत आचरणद्वारा जीवन -निर्वाह कर सकता है ।

जीविका क्षीण होनेपर ब्राह्मणोंमें ऐसा व्यवहार देखा गया है ॥ २५ ॥

क्षत्रिये संशयः कस्मादित्येवं निश्चितं सदा ।

आददीत विशिष्टेभ्यो नावसीदेत् कथंचन ॥ २६ ॥

फिर क्षत्रियके लिये कैसे संदेह किया जा सकता है? उसके लिये भी सदा यही निश्चित है कि वह आपत्तिकालमें विशिष्ट अर्थात् धनवान् पुरुषोंसे बलपूर्वक धन ग्रहण करे । धनके अभावमें वह किसी तरह कष्ट न भोगे ॥ २६ ॥

हन्तारं रक्षितारं च प्रजानां क्षत्रियं विदुः ।

तस्मात् संरक्षता कार्यमादानं क्षत्रबन्धुना ॥ २७ ॥

विद्वान् पुरुष क्षत्रियको प्रजाका रक्षक और विनाशक भी मानते हैं । अतः क्षत्रियबन्धुको प्रजाकी रक्षा करते हुए ही धन ग्रहण करना चाहिये ॥ २७ ॥

अन्यत्र राजन् हिंसाया वृत्तिर्नेहास्ति कस्यचित् ।

अप्यरण्यसमुत्थस्य एकस्य चरतो मुनेः ॥ २८ ॥

राजन्! इस संसारमें किसीकी भी ऐसी वृत्ति नहीं है, जो हिंसासे शून्य हो । औरोंकी तो बात ही क्या है, वनमें रहकर एकाकी विचरनेवाले तपस्वी मुनिकी भी वृत्ति सर्व था हिंसारहित नहीं है ॥ २८ ॥

न शंखलिखितां वृत्तिं शक्यमास्थाय जीवितुम् ।

विशेषतः कुरुश्रेष्ठ प्रजापालनमीप्सया ॥ २९ ॥

कुरुश्रेष्ठ! कोई भी ललाटमें लिखी हुई वृत्तिका ही भरोसा करके जीवन-निर्वाह नहीं कर सकता; अतः प्रजापालनकी इच्छा रखनेवाले राजाका भाग्यके भरोसे निर्वाह चलाना तो सर्वथा अशक्य है ॥ २ ९ ॥

परस्परं हि संरक्षा राज्ञा राष्ट्रेण चापदि ।

नित्यमेव हि कर्तव्या एष धर्मः सनातनः ॥ ३० ॥

इसलिये आपत्तिकालमें राजा और राज्यकी प्रजा दोनोंको निरन्तर एक - दूसरेकी रक्षा

करनी चाहिये । यही सदाका धर्म है ॥ ३० ॥

राजा राष्ट्रं यथाऽऽपत्सु द्रव्यौघैरपि रक्षति ।

राष्ट्रेण राजा व्यसने रक्षितव्यस्तथा भवेत् ॥ ३१ ॥

जैसे राजा प्रजापर संकट आ जाय तो राशि राशि धन लुटाकर भी उसकी रक्षा करता है, उसी तरह राजाके ऊपर संकट पड़नेपर राष्ट्रकी प्रजाको भी उसकी रक्षा करनी