05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 861–870
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 861–870
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त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः राजाके लिये कोशसंग्रहकी आवश्यकता, मर्यादाकी स्थापना और अमर्यादित दस्युवृत्तिकी निन्दा भीष्म उवाच
स्वराष्ट्रात् परराष्ट्राच्च कोशं संजनयेन्नृपः ।
कोशाद्धि धर्मः कौन्तेय राज्यमूलं च वर्धते ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! राजाको चाहिये कि वह अपने तथा शत्रुके राज्यसे धन लेकर खजानेको भरे । कोशसे ही धर्मकी वृद्धि होती है और राज्यकी जड़ें बढ़ती अर्थात् सुदृढ़ होती हैं ॥ १ ॥
तस्मात् संजनयेत् कोशं सत्कृत्य परिपालयेत् ।
परिपाल्यानुतनुयादेष धर्मः सनातनः ॥ २ ॥
इसलिये राजा कोशका संग्रह करे, संग्रह करके सादर उसकी रक्षा करे और रक्षा करके निरन्तर उसको बढ़ाता रहे; यही राजाका सदासे चला आनेवाला धर्म है ॥ २ ॥
न कोशः शुद्धशौचेन न नृशंसेन जातुचित् ।
मध्यमं पदमास्थाय कोशसंग्रहणं चरेत् ॥ ३ ॥
जो विशुद्ध आचार- विचारसे रहनेवाला है, उसके द्वारा कभी कोशका संग्रह नहीं हो सकता । जो अत्यन्त क्रूर है, वह भी कदापि इसमें सफल नहीं हो सकता; अतः मध्यम मार्गका आश्रय लेकर कोश- संग्रह करना चाहिये ॥ ३ ॥
अबलस्य कुतः कोशो ह्यकोशस्य कुतो बलम् ।
अबलस्य कुतो राज्यमराज्ञः श्रीर्भवेत् कुतः ॥ ४ ॥
यदि राजा बलहीन हो तो उसके पास कोश कैसे रह सकता है? कोशहीनके पास सेना कैसे रह सकती है? जिसके पास सेना ही नहीं है, उसका राज्य कैसे टिक सकता है और राज्यहीनके पास लक्ष्मी कैसे रह सकती है? ॥ ४ ॥
उच्चैर्वृत्तेः श्रियो हानिर्यथैव मरणं तथा ।
तस्मात् कोशं बलं मित्रमथ राजा विवर्धयेत् ॥ ५ ॥
जो धनके कारण ऊँचे तथा महत्त्वपूर्ण पदपर पहुँचा हुआ है, उसके धनकी हानि हो जाय तो उसे मृत्युके तुल्य कष्ट होता है, अतः राजाको कोश, सेना तथा मित्रकी संख्या बढ़ानी चाहिये ॥ ५ ॥
हीनकोशं हि राजानमवजानन्ति मानवाः ।
न चास्याल्पेन तुष्यन्ति कार्यमप्युत्सहन्ति च ॥ ६ ॥
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जिस राजाके पास धनका भण्डार नहीं है, उसकी साधारण मनुष्य भी अवहेलना करते हैं । उससे थोड़ा लेकर लोग संतुष्ट नहीं होते हैं और न उसका कार्य करनेमें ही उत्साह दिखाते हैं ॥ ६ ॥
श्रियो हि कारणाद् राजा सत्क्रियां लभते पराम् ।
सास्य गूहति पापानि वासो गुह्यमिव स्त्रियाः ॥ ७ ॥
लक्ष्मीके कारण ही राजा सर्वत्र बड़ा भारी आदर - सत्कार पाता है । जैसे कपड़ा नारी गुप्त अंगोंको छिपाये रखता है, उसी प्रकार लक्ष्मी राजाके सारे दोषोंको ढक लेती है ॥ ७ ॥
ऋद्धिमस्यानु तप्यन्ते पुरा विप्रकृता नराः ।
शालावृका इवाजस्रं जिघांसुमेव विन्दति ॥ ८ ॥
पहलेके तिरस्कृत हुए मनुष्य इस राजाकी बढ़ती हुई समृद्धिको देखकर जलते रहते हैं और अपने वधकी इच्छा रखनेवाले उस राजाका ही कपटपूर्वक आश्रय ले उसी तरह उसकी सेवा करते हैं, जैसे कुत्ते अपने घातक चाण्डालकी सेवामें रहते हैं ॥ ८ ॥
ईदृशस्य कुतो राज्ञः सुखं भवति भारत ।
उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम् ॥ ९ ॥
अप्यपर्वणि भज्येत न नमेतेह कस्यचित् । भारत! ऐसे नरेशको कैसे सुख मिलेगा? अतः राजाको सदा उद्यम ही करना चाहिये, किसीके सामने झुकना नहीं चाहिये; क्योंकि उद्यम ही पुरुषत्व है । जैसे सूखी लकड़ी बिना गाँठके ही टूट जाती है, परंतु झुकती नहीं है, उसी प्रकार राजा नष्ट भले ही हो जाय, परंतु उसे कभी दबना नहीं चाहिये ॥ ९ ३ ॥ अप्यरण्यं समाश्रित्य चरेन्मृगगणैः सह ॥ १० ॥
न त्वेवोज्झितमर्यादैर्दस्युभिः सहितश्चरेत् । वह वनकी शरण लेकर मृगोंके साथ भले ही विचरे; किंतु मर्यादा भंग करनेवाले डाकुओंके साथ कदापि न रहे ॥ १०३ ॥
दस्यूनां सुलभा सेना रौद्रकर्मसु भारत ॥ ११ ॥
एकान्ततो ह्यमर्यादात् सर्वोऽप्युद्विजते जनः ।
दस्यवोऽप्यभिशङ्कन्ते निरनुक्रोशकारिणः ॥ १२ ॥
भारत! डाकुओंको लूट- पाट या हिंसा आदि भयानक कर्मोंके लिये अनायास ही सेना सुलभ हो जाती है । सर्वथा मर्यादाशून्य मनुष्यसे सब लोग उद्विग्न हो उठते हैं । केवल निर्दयतापूर्ण कर्म करनेवाले पुरुषकी ओरसे डाकू भी शंकित रहते हैं ॥ ११-१२ ॥
स्थापयेदेव मर्यादां जनचित्तप्रसादिनीम् ।
अल्पेऽप्यर्थे च मर्यादा लोके भवति पूजिता ॥ १३ ॥
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राजाको ऐसी ही मर्यादा स्थापित करनी चाहिये, जो सब लोगोंके चित्तको प्रसन्न करनेवाली हो । लोकमें छोटे - से काममें भी मर्यादाका ही मान होता है ॥ १३ ॥
नायं लोकोऽस्ति न पर इति व्यवसितो जनः ।
नालं गन्तुं हि विश्वासं नास्तिके भयशङ्किते ॥ १४ ॥
संसारमें ऐसे भी मनुष्य हैं, जो यह निश्चय किये बैठे हैं कि ' यह लोक और परलोक हैं ही नहीं । ' ऐसा नास्तिक मानव भयकी शंकाका स्थान है, उसपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ १४ ॥
यथा सद्भिः परादानमहिंसा दस्युभिः कृता ।
अनुरज्यन्ति भूतानि समर्यादेषु दस्युषु ॥ १५ ॥
दस्युओंमें भी मर्यादा होती है, जैसे अच्छे डाकू दूसरोंका धन तो लूटते हैं, परंतु हिंसा नहीं करते ( किसीकी इज्जत नहीं लेते ) । जो मर्यादाका ध्यान रखते हैं, उन लुटेरोंमें बहुत - से प्राणी स्नेह भी करते हैं, ( क्योंकि उनके द्वारा बहुतों की रक्षा भी होती है ) ॥ १५ ॥
अयुद्धयमानस्य वधो दारामर्षः कृतघ्नता ।
ब्रह्मवित्तस्य चादानं निःशेषकरणं तथा ॥ १६ ॥
स्त्रिया मोषः पतिस्थानं दस्युष्वेतद् विगर्हितम् ।
संश्लेषं च परस्त्रीभिर्दस्युरेतानि वर्जयेत् ॥ १७ ॥
युद्ध न करनेवालेको मारना, परायी स्त्रीपर बलात्कार करना, कृतघ्नता, ब्राह्मणके धनका अपहरण, किसीका सर्वस्व छीन लेना, कुमारी कन्याका अपहरण करना तथा किसी ग्राम आदिपर आक्रमण करके स्वयं उसका स्वामी बन बैठना – ये सब बातें डाकुओंमें भी निन्दित मानी गयी हैं । इस्युको भी परस्त्रीका स्पर्श और उपर्युक्त सभी पाप त्याग देने चाहिये ॥ १६-१७ ॥
अभिसंदधते ये च विश्वासायास्य मानवाः ।
अशेषमेवोपलभ्य कुर्वन्तीति विनिश्चयः ॥ १८ ॥
जिनका सर्वस्व लूट लिया जाता है, वे मनुष्य उन डाकुओंके साथ मेल - जोल और विश्वास बढ़ानेकी चेष्टा करते हैं और उनके स्थान आदिका पता लगाकर फिर उनका सर्वस्व नष्ट कर देते हैं, यह निश्चित बात है ॥ १८ ॥
तस्मात् सशेषं कर्तव्यं स्वाधीनमपि दस्युभिः ।
न बलस्थोऽहमस्मीति नृशंसानि समाचरेत् ॥ १ ९ ॥
इसलिये दस्युओंको उचित है कि वे दूसरोंके धनको अपने अधिकारमें पाकर भी कुछ शेष छोड़ दें, सारा- का - सारा न लूट लें । ' मैं बलवान् हूँ' ऐसा समझकर क्रूरतापूर्ण बर्ताव न करें ॥ १ ९ ॥
स शेषकारिणस्तत्र शेषं पश्यन्ति सर्वशः ।
निःशेषकारिणो नित्यं निःशेषकरणाद् भयम् ॥ २० ॥
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जो डाकू दूसरोंके धनको शेष छोड़ देते हैं, वे सब ओर अपने धनका भी अवशेष देख पाते हैं; तथा जो दूसरोंके धनमें से कुछ भी शेष नहीं छोड़ते, उन्हें सदा अपने धनके भी निःशेष हो जानेका भय बना रहता है ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें एक सौ तैंतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १३३ ॥
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चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः बलकी महत्ता और पापसे छूटनेका प्रायश्चित्त भीष्म उवाच
अत्र धर्मानुवचनं कीर्तयन्ति पुराविदः ।
प्रत्यक्षावेव धर्मार्थौ क्षत्रियस्य विजानतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! प्राचीनकालकी बातोंको जाननेवाले विद्वान् इस विषयमें जो धर्मका प्रवचन करते हैं, वह इस प्रकार है- विज्ञ क्षत्रियके लिये धर्म और अर्थ — ये दो ही प्रत्यक्ष हैं ॥ १ ॥
तत्र न व्यवधातव्यं परोक्षा धर्मयापना ।
अधर्मो धर्म इत्येतद् यथा वृकपदं तथा ॥ २ ॥
धर्म और अधर्मकी समस्या रखकर किसीके कर्तव्यमें व्यवधान नहीं डालना चाहिये; क्योंकि धर्मका फल प्रत्यक्ष नहीं है । जैसे भेड़ियेका पदचिह्न देखकर किसीको यह निश्चय नहीं होता कि यह व्याघ्रका पदचिह्न है या कुत्तेका? उसी प्रकार धर्म और अधर्मके विषयमें निर्णय करना कठिन है ॥ २ ॥
धर्माधर्मफले जातु ददर्शेह न कश्चन ।
बुभूषेद् बलमेवैतत् सर्वं बलवतो वशे ॥ ३ ॥
धर्म और अधर्मका फल किसीने कभी यहाँ प्रत्यक्ष नहीं देखा है । अतः राजा बलप्राप्तिके लिये प्रयत्न करे; क्योंकि यह सब जगत् बलवान्के वशमें होता है ॥ ३ ॥
श्रियो बलममात्यांश्च बलवानिह विन्दति ।
यो ह्यनाढ्यः स पतितस्तदुच्छिष्टं यदल्पकम् ॥ ४ ॥
बलवान् पुरुष इस जगत् में सम्पत्ति, सेना और मन्त्री सब कुछ पा लेता है । जो दरिद्र है, वह पतित समझा जाता है और किसीके पास जो बहुत थोड़ा धन है, वह उच्छिष्ट या जूठन समझा जाता है ॥ ४ ॥
बह्वपथ्यं बलवति न किंचित् क्रियते भयात् ।
उभौ सत्याधिकारस्थौ त्रायेते महतो भयात् ॥ ५ ॥
बलवान् पुरुषमें बहुत - सी बुराई होती है तो भी भयके मारे उसके विषयमें कोई मुँहसे कुछ बात नहीं निकालता है । यदि बल और धर्म दोनों सत्यके ऊपर प्रतिष्ठित हों तो वे मनुष्यकी महान् भयसे रक्षा करते हैं ॥ ५ ॥
अतिधर्माद् बलं मन्ये बलाद् धर्मः प्रवर्तते ।
बले प्रतिष्ठितो धर्मो धरण्यामिव जङ्गमम् ॥ ६ ॥
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मैं धर्मसे भी बलको ही अधिक श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि बलसे धर्मकी प्रवृत्ति होती है । जैसे चलने - फिरनेवाले सभी प्राणी पृथ्वीपर ही स्थित हैं, उसी प्रकार धर्म बलपर ही प्रतिष्ठित है ॥ ६ ॥
धूमो वायोरिव वशे बलं धर्मोऽनुवर्तते ।
अनीश्वरो बले धर्मो द्रुमे वल्लीव संश्रिता ॥ ७ ॥
जैसे धूआँ वायुके अधीन होकर चलता है, उसी प्रकार धर्म भी बलका अनुसरण करता है; अतः जैसे लता किसी वृक्षके सहारे फैलती है, उसी प्रकार निर्बल धर्मबलके ही आधारपर सदा स्थिर रहता है ॥ ७ ॥
वशे बलवतां धर्मः सुखं भोगवतामिव ।
नास्त्यसाध्यं बलवतां सर्वं बलवतां शुचि ॥ ८ ॥
जैसे भोग- सामग्रीसे सम्पन्न पुरुषोंके अधीन सुख भोग होता है, उसी प्रकार धर्म बलवानोंके वशमें रहता है । बलवानोंके लिये कुछ भी असाध्य नहीं है । बलवानोंकी सारी वस्तु ही शुद्ध एवं निर्दोष होती है ॥ ८ ॥
दुराचारः क्षीणबलः परित्राणं न गच्छति ।
अथ तस्मादुद्विजते सर्वो लोको वृकादिव ॥ ९ ॥
जिसका बल नष्ट हो गया है, जो दुराचारी है, उसको भय उपस्थित होनेपर कोई रक्षक नहीं मिलता है । दुर्बलसे सब लोग उसी प्रकार उद्विग्न हो उठते हैं, जैसे भेड़ियेसे ॥ ९ ॥
अपध्वस्तो ह्यवमतो दुःखं जीवति जीवितम् ।
जीवितं यदपक्रुष्टं यथैव मरणं तथा ॥ १० ॥
दुर्बल अपनी सम्पत्तिसे वंचित हो जाता है, सबके अपमान और उपेक्षाका पात्र बनता है तथा दुःखमय जीवन व्यतीत करता है । जो जीवन निन्दित हो जाता है, वह मृत्युके ही तुल्य है ॥ १० ॥
यदेवमाहुः पापेन चारित्रेण विवर्जितः ।
सुभृशं तप्यते तेन वाक्शल्येन परिक्षतः ॥ ११ ॥
दुर्बल मनुष्यके विषयमें लोग इस प्रकार कहने लगते हैं— ' अरे! यह तो अपने पापाचारके कारण बन्धु- बान्धवोंद्वारा त्याग दिया गया है । ' उनके उस वाग्बाणसे घायल होकर वह अत्यन्त संतप्त हो उठता है ॥ ११ ॥
अत्रैतदाहुराचार्याः पापस्य परिमोक्षणे ।
त्रयीं विद्यामवेक्षेत तथोपासीत वै द्विजान् ॥ १२ ॥
प्रसादयेन्मधुरया वाचा चाप्यथ कर्मणा ।
महामनाश्चापि भवेद् विवहेच्च महाकुले ॥ १३ ॥
इत्यस्मीति वदेदेवं परेषां कीर्तयेद् गुणान् ।
जपेदुदकशीलः स्यात् पेशलो नातिजल्पकः ॥ १४ ॥
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ब्रह्मक्षत्रं सम्प्रविशेद् बहु कृत्वा सुदुष्करम् ।
उच्चमानो हि लोकेन बहुकृत् तदचिन्तयन् ॥ १५ ॥
यहाँ अधर्मपूर्वक धनका उपार्जन करनेपर जो पाप होता है, उससे छूटनेके लिये आचार्योंने यह उपाय बताया है— उक्त पापसे लिप्त हुआ राजा तीनों वेदोंका स्वाध्याय करे, ब्राह्मणोंकी सेवामें उपस्थित रहे, मधुर वाणी तथा सत्कर्मोंद्वारा उन्हें प्रसन्न करे, अपने मनको उदार बनावे और उच्चकुलमें विवाह करे । मैं अमुक नामवाला आपका सेवक हूँ, इस प्रकार अपना परिचय दे, दूसरोंके गुणोंका बखान करे, प्रतिदिन स्नान करके इष्ट - मन्त्रका जप करे, अच्छे स्वभावका बने अधिक न बोले, लोग उसे बहुत पापाचारी बताकर उसकी निन्दा करें तो भी उसकी परवा न करे और अत्यन्त दुष्कर तथा बहुत से पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करके ब्राह्मणों तथा क्षत्रियोंके समाजमें प्रवेश करे ॥ १२–१५ ॥
अपापो ह्येवमाचारः क्षिप्रं बहुमतो भवेत् ।
सुखं च चित्रं भुञ्जीत कृतेनैकेन गोपयेत् ॥ १६ ॥
लोके च लभते पूजां परत्रेह महत् फलम् ॥ १७ ॥
ऐसे आचरणवाला पुरुष पापहीन हो शीघ्र ही बहुसंख्यक मनुष्योंके आदरका पात्र हो जाता है, नाना प्रकारके सुखोंका उपभोग करता है और अपने किये हुए विशेष सत्कर्मके प्रभावसे अपनी रक्षा कर लेता है । लोकमें सर्वत्र उसका आदर होने लगता है तथा वह इहलोक और परलोकमें भी महान् फलका भागी होता है ॥ १६-१७ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें एक सौचौंतीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १३४ ॥
Fard
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पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः मर्यादाका पालन करने - करानेवाले कायव्यनामक दस्युकी सद्गतिका वर्णन भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथा दस्युः समर्यादः प्रेत्यभावे न नश्यति ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! जो दस्यु ( डाकू) मर्यादाका पालन करता है, वह मरनेके बाद दुर्गतिमें नहीं पड़ता । इस विषयमें विद्वान् पुरुष एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १ ॥
प्रहर्ता मतिमान् शूरः श्रुतवाननृशंसवान् ।
रक्षन्नाश्रमिणां धर्मं ब्रह्मण्यो गुरुपूजकः ॥ २ ॥
निषाद्यां क्षत्रियाज्जातः क्षत्रधर्मानुपालकः ।
कायव्यो नाम नैषादिर्दस्युत्वात् सिद्धिमाप्तवान् ॥ ३ ॥
कायव्यनामसे प्रसिद्ध एक निषादपुत्रने दस्यु होनेपर भी सिद्धि प्राप्त कर ली थी । वह प्रहारकुशल, शूरवीर, बुद्धिमान्, शास्त्रज्ञ, क्रूरतारहित, आश्रमवासियोंके धर्मकी रक्षा करनेवाला, ब्राह्मणभक्त और गुरुपूजक था । वह क्षत्रिय पितासे एक निषादजातिकी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था; अतः क्षत्रियधर्मका निरन्तर पालन करता था ॥ २-३ ॥
अरण्ये सायं पूर्वाह्णे मृगयूथप्रकोपिता ।
विधिज्ञो मृगजातीनां नैषादानां च कोविदः ॥ ४ ॥
कायव्य प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकालके समय वनमें जाकर मृगोंकी टोलियोंको उत्तेजित कर देता था । वह मृगोंकी विभिन्न जातियोंके स्वभावसे परिचित तथा उन्हें काबूमें
करनेकी कलाको जाननेवाला था । निषादोंमें वह सबसे निपुण था ॥ ४ ॥
सर्वकाननदेशज्ञः पारियात्रचरः सदा ।
धर्मज्ञः सर्वभूतानाममोघेषुर्दृढायुधः ॥ ५ ॥
उसे वनके सम्पूर्ण प्रदेशोंका ज्ञान था । वह सदा पारियात्र पर्वतपर विचरनेवाला तथा समस्त प्राणियोंके धर्मोंका ज्ञाता था। उसका बाण लक्ष्य बेधनेमें अचूक था । उसके सारे अस्त्र- शस्त्र सुदृढ़ थे ॥ ५ ॥
अप्यनेकशतां सेनामेक एव जिगाय सः ।
स वृद्धावन्धबधिरौ महारण्येऽभ्यपूजयत् ॥ ६ ॥
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वह सैकड़ों मनुष्योंकी सेनाको अकेले ही जीत लेता था और उस महान् वनमें रहकर अपने अन्धे और बहरे माता- पिताकी सेवा - पूजा किया करता था ॥ ६ ॥
मधुमांसैर्मूलफलेरन्नैरुच्चावचैरपि ।
सत्कृत्य भोजयामास मान्यान् परिचचार च ॥ ७ ॥
वह निषाद मधु, मांस, फल, मूल तथा नाना प्रकारके अन्नोंद्वारा माता- पिताको सत्कारपूर्वक भोजन कराता था तथा दूसरे दूसरे माननीय पुरुषोंकी भी सेवा- पूजा किया करता था ॥ ७ ॥
आरण्यकान् प्रव्रजितान् ब्राह्मणान् परिपूजयन् ।
अपि तेभ्यो गृहान् गत्वा निनाय सततं वने ॥। ८ ॥
वह वनमें रहनेवाले वानप्रस्थ और संन्यासी ब्राह्मणोंकी पूजा करता और प्रतिदिन उनके घरमें जाकर उनके लिये अन्न आदि वस्तुएँ पहुँचा देता था ॥ ८ ॥
येऽस्मान्न प्रतिगृह्णन्ति दस्युभोजनशङ्कया ।
तेषामासज्य गेहेषु कल्य एव स गच्छति ॥ ९ ॥
जो लोग लुटेरेके घरका भोजन होनेकी आशंकासे उसके हाथसे अन्न नहीं ग्रहण करते थे, उनके घरोंमें वह बड़े सबेरे ही अन्न और फल- मूल आदि भोजन-सामग्री रख जाता था ॥ ९ ॥
बहूनि च सहस्राणि ग्रामणित्वेऽभिवव्रिरे ।
निर्मर्यादानि दस्यूनां निरनुक्रोशवर्तिनाम् ॥ १० ॥
एक दिन मर्यादाका अतिक्रमण और भाँति - भाँतिके क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले कई हजार डाकुओंने उससे अपना सरदार बननेके लिये प्रार्थना की ॥ १० ॥
दस्यव ऊचुः
मुहूर्तदेशकालज्ञः प्राज्ञः शूरो दृढव्रतः ।
ग्रामणीर्भव नो मुख्यः सर्वेषामेव सम्मतः ॥ ११ ॥
डाकू बोले — तुम देश, काल और मुहूर्तके ज्ञाता, विद्वान्, शूरवीर और दृढ़प्रतिज्ञ हो; इसलिये हम सब लोगोंकी सम्मतिसे तुम हमारे सरदार हो जाओ ॥ ११ ॥
यथा यथा वक्ष्यसि नः करिष्यामस्तथा तथा ।
पालयास्मान् यथान्यायं यथा माता यथा पिता ॥ १२ ॥
तुम हमें जैसी -जैसी आज्ञा दोगे, वैसा ही वैसा हम करेंगे । तुम माता--पिताके समान हमारी यथोचित रीतिसे रक्षा करो ॥ १२ ॥
कायव्य उवाच
मा वधीस्त्वं स्त्रियं भीरुं मा शिशुं मा तपस्विनम् ।
नायुद्धयमानो हन्तव्यो न च ग्राह्या बलात् स्त्रियः ॥ १३ ॥
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कायव्यने कहा — प्रिय बन्धुओ! तुम कभी स्त्री, डरपोक, बालक और तपस्वीकी हत्या न करना । जो तुमसे युद्ध न कर रहा हो, उसका भी वध न करना । स्त्रियोंको कभी बलपूर्वक न पकड़ना ॥ १३ ॥
सर्वथा स्त्री न हन्तव्या सर्वसत्त्वेषु केनचित् ।
नित्यं तु ब्राह्मणे स्वस्ति योद्धव्यं च तदर्थतः ॥ १४ ॥
तुममेंसे कोई भी सभी प्राणियोंके स्त्रीवर्गकी किसी तरह भी हत्या न करे। ब्राह्मणोंके हितका सदा ध्यान रखना । आवश्यकता हो तो उनकी रक्षाके लिये युद्ध भी करना ॥ १४ ॥
शस्यं च नापि हर्तव्यं सारविघ्नं च मा कृथाः ।
पूज्यन्ते यत्र देवाश्च पितरोऽतिथयस्तथा ॥ १५ ॥
खेतकी फसल न उखाड़ लाना, विवाह आदि उत्सवोंमें विघ्न न डालना, जहाँ देवता, पितर और अतिथियोंकी पूजा होती हो, वहाँ कोई उपद्रव न खड़ा करना ॥ १५ ॥
सर्वभूतेष्वपि च वै ब्राह्मणो मोक्षमर्हति ।
कार्याचोपचितिस्तेषां सर्वस्वेनापि या भवेत् ॥ १६ ॥
समस्त प्राणियोंमें ब्राह्मण विशेषरूपसे डाकुओंके हाथसे छुटकारा पानेका अधिकारी है । अपना सर्वस्व लगाकर भी तुम्हें उनकी सेवा- पूजा करनी चाहिये ॥ १६ ॥
यस्य ह्येते सम्प्ररुष्टा मन्त्रयन्ति पराभवम् ।
न तस्य त्रिषु लोकेषु त्राता भवति कश्चन ॥ १७ ॥
देखो, ब्राह्मणलोग कुपित होकर जिसके पराभवका चिन्तन करने लगते हैं, उसका तीनों लोकोंमें कोई रक्षक नहीं होता ॥ १७ ॥
यो ब्राह्मणान् परिवदेद् विनाशं चापि रोचयेत् ।
सूर्योदय इव ध्वान्ते ध्रुवं तस्य पराभवः ॥ १८ ॥
जो ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है और उनका विनाश चाहता है, उसका जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी प्रकार अवश्य ही पतन हो जाता है ॥
इहैव फलमासीनः प्रत्याकाङ्क्षेत सर्वशः ।
ये येनो न प्रदास्यन्ति तांस्तांस्तेनाभियास्यसि ॥ १ ९ ॥
तुम लोग यहीं बैठे - बैठे लुटेरेपनका जो फल है, उसे पानेकी अभिलाषा रखो । जो -जो व्यापारी हमें स्वेच्छासे धन नहीं देंगे, उन्हीं - उन्हींपर तुम दल बाँधकर आक्रमण करोगे ॥ १ ९ ॥
शिष्ट्यर्थं विहितो दण्डो न वृद्धयर्थं विनिश्चयः ।
ये च शिष्टान् प्रबाधन्ते दण्डस्तेषां वधः स्मृतः ॥ २० ॥
दण्डका विधान दुष्टोंके दमनके लिये है, अपना धन बढ़ानेके लिये नहीं । जो शिष्ट पुरुषोंको सताते हैं, उनका वध ही उनके लिये दण्ड माना गया है ॥ २० ॥
राष्ट्रोपरोधेन वृद्धिं कुर्वन्ति केचन ।