05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 871–880
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 871–880
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तदैव तेऽनुमार्यन्ते कुणपे कृमयो यथा ॥ २१ ॥
जो लोग राष्ट्रको हानि पहुँचाकर अपनी उन्नतिके लिये प्रयत्न करते हैं, वे मुर्दोंमें पड़े हुए कीड़ोंके समान उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं ॥ २१ ॥
ये पुनर्धर्मशास्त्रेण वर्तेरन्निह दस्यवः ।
अपि ते दस्यवो भूत्वा क्षिप्रं सिद्धिमवाप्नुयुः ॥ २२ ॥
जो दस्युजातिमें उत्पन्न होकर भी धर्मशास्त्रके अनुसार आचरण करते हैं, वे लुटेरे होनेपर भी शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं ( ये सब बातें तुम्हें स्वीकार हों तो मैं तुम्हारा सरदार बन सकता हूँ) ॥ २२ ॥
भीष्म उवाच
ते सर्वमेवानुचक्रुः कायव्यस्यानुशासनम् ।
वृद्धिं च लेभिरे सर्वे पापेभ्यश्चाप्युपारमन् ॥ २३ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! यह सुनकर उन दस्युओंने कायव्यकी सारी आज्ञा मान ली और सदा उसका अनुसरण किया । इससे उन सभीकी उन्नति हुई और वे पाप - कर्मोंसे हट गये ॥ २३ ॥
कायव्यः कर्मणा तेन महतीं सिद्धिमाप्तवान् ।
साधूनामाचरन् क्षेमं दस्यून् पापान्निवर्तयम् ॥ २४ ॥
कायव्यने उस पुण्यकर्मसे बड़ी भारी सिद्धि प्राप्त कर ली; क्योंकि उसने साधु पुरुषोंका कल्याण करते हुए डाकुओंको पापसे बचा लिया था ॥ २४ ॥
इदं कायव्यचरितं यो नित्यमनुचिन्तयेत् ।
नारण्येभ्यो हि भूतेभ्यो भयं प्राप्नोति किंचन ॥ २५ ॥
जो प्रतिदिन काव्यके इस चरित्रका चिन्तन करता है, उसे वनवासी प्राणियोंसे किंचिन्मात्र भी भय नहीं प्राप्त होता ॥ २५ ॥
न भयं तस्य भूतेभ्यः सर्वेभ्यश्चैव भारत ।
नासतो विद्यते राजन् स ह्यरण्येषु गोपतिः ॥ २६ ॥
भारत! उसे सम्पूर्ण भूतोंसे भी भय नहीं होता । राजन्! किसी दुष्टात्मासे भी उसको डर नहीं लगता । वह तो वनका अधिपति हो जाता है ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कायव्यचरिते पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कायव्यका चरित्रविषयक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३५ ॥
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षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः राजा किसका धन ले और किसका न ले तथा किसके साथ कैसा बर्ताव करे – इसका विचार भीष्म उवाच
अत्र गाथा ब्रह्मगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
येन मार्गेण राजा वै कोशं संजनयत्युत ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं — युधिष्ठिर! जिस मार्ग या उपायसे राजा अपना खजाना भरता है, उसके विषयमें प्राचीन इतिहासके जानकारलोग ब्रह्माजीकी कही हुई कुछ गाथाएँ कहा करते हैं ॥ १ ॥
न धनं यज्ञशीलानां हार्यं देवस्वमेव च ।
दस्यूनां निष्क्रियाणां च क्षत्रियो हर्तुमर्हति ॥ २ ॥
राजाको यज्ञानुष्ठान करनेवाले द्विजोंका धन नहीं लेना चाहिये । इसी प्रकार उसे देवसम्पत्तिमें भी हाथ नहीं लगाना चाहिये। वह लुटेरों तथा अकर्मण्य मनुष्योंके धनका अपहरण कर सकता है ॥ २ ॥
इमाः प्रजाः क्षत्रियाणां राज्यभोगाश्च भारत ।
धनं हि क्षत्रियस्यैव द्वितीयस्य न विद्यते ॥ ३ ॥
तदस्य स्याद् बलार्थं वा धनं यज्ञार्थमेव च । भरतनन्दन! ये समस्त प्रजाएँ क्षत्रियोंकी हैं । राज्यभोग भी क्षत्रियोंके ही हैं और सारा धन भी उन्हींका है, दूसरेका नहीं है; किंतु वह धन उसकी सेनाके लिये है या यज्ञानुष्ठानके लिये ॥ ३३ ॥
अभोग्याश्चौषधीश्छित्त्वा भोग्या एव पचन्त्युत ॥ ४ ॥
यो वै न देवान् न पितॄन् न मर्त्यान हविषार्चति ।
अनर्थकं धनं तत्र प्राहुर्धर्मविदो जनाः ॥ ५ ॥
हरेत् तद् द्रविणं राजन् धार्मिकः पृथिवीपतिः ।
ततः प्रीणयते लोकं न कोशं तद्विधं नृपः ॥ ६ ॥
राजन्! जो खानेयोग्य नहीं हैं, उन ओषधियों या वृक्षोंको काटकर मनुष्य उनके द्वारा खानेयोग्य ओषधियोंको पकाते हैं । इसी प्रकार जो देवताओं, पितरों और मनुष्योंका हविष्यके द्वारा पूजन नहीं करता है, उसके धनको धर्मज्ञ पुरुषोंने व्यर्थ बताया है । अतः धर्मात्मा राजा ऐसे धनको छीन ले और उसके द्वारा प्रजाका पालन करे, किंतु वैसे धनसे राजा अपना कोश न भरे ॥ ४–६ ॥
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असाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यो यः प्रयच्छति ।
आत्मानं संक्रमं कृत्वा कृत्स्नधर्मविदेव सः ॥ ७ ॥
जो राजा दुष्टोंसे धन छीनकर उसे श्रेष्ठ पुरुषोंमें बाँट देता है, वह अपने - आपको सेतु बनाकर उन सबको पार कर देता है । उसे सम्पूर्ण धर्मोंका ज्ञाता ही मानना चाहिये ॥ ७ ॥
तथा तथा जयेल्लोकान् शक्त्या चैव यथा यथा ।
उद्भिज्जा जन्तवो यद्वच्छुक्लजीवा यथा यथा ॥ ८ ॥
अनिमित्तात् सम्भवन्ति तथायज्ञः प्रजायते ॥ ९ ॥
यथैव दंशमशकं यथा चाण्डपिपीलिकम् ।
सैव वृत्तिरयज्ञेषु यथा धर्मो विधीयते ॥ १० ॥
धर्मज्ञ राजा अपनी शक्तिके अनुसार उसी -उसी तरह लोकोंपर विजय प्राप्त करे, जैसे उद्भिज्ज जन्तु ( वृक्ष आदि ) अपनी शक्तिके अनुसार आगे बढ़ते हैं तथा जैसे वज्रकीट आदि क्षुद्र जीव बिना ही निमित्तके उत्पन्न हो जाते हैं, वैसे ही बिना ही कारणके यज्ञहीन कर्तव्यविरोधी मनुष्य भी राज्यमें उत्पन्न हो जाते हैं । अतः राजाको चाहिये कि मच्छर, डाँस और चींटी आदि कीटोंके साथ जैसा बर्ताव किया जाता है, वही बर्ताव उन सत्कर्मविरोधियोंके साथ करे, जिससे धर्मका प्रचार हो ॥ ८-१० ॥
यथा ह्यकस्माद् भवति भूमौ पांसुर्विलोलितः ।
तथैवेह भवेद् धर्मः सूक्ष्मः सूक्ष्मतरस्तथा ॥ ११ ॥
जिस प्रकार अकस्मात् पृथ्वीकी धूलको लेकर सिलपर पीसा जाय तो वह और भी महीन ही होती है, उसी प्रकार विचार करनेसे धर्मका स्वरूप उत्तरोत्तर सूक्ष्म जान पड़ता है ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३६ ॥
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सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः आनेवाले संकटसे सावधान रहनेके लिये दूरदर्शी, तत्कालज्ञ और दीर्घसूत्री- इन तीन मत्स्योंका दृष्टान्त भीष्म उवाच
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः ।
द्वावेव सुखमेधेते दीर्घसूत्री विनश्यति ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! जो संकट आनेसे पहले ही अपने बचावका उपाय कर लेता है, उसे अनागतविधाता कहते हैं तथा जिसे ठीक समयपर ही आत्मरक्षाका उपाय सूझ जाता है, वह ‘ प्रत्युत्पन्नमति' कहलाता है । ये दो ही प्रकारके लोग सुखसे अपनी उन्नति करते हैं; परंतु जो प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करनेवाला होता है, वह दीर्घसूत्री मनुष्य नष्ट हो जाता है ॥ १ ॥
अत्रैव चेदमव्यग्रं शृणुष्वाख्यानमुत्तमम् ।
दीर्घसूत्रमुपाश्रित्य कार्याकार्यविनिश्चये ॥ २ ॥
कर्तव्य और अकर्तव्यका निश्चय करनेमें जो दीर्घसूत्री होता है, उसको लेकर मैं एक
सुन्दर उपाख्यान सुना रहा हूँ। तुम स्वस्थचित्त होकर सुनो ॥ २ ॥
नातिगाधे जलाधारे सुहृदः कुशलास्त्रयः ।
प्रभूतमत्स्ये कौन्तेय बभूवुः सहचारिणः ॥ ३ ॥
कुन्तीनन्दन! कहते हैं, एक तालाबमें जो अधिक गहरा नहीं था, बहुत - सी मछलियाँ रहती थीं, उसी जलाशयमें तीन कार्यकुशल मत्स्य भी रहते थे, जो सदा साथ- साथ विचरनेवाले और एक - दूसरेके सुहृद् थे ॥ ३ ॥
तत्रैको दीर्घकालज्ञ उत्पन्नप्रतिभोऽपरः ।
दीर्घसूत्रश्च तत्रैकस्त्रयाणां सहचारिणाम् ॥ ४ ॥
वहाँ उन तीनों सहचारियोंमेंसे एक तो ( अनागतविधाता था, जो ) आनेवाले दीर्घकालतककी बात सोच लेता था । दूसरा प्रत्युत्पन्नमति था, जिसकी प्रतिभा ठीक समयपर ही काम दे देती थी और तीसरा दीर्घसूत्री था (जो प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करता था) ॥ ४ ॥
कदाचित् तं जलस्थायं मत्स्यबन्धाः समन्ततः ।
निस्रावयामासुरथो निम्नेषु विविधैर्मुखैः ॥ ५ ॥
एक दिन कुछ मछलीमारोंने उस जलाशयमें चारों ओरसे नालियाँ बनाकर अनेक द्वारोंसे उसका पानी आसपासकी नीची भूमिमें निकालना आरम्भ कर दिया ॥ ५ ॥
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प्रक्षीयमाण तं दृष्ट्वा जलस्थायं भयागमे ।
अब्रवीद् दीर्घदर्शी तु तावुभौ सुहृदौ तदा ॥ ६ ॥
जलाशयका पानी घटता देख भय आनेकी सम्भावना समझकर दूरतककी बातें सोचनेवाले उस मत्स्यने अपने उन दोनों सुहृदोंसे कहा- ॥ ६ ॥
इयमापत् समुत्पन्ना सर्वेषां सलिलौकसाम् ।
शीघ्रमन्यत्र गच्छामः पन्था यावन्न दुष्यति ॥ ७ ॥
'बन्धुओ! जान पड़ता है कि इस जलाशयमें रहनेवाले सभी मत्स्योंपर संकट आ पहुँचा है; इसलिये जबतक हमारे निकलनेका मार्ग दूषित न हो जाय, तबतक शीघ्र ही हमें यहाँसे अन्यत्र चले जाना चाहिये ॥ ७ ॥
अनागतमनर्थं हि सुनयैर्यः प्रबाधयेत् ।
स न संशयमाप्नोति रोचतां भो व्रजामहे ॥ ८ ॥
' जो आनेवाले संकटको उसके आनेसे पहले ही अपनी अच्छी नीतिद्वारा मिटा देता है, वह कभी प्राण जानेके संशयमें नहीं पड़ता । यदि आपलोगोंको मेरी बात ठीक जान पड़े तो चलिये, दूसरे जलाशयको चलें ' ॥ ८ ॥
दीर्घसूत्रस्तु यस्तत्र सोऽब्रवीत् सम्यगुच्यते ।
न तु कार्या त्वरा तावदिति मे निश्चिता मतिः ॥ ९ ॥
इसपर वहाँ जो दीर्घसूत्री था, उसने कहा - ' मित्र! तुम बात तो ठीक कहते हो; परंतु मेरा यह दृढ़ विचार है कि अभी हमें जल्दी नहीं करनी चाहिये ' ॥ ९ ॥
अथ सम्प्रतिपत्तिज्ञः प्राब्रवीद् दीर्घदर्शिनम् ।
प्राप्ते काले न मे किंचिन्न्यायतः परिहास्यते ॥ १० ॥
तदनन्तर प्रत्युत्पन्नमतिने दूरदर्शीसे कहा - ' मित्र! जब समय आ जाता है, तब मेरी बुद्धि न्यायतः कोई युक्ति ढूँढ़ निकालनेमें कभी नहीं चूकती है ' ॥ १० ॥
एवं श्रुत्वा निराक्रम्य दीर्घदर्शी महामतिः ।
जगाम स्रोतसा तेन गम्भीरं सलिलाशयम् ॥ ११ ॥
यह सुनकर परम बुद्धिमान् दीर्घदर्शी ( अनागत - विधाता ) वहाँसे निकलकर एक नालीके रास्तेसे दूसरे गहरे जलाशयमें चला गया ॥ ११ ॥
ततः प्रसृततोयं तं प्रसमीक्ष्य जलाशयम् ।
बबन्धुर्विविधैर्योगेर्मत्स्यान् मत्स्योपजीविनः ॥ १२ ॥
तदनन्तर मछलियोंसे ही जीविका चलानेवाले मछलीमारोंने जब यह देखा कि जलाशयका जल प्रायः बाहर निकल चुका है, तब उन्होंने अनेक उपायोंद्वारा वहाँकी सब मछलियोंको फँसा लिया ॥ १२ ॥
विलोड्यमाने तस्मिंस्तु स्रुततोये जलाशये ।
अगच्छद् बन्धनं तत्र दीर्घसूत्रः सहापरैः ॥ १३ ॥
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जिसका पानी बाहर निकल चुका था, वह जलाशय जब मथा जाने लगा, तब दीर्घसूत्री भी दूसरे मत्स्योंके साथ जालमें फँस गया ॥ १३ ॥
उद्याने क्रियमाणे तु मत्स्यानां तत्र रज्जुभिः ।
प्रविश्यान्तरमेतेषां स्थितः सम्प्रतिपत्तिमान् ॥ १४ ॥
जब मछलीमार रस्सी खींचकर मछलियोंसे भरे हुए उस जालको उठाने लगे, तब प्रत्युत्पन्नमति मत्स्य भी उन्हीं मत्स्योंके भीतर घुसकर जालमें बँध- सा गया ॥ १४ ॥
गृह्यमेव तदुद्यानं गृहीत्वा तं तथैव सः ।
सर्वानेव च तांस्तत्र ते विदुर्ग्रथितानिति ॥ १५ ॥
वह जाल मुखसे पकड़ने योग्य था; अतः उसकी ताँतको मुँहमें लेकर वह भी अन्य मछलियोंकी तरह बँधा हुआ प्रतीत होने लगा । मछलीमारोंने उन सब मछलियोंको वहाँ बँधा हुआ ही समझा ॥ १५ ॥
ततः प्रक्षाल्यमानेषु मत्स्येषु विपुले जले ।
मुक्त्वा रज्जुं प्रमुक्तोऽसौ शीघ्रं सम्प्रतिपत्तिमान् ॥ १६ ॥
तदनन्तर उस जालको लेकर वे मछलीमार जब दूसरे अगाध जलवाले जलाशयके समीप गये और उन मछलियोंको धोने लगे, उसी समय प्रत्युत्पन्नमति मुखमें ली हुई जालकी रस्सीको छोड़कर उसके बन्धनसे मुक्त हो गया और जलमें समा गया ॥ १६ ॥
दीर्घसूत्रस्तु मन्दात्मा हीनबुद्धिरचेतनः ।
मरणं प्राप्तवान् मूढो यथैवोपहतेन्द्रियः ॥ १७ ॥
परंतु बुद्धिहीन और आलसी मूर्ख दीर्घसूत्री अचेत होकर मृत्युको प्राप्त हुआ, जैसे कोई इन्द्रियोंके नष्ट होनेसे नष्ट हो जाता है ॥ १७ ॥
एवं प्राप्ततमं कालं यो मोहान्नावबुद्धयते ।
स विनश्यति वै क्षिप्रं दीर्घसूत्रो यथा झषः ॥ १८ ॥
इसी प्रकार जो पुरुष मोहवश अपने सिरपर आये हुए कालको नहीं समझ पाता, वह उस दीर्घसूत्री मत्स्यके समान शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ १८ ॥
आदौ न कुरुते श्रेयः कुशलोऽस्मीति यः पुमान् ।
स संशयमवाप्नोति यथा सम्प्रतिपत्तिमान् ॥ १ ९ ॥
जो पुरुष यह समझकर कि मैं बड़ा कार्यकुशल हूँ, पहलेसे ही अपने कल्याणका उपाय नहीं करता, वह प्रत्युत्पन्नमति मत्स्यके समान प्राणसंशयकी स्थितिमें पड़ जाता है ॥ १ ९ ॥
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः ।
द्वावेव सुखमेधेते दीर्घसूत्रो विनश्यति ॥ २० ॥
जो संकट आनेसे पहले ही अपने बचावका उपाय कर लेता है, वह ' अनागतविधाता’ और जिसे ठीक समयपर ही आत्मरक्षाका कोई उपाय सूझ जाता है, वह ' प्रत्युत्पन्नमति'-
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ये दो ही सुखपूर्वक अपनी उन्नति करते हैं; परंतु प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करनेवाला ‘ दीर्घसूत्री ' नष्ट हो जाता है ॥ २० ॥
काष्ठाः कला मुहूर्ताश्च दिवा रात्रिस्तथा लवाः ।
मासाः पक्षाः षड् ऋतवः कल्पः संवत्सरास्तथा ॥ २१ ॥
पृथिवी देश इत्युक्तः कालः स च न दृश्यते ।
अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं ध्यायते यच्च तत्तथा ॥ २२ ॥
काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन, रात, लव, मास, पक्ष, छः ऋतु, संवत्सर और कल्प — इन्हें ‘ काल’ कहते हैं तथा पृथ्वीको ' देश' कहा जाता है। इनमेंसे देशका तो दर्शन होता है, किंतु काल दिखायी नहीं देता है । अभीष्ट मनोरथकी सिद्धिके लिये जिस देश और कालको उपयोगी मानकर उसका विचार किया जाता है, उसको ठीक-ठीक ग्रहण करना चाहिये ॥ २१-२२ ॥
एतौ धर्मार्थशास्त्रेषु मोक्षशास्त्रेषु चर्षिभिः ।
प्रधानाविति निर्दिष्टौ कामे चाभिमतौ नृणाम् ॥ २३ ॥
ऋषियोंने धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा मोक्षशास्त्रमें इन देश और कालको ही कार्य-सिद्धिका प्रधान उपाय बताया है । मनुष्योंकी कामना -सिद्धिमें भी ये देश और काल ही प्रधान माने गये हैं ॥ २३ ॥
परीक्ष्यकारी युक्तश्च स सम्यगुपपादयेत् ।
देशकालावभिप्रेतौ ताभ्यां फलमवाप्नुयात् ॥ २४ ॥
जो पुरुष सोच-समझकर या जान-बूझकर काम करनेवाला तथा सतत सावधान रहनेवाला है, वह अभीष्ट देश और कालका ठीक-ठीक उपयोग करता है और उनके सहयोगसे इच्छानुसार फल प्राप्त कर लेता है ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि शाकुलोपाख्याने सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें शाकुलोपाख्यानविषयक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १३७ ॥
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अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान युधिष्ठिरउवाच
सर्वत्र बुद्धिः कथिता श्रेष्ठा ते भरतर्षभ ।
अनागता तथोत्पन्ना दीर्घसूत्रा विनाशिनी ॥१ ॥
युधिष्ठिर बोले- भरतश्रेष्ठ! आपने सर्वत्र अनागत ( संकट आनेसे पहले ही आत्मरक्षाकी व्यवस्था करनेवाली ) तथा प्रत्युत्पन्न ( समयपर बचावका उपाय सोच लेनेवाली ) बुद्धिको ही श्रेष्ठ बताया है और प्रत्येक कार्यमें आलस्यके कारण विलम्ब करनेवाली बुद्धिको विनाशकारी बताया है ॥ १ ॥
तदिच्छामि परां श्रोतुं बुद्धिं ते भरतर्षभ ।
यथा राजा न मुह्येत शत्रुभिः परिवारितः ॥ २ ॥
धर्मार्थकुशलो राजा धर्मशास्त्रविशारदः ।
पृच्छामि त्वां कुरुश्रेष्ठ तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥
भरतभूषण! अतः अब मैं उस श्रेष्ठ बुद्धिके विषयमें आपसे सुनना चाहता हूँ, जिसका आश्रय लेनेसे धर्म और अर्थमें कुशल तथा धर्मशास्त्रविशारद राजा शत्रुओं - द्वारा घिरा रहनेपर भी मोहमें नहीं पड़ता । कुरुश्रेष्ठ! उसी बुद्धिके विषयमें मैं आपसे प्रश्न करता हूँ; अतः आप मेरे लिये उसकी व्याख्या करें ॥ २-३ ॥
शत्रुभिर्बहुभिर्ग्रस्तो यथा वर्तेत पार्थिवः ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वमेव यथाविधि ॥ ४ ॥
बहुत - से शत्रुओंका आक्रमण हो जानेपर राजाको कैसा बर्ताव करना चाहिये? यह सब कुछ मैं विधिपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ ४ ॥
विषमस्थं हि राजानं शत्रवः परिपन्थिनः ।
बहवोऽप्येकमुद्धर्तुं यतन्ते पूर्वतापिताः ॥ ५ ॥
पहलेके सताये हुए डाकू आदि शत्रु जब राजाको संकटमें पड़ा हुआ देखते हैं, तब वे बहुत - से मिलकर उस असहाय राजाको उखाड़ फेंकनेका प्रयत्न करते हैं ॥ ५ ॥
सर्वत्र प्रार्थ्यमानेन दुर्बलेन महाबलैः ।
एकेनैवासहायेन शक्यं स्थातुं भवेत् कथम् ॥ ६ ॥
जब अनेक महाबली शत्रु किसी दुर्बल राजाको सब ओरसे हड़प जानेके लिये तैयार हो जायँ, तब उस एकमात्र असहाय नरेशके द्वारा उस परिस्थितिका कैसे सामना किया जा
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सकता है? ॥ ६ ॥
कथं मित्रमरिं चापि विन्दते भरतर्षभ ।
चेष्टितव्यं कथं चात्र शत्रोर्मित्रस्य चान्तरे ॥ ७ ॥
राजा किस प्रकार मित्र और शत्रुको अपने वशमें करता है तथा उसे शत्रु और मित्रके बीचमें रहकर कैसी चेष्टा करनी चाहिये? ॥ ७ ॥
प्रज्ञातलक्षणे मित्रे तथैवामित्रतां गते ।
कथं तु पुरुषः कुर्यात् कृत्वा किं वा सुखी भवेत् ॥ ८ ॥
पहले लक्षणोंद्वारा जिसे मित्र समझा गया है, वही मनुष्य यदि शत्रु हो जाय, तब उसके साथ कोई पुरुष कैसा बर्ताव करे? अथवा क्या करके वह सुखी हो? ॥ ८ ॥
विग्रहं केन वा कुर्यात् संधिं वा केन योजयेत् ।
कथं वा शत्रुमध्यस्थो वर्तेत बलवानपि ॥ ९ ॥
किसके साथ विग्रह करे? अथवा किसके साथ संधि जोड़े और बलवान् पुरुष भी यदि शत्रुओंके बीचमें मिल जाय तो उसके साथ कैसा बर्ताव करे? ॥ ९ ॥
एतद् वै सर्वकृत्यानां परं कृत्यं परंतप ।
नैतस्य कश्चिद् वक्तास्ति श्रोता वापि सुदुर्लभः ॥ १० ॥
ऋते शान्तनवाद् भीष्मात् सत्यसंधाज्जितेन्द्रियात् ।
तदन्विष्य महाभाग सर्वमेतद् वदस्व मे ॥ ११ ॥
परंतप पितामह! यह कार्य समस्त कार्योंमें श्रेष्ठ है । सत्यप्रतिज्ञ जितेन्द्रिय शान्तनुनन्दन भीष्मके सिवा, दूसरा कोई इस विषयको बतानेवाला नहीं है । इसको सुननेवाला भी दुर्लभ ही है । अतः महाभाग! आप उसका अनुसंधान करके यह सारा विषय मुझसे कहिये ॥ १०-११ ॥ भीष्म उवाच
त्वयुक्तोऽयमनुप्रश्नो युधिष्ठिर सुखोदयः ।
शृणु मे पुत्र कार्त्स्न्येन गुह्यमापत्सु भारत ॥ १२ ॥
भीष्मजीने कहा — भरतनन्दन बेटा युधिष्ठिर! तुम्हारा यह विस्तारपूर्वक पूछना बहुत ठीक है । यह सुखकी प्राप्ति करानेवाला है । आपत्तिके समय क्या करना चाहिये? यह विषय
गोपनीय होनेसे सबको मालूम नहीं है । तुम यह सब रहस्य मुझसे सुनो ॥ १२ ॥
अमित्रो मित्रतां याति मित्रं चापि प्रदुष्यति ।
सामर्थ्ययोगात् कार्याणामनित्या वै सदा गतिः ॥ १३ ॥
भिन्न-भिन्न कार्योंका ऐसा प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण कभी शत्रु भी मित्र बन जाता है और कभी मित्रका मन भी द्वेषभावसे दूषित हो जाता है । वास्तवमें शत्रु - मित्रकी परिस्थिति सदा एक - सी नहीं रहती है ॥ १३ ॥
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तस्माद् विश्वसितव्यं च विग्रहं च समाचरेत् ।
देशं कालं च विज्ञाय कार्याकार्यविनिश्चये ॥ १४ ॥
अतः देश - कालको समझकर कर्तव्य - अकर्तव्यका निश्चय करके किसीपर विश्वास और किसीके साथ युद्ध करना चाहिये ॥ १४ ॥
संधातव्यं बुधैर्नित्यं व्यवस्य च हितार्थिभिः ।
अमित्रैरपि संधेयं प्राणा रक्ष्या हि भारत ॥ १५ ॥
भारत! कर्तव्यका विचार करके सदा हित चाहनेवाले विद्वान् मित्रोंके साथ संधि करनी चाहिये और आवश्यकता पड़नेपर शत्रुओंसे भी संधि कर लेनी चाहिये; क्योंकि प्राणोंकी रक्षा सदा ही कर्तव्य है ॥ १५ ॥
यो ह्यमित्रैर्नरो नित्यं न संदध्यादपण्डितः ।
न सोऽर्थं प्राप्नुयात् किंचित् फलान्यपि च भारत ॥ १६ ॥
भारत! जो मूर्ख मानव शत्रुओंके साथ कभी किसी भी दशामें संधि ही नहीं करता, वह अपने किसी भी उद्देश्यको सिद्ध नहीं कर सकता और न कोई फल ही पा सकता है ॥ १६ ॥
यस्त्वमित्रेण संदध्यान्मित्रेण च विरुद्धयते ।
अर्थयुक्तिं समालोक्य सुमहद् विन्दते फलम् ॥ १७ ॥
जो स्वार्थसिद्धिका अवसर देखकर शत्रुसे तो संधि कर लेता है और मित्रोंके साथ विरोध बढ़ा लेता है, वह महान् फल प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
मार्जारस्य च संवादं न्यग्रोधे मूषिकस्य च ॥ १८ ॥
इस विषयमें विद्वान् पुरुष वटवृक्षके आश्रयमें रहनेवाले एक बिलाव और चूहेके संवादरूप एक प्रचीन कथानकका दृष्टान्त दिया करते हैं ॥ १८ ॥
वने महति कस्मिंश्चिन्न्यग्रोधः सुमहानभूत् ।
लताजालपरिच्छिन्नो नानाद्विजगणान्वितः ॥ १ ९ ॥
किसी महान् वनमें एक विशाल बरगदका वृक्ष था, जो लतासमूहोंसे आच्छादित तथा भाँति - भाँतिके पक्षियोंसे सुशोभित था ॥ १ ९ ॥
स्कन्धवान् मेघसङ्काशः शीतच्छायो मनोरमः ।
अरण्यमभितो जातः स तु व्यालमृगाकुलः ॥ २० ॥
वह अपनी मोटी - मोटी डालियोंसे हरा- भरा होनेके कारण मेघके समान दिखायी देता था । उसकी छाया शीतल थी । वह मनोरम वृक्ष वनके समीप होनेके कारण बहुत - से सर्पों तथा पशुओंका आश्रय बना हुआ था ॥ २० ॥
तस्य मूलं समाश्रित्य कृत्वा शतमुखं बिलम् ।
वसति स्म महाप्राज्ञः पलितो नाम मूषिकः ॥ २१ ॥