05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 881–890
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 881–890
पृष्ठ 881
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उसीकी जड़मे सौ दरवाजोंका बिल बनाकर पलित नामक एक परम बुद्धिमान् चूहा निवास करता था ॥ २१ ॥
शाखां तस्य समाश्रित्य वसति स्म सुखं पुरा ।
लोमशो नाम मार्जारः पक्षिसंघातखादकः ॥ २२ ॥
उसी बरगदकी डालीपर पहले लोमश नामका एक बिलाव भी बड़े सुखसे रहता था ।
पक्षियोंका समूह ही उसका भोजन था ॥ २२ ॥
तत्र चागत्य चाण्डालो ह्यरण्ये कृतकेतनः ।
प्रयोजयति चोन्माथं नित्यमस्तंगते रवौ ॥ २३ ॥
तत्र स्नायुमयान् पाशान् यथावत् संविधाय सः ।
गृहं गत्वा सुखं शेते प्रभातामेति शर्वरीम् ॥ २४ ॥
उसी वनमें एक चाण्डाल भी घर बनाकर रहता था । वह प्रतिदिन सायंकाल सूर्यास्त हो जानेपर वहाँ आकर जाल फैला देता और उसकी ताँतकी डोरियोंको यथास्थान लगा घर जाकर मौजसे सोता था; फिर सबेरा होनेपर वहाँ आया करता था ॥ २३-२४ ॥
तत्र स्म नित्यं बध्यन्ते नक्तं बहुविधा मृगाः ।
कदाचिदत्र मार्जारस्त्वप्रमत्तो व्यबध्यत ॥ २५ ॥
रातको उस जालमें प्रतिदिन नाना प्रकारके पशु फँस जाते थे ( उन्हींको लेनेके लिये वह सबेरे आता था ) । एक दिन अपनी असावधानीके कारण पूर्वोक्त बिलाव भी उस जालमें फँस गया ॥ २५ ॥
तस्मिन् बद्धे महाप्राणे शत्रौ नित्याततायिनि ।
तं कालं पलितो ज्ञात्वा प्रचचार सुनिर्भयः ॥ २६ ॥
उस महान् शक्तिशाली और नित्य आततायी शत्रुके फँस जानेपर जब पलितको यह समाचार मालूम हुआ, तब वह उस समय बिलसे बाहर निकलकर सब ओर निर्भय विचरने लगा ॥ २६ ॥
तेनानुचरता तस्मिन् वने विश्वस्तचारिणा ।
भक्ष्यं मृगयमाणेन चिराद् दृष्टं तदामिषम् ॥ २७ ॥
स तमुन्माथमारुह्य तदामिषमभक्षयत् ॥ २८ ॥
उस वनमें विश्वस्त होकर विचरते तथा आहारकी खोज करते हुए उस चूहेने बहुत देरके बाद वह माँस देखा, जो जालपर बिखेरा गया था । चूहा उस जालपर चढ़कर उस मांसको खाने लगा ॥ २७-२८ ॥
तस्योपरि सपत्नस्य बद्धस्य मनसा हसन् ।
आमिषे'तु प्रसक्तः स कदाचिदवलोकयन् ॥ २ ९ ॥
जालके ऊपर मांस खानेमें लगा हुआ वह चूहा अपने शत्रुके ऊपर मन- ही - मन हँस रहा था । इतनेहीमें कभी उसकी दृष्टि दूसरी ओर घूम गयी ॥ २ ९ ॥
पृष्ठ 882
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अपश्यदपरं घोरमात्मनः शत्रुमागतम् ।
शरप्रसूनसङ्काशं महीविवरशायिनम् ॥ ३० ॥
फिर तो उसने एक दूसरे भयंकर शत्रुको वहाँ आया हुआ देखा, जो सरकण्डेके फूलके समान भूरे रंगका था । वह धरतीमें विवर बनाकर उसके भीतर सोया करता था ॥ ३० ॥
नकुलं हरिणं नाम चपलं ताम्रलोचनम् ।
तेन मूषिकगन्धेन त्वरमाणमुपागतम् ॥ ३१ ॥
वह जातिका न्यौला था । उसकी आँखें ताँबेके समान दिखायी देती थीं । वह चपल नेवला हरिणके नामसे प्रसिद्ध था और उसी चूहेकी गन्ध पाकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आ पहुँचा था ॥ ३१ ॥
भक्ष्यार्थं संलिहानं तं भूमावूर्ध्वमुखं स्थितम् ।
शाखागतमरिं चान्यमपश्यत् कोटरालयम् ॥ ३२ ॥
उलूकं चन्द्रकं नाम तीक्ष्णतुण्डं क्षपाचरम् । इधर तो वह नेवला अपना आहार ग्रहण करनेके लिये जीभ लपलपाता हुआ ऊपर मुँह किये पृथ्वीपर खड़ा था और दूसरी ओर बरगदकी शाखापर बैठा हुआ दूसरा ही शत्रु दिखायी दिया, जो वृक्षके खोखलेमें निवास करता था । वह चन्द्रक नामसे प्रसिद्ध उल्लू था ।
उसकी चोंच बड़ी तीखी थी । वह रातमें विचरनेवाला पक्षी था ॥ ३२ ॥
गतस्य विषयं तत्र नकुलोलूकयोस्तथा ॥ ३३ ॥
अथास्यासीदियं चिन्ता तत् प्राप्य सुमहद् भयम् । न्यौले और उल्लू— दोनोंका लक्ष्य बने हुए उस चूहेको बड़ा भय हुआ । अब उसे इस प्रकार चिन्ता होने लगी- ॥ आपद्यस्यां सुकष्टायां मरणे प्रत्युपस्थिते ॥ ३४ ॥
समन्ताद् भय उत्पन्ने कथं कार्यं हितैषिणा । ‘ अहो! इस कष्टदायिनी विपत्तिमें मृत्यु निकट आकर खड़ी है । चारों ओरसे भय उत्पन्न हो गया है । ऐसी अवस्थामें अपना हित चाहनेवाले प्राणीको किस उपायका अवलम्बन करना चाहिये? ' ॥ ३४३ ॥
स तथा सर्वतो रुद्धः सर्वत्र भयदर्शनः ॥ ३५ ॥
अभवद् भयसंतप्तश्चक्रे च परमां मतिम् । इस प्रकार सब ओरसे उसका मार्ग अवरुद्ध हो गया था । सर्वत्र उसे भय - ही - भय दिखायी देता था । उस भयसे वह संतप्त हो उठा । इसके बाद उसने पुनः श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय ले सोचना आरम्भ किया- ॥ ३५३ ॥
आपद्विनाशभूयिष्ठं गर्तः कार्यं हि जीवितम् ॥ ३६ ॥
समन्तात् संशयात् सैषा तस्मादापदुपस्थिता
पृष्ठ 883
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘ आपत्तिमें पड़कर विनाशके समीप पहुँचे हुए प्राणियोंको भी अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये प्रयत्न तो करना ही चाहिये । आज सब ओरसे प्राणोंका संशय उपस्थित है; अतः यह मुझपर बड़ी भारी आपत्ति आ गयी है ॥ ३६३ ॥
गतं मां सहसा भूमिं नकुलो भक्षयिष्यति ॥ ३७ ॥
उलूकश्चेह तिष्ठन्तं मार्जारः पाशंसक्षयात् । ‘ यदि मैं पृथ्वीपर उतरकर भागता हूँ तो सहसा नेवला मुझे पकड़कर खा जायगा । यदि यहीं ठहर जाता हूँ तो उल्लू मुझे चोंचसे मार डालेगा और यदि जाल काटकर भीतर घुसता हूँ तो बिलाव जीवित नहीं छोड़ेगा ॥ ३७३३ ॥
न त्वेवास्मद्विधः प्राज्ञः सम्मोहं गन्तुमर्हति ॥ ३८ ॥
करिष्ये जीविते यत्नं यावद् युक्त्या प्रतिग्रहात् । ‘ तथापि मुझ - जैसे बुद्धिमान्को घबराना नहीं चाहिये । अतः जहाँतक युक्ति काम देगी, परस्पर सहयोगका आदान-प्रदान करके मैं जीवन -रक्षाके लिये प्रयत्न करूँगा ॥ ३८३ ॥
न हि बुद्धयान्वितः प्राज्ञो नीतिशास्त्रविशारदः ॥ ३ ९ ॥ निमज्जत्यापदं प्राप्य महतीं दारुणामपि ॥ ४० ॥
' बुद्धिमान्, विद्वान् और नीतिशास्त्रमें निपुण पुरुष भारी और भयंकर विपत्तिमें पड़नेपर भी उसमें डूब नहीं जाता है— उससे छूटनेकी चेष्टा करता है ॥ ३ ९ -४० ॥
न त्वन्यामिह मार्जाराद् गतिं पश्यामि साम्प्रतम् ।
विषमस्थो ह्ययं शत्रुः कृत्यं चास्य महन्मया ॥ ४१ ॥
‘ मैं इस समय इस बिलावका सहारा लेनेके सिवा, अपने लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं देखता । यद्यपि यह मेरा कट्टर शत्रु है, तथापि इस समय स्वयं ही भारी संकटमें पड़ा हुआ है । मेरे द्वारा इसका भी बड़ा भारी काम निकल सकता है ॥ ४१ ॥
जीवितार्थी कथं त्वद्य शत्रुभिः प्रार्थितस्त्रिभिः ।
तस्मादेनमहं शत्रुं मार्जारं संश्रयामि वै ॥ ४२ ॥
‘ इधर, मैं भी जीवनकी रक्षा चाहता हूँ, तीन- तीन शत्रु मुझपर घात लगाये बैठे हैं; अतः क्यों न आज मैं अपने शत्रु इस बिलावका ही आश्रय लूँ? ॥ ४२ ॥
नीतिशास्त्रं समाश्रित्य हितमस्योपवर्णये ।
येनेमं शत्रुसंघातं मतिपूर्वेण वञ्चये ॥ ४३ ॥
‘ आज नीतिशास्त्रका सहारा लेकर इसके हितका वर्णन करूँगा जिससे बुद्धिके द्वारा इस शत्रुसमुदायको धोखा देकर बच जाऊँगा ॥ ४३ ॥
अयमत्यन्तशत्रुर्मे वैषम्यं परमं गतः ।
मूढो ग्राहयितुं स्वार्थं सङ्गत्या यदि शक्यते ॥ ४४ ॥
‘ इसमें संदेह नहीं कि बिलाव मेरा महान् दुश्मन है, तथापि इस समय महान् संकटमें है । यदि सम्भव हो तो इस मूर्खको संगतिके द्वारा स्वार्थ सिद्ध करनेकी बातपर राजी
पृष्ठ 884
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
करूँ ॥ ४४ ॥
कदाचिद् व्यसनं प्राप्य संधिं कुर्यान्मया सह ।
बलिना संनिकृष्टस्य शत्रोरपि परिग्रहः ॥ ४५ ॥
कार्य इत्याहुराचार्या विषमे जीवितार्थिना । ‘ हो सकता है कि विपत्तिमें पड़ा होनेके कारण यह मेरे साथ संधि कर ले । आचार्योंका कथन है कि संकट आ पड़नेपर जीवनकी रक्षा चाहनेवाले बलवान् पुरुषको भी अपने निकटवर्ती शत्रुसे मेल कर लेना चाहिये ॥ ४५३ ॥
श्रेष्ठो हि पण्डितः शत्रुर्न च मित्रमपण्डितः ॥ ४६ ॥
मम त्वमित्रे मार्जार जीवितं सम्प्रतिष्ठितम् । ‘ विद्वान् शत्रु भी अच्छा होता है किंतु मूर्ख मित्र भी अच्छा नहीं है । मेरा जीवन तो आज मेरे शत्रु बिलावके ही अधीन है ॥ ४६३ ॥
हन्तास्मै सम्प्रवक्ष्यामि हेतुमात्माभिरक्षणे ॥ ४७ ॥
अपीदानीमयं शत्रुः सङ्गत्या पण्डितो भवेत् । ‘ अच्छा, अब मैं इसे आत्मरक्षाके लिये एक मुक्ति बता रहा हूँ । सम्भव है, यह शत्रु इस समय मेरी संगतिसे विद्वान् हो जाय - विवेकसे काम ले ' ॥ ४७ ॥
एवं विचिन्तयामास मूषिकः शत्रुचेष्टितम् ॥ ४८ ॥
ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः संधिविग्रहकालवित् ।
सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यं मार्जारं मूषिकोऽब्रवीत् ॥ ४ ९ ॥
इस प्रकार चूहेने शत्रुकी चेष्टापर विचार किया । वह अर्थसिद्धिके उपायको यथार्थरूपसे जाननेवाला तथा संधि और विग्रहके अवसरको समझनेवाला था । उसने बिलावको सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें कहा- ॥ ४८-४९ ॥
सौहृदेनाभिभाषे त्वां कच्चिन्मार्जार जीवसि ।
जीवितं हि तवेच्छामि श्रेयः साधारणं हि नौ ॥ ५० ॥
' भैया बिलाव! मैं तुम्हारे प्रति मैत्रीका भाव रखकर बातचीत कर रहा हूँ । तुम अभी जीवित तो हो न? मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा जीवन सुरक्षित रहे; क्योंकि इसमें मेरी और तुम्हारी दोनोंकी एक- सी भलाई है ॥ ५० ॥
न ते सौम्य भयं कार्यं जीविष्यसि यथासुखम् ।
अहं त्वामुद्धरिष्यामि यदि मां न जिघांससि ॥ ५१ ॥
' सौम्य! तुम्हें डरना नहीं चाहिये । तुम आनन्दपूर्वक जीवित रह सकोगे । यदि मुझे मार डालनेकी इच्छा त्याग दो तो मैं इस संकटसे तुम्हारा उद्धार कर दूँगा ॥ ५१ ॥
अस्ति कश्चिदुपायोऽत्र दुष्करः प्रतिभाति मे ।
येन शक्यस्त्वया मोक्षः प्राप्तुं श्रेयस्तथा मया ॥ ५२ ॥
पृष्ठ 885
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
'एक उपाय है जिससे तुम इस संकटसे छुटकारा पा सकते हो और मैं भी कल्याणका भागी हो सकता हूँ । यद्यपि वह उपाय मुझे दुष्कर प्रतीत होता है ॥ ५२ ॥
मयाप्युपायो दृष्टोऽयं विचार्य मतिमात्मनः ।
आत्मार्थं च त्वदर्थं च श्रेयः साधारणं हि नौ ॥ ५३ ॥
‘ मैंने अपनी बुद्धिसे अच्छी तरह सोच- विचार करके अपने और तुम्हारे लिये एक उपाय ढूँढ़ निकाला है, जिससे हम दोनोंकी समानरूपसे भलाई होगी ॥ ५३ ॥
इदं हि नकुलोकं पापबुद्धयाभिसंस्थितम् ।
न धर्षयति मार्जार तेन मे स्वस्ति साम्प्रतम् ॥ ५४ ॥
‘ मार्जार! देखो, ये नेवला और उल्लू दोनों पापबुद्धिसे यहाँ ठहरे हुए हैं । मेरी ओर घात लगाये बैठे हैं । जबतक वे मुझपर आक्रमण नहीं करते, तभीतक मैं कुशलसे हूँ ॥ ५४ ॥
कूजंश्चपलनेत्रोऽयं कौशिको मां निरीक्षते ।
नगशाखाग्रगः पापस्तस्याहं भृशमुद्विजे ॥ ५५ ॥
‘ यह चंचल नेत्रोंवाला पापी उल्लू वृक्षकी डालीपर बैठकर ' हू हू' करता मेरी ही ओर घूर रहा है । उससे मुझे बड़ा डर लगता है ॥ ५५ ॥
सतां साप्तपदं मैत्रं स सखा मे s सि पण्डितः ।
सांवास्यकं करिष्यामि नास्ति ते भयमद्य वै ॥ ५६ ॥
‘ साधु पुरुषोंमें तो सात पग साथ- साथ चलनेसे ही मित्रता हो जाती है । हम और तुम तो यहाँ सदासे ही साथ रहते हैं; अतः तुम मेरे विद्वान् मित्र हो । मैं इतने दिन साथ रहनेका अपना मित्रोचित धर्म अवश्य निभाऊँगा, इसलिये अब तुम्हें कोई भय नहीं है ॥ ५६ ॥
न हि शक्तोऽसि मार्जार पाशं छेत्तुं मया विना ।
अहं छेत्स्यामि पाशांस्ते यदि मां त्वं न हिंससि ॥ ५७ ॥
‘ मार्जार! तुम मेरी सहायताके बिना अपना यह बन्धन नहीं काट सकते । यदि तुम मेरी हिंसा न करो तो मैं तुम्हारे ये सारे बन्धन काट डालूँगा ॥ ५७ ॥
त्वमाश्रितो द्रुमस्याग्रं मूलं त्वहमुपाश्रितः ।
चिरोषितावुभावावां वृक्षेऽस्मिन् विदितं च ते ॥ ५८ ॥
' तुम इस पेड़के ऊपर रहते हो और मैं इसकी जड़में रहता हूँ । इस प्रकार हम दोनों चिरकालसे इस वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं, यह बात तो तुम्हें ज्ञात ही है ॥ ५८ ॥
यस्मिन्नाश्वासते कश्चिद् यश्च नाश्वसिति क्वचित् ।
न तौ धीराः प्रशंसन्ति नित्यमुद्विग्नमानसौ ॥ ५ ९ ॥
‘ जिसपर कोई भरोसा नहीं करता तथा जो दूसरे किसीपर स्वयं भी भरोसा नहीं करता, उन दोनोंकी धीर पुरुष कोई प्रशंसा नहीं करते हैं; क्योंकि उनके मनमें सदा उद्वेग भरा रहता है ॥ ५ ९ ॥ तस्माद् विवर्धतां प्रीतिर्नित्यं संगतमस्तु नौ ।
पृष्ठ 886
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कालातीतमिहार्थं तु न प्रशंसन्ति पण्डिताः ॥ ६० ॥
‘ अतः हमलोगोंमें सदा प्रेम बढ़े तथा नित्य प्रति हमारी संगति बनी रहे । जब कार्यका समय बीत जाता है, उसके बाद विद्वान् पुरुष उसकी प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ ६० ॥
अर्थयुक्तिमिमां तत्र यथाभूतां निशामय ।
तव जीवितमिच्छामि त्वं ममेच्छसि जीवितम् ॥ ६१ ॥
‘ बिलाव! हम दोनोंके प्रयोजनका जो यह संयोग आ बना है, उसे यथार्थरूपसे सुनो । मैं तुम्हारे जीवनकी रक्षा चाहता हूँ और तुम मेरे जीवनकी रक्षा चाहते हो ॥ ६१ ॥
कश्चित् तरति काष्ठेन सुगम्भीरां महानदीम् ।
स तारयति तत् काष्ठं स च काष्ठेन तार्यते ॥ ६२ ॥
‘ कोई पुरुष जब लकड़ीके सहारे किसी गहरी एवं विशाल नदीको पार करता है, तब उस लकड़ीको भी किनारे लगा देता है तथा वह लकड़ी भी उसे तारनेमें सहायक होती है ॥ ६२ ॥
ईदृशो नौ समायोगो भविष्यति सुविस्तरः ।
अहं त्वां तारयिष्यामि मां च त्वं तारयिष्यसि ॥ ६३ ॥
' इसी प्रकार हम दोनोंका यह संयोग चिरस्थायी होगा । मैं तुम्हें विपत्तिसे पार कर दूँगा और तुम मुझे आपत्तिसे बचा लोगे ' ॥ ६३ ॥
एवमुक्त्वा तु पलितस्तमर्थमुभयोर्हितम् ।
हेतुमद् ग्रहणीयं च कालापेक्षी न्यवेक्ष्य च ॥ ६४ ॥
इस प्रकार पलित दोनोंके लिये हितकर, युक्तियुक्त और मानने योग्य बात कहकर उत्तर मिलनेके अवसरकी प्रतीक्षा करता हुआ बिलावकी ओर देखने लगा ॥ ६४ ॥
अथ सुव्याहृतं श्रुत्वा तस्य शत्रोर्विचक्षणः ।
हेतुमद् ग्रहणीयार्थं मार्जारो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६५ ॥
अपने उस शत्रुका यह युक्तियुक्त और मान लेने योग्य सुन्दर भाषण सुनकर बुद्धिमान् बिलाव कुछ बोलनेको उद्यत हुआ ॥ ६५ ॥
बुद्धिमान् वाक्यसम्पन्नस्तद्वाक्यमनुवर्णयन् ।
स्वामवस्थां समीक्ष्याथ साम्नैव प्रत्यपूजयत् ॥ ६६ ॥
उसकी बुद्धि अच्छी थी । वह बोलनेकी कलामें कुशल था । पहले तो उसने चूहेकी बातको मन- ही- मन दुहराया; फिर अपनी दशापर दृष्टिपात करके उसने सामनीतिसे ही उस चूहेकी भूरि- भूरि प्रशंसा की ॥ ६६ ॥
ततस्तीक्ष्णाग्रदशनो मणिवैदूर्यलोचनः ।
मूषिकं मन्दमुद्वीक्ष्य मार्जारो लोमशोऽब्रवीत् ॥ ६७ ॥
तदनन्तर जिसके आगेके दाँत बड़े तीखे थे और दोनों नेत्र नीलमके समान चमक रहे थे, उस लोमश नामक बिलावने चूहेकी ओर किंचिद् दृष्टिपात करके इस प्रकार कहा
पृष्ठ 887
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ ६७ ॥
नन्दामि सौम्य भद्रं ते यो मां जीवितुमिच्छसि ।
श्रेयश्च यदि जानीषे क्रियतां मा विचारय ॥ ६८ ॥
‘ सौम्य! मैं तुम्हारा अभिनन्दन करता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, जो कि तुम मुझे जीवन प्रदान करना चाहते हो । यदि हमारे कल्याणका उपाय जानते हो तो इसे अवश्य करो, कोई अन्यथा विचार मनमें न लाओ ॥ ६८ ॥
अहं हि भृशमापन्नस्त्वमापन्नतरो मम ।
द्वयोरापन्नयोः संधिः क्रियतां मा चिराय च ॥ ६ ९ ॥
‘ मैं भारी विपत्तिमें फँसा हूँ और तुम भी महान् संकटमें पड़े हुए हो । इस प्रकार
आपत्तिमें पड़े हुए हम दोनोंको संधि कर लेनी चाहिये । इसमें विलम्ब न हो ॥ ६९ ॥
विधास्ये प्राप्तकालं यत् कार्यं सिद्धिकरं विभो ।
मयि'कृच्छ्राद् विनिर्मुक्ते न विनङ्क्ष्यति ते कृतम् ॥ ७० ॥
‘ प्रभो! समय आनेपर तुम्हारे अभीष्टकी सिद्धि करनेवाला जो भी कार्य होगा, उसे अवश्य करूँगा । इस संकटसे मेरे मुक्त हो जानेपर तुम्हारा किया हुआ उपकार नष्ट नहीं होगा । मैं इसका बदला अवश्य चुकाऊँगा ॥ ७० ॥
न्यस्तमानोऽस्मि भक्तोऽस्मि शिष्यस्त्वद्धितकृत् तथा ।
निदेशवशवर्ती च भवन्तं शरणं गतः ॥ ७१ ॥
‘ इस समय मेरा मान भंग हो चुका है । मैं तुम्हारा भक्त और शिष्य हो गया हूँ । तुम्हारे हितका साधन करूँगा और सदा तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहूँगा । मैं सब प्रकारसे तुम्हारी शरणमें आ गया हूँ' ॥ ७१ ॥
इत्येवमुक्तः पलितो मार्जारं वशमागतम् ।
वाक्यं हितमुवाचेदमभिनीतार्थमर्थवित् ॥ ७२ ॥
बिलावके ऐसा कहनेपर अपने प्रयोजनको समझनेवाले पलितने वशमें आये हुए उस बिलावसे यह अभिप्रायपूर्ण हितकर बात कही— ॥ ७२ ॥
उदारं यद् भवानाह नैतच्चित्रं भवद्विधे ।
विहितो यस्तु मार्गो मे हितार्थं शृणु तं मम ॥ ७३ ॥
‘ भैया बिलाव! आपने जो उदारतापूर्ण वचन कहा है, यह आप जैसे बुद्धिमान्के लिये आश्चर्यकी बात नहीं है । मैंने दोनोंके हितके लिये जो बात निर्धारित की है, वह मुझसे सुनो ॥ ७३ ॥
अहं त्वानुप्रवेक्ष्यामि नकुलान्मे महद् भयम् ।
त्रायस्व भो मा वधीस्त्वं शक्तोऽस्मि तव रक्षणे ॥ ७४ ॥
' भैया! इस नेवलेसे मुझे बड़ा डर लग रहा है । इसलिये मैं तुम्हारे पीछे इस जालमें प्रवेश कर जाऊँगा, परंतु दादा! तुम मुझे मार न डालना, बचा लेना; क्योंकि जीवित रहनेपर
पृष्ठ 888
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ही मैं तुम्हारी रक्षा करनेमें समर्थ हूँ ॥
उलूकाच्चैव मां रक्ष क्षुद्रः प्रार्थयते हि माम् ।
अहं छेत्स्यामि ते पाशान् सखे सत्येन ते शपे ॥ ७५ ॥
' इधर यह नीच उल्लू भी मेरे प्राणका ग्राहक बना हुआ है । इससे भी तुम मुझे बचा लो ।
सखे! मैं तुमसे सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, मैं तुम्हारे बन्धन काट दूँगा' ॥ ७५ ॥
तद्वचः संगतं श्रुत्वा लोमशो युक्तमर्थवत् ।
हर्षादुद्वीक्ष्य पलितं स्वागतेनाभ्यपूजयत् ॥ ७६ ॥
चूहेकी यह युक्तियुक्त, सुसंगत और अभिप्रायपूर्ण बात सुनकर लोमशने उसकी ओर हर्षभरी दृष्टिसे देखा तथा स्वागतपूर्वक उसकी भूरि- भूरि प्रशंसा की ॥ ७६ ॥
तं सम्पूज्याथ पलितं मार्जारः सौहृदे स्थितः ।
स विचिन्त्याब्रवीद् धीरः प्रीतस्त्वरित एव च ॥ ७७ ॥
इस प्रकार पलितकी प्रशंसा एवं पूजा करके सौहार्दमें प्रतिष्ठित हुए धीरबुद्धि मार्जारने भलीभाँति सोच - विचारकर तुरंत ही प्रसन्नतापूर्वक कहा— ॥ ७७ ॥
शीघ्रमागच्छ भद्रं ते त्वं मे प्राणसमः सखा ।
तव प्राज्ञ प्रसादाद्धि प्रायः प्राप्स्यामि जीवितम् ॥ ७८ ॥
' भैया! शीघ्र आओ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम तो हमारे प्राणोंके समान प्रिय सखा हो । विद्वन्! इस समय मुझे प्रायः तुम्हारी ही कृपासे जीवन प्राप्त होगा ॥ ७८ ॥
यद् यदेवंगतेनाद्य शक्यं कर्तुं मया तव ।
तदाज्ञापय कर्तास्मि संधिरेवास्तु नौ सखे ॥ ७ ९ ॥
‘ सखे! इस दशामें पड़े हुए मुझ सेवकके द्वारा तुम्हारा जो- जो कार्य किया जा सकता हो, उसके लिये मुझे आज्ञा दो, मैं अवश्य करूंगा । हम दोनोंमें संधि रहनी चाहिये ॥ ७ ९ ॥
अस्मात् तु संकटान्मुक्तः समित्रगणबान्धवः ।
सर्वकार्याणि कर्ताहं प्रियाणि च हितानि च ॥ ८० ॥
‘ इस संकटसे मुक्त होनेपर मैं अपने सभी मित्रों और बन्धु - बान्धवोंके साथ तुम्हारे सभी प्रिय एवं हितकर कार्य करता रहूँगा ॥ ८० । ।
मुक्तश्च व्यसनादस्मात् सौम्याहमपि नाम ते ।
प्रीतिमुत्पादयेयं च प्रीतिकर्तुश्च सत्क्रियाम् ॥ ८१ ॥
‘ सौम्य! इस विपत्तिसे छुटकारा पानेपर मैं भी तुम्हारे हृदयमें प्रीति उत्पन्न करूँगा । तुम मेरा प्रिय करनेवाले हो, अतः तुम्हारा भलीभाँति आदर- सत्कार करूँगा ॥ ८१ ॥
प्रत्युपकुर्वन् बह्वपि न भाति पूर्वोपकारिणा तुल्यः । एकः करोति हि कृते निष्कारणमेव कुरुतेऽन्यः ॥ ८२ ॥
पृष्ठ 889
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘ कोई किसीके उपकारका कितना ही अधिक बदला क्यों न चुका दे; वह प्रथम उपकार करनेवालेके समान नहीं शोभा पाता है; क्योंकि एक तो किसीके उपकार करनेपर बदलेमें उसका उपकार करता है; परंतु दूसरेने बिना किसी कारणके ही उसकी भलाई की है ' ॥ ८२ ॥
भीष्म उवाच
ग्राहयित्वा तु तं स्वार्थं मार्जारं मूषिकस्तथा ।
प्रविवेश तु विश्रभ्य क्रोडमस्य कृतागसः ॥ ८३ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस प्रकार चूहेने बिलावसे अपने मतलबकी बात स्वीकार कराकर और स्वयं भी उसका विश्वास करके उस अपराधी शत्रुकी भी गोदमें जा बैठा ॥ ८३ ॥
एवमाश्वासितो विद्वान् माजरिण स मूषिकः ।
मार्जारोरसि विस्रब्धः सुष्वाप पितृमातृवत् ॥ ८४ ॥
बिलावने जब उस विद्वान् चूहेको पूर्वोक्तरूपसे आश्वासन दिया, तब वह माता- पिताकी गोदके समान उस बिलावकी छातीपर निर्भय होकर सो गया ॥ ८४ ॥
लीनं तु तस्य गात्रेषु मार्जारस्य च मूषिकम् ।
दृष्ट्वा तौ नकुलोलूकौ निराशौ प्रत्यपद्यताम् ॥ ८५ ॥
चूहेको बिलावके अंगोंमें छिपा हुआ देख नेवला और उल्लू दोनों निराश हो गये ॥ ८५ ॥
तथैव तौ सुसंत्रस्तौ दृढमागततन्द्रितौ ।
दृष्ट्वा तयोः परां प्रीतिं विस्मयं परमं गतौ ॥ ८६ ॥
उन दोनोंको बड़े जोरसे औंघाई आ रही थी और वे अत्यन्त भयभीत भी हो गये थे । उस समय चूहे और बिलावका वह विशेष प्रेम देखकर नेवला और उल्लू दोनोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ८६ ॥
बलिनौ मतिमन्तौ च सुवृत्तौ चाप्युपासितौ ।
अशक्तौ तु नयात् तस्मात् सम्प्रधर्षयितुं बलात् ॥ ८७ ॥
यद्यपि वे बड़े बलवान्, बुद्धिमान्, सुन्दर बर्ताव करनेवाले, कार्यकुशल तथा निकटवर्ती थे तो भी उस संधिकी नीतिसे काम लेनेके कारण उन चूहे और बिलावपर वे बलपूर्वक आक्रमण करनेमें समर्थ न हो सके ॥ ८७ ॥
कार्यार्थं कृतसंधी तौ दृष्ट्वा मार्जारमूषिकी ।
उलूकनकुलौ तूर्णं जग्मतुस्तौ स्वमालयम् ॥ ८८ ॥
अपने - अपने प्रयोजनकी सिद्धिके लिये चूहे और बिलावने आपसमें संधि कर ली, यह देखकर उल्लू और नेवला देनों तत्काल अपने निवासस्थानको लौट गये ॥ ८८ ॥
पृष्ठ 890
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
लीनः स तस्य गात्रेषु पलितो देशकालवित् ।
चिच्छेद पाशान् नृपते कालापेक्षी शनैः शनैः ॥ ८ ९ ॥
नरेश्वर! चूहा देश- कालकी गतिको अच्छी तरह जानता था; इसलिये वह बिलावके अंगोंमें ही छिपा रहकर चाण्डालके आनेके समयकी प्रतीक्षा करता हुआ धीरे- धीरे जालको काटने लगा ॥ ८९ ॥
अथ बन्धपरिक्लिष्टो मार्जारो वीक्ष्य मूषिकम् ।
छिन्दन्तं वै तदा पाशानत्वरन्तं त्वरान्वितः ॥ ९ ० ॥
तमत्वरन्तं पलितं पाशानां छेदने तथा ।
संचोदयितुमारेभे मार्जारो मूषिकं तदा ॥ ९ १ ॥
बिलाव उस बन्धनसे तंग आ गया था । उसने देखा, चूहा जाल तो काट रहा है; किंतु इस कार्यमें फुर्ती नहीं दिखा रहा है, तब वह उतावला होकर बन्धन काटनेमें जल्दी न करनेवाले पलित नामक चूहेको उकसाता हुआ बोला – ॥ ९ ० - ९ १ ॥
किं सौम्य नातित्वरसे किं कृतार्थोऽवमन्यसे ।
छिन्धि पाशानमित्रघ्न पुरा श्वपच एति च ॥ ९ २ ॥
‘ सौम्य! तुम जल्दी क्यों नहीं करते हो? क्या तुम्हारा काम बन गया, इसलिये मेरी अवहेलना करते हो? शत्रुसूदन! देखो, अब चाण्डाल आ रहा होगा । उसके आनेसे पहले ही मेरे बन्धनोंको काट दो ' ॥ ९ २ ॥
इत्युक्तस्त्वरता तेन मतिमान् पलितोऽब्रवीत् ।
मार्जारमकृतप्रज्ञं पथ्यमात्महितं वचः ॥ ९ ३ ॥
उतावले हुए बिलावके ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् पलितने अपवित्र विचार रखनेवाले उस मार्जारसे अपने लिये हितकर और लाभदायक बात कही- ॥ ९ ३ ॥
तूष्णींभव न ते सौम्य त्वरा कार्या न सम्भ्रमः ।
वयमेवात्र कालज्ञा न कालः परिहास्यते ॥ ९ ४ ॥
' सौम्य चुप रहो, तुम्हें जल्दी नहीं करनी चाहिये, घबरानेकी कोई आवश्यकता नहीं है ।
मैं समयको खूब पहचानता हूँ, ठीक अवसर आनेपर मैं कभी नहीं चूकूँगा ॥
अकाले कृत्यमारब्धं कर्तुर्नार्थाय कल्पते ।
तदेव काल आरब्धं महतेऽर्थाय कल्पते ॥ ९ ५ ॥
' बेमौके शुरू किया हुआ काम करनेवालेके लिये लाभदायक नहीं होता है और वही उपयुक्त समयपर आरम्भ किया जाय तो महान् अर्थका साधक हो जाता है ॥ ९ ५ ॥
अकाले विप्रमुक्तान्मे त्वत्त एव भयं भवेत् ।
तस्मात् कालं प्रतीक्षस्व किमिति त्वरसे सखे ॥ ९ ६ ॥
‘यदि असमयमें ही तुम छूट गये तो मुझे तुम्हींसे भय प्राप्त हो सकता है, इसलिये मेरे मित्र! थोड़ी देर और प्रतीक्षा करो; क्यों इतनी जल्दी मचा रहे हो? ॥ ९ ६ ॥