05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 891–900

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900

पृष्ठ 891

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यदा पश्यामि चाण्डालमायान्तं शस्त्रपाणिनम् ।

ततश्छेत्स्यामि ते पाशान् प्राप्ते साधारणे भये ॥ ९ ७ ॥

‘ जब मैं देख लूँगा कि चाण्डाल हाथमें हथियार लिये आ रहा है, तब तुम्हारे ऊपर साधारण - सा भय उपस्थित होनेपर मैं शीघ्र ही तुम्हारे बन्धन काट डालूँगा ॥ ९ ७ ॥

तस्मिन् काले प्रमुक्तस्त्वं तरुमेवाधिरोक्ष्यसे ।

न हि ते जीवितादन्यत् किंचित् कृत्यं भविष्यति ॥ ९ ८ ॥

‘ उस समय छूटते ही तुम पहले पेड़पर ही चढ़ोगे । अपने जीवनकी रक्षाके सिवा दूसरा कोई कार्य तुम्हें आवश्यक नहीं प्रतीत होगा ॥ ९ ८ ॥

ततो भवत्यपक्रान्ते त्रस्ते भीते च लोमश ।

अहं बिलं प्रवेक्ष्यामि भवान् शाखां भजिष्यति ॥ ९९ ॥

‘ लोमशजी! जब आप त्रास और भयसे आक्रान्त हो भाग खड़े होंगे, उस समय मैं बिलमें घुस जाऊँगा और आप वृक्षकी शाखापर जा बैठेंगे ' ॥ ९९ ॥

एवमुक्तस्तु मार्जारो मूषिकेणात्मनो हितम् ।

वचनं वाक्यतत्त्वज्ञो जीवितार्थी महामतिः ॥ १०० ॥

चूहेके ऐसा कहनेपर वाणीके मर्मको समझनेवाला और अपने जीवनकी रक्षा चाहनेवाला परम बुद्धिमान् बिलाव अपने हितकी बात बताता हुआ बोला ॥ १०० ॥

अथात्मकृत्ये त्वरितः सम्यक् प्रश्रितमाचरन् ।

उवाच लोमशो वाक्यं मूषिकं चिरकारिणम् ॥ १०१ ॥

लोमशको अपना काम बनानेकी जल्दी लगी हुई थी; अतः वह भलीभाँति विनयपूर्ण बर्ताव करता हुआ विलम्ब करनेवाले चूहेसे इस प्रकार कहने लगा- ॥

न ह्येवं मित्रकार्याणि प्रीत्या कुर्वन्ति साधवः ।

यथा त्वां मोक्षितः कृच्छ्रात् त्वरमाणेन वै मया ॥ १०२ ॥

' श्रेष्ठ पुरुष मित्रोंके कार्य बड़े प्रेम और प्रसन्नताके साथ किया करते हैं; तुम्हारी तरह नहीं। जैसे मैंने तुरंत ही तुम्हें संकटसे छुड़ा लिया था ॥ १०२ ॥

तथा हि त्वरमाणेन त्वया कार्यं हितं मम ।

यत्नं कुरु महाप्राज्ञ यथा रक्षाऽऽवयोर्भवेत् ॥ १०३ ॥

' इसी प्रकार तुम्हें भी जल्दी ही मेरे हितका कार्य करना चाहिये । महाप्राज्ञ! तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे हम दोनोंकी रक्षा हो सके ॥ १०३ ॥

अथवा पूर्ववैरं त्वं स्मरन् कालं जिहीर्षसि ।

पश्य दुष्कृतकर्मंस्त्वं व्यक्तमायुःक्षयं तव ॥ १०४ ॥

‘ अथवा यदि पहलेके वैरका स्मरण करके तुम यहाँ व्यर्थ समय काटना चाहते हो तो पापी! देख लेना, इसका क्या फल होगा? निश्चय ही तुम्हारी आयु क्षीण हो चली है ॥ १०४ ॥

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यदि किंचिन्मयाज्ञानात् पुरस्ताद् दुष्कृत कृतम् ।

न तन्मनसि कर्तव्यं क्षामये त्वां प्रसीद मे ॥ १०५ ॥

‘ यदि मैंने अज्ञानवश पहले कभी तुम्हारा कोई अपराध किया हो तो तुम्हें उसको मनमें

नहीं लाना चाहिये, मैं क्षमा माँगता हूँ। तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ ॥ १०५ ॥

तमेवंवादिनं प्राज्ञः शास्त्रबुद्धिसमन्वितः ।

उवाचेदं वचः श्रेष्ठं मार्जारं मूषिकस्तदा ॥ १०६ ॥

चूहा बड़ा विद्वान् तथा नीतिशास्त्रको जाननेवाली बुद्धिसे सम्पन्न था । उसने उस समय इस प्रकार कहनेवाले बिलावसे यह उत्तम बात कही- ॥ १०६ ॥

श्रुतं मे तव मार्जार स्वमर्थं परिगृह्णतः ।

ममापि त्वं विजानासि स्वमर्थं परिगृह्णतः ॥ १०७ ॥

‘ भैया बिलाव! तुमने अपनी स्वार्थसिद्धिपर ही ध्यान रखकर जो कुछ कहा है, वह सब मैंने सुन लिया तथा मैंने भी अपने प्रयोजनको सामने रखते हुए जो कुछ कहा है, उसे तुम भी अच्छी तरह समझते हो ॥ १०७ ॥

यन्मित्रं भीतवत्साध्यं यन्मित्रं भयसंहितम् ।

सुरक्षितव्यं तत् कार्यं पाणिः सर्पमुखादिव ॥ १०८ ॥

' जो किसी डरे हुए प्राणीद्वारा मित्र बनाया गया हो तथा जो स्वयं भी भयभीत होकर ही उसका मित्र बना हो–इन दोनों प्रकारके मित्रोंकी ही रक्षा होनी चाहिये और जैसे बाजीगर सर्पके मुखसे हाथ बचाकर ही उसे खेलाता है, उसी प्रकार अपनी रक्षा करते हुए ही उन्हें एक दूसरेका कार्य करना चाहिये ॥ १०८ ॥

कृत्वा बलवता संधिमात्मानं यो न रक्षति ।

अपथ्यमिव तद् भुक्तं तस्य नार्थाय कल्पते ॥ १० ९ ॥

‘ जो व्यक्ति बलवान्से संधि करके अपनी रक्षाका ध्यान नहीं रखता, उसका वह मेल-जोल खाये हुए अपथ्य अन्नके समान हितकर नहीं होता ॥ १० ९ ॥

न कश्चित् कस्यचिन्मित्रं न कश्चित् कस्यचिद् रिपुः ।

अर्थतस्तु निबद्धयन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥ ११० ॥

अर्थैरर्था निबद्धयन्ते गजैर्वनगजा इव । ' न तो कोई किसीका मित्र है और न कोई किसीका शत्रु । स्वार्थको ही लेकर मित्र और शत्रु एक दूसरेसे बँधे हुए हैं । जैसे पालतू हाथियोंद्वारा जंगली हाथी बाँध लिये जाते हैं, उसी प्रकार अर्थोंद्वारा ही अर्थ बँधते हैं ॥ ११० ॥

न च कश्चित् कृते कार्ये कर्तारं समवेक्षते ॥ १११ ॥

तस्मात् सर्वाणि कार्याणि सावशेषाणि कारयेत् । ' काम पूरा हो जानेपर कोई भी उसके करनेवालेको नहीं देखता - उसके हितपर नहीं ध्यान देता; अतः सभी कार्योंको अधूरे ही रखना चाहिये ॥ १११३ ॥

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तस्मिन् कालेऽपि च भवान् दिवाकीर्तिभयार्दितः ॥ ११२ ॥

मम न ग्रहके शक्तः पलायनपरायणः । ‘ जब चाण्डाल आ जायगा, उस समय तुम उसीके भयसे पीड़ित हो भागने लग जाओगे; फिर मुझे पकड़ न सकोगे ॥ ११२३ ॥

छिन्नं तु तन्तुबाहुल्यं तन्तुरेकोऽवशेषितः ॥ ११३ ॥

छेत्स्याम्यहं तमप्याशु निर्वृतो भव लोमश । ' मैंने बहुतसे तंतु काट डाले हैं, केवल एक ही डोरी बाकी रख छोड़ी है । उसे भी मैं शीघ्र ही काट डालूँगा; अतः लोमश! तुम शान्त रहो, घबराओ न ' ॥ तयोः संवदतोरेवं तथैवापन्नयोर्द्वयोः ॥ ११४ ॥

क्षयं जगाम सा रात्रिर्लोमशं त्वाविशद् भयम् ।

इस प्रकार संकटमें पड़े हुए उन दोनोंके वार्तालाप करते - करते ही वह रात बीत गयी ।

अब लोमशके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ॥ ११४३ ॥

ततः प्रभातसमये विकृतः कृष्णपिङ्गल ॥ ११५ ॥

स्थूलस्फिग् विकृतो रूक्षः श्वयूथपरिवारितः ।

शंकुकर्णो महावक्त्रो मलिनो घोरदर्शनः ॥ ११६ ॥

परिघो नाम चाण्डालः शस्त्रपाणिरदृश्यत । तदनन्तर प्रातःकाल परिघ नामक चाण्डाल हाथमें हथियार लेकर आता दिखायी दिया । उसकी आकृति बड़ी विकराल थी । शरीरका रंग काला और पीला था । उसका नितम्ब भाग बहुत स्थूल था । कितने ही अंग विकृत हो गये थे । वह स्वभावका रूखा जान पड़ता था । कुत्तोंसे घिरा हुआ वह मलिनवेषधारी चाण्डाल बड़ा भयंकर दिखायी दे रहा था, उसका मुँह विशाल था और कान दीवारमें गड़ी हुई खूँटियोंके समान जान पड़ते थे ॥ तं दृष्ट्वा यमदूताभं मार्जारस्त्रस्तचेतनः ॥ ११७ ॥

उवाच वचनं भीतः किमिदानीं करिष्यसि । यमदूतके समान चाण्डालको आते देख बिलावका चित्त भयसे व्याकुल हो गया । उसने डरते - डरते यही कहा — ‘ भैया चूहा! अब क्या करोगे? ' ॥ ११७३ ॥

अथ तावपि संत्रस्तौ तं दृष्ट्वा घोरसंकुलम् ॥ ११८ ॥

क्षणेन नकुलोलूको नैराश्यमुपजग्मतुः । एक ओर वे दोनों भयभीत थे । दूसरी ओर भयानक प्राणियोंसे घिरा हुआ चाण्डाल आ रहा था । उन सबको देखकर नेवला और उल्लू क्षणभरमें ही निराश हो गये ॥ ११८३ ॥

बलिनौ मतिमन्तौ च संघाते चाप्युपागतौ ॥ ११ ९ ॥ अशक्तौ सुनयात् तस्मात् सम्प्रधर्षयितुं बलात् ।

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वे दोनों बलवान् और बुद्धिमान् तो थे ही । चूहेके घातमें पासहीमें बैठे हुए थे; परंतु अच्छी नीतिसे संगठित हो जानेके कारण चूहे और बिलावपर वे बलपूर्वक आक्रमण न कर सके ॥ ११ ९ ३ ॥ कार्यार्थे कृतसंधानौ दृष्ट्वा मार्जारमूषिकौ ॥ १२० ॥

उलूकनकुलौ तत्र जग्मतुः स्वं स्वमालयम् । चूहे और बिलावको कार्यवश संधिसूत्रमें बँधे देख उल्लू और नेवला दोनों अपने - अपने निवासस्थानको चले गये ॥ १२०३ ॥

ततश्चिच्छेद तं पाशं मार्जारस्य च मूषिकः ॥ १२१ ॥

विप्रमुक्तोऽथ मार्जारस्तमेवाभ्यपतद् द्रुमम् ।

स तस्मात् सम्भ्रमावर्तान्मुक्तो घोरेण शत्रुणा ॥ १२२ ॥

बिलं विवेश पलितः शाखां लेभे स लोमशः । तदनन्तर चूहेने बिलावका बन्धन काट दिया । जालसे छूटते ही बिलाव उसी पेड़पर चढ़ गया । उस घोर शत्रु तथा उस भारी घबराहटसे छुटकारा पाकर पलित अपने बिलमें घुस गया और लोमश वृक्षकी शाखापर जा बैठा ॥ १२१-१२२ ॥ उन्माथमप्यथादाय चाण्डालो वीक्ष्य सर्वशः ॥ १२३ ॥

विहताशः क्षणेनास्ते तस्माद् देशादपाक्रमत् ।

जगाम स स्वभवनं चाण्डालो भरतर्षभ ॥ १२४ ॥

भरतश्रेष्ठ! चाण्डालने उस जालको लेकर उसे सब ओरसे उलट - पलटकर देखा और निराश होकर क्षणभरमें उस स्थानसे हट गया और अन्तमें अपने घरको चला गया ॥ १२३-१२४ ॥

ततस्तस्माद् भयान्मुक्तो दुर्लभं प्राप्य जीवितम् ।

बिलस्थं पादपाग्रस्थः पलितं लोमशोऽब्रवीत् ॥ १२५ ॥

उस भारी भयसे मुक्त हो दुर्लभ जीवन पाकर वृक्षकी शाखापर बैठे हुए लोमशने बिलके भीतर बैठे हुए चूहेसे कहा— ॥ १२५ ॥

अकृत्वा संविदं काञ्चित् सहसा समवप्लुतः ।

कृतज्ञं कृतकर्माणं कच्चिन्मां नाभिशंकसे ॥ १२६ ॥

‘ भैया! तुम मुझसे कोई बातचीत किये बिना ही इस प्रकार सहसा बिलमें क्यों घुस गये? मैं तो तुम्हारा बड़ा ही कृतज्ञ हूँ । मैंने तुम्हारे प्राणोंकी रक्षा करके तुम्हारा भी बड़ा भारी काम किया है । तुम्हें मेरी ओरसे कुछ शंका तो नहीं है? ॥ १२६ ॥

गत्वा च मम विश्वासं दत्त्वा च मम जीवितम् ।

मित्रोपभोगसमये किं मां त्वं नोपसर्पसि ॥ १२७ ॥

‘ मित्र! तुमने विपत्तिके समय मेरा विश्वास किया और मुझे जीवनदान दिया । अब तो मैत्रीके सुखका उपभोग करनेका समय है, ऐसे समय तुम मेरे पास क्यों नहीं आते

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हो? ॥ १२७ ॥

कृत्वा हि पूर्वं मित्राणि यः पश्चान्नानुतिष्ठति ।

न स मित्राणि लभते कृच्छ्रास्वापत्सु दुर्मतिः ॥ १२८ ॥

' जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य पहले बहुत - से मित्र बनाकर पीछे उस मित्रभावमें स्थिर नहीं रहता है, वह कष्टदायिनी विपत्तिमें पड़नेपर उन मित्रोंको नहीं पाता है अर्थात् उनसे उसको सहायता नहीं मिलती ॥ १२८ ॥

सत्कृतोऽहं त्वया मित्र सामर्थ्यादात्मनः सखे स मां मित्रत्वमापन्नमुपभोक्तुं त्वमर्हसि ॥ १२ ९ ॥ ‘ सखे! मित्र! तुमने अपनी शक्तिके अनुसार मेरा पूरा सत्कार किया है और मैं भी तुम्हारा मित्र हो गया हूँ; अतः तुम्हें मेरे साथ रहकर इस मित्रताका सुख भोगना चाहिये ॥ १२ ९ ॥

यानि मे सन्ति मित्राणि ये च सम्बन्धिबान्धवाः ।

सर्वे त्वां पूजयिष्यन्ति शिष्या गुरुमिव प्रियम् ॥ १३० ॥

' मेरे जो भी मित्र, सम्बन्धी और बन्धु बान्धव हैं, वे सब तुम्हारी उसी प्रकार सेवा --पूजा करेंगे, जैसे शिष्य अपने श्रद्धेय गुरुकी करते हैं ॥ १३० ॥

अहं च पूजयिष्ये त्वां समित्रगणबान्धवम् ।

जीवितस्य प्रदातारं कृतज्ञः को न पूजयेत् ॥ १३१ ॥

‘ मैं भी मित्रों और बन्धु - बान्धवोंसहित तुम्हारा सदा ही आदर- सत्कार करूँगा । संसारमें ऐसा कौन पुरुष होगा, जो अपने जीवनदाताकी पूजा न करे? ॥ १३१ ॥

ईश्वरो मे भवानस्तु स्वशरीरगृहस्य च ।

अर्थानां चैव सर्वेषामनुशास्ता च मे भव ॥ १३२ ॥

‘ तुम मेरे शरीरके और मेरे घरके भी स्वामी हो जाओ । मेरी जो कुछ भी सम्पत्ति है, वह

सारी - की - सारी तुम्हारी है । तुम उसके शासक और व्यवस्थापक बनो ॥ १३२ ॥

अमात्यो मे भव प्राज्ञ पितेवेह प्रशाधि माम् ।

न तेऽस्ति भयमस्मत्तो जीवितेनात्मनः शपे ॥ १३३ ॥

' विद्वन्! तुम मेरे मन्त्री हो जाओ और पिताकी भाँति मुझे कर्तव्यका उपदेश दो । मैं अपने जीवनकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हें हमलोगोंकी ओरसे कोई भय नहीं है ॥ १३३ ॥

बुद्धया त्वमुशना साक्षाद् बलेनाधिकृता वयम् ।

त्वं मन्त्रबलयुक्तो हि दत्त्वा जीवितमद्य मे ॥ १३४ ॥

‘ तुम साक्षात् शुक्राचार्यके समान बुद्धिमान् हो । तुममें मन्त्रणाका बल है । आज तुमने मुझे जीवनदान देकर अपने मन्त्रणाबलसे हम सब लोगोंके हृदयपर अधिकार प्राप्त कर लिया है ' ॥ १३४ ॥

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एवमुक्तः परां शान्तिं माजरिण स मूषिकः ।

उवाच परमन्त्रज्ञः श्लक्ष्णमात्महितं वचः ॥ १३५ ॥

बिलावकी ऐसी परम शान्तिपूर्ण बातें सुनकर उत्तम मन्त्रणाके ज्ञाता चूहेने मधुर वाणीमें अपने लिये हितकर वचन कहा- ॥ १३५ ॥

यद् भवानाह तत् सर्वं मया ते लोमश श्रुतम् ।

ममापि तावद् ब्रुवतः शृणु यत् प्रतिभाति मे ॥ १३६ ॥

'लोमश! तुमने जो कुछ कहा, वह सब मैंने ध्यान देकर सुना । अब मेरी बुद्धिमें जो विचार स्फुरित हो रहा है उसे बतलाता हूँ, अतः मेरे इस कथनको भी सुन लो ॥ १३६ ॥

वेदितव्यानि मित्राणि विज्ञेयाश्चापि शत्रवः ।

एतत् सुसूक्ष्मं लोकेऽस्मिन् दृश्यते प्राज्ञ सम्मतम् ॥ १३७ ॥

‘ मित्रोंको जानना चाहिये, शत्रुओंको भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिये – इस जगत्में मित्र और शत्रुकी यह पहचान अत्यन्त सूक्ष्म तथा विज्ञजनोंको अभिमत है ॥ १३७ ॥

शत्रुरूपा हि सुहृदो मित्ररूपाश्च शत्रवः ।

संधितास्ते न बुद्धयन्ते कामक्रोधवशं गताः ॥ १३८ ॥

‘ अवसर आनेपर कितने ही मित्र शत्रुरूप हो जाते हैं और कितने ही शत्रु मित्र बन जाते हैं । परस्पर संधि कर लेनेके पश्चात् जब वे काम और क्रोधके अधीन हो जाते हैं, तब यह समझना असम्भव हो जाता है कि वे मित्रभावसे युक्त हैं या शत्रुभावसे? ॥ १३८ ॥

नास्ति जातु रिपुर्नाम मित्रं नाम न विद्यते ।

सामर्थ्ययोगाज्जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥ १३ ९ ॥

' न कभी कोई शत्रु होता है और न मित्र होता है। आवश्यक शक्तिके सम्बन्धसे लोग एक दूसरेके मित्र और शत्रु हुआ करते हैं ॥ १३ ९ ॥

यो यस्मिन् जीवति स्वार्थं पश्येत् पीडां न जीवति ।

स तस्य मित्रं तावत् स्याद् यावन्न स्याद् विपर्ययः ॥ १४० ॥

' जो जिसके जीते - जी अपना स्वार्थ सधता देखता है और जिसके मर जानेपर अपनी हानि मानता है, वह तबतक उसका मित्र बना रहता है, जबतक कि इस स्थितिमें कोई उलट - फेर नहीं होता ॥ १४० ॥

नास्ति मैत्री स्थिरा नाम न च ध्रुवमसौहृदम् ।

अर्थयुक्त्यानुजायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥ १४१ ॥

' मैत्री कोई स्थिर वस्तु नहीं है और शत्रुता भी सदा स्थिर रहनेवाली चीज नहीं है ।

स्वार्थके सम्बन्धसे मित्र और शत्रु होते रहते हैं ॥ १४१ ॥

मित्रं च शत्रुतामेति कस्मिंश्चित् कालपर्यये ।

शत्रुश्च मित्रतामेति स्वार्थो हि बलवत्तरः ॥ १४२ ॥

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' कभी - कभी समयके फेरसे मित्र शत्रु बन जाता है और शत्रु भी मित्र बन जाता है; क्योंकि स्वार्थ बड़ा बलवान् होता है ॥ १४२ ॥

यो विश्वसिति मित्रेषु न विश्वसिति शत्रुषु ।

अर्थयुक्तिमविज्ञाय यः प्रीतौ कुरुते मनः ॥ १४३ ॥

मित्रे वा यदि वा शत्रौ तस्यापि चलिता मतिः । ‘जो मनुष्य स्वार्थके सम्बन्धका विचार किये बिना ही मित्रोंपर केवल विश्वास और शत्रुओंपर केवल अविश्वास करता जाता है तथा जो शत्रु हो या मित्र, जो सबके प्रति प्रेमभाव ही स्थापित करने लगता है, उसकी बुद्धि भी चंचल ही समझनी चाहिये ॥ १४३ ||

पृष्ठ 898

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चूहेकी सहायताके फलस्वरूप चाण्डालके जालसे बिलावकी मुक्ति

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न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ॥ १४४ ॥

विश्वासाद् भयमुत्पन्नमपि मूलानि कृन्तति । ' जो विश्वासपात्र न हो, उसपर कभी विश्वास न करे और जो विश्वासपात्र हो, उसपर भी अधिक विश्वास न करे; क्योंकि विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय मनुष्यका मूलोच्छेद कर डालता है ॥ १४४३ ॥

अर्थयुक्त्या हि जायन्ते पिता माता सुतस्तथा ॥ १४५ ॥

मातुला भागिनेयाश्च तथा सम्बन्धिबान्धवाः । 'माता- पिता, पुत्र, मामा, भांजे, सम्बन्धी तथा बन्धु बान्धव-इन सबमें स्वार्थके सम्बन्धसे ही स्नेह होता है ॥ पुत्रं हि मातापितरौ त्यजतः पतितं प्रियम् ॥ १४६ ॥

लोको रक्षति चात्मानं पश्य स्वार्थस्य सारताम् । ‘ अपना प्यारा पुत्र भी यदि पतित हो जाता है तो माँ- बाप उसे त्याग देते हैं और सब लोग सदा अपनी ही रक्षा करना चाहते हैं । अतः देख लो, इस जगत्में स्वार्थ ही सार है ' ॥ १४६३ ॥

सामान्या निष्कृतिः प्राज्ञ यो मोक्षात् प्रत्यनन्तरम् ॥ १४७ ॥

कृतं मृगयसे शत्रुं सुखोपायमसंशयम् । ' बुद्धिमान् लोमश! जो तुम आज जालके बन्धनसे छूटनेके बाद ही कृतज्ञतावश मुझ अपने शत्रुको सुख पहुँचानेका असंदिग्ध उपाय ढूँढ़ने लगे हो, इसका क्या कारण है? जहाँतक उपकारका बदला चुकानेका प्रश्न है, वहाँतक तो हमारी तुम्हारी समान स्थिति है । यदि मैंने तुम्हें संकटसे छुड़ाया है, तो तुमने भी तो मुझे वैसी ही विपत्तिसे बचाया है; फिर मैं तो कुछ करता नहीं, तुम्हीं क्यों उपकारका बदला देनेके लिये उतावले हो उठे हो? ॥ १४७ ३ ॥ अस्मिन् निलय एव त्वं न्यग्रोधादवतारितः ॥ १४८ ॥

पूर्वं निविष्टमुन्माथं चपलत्वान्न बुद्धवान् । ' तुम इसी स्थानपर बरगदसे उतरे थे और पहलेसे ही यहाँ जाल बिछा हुआ था; परंतु तुमने चपलताके कारण उधर ध्यान नहीं दिया और फँस गये ॥ १४८३ ॥

आत्मनश्चपलो नास्ति कुतोऽन्येषां भविष्यति ॥ १४ ९ ॥ तस्मात् सर्वाणि कार्याणि चपलो हन्त्यसंशयम् । ‘ चपल प्राणी जब अपने ही लिये कल्याणकारी नहीं होता तो वह दूसरेकी भलाई क्या करेगा? अतः यह निश्चित है कि चपल पुरुष सब काम चौपट कर देता है ॥ १४ ९ ३ ॥ ब्रवीषि मधुरं यच्च प्रियो मेऽद्य भवानिति ॥ १५० ॥

तन्मित्र कारणं सर्वं विस्तरेणापि मे शृणु

पृष्ठ 900

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कारणात् प्रियतामेति द्वेष्यो भवति कारणात् ॥ १५१ ॥

' इसके सिवा तुम जो यह मीठी- मीठी बात कह रहे हो कि ' आज तुम मुझे बड़े प्रिय

लगते हो' इसका भी कारण है, मेरे मित्र! वह सब मैं विस्तारके साथ बताता हूँ, सुनो ।

मनुष्य कारणसे ही प्रेमपात्र और कारणसे ही द्वेषका पात्र बनता है ॥ १५०-१५१ ॥

अर्थार्थी जीवलोकोऽयं न कश्चित् कस्यचित् प्रियः ।

सख्यं सोदर्ययोर्भ्रात्रोर्दम्पत्योर्वा परस्परम् ॥ १५२ ॥

कस्यचिन्नाभिजानामि प्रीतिं निष्कारणामिह । ‘ यह जीव- जगत् स्वार्थका ही साथी है । कोई किसीका प्रिय नहीं है। दो सगे भाइयों तथा पति और पत्नीमें भी जो परस्पर प्रेम होता है, वह भी स्वार्थवश ही है । इस जगत्में किसीके भी प्रेमको मैं निष्कारण ( स्वार्थरहित ) नहीं समझता ॥ १५२३ ॥

यद्यपि भ्रातरः क्रुद्धा भार्या वा कारणान्तरे ॥ १५३ ॥

स्वभावतस्ते प्रीयन्ते नेतरः प्रीयते जनः । ‘ कभी - कभी किसी स्वार्थको लेकर भाई भी कुपित हो जाते हैं अथवा पत्नी भी रूठ जाती है । यद्यपि वे स्वभावतः एक- दूसरेसे जैसा प्रेम करते हैं, ऐसा प्रेम दूसरे लोग नहीं करते हैं ॥ १५३३ ॥

प्रियो भवति दानेन प्रियवादेन चापरः ॥ १५४ ॥

मन्त्रहोमजपैरन्यः कार्यार्थं प्रीयते जनः । ‘ कोई दान देनेसे प्रिय होता है, कोई प्रिय वचन बोलनेसे प्रीतिपात्र बनता है और कोई कार्यसिद्धिके लिये मन्त्र, होम एवं जप करनेसे प्रेमका भाजन बन जाता है ॥ १५४३ ॥

उत्पन्ना कारणे प्रीतिरासीन्नौ कारणान्तरे ॥ १५५ ॥

प्रध्वस्ते कारणस्थाने सा प्रीतिर्विनिवर्तते । ' किसी कारण ( स्वार्थ ) को लेकर उत्पन्न होनेवाली प्रीति जबतक वह कारण रहता है, तबतक बनी रहती है । उस कारणका स्थान नष्ट हो जानेपर उसको लेकर की हुई प्रीति भी स्वतः निवृत्त हो जाती है ॥ १५५३ । किं नु तत् कारणं मन्ये येनाहं भवतः प्रियः ॥ १५६ ॥

अन्यत्राभ्यवहारार्थं तत्रापि च बुधा वयम् । ‘ अब मेरे शरीरको खा जानेके सिवा दूसरा कौन- सा ऐसा कारण रह गया है, जिससे मैं यह मान लूँ कि वास्तवमें तुम्हारा मुझपर प्रेम है । इस समय जो तुम्हारा स्वार्थ है, उसे मैं अच्छी तरह समझता हूँ ॥ १५६३ ॥

कालो हेतुं विकुरुते स्वार्थस्तमनुवर्तते ॥ १५७ ॥

स्वार्थं प्राज्ञोऽभिजानाति प्राज्ञं लोकोऽनुवर्तते ।

न त्वीदृशं त्वया वाच्यं विदुषि स्वार्थपण्डिते ॥ १५८ ॥