श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 901–910
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 901–910
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‘ समय कारणके स्वरूपको बदल देता है; और स्वार्थ उस समयका अनुसरण करता रहता है । विद्वान् पुरुष उस स्वार्थको समझता है और साधारण लोग विद्वान् पुरुषके ही पीछे चलते हैं । तात्पर्य यह है कि मैं विद्वान् हूँ; इसलिये तुम्हारे स्वार्थको अच्छी तरह समझता हूँ; अतः तुम्हें मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ १५७ - १५८ ॥
अकाले हि समर्थस्य स्नेहहेतुरयं तव ।
तस्मान्नाहं चले स्वार्थात् सुस्थिरः संधिविग्रहे ॥ १५ ९ ॥
' तुम शक्तिशाली हो तो भी जो बेसमय मुझपर इतना स्नेह दिखा रहे हो, इसका यह स्वार्थ ही कारण है; अतः मैं भी अपने स्वार्थसे विचलित नहीं हो सकता । संधि और विग्रहके विषयमें मेरा विचार सुनिश्चित है ॥ १५ ९ ॥
अभ्राणामिव रूपाणि विकुर्वन्ति क्षणे क्षणे ।
अद्यैव हि रिपुर्भूत्वा पुनरद्यैव मे सुहृत् ॥ १६० ॥
पुनश्च रिपुरद्यैव युक्तीनां पश्य चापलम् । ‘ मित्रता और शत्रुताके रूप तो बादलोंके समान क्षण- क्षणमें बदलते रहते हैं । आज ही तुम मेरे शत्रु होकर फिर आज ही मेरे मित्र हो सकते हो और उसके बाद आज ही पुनः शत्रु भी बन सकते हो । देखो, यह स्वार्थका सम्बन्ध कितना चंचल है? ॥ १६०३ ॥
आसीन्मैत्री तु तावन्नौ यावद्धेतुरभूत् पुरा ॥ १६१ ॥
सागता सह तेनैव कालयुक्तेन हेतुना । ' पहले जब उपयुक्त कारण था, तब हम दोनोंमें मैत्री हो गयी थी, किंतु कालने जिसे उपस्थित कर दिया था उस कारणके निवृत्त होनेके साथ ही वह मैत्री भी चली गयी ॥ १६१ ॥ त्वं हि मे जातितः शत्रुः सामर्थ्यान्मित्रतां गतः ॥ १६२ ॥
तत् कृत्यमभिनिर्वर्त्य प्रकृतिः शत्रुतां गता । ' तुम जातिसे ही मेरे शत्रु हो, किंतु विशेष प्रयोजनसे मित्र बन गये थे । वह प्रयोजन सिद्ध कर लेनेके पश्चात् तुम्हारी प्रकृति फिर सहज शत्रुभावको प्राप्त हो गयी ॥ १६२३ ॥
सोऽहमेवं प्रणीतानि ज्ञात्वा शास्त्राणि तत्त्वतः ॥ १६३ ॥
प्रविशेयं कथं पाशं त्वत्कृते तद् वदस्व मे । ' मैं इस प्रकार शुक्र आदि आचार्योंके बनाये हुए नीतिशास्त्रकी बातोंको ठीक- ठीक जानकर भी तुम्हारे लिये उस जालके भीतर कैसे प्रवेश कर सकता था? यह तुम्हीं मुझे बताओ ॥ १६३३ ॥
त्वद्वीर्येण प्रमुक्तोऽहं मद्वीर्येण तथा भवान् ॥ १६४ ॥
अन्योन्यानुग्रहे वृत्ते नास्ति भूयः समागमः ।
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‘ तुम्हारे पराक्रमसे मैं प्राण- संकटसे मुक्त हुआ और मेरी शक्तिसे तुम । जब एक दूसरेपर अनुग्रह करनेका काम पूरा हो गया, तब फिर हमें परस्पर मिलनेकी आवश्यकता नहीं ॥ १६४३ ॥
त्वं हि सौम्य कृतार्थोऽद्य निर्वृत्तार्थास्तथा वयम् ॥ १६५ ॥
न तेऽस्त्यद्य मया कृत्यं किंचिदन्यत्र भक्षणात् । ' सौम्य! अब तुम्हारा काम बन गया और मेरा प्रयोजन भी सिद्ध हो गया; अतः अब मुझे खा लेनेके सिवा मेरे द्वारा तुम्हारा दूसरा कोई प्रयोजन सिद्ध होनेवाला नहीं है ॥ १६५ ॥ अहमन्नं भवान् भोक्ता दुर्बलोऽहं भवान् बली ॥ १६६ ॥
नावयोर्विद्यते संधिर्वियुक्ते विषमे बले । ' मैं अन्न हूँ और तुम मुझे खानेवाले हो । मैं दुर्बल हूँ और तुम बलवान् हो । इस प्रकार मेरे और तुम्हारे बलमें कोई समानता नहीं है । दोनोंमें बहुत अन्तर है । अतः हम दोनोंमें संधि नहीं हो सकती ॥ १६६३ ॥
स मन्येऽहं तव प्रज्ञां यन्मोक्षात् प्रत्यनन्तरम् ॥ १६७ ॥
भक्ष्यं मृगयसे नूनं सुखोपायेन कर्मणा । ' मैं तुम्हारा विचार जान गया हूँ, निश्चय ही तुम जालसे छूटनेके बादसे ही सहज उपाय तथा प्रयत्नद्वारा आहार ढूँढ़ रहे हो ॥ १६७३ ॥
भक्ष्यार्थं ह्यवबद्धस्त्वं स मुक्तः पीडितः क्षुधा ॥ १६८ ॥
शास्त्रजां मतिमास्थाय नूनं भक्षयिताद्य माम् ।
जानामि क्षुधितं तु त्वामाहारसमयश्च ते ॥ १६ ९ ॥
स त्वं मामभिसंधाय भक्ष्यं मृगयसे पुनः । ' आहारकी खोजके लिये ही निकलनेपर तुम इस जालमें फँसे थे और अब इससे छूटकर भूखसे पीड़ित हो रहे हो । निश्चय ही शास्त्रीय बुद्धिका सहारा लेकर अब तुम मुझे खा जाओगे । मैं जानता हूँ कि तुम भूखे हो और यह तुम्हारे भोजनका समय है; अतः तुम पुनः मुझसे संधि करके अपने लिये भोजनकी तलाश करते हो ॥ १६८-१६९ ३ ॥ त्वं चापि पुत्रदारस्थो यत् संधिं सृजसे मयि ॥ १७० ॥
शुश्रूषां यतसे कर्तुं सखे मम न तत् क्षमम् । ‘ सखे! तुम जो बाल-बच्चोंके बीचमें बैठकर मुझपर संधिका भाव दिखा रहे हो तथा मेरी सेवा करनेका यत्न करते हो, वह सब मेरे योग्य नहीं है ॥ १७०३ ॥
त्वया मां सहितं दृष्ट्वा प्रिया भार्या सुताश्च ते ॥ १७१ ॥
कस्मात् ते मां न खादेयुर्हृष्टाः प्रणयिनस्त्वयि ।
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' तुम्हारे साथ मुझे देखकर तुम्हारी प्यारी पत्नी और पुत्र जो तुमसे बड़ा प्रेम रखते हैं, हर्षसे उल्लसित हो मुझे कैसे नहीं खा जायँगे? ॥ १७१३ ॥
नाहं त्वया समेष्यामि वृत्तो हेतुः समागमे ॥ १७२ ॥
शिवं ध्यायस्व मे स्वस्थः सुकृतं स्मरसे यदि । ‘ अब मैं तुमसे नहीं मिलूँगा । हम दोनोंके मिलनका जो उद्देश्य था, वह पूरा हो गया । यदि तुम्हें मेरे शुभ कर्म ( उपकार ) का स्मरण है तो स्वयं स्वस्थ रहकर मेरे भी कल्याणका चिन्तन करो ॥ १७२३ ॥
शत्रोरनार्यभूतस्य क्लिष्टस्य क्षुधितस्य च ॥। १७३ ॥ भक्ष्यं मृगयमाणस्य कः प्राज्ञो विषयं व्रजेत् । 'जो अपना शत्रु हो, दुष्ट हो, कष्टमें पड़ा हुआ हो, भूखा हो और अपने लिये भोजनकी तलाश कर रहा हो, उसके सामने कोई भी बुद्धिमान् ( जो उसका भोज्य है ) ' कैसे जा सकता है ॥ १७३३ ॥
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि दूरादपि तवोद्विजे ॥ १७४ ॥
विश्वस्तं वा प्रमत्तं वा एतदेव कृतं भवेत् ।
बलवत्संनिकर्षो हि न कदाचित् प्रशस्यते ॥ १७५ ॥
' तुम्हारा कल्याण हो । अब मैं चला जाऊँगा । मुझे दूरसे भी तुमसे डर लगता है । मेरा
यह पलायन विश्वासपूर्वक हो रहा हो या प्रमादके कारण; इस समय यही मेरा कर्तव्य है ।
बलवानोंके निकट रहना दुर्बल प्राणीके लिये कभी अच्छा नहीं माना जाता ॥
नाहं त्वया समेष्यामि निवृत्तो भव लोमश ।
यदि त्वं सुकृतं वेत्सि तत् सख्यमनुसारय ॥ १७६ ॥
‘ लोमश! अब मैं तुमसे कभी नहीं मिलूँगा । तुम लौट जाओ । यदि तुम समझते हो कि मैनें तुम्हारा कोई उपकार किया है तो तुम मेरे प्रति सदा मैत्रीभाव बनाये रखना ॥ १७६ ॥
प्रशान्तादपि मे पापाद् भेतव्यं बलिनः सदा ।
यदि स्वार्थं न ते कार्यं ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १७७ ॥
‘ जो बलवान् और पापी हो, वह शान्तभावसे रहता हो तो भी मुझे सदा उससे डरना चाहिये । यदि तुम्हें मुझसे कोई स्वार्थ सिद्ध नहीं करना है तो बताओ मैं तुम्हारा ( इसके अतिरिक्त ) कौन - सा कार्य करूँ? ॥
कामं सर्वं प्रदास्यामि न त्वाऽऽत्मानं कदाचन ।
आत्मार्थे संततिस्त्याज्या राज्यं रत्नं धनानि च ॥ १७८ ॥
अपि सर्वस्वमुत्सृज्य रक्षेदात्मानमात्मना । 'मैं तुम्हें इच्छानुसार सब कुछ दे सकता हूँ; परंतु अपने आपको कभी नहीं दूँगा । अपनी रक्षा करनेके लिये तो संतति, राज्य, रत्न और धन – सबका त्याग किया जा सकता है । अपना सर्वस्व त्यागकर भी स्वयं ही अपनी रक्षा करनी चाहिये ॥ १७८१६३ ॥
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ऐश्वर्यधनरत्नानां प्रत्यमित्रे निवर्तताम् ॥ १७९ ॥
दृष्ट्वा हि पुनरावृत्तिर्जीवतामिति नः श्रुतम् । ‘ हमने सुना है कि यदि प्राणी जीवित रहे तो वह शत्रुओं द्वारा अपने अधिकारमें किये हुए ऐश्वर्य, धन और रत्नोंको पुनः वापस ला सकता है । यह बात प्रत्यक्ष देखी भी गयी है ॥ १७ ९ ३ ॥ न त्वात्मनः सम्प्रदानं धनरत्नवदिष्यते ॥ १८० ॥
आत्मा हि सर्वदा रक्ष्यो दारैरपि धनैरपि । ‘ धन और रत्नोंकी भाँति अपने आपको शत्रुके हाथमें दे देना अभीष्ट नहीं है । धन और स्त्रीके द्वारा अर्थात् उनका त्याग करके भी सर्वदा अपनी रक्षा करनी चाहिये ॥ १८० आत्मरक्षणतन्त्राणां सुपरीक्षितकारिणाम् ॥ १८१ ॥
आपदो नोपपद्यन्ते पुरुषाणां स्वदोषजाः । ‘जो आत्मरक्षामें तत्पर हैं और भलीभाँति परीक्षापूर्वक निर्णय करके काम करते हैं, ऐसे पुरुषोंको अपने ही दोषसे उत्पन्न होनेवाली आपत्तियाँ नहीं प्राप्त होती हैं ॥ शत्रून् सम्यग् विजानन्ति दुर्बला ये बलीयसः ॥ १८२ ॥
न तेषां चाल्यते बुद्धिः शास्त्रार्थकृतनिश्चया । 'जो दुर्बल प्राणी अपने बलवान् शत्रुओंको अच्छी तरह जानते हैं, उनकी शास्त्रके अर्थज्ञानद्वारा स्थिर हुई बुद्धि कभी विचलित नहीं होती' ॥ १८२३ ॥
इत्यभिव्यक्तमेवं स पलितेनाभिभर्त्सितः ॥ १८३ ॥
मार्जारो व्रीडितो भूत्वा मूषिकं वाक्यमब्रवीत् ॥ १८४ ॥
पलितने जब इस प्रकार स्पष्टरूपसे कड़ी फटकार सुनायी, तब बिलावने लज्जित होकर पुनः उस चूहेसे इस प्रकार कहा ॥ १८३-१८४ ॥ लोमश उवाच
सत्यं शपे त्वयाहं वै मित्रद्रोहो विगर्हितः ।
तन्मन्येऽहं तव प्रज्ञां यस्त्वं मम हिते रतः ॥ १८५ ॥
लोमश बोला- भाई! मैं तुमसे सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, मित्रसे द्रोह करना तो बड़ी घृणित बात है । तुम जो सदा मेरे हितमें तत्पर रहते हो, इसे मैं तुम्हारी उत्तम बुद्धिका ही परिणाम समझता हूँ ॥ १८५ ॥
उक्तवानर्थतत्त्वेन मया सम्भिन्नदर्शनः ।
न तु मामन्यथा साधो त्वं ग्रहीतुमिहार्हसि ॥ १८६ ॥
श्रेष्ठ पुरुष! तुमने तो यथार्थरूपसे नीति- शास्त्रका सार ही बता दिया। मुझसे तुम्हारा विचार पूरा- पूरा मिलता है। मित्रवर! किंतु तुम मुझे गलत न समझो । मेरा भाव तुमसे विपरीत नहीं है ॥ १८६ ॥
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प्राणप्रदानजं त्वत्तो मयि सौहृदमागतम् ।
धर्मज्ञोऽस्मि गुणज्ञोऽस्मि कृतज्ञोऽस्मि विशेषतः ॥ १८७ ॥
मित्रेषु वत्सलश्चास्मि त्वद्भक्तश्च विशेषतः ।
तस्मादेवं पुनः साधो मय्याचरितुमर्हसि ॥ १८८ ॥
तुमने मुझे प्राणदान दिया है । इसीसे मुझपर तुम्हारे सौहार्दका प्रभाव पड़ा । मैं धर्मको जानता हूँ, गुणोंका मूल्य समझता हूँ, विशेषतः तुम्हारे प्रति कृतज्ञ हूँ, मित्रवत्सल हूँ और सबसे बड़ी बात यह है कि मैं तुम्हारा भक्त हो गया हूँ; अतः मेरे अच्छे मित्र! तुम फिर मेरे साथ ऐसा ही बर्ताव करो - मेलजोल बढ़ाकर मेरे साथ घूमो- फिरो ॥ १८७-१८८ ॥
त्वया हि वाच्यमानोऽहं जह्यां प्राणान् सबान्धवः ।
विश्रम्भो हि बुधैर्दृष्टो मद्विधेषु मनस्विषु ॥ १८९ ॥
यदि तुम कह दो तो मैं बन्धु - बान्धवोंसहित तुम्हारे लिये अपने प्राण भी त्याग दे सकता हूँ। विद्वानोंने मुझ जैसे मनस्वी पुरुषोंपर सदा विश्वास ही किया और देखा है ॥ १८ ९ ॥
तदेतद् धर्मतत्त्वज्ञ न त्वं शंकितुमर्हसि ।
अतः धर्मके तत्त्वको जाननेवाले पलित! तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये ॥ १८ ९
|| इति संस्तूयमानोऽपि माजरिण स मूषिकः ॥ १ ९० ॥ मनसा भावगम्भीरो मार्जारं वाक्यमब्रवीत् । बिलावके द्वरा इस प्रकारकी स्तुति की जानेपर भी चूहा अपने मनसे गम्भीर भाव ही धारण किये रहा । उसने मार्जारसे पुनः इस प्रकार कहा— ॥ १ ९०३ ॥ साधुर्भवान् श्रुतार्थोऽस्मि प्रीये च न च विश्वसे ॥ १ ९ १ ॥
संस्तवैर्वा धनौघैर्वा नाहं शक्यः पुनस्त्वया ।
न ह्यमित्रे वशं यान्ति प्राज्ञा निष्कारणं सखे ॥ १ ९ २ ॥
' भैया! तुम वास्तवमें बड़े साधु हो । यह बात मैंने तुम्हारे विषयमें सुन रक्खी है । उससे मुझे प्रसन्नता भी है; परंतु मैं तुमपर विश्वास नहीं कर सकता । तुम मेरी कितनी ही स्तुति क्यों न करो । मेरे लिये कितनी ही धनराशि क्यों न लुटा दो; परंतु अब मैं तुम्हारे साथ मिल नहीं सकता । सखे! बुद्धिमान् एवं विद्वान् पुरुष बिना किसी विशेष कारणके अपने शत्रुके वशमें नहीं जाते ॥ १ ९१-१९ २ ॥
अस्मिन्नर्थे च गाथे द्वे निबोधोशनसा कृते ।
शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा संधिं बलीयसा ॥ १ ९ ३ ॥
समाहितश्चरेद् युक्त्या कृतार्थश्च न विश्वसेत् ।
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‘ इस विषय में शुक्राचार्यने दो गाथाएँ कही हैं । उन्हें ध्यान देकर सुनो । जब अपने और शत्रुपर एक- सी विपत्ति आयी हो, तब निर्बलको सबल शत्रुके साथ मेल करके बड़ी सावधानी और युक्तिसे अपना काम निकालना चाहिये और जब काम हो जाय, तो फिर उसे शत्रुपर विश्वास नहीं करना चाहिये ( यह पहली गाथा है ) ' ॥ १ ९ ३३ ॥ न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ॥ १ ९ ४ ॥ नित्यं विश्वासयेदन्यान् परेषां तु न विश्वसेत् । ' ( दूसरी गाथा यों हैं ) जो विश्वासपात्र न हो, उसपर विश्वास न करे तथा जो विश्वासपात्र हो, उसपर भी अधिक विश्वास न करे । अपने प्रति सदा दूसरोंका विश्वास उत्पन्न करे; किंतु स्वयं दूसरोका विश्वास न करे ॥ १ ९ ४३ ॥ तस्मात् सर्वास्ववस्थासु रक्षेज्जीवितमात्मनः ॥ १ ९ ५ ॥ द्रव्याणि संततिश्चैव सर्वं भवति जीवितः । ‘ इसलिये सभी अवस्थाओंमें अपने जीवनकी रक्षा करे; क्योंकि जीवित रहनेपर पुरुषको धन और संतान - सभी मिल जाते हैं ॥ १ ९ ५३ ॥ संक्षेपो नीतिशास्त्राणामविश्वासः परो मतः ॥ १ ९ ६ ॥ नृषु तस्मादविश्वासः पुष्कलं हितमात्मनः । ' संक्षेपमें नीतिशास्त्रका सार यह है कि किसीका भी विश्वास न करना ही उत्तम माना गया है; इसलिये दूसरे लोगोंपर विश्वास न करनेमें ही अपना विशेष हित है ॥ वध्यन्ते न ह्यविश्वस्ताः शत्रुभिर्दुर्बला अपि ॥ १ ९७ ॥ विश्वस्तास्तेषु वध्यन्ते बलवन्तोऽपि दुर्बलैः । ‘जो विश्वास न करके सावधान रहते हैं, वे दुर्बल होनेपर भी शत्रुओंद्वारा मारे नहीं जाते । परंतु जो उनपर विश्वास करते हैं, वे बलवान् होनेपर भी दुर्बल शत्रुओंद्वारा मार डाले जाते हैं ॥ १ ९ ७ ॥ त्वद्विधेभ्यो मया ह्यात्मा रक्ष्यो मार्जार सर्वदा ॥ १ ९ ८ ॥ रक्ष त्वमपि चात्मानं चाण्डालाज्जातिकिल्बिषात् । ‘ बिलाव! तुम जैसे लोगोंसे मुझे सदा अपनी रक्षा करनी चाहिये और तुम भी अपने जन्मजात शत्रु चाण्डालसे अपनेको बचाये रखो ' ॥ १ ९ ८३ ॥ स तस्य ब्रुवतस्त्वेवं संत्रासाज्जातसाध्वसः ॥ १ ९९ ॥ शाखां हित्वा जवेनाशु मार्जारः प्रययौ ततः । चूहेके इस प्रकार कहते समय चाण्डालका नाम सुनते ही बिलाव बहुत डर गया और वह डाली छोड़कर बड़े वेग से तुरंत दूसरी ओर चला गया ॥ १ ९९ ३ ॥ ततः शास्त्रार्थतत्त्वज्ञो बुद्धिसामर्थ्यमात्मनः ॥ २०० ॥
विश्राव्य पलितः प्राज्ञो बिलमन्यज्जगाम ह ।
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तदनन्तर नीतिशास्त्रके अर्थ और तत्त्वको जाननेवाला बुद्धिमान् पलित अपने बौद्धिक शक्तिका परिचय दे दूसरे बिलमें चला गया ॥ २००३ ॥
एवं प्रज्ञावता बुद्धया दुर्बलेन महाबलाः ॥ २०१ ॥
एकेन बहवोऽमित्राः पलितेनाभिसंधिताः ।
अरिणापि समर्थेन संधिं कुर्वीत पण्डितः ॥ २०२ ॥
मूषिकश्च बिडालश्च मुक्तावन्योन्यसंश्रयात् । इस प्रकार दुर्बल और अकेला होनेपर भी बुद्धिमान् पलित चूहेने अपने बुद्धि - बलसे बहुतेरे प्रबल शत्रुओंको परास्त कर दिया; अतः आपत्तिके समय विद्वान् पुरुष बलवान् शत्रुके साथ भी संधि कर ले । देखो, चूहे और बिलाव दोनों एक दूसरेका आश्रय लेकर विपत्तिसे छुटकारा पा गये थे ॥ २०१-२०२३ ॥ इत्येवं क्षत्रधर्मस्य मया मार्गे निदर्शितः ॥ २०३ ॥
विस्तरेण महाराज संक्षेपमपि मे शृणु । महाराज! इस दृष्टान्तसे मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक क्षात्र - धर्मका मार्ग दिखाया है । अब संक्षेपमें कुछ मेरी बात सुनो ॥ २०३३ ॥
अन्योन्यकृतवैरौ तु चक्रतुः प्रीतिमुत्तमाम् ॥ २०४ ॥
अन्योन्यमभिसंधातुं सम्बभूव तयोर्मतिः । चूहे और बिलाव एक दूसरेसे वैर रखनेवाले प्राणी हैं तो भी उन्होंने संकटके समय एक
दूसरेसे उत्तम प्रीति कर ली। उनमें परस्पर संधि कर लेनेका विचार पैदा हो गया ॥ २०४३
|| तत्र प्राज्ञोऽभिसंधत्ते सम्यग् बुद्धिसमाश्रयात् ॥ २०५ ॥
अभिसंधीयते प्राज्ञः प्रमादादपि वा बुधैः । ऐसे अवसरोंपर बुद्धिमान् पुरुष उत्तम बुद्धिका आश्रय ले संधि करके शत्रुको परास्त कर देता है । इसी तरह विद्वान् पुरुष भी यदि असावधान रहे तो उसे दूसरे बुद्धिमान् पुरुष परास्त कर देते हैं ॥ २०५३ ॥
तस्मादभीतवद् भीतो विश्वस्तवदविश्वसन् ॥ २०६ ॥
न ह्यप्रमत्तश्चलति चलितो वा विनश्यति । इसलिये मनुष्य भयभीत होकर भी निडरके समान और किसीपर विश्वास न करते हुए भी विश्वास करनेवालेके समान बर्ताव करे, उसे कभी असावधान होकर नहीं चलना चाहिये । यदि चलता है तो नष्ट हो जाता है ॥ २०६३ ॥
कालेन रिपुणा संधिः काले मित्रेण विग्रहः ॥ २०७ ॥
कार्य इत्येव संधिज्ञाः प्राहुर्नित्यं नराधिप ।
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नरेश्वर! समयानुसार शत्रुके साथ भी संधि और मित्रके साथ भी युद्ध करना उचित है ।
संधिके तत्त्वको जाननेवाले विद्वान् पुरुष इसी बातको सदा कहते हैं ॥ २०७३ ॥
एतज्ज्ञात्वा महाराज शास्त्रार्थमभिगम्य च ॥ २०८ ॥
अभियुक्तोऽप्रमत्तश्च प्राग्भयाद् भीतवच्चरेत् । महाराज! ऐसा जानकर नीतिशास्त्रके तात्पर्यको हृदयंगम करके उद्योगशील एवं सावधान रहकर भय आनेसे पहले भयभीतके समान आचरण करना चाहिये ॥ भीतवत् संनिधिः कार्यः प्रतिसंधिस्तथैव च ॥ २० ९ ॥ भयादुत्पद्यते बुद्धिरप्रमत्ताभियोगजा । बलवान् शत्रुके समीप डरे हुए के समान उपस्थित होना चाहिये । उसी तरह उसके साथ संधि भी कर लेनी चाहिये । सावधान पुरुषके उद्योगशील बने रहनेसे स्वयं ही संकटसे बचानेवाली बुद्धि उत्पन्न होती है ॥ २० ९ ३ ॥ न भयं विद्यते राजन् भीतस्यानागते भये ॥ २१० ॥
अभीतस्य च विश्रम्भात् सुमहज्जायते भयम् । पुरुष भय आनेके!, राजन् जो पहलेसे ही उसकी ओरसे सशंक रहता है उसके सामनेप्रायः भयका अवसर ही नहीं आता है; परंतु जो निःशंक होकर दूसरोंपर विश्वास कर लेता है, उसे सहसा बड़े भारी भयका सामना करना पड़ता है ॥ २१०३ ॥
अभीश्चरति यो नित्यं मन्त्रोऽदेयः कथंचन ॥ २११ ॥
अविज्ञानाद्धि विज्ञातो गच्छेदास्पददर्शिषु । जो मनुष्य अपनेको बुद्धिमान् मानकर निर्भय विचरता है, उसे कभी कोई सलाह नहीं देनी चाहिये; क्योंकि वह दूसरेकी सलाह सुनता ही नहीं है । भयको न जाननेकी अपेक्षा उसे जाननेवाला ठीक है; क्योंकि वह उससे बचनेके लिये उपाय जाननेकी इच्छा से परिणामदर्शी पुरुषोंके पास जाता है ॥ २११३ ॥
तस्मादभीतवद् भीतो विश्वस्तवदविश्वसन् ॥ २१२ ॥
कार्याणां गुरुतां प्राप्य नानृतं किंचिदाचरेत् । इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको डरते हुए भी निर्भयके समान रहना चाहिये तथा भीतरसे विश्वास न करते हुए भी ऊपरसे विश्वासी पुरुषकी भाँति बर्ताव करना चाहिये । कार्योंकी कठिनता देखकर कभी कोई मिथ्या आचरण नहीं करना चाहिये ॥ २१२३ ॥
एवमेतन्मया प्रोक्तमितिहासं युधिष्ठिर ॥ २१३ ॥
श्रुत्वा त्वं सुहृदां मध्ये यथावत् समुपाचर । युधिष्ठिर! इस प्रकार यह मैंने तुम्हारे सामने नीतिकी बात बतानेके लिये चूहे तथा बिलावके इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया है । इसे सुनकर तुम अपने सुहृदोंके बीचमें यथायोग्य बर्ताव करो ॥ २१३ ॥
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उपलभ्य मतिं चाग्ग्रामरिमित्रान्तरं तथा ॥ २१४ ॥
संधिविग्रहकालौ च मोक्षोपायस्तथैव च । श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर शत्रु और मित्रके भेद, संधि और विग्रह के अवसरका तथा विपत्तिसे छूटनेके उपायका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ २१४३ ॥
शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा संधिं बलीयसा ॥ २१५ ॥
समागतश्चरेद् युक्त्या कृतार्थो न च विश्वसेत् । अपने और शत्रुके प्रयोजन यदि समान हों तो बलवान् शत्रुके साथ संधि करके उससे मिलकर युक्तिपूर्वक अपना काम बनावे और कार्य पूरा हो जानेपर फिर कभी उसका विश्वास न करे ॥ २१५ ॥
अविरुद्धां त्रिवर्गेण नीतिमेतां महीपते ॥ २१६ ॥
अभ्युत्तिष्ठ श्रुतादस्माद् भूयः संरक्षयन् प्रजाः । पृथ्वीनाथ! यह नीति धर्म, अर्थ और कामके अनुकूल है । तुम इसका आश्रय लो । मुझसे सुने हुए इस उपदेशके अनुसार कर्तव्यपालनमें तत्पर हो सम्पूर्ण प्रजाकी रक्षा करते हुए अपनी उन्नतिके लिये उठकर खड़े हो जाओ ॥ ब्राह्मणैश्चापि ते सार्धं यात्रा भवतु पाण्डव ॥ २१७ ॥
ब्राह्मणा वै परं श्रेयो दिवि चेह च भारत । पाण्डुनन्दन! तुम्हारी जीवनयात्रा ब्राह्मणोंके साथ होनी चाहिये । भरतनन्दन! ब्राह्मणलोग इहलोक और परलोकमें भी परम कल्याणकारी होते हैं ॥ २१७ ॥
एते धर्मस्य वेत्तारः कृतज्ञाः सततं प्रभो ॥ २१८ ॥
पूजिताः शुभकर्तारः पूजयेत् तान् नराधिप । प्रभो! नरेश्वर! ये ब्राह्मण धर्मज्ञ होनेके साथ ही सदा कृतज्ञ होते हैं । सम्मानित होनेपर शुभकारक एवं शुभचिन्तक होते हैं; अतः इनका सदा आदर-सम्मान करना चाहिये ॥ २१८ ३ ॥ राज्यं श्रेयः परं राजन् यशः कीर्तिं च लप्स्यसे ॥ २१ ९ ॥ कुलस्य संततिं चैव यथान्यायं यथाक्रमम् ॥ २२० ॥
राजन्! तुम ब्राह्मणोंके यथोचित सत्कारसे क्रमशः राज्य, परम कल्याण, यश, कीर्ति तथा वंशपरम्पराको बनाये रखनेवाली संतति सब कुछ प्राप्त कर लोगे ॥ द्वयोरिमं भारत संधिविग्रहं सुभाषितं बुद्धिविशेषकारकम् । यथा त्ववेक्ष्य क्षितिपेन सर्वदा निषेवितव्यं नृप शत्रुमण्डले ॥ २२१ ॥
भरतनन्दन! नरेश्वर! चूहे और बिलावका जो यह सुन्दर उपाख्यान कहा गया है, यह संधि और विग्रहका ज्ञान तथा विशेष बुद्धि उत्पन्न करनेवाला है । भूपालको सदा इसीके
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अनुसार दृष्टि रखकर शत्रुमण्डलके साथ यथोचित व्यवहार करना चाहिये ॥ २२१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि मार्जारमूषिकसंवादे अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें चूहे और बिलावका संवादविषयक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १३८ ॥