श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1041–1050
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1041–1050
पृष्ठ 1041
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
स चान्नाज्जायते तस्मात् सूक्ष्म एष व्यतिक्रमः ॥ १३ ॥
प्रभाव और शक्तिसे सम्पन्न विद्वान् ब्राह्मण यदि अन्न भोजन करता है तो वह पुनः अन्नका उत्पादन करता है, किंतु वह स्वयं अन्नसे उत्पन्न होता है, इसलिये यह व्यतिक्रम सूक्ष्म ( दुर्विज्ञेय ) है अर्थात् यद्यपि वृष्टिसे अन्नकी और अन्नसे प्रजाकी उत्पत्ति होती है; किंतु यह प्रजा ( विद्वान् ब्राह्मण ) से अन्नकी उत्पत्तिका विषय दुर्विज्ञेय है ॥ १३ ॥
यदेव ददतः पुण्यं तदेव प्रतिगृह्णतः ।
न ह्येकचक्रं वर्तेत इत्येवमृषयो विदुः ॥ १४ ॥
‘ दान देनेवालेको जो पुण्य होता है, वही दान लेनेवालेको भी ( यदि वह योग्य अधिकारी है तो ) होता है । ( क्योंकि दोनों एक दूसरेके उपकारक होते हैं) एक पहियेसे गाड़ी नहीं चलती — प्रतिग्रहीताके बिना दाताका दान सफल नहीं हो सकता । ' ऐसी ऋषियोंकी मान्यता है ॥
यत्र वै ब्राह्मणाः सन्ति श्रुतवृत्तोपसंहिताः ।
तत्र दानफलं पुण्यमिह चामुत्र चाश्नुते ॥ १५ ॥
जहाँ विद्वान् और सदाचारी ब्राह्मण रहते हैं, वहीं दिये हुए दानका फल इहलोक और परलोकमें मनुष्य भोगता है ॥ १५ ॥
योनिशुद्धाः सततं तपस्यभिरता भृशम् दानाध्ययनसम्पन्नास्ते वै पूज्यतमाः सदा ॥ १६ ॥
जो ब्राह्मण विशुद्ध कुलमें उत्पन्न, निरन्तर तपस्यामें संलग्न रहनेवाले, बहुत दानपरायण तथा अध्ययनसम्पन्न हैं, वे ही सदा पूज्य माने गये हैं ॥ १६ ॥
तैर्हि सद्भिः कृतः पन्थास्तेन यातो न मुह्यते ।
ते हि स्वर्गस्य नेतारो यज्ञवाहाः सनातनाः ॥ १७ ॥
ऐसे सत्पुरुषोंने जिस मार्गका निर्माण किया है, उससे चलनेवालेको कभी मोह नहीं होता; क्योंकि वे मनुष्योंको स्वर्गलोकमें ले जानेवाले तथा सनातन यज्ञनिर्वाहक हैं ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मैत्रेयभिक्षायामेकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मैत्रेयकी भिक्षाविषयक एक सौ इक्कीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥
पृष्ठ 1042
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः व्यास - मैत्रेय - संवाद - तपकी प्रशंसा तथा गृहस्थके उत्तम कर्तव्यका निर्देश भीष्म उवाच
एवमुक्तः स भगवान् मैत्रेयं प्रत्यभाषत ।
दिष्ट्यैवं त्वं विजानासि दिष्ट्या ते बुद्धिरीदृशी ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! मैत्रेयके इस प्रकार कहनेपर भगवान् वेदव्यास उनसे इस प्रकार बोले — ‘ब्रह्मन्! तुम बड़े सौभाग्यशाली हो, जो ऐसी बातोंका ज्ञान रखते हो । भाग्यसे ही तुमको ऐसी बुद्धि प्राप्त हुई है ॥ १ ॥
लोको ह्यार्यगुणानेव भूयिष्ठं तु प्रशंसति ।
रूपमानवयोमानश्रीमानाश्चाप्यसंशयम् ॥ २ ॥
दिष्ट्या नाभिभवन्ति त्वां दैवस्तेऽयमनुग्रहः । ' संसारके लोग उत्तम गुणवाले पुरुषकी ही अधिक प्रशंसा करते हैं । सौभाग्यकी बात है कि रूप, अवस्था और सम्पत्तिके अभिमान तुम्हारे ऊपर प्रभाव नहीं डालते हैं । यह तुमपर
देवताओंका महान् अनुग्रह है । इसमें संशय नहीं है ॥ २३
यत् ते भृशतरं दानाद् वर्तयिष्यामि तच्छृणु ॥ ३ ॥
यानीहागमशास्त्राणि याश्च काश्चित् प्रवृत्तयः ।
तानि वेदं पुरस्कृत्य प्रवृत्तानि यथाक्रमम् ॥ ४ ॥
' अस्तु, अब मैं दानसे भी उत्तम धर्मका तुमसे वर्णन करता हूँ, सुनो । इस जगत्में जितने शास्त्र और जो कोई भी प्रवृतियाँ हैं, वे सब वेदको ही सामने रखकर क्रमशः प्रचलित हुए हैं ॥ ३-४ ॥
अहं दानं प्रशंसामि भवानपि तपःश्रुते ।
तपः पवित्रं वेदस्य तपः स्वर्गस्य साधनम् ॥ ५ ॥
' मैं दानकी प्रशंसा करता हूँ, तुम भी तपस्या और शास्त्रज्ञानकी प्रशंसा करते हो, वास्तवमें तपस्या पवित्र और वेदाध्ययन एवं स्वर्गका उत्तम साधन है ॥ ५ ॥
तपसा महदाप्नोति विद्यया चेति नः श्रुतम् ।
तपसैव चापनुदेद् यच्चान्यदपि दुष्कृतम् ॥ ६ ॥
' मैंने सुना है कि तपस्या और विद्या दोनोंसे ही मनुष्य महान् पदको प्राप्त करता है । अन्यान्य जो पाप हैं, उन्हें भी तपस्यासे ही वह दूर कर सकता है ॥ ६ ॥
यद् यद्धि किंचित् संधाय पुरुषस्तप्यते तपः ।
पृष्ठ 1043
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सर्वमेतदवाप्नोति विद्यया चेति नः श्रुतम् ॥ ७ ॥
'जो कोई भी उद्देश्य लेकर पुरुष तपस्यामें प्रवृत्त होता है, वह सब उसे तप और विद्यासे प्राप्त हो जाता है; यह हमारे सुननेमें आया है ॥ ७ ॥
दुरन्वयं दुष्प्रधर्षं दुरापं दुरतिक्रमम् ।
सर्वं वै तपसाभ्येति तपो हि बलवत्तरम् ॥ ८ ॥
‘ जिससे सम्बन्ध स्थापित करना अत्यन्त कठिन है, जो दुर्धर्ष, दुर्लभ और दुर्लङ्घ्य है, वह सब तपस्यासे सुलभ हो जाता है; क्योंकि तपस्याका बल सबसे बड़ा है ॥ ८ ॥
सुरापोऽसम्मतादायी भ्रूणहा गुरुतल्पगः ।
तपसा तरते सर्वमेनसश्च प्रमुच्यते ॥ ९ ॥
‘ शराबी, चोर, गर्भहत्यारा, गुरुकी शय्यापर शयन करनेवाला पापी भी तपस्याद्वारा सम्पूर्ण संसारसे पार हो जाता है और अपने पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥
सर्वविद्यस्तु चक्षुष्मानपि यादृशतादृशम् ।
तपस्विनं तथैवाहुस्ताभ्यां कार्यं सदा नमः ॥ १० ॥
'जो सब प्रकारकी विद्याओंमें प्रवीण है, वही नेत्रवान् है और तपस्वी, चाहे जैसा हो
उसे भी नेत्रवान् ही कहा जाता है । इन दोनोंको सदा नमस्कार करना चाहिये ॥
सर्वे पूज्याः श्रुतधनास्तथैव च तपस्विनः ।
दानप्रदाः सुखं प्रेत्य प्राप्नुवन्तीह च श्रियम् ॥ ११ ॥
‘ जो विद्याके धनी और तपस्वी हैं, वे सब पूजनीय हैं तथा दान देनेवाले भी इस लोकमें धन - सम्पत्ति और परलोकमें सुख पाते हैं ॥ ११ ॥
इमं च ब्रह्मलोकं च लोकं च बलवत्तरम् ।
अन्नदानैः सुकृतिनः प्रतिपद्यन्ति लौकिकाः ॥ १२ ॥
संसारके पुण्यात्मा पुरुष अन्न -दान देकर इस लोकमें भी सुखी होते हैं और मृत्युके बाद ब्रह्मलोक तथा दूसरे शक्तिशाली लोकको प्राप्त कर लेते हैं ॥
पूजिताः पूजयन्त्येते मानिता मानयन्ति च ।
स दाता यत्र यत्रैति सर्वतः सम्प्रणूयते ॥ १३ ॥
‘ दानी स्वयं पूजित और सम्मानित होकर दूसरोंका पूजन और सम्मान करते हैं । दाता जहाँ- जहाँ जाते हैं, सब ओर उनकी स्तुति की जाती है ॥ १३ ॥
अकर्ता चैव कर्ता च लभते यस्य यादृशम् ।
यदि चोर्ध्वं यद्यधो वा स्वाँल्लोकानभियास्यति ॥ १४ ॥
' मनुष्य दान करता हो या न करता हो, वह ऊपरके लोकमें रहता हो या नीचेके लोकमें, जिसे कर्मानुसार जैसा लोक प्राप्त होगा, वह अपने उसी लोकमें जायगा ॥
प्राप्स्यसि त्वन्नपानानि यानि वाञ्छसि कानिचित् ।
मेधाव्यसि कुले जातः श्रुतवाननृशंसवान् ॥ १५ ॥
पृष्ठ 1044
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कौमारचारी व्रतवान् मैत्रेय निरतो भव ।
एतद् गृहाण प्रथमं प्रशस्तं गृहमेधिनाम् ॥ १६ ॥
' मैत्रेयजी! तुम जो कुछ चाहोगे, उसके अनुसार तुमको अन्न- पानकी सामग्री प्राप्त होगी । तुम बुद्धिमान्, कुलीन, शास्त्रज्ञ और दयालु हो । तुम्हारी तरुण अवस्था है और तुम व्रतधारी हो । अतः सदा धर्म- पालनमें लगे रहो और गृहस्थोंके लिये जो सबसे उत्तम एवं मुख्य कर्तव्य है, उसे ग्रहण करो - ध्यान देकर सुनो ॥
यो भर्ता वासितातुष्टो भर्तुस्तुष्टा च वासिता ।
यस्मिन्नेवं कुले सर्वं कल्याणं तत्र वर्तते ॥ १७ ॥
‘ जिस कुलमें पति अपनी पत्नीसे और पत्नी अपने पतिसे संतुष्ट रहती हो, वहाँ सदा कल्याण होता है ॥
अद्भिर्गात्रान्मलमिव तमोऽग्निप्रभया यथा ।
दानेन तपसा चैव सर्वपापमपोहति ॥ १८ ॥
‘ जिस प्रकार जलसे शरीरका मल धुल जाता है और अग्निकी प्रभासे अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार दान और तपस्यासे मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १८ ॥
(दानेन तपसा चैव विष्णोरभ्यर्चनेन च ।
ब्राह्मणः स महाभाग तरेत् संसारसागरात् ॥
स्वकर्मशुद्धसत्त्वानां तपोभिर्निर्मलात्मनाम् ।
विद्यया गतमोहानां तारणाय हरिः स्मृतः ॥
तदर्चनपरो नित्यं तद्भक्तस्तं नमस्कुरु ।
तद्भक्ता न विनश्यन्ति ह्यष्टाक्षरपरायणाः ॥
प्रणवोपासनपराः परमार्थपरास्त्विह । एतैः पावय चात्मानं सर्वपापमपोह्य च ॥ ) ‘महाभाग! ब्राह्मण दान, तपस्या और भगवान् विष्णुकी आराधनाके द्वारा संसारसागरसे पार हो जाता है । जिन्होंने अपने वर्णोचित कर्मोंका अनुष्ठान करके अन्तःकरणको शुद्ध बना लिया है, तपस्याद्वारा जिनका चित्त निर्मल हो गया है तथा विद्याके प्रभावसे जिनका मोह दूर हो गया है, ऐसे मनुष्योंके उद्धारके लिये भगवान् श्रीहरि माने गये हैं अर्थात् उनका स्मरण करते ही वे अवश्य उद्धार करते हैं । अतः तुम भगवान् विष्णुकी आराधनामें तत्पर हो सदा उनके भक्त बने रहो और निरन्तर उन्हें नमस्कार करो । अष्टाक्षर मन्त्रके जपमें तत्पर रहनेवाले भगवद्भक्त कभी नष्ट नहीं होते । जो इस जगत्में प्रणवोपासनामें संलग्न और परमार्थ-साधनमें तत्पर हैं, ऐसे श्रेष्ठ पुरुषोंके संगसे सारा पाप दूर करके अपने आपको पवित्र करो ॥
स्वस्ति प्राप्नुहि मैत्रेय गृहान् साधु व्रजाम्यहम् ।
एतन्मनसि कर्तव्यं श्रेय एवं भविष्यति ॥ १ ९ ॥
पृष्ठ 1045
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘ मैत्रेय! तुम्हारा कल्याण हो । अब मैं सावधानीके साथ अपने आश्रमको जा रहा हूँ ।
मैंने जो कुछ बताया है, उसे याद रखना; इससे तुम्हारा कल्याण होगा' ॥ १ ९ ॥
तं प्रणम्याथ मैत्रेयः कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् स्वस्ति प्राप्नोतु भगवानित्युवाच कृताञ्जलिः ॥ २० ॥
तब मैत्रेयजीने व्यासजीको प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर कहा -' भगवन्! आप मंगल प्राप्त करें' ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मैत्रेयभिक्षायां द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मैत्रेयकी भिक्षाविषयक एक सौ बाईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १२२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर २४ श्लोक हैं )
पृष्ठ 1046
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः शाण्डिली और सुमनाका संवाद- पतिव्रता स्त्रियोंके कर्तव्यका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
सत्स्त्रीणां समुदाचारं सर्वधर्मविदां वर ।
श्रोतुमिच्छाम्यहं त्वत्तस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ पितामह! साध्वी स्त्रियोंके सदाचारका क्या
स्वरूप है? यह मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ। उसे मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सर्वज्ञां सर्वतत्त्वज्ञां देवलोके मनस्विनीम् ।
कैकेयी सुमना नाम शाण्डिलीं पर्यपृच्छत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! देवलोककी बात है - सम्पूर्ण तत्त्वोंको जाननेवाली सर्वज्ञा एवं मनस्विनी शाण्डिलीदेवीसे केकयराजकी पुत्री सुमनाने इस प्रकार प्रश्न किया- ॥ २ ॥
केन वृत्तेन कल्याणि समाचारेण केन वा ।
विधूय सर्वपापानि देवलोकं त्वमागता ॥ ३ ॥
‘ कल्याणि! तुमने किस बर्ताव अथवा किस सदाचारके प्रभावसे समस्त पापोंका नाश करके देवलोकमें पदार्पण किया है? ॥ ३ ॥
हुताशनशिखेव त्वं ज्वलमाना स्वतेजसा ।
सुता ताराधिपस्येव प्रभया दिवमागता ॥ ४ ॥
' तुम अपने तेजसे अग्निकी ज्वालाके समान प्रज्वलित हो रही हो और चन्द्रमाकी पुत्रीके समान अपनी उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित होती हुई स्वर्ग- लोकमें आयी हो ॥ ४ ॥
अरजांसि च वस्त्राणि धारयन्ती गतक्लमा ।
विमानस्था शुभा भासि सहस्रगुणमोजसा ॥ ५ ॥
निर्मल वस्त्र धारण किये थकावट और परिश्रमसे रहित होकर विमानपर बैठी हो ।
तुम्हारी मंगलमयी आकृति है, तुम अपने तेजसे सहस्रगुनी शोभा पा रही हो ॥ ५ ॥
न त्वमल्पेन तपसा दानेन नियमेन वा ।
इमं लोकमनुप्राप्ता त्वं हि तत्त्वं वदस्व मे ॥ ६ ॥
‘ थोड़ी - सी तपस्या थोड़े - से दान या छोटे - मोटे नियमोंका पालन करके तुम इस लोकमें नहीं आयी हो । अतः अपनी साधनाके सम्बन्धमें सच्ची - सच्ची बात बताओ ' ॥
पृष्ठ 1047
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
देवलोकमें पतिव्रता शाण्डिली और सुमनाकी बातचीत
पृष्ठ 1048
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इति पृष्टा सुमनया मधुरं चारुहासिनी ।
शाण्डिली निभृतं वाक्यं सुमनामिदमब्रवीत् ॥ ७ ॥
सुमनाके इस प्रकार मधुर वाणीमें पूछनेपर मनोहर मुसकानवाली शाण्डिलीने उससे नम्रतापूर्ण शब्दोंमें इस प्रकार कहा— ॥ ७ ॥
नाहं काषायवसना नापि वल्कलधारिणी ।
न च मुण्डा च जटिला भूत्वा देवत्वमागता ॥ ८ ॥
‘ देवि! मैंने गेरुआ वस्त्र नहीं धारण किया, वल्कलवस्त्र नहीं पहना, मूँड़ नहीं मुड़ाया
और बड़ी - बड़ी जटाएँ नहीं रखायीं । वह सब करके मैं देवलोकमें नहीं आयी हूँ ॥ ८ ॥
अहितानि च वाक्यानि सर्वाणि परुषाणि च ।
अप्रमत्ता च भर्तारं कदाचिन्नाहमब्रुवम् ॥ ९ ॥
‘ मैंने सदा सावधान रहकर अपने पतिदेवके प्रति मुँहसे कभी अहितकर और कठोर वचन नहीं निकाले हैं ॥ ९ ॥
देवतानां पितॄणां च ब्राह्मणानां च पूजने ।
अप्रमत्ता सदा युक्ता श्वश्रूश्वशुरवर्तिनी ॥ १० ॥
‘ मैं सदा सास - ससुरकी आज्ञामें रहती और देवता, पितर तथा ब्राह्मणोंकी पूजामें सदा सावधान होकर संलग्न रहती थी ॥ १० ॥
पैशुन्ये न प्रवर्तामि न ममैतन्मनोगतम् ।
अद्वारि न च तिष्ठामि चिरं न कथयामि च ॥ ११ ॥
‘ किसीकी चुगली नहीं खाती थी। चुगली करना मेरे मनको बिलकुल नहीं भाता था । मैं घरका दरवाजा छोड़कर अन्यत्र नहीं खड़ी होती और देरतक किसीसे बात नहीं करती थी ॥ ११ ॥
असद् वा हसितं किंचिदहितं वापि कर्मणा ।
रहस्यमरहस्यं वा न प्रवर्तामि सर्वथा ॥ १२ ॥
' मैंने कभी एकान्तमें या सबके सामने किसीके साथ अश्लील परिहास नहीं किया तथा मेरी किसी क्रियाद्वारा किसीका अहित भी नहीं हुआ । मैं ऐसे कार्योंमें कभी प्रवृत्त नहीं होती थी ॥ १२ ॥
कार्यार्थे निर्गतं चापि भर्तारं गृहमागतम् ।
आसनेनोपसंयोज्य पूजयामि समाहिता ॥ १३ ॥
‘ यदि मेरे स्वामी किसी कार्यसे बाहर जाकर फिर घरको लौटते तो मैं उठकर उन्हें बैठनेके लिये आसन देती और एकाग्रचित्त हो उनकी पूजा करती थी ॥ १३ ॥
यदन्नं नाभिजानाति यद् भोज्यं नाभिनन्दति ।
भक्ष्यं वा यदि वा लेह्यं तत्सर्वं वर्जयाम्यहम् ॥ १४ ॥
पृष्ठ 1049
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' मेरे स्वामी जिस अन्नको ग्रहण करने योग्य नहीं समझते थे तथा जिस भक्ष्य, भोज्य या लेह्य आदिको वे नहीं पसंद करते थे, उन सबको मैं भी त्याग देती थी ॥ १४ ॥
कुटुम्बार्थे समानीतं यत्किंचित् कार्यमेव तु ।
प्रातरुत्थाय तत्सर्वं कारयामि करोमि च ॥ १५ ॥
' सारे कुटुम्बके लिये जो कुछ कार्य आ पड़ता, वह सब मैं सबेरे ही उठकर कर- करा लेती थी ॥ १५ ॥
( अग्निसंरक्षणपरा गृहशुद्धिं च कारये ।
कुमारान् पालये नित्यं कुमारीं परिशिक्षये ॥
आत्मप्रियाणि हित्वापि गर्भसंरक्षणे रता ।
बालानां वर्जये नित्यं शापं कोपं प्रतापनम् ॥
अविक्षिप्तानि धान्यानि नान्नविक्षेपणं गृहे ।
रत्नवत् स्पृहये गेहे गावः सयवसोदकाः ॥
समुद्गम्य च शुद्धाहं भिक्षां दद्यां द्विजातिषु । ) ' मैं अग्निहोत्रकी रक्षा करती और घरको लीप-पोतकर शुद्ध रखती थी । बच्चोंका प्रतिदिन पालन करती और कन्याओंको नारीधर्मकी शिक्षा देती थी। अपनेको प्रिय लगनेवाली खाद्य वस्तुएँ त्यागकर भी गर्भकी रक्षामें ही सदा संलग्न रहती थी । बच्चोंको शाप ( गाली ) देना, उनपर क्रोध करना अथवा उन्हें सताना आदि मैं सदाके लिये त्याग चुकी थी । मेरे घरमें कभी अनाज छीटे नहीं जाते थे । किसी भी अन्नको बिखेरा नहीं जाता था । मैं अपने घरमें गौओंको घास- भूसा खिलाकर, पानी पिलाकर तृप्त करती थी और रत्नकी भाँति उन्हें सुरक्षित रखनेकी इच्छा करती थी तथा शुद्ध अवस्थामें मैं आगे बढ़कर ब्राह्मणोंको भिक्षा देती थी ।
प्रवासं यदि मे याति भर्ता कार्येण केनचित् ।
मंगलैर्बहुभिर्युक्ता भवामि नियता तदा ॥ १६ ॥
यदि मेरे पति किसी आवश्यक कार्यवश कभी परदेश जाते तो मैं नियमसे रहकर उनके कल्याणके लिये नाना प्रकारके मांगलिक कार्य किया करती थी ॥
अञ्जनं रोचनां चैव स्नानं माल्यानुलेपनम् ।
प्रसाधनं च निष्क्रान्ते नाभिनन्दामि भर्तरि ॥ १७ ॥
' स्वामीके बाहर चले जानेपर मैं आँखोंमें आँजन लगाना, ललाटमें गोरोचनका तिलक करना, तैलाभ्यंगपूर्वक स्नान करना, फूलोंकी माला पहनना, अंगोंमें अंगराग लगाना तथा शृंगार करना पसंद नहीं करती थी ॥ १७ ॥
नोत्थापयामि भर्तारं सुखसुप्तमहं सदा ।
आन्तरेष्वपि कार्येषु तेन तुष्यति मे मनः ॥ १८ ॥
पृष्ठ 1050
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘जब स्वामी सुखपूर्वक सो जाते उस समय आवश्यक कार्य आ जानेपर भी मैं उन्हें कभी नहीं जगाती थी । इससे मेरे मनको विशेष संतोष प्राप्त होता था ॥
नायासयामि भर्तारं कुटुम्बार्थेऽपि सर्वदा ।
गुप्तगुह्या सदा चास्मि सुसम्मृष्टनिवेशना ॥ १ ९ ॥
‘ परिवारके पालन - पोषणके कार्यके लिये भी मैं उन्हें कभी नहीं तंग करती थी । घरकी गुप्त बातोंको सदा छिपाये रखती और घर- आँगनको सदा झाड़ -बुहारकर साफ रखती थी ॥ १ ९ ॥
इमं धर्मपथं नारी पालयन्ती समाहिता ।
अरुन्धतीव नारीणां स्वर्गलोके महीयते ॥ २० ॥
' जो स्त्री सदा सावधान रहकर इस धर्ममार्गका पालन करती है, वह नारियोंमें अरुन्धतीके समान आदरणीय होती है और स्वर्गलोकमें भी उसकी विशेष प्रतिष्ठा होती है ' ॥ २० ॥
भीष्म उवाच
एतदाख्याय सा देवी सुमनायै तपस्विनी ।
पतिधर्मं महाभागा जगामादर्शनं तदा ॥ २१ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! सुमनाको इस प्रकार पातिव्रत्य धर्मका उपदेश देकर तपस्विनी महाभागा शाण्डिली देवी तत्काल वहाँ अदृश्य हो गयीं ॥ २१ ॥
यश्चेदं पाण्डवाख्यानं पठेत् पर्वणि पर्वणि ।
स देवलोकं सम्प्राप्य नन्दने स सुखी वसेत् ॥ २२ ॥
पाण्डुनन्दन! जो प्रत्येक पर्वके दिन इस आख्यानका पाठ करता है, वह देवलोकमें पहुँचकर नन्दनवनमें सुखपूर्वक निवास करता है ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शाण्डिलीसुमनासंवादे त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शाण्डिली और सुमनाका संवादविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२३ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल २५३ श्लोक हैं) FUEL FUTLO