06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1071–1080
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1071–1080
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' देवराज! मनुष्य मोहवश जो तिर्यग्योनिमें पड़े हुए प्राणियों, मृग, पक्षी और भेड़ आदिको तथा कीड़ों, चींटे - चींटियों एवं सर्पोंकी हिंसा करते हैं, इससे वे बहुत- सा पाप बटोर लेते हैं । उनके लिये इन पापोंसे छूटनेका क्या उपाय है? ' ॥ ४६ ॥
ततो देवगणाः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः ॥ ४७ ॥
पितरश्च महाभागाः पूजयन्ति स्म तं मुनिम् । उनका यह प्रश्न सुनकर सम्पूर्ण देवता, तपोधन ऋषि तथा महाभाग पितर विद्युत्प्रभ मुनिकी भूरि- भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ४७३ ॥
शक्र उवाच कुरुक्षेत्रं गयां गङ्गां प्रभासं पुष्कराणि च ॥ ४८ ॥
एतानि मनसा ध्यात्वा अवगाहेत् ततो जलम् ।
तथा मुच्यति पापेन राहुणा चन्द्रमा यथा ॥ ४ ९ ॥
इन्द्र बोले- मुने! मनुष्यको चाहिये कि कुरुक्षेत्र, गया, गंगा, प्रभास और पुष्करक्षेत्रका मन- ही- मन चिन्तन करके जलमें स्नान करे । ऐसा करनेसे वह पापसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा राहुके ग्रहणसे ॥
त्र्यहं स्नातः स भवति निराहारश्च वर्तते ।
स्पृशते यो गवां पृष्ठं बालधिं च नमस्यति ॥ ५० ॥
जो मनुष्य गायकी पीठ छूता और उसकी पूँछको नमस्कार करता है, वह मानो उपर्युक्त तीर्थोंमें तीन दिनतक उपवासपूर्वक रहकर स्नान कर लेता है ॥
ततो विद्युत्प्रभो वाक्यमभ्यभाषत वासवम् ।
अयं सूक्ष्मतरो धर्मस्तं निबोध शतक्रतो ॥ ५१ ॥
तदनन्तर विद्युत्प्रभने इन्द्रसे कहा– ' शतक्रतो! यह सूक्ष्मतर धर्म मैं बता रहा हूँ । इसे ध्यानपूर्वक सुनिये ॥
घृष्टो वटकषायेण अनुलिप्तः प्रियंगुणा ।
क्षीरेण षष्टिकान् भुक्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५२ ॥
‘ बरगदकी जटासे अपने शरीरको रगड़े, राईका उबटन लगाये और दूधके साथ साठीके चावलोंकी खीर बनाकर भोजन करे तो मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥
श्रूयतां चापरं गुह्यं रहस्यमृषिचिन्तितम् ।
श्रुतं मे भाषमाणस्य स्थाणोः स्थाने बृहस्पतेः ॥ ५३ ॥
रुद्रेण सह देवेश तन्निबोध शचीपते । 'एक दूसरा गूढ़ रहस्य, जिसका ऋषियोंने चिन्तन किया है, सुनिये | इसे मैंने भगवान्
शंकरके स्थानमें भाषण करते हुए बृहस्पतिजीके मुखसे भगवान् रुद्रके साथ ही सुना था ।
देवेश! शचीपते! उसे ध्यानपूर्वक सुनिये ॥
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पर्वतारोहणं कृत्वा एकपादो विभावसुम् ॥ ५४ ॥
निरीक्षेत निराहार ऊर्ध्वबाहुः कृताञ्जलिः ।
तपसा महता युक्त उपवासफलं लभेत् ॥ ५५ ॥
‘ जो पर्वतपर चढ़कर भोजनसे पूर्व एक पैरसे खड़ा हो दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये हाथ जोड़े वहाँ अग्निदेवकी ओर देखता है, वह महान् तपस्यासे युक्त होकर उपवास करनेका फल पाता है ॥ ५४-५५ ॥
रश्मिभिस्तापितोऽर्कस्य सर्वपापमपोहति ।
ग्रीष्मकालेऽथ वा शीते एवं पापमपोहति ॥ ५६ ॥
ततः पापात् प्रमुक्तस्य द्युतिर्भवति शाश्वती ।
तेजसा सूर्यवद् दीप्तो भ्राजते सोमवत् पुनः ॥ ५७ ॥
'जो ग्रीष्म अथवा शीतकालमें सूर्यकी किरणोंसे तापित होता है, वह अपने सारे पापोंको नाश कर देता है । इस प्रकार मनुष्य पापमुक्त हो जाता है । पापसे मुक्त हुए पुरुषको सनातन कान्ति प्राप्त होती है । वह अपने तेजसे सूर्यके समान देदीप्यमान और चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है ' ॥ ५६-५७ ॥
मध्ये त्रिदशवर्गस्य देवराजः शतक्रतुः ।
उवाच मधुरं वाक्यं बृहस्पतिमनुत्तमम् ॥ ५८ ॥
तत्पश्चात् देवराज शतक्रतु इन्द्रने देवमण्डलीके बीचमें अपने सर्वश्रेष्ठ गुरु बृहस्पतिजीसे मधुर वाणीमें कहा— ॥
धर्मगुह्यं तु भगवन् मानुषाणां सुखावहम् ।
सरहस्याश्च ये दोषास्तान् यथावदुदीरय ॥ ५ ९ ॥
‘ भगवन्! मनुष्योंको सुख देनेवाले धर्मके गूढ़ - स्वरूपका तथा रहस्योंसहित जो दोष हैं, उनका भी यथावत्रूपसे वर्णन कीजिये ' ॥ ५ ९ ॥ बृहस्पतिरुवाच
प्रतिमेहन्ति ये सूर्यमनिलं द्विषते च ये ।
हव्यवाहे प्रदीप्ते च समिधं ये न जुह्वति ॥ ६० ॥
बालवत्सां च ये धेनुं दुहन्ति क्षीरकारणात् ।
तेषां दोषान् प्रवक्ष्यामि तान् निबोध शचीपते ॥ ६१ ॥
बृहस्पतिजीने कहा —शचीपते! जो सूर्यकी ओर मुँह करके मूत्र त्याग करते हैं, वायुदेवसे द्वेष रखते हैं अर्थात् वायुके सम्मुख मूत्र त्याग करते हैं, जो प्रज्वलित अग्निमें समिधाकी आहुति नहीं देते तथा जो दूधके लोभसे बहुत छोटे बछड़ेवाली धेनुको भी दुह
लेते हैं, उन सबके दोषोंका वर्णन करता हूँ । ध्यानपूर्वक सुनो ॥
भानुमाननिलश्चैव हव्यवाहश्च वासव ।
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लोकानां मातरश्चैव गावः सृष्टाः स्वयम्भुवा ॥ ६२ ॥
वासव! साक्षात् ब्रह्माजीने सूर्य, वायु, अग्नि तथा लोकमाता गौओंकी सृष्टि की है ॥ ६२ ॥
लोकांस्तारयितुं शक्ता मर्त्येष्वेतेषु देवताः ।
सर्वे भवन्तः शृण्वन्तु एकैकं धर्मनिश्चयम् ॥ ६३ ॥
ये मर्त्यलोकके देवता हैं तथा सम्पूर्ण जगत्का उद्धार करनेकी शक्ति रखते हैं । आप सब लोग सुनें, मैं एक- एक धर्मका निश्चय बता रहा हूँ ॥ ६३ ॥
वर्षाणि षडशीतिं तु दुर्वृत्ताः कुलपांसनाः ।
स्त्रियः सर्वाश्च दुर्वृत्ताः प्रतिमेहन्ति या रविम् ॥ ६४ ॥
अनिलद्वेषिणः शक्र गर्भस्था च्यवते प्रजा । इन्द्र! जो दुराचारी और कुलांगार पुरुष तथा जो समस्त दुराचारिणी स्त्रियाँ सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करती हैं और जो लोग वायुसे द्वेष रखते अर्थात् वायुके सम्मुख मूत्रत्याग करते हैं उन सबकी छियासी वर्षोंतक गर्भमें आयी हुई संतान गिर जाती है ॥ ६४३ ॥
हव्यवाहस्य दीप्तस्य समिधं ये न जुह्वति ॥ ६५ ॥
अग्निकार्येषु वै तेषां हव्यं नाश्नाति पावकः । जो प्रज्वलित यज्ञाग्निमें समिधाकी आहुति नहीं देते, उनके अग्निहोत्रमें अग्निदेव हविष्य ग्रहण नहीं करते हैं ( अतः अग्नि प्रज्वलित किये बिना उसे आहुति नहीं देनी चाहिये ) ॥ ६५ ॥
क्षीरं तु बालवत्सानां ये पिबन्तीह मानवाः ॥ ६६ ॥
न तेषां क्षीरपाः केचिज्जायन्ते कुलवर्धनाः ।
प्रजाक्षयेण युज्यन्ते कुलवंशक्षयेण च ॥ ६७ ॥
जो मानव छोटे बछड़ेवाली गौओंके दूध दुहकर पी जाते हैं, उनके वंशमें दूध पीनेवाले और कुलकी वृद्धि करनेवाले कोई बालक नहीं उत्पन्न होते हैं । उनकी संतान नष्ट हो जाती है तथा उनके कुल एवं वंशका क्षय हो जाता है ॥ ६६-६७ ॥
एवमेतत् पुरा दृष्टं कुलवृद्धैर्द्विजातिभिः ।
तस्माद् वर्ज्यानि वर्ज्यानि कार्यं कार्यं च नित्यशः ॥ ६८ ॥
भूतिकामेन मर्त्येन सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । इस प्रकार उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंने पूर्वकालमें यह प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया है; अतः अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको शास्त्रमें जिन्हें त्याज्य बतलाया है, उन कर्मोंको त्याग देना चाहिये और जो कर्तव्य कर्म है, उसका सदा अनुष्ठान करते रहना चाहिये । यह मैं तुम्हें सच्ची बात बता रहा हूँ ॥ ६८ ॥
ततः सर्वा महाभाग देवताः समरुद्गणाः ॥ ६ ९ ॥ ऋषयश्च महाभागाः पृच्छन्ति स्म पितॄंस्ततः ।
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तब मरुद्गणोंसहित सम्पूर्ण महाभाग देवता और परम सौभाग्यशाली ऋषियोंने पितरोंसे पूछा— ॥ ६ ९ ३ ॥ पितरः केन तुष्यन्ति मर्त्यानामल्पचेतसाम् ॥ ७० ॥
अक्षयं च कथं दानं भवेच्चैवोर्ध्वदेहिकम् ।
आनृण्यं वा कथं मर्त्या गच्छेयुः केन कर्मणा ॥ ७१ ॥
एतदिच्छामहे श्रोतुं परं कौतूहलं हि नः । ' मनुष्योंकी बुद्धि थोड़ी होती है; अतः वे कौन -सा कर्म करें, जिससे आप सम्पूर्ण पितर उनके ऊपर संतुष्ट होंगे? श्राद्धमें दिया हुआ दान किस प्रकार अक्षय हो सकता है? अथवा मनुष्य किस कर्मसे किस प्रकार पितरोंके ऋणसे छुटकारा पा सकते हैं? हम यह सुनना चाहते हैं । यह सब सुननेके लिये हमारे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ' ॥ ७०-७१३ ॥ पितर ऊचुः न्यायतो वै महाभागाः संशयः समुदाहृतः ॥ ७२ ॥
श्रूयतां येन तुष्यामो मर्त्याना साधुकर्मणाम् । पितरोंने कहा — महाभाग देवताओ! आपने न्यायतः अपना संदेह उपस्थित किया है । उत्तम कर्म करनेवाले मनुष्योंके जिस कार्यसे हम संतुष्ट होते हैं, उसको सुनिये ॥ ७२ ॥ ’
नीलषण्डप्रमोक्षेण अमावास्यां तिलोदकैः ॥ ७३ ॥
वर्षासु दीपकैश्चैव पितॄणामनृणो भवेत् । नीले रंगके साँड़ छोड़नेसे, अमावास्याको तिलमिश्रित जलद्वारा तर्पण करनेसे और वर्षा -ऋतुमें पितरोंके लिये दीप देनेसे मनुष्य उनके ऋणसे मुक्त हो सकता है ॥ अक्षयं निर्व्यलीकं च दानमेतन्महाफलम् ॥ ७४ ॥
अस्माकं परितोषश्च अक्षयः परिकीर्त्यते । इस तरह निष्कपट भावसे किया हुआ दान अक्षय एवं महान् फलदायक होता है और उससे हमें भी अक्षय संतोष प्राप्त होता है - ऐसा शास्त्रका कथन है ॥ श्रद्दधानाश्च ये मर्त्या आहरिष्यन्ति संततिम् ॥ ७५ ॥
दुर्गात् ते तारयिष्यन्ति नरकात् प्रपितामहान् । जो मनुष्य पितरोंमें श्रद्धा रखकर संतान उत्पन्न करेंगे, वे अपने प्रपितामहोंका दुर्गम नरकसे उद्धार कर देंगे ॥ पितॄणां भाषितं श्रुत्वा हृष्टरोमा तपोधनः ॥ ७६ ॥
वृद्धगार्ग्यो महातेजास्तानेवं वाक्यमब्रवीत् । पितरोंका यह भाषण सुनकर तपस्याके धनी महातेजस्वी वृद्धगार्ग्यके शरीरमें रोमांच हो आया और उनसे इस प्रकार पूछा- ॥ ७६ ॥
के गुणा नीलषण्डस्य प्रमुक्तस्य तपोधनाः ॥ ७७ ॥
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वर्षासु दीपदानेन तथैव च तिलोदकैः । 'तपोधनो! नीले रंगके साँड़ छोड़ने, वर्षा ऋतुमें दीप देने और अमावास्याको तिलमिश्रित जलद्वारा तर्पण करनेसे क्या लाभ होते हैं? ” ॥ ७७ ॥
पितर ऊचुः नीलषण्डस्य लाङ्गूलं तोयमभ्युद्धरेद् यदि ॥ ७८ ॥
षष्टिं वर्षसहस्राणि पितरस्तेन तर्पिताः । पितरोंने कहा — मुने! छोड़े हुए नीले रंगके साँड़की पूँछ यदि नदी आदिके जलमें भीगकर उस जलको ऊपर उछालती है तो जिसने उस साँड़को छोड़ा है उसके पितर साठ हजार वर्षोंतक उस जलसे तृप्त रहते हैं ॥ यस्तु शृङ्गगतं पङ्कं कूलादुद्धृत्य तिष्ठति ॥ ७९ ॥
पितरस्तेन गच्छन्ति सोमलोकमसंशयम् । जो नदी या तालाबके तटसे अपने सींगोंद्वारा कीचड़ उछालकर खड़ा होता है, उससे वृषोत्सर्ग करनेवालेके पितर निस्संदेह चन्द्रलोकमें जाते हैं ॥ ७ ९ ॥ वर्षासु दीपदानेन शशिवच्छोभते नरः ॥ ८० ॥
तमोरूपं न तस्यास्ति दीपकं यः प्रयच्छति । वर्षा ऋतुमें दीपदान करनेसे मनुष्य चन्द्रमाके समान शोभा पाता है । जो दीपदान करता है, उसके लिये नरकका अन्धकार है ही नहीं ॥ ८० ॥
अमावास्यां तु ये मर्त्याः प्रयच्छन्ति तिलोदकम् ॥ ८१ ॥
पात्रमौदुम्बरं गृह्य मधुमिश्रं तपोधन ।
कृतं भवति तैः श्राद्धं सरहस्यं यथार्थवत् ॥ ८२ ॥
तपोधन! जो मनुष्य अमावास्याके दिन ताँबेके पात्रमें मधु एवं तिलसे मिश्रित जल लेकर उसके द्वारा पितरोंका तर्पण करते हैं, उनके द्वारा रहस्यसहित श्राद्धकर्म यथार्थरूपसे सम्पादित हो जाता है ॥ ८१-८२ ॥ हृष्टपुष्टमनास्तेषां प्रजा भवति नित्यदा ।
कुलवंशस्य वृद्धिस्तु पिण्डदस्य फलं भवेत् ।
श्रद्दधानस्तु यः कुर्यात् पितॄणामनृणो भवेत् ॥ ८३ ॥
उनकी प्रजा सदा हृष्ट - पुष्ट मनवाली होती है । कुल और वंश- परम्पराकी वृद्धि श्राद्धका फल है । पिण्डदान करनेवालेको यह फल सुलभ होता है । जो श्रद्धापूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है, वह उनके ऋणसे छुटकारा पा जाता है ॥ ८३ ॥
एवमेव समुद्दिष्टः श्राद्धकालक्रमस्तथा ।
विधिः पात्रं फलं चैव यथावदनुकीर्तितम् ॥ ८४ ॥
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इस प्रकार यह श्राद्धके काल, क्रम, विधि, पात्र और फलका यथावत्रूपसे वर्णन किया गया है ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पितृरहस्यं नाम पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पितरोंका रहस्य नामक एक सौ पचीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥
OF FUTE
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षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन भीष्म उवाच
केन ते च भवेत् प्रीतिः कथं तुष्टिं तु गच्छसि ।
इति पृष्टः सुरेन्द्रेण प्रोवाच हरिरीश्वरः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! प्राचीन कालकी बात है, एक बार देवराज इन्द्रने भगवान् विष्णुसे पूछा — ' भगवन्! आप किस कर्मसे प्रसन्न होते हैं? किस प्रकार आपको संतुष्ट किया जा सकता है? ' सुरेन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर जगदीश्वर श्रीहरिने कहा ॥ १ ॥
विष्णुरुवाच
ब्राह्मणानां परीवादो मम विद्वेषणं महत् ।
ब्राह्मणैः पूजितैर्नित्यं पूजितोऽहं न संशयः ॥ २ ॥
भगवान् विष्णु बोले— इन्द्र! ब्राह्मणोंकी निन्दा करना मेरे साथ महान् द्वेष करनेके समान है तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे सदा मेरी भी पूजा हो जाती हैं - इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥
नित्याभिवाद्या विप्रेन्द्रा भुक्त्वा पादौ तथात्मनः ।
तेषां तुष्यामि मर्त्यानां यश्चक्रे च बलिं हरेत् ॥ ३ ॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रतिदिन प्रणाम करना चाहिये । भोजनके पश्चात् अपने दोनों पैरोंकी भी सेवा करे अर्थात् पैरोंको भलीभाँति धो ले तथा तीर्थकी मृत्तिकासे सुदर्शन चक्र बनाकर उसपर मेरी पूजा करे और नाना प्रकारकी भेंट चढ़ावे । जो ऐसा करते हैं, उन मनुष्योंपर मैं सन्तुष्ट होता हूँ ॥ ३ ॥
वामनं ब्राह्मणं दृष्ट्वा वराहं च जलोत्थितम् ।
उद्धृतां धरणीं चैव मूर्ध्ना धारयते तु यः ॥ ४ ॥
न तेषामशुभं किंचित् कल्मषं चोपपद्यते । जो मनुष्य बौने ब्राह्मण और पानीसे निकले हुए वराहको देखकर नमस्कार करता और उनकी उठायी मृत्तिकाको मस्तकसे लगाता है, ऐसे लोगोंको कभी कोई अशुभ या पाप नहीं प्राप्त होता ॥ ४३ ॥
अश्वत्थं रोचनां गां च पूजयेद् यो नरः सदा ॥ ५ ॥
पूजितं च जगत् तेन सदेवासुरमानुषम् ।
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जो मनुष्य अश्वत्थ वृक्ष, गोरोचना और गौकी सदा पूजा करता है, उसके द्वारा देवताओं, असुरों और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत्की पूजा हो जाती है ॥ ५३ ॥
तेन रूपेण तेषां च पूजां गृह्णामि तत्त्वतः ॥ ६ ॥
पूजा ममैषा नास्त्यन्या यावल्लोकाः प्रतिष्ठिताः । उस रूपमें उनके द्वारा की हुई पूजाको मैं यथार्थरूपसे अपनी पूजा मानकर ग्रहण करता हूँ । जबतक ये सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं, तबतक यह पूजा ही मेरी पूजा है । इससे भिन्न दूसरे प्रकारकी पूजा मेरी पूजा नहीं है ॥ ६३ ॥
अन्यथा हि वृथा मर्त्याः पूजयन्त्यल्पबुद्धयः ॥ ७ ॥
नाहं तत् प्रतिगृह्णामि न सा तुष्टिकरी मम ॥ ८ ॥
अल्पबुद्धि मानव अन्य प्रकारसे मेरी व्यर्थ पूजा करते हैं । मैं उसे ग्रहण नहीं करता हूँ । वह पूजा मुझे संतोष प्रदान करनेवाली नहीं हैं ॥ ७-८ ॥ इन्द्र उवाच
चक्रं पादौ वराहं च ब्राह्मणं चापि वामनम् ।
उद्घृतां धरणीं चैव किमर्थं त्वं प्रशंससि ॥ ९ ॥
इन्द्रने पूछा — भगवन्! आप चक्र, दोनों पैर, बौने ब्राह्मण, वराह और उनके द्वारा उठायी हुई मिट्टीकी प्रशंसा किसलिये करते हैं? ॥ ९ ॥
भवान् सृजति भूतानि भवान् संहरति प्रजाः ।
प्रकृतिः सर्वभूतानां समर्त्यानां सनातनी ॥ १० ॥
आप ही प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं, आप ही समस्त प्रजाका संहार करते हैं और आप ही मनुष्योंसहित सम्पूर्ण प्राणियोंकी सनातन प्रकृति ( मूल कारण) हैं ॥ भीष्म उवाच
सम्प्रहस्य ततो विष्णुरिदं वचनमब्रवीत् ।
चक्रेण निहता दैत्याः पद्भ्यां क्रान्ता वसुन्धरा ॥ ११ ॥
वाराहं रूपमास्थाय हिरण्याक्षो निपातितः ।
वामनं रूपमास्थाय जितो राजा मया बलिः ॥ १२ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तब भगवान् विष्णुने हँसकर इस प्रकार कहा — ‘ देवराज! मैंने चक्रसे दैत्योंको मारा है । दोनों पैरोंसे पृथ्वीको आक्रान्त किया है । वाराहरूप धारण करके हिरण्याक्ष दैत्यको धराशायी किया है और वामन ब्राह्मणका रूप ग्रहण करके मैंने राजा बलिको जीता है ॥ ११-१२ ॥
परितुष्टो भवाम्येवं मानुषाणां महात्मनाम् ।
तन्मां ये पूजयिष्यन्ति नास्ति तेषां पराभवः ॥ १३ ॥
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इन्द्रका भगवान् विष्णुके साथ प्रश्नोत्तर
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इस तरह इन सबकी पूजा करनेसे मैं महामना मनुष्योंपर संतुष्ट होता हूँ। जो मेरी पूजा करेंगे, उनका कभी पराभव नहीं होगा ॥ १३ ॥
अपि वा ब्राह्मणं दृष्ट्वा ब्रह्मचारिणमागतम् ।
ब्राह्मणाग्रयाहुतिं दत्त्वा अमृतं तस्य भोजनम् ॥ १४ ॥
‘ ब्रह्मचारी ब्राह्मणको घरपर आया देख गृहस्थ पुरुष ब्राह्मणको प्रथम भोजन कराये, तत्पश्चात् स्वयं अवशिष्ट अन्नको ग्रहण करे तो उसका वह भोजन अमृतके समान माना गया है ॥ १४ ॥
ऐन्द्रीं संध्यामुपासित्वा आदित्याभिमुखः स्थितः ।
सर्वतीर्थेषु स स्नातो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ १५ ॥
‘ जो प्रातःकालकी संध्या करके सूर्यके सम्मुख खड़ा होता है, उसे समस्त तीर्थोंमें स्नानका फल मिलता है और वह सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ १५ ॥
एतद् वः कथितं गुह्यमखिलेन तपोधनाः ।
संशयं पृच्छमानानां किं भूयः कथयाम्यहम् ॥ १६ ॥
‘ तपोधनो! तुमलोगोंने जो संशय पूछा है, उसके समाधानके लिये मैंने यह सारा गूढ़
रहस्य तुम्हें बताया है । बताओ और क्या कहूँ ' ॥ १६ ॥
बलदेव उवाच
श्रूयतां परमं गुह्यं मानुषाणां सुखावहम् ।
अजानन्तो यदबुधाः क्लिश्यन्ते भूतपीडिताः ॥ १७ ॥
बलदेवजीने कहा- जो मनुष्योंको सुख देनेवाला है तथा मूर्ख मानव जिसे न जाननेके कारण भूतोंसे पीड़ित हो नाना प्रकारके कष्ट उठाते रहते हैं, वह परम गोपनीय विषय मैं बता रहा हूँ; उसे सुनो ॥ १७ ॥
कल्य उत्थाय यो मर्त्यः स्पृशेद् गां वै घृतं दधि ।
सर्षपं च प्रियङ्गं च कल्मषात् प्रतिमुच्यते ॥ १८ ॥
जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर गाय, घी, दही, सरसों और राईका स्पर्श करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है ॥ १८ ॥
भूतानि चैव सर्वाणि अग्रतः पृष्ठतोऽपि वा ।
उच्छिष्टं वापि च्छिद्रेषु वर्जयन्ति तपोधनाः ॥ १ ९ ॥
तपस्वी पुरुष आगे या पीछेसे आनेवाले सभी हिंसक जन्तुओंको त्याग देते — उन्हें छोड़कर दूर हट जाते हैं । इसी प्रकार संकटके समय भी वे उच्छिष्ट वस्तुका सदा परित्याग ही करते हैं ॥ १ ९ ॥ देवा ऊचुः प्रगृह्यौदुम्बरं पात्रं तोयपूर्णमुदङ्मुखः ।