श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1061–1070
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1061–1070
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नूनमासंजयित्वा त्वां कृत्ये कस्मिंश्चिदीप्सिते ।
कश्चिदर्थयते नित्यं तेनासि हरिणः कृशः ॥ २५ ॥
निश्चय ही कोई मनुष्य अपनी इच्छाके अनुसार किसी अभीष्ट कार्यमें नियुक्त करके सदा अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है; इसीलिये तुम श्वेत ( पीत ) वर्णके और दुबले हो रहे हो ॥ २५ ॥
नूनं त्वां सुगुणैर्युक्तं पूजयानं सुहृद्ध्रुवम् ।
ममार्थ इति जानीते तेनासि हरिणः कृशः ॥ २६ ॥
अवश्य ही तुम सद्गुणोंसे युक्त होनेके कारण दूसरे लोगोंद्वारा पूजित होते हो; परंतु तुम्हारा मित्र समझता है कि यह मेरे ही प्रभावसे आदर पा रहा है । इसीलिये तुम चिन्तासे दुर्बल एवं पीले होते जा रहे हो ॥ २६ ॥
अन्तर्गतमभिप्रायं नूनं नेच्छसि लज्जया ।
विवेक्तुं प्राप्तिशैथिल्यात् तेनासि हरिणः कृशः ॥ २७ ॥
निश्चय ही तुम लज्जावश किसीपर अपना आन्तरिक अभिप्राय नहीं प्रकट करना चाहते, क्योंकि तुम्हें अपनी अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिके विषयमें संदेह है, इसीलिये चिन्तावश सूखते और पीले पड़ते जा रहे हो ॥ २७ ॥
नानाबुद्धिरुचो लोके मनुष्यान् नूनमिच्छसि ।
ग्रहीतुं स्वगुणैः सर्वांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ २८ ॥
निश्चय ही संसारमें नाना प्रकारकी बुद्धि और भिन्न- भिन्न रुचि रखनेवाले लोग रहते हैं । उन सबको तुम अपने गुणोंसे वशमें करना चाहते हो । इसीलिये क्षीणकाय और पाण्डुवर्णके हो रहे हो ॥ २८ ॥
अविद्वान् भीरुरल्पार्थे विद्याविक्रमदानजम् ।
यशः प्रार्थयसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ २९ ॥
अथवा यह भी हो सकता है कि तुम विद्वान् न होकर भी विद्यासे मिलनेवाले यशको पाना चाहते हो । डरपोक और कायर होनेपर भी पराक्रमजनित कीर्ति पानेकी अभिलाषा रखते हो और अपने पास बहुत थोड़ा धन होनेपर भी दानवीर होनेका यश पानेके लिये उत्सुक हो । इसीलिये कृशकाय और पीले हो रहे हो ॥ २ ९ ॥
चिराभिलषितं किंचित्फलमप्राप्तमेव ते ।
कृतमन्यैरपहृतं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३० ॥
तुमने कोई कार्य किया, जिसका चिरकालसे अभिलषित कोई फल तुम्हें प्राप्त होनेवाला था, किंतु तुम्हें तो वह प्राप्त हुआ नहीं और दूसरे लोग उसे हर ले गये । इसीलिये तुम्हारे शरीरकी कान्ति फीकी पड़ गयी है और दिनोंदिन दुबले होते जा रहे हो ॥ ३० ॥
नूनमात्मकृतं दोषमपश्यन् किंचिदात्मनः ।
अकारणेऽभिशप्तोऽसि तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३१ ॥
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एक बात यह भी ध्यानमें आती है कि तुम्हें तो अपना कोई दोष दिखायी नहीं देता तथापि दूसरे लोग अकारण ही तुम्हें कोसते रहते हैं । शायद इसीलिये तुम कान्तिहीन और दुर्बल होते जा रहे हो ॥ ३१ ॥
साधून् गृहस्थान् दृष्ट्वा च तथा साधून् वनेचरान् ।
मुक्तांश्चावसथे सक्तांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३२ ॥
तुम विरक्त साधुओंको गृहस्थ, दुर्जनोंको वनवासी तथा संन्यासियोंको मठ - मन्दिरमें आसक्त देखते हो; इसीलिये सफेद और दुर्बल होते जा रहे हो ॥ ३२ ॥
सुहृदां दुःखमार्तानां न प्रमोक्ष्यसि चार्तिजम् ।
अलमर्थगुणैर्हीनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३३ ॥
तुम्हारे स्नेही बन्धु - बान्धव रोग आदिसे पीड़ित होकर महान् दुःख भोगते हैं और तुम उन्हें उस पीड़ाजनित कष्टसे मुक्त नहीं कर पाते हो तथा अपने आपको भी तुम अर्थ- लाभसे हीन पाते हो; शायद इसीलिये तुम सफेद और दुबले - पतले हो गये हो ॥ ३३ ॥
धर्म्यमर्थ्यं च काम्यं च काले चाभिहितं वचः ।
न प्रतीयन्ति ते नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३४ ॥
तुम्हारी बातें धर्म, अर्थ और कामके अनुकूल एवं सामयिक होती हैं, तो भी दूसरे लोग उनपर ठीक विश्वास नहीं करते हैं । इसलिये तुम कान्तिहीन एवं कृशकाय हो रहे हो ॥ ३४ ॥
दत्तानकुशलैरर्थान् मनीषी संजिजीविषुः ।
प्राप्य वर्तयसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३५ ॥
मनीषी होनेपर भी तुम जीवन -निर्वाहकी इच्छासे ही अज्ञानी पुरुषोंके दिये हु धनको लेकर उसीपर गुजारा करते हो; इसीलिये तुम कान्तिहीन और दुर्बल हो ॥ ३५ ॥
पापात् प्रवर्धतो दृष्ट्वा कल्याणानावसीदतः ।
ध्रुवं गर्हयसे नित्यं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३६ ॥
पापियोंको आगे बढ़ते और कल्याणकारी कर्मोंमें लगे हुए पुण्यात्मा पुरुषोंको दुःख उठाते देखकर अवश्य ही तुम सदा इस परिस्थितिकी निन्दा करते हो; इसीलिये दुर्बल और पाण्डुवर्णके हो गये हो ॥ ३६ ॥
परस्परविरुद्धानां प्रियं नूनं चिकीर्षसि ।
सुहृदामुपरोधेन तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३७ ॥
एक दूसरेसे विरोध रखनेवाले अपने सुहृदोंको रोककर तुम निश्चय ही उनका प्रिय करना चाहते हो; इसीलिये चिन्ताके कारण श्रीहीन और दुर्बल हो गये हो ॥ ३७ ॥
श्रोत्रियांश्च विकर्मस्थान् प्राज्ञांश्चाप्यजितेन्द्रियान् ।
मन्येऽनुध्यायसि जनांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३८ ॥
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वेदज्ञ ब्राह्मणोंको वेदविरुद्ध कर्ममें तत्पर और विद्वानोंको इन्द्रियोंके अधीन देखकर मेरी समझमें तुम निरन्तर चिन्तित रहते हो । सम्भवतः इसीलिये तुम्हारा शरीर सफेद ( पीला ) पड़ गया है और तुम दुर्बल हो गये हो ॥ ३८ ॥
एवं सम्पूजितं रक्षो विप्रं तं प्रत्यपूजयत् ।
सखायमकरोच्चैनं संयोज्यार्थैर्मुमोच ह ॥ ३ ९ ॥
ऐसा कहकर जब उस ब्राह्मणने राक्षसका समादर किया, तब राक्षसने भी ब्राह्मणका विशेष सत्कार किया । उसने ब्राह्मणको अपना मित्र बना लिया और उसे धन देकर छोड़ दिया ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि हरिणकृशकाख्याने चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दुर्बल और पाण्डुवर्णके राक्षसका आख्यानविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २८३ श्लोक मिलाकर कुल ६७३ श्लोक हैं ) 0
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पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद युधिष्ठिर उवाच
जन्म मानुष्यकं प्राप्य कर्मक्षेत्रं सुदुर्लभम् ।
श्रेयोऽर्थिना दरिद्रेण किं कर्तव्यं पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! मनुष्यकुलमें जन्म और परम दुर्लभ कर्मक्षेत्र पाकर अपना कल्याण चाहनेवाले दरिद्र पुरुषको क्या करना चाहिये? ॥ १ ॥
दानानामुत्तमं यच्च देयं यच्च यथा यथा ।
मान्यान् पूज्यांश्च गाङ्गेय रहस्यं वक्तुमर्हसि ॥ २ ॥
गंगानन्दन! सब दानोंमें जो उत्तम दान है, जिस वस्तुका जिस-जिस प्रकारसे दान करना उचित है तथा जो माननीय और पूजनीय हैं -इन सब रहस्यमय ( गोपनीय ) विषयोंका वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं पृष्टो नरेन्द्रेण पाण्डवेन यशस्विना ।
धर्माणां परमं गुह्यं भीष्मः प्रोवाच पार्थिवम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! यशस्वी पाण्डुपुत्र महाराज युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर भीष्मजीने उनसे धर्मका परम गुह्य रहस्य बताना आरम्भ किया ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
शृणुष्वावहितो राजन् धर्मगुह्यानि भारत ।
यथा हि भगवान् व्यासः पुरा कथितवान् मयि ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! भरतनन्दन! पूर्वकालमें भगवान् वेदव्यासने मुझे धर्मके जो गूढ़ रहस्य बताये थे, उनका वर्णन करता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ ४ ॥
देवगुह्यमिदं राजन् यमेनाक्लिष्टकर्मणा ।
नियमस्थेन युक्तेन तपसो महतः फलम् ॥ ५ ॥
राजन्! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले यमने नियमपरायण और योगयुक्त होकर महान् तपके फलस्वरूप इस देवगुह्य रहस्यको प्राप्त किया था ॥ ५ ॥
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येन यः प्रीयते देवः प्रीयन्ते पितरस्तथा ।
ऋषयः प्रमथाः श्रीश्च चित्रगुप्तो दिशां गजाः ॥ ६ ॥
जिससे देवता, पितर, ऋषि, प्रमथगण, लक्ष्मी, चित्रगुप्त और दिग्गज प्रसन्न होते हैं ॥ ६ ॥
ऋषिधर्मः स्मृतो यत्र सरहस्यो महाफलः ।
महादानफलं चैव सर्वयज्ञफलं तथा ॥ ७ ॥
जिसमें महान् फल देनेवाले ऋषिधर्मका रहस्यसहित समावेश हुआ है तथा जिसके अनुष्ठानसे बड़े - बड़े दानों और सम्पूर्ण यज्ञोंका फल मिलता है ॥ ७ ॥
यश्चैतदेवं जानीयाज्ज्ञात्वा वा कुरुतेऽनघ ।
सदोषोऽदोषवांश्चेह तैर्गुणैः सह युज्यते ॥ ८ ॥
निष्पाप नरेश! जो उस धर्मको इस प्रकार जानता और जानकर इसके अनुसार आचरण करता है, वह सदोष ( पापी ) रहा हो भी तो उस दोषसे मुक्त होकर उन सद्गुणोंसे सम्पन्न हो जाता है ॥ ८ ॥
दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः ।
दशध्वजसमा वेश्या दशवेश्यासमो नृपः ॥ ९ ॥
दस कसाइयोंके समान एक तेली, दस तेलियोंके समान एक कलवार, दस कलवारोंके समान एक वेश्या और दस वेश्याओंके समान एक राजा है ॥ ९ ॥
अर्धेनैतानि सर्वाणि नृपतिः कथ्यतेऽधिकः ।
त्रिवर्गसहितं शास्त्रं पवित्रं पुण्यलक्षणम् ॥ १० ॥
राजा इन सबकी अपेक्षा अधिक दोषयुक्त बताया जाता है, इसलिये ये सब पाप राजाके आधेसे भी कम हैं । ( अतः राजाका दान लेना निषिद्ध है । ) धर्म, अर्थ और कामका प्रतिपादन करनेवाला जो शास्त्र है, वह पवित्र एवं पुण्यका परिचय करानेवाला है ॥ १० ॥
धर्मव्याकरणं पुण्यं रहस्यश्रवणं महत् ।
श्रोतव्यं धर्मसंयुक्तं विहितं त्रिदशैः स्वयम् ॥ ११ ॥
उसमें धर्म और उसके रहस्योंकी व्याख्या है वह परम पवित्र, महान् रहस्यमय तत्त्वका श्रवण करानेवाला, धर्मयुक्त और साक्षात् देवताओंद्वारा निर्मित है । उसका श्रवण करना चाहिये ॥ ११ ॥
पितॄणां यत्र गुह्यानि प्रोच्यन्ते श्राद्धकर्मणि ।
देवतानां च सर्वेषां रहस्यं कथ्यतेऽखिलम् ॥ १२ ॥
ऋषिधर्मः स्मृतो यत्र सरहस्यो महाफलः ।
महायज्ञफलं चैव सर्वदानफलं तथा ॥ १३ ॥
जिसमें पितरोंके श्राद्धके विषयमें गूढ़ बातें बतायी गयी हैं, जहाँ सम्पूर्ण देवताओंके रहस्यका पूरा - पूरा वर्णन है तथा जिसमें रहस्यसहित महान् फलदायी ऋषि- धर्मका एवं
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बड़े - बड़े यज्ञों और सम्पूर्ण दानोंके फलका प्रतिपादन किया गया है ॥ १२-१३ ॥
ये पठन्ति सदा मर्त्या येषां चैवोपतिष्ठति ।
श्रुत्वा च फलमाचष्टे स्वयं नारायणः प्रभुः ॥ १४ ॥
जो मनुष्य उस शास्त्रको सदा पढ़ते हैं, जिन्हें उसका तत्त्व हृदयंगम हो जाता है तथा जो उसका फल सुनकर दूसरोंके सामने व्याख्या करते हैं, वे साक्षात् भगवान् नारायणस्वरूप हो जाते हैं ॥ १४ ॥
गवां फलं तीर्थफलं यज्ञानां चैव यत् फलम् ।
एतत् फलमवाप्नोति यो नरोऽतिथिपूजकः ॥ १५ ॥
जो मानव अतिथियोंकी पूजा करता है, वह गोदान, तीर्थस्थान और यज्ञानुष्ठानका फल पा लेता है ॥ १५ ॥
श्रोतारः श्रद्दधानाश्च येषां शुद्धं च मानसम् ।
तेषां व्यक्तं जिता लोकाः श्रद्दधानेन साधुना ॥ १६ ॥
जो श्रद्धापूर्वक धर्मशास्त्रका श्रवण करते हैं तथा जिनका हृदय शुद्ध हो गया है, वे श्रद्धालु एवं श्रेष्ठ मनके द्वारा अवश्य ही पुण्यलोकपर विजय प्राप्त कर लेते हैं ॥ १६ ॥
मुच्यते किल्बिषाच्चैव न स पापेन लिप्यते ।
धर्मं च लभते नित्यं प्रेत्य लोकगतो नरः ॥ १७ ॥
शुद्धचित्त पुरुष श्रद्धापूर्वक शास्त्र- श्रवण करनेसे पूर्व पापसे मुक्त हो जाता है तथा वह भविष्यमें भी पापसे लिप्त नहीं होता है । नित्य -प्रति धर्मका अनुष्ठान करता है और मरनेके बाद उसे उत्तम लोककी प्राप्ति होती है ॥ १७ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य देवदूतो यदृच्छया ।
स्थितो ह्यन्तर्हितो भूत्वा पर्यभाषत वासवम् ॥ १८ ॥
एक समयकी बात है, एक देवदूतने अकस्मात् पहुँचकर आकाशमें स्थित हो इन्द्रसे कहा— ॥ १८ ॥
यौ तौ कामगुणोपेतावश्विनौ भिषजां वरौ ।
आज्ञयाहं तयोः प्राप्तः सनरान् पितृदैवतान् ॥ १ ९ ॥
' वे जो कमनीय गुणोंसे सम्पन्न वैद्यप्रवर अश्विनीकुमार हैं, उन दोनोंकी आज्ञासे मैं यहाँ देवताओं, पितरों और मनुष्योंके पास आया हूँ ॥ १ ९ ॥
कस्माद्धि मैथुनं श्राद्धे दातुर्भोक्तुश्च वर्जितम् ।
किमर्थं च त्रयः पिण्डाः प्रविभक्ताः पृथक् पृथक् ॥ २० ॥
' मेरे मनमें यह जिज्ञासा हुई है कि श्राद्धके दिन श्राद्ध- कर्ता और श्राद्धान्न भोजन करनेवाले ब्राह्मणके लिये जो मैथुनका निषेध किया गया है, उसका क्या कारण है? तथा श्राद्धमें पृथक् - पृथक् तीन पिण्ड किसलिये दिये जाते हैं? ॥ २० ॥
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Bayendnes
प्रथमः कस्य दातव्यो मध्यमः क्व च गच्छति ।
उत्तरश्च स्मृतः कस्य एतदिच्छामि वेदितुम् ॥ २१ ॥
‘ प्रथम पिण्ड किसे देना चाहिये? दूसरा पिण्ड किसे प्राप्त होता तथा तीसरे पिण्डपर किसका अधिकार माना गया है? यह सब कुछ मैं जानना चाहता हूँ' ॥
श्रद्दधानेन दूतेन भाषितं धर्मसंहितम् ।
पूर्वस्थास्त्रिदशाः सर्वे पितरः पूज्य खेचरम् ॥ २२ ॥
उस श्रद्धालु देवदूतके इस प्रकार धर्मयुक्त भाषण करनेपर पूर्वदिशामें स्थित हुए सभी देवताओं और पितरोंने उस आकाशचारी पुरुषकी प्रशंसा करते हुए कहा ॥ २२ ॥
पितर ऊचुः
स्वागतं तेऽस्तु भद्रं ते श्रूयतां खेचरोत्तम ।
गूढार्थः परमः प्रश्नो भवता समुदीरितः ॥ २३ ॥
पितर बोले — आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ देवदूत! तुम्हारा स्वागत है । तुम कल्याणके भागी होओ । तुमने गूढ़ अभिप्रायसे युक्त बहुत उत्तम प्रश्न उपस्थित किया है । इसका उत्तर सुनो ॥ २३ ॥
श्राद्धं दत्त्वा च भुक्त्वा च पुरुषो यः स्त्रियं व्रजेत् ।
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पितरस्तस्य तं मासं तस्मिन् रेतसि शेरते ॥ २४ ॥
जो पुरुष श्राद्धका दान और भोजन करके स्त्रीके साथ समागम करता है, उसके पितर उस महीनेभर उसी वीर्यमें शयन करते हैं ॥ २४ ॥
प्रविभागं तु पिण्डानां प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।
पिण्डो ह्यधस्ताद् गच्छंस्तु अप आविश्य भावयेत् ॥ २५ ॥
पिण्डं तु मध्यमं तत्र पत्नी त्वेका समश्नुते ।
पिण्डस्तृतीयो यस्तेषां तै दद्याज्जातवेदसि ॥ २६ ॥
अब मैं पिण्डोंका क्रमशः विभाग बताऊँगा । श्राद्धमें जो तीन पिण्डोंका विधान है, उनमें पहला पिण्ड जलमें डाल देना चाहिये । मध्यम पिण्ड केवल श्राद्धकर्ताकी पत्नीको भोजन करना चाहिये और उनमें जो तीसरा पिण्ड है, उसे आगमें डाल देना चाहिये ॥ २५-२६ ॥
एष श्राद्धविधिः प्रोक्तो यथा धर्मो न लुप्यते ।
पितरस्तस्य तुष्यन्ति प्रहृष्टमनसः सदा ॥ २७ ॥
प्रजा विवर्धते चास्य अक्षयं चोपतिष्ठति । यही श्राद्धकी विधि बतायी गयी है, जिसके अनुसार चलनेपर धर्मका लोप नहीं होता । जो इस धर्मका पालन करता है, उसके पितर सदा प्रसन्नचित्त एवं संतुष्ट रहते हैं । उसकी संतति बढ़ती है और कभी क्षीण नहीं होती ॥ २७ ॥
देवदूत उवाच आनुपूर्व्येण पिण्डानां प्रविभागः पृथक् पृथक् ॥ २८ ॥
पितॄणां त्रिषु सर्वेषां निरुक्तं कथितं त्वया । देवदूतने पूछा- पितृगण! आपलोगोंने क्रमशः पिण्डोंका विभाग बतलाया और तीनों लोकोंमें जो समस्त पितर हैं, उनको पिण्डदान करनेका शास्त्रोक्त प्रकार भी बतला दिया ॥ २८३ ॥
एकः समुद्धृतः पिण्डो ह्यधस्तात् कस्य गच्छति ॥ २ ९ ॥ कं वा प्रीणयते देवं कथं तारयते पितॄन् । किंतु पहले पिण्डको उठाकर जो नीचे जलमें डाल देनेकी बात कही गयी है, उसके अनुसार यदि वह जलमें डाला जाय तो वह किसको प्राप्त होता है? किस देवताको तृप्त करता है? और किस प्रकार पितरोंको तारता है? ॥ २ ९ ॥ मध्यमं तु तदा पत्नी भुङ्क्तेऽनुज्ञातमेव हि ॥ ३० ॥
किमर्थं पितरस्तस्य कव्यमेव च भुञ्जते । इसी प्रकार यदि गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार मध्यम पिण्ड पत्नी ही खाती है तो उसके पितर किस प्रकार उस पिण्डका उपभोग करते हैं? ॥ ३० ॥
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अत्र यस्त्वन्तिमः पिण्डो गच्छते जातवेदसम् ॥ ३१ ॥
भवते का गतिस्तस्य कं वा समनुगच्छति । तथा अन्तिम पिण्ड जब अग्निमें डाल दिया जाता है, तब उसकी क्या गति होती है? वह किस देवताको प्राप्त होता है? ॥ ३१३ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पिण्डेषु त्रिषु या गतिः ॥ ३२ ॥
फलं वृत्तिं च मार्गं च यश्चैनं प्रतिपद्यते । यह सब मैं सुनना चाहता हूँ । तीनों पिण्डोंकी जो गति होती है, उसका जो फल, वृत्ति और मार्ग है तथा जो देवता उस पिण्डको पाता है, उन सबपर प्रकाश डालिये ॥ ३२ ॥
पितर ऊचुः सुमहानेष प्रश्नो वै यस्त्वया समुदीरितः ॥ ३३ ॥
रहस्यमद्भुतं चापि पृष्टाः स्म गगनेचर ।
एतदेव प्रशंसन्ति देवाश्च मुनयस्तथा ॥ ३४ ॥
पितरोंने कहा — आकाशचारी देवदूत! तुमने यह महान् प्रश्न उपस्थित किया है और हमलोगोंसे अद्भुत रहस्यकी बात पूछी है। देवता और मुनि भी इस पितृकर्मकी प्रशंसा करते हैं ॥ ३३-३४ ॥
तेऽप्येवं नाभिजानन्ति पितृकार्यविनिश्चयम् ।
वर्जयित्वा महात्मानं चिरजीविनमुत्तमम् ॥ ३५ ॥
पितृभक्तस्तु यो विप्रो वरलब्धो महायशाः । परन्तु वे भी इस प्रकार पितृकार्यके रहस्यको निश्चित रूपसे नहीं जानते हैं । जो पिताके भक्त हैं और जिन महायशस्वी ब्राह्मणको वर प्राप्त हुआ है, उन सर्वश्रेष्ठ चिरजीवी महात्मा मार्कण्डेयको छोड़कर और किसीको उसका पता नहीं है ॥ ३५३ ॥
त्रयाणामपि पिण्डानां श्रुत्वा भगवतो गतिम् ॥ ३६ ॥
देवदूतेन यः पृष्टः श्राद्धस्य विधिनिश्चयः ।
गतिं त्रयाणां पिण्डानां शृणुष्वावहितो मम ॥ ३७ ॥
उन्होंने भगवान् विष्णुसे तीनों पिण्डोंकी गति सुनकर श्राद्धका रहस्य जान लिया है । देवदूत! तुमने जो श्राद्धविधिका निर्णय पूछा है, उसके अनुसार तीनों पिण्डोंकी गति बतायी जा रही है । सावधान होकर मुझसे सुनो ॥ ३६-३७ ॥
अपो गच्छति यो ह्यत्र शशिनं ह्येष प्रीणयेत् ।
शशी प्रीणयते देवान् पितॄंश्चैव महामते ॥ ३८ ॥
महामते! इस श्राद्धमें जो पहला पिण्ड पानीके भीतर चला जाता है, वह चन्द्रमाको तृप्त करता है और चन्द्रमा स्वयं देवता तथा पितरोंको तृप्त करते हैं ॥ भुङ्क्ते तु पत्नी यं चैषामनुज्ञाता तु मध्यमम् ।
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पुत्रकामाय पुत्रं तु प्रयच्छन्ति पितामहाः ॥ ३ ९ ॥ इसी प्रकार श्राद्धकर्ताकी पत्नी गुरुजनोंकी आज्ञासे जो मध्यम पिण्डका भक्षण करती है, उससे प्रसन्न हुए पितामह पुत्रकी कामनावाले पुरुषको पुत्र प्रदान करते हैं ॥ ३ ९ ॥
हव्यवाहे तु यः पिण्डो दीयते तन्निबोध मे ।
पितरस्तेन तृप्यन्ति प्रीताः कामान् दिशन्ति च ॥ ४० ॥
अग्निमें जो पिण्ड डाला जाता है, उसके विषयमें भी मुझसे समझ लो । उससे पितर तृप्त होते हैं और तृप्त होकर वे मनुष्यकी सब कामनाएँ पूर्ण करते हैं ॥ ४० ॥
एतत् ते कथितं सर्वं त्रिषु पिण्डेषु या गतिः ।
ऋत्विग्यो यजमानस्य पितृत्वमनुगच्छति ॥ ४१ ॥
तस्मिन्नहनि मन्यन्ते परिहार्यं हि मैथुनम् ।
शुचिना तु सदा श्राद्धं भोक्तव्यं खेचरोत्तम ॥ ४२ ॥
इस प्रकार तुम्हें यह सब कुछ बताया गया । तीनों पिण्डोंकी जो गति होती है, उसका भी प्रतिपादन किया गया । श्राद्धमें भोजनके लिये निमन्त्रित हुआ ब्राह्मण उस दिनके लिये यजमानके पितृभावको प्राप्त हो जाता है; अतः उस दिन उसके लिये मैथुनको त्याज्य मानते हैं । आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ देवदूत! ब्राह्मणको स्नान आदिसे पवित्र होकर सदा श्राद्धमें भोजन करना चाहिये ॥ ४१-४२ ॥
ये मया कथिता दोषास्ते तथा स्युर्न चान्यथा ।
तस्मात् स्नातः शुचिः क्षान्तः श्राद्धं भुञ्जीत वै द्विजः ॥ ४३ ॥
मैंने जो दोष बताये हैं, वे वैसे ही प्राप्त होते हैं । इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता; अतः ब्राह्मण स्नान करके पवित्र एवं क्षमाशील हो श्राद्धमें भोजन करे ॥
प्रजा विवर्धते चास्य यश्चैवं सम्प्रयच्छति ।
ततो विद्युत्प्रभो नाम ऋषिराह महातपाः ॥ ४४ ॥
जो इस प्रकार श्राद्धका दान देता है, उसकी संतति बढ़ती है । पितरोंके इस प्रकार कहनेके बाद विद्युत्प्रभ नामवाले एक महातपस्वी महर्षिने अपना प्रश्न उपस्थित किया ॥ ४४ ॥
आदित्यतेजसा तस्य तुल्यं रूपं प्रकाशते ।
स च धर्मरहस्यानि श्रुत्वा शक्रमथाब्रवीत् ॥ ४५ ॥
उनका रूप सूर्यके समान तेजसे प्रकाशित हो रहा था । उन्होंने धर्मके रहस्योंको सुनकर इन्द्रसे पूछा– ॥
तिर्यग्योनिगतान् सत्त्वान् मर्त्या हिंसन्ति मोहिताः ।
कीटान् पिपीलिकान् सर्पान् मेषान् समृगपक्षिणः ॥ ४६ ॥
किल्बिषं सुबहु प्राप्ताः किंस्विदेषां प्रतिक्रिया ।