श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1081–1090
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1081–1090
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उपवासं तु गृह्णीयाद् यद् वा संकल्पयेद् व्रतम् ॥ २० ॥
देवता बोले — मनुष्य जलसे भरा हुआ ताँबेका पात्र लेकर उत्तराभिमुख हो उपवासका नियम ले अथवा और किसी व्रतका संकल्प करे ॥ २० ॥
देवतास्तस्य तुष्यन्ति कामिकं चापि सिध्यति ।
अन्यथा हि वृथा मर्त्याः कुर्वते स्वल्पबुद्धयः ॥ २१ ॥
जो ऐसा करता है, उसके ऊपर देवता संतुष्ट होते हैं और उसकी सारी मनोवांछा सिद्ध हो जाती है; परन्तु मंदबुद्धि मानव ऐसा न करके व्यर्थ दूसरे दूसरे कार्य किया करते हैं ॥ २१ ॥
उपवासे बलौ चापि ताम्रपात्रं विशिष्यते ।
बलिर्भिक्षा तथार्घ्यं च पितॄणां च तिलोदकम् ॥ २२ ॥
ताम्रपात्रेण दातव्यमन्यथाल्पफलं भवेत् ।
गुह्यमेतत् समुद्दिष्टं यथा तुष्यन्ति देवताः ॥ २३ ॥
उपवासका संकल्प लेने और पूजाका उपचार समर्पित करनेमें ताम्रपात्रको उत्तम माना गया है । पूजन - सामग्री, भिक्षा, अर्घ्य तथा पितरोंके लिये तिल- मिश्रित जल ताम्रपात्रके द्वारा देने चाहिये अन्यथा उनका फल बहुत थोड़ा होता है । यह अत्यन्त गोपनीय बात बतायी गयी है । इसके अनुसार कार्य करनेसे देवता संतुष्ट होते हैं ॥ २२-२३ ॥ धर्मउवाच
राजपौरुषिके विप्रे घाण्टिके परिचारिके ।
गोरक्षके वाणिजके तथा कारुकुशीलवे ॥ २४ ॥
मित्रद्रुह्यनधीयाने यश्च स्वाद् वृषलीपतिः ।
एतेषु दैवं पित्र्यं वा न देयं स्यात् कथंचन ॥ २५ ॥
पिण्डदास्तस्य हीयन्ते न च प्रीणाति वै पितॄन् । धर्मने कहा —ब्राह्मण यदि राजाका कर्मचारी हो, वेतन लेकर घण्टा बजानेका काम करता हो, दूसरोंका सेवक हो, गोरक्षा एवं वाणिज्यका व्यवसाय करता हो, शिल्पी या नट हो, मित्रद्रोही हो, वेद न पढ़ा हो अथवा शूद्र जातिकी स्त्रीका पति हो, ऐसे लोगोंको किसी तरह भी देवकार्य ( यज्ञ ) और पितृकार्य (श्राद्ध) का अन्न आदि नहीं देना चाहिये । जो इन्हें पिण्ड या अन्न देते हैं, उनकी अवनति होती है तथा उनके पितरोंको भी तृप्ति नहीं होती ॥ २४-२५ ॥ अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते ॥ २६ ॥
पितरस्तस्य देवाश्च अग्नयश्च तथैव हि ।
निराशाः प्रतिगच्छन्ति अतिथेरप्रतिग्रहात् ॥ २७ ॥
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जिसके घरसे अतिथि निराश लौट जाता है, उसके यहाँसे अतिथिका सत्कार न होनेके कारण देवता, पितर तथा अग्नि भी निराश लौट जाते हैं ॥ २६-२७ ॥
स्त्रीघ्नैर्गोघ्नैः कृतघ्नैश्च ब्रह्मघ्नैर्गुरुतल्पगैः ।
तुल्यदोषो भवत्येभिर्यस्यातिथिरनर्चितः ॥ २८ ॥
जिसके यहाँ अतिथिका सत्कार नहीं होता, उस पुरुषको स्त्रीहत्यारों, गोघातकों, कृतघ्नों, ब्रह्मघातियों और गुरुपत्नीगामियोंके समान पाप लगता है ॥ २८ ॥
अग्निरुवाच
पादमुद्यम्य यो मर्त्यः स्पृशेद् गाश्च सुदुर्मतिः ।
ब्राह्मणं वा महाभागं दीप्यमानं तथानलम् ॥ २ ९ ॥
तस्य दोषान् प्रवक्ष्यामि तच्छृणुध्वं समाहिताः । अग्नि बोले- जो दुर्बुद्धि मनुष्य लात उठाकर उससे गौका, महाभाग ब्राह्मणका अथवा प्रज्वलित अग्निका स्पर्श करता है, उसके दोष बता रहा हूँ, सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २ ९ ३ ॥ दिवं स्पृशत्यशब्दोऽस्य त्रस्यन्ति पितरश्च वै ॥ ३० ॥
वैमनस्यं च देवानां कृतं भवति पुष्कलम् ।
पावकश्च महातेजा हव्यं न प्रतिगृह्णति ॥ ३१ ॥
ऐसे मनुष्यकी अपकीर्ति स्वर्गतक फैल जाती है । उसके पितर भयभीत हो उठते हैं । देवताओंमें भी उसके प्रति भारी वैमनस्य हो जाता है तथा महातेजस्वी पावक उसके दिये हुए हविष्यको नहीं ग्रहण करते हैं ॥ ३०-३१ ॥
आजन्मनां शतं चैव नरके पच्यते तु सः ।
निष्कृतिं च न तस्यापि अनुमन्यन्ति कर्हिचित् ॥ ३२ ॥
वह सौ जन्मोंतक नरकमें पकाया जाता है । ऋषिगण कभी उसके उद्धारका अनुमोदन नहीं करते हैं ॥
तस्माद् गावो न पादेन स्प्रष्टव्या वै कदाचन ।
ब्राह्मणश्च महातेजा दीप्यमानस्तथानलः ॥ ३३ ॥
श्रद्दधानेन मर्त्येन आत्मनो हितमिच्छता ।
एते दोषा मया प्रोक्तास्त्रिषु यः पादमुत्सृजेत् ॥ ३४ ॥
इसलिये अपना हित चाहनेवाले श्रद्धालु पुरुषको गौओंका, महातेजस्वी ब्राह्मणका तथा प्रज्वलित अग्निका भी कभी पैरसे स्पर्श नहीं करना चाहिये । जो इन तीनोंपर पैर उठाता है, उसे प्राप्त होनेवाले इन दोषोंका मैंने वर्णन किया है ॥ ३३-३४ ॥ विश्वामित्र उवाच श्रूयतां परमं गुह्यं रहस्यं धर्मसंहितम् ।
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परमान्नेन यो दद्यात् पितॄणामौपहारिकम् ॥ ३५ ॥
गजच्छायायां पूर्वस्यां कुतपे दक्षिणामुखः ।
यदा भाद्रपदे मासि भवते बहुले मघा ॥ ३६ ॥
श्रूयतां तस्य दानस्य यादृशो गुणविस्तरः ।
कृतं तेन महच्छ्राद्धं वर्षाणीह त्रयोदश ॥ ३७ ॥
विश्वामित्र बोले — देवताओ! यह धर्मसम्बन्धी परम गोपनीय रहस्य सुनो, जब भाद्रपदमासके कृष्णपक्षमें त्रयोदशी तिथिको मघा नक्षत्रका योग हो, उस समय जो मनुष्य दक्षिणाभिमुख हो कुतप कालमें ( मध्याह्न के बाद आठवें मुहूर्तमें ) जब कि हाथीकी छाया पूर्व दिशाकी ओर पड़ रही हो, उस छायामें ही स्थित हो पितरोंके निमित्त उपहारके रूपमें उत्तम अन्नका दान करता है, उस दानका जैसा विस्तृत फल बताया गया है, वह सुनो । दान करनेवाले उस पुरुषने इस जगत्में तेरह वर्षोंके लिये पितरोंका महान् श्राद्ध सम्पन्न कर दिया, ऐसा जानना चाहिये ॥ ३५-३७ ॥ गाव ऊचुः बहुले समंगे ह्यकुतोऽभये च क्षेमे च सख्येव हि भूयसी च । यथा पुरा ब्रह्मपुरे सवत्सा शतक्रतोर्वज्रधरस्य यज्ञे ॥ ३८ ॥
भूयश्च या विष्णुपदे स्थिता या विभावसोश्चापि पथे स्थिता या । देवाश्च सर्वे सह नारदेन प्रकुर्वते सर्वसहेति नाम ॥ ३ ९ ॥ गौओंने कहा- पूर्वकालमें ब्रह्मलोकके भीतर वज्रधारी इन्द्रके यज्ञमें ' बहुले! समंगे! अकुतोभये! क्षेमे! सखी, भूयसी' इन नामोंका उच्चारण करके बछड़ोंसहित गौओंकी स्तुति की गयी थी, फिर जो - जो गौएँ आकाशमें स्थित थीं और जो सूर्यके मार्गमें विद्यमान थीं, नारदसहित सम्पूर्ण देवताओंने उनका ' सर्वसहा ' नाम रख दिया ॥ ३८-३९ ॥ मन्त्रेणैतेनाभिवन्देत यो वै विमुच्यते पापकृतेन कर्मणा । लोकानवाप्नोति पुरंदरस्य गवां फलं चन्द्रमसो द्युतिं च ॥ ४० ॥
ये दोनों श्लोक मिलकर एक मन्त्र है । उस मन्त्रसे जो गौओंकी वन्दना करता है, वह पापकर्मसे मुक्त हो जाता है । गोसेवाके फलस्वरूप उसे इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है तथा वह चन्द्रमाके समान कान्तिलाभ करता है ॥ ४० ॥
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एतं हि मन्त्रं त्रिदशाभिजुष्टं पठेत यः पर्वसु गोष्ठमध्ये । न तस्य पापं न भयं न शोकः सहस्रनेत्रस्य च याति लोकम् ॥ ४१ ॥
जो पर्वके दिन गोशालामें इस देवसेवित मन्त्रका पाठ करता है, उसे न पाप होता है, न भय होता है और न शोक ही प्राप्त होता है । वह सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके लोकमें जाता है ॥ ४१ ॥
भीष्म उवाच
अथ सप्त महाभागा ऋषयो लोकविश्रुताः ।
वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे ब्रह्माणं पद्मसम्भवम् ॥ ४२ ॥
प्रदक्षिणमभिक्रम्य सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः । भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर महान् सौभाग्यशाली विश्वविख्यात वसिष्ठ आदि सभी सप्तर्षियोंने कमलयोनि ब्रह्माजीकी प्रदक्षिणा की और सब- के - सब हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गये ॥ ४२३ ॥
उवाच वचनं तेषां वसिष्ठो ब्रह्मवित्तमः ॥ ४३ ॥
सर्वप्राणिहितं प्रश्नं ब्रह्मक्षत्रे विशेषतः । उनमेंसे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनिने समस्त प्राणियोंके लिये हितकर तथा विशेषतः ब्राह्मण और क्षत्रियजातिके लिये लाभदायक प्रश्न उपस्थित किया- ॥ ४३३ ॥
द्रव्यहीनाः कथं मर्त्या दरिद्राः साधुवर्तिनः ॥ ४४ ॥
प्राप्नुवन्तीह यज्ञस्य फलं केन च कर्मणा ।
एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ ४५ ॥
‘ भगवन्! इस संसारमें सदाचारी मनुष्य प्रायः दरिद्र एवं द्रव्यहीन हैं । वे किस कर्मसे किस तरह यहाँ यज्ञका फल पा सकते हैं? ' उनकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा ॥ ४४-४५ ॥ ब्रह्मोवाच
अहो प्रश्नो महाभागा गूढार्थः परमः शुभः ।
सूक्ष्मः श्रेयांश्च मर्दानां भवद्भिः समुदाहृतः ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजी बोले- महान् भाग्यशाली सप्तर्षियो! तुम लोगोंने परम शुभकारक, गूढ़ अर्थसे युक्त, सूक्ष्म एवं मनुष्योंके लिये कल्याणकारी प्रश्न सामने रखा है ॥
श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये निखिलेन तपोधनाः ।
यथा यज्ञफलं मर्त्यो लभते नाज संशयः ॥ ४७ ॥
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तपोधनो! मनुष्य जिस प्रकार बिना किसी संशयके यज्ञका फल पाता है, वह सब पूर्णरूपसे बताऊँगा, सुनो ॥
पौषमासस्य शुक्ले वै यदा युज्येत रोहिणी ।
तेन नक्षत्रयोगेन आकाशशयनो भवेत् ॥ ४८ ॥
एकवस्त्रः शुचिः स्नातः श्रद्दधानः समाहितः ।
सोमस्य रश्मयः पीत्वा महायज्ञफलं लभेत् ॥ ४ ९ ॥
पौषमासके शुक्ल पक्षमें जिस दिन रोहिणी नक्षत्रका योग हो, उस दिनकी रातमें मनुष्य स्नान आदिसे शुद्ध हो एक वस्त्र धारण करके श्रद्धा और एकाग्रताके साथ खुले मैदानमें आकाशके नीचे शयन करे और चन्द्रमाकी किरणोंका ही पान करता रहे । ऐसा करनेसे उसको महान् यज्ञका फल मिलता है ॥ ४८-४९ ॥
एतद् वः परमं गुह्यं कथितं द्विजसत्तमाः ।
यन्मां भवन्तः पृच्छन्ति सूक्ष्मतत्त्वार्थदर्शिनः ॥ ५० ॥
विप्रवरो! तुमलोग सूक्ष्मतत्त्व एवं अर्थके ज्ञाता हो । तुमने मुझसे जो कुछ पूछा है, उसके अनुसार मैंने तुम्हें यह परम गूढ़ रहस्य बताया है ॥ ५० ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि देवरहस्ये षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवताओंका रहस्यविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥
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सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः अग्नि, लक्ष्मी, अंगिरा, गार्ग्य, धौम्य तथा जमदग्निके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन विभावसुरुवाच
सलिलस्याञ्जलिं पूर्णमक्षताश्च घृतोत्तराः ।
सोमस्योत्तिष्ठमानस्य तज्जलं चाक्षतांश्च तान् ॥ १ ॥
स्थितो ह्यभिमुखो मर्त्यः पौर्णमास्यां बलिं हरेत् ।
अग्निकार्यं कृतं तेन हुताश्चास्याग्नयस्त्रयः ॥ २ ।
अग्निदेवने कहा — जो मनुष्य पूर्णिमा तिथिको चन्द्रोदयके समय चन्द्रमाकी ओर मुँह करके उन्हें जलकी भरी हुई एक अंजलि घी और अक्षतके साथ भेंट करता है, उसने अग्निहोत्रका कार्य सम्पन्न कर लिया । उसके द्वारा गार्हपत्य आदि तीनों अग्नियोंको भलीभाँति आहुति दे दी गयी ॥ १-२ ॥
वनस्पतिं च यो हन्यादमावास्यामबुद्धिमान् ।
अपि ह्येकेन पत्रेण लिप्यते ब्रह्महत्यया ॥ ३ ॥
जो मूर्ख अमावास्याके दिन किसी वनस्पतिका एक पत्ता भी तोड़ता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥ ३ ॥
दन्तकाष्ठं तु यः खादेदमावास्यामबुद्धिमान् ।
हिंसितश्चन्द्रमास्तेन पितरश्चोद्विजन्ति च ॥ ४ ॥
जो बुद्धिहीन मानव अमावास्या तिथिको दन्तधावन काष्ठ चबाता है, उसके द्वारा चन्द्रमाकी हिंसा होती है और पितर भी उससे उद्विग्न हो उठते हैं ॥ ४ ॥
हव्यं न तस्य देवाश्च प्रतिगृह्णन्ति पर्वसु ।
कुप्यन्ते पितरश्चास्य कुले वंशोऽस्य हीयते ॥ ५ ॥
पर्वके दिन उसके दिये हुए हविष्यको देवता नहीं ग्रहण करते हैं । उसके पितर भी कुपित हो जाते हैं और उसके कुलमें वंशकी हानि होती है ॥ ५ ॥
श्रीरुवाच
प्रकीर्णं भाजनं यत्र भिन्नभाण्डमथासनम् ।
योषितश्चैव हन्यते कश्मलोपहते गृहे ॥ ६ ॥
देवताः पितरश्चैव उत्सवे पर्वणीषु वा ।
निराशाः प्रतिगच्छन्ति कश्मलोपहताद् गृहात् ॥ ७ ॥
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लक्ष्मी बोलीं — जिस घरमें सब पात्र इधर - उधर बिखरे पड़े हों, बर्तन फूटे और आसन फटे हों तथा जहाँ स्त्रियाँ मारी -पीटी जाती हों, वह घर पापके कारण दूषित होता है । पापसे दूषित हुए उस गृहसे उत्सव और पर्वके अवसरोंपर देवता और पितर निराश लौट जाते हैं— उस घरकी पूजा नहीं स्वीकार करते ॥ ६-७ ॥ अंगिरा उवाच
यस्तु संवत्सरं पूर्णं दद्याद् दीपं करञ्जके ।
सुवर्चलामूलहस्तः प्रजा तस्य विवर्धते ॥ ८ ॥
अंगिराने कहा- जो पूरे एक वर्षतक करंज ( करज) वृक्षके नीचे दीपदान करे और ब्राह्मीबूटीकी जड़ हाथमें लिये रहे, उसकी संतति बढ़ती है ॥ ८ ॥
गार्ग्यउवाच
आतिथ्यं सततं कुर्याद् दीपं दद्यात् प्रतिश्रये ।
वर्जयानो दिवा स्वापं न च मांसानि भक्षयेत् ॥ ९ ॥
गोब्राह्मणं न हिंस्याच्च पुष्कराणि च कीर्तयेत् ।
एष श्रेष्ठतमो धर्मः सरहस्यो महाफलः ॥ १० ॥
गार्ग्यने कहा — सदा अतिथियोंका सत्कार करे, घरमें दीपक जलाये, दिनमें सोना छोड़ दे । मांस कभी न खाय । गौ और ब्राह्मणकी हत्या न करे तथा तीनों पुष्कर तीर्थोंका प्रतिदिन नाम लिया करे । यह रहस्यसहित श्रेष्ठतम धर्म महान् फल देनेवाला है ॥ ९ -१० ॥
अपि क्रतुशतैरिष्ट्वा क्षयं गच्छति तद्धविः ।
न तु क्षीयन्ति ते धर्माः श्रद्दधानैः प्रयोजिताः ॥ ११ ॥
सैकड़ों बार किये हुए यज्ञका फल भी क्षीण हो जाता है; किंतु श्रद्धालु पुरुषोंद्वारा उपर्युक्त धर्मोंका पालन किया जाय तो वे कभी क्षीण नहीं होते ॥ ११ ॥
इदं च परमं गुह्यं सरहस्यं निबोधत ।
श्राद्धकल्पे च दैवे च तैर्थिके पर्वणीषु च ॥ १२ ॥
रजस्वला च या नारी श्वित्रिकापुत्रिका च या ।
एताभिश्चक्षुषा दृष्टं हविर्नाश्नन्ति देवताः ॥ १३ ॥
पितरश्च न तुष्यन्ति वर्षाण्यपि त्रयोदश । यह परम गोपनीय रहस्यकी बात सुनो । श्राद्धमें, यज्ञमें, तीर्थमें और पर्वोंके दिन देवताओंके लिये जो हविष्य तैयार किया जाता है, उसे यदि रजस्वला, कोढ़ी अथवा वन्ध्या स्त्री देख ले तो उनके नेत्रोंद्वारा देखे हुए हविष्यको देवता नहीं ग्रहण करते हैं तथा पितर भी तेरह वर्षोंतक असंतुष्ट रहते हैं ॥ १२-१३३ ॥
शुक्लवासाः शुचिर्भूत्वा ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयेत् ।
कीर्तयेद् भारतं चैव तथा स्यादक्षयं हविः ॥ १४ ॥
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श्राद्ध और यज्ञके दिन मनुष्य स्नान आदिसे पवित्र होकर श्वेत वस्त्र धारण करे । ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये तथा महाभारत ( गीता आदि) का पाठ करे । ऐसा करनेसे उसका हव्य और कव्य अक्षय होता है ॥ १४ ॥
धौम्य उवाच
भिन्नभाण्डं च खट्वां च कुक्कुटं शुनकं तथा ।
अप्रशस्तानि सर्वाणि यश्च वृक्षो गृहेरुहः ॥ १५ ॥
धौम्य बोले- घरमें फूटे बर्तन, टूटी खाट, मुर्गा, कुत्ता और अश्वत्थादि वृक्षका होना अच्छा नहीं माना गया है ॥ १५ ॥
भिन्नभाण्डे कलिं प्राहुः खट्वायां तु धनक्षयः ।
कुक्कुटे शुनके चैव हविर्नाश्नन्ति देवताः ।
वृक्षमूले ध्रुवं सत्त्वं तस्माद् वृक्षं न रोपयेत् ॥ १६ ॥
फूटे बर्तनमें कलियुगका वास कहा गया है । टूटी खाट रहनेसे धनकी हानि होती है । मुर्गे और कुत्तेके रहनेपर देवता उस घरमें हविष्य नहीं ग्रहण करते तथा मकानके अंदर कोई बड़ा वृक्ष होनेपर उसकी जड़के अंदर साँप, बिच्छू आदि जन्तुओंका रहना अनिवार्य हो जाता है; इसलिये घरके भीतर पेड़ न लगावे ॥ १६ ॥
जमदग्निरुवाच
यो यजेदश्वमेधेन वाजपेयशतेन ह ।
अवाक्शिरा वा लम्बेत सत्रं वा स्फीतमाहरेत् ॥ १७ ॥
न यस्य हृदयं शुद्धं नरकं स ध्रुवं व्रजेत् ।
तुल्यं यज्ञश्च सत्यं च हृदयस्य च शुद्धता ॥ १८ ॥
जमदग्नि बोले – कोई अश्वमेध या सैकड़ों बाजपेय यज्ञ करे, नीचे मस्तक करके वृक्षमें लटके अथवा समृद्धिशाली सत्र खोल दे; किंतु जिसका हृदय शुद्ध नहीं है, वह पापी निश्चय ही नरकमें जाता है; क्योंकि यज्ञ, सत्य और हृदयकी शुद्धि तीनों बराबर हैं ( फिर भी हृदयकी शुद्धि सर्वश्रेष्ठ है ) ॥ १७-१८ ॥
शुद्धेन मनसा दत्त्वा सक्तुप्रस्थं द्विजातये ।
ब्रह्मलोकमनुप्राप्तः पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ १ ९ ॥
(प्राचीन समयमें एक ब्राह्मण) शुद्ध हृदयसे ब्राह्मणको सेरभर सत्तू दान करके ही ब्रह्मलोकको प्राप्त हुआ था । हृदयकी शुद्धिका महत्त्व बतानेके लिये यह एक ही दृष्टान्त पर्याप्त होगा ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि देवरहस्ये सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवताओंका रहस्यविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥
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अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः वायुके द्वारा धर्माधर्मके रहस्यका वर्णन वायुरुवाच
किंचिद् धर्मं प्रवक्ष्यामि मानुषाणां सुखावहम् ।
सरहस्याश्च ये दोषास्तान् शृणुध्वं समाहिताः ॥ १ ॥
वायुदेवने कहा — मैं मनुष्योंके लिये सुखदायक धर्मका किंचित् वर्णन करता हूँ और रहस्यसहित जो दोष हैं, उन्हें भी बतलाता हूँ । तुम सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ १ ॥
अग्निकार्यं च कर्तव्यं परमान्नेन भोजनम् ।
दीपकश्चापि कर्तव्यः पितॄणां सतिलोदकः ॥ २ ॥
प्रतिदिन अग्निहोत्र करना चाहिये । श्राद्धके दिन उत्तम अन्तके द्वारा ब्राह्मण - भोजन कराना चाहिये । पितरोंके लिये दीप दान तथा तिलमिश्रित जलसे तर्पण करना चाहिये ॥ २ ॥
एतेन विधिना मर्त्यः श्रद्दधानः समाहितः ।
चतुरो वार्षिकान् मासान् यो ददाति तिलोदकम् ॥ ३ ॥
भोजनं च यथाशक्त्या ब्राह्मणे वेदपारगे ।
पशुबन्धशतस्येह फलं प्राप्नोति पुष्कलम् ॥ ४ ॥
जो मनुष्य श्रद्धा और एकाग्रताके साथ इस विधिसे वर्षाके चार महीनोंतक पितरोंको तिलमिश्रित जलकी अंजलि देता है और वेद - शास्त्रके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको यथाशक्ति भोजन कराता है, वह सौ यज्ञोंका पूरा फल प्राप्त कर लेता है ॥ ३-४ ॥
इदं चैवापरं गुह्यमप्रशस्तं निबोधत ।
अग्नेस्तु वृषलो नेता हविर्मूढाश्च योषितः ॥ ५ ॥
मन्यते धर्म एवेति स चाधर्मेण लिप्यते ।
अग्नयस्तस्य कुप्यन्ति शूद्रयोनिं स गच्छति ॥ ६ ॥
अब यह दूसरी उस गोपनीय बातको सुनो, जो उत्तम नहीं है अर्थात् निन्दनीय है । यदि शूद्र किसी द्विजके अग्निहोत्रकी अग्निको एक स्थानसे दूसरे स्थानको ले जाता है तथा मूर्ख स्त्रियाँ यज्ञ- सम्बन्धी हविष्यको ले जाती हैं -इस कार्यको जो धर्म ही समझता है, वह अधर्मसे लिप्त होता है । उसके ऊपर अग्नियोंका कोप होता है और वह शूद्रयोनिमें जन्म लेता है ॥ ५-६ ॥
पितरश्च न तुष्यन्ति सह देवैर्विशेषतः ।
प्रायश्चित्तं तु यत् तत्र ब्रुवतस्तन्निबोध मे ॥ ७ ॥