06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1231–1240
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1231–1240
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अपनी प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखावे । राज्यमें स्थित रहकर प्रजाके पालनमें तत्पर रहे । लोभशून्य होकर न्याययुक्त बात कहे और प्रजाकी आयका छठा भागमात्र लेकर जीवन-निर्वाह करे ॥
कार्याकार्यविशेषज्ञः सर्वं धर्मेण पश्यति ।
स्वराष्ट्रेषु दयां कुर्यादकार्ये न प्रवर्तते ॥
कर्तव्य - अकर्तव्यको समझे । सबको धर्मकी दृष्टिसे देखे! अपने राष्ट्रके निवासियोंपर दया करे और कभी न करने योग्य कर्ममें प्रवृत न हो ॥
ये चैवैनं प्रशंसन्ति ये च निन्दन्ति मानवाः ।
शत्रुं च मित्रवत् पश्येदपराधविवर्जितम् ॥
जो मनुष्य राजाकी प्रशंसा करते हैं और जो उसकी निन्दा करते हैं, इनमेंसे शत्रु भी यदि निरपराध हो तो उसे मित्रके समान देखे ॥
अपराधानुरूपेण दुष्टं दण्डेन शासयेत् ।
धर्मः प्रवर्तते तत्र यत्र दण्डरुचिर्नृपः ॥
दुष्टको अपराधके अनुसार दण्ड देकर उसका शासन करे । जहाँ राजा न्यायोचित दण्डमें रुचि रखता है, वहाँ धर्मका पालन होता है ॥ नाधर्मो विद्यते तत्र यत्र राजाक्षमान्वितः ॥ अशिष्टशासनं धर्मः शिष्टानां परिपालनम् । जहाँ राजा क्षमाशील न हो, वहाँ अधर्म नहीं होता । अशिष्ट पुरुषोंको दण्ड देना और शिष्ट पुरुषोंका पालन करना राजाका धर्म है ॥ वध्यांश्च घातयेद् यस्तु अवध्यान् परिरक्षति ॥
अवध्या ब्राह्मणा गावो दूताश्चैव पिता तथा ।
विद्यां ग्राहयते यश्च ये च पूर्वोपकारिणः ॥
स्त्रियश्चैव न हन्तव्या यश्च सर्वातिथिर्नरः ॥
राजा वधके योग्य पुरुषोंका वध करे और जो वधके योग्य न हों, उनकी रक्षा करे । ब्राह्मण, गौ, दूत, पिता, जो विद्या पढ़ाता है वह अध्यापक तथा जिन्होंने पहले कभी उपकार किये हैं वे मनुष्य – ये सब - के - सब अवध्य माने गये हैं। स्त्रियोंका तथा जो सबका अतिथि- सत्कार करनेवाला हो, उस मनुष्यका भी वध नहीं करना चाहिये ॥
धरणीं गां हिरण्यं च सिद्धान्नं च तिलान् घृतम् ।
ददन्नित्यं द्विजातिभ्यो मुच्यते राजकिल्बिषात् ॥
पृथ्वी, गौ, सुवर्ण, सिद्धान्न, तिल और घी- इन वस्तुओंका ब्राह्मणके लिये प्रतिदिन दान करनेवाला राजा पापसे मुक्त हो जाता है ॥
एवं चरति यो नित्यं राजा राष्ट्रहिते रतः ।
तस्य राष्ट्रं धनं धर्मो यशः कीर्तिश्च वर्धते ॥
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जो राजा इस प्रकार राष्ट्रके हितमें तत्पर हो प्रतिदिन ऐसा बर्ताव करता है, उसके राष्ट्र, धन, धर्म, यश और कीर्तिका विस्तार होता है ॥ न च पापैर्न चानर्थैर्युज्यते स नराधिपः ॥ षड्भागमुपयुञ्जन् यः प्रजा राजा न रक्षति ॥
स्वचक्रपरचकाभ्यां धर्मैर्वा विक्रमेण वा ।
निरुद्योगो नृपो यश्च परराष्ट्रविघातने ॥
स्वराष्ट्रं निष्प्रतापस्य परचक्रेण हन्यते ॥
ऐसा राजा पाप और अनर्थका भागी नहीं होता । जो नरेश प्रजाकी आयके छठे भागका उपयोग तो करता है; परंतु धर्म या पराक्रमद्वारा स्वचक्र ( अपनी मण्डलीके लोगों ) तथा परचक्र ( शत्रुमण्डलीके लोगों) से प्रजाकी रक्षा नहीं करता एवं जो राजा दूसरेके राष्ट्रपर आक्रमण करनेके विषयमें सदा उद्योगहीन बना रहता है, उस प्रतापहीन राजाका राज्य शत्रुओं द्वारा नष्ट कर दिया जाता है ॥
यत् पापं परचक्रस्य परराष्ट्राभिघातने ।
तत् पापं सकलं राजा हतराष्ट्रः प्रपद्यते ॥
दूसरे चक्रके राजाके लिये दूसरेके राष्ट्रका विनाश करनेपर जो पाप लागू होता है, वह समूचा पाप उस राजाको भी प्राप्त होता है, जिसका राज्य उसीकी दुर्बलताके कारण शत्रुओंद्वारा नष्ट कर दिया जाता है ॥
मातुलं भागिनेयं वा मातरं श्वशुरं गुरुम् ।
पितरं वर्जयित्वैकं हन्याद् घातकमागतम् ॥
मामा, भानजा, माता, श्वशुर, गुरु तथा पिता–इनमेंसे प्रत्येकको छोड़कर यदि दूसरा कोई मनुष्य मारनेकी नीयतसे आ जाय तो उसे ( आततायी समझकर ) मार डालना चाहिये ॥
स्वस्य राष्ट्रस्य रक्षार्थं युध्यमानस्तु यो हतः ।
संग्रामे परचक्रेण श्रूयतां तस्य या गतिः ॥
जो राजा अपने राष्ट्रकी रक्षाके लिये युद्धमें जूझता हुआ शत्रुमण्डलके द्वारा मारा जाता है, उसे जो गति मिलती है, उसको श्रवण करो ॥
विमाने तु वरारोहे अप्सरोगणसेविते ।
शक्रलोकमितो याति संग्रामे निहतो नृपः ॥
वरारोहे! संग्राममें मारा गया नरेश अप्सराओंसे सेवित विमानपर आरूढ़ हो इस लोकसे इन्द्रलोकमें जाता है ॥
यावन्तो रोमकूपाः स्युस्तस्य गात्रेषु सुन्दरि ।
तावद्वर्षसहस्राणि शक्रलोके महीयते ॥
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सुन्दरि! उसके अंगोंमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही हजार वर्षोंतक वह इन्द्रलोकमें सम्मानित होता है ॥
यदि वै मानुषे लोके कदाचिदुपपद्यते ।
राजा वा राजमात्रो वा भूयो भवति वीर्यवान् ॥
यदि कदाचित् वह फिर मनुष्यलोकमें आता है तो पुनः राजा या राजाके तुल्य ही शक्तिशाली पुरुष होता है ॥
तस्माद् यत्नेन कर्तव्यं स्वराष्ट्रपरिपालनम् ।
व्यवहाराश्च चारश्च सततं सत्यसंधता ॥
अप्रमादः प्रमोदश्च व्यवसायेऽप्यचण्डता ।
भरणं चैव भृत्यानां वाहनानां च पोषणम् ॥
योधानां चैव सत्कारः कृते कर्मण्यमोघता ।
श्रेय एव नरेन्द्राणामिह चैव परत्र च ॥
इसलिये राजाको यत्नपूर्वक अपने राष्ट्रकी रक्षा करनी चाहिये । राजोचित व्यवहारोंका पालन, गुप्तचरोंकी नियुक्ति, सदा सत्यप्रतिज्ञ होना, प्रमाद न करना, प्रसन्न रहना, व्यवसायमें अत्यन्त कुपित न होना, भृत्यवर्गका भरण और वाहनोंका पोषण करना, योद्धाओंका सत्कार करना और किये हुए कार्यमें सफलता लाना - यह सब राजाओंका कर्तव्य है । ऐसा करनेसे उन्हें इहलोक और परलोकमें भी श्रेयकी प्राप्ति होती है ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )
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[अहिंसाकी और इन्द्रिय - संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता ] उमोवाच
देवदेव महादेव सर्वदेवनमस्कृत ।
यानि धर्मरहस्यानि श्रोतुमिच्छामि तान्यहम् ॥
उमाने कहा — सर्वदेववन्दित देवाधिदेव महादेव! अब मैं धर्मके रहस्योंको सुनना चाहती हूँ ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
अहिंसा परमो धर्मो ह्यहिंसा परमं सुखम् ।
अहिंसा धर्मशास्त्रेषु सर्वेषु परमं पदम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— अहिंसा परम धर्म है | अहिंसा परम सुख है । सम्पूर्ण धर्मशास्त्रोंमें अहिंसाको परमपद बताया गया है ॥
देवतातिथिशुश्रूषा सततं धर्मशीलता ।
वेदाध्ययनयज्ञाश्च तपो दानं दमस्तथा ॥
आचार्यगुरुशुश्रूषा तीर्थाभिगमनं तथा ।
अहिंसाया वरारोहे कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥
एतत् ते परमं गुह्यमाख्यातं परमार्चितम् ॥
वरारोहे! देवताओं और अतिथियोंकी सेवा, निरन्तर धर्मशीलता, वेदाध्ययन, यज्ञ, तप, दान, दम, गुरु और आचार्यकी सेवा तथा तीर्थोंकी यात्रा - ये सब अहिंसा- धर्मकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं । यह मैंने तुम्हें धर्मका परम गुह्य रहस्य बताया है, जिसकी शास्त्रोंमें भूरि- भूरि प्रशंसा की गयी है ॥ निरुणद्धीन्द्रियाण्येव स सुखी स विचक्षणः ॥
इन्द्रियाणां निरोधेन दानेन च दमेन च ।
नरः सर्वमवाप्नोति मनसा यद् यदिच्छति ॥
जो अपनी इन्द्रियोंका निरोध करता है, वही सुखी है और वही विद्वान् है । इन्द्रियोंके निरोधसे, दानसे और इन्द्रिय - संयमसे मनुष्य मनमें जिस - जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब पा लेता है ॥
यतो यतो महाभागे हिंसा स्यान्महती ततः ।
निवृत्तो मधुमांसाभ्यां हिंसा त्वल्पतरा भवेत् ॥
महाभागे! जिस - जिस ओरसे भारी हिंसाकी सम्भावना हो, उससे तथा मद्य और मांससे मनुष्यको निवृत्त हो जाना चाहिये । इससे हिंसाकी सम्भावना बहुत कम हो जाती है ॥ निवृत्तिः परमो धर्मो निवृत्तिः परमं सुखम् ।
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मनसा विनिवृत्तानां धर्मस्य निचयो महान् ॥ निवृत्ति परम धर्म है, निवृत्ति परम सुख है, जो मनसे विषयोंकी ओरसे निवृत्त हो गये हैं, उन्हें विशाल धर्मराशिकी प्राप्ति होती है ॥
मनः पूर्वागमा धर्मा अधर्माश्च न संशयः ।
मनसा बद्ध्यते चापि मुच्यते चापि मानवः ॥
निगृहीते भवेत् स्वर्गो विसृष्टे नरको ध्रुवः । इसमें संदेह नहीं कि धर्म और अधर्म पहले मनमें ही आते हैं। मनसे ही मनुष्य बँधता है और मनसे ही मुक्त होता है । यदि मनको वशमें कर लिया जाय, तब तो स्वर्ग मिलता है और यदि उसे खुला छोड़ दिया जाय तो नरककी प्राप्ति अवश्यम्भावी है ॥
जीवाः पुराकृतेनैव तिर्यग्योनिसरीसृपाः ।
नानायोनिषु जायन्ते स्वकर्मपरिवेष्टिताः ॥
जीव अपने पूर्वकृत कर्मके ही फलसे पशु -पक्षी एवं कीट आदि होते हैं । अपने - अपने कर्मोंसे बँधे हुए प्राणी ही भिन्न- भिन्न योनियोंमें जन्म लेते हैं ॥
जायमानस्य जीवस्य मृत्युः पूर्वं प्रजायते ।
सुखं वा यदि वा दुःखं यथापूर्वं कृतं तु वा ॥
जो जीव जन्म लेता है, उसकी मृत्यु पहले ही पैदा हो जाती है । मनुष्यने पूर्व जन्ममें जैसा कर्म किया है, तदनुसार ही उसे सुख या दुःख प्राप्त होता है ॥
अप्रमत्तः प्रमत्तेषु विधिर्जागर्ति जन्तुषु ।
न हि तस्य प्रियः कश्चिन्न द्वेष्यो न च मध्यमः ॥
प्राणी प्रमादमें पड़कर भले ही सो जायँ, परंतु उनका प्रारब्ध या दैव प्रमादशून्य-सावधान होकर सदा जागता रहता है । उसका न कोई प्रिय है, न द्वेषपात्र है और न कोई मध्यस्थ ही है ॥
समः सर्वेषु भूतेषु कालः कालं निरीक्षते ।
गतायुषो ह्याक्षिपते जीवः सर्वस्य देहिनः ॥
काल समस्त प्राणियोंके प्रति समान है । वह अवसरकी प्रतीक्षा करता रहता है । जिनकी आयु समाप्त हो गयी है, उन्हीं प्राणियोंका वह संहार करता है । वही समस्त देहधारियोंका जीवन है ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )
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[ त्रिवर्गका निरूपण तथा कल्याणकारी आचार- व्यवहारका वर्णन ] श्रीमहेश्वर उवाच
विद्या वार्ता च सेवा च कारुत्वं नाट्यता तथा ।
इत्येते जीवनार्थाय मर्त्यानां विहिताः प्रिये ॥
श्रीमहेश्वरने कहा – प्रिये! विद्या, वार्ता, सेवा, शिल्पकला और अभिनय-कला — ये मनुष्योंके जीवन- निर्वाहके लिये पाँच वृत्तियाँ बनायी गयी हैं ॥
विद्यायोगस्तु सर्वेषां पूर्वमेव विधीयते ।
कार्याकार्यं विजानन्ति विद्यया देवि नान्यथा ॥
देवि! सभी मनुष्योंके लिये विद्याका योग पहले ही निश्चित कर दिया जाता है । विद्यासे लोग कर्तव्य और अकर्तव्यको जानते हैं, अन्यथा नहीं ॥
विद्यया स्फीयते ज्ञानं ज्ञानात् तत्त्वविदर्शनम् ।
दृष्टतत्त्वो विनीतात्मा सर्वार्थस्य च भाजनम् ॥
विद्यासे ज्ञान बढ़ता है, ज्ञानसे तत्त्वका दर्शन होता है और तत्त्वका दर्शन कर लेनेके पश्चात् मनुष्य विनीतचित्त होकर समस्त पुरुषार्थोंका भाजन हो जाता है ॥ शक्यं विद्याविनीतेन लोके संजीवनं शुभम ॥
आत्मानं विद्यया तस्मात् पूर्वं कृत्वा तु भाजनम् ।
वश्येन्द्रियो जितक्रोधो भूतात्मानं तु भावयेत् ॥
विद्यासे विनीत हुआ पुरुष संसारमें शुभ जीवन बिता सकता है; अतः अपने आपको पहले विद्याद्वारा पुरुषार्थका भाजन बनाकर क्रोधविजयी एवं जितेन्द्रिय पुरुष सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा- परमात्माका चिन्तन करे ॥ भावयित्वा तदाऽऽत्मानं पूजनीयः सतामपि ॥ कुलानुवृत्तं वृत्तं वा पूर्वमात्मा समाश्रयेत् ।
परमात्माका चिन्तन करके मनुष्य सत्पुरुषोंके लिये भी पूजनीय बन जाता है ।
जीवात्मा पहले कुल - परम्परासे चले आते हुए सदाचारका ही आश्रय ले ॥
यदि चेद् विद्यया चैव वृत्तिं काङ्क्षेदथात्मनः ॥
राजविद्यां तु वा देवि लोकविद्यामथापि वा ।
तीर्थतश्चापि गृह्णीयाच्छुश्रूषादिगुणैर्युतः ॥
ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव दृढं कुर्यात् प्रयत्नतः ॥
देवि! यदि विद्यासे अपनी जीविका चलानेकी इच्छा हो तो शुश्रूषा आदि गुणोंसे सम्पन्न हो किसी गुरुसे राजविद्या अथवा लोकविद्याकी शिक्षा ग्रहण करे और उसे ग्रन्थ एवं अर्थके अभ्यासद्वारा प्रयत्नपूर्वक दृढ़ करे ॥ एवं विद्याफलं देवि प्राप्नुयान्नान्यथा नरः ।
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न्यायाद् विद्याफलानीच्छेदधर्मं तत्र वर्जयेत् ॥ देवि! ऐसा करनेसे मनुष्य विद्याका फल पा सकता है, अन्यथा नहीं । न्यायसे ही
विद्याजनित फलोंको पानेकी इच्छा करे । वहाँ अधर्मको सर्वथा त्याग दे ॥
यदिच्छेद् वार्तया वृत्तिं काङ्क्षेत विधिपूर्वकम् ।
क्षेत्रे जलोपपन्ने च तद्योग्यं कृषिमाचरेत् ॥
यदि वार्तावृत्तिके द्वारा जीविका चलानेकी इच्छा हो तो जहाँ सींचनेके लिये जलकी व्यवस्था हो, ऐसे खेतमें तदनुरूप कार्य विधिपूर्वक करे ॥ वाणिज्यं वा यथाकालं कुर्यात् तद्देशयोगतः । मूल्यमर्थं प्रयासं च विचार्यैव व्ययोदयौ । अथवा यथासमय उस देशकी आवश्यकताके अनुसार वस्तु, उसके मूल्य, व्यय, लाभ और परिश्रम आदिका भलीभाँति विचार करके व्यापार करे ॥ पशुसंजीवनं चैव देशगः पोषयेद् ध्रुवम् ॥ बहुप्रकारा बहवः पशवस्तस्य साधकाः ॥ देशवासी पुरुषको पशुओंका पालन -पोषण भी अवश्य करना चाहिये । अनेक प्रकारके बहुसंख्यक पशु भी उसके लिये अर्थप्राप्तिके साधक हो सकते हैं ॥
यः कश्चित् सेवया वृत्तिं कांक्षेत मतिमान् नरः ।
यतात्मा श्रवणीयानां भवेद् वै सम्प्रयोजकः ॥
जो कोई बुद्धिमान् मनुष्य सेवाद्वारा जीवननिर्वाह करना चाहे तो वह मनको संयममें रखकर श्रवण करनेयोग्य मीठे वचनोंका प्रयोग करे ॥
यथा यथा स तुष्येत तथा संतोषयेत् तु तम् ।
अनुजीविगुणोपेतः कुर्यादात्मानमाश्रितम् ॥
जैसे - जैसे सेव्य स्वामी संतुष्ट रहे, वैसे ही वैसे उसे संतोष दिलावे । सेवकके गुणोंसे सम्पन्न हो अपने आपको स्वामीके आश्रित रखे ॥ विप्रियं नाचरेत् तस्य एषा सेवा समासतः ॥ विप्रयोगात् पुरा तेन गतिमन्यां न लक्षयेत् ॥ स्वामीका कभी अप्रिय न करे, यही संक्षेपसे सेवाका स्वरूप है । उसके साथ वियोग होनेसे पहले अपने लिये दूसरी कोई गति न देखे ॥
कारुकर्म च नाट्यं च प्रायशो नीचयोनिषु ।
तयोरपि यथायोगं न्यायतः कर्मवेतनम् ॥
शिल्पकर्म अथवा कारीगरी और नाट्यकर्म प्रायः निम्न जातिके लोगोंमें चलते हैं ।
शिल्प और नाट्यमें भी यथायोग्य न्यायानुसार कार्यका वेतन लेना चाहिये ॥
आर्जवेभ्योऽपि सर्वेभ्यः स्वार्जवाद् वेतनं हरेत् ।
अनार्जवादाहरतस्तत् तु पापाय कल्पते ॥
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सरल व्यवहारवाले सभी मनुष्योंसे सरलतासे ही वेतन लेना चाहिये । कुटिलतासे वेतन लेनेवालेके लिये वह पापका कारण बनता है ॥
सर्वेषां पूर्वमारम्भांश्चिन्तयेन्नयपूर्वकम् ।
आत्मशक्तिमुपायांश्च देशकालौ च युक्तितः ॥
कारणानि प्रवासं च प्रक्षेपं च फलोदयम् ॥
एवमादीनि संचिन्त्य दृष्ट्वा दैवानुकूलताम् ।
अतः परं समारम्भेद् यत्रात्महितमाहितम् ॥
जीविका - साधनके जितने उपाय हैं, उन सबके आरम्भोंपर पहले न्यायपूर्वक विचार करे । अपनी शक्ति, उपाय, देश, काल, कारण, प्रवास, प्रक्षेप और फलोदय आदिके विषयमें युक्तिपूर्वक विचार एवं चिन्तन करके दैवकी अनुकूलता देखकर जिसमें अपना हित निहित दिखायी दे, उसी उपायका आलम्बन करे ॥
वृत्तिमेवं समासाद्य तां सदा परिपालयेत् ।
दैवमानुषविघ्नेभ्यो न पुनर्भ्रश्यते यथा ॥
इस प्रकार अपने लिये जीविकावृति चुनकर उसका सदा ही पालन करे और ऐसा प्रयत्न करे, जिससे वह दैव और मानुष विघ्नोंसे पुनः उसे छोड़ न बैठे ॥
पालयन् वर्धयन् भुञ्जंस्तां प्राप्य न विनाशयेत् ।
क्षीयते गिरिसंकाशमश्नतो ह्यनपेक्षया ॥
रक्षा, वृद्धि और उपभोग करते हुए उस वृत्तिको पाकर नष्ट न करे । यदि रक्षा आदिकी चिन्ता छोड़कर केवल उपभोग ही किया जाय तो पर्वत- जैसी धनराशि भी नष्ट हो जाती है ॥
आजीवेभ्यो धनं प्राप्य चतुर्धा विभजेद् बुधः ।
धर्मायार्थाय कामाय आपत्प्रशमनाय च ॥
आजीविकाके उपायोंसे धनका उपार्जन करके विद्वान् पुरुष धर्म, अर्थ, काम तथा संकट- निवारण— इन चारोंके उद्देश्यसे उस धनके चार भाग करे ॥ चतुर्ष्वपि विभागेषु विधानं शृणु भामिनि ॥ यज्ञार्थं चान्नदानार्थं दीनानुग्रहकारणात् ॥ देवब्राह्मणपूजार्थं पितृपूजार्थमेव च ॥
मूलार्थं संनिवासार्थं क्रियानित्यैश्च धार्मिकैः ।
एवमादिषु चान्येषु धर्मार्थं संत्यजेद् धनम् ॥
भामिनि! इन चारों विभागोंमें भी जैसा विधान है, उसे सुनो। यज्ञ करने, दीन-दुःखियोंपर अनुग्रह करके अन्न देने, देवताओं, ब्राह्मणों तथा पितरोंकी पूजा करने, मूलधनकी रक्षा करने, सत्पुरुषोंके रहने तथा क्रियापरायण धर्मात्मा पुरुषोंके सहयोगके लिये तथा इसी प्रकार अन्यान्य सत्कर्मोंके उद्देश्यसे धर्मार्थ धनका दान करे ॥
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धर्मकार्ये धनं दद्यादनवेक्ष्य फलोदयम् ।
ऐश्वर्यस्थानलाभार्थं राजवाल्लभ्यकारणात् ॥
वार्तायां च समारम्भेऽमात्यमित्रपरिग्रहे ।
आवाहे च विवाहे च पूर्णानां वृत्तिकारणात् ॥
अर्थोदयसमावाप्तावनर्थस्य विघातने ।
एवमादिषु चान्येषु अर्थार्थं विसृजेद् धनम् ॥
फलकी प्राप्तिका विचार न करके धर्मके कार्यमें धन देना चाहिये । ऐश्वर्यपूर्ण स्थानकी प्राप्तिके लिये, राजाका प्रिय होनेके लिये, कृषि, गोरक्षा अथवा वाणिज्यके आरम्भके लिये, मन्त्रियों और मित्रोंके संग्रहके लिये, आमन्त्रण और विवाहके लिये, पूर्ण पुरुषोंकी वृत्तिके लिये, धनकी उत्पत्ति एवं प्राप्तिके लिये तथा अनर्थके निवारण और ऐसे ही अन्य कार्योंके लिये अर्थार्थ धनका त्याग करना चाहिये ॥
अनुबन्धं हेतुयुक्तं दृष्ट्वा वित्तं परित्यजेत् ।
अनर्थं बाधते ह्यर्थो अर्थं चैव फलान्युत ॥
हेतुयुक्त अनुबन्ध ( सकारण सम्बन्ध ) देखकर उसके लिये धनका त्याग करना चाहिये ।
अर्थ अनर्थका निवारण करता है तथा धन एवं अभीष्ट फलकी प्राप्ति कराता है ॥
नाधनाः प्राप्नुवन्त्यर्थं नरा यत्नशतैरपि ।
तस्माद् धनं रक्षितव्यं दातव्यं च विधानतः ॥
निर्धन मनुष्य सैकड़ों यत्न करके भी धन नहीं पा सकते । अतः धनकी रक्षा करनी चाहिये तथा विधिपूर्वक उसका दान करना चाहिये ॥
शरीरपोषणार्थाय आहारस्य विशेषणे ।
एवमादिषु चान्येषु कामार्थं विसृजेद् धनम् ॥
शरीरके पोषणके लिये विशेष प्रकारके आहारकी व्यवस्था तथा ऐसे ही अन्य कार्योंके निमित्त कामार्थ धनका व्यय करना उचित है ॥
विचार्य गुणदोषौ तु त्रयाणां तत्र संत्यजेत् ।
चतुर्थं संनिदध्याच्च आपदर्थं शुचिस्मिते ॥
गुण-ग-दोषका विचार करके धर्म, अर्थ और काम- सम्बन्धी धनोंका तत्तत् कार्योंमें व्यय करना चाहिये । शुचिस्मिते! धनका जो चौथा भाग है, उसे आपत्तिकालके लिये सदा सुरक्षित रखे ॥
राज्यभ्रंशविनाशार्थं दुर्भिक्षार्थं च शोभने ।
महाव्याधिविमोक्षार्थं वार्धक्यस्यैव कारणात् ॥
शत्रूणां प्रतिकाराय साहसैश्चाप्यमर्षणात् ॥
प्रस्थाने चान्य देशार्थमापदां विप्रमोक्षणे ।
एवमादिसमुद्धिश्य संनिदध्यात् स्वकं धनम् ॥
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शोभने! राज्य- विध्वंसका निवारण करने, दुर्भिक्षके समय काम आने, बड़े - बड़े रोगोंसे छुटकारा पाने, बुढ़ापेमें जीवन - निर्वाह करने, साहस और अमर्षपूर्वक शत्रुओंसे बदला लेने, विदेश- यात्रा करने तथा सब प्रकारकी आपत्तियोंसे छुटकारा पाने आदिके उद्देश्यसे अपने धनको अपने निकट बचाये रखना चाहिये ॥
सुखमर्थवतां लोके कृच्छ्राणां विप्रमोक्षणम् ।
धन संकटोंसे छुड़ानेवाला है, इसलिये इस जगत् में धनवानोंको सुख होता है ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं च परमं यशः ।
त्रिवर्गो हि वशे युक्तः सर्वेषां शं विधीयते ॥
तथा संवर्तमानास्तु लोकयोर्हितमाप्नुयुः ॥
वह धन यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है । इतना ही नहीं, वह परम यशस्वरूप है । धर्म, अर्थ और काम यह त्रिवर्ग कहलाता है । वह जिनके वशमें होता है, उन सबके लिये कल्याणकारी होता है । ऐसा बर्ताव करनेवाले लोग उभय लोकमें अपना हित साधन करते हैं ॥
काल्योत्थानं च शौचं च देवब्राह्मणभक्तितः ।
गुरूणामेव शुश्रूषा ब्राह्मणेष्वभिवादनम् ॥
प्रत्युत्थानं च वृद्धानां देवस्थानप्रणामनम् ।
आभिमुख्यं पुरस्कृत्य अतिथीनां च पूजनम् ॥
वृद्धोपदेशकरणं श्रवणं हितपथ्ययोः ।
पोषणं भृत्यवर्गस्य सान्त्वदानपरिग्रहैः ॥
न्यायतः कर्मकरणमन्यायाहितवर्जितम् ।
सम्यग्वृत्तं स्वदारेषु दोषाणां प्रतिषेधनम् ॥
पुत्राणां विनयं कुर्यात् तत्तत्कार्यनियोजनम् ।
वर्जनं चाशुभार्थानां शुभानां जोषणं तथा ॥
कुलोचितानां धर्माणां यथावत् परिपालनम् ।
कुलसंधारणं चैव पौरुषेणैव सर्वशः ।
एवमादि शुभं सर्वं तस्य वृत्तमिति स्थितम् ॥
प्रातःकाल उठना, शौच- स्नान करके शुद्ध होना, देवताओं और ब्राह्मणोंमें भक्ति रखते हुए गुरुजनोंकी सेवा तथा ब्राह्मण- वर्गको प्रणाम करना, बड़े - बूढ़ोंके आनेपर उठकर उनका स्वागत करना, देवस्थानमें मस्तक झुकाना, अतिथियोंके सम्मुख होकर उनका उचित आदर- सत्कार करना, बड़े - बूढ़ोंके उपदेशको मानना और आचरणमें लाना, उनके हितकर और लाभदायक वचनोंको सुनना, भृत्यवर्गको सान्त्वना और अभीष्ट वस्तुका दान देकर अपनाते हुए उसका पालन- पोषण करना, न्याययुक्त कर्म करना, अन्याय और अहितकर कार्यको त्याग देना, अपनी स्त्रीके साथ अच्छा बर्ताव करना, दोषोंका निवारण करना,