श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1241–1250

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1241–1250

पृष्ठ 1241

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पुत्रोंको विनय सिखाना, उन्हें भिन्न- भिन्न आवश्यक कार्योंमें लगाना, अशुभ पदार्थोंको त्याग देना, शुभ पदार्थोंका सेवन करना, कुलोचित धर्मोंका यथावत् रूपसे पालन करना और अपने ही पुरुषार्थसे सर्वथा अपने कुलकी रक्षा करना इत्यादि सारे शुभ व्यवहार वृत्त कहे गये हैं ॥

वृद्धसेवी भवेन्नित्यं हितार्थं ज्ञानकाङ्क्षया ।

परार्थं नाहरेद् द्रव्यमनामन्त्र्य तु सर्वदा ॥

प्रतिदिन अपने हितके लिये और ज्ञान-प्राप्तिकी इच्छासे वृद्ध पुरुषोंका सेवन करे ।

दूसरेके द्रव्यको उससे पूछे बिना कदापि न ले ॥

न याचेत परान् धीरः स्वबाहुबलमाश्रयेत् ॥

स्वशरीरं सदा रक्षेदाहाराचारयोरपि ।

हितं पथ्यं सदाहारं जीर्णं भुञ्जीत मात्रया ॥

धीर पुरुष दूसरेसे याचना न करे । अपने बाहुबलका भरोसा रखे । आहार और आचार-व्यवहारमें भी सदा अपने शरीरकी रक्षा करे। जो भोजन हितकर एवं लाभदायक हो तथा अच्छी तरह पक गया हो, उसीको नियत मात्रामें ग्रहण करे ॥

देवतातिथिसत्कारं कृत्वा सर्वं यथाविधि ।

शेषं भुञ्जेच्छुचिर्भूत्वा न च भाषेत विप्रियम् ॥

देवताओं और अतिथियोंको पूर्णरूपसे विधिपूर्वक सत्कार करके शेष अन्नका पवित्र होकर भोजन करे और कभी किसीसे अप्रिय वचन न बोले ॥

प्रतिश्रयं च पानीयं बलिं भिक्षां च सर्वतः ।

गृहस्थवासी व्रतवान् दद्याद् गाश्चैव पोषयेत् ॥

गृहस्थ पुरुष धर्मपालनका व्रत लेकर अतिथिके लिये ठहरनेका स्थान, जल, उपहार और भिक्षा दे तथा गौओंका पालन - पोषण करे ॥

बहिर्निष्क्रमणं चैव कुर्यात् कारणतोऽपि वा ।

मध्याह्ने वार्धरात्रे वा गमनं नैव रोचयेत् ॥

वह किसी विशेष कारणसे बाहरकी यात्रा भी कर सकता है, परंतु दोपहर या आधी रातके समय उसे प्रस्थान करनेका विचार नहीं करना चाहिये ॥

विषयान् नावगाहेत स्वशक्त्या तु समाचरेत् ।

यथाऽऽयव्ययता लोके गृहस्थानां प्रपूजिता ॥

विषयोंमें डूबा न रहे । अपनी शक्तिके अनुसार धर्माचरण करे । गृहस्थ पुरुषकी जैसी आय हो, उसके अनुसार ही यदि उसका व्यय हो तो लोकमें उसकी प्रशंसा की जाती है ॥

अयशस्करमर्थघ्नं कर्म यत् परपीडनम् ।

भयाद् वा यदि वा लोभान्न कुर्वीत कदाचन ॥

पृष्ठ 1242

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भय अथवा लोभवश कभी ऐसा कर्म न करे जो यश और अर्थका नाशक तथा दूसरोंको पीड़ा देनेवाला हो ॥

बुद्धिपूर्वं समालोक्य दूरतो गुणदोषतः ।

आरभेत तदा कर्म शुभं वा यदि वेतरत् ॥

किसी कर्मके गुण और दोषको दूरसे ही बुद्धिपूर्वक देखकर तदनन्तर उस शुभ कर्मको लाभदायक समझे तो आरम्भ करे या अशुभका त्याग करे ॥

आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनस्तु शुभाशुभे ।

मनसा कर्मणा वाचा न च कांक्षेत पातकम् ॥

अपने शुभ और अशुभ कर्ममें सदा अपने - आपको ही साक्षी माने और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा कभी पाप करनेकी इच्छा न करे ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )

पृष्ठ 1243

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[विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन ] उमोवाच

सुरासुरपते देव वरद प्रीतिवर्धन ।

मानुषेष्वेव ये केचिदाढ्याः क्लेशविवर्जिताः ॥

भुञ्जाना विविधान् भोगान् दृश्यन्ते निरुपद्रवाः ॥

अपरे क्लेशसंयुक्ता दरिद्रा भोगवर्जिताः ॥

किमर्थं मानुषे लोके न समत्वेन कल्पिताः ।

एतच्छ्रोतुं महादेव कौतूहलमतीव मे ॥

उमाने पूछा — सुरासुरपते! सबकी प्रीति बढ़ानेवाले वरदायक देव! मनुष्योंमें ही कितने ही लोग क्लेशशून्य, उपद्रवरहित एवं धन- धान्यसे सम्पन्न होकर भाँति - भाँतिके भोग भोगते देखे जाते हैं और दूसरे बहुत- से मनुष्य क्लेशयुक्त, दरिद्र एवं भोगों से वंचित पाये जाते हैं । महादेव! मनुष्यलोकमें सब लोग समान क्यों नहीं बनाये गये ( वहाँ इतनी विषमता क्यों है )? यह सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ श्रीमहेश्वर उवाच यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमश्नुते । स्वकृतस्य फलं भुङ्क्ते नान्यस्तद् भोक्तुमर्हति । श्रीमहेश्वर कहते हैं— देवि! जीव जैसा कर्म करता है, वैसा फल पाता है । वह अपने किये हुएका फल स्वयं ही भोगता है, दूसरा कोई उसे भोगनेका अधिकारी नहीं है ॥

अपरे धर्मकामेभ्यो निवृत्ताश्च शुभेक्षणे ।

कदर्या निरनुक्रोशाः प्रायेणात्मपरायणाः ॥

तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने ।

दरिद्राः क्लेशभूयिष्ठा भवन्त्येव न संशयः ॥

शुभेक्षणे! जो लोग धर्म और कामसे निवृत्त हो लोभी, निर्दयी और प्रायः अपने ही शरीरके पोषक हो जाते हैं, शोभने! ऐसे लोग मृत्युके पश्चात् जब पुनः जन्म लेते हैं, तब

दरिद्र और अधिक क्लेशके भागी होते हैं । इसमें संशय नहीं है ॥

उमोवाच

मानुषेष्वथ ये केचिद् धनधान्यसमन्विताः ।

भोगहीनाः प्रदृश्यन्ते सर्वभोगेषु सत्स्वपि ॥

न भुञ्जते किमर्थं ते तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! मनुष्योंमें जो लोग धन- धान्यसे सम्पन्न हैं, उनमेंसे भी कितने ही ऐसे हैं, जो सम्पूर्ण भोगोंके होनेपर भी भोगहीन देखे जाते हैं । वे उन भोगोंको क्यों नहीं

पृष्ठ 1244

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भोगते? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

परैः संचोदिता धर्मं कुर्वते न स्वकामतः ।

धर्मश्रद्धां बहिष्कृत्य कुर्वन्ति च रुदन्ति च ॥

तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने ।

फलानि तानि सम्प्राप्य भुञ्जते न कदाचन ॥

रक्षन्तो वर्धयन्तश्च आसते निधिपालवत् ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! जो दूसरोंसे प्रेरित होकर धर्म करते हैं, स्वेच्छासे नहीं तथा धर्मविषयक श्रद्धाको दूर करके अश्रद्धासे दान या धर्म करते हैं और उसके लिये रोते या पछताते हैं; शोभने! ऐसे लोग जब मृत्युको प्राप्त होकर फिर जन्म लेते हैं तो धर्मके उन फलोंको पाकर कभी भोगते नहीं हैं । केवल खजानेकी रक्षा करनेवाले सिपाहीकी भाँति उस धनकी रखवाली करते हुए उसे बढ़ाते रहते हैं ॥ उमोवाच

केचिद् धनवियुक्ताश्च भोगयुक्ता महेश्वर ।

मानुषाः सम्प्रदृश्यन्ते तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — महेश्वर! कितने ही मनुष्य धनहीन होनेपर भी भोगयुक्त दिखायी देते हैं ।

इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच नित्यं ये दातुमनसो नरा वित्तेष्वसत्स्वपि ॥

कालधर्मवशं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि ते नराः ।

एते धनविहीनाश्च भोगयुक्ता भवन्त्युत ॥

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो धन न होनेपर भी सदा दान देनेकी इच्छा रखते हैं, वे मनुष्य मृत्युके पश्चात् जब फिर जन्म लेते हैं, तब निर्धन होनेके साथ ही भोगयुक्त होते हैं ( धर्मके प्रभावसे उनके योगक्षेमकी व्यवस्था होती रहती है ) ॥

धर्मदानोपदेशं वा कर्तव्यमिति निश्चयः ।

इति ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

अतः धर्म और दानका उपदेश करना चाहिये - यह विद्वानोंका निश्चय है । देवि! तुम्हारे इस प्रश्नका उत्तर तो दे दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ उमोवाच

भगवन् देवदेवेश त्रियक्ष वृषभध्वज ।

मानुषास्त्रिविधा देव दृश्यन्ते सततं विभो ॥

पृष्ठ 1245

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उमाने कहा — भगवन्! देवदेवेश्वर! त्रिलोचन! वृषभध्वज! देव! विभो! मनुष्य तीन प्रकारके दिखायी देते हैं ॥

आसीना एव भुञ्जन्ते स्थानैश्वर्यपरिग्रहैः ।

अपरे यत्नपूर्वं तु लभन्ते भोगसंग्रहम् ॥

अपरे यतमानाश्च न लभन्ते तु किंचन ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

कुछ लोग बैठे - बैठे ही उत्तम स्थान, ऐश्वर्य और विविध भोगोंका संग्रह पाकर उनका उपभोग करते हैं । दूसरे लोग यत्नपूर्वक भोगोंका संग्रह कर पाते हैं, और तीसरे ऐसे हैं, जो

यत्न करनेपर भी कुछ नहीं पाते । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामासि भामिनि ॥

ये लोके मानुषा देवि दानधर्मपरायणाः ।

पात्राणि विधिवज्ज्ञात्वा दूरतोऽप्यनुमानतः ॥

अभिगम्य स्वयं तत्र ग्राहयन्ति प्रसाद्य च ।

दानादि चेङ्गितैरेव तैरविज्ञातमेव वा ॥

पुनर्जन्मनि ते देवि तादृशाः शोभना नराः ।

अयत्नतस्तु तान्येव फलानि प्राप्नुवन्त्युत ॥

आसीना एव भुञ्जन्ते भोगान् सुकृतभागिनः । श्रीमहेश्वरने कहा – महाभागे! भामिनि! तुम न्यायतः मेरा उपदेश सुनना चाहती हो, अतः सुनो । देवि! दानधर्ममें तत्पर रहनेवाले जो मनुष्य संसारमें दानके सुयोग्य पात्रोंका विधिवत् ज्ञान प्राप्त करके अथवा अनुमानसे भी उन्हें जानकर दूरसे भी स्वयं उनके पास चले जाते और उन्हें प्रसन्न करके अपनी दी हुई वस्तुएँ उन्हें स्वीकार करवाते हैं, उनके दान आदि कर्म संकेतसे ही होते हैं; अतः दान- पात्रोंको जनाये बिना ही जो उनके लिये दानकी वस्तुएँ दे देते हैं; देवि! वे ही पुनर्जन्ममें वैसे श्रेष्ठ पुरुष होते हैं तथा वे बिना यत्नके ही उन कर्मोंके फलोंको प्राप्त कर लेते हैं और पुण्यके भागी होनेके कारण बैठे - बैठाये ही सब तरहके भोग भोगते हैं ॥ अपरे ये च दानानि ददत्येव प्रयाचिताः ॥ यदा यदार्थिने दत्त्वा पुनर्दानं च याचिताः ।

तावत्कालं ततो देवि पुनर्जन्मनि ते नराः ।

यत्नतः श्रमसंयुक्ताः पुनस्तान् प्राप्नुवन्ति च ॥

दूसरे जो लोग याचकोंके माँगनेपर दान देते ही हैं और जब- जब याचकने माँगा, तब-तब उसे दान देकर उसके पुनः याचना करनेपर फिर दान दे देते हैं; देवि! वे मनुष्य पुनर्जन्म

पृष्ठ 1246

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पानेपर यत्न और परिश्रमसे बारंबार उन दान - कर्मोंके फल पाते रहते हैं ॥

याचिता अपि केचित् तु न ददत्येव किंचन ।

अभ्यसूयापरा मर्त्या लोभोपहतचेतसः ॥

कुछ लोग ऐसे हैं, जो याचना करनेपर भी याचकको कुछ नहीं देते । उनका चित्त लोभसे दूषित होता है और वे सदा दूसरोंके दोष ही देखा करते हैं ॥

ते पुनर्जन्मनि शुभे यतन्तो बहुधा नराः ।

न प्राप्नुवन्ति मनुजा मार्गन्तस्तेऽपि किंचन ॥

शुभे! ऐसे लोग फिर जन्म लेनेपर बहुत यत्न करते रहते हैं तो भी कुछ नहीं पाते ।

बहुत ढूँढ़नेपर भी उन्हें कोई भोग सुलभ नहीं होता ॥

नानुप्तं रोहते सस्यं तद्वद् दानफलं विदुः ।

यद् यद् ददाति पुरुषस्तत् तत् प्राप्नोति केवलम् ॥

इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥

जैसे बीज बोये बिना खेती नहीं उपजती, यही बात दानके फलके विषयमें समझनी चाहिये – दिये बिना किसीको कुछ नहीं मिलता । मनुष्य जो-जो देता है, केवल उसीको

पाता है । देवि! यह विषय तुम्हें बताया गया । अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥

उमोवाच

भगवन् भगनेत्रघ्न केचिद् वार्धक्य संयुताः ।

अभोगयोग्यकाले तु भोगांश्चैव धनानि च ॥

लभन्ते स्थविरा भूता भोगैश्वर्यं यतस्ततः ॥

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसिगर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! भगदेवताका नेत्र नष्ट करनेवाले महादेव! कुछ लोग बूढ़े हो जानेपर, जब कि उनके लिये भोग भोगने योग्य समय नहीं रह जाता, बहुत- से भोग और धन पा जाते हैं । वे वृद्ध होनेपर भी जहाँ- तहाँसे भोग और ऐश्वर्य प्राप्त कर लेते हैं; ऐसा किस कर्म - विपाकसे सम्भव होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच हन्त ते कथयिष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ॥

धर्मकार्यं चिरं कालं विस्मृत्य धनसंयुताः ।

प्राणान्तकाले सम्प्राप्ते व्याधिभिश्च निपीडिताः ॥

आरभन्ते पुनर्धर्मान् दातुं दानानि वा नराः ॥

ते पुनर्जन्मनि शुभे भूत्वा दुःखपरिप्लुताः ।

अतीतयौवने काले स्थविरत्वमुपागताः ॥

लभन्ते पूर्वदत्तानां फलानि शुभलक्षणे ॥

पृष्ठ 1247

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एतत् कर्मफलं देवि कालयोगाद् भवत्युत ॥ श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे इसका उत्तर देता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर इसका तात्त्विक विषय सुनो । जो लोग धनसे सम्पन्न होनेपर भी दीर्घकालतक धर्मकार्यको भूले रहते हैं और जब रोगोंसे पीड़ित होते हैं, तब प्राणान्त- काल निकट आनेपर धर्म करना या दान देना आरम्भ करते हैं, शुभे! वे पुनर्जन्म लेनेपर दुःखमें मग्न हो यौवनका समय बीत जानेपर जब बूढ़े होते हैं, तब पहलेके दिये हुए दानोंके फल पाते हैं । शुभलक्षणे! देवि! यह कर्म - फल काल- योगसे प्राप्त होता है ॥ उमोवाच

भोगयुक्ता महादेव केचिद् व्याधिपरिप्लुताः ।

असमर्थाश्च तान् भोक्तुं भवन्ति किल कारणम् ॥

उमाने पूछा- महादेव! कुछ लोग युवावस्थामें ही भोगसे सम्पन्न होनेपर भी रोगोंसे पीड़ित होनेके कारण उन्हें भोगनेमें असमर्थ हो जाते हैं, इसका क्या कारण है? ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

व्याधियोगपरिक्लिष्टा ये निराशाः स्वजीविते ।

आरभन्ते तदा कर्तुं दानानि शभलक्षणे ॥

ते पुनर्जन्मनि शुभे प्राप्य तानि फलान्युत ।

असमर्थाश्च तान् भोक्तुं व्याधितास्ते भवन्त्युत ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— शुभलक्षणे! जो रोगोंसे कष्टमें पड़ जानेपर जब जीवनसे निराश हो जाते हैं, तब दान करना आस्मभ करते हैं । शुभे! वे ही पुनर्जन्म लेनेपर उन फलोंको पाकर रोगोंसे आक्रान्त हो उन्हें भोगनेमें असमर्थ हो जाते हैं ॥ उमोवाच

भगवन् देवदेवेश मानुषेष्वेव केचन ।

रूपयुक्ताः प्रदृश्यन्ते शुभाङ्का प्रियदर्शनाः ॥

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा— भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें कुछ ही लोग रूपवान्, शुभ लक्षणसम्पन्न और प्रिय-दर्शन ( परम मनोहर ) देखे जाते हैं, किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच हन्त ते कथयिष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ॥

ये पुरा मानुषा देवि लज्जायुक्ताः प्रियंवदाः ।

शक्ताः सुमधुरा नित्यं भूत्वा चैव स्वभावतः ॥

पृष्ठ 1248

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अमांस भोजिनश्चैव सदा प्राणिदयायुताः ।

प्रतिकर्मप्रदा वापि वस्त्रदा धर्मकारणात् ॥

भूमिशुद्धिकरा वापि कारणादग्निपूजकाः ॥

एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि ते नराः ।

रूपेण स्पृहणीयास्तु भवन्त्येव न संशयः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक इसका रहस्य बताता हूँ । तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो । जो मनुष्य पूर्वजन्ममें लज्जायुक्त, प्रिय वचन बोलनेवाले, शक्तिशाली और सदा स्वभावतः मधुर स्वभाववाले होकर सर्वदा समस्त प्राणियोंपर दया करते हैं, कभी मांस नहीं खाते हैं, धर्मके उद्देश्यसे वस्त्र और आभूषणोंका दान करते हैं, भूमिकी शुद्धि करते हैं, कारणवश अग्निकी पूजा करते हैं; ऐसे सदाचारसम्पन्न मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर रूप-सौन्दर्यकी दृष्टिसे स्पृहणीय होते ही हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ उमोवाच

विरूपाश्च प्रदृश्यन्ते मानुषेष्वेव केचन ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! मनुष्योंमें ही कुछ लोग बड़े कुरूप दिखायी देते हैं, इसमें कौन- सा कर्मविपाक कारण है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ॥

रूपयोगात् पुरा मर्त्या दर्पाहंकारसंयुताः ।

विरूपहासकाश्चैव स्तुतिनिन्दादिभिर्भृशम् ॥

परोपतापिनश्चैव मांसादाश्च तथैव च ।

अभ्यसूयापराश्चैव अशुद्धाश्च तथा नराः ॥

एवंयुक्तसमाचारा यमलोके सुदण्डिताः ।

कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते रूपवर्जिताः ॥

विरूपाः सम्भवन्त्येव नास्ति तत्र विचारणा । श्रीमहेश्वरने कहा — कल्याणि! सुनो, मैं तुमको इसका कारण बताता हूँ। पूर्वजन्ममें सुन्दर रूप पाकर जो मनुष्य दर्प और अहंकारसे युक्त हो स्तुति और निन्दा आदिके द्वारा कुरूप मनुष्योंकी बहुत हँसी उड़ाया करते हैं, दूसरोंको सताते, मांस खाते, पराया दोष देखते और सदा अशुद्ध रहते हैं, ऐसे अनाचारी मनुष्य यमलोकमें भलीभाँति दण्ड पाकर जब फिर किसी प्रकार मनुष्य- योनिमें जन्म लेते हैं, तब रूपहीन और कुरूप होते ही हैं । इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं ॥ उमोवाच

पृष्ठ 1249

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भगवन् देवदेवेश केचित् सौभाग्यसंयुताः ।

रूपभोगविहीनाश्च दृश्यन्ते प्रमदाप्रियाः ॥

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! देवदेवेश्वर! कुछ मनुष्य सौभाग्यशाली होते हैं, जो रूप और भोगसे हीन होनेपर भी नारीको प्रिय लगते हैं । किस कर्म विपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मानुषा देवि सौम्यशीलाः प्रियंवदाः ।

स्वदारैरेव संतुष्टा दारेषु समवृत्तयः ॥

दाक्षिण्येनैव वर्तन्ते प्रमदास्वप्रियास्वपि ।

न तु प्रत्यादिशन्त्येव स्त्रीदोषान् गुणसंश्रितान् ॥

अन्नपानीयदाः काले नृणां स्वादुप्रदाश्च ये ।

स्वदारव्रतिनश्चैव धृतिमन्तो निरत्ययाः ॥

एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।

मानुषास्ते भवन्त्येव सततं सुभगा भृशम् ॥

अर्थादृतेऽपि ते देवि भवन्ति प्रमदाप्रियाः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा —देवि! जो मनुष्य पहले सौम्य स्वभावके तथा प्रिय वचन बोलनेवाले होते हैं, अपनी ही पत्नीमें संतुष्ट रहते हैं, यदि कई पत्नियाँ हों तो उन सबपर समान भाव रखते हैं, अपने स्वभावके कारण अप्रिय लगनेवाली स्त्रियोंके प्रति भी उदारतापूर्ण बर्ताव करते हैं, स्त्रियोंके दोषोंकी चर्चा नहीं करते, उनके गुणोंका ही बखान करते हैं, समयपर अन्न और जलका दान करते हैं, अतिथियोंको स्वादिष्ट अन्न भोजन कराते हैं, अपनी पत्नीके प्रति ही अनुरक्त रहनेका नियम लेते हैं, धैर्यवान् और दुःखरहित होते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर सदा सौभाग्यशाली होते ही हैं । देवि! वे धनहीन होनेपर भी अपनी पत्नीके प्रीतिपात्र होते हैं ॥ उमोवाच

दुर्भगाः सम्प्रदृश्यन्ते आर्या भोगयुता अपि ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! बहुत - से श्रेष्ठ पुरुष भोगोंसे सम्पन्न होनेपर भी दुर्भाग्यके मारे दिखायी देते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा सम्भव होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वं समाहिता ॥

पृष्ठ 1250

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 1250 का मूल पृष्ठ
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ये पुरा मेनुजा देवि स्वदारेष्वनपेक्षया ।

यथेष्टवृत्तयश्चैव निर्लज्जा वीतसम्भ्रमाः ॥

परेषां विप्रियकरा वाङ्मनःकायकर्मभिः ।

निराश्रया निरन्नाद्याः स्त्रीणां हृदयकोपनाः ॥

एवं युक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि ते नराः ।

दुर्भगास्तु भवन्त्येव स्त्रीणां हृदयविप्रियाः ॥

नास्ति तेषां रतिसुखं स्वदारेध्वपि किंचन ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! इस बातको मैं तुम्हें बताता हूँ, तुम एकाग्रचित होकर सारी बातें सुनो । जो मनुष्य पहले अपनी पत्नीकी उपेक्षा करके स्वेच्छाचारी हो जाते हैं, लज्जा और भयको छोड़ देते हैं, मन, वाणी और शरीर तथा क्रियाद्वारा दूसरोंकी बुराई करते हैं और आश्रयहीन एवं निराहार रहकर पत्नीके हृदयमें क्रोध उत्पन्न करते हैं; ऐसे दूषित आचारवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर दुर्भाग्ययुक्त और नारी जातिके लिये अप्रिय ही होते हैं । ऐसे भाग्यहीनोंको अपनी पत्नीसे भी अनुरागजनित सुख नहीं सुलभ होता ॥ उमोवाच

भगवन् देवदेवेश मानुषेष्वपि केचन ।

ज्ञानविज्ञानसम्पन्ना बुद्धिमन्तो विचक्षणाः ॥

दुर्गतास्तु प्रदृश्यन्ते यतमाना यथाविधि ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमेंसे कुछ लोग ज्ञान- विज्ञानसे सम्पन्न, बुद्धिमान् और विद्वान् होनेपर भी दुर्गतिमें पड़े दिखायी देते हैं । वे विधिपूर्वक यत्न करके

भी उस दुर्गतिसे नहीं छूट पाते । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ॥

ये पुरा मनुजा देवि श्रुतवन्तोऽपि केवलम् ।

निराश्रया निरन्नाद्या भृशमात्मपरायणाः ॥

ते पुनर्जन्मनि शुभे ज्ञानबुद्धियुता अपि ।

निष्किंचना भवन्त्येव अनुप्तं हि न रोहति ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! सुनो, मैं इसका कारण तुम्हें बताता हूँ। देवि! जो मनुष्य पहले केवल विद्वान् होनेपर भी आश्रयहीन और भोजन- सामग्रीसे वंचित होकर केवल अपने ही उदर- पोषणके प्रयत्नमें लगे रहते हैं, शुभे! वे पुनर्जन्म लेनेपर ज्ञान और बुद्धिसे युक्त होनेपर भी अकिंचन ही रह जाते हैं, क्योंकि बिना बोया हुआ बीज नहीं जमता है ॥