06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1261–1270
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1261–1270
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श्रीमहेश्वरने कहा – देवि! जो मनुष्य पहले लोभ और मोहसे आच्छादित होकर प्राणियोंके प्राणोंकी हिंसा करनेके लिये उनके अंग- भंग कर देते हैं, शस्त्रोंसे काटकर उन प्राणियोंको निश्चेष्ट बना देते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले पुरुष मरनेके बाद पुनर्जन्म लेनेपर अंगहीन होते हैं; इसमें संशय नहीं है । वे स्वभावतः पंगुरूपमें उत्पन्न होते हैं अथवा जन्म लेनेके बाद पंगु हो जाते हैं ॥ उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिद् ग्रन्थिभिः पिल्लकैस्तथा ।
क्लिश्यमानाः प्रदृश्यन्ते तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— भगवन्! कुछ मनुष्य ग्रन्थि ( गठिया ), पिल्लक ( फीलपाँव) आदि रोगोंसे कष्ट पाते देखे जाते हैं, इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि ग्रन्थिभेदकरा नृणाम् ।
मुष्टिप्रहारपरुषा नृशंसाः पापकारिणः ॥
पाटकास्तोटकाश्चैव शूलतुन्दास्तथैव च ।
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
ग्रन्थिभिः पिल्लकैश्चैव क्लिश्यन्ते भृशदुःखिताः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा - देवि! जो मनुष्य पहले लोगोंकी ग्रथियोंका भेदन करनेवाले रहे हैं; जो मुष्टि-प्रहार करनेमें निर्दय, नृशंस, पापाचारी, तोड़- फोड़ करनेवाले और शूल चुभाकर पीड़ा देनेवाले रहे हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग फिर जन्म लेनेपर गठिया और फीलपाँवसे कष्ट पाते तथा अत्यन्त दुःखी होते हैं ॥ उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचित् पादरोगसमन्विताः ।
दृश्यन्ते सततं देव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा — भगवन्! देव! कुछ मनुष्य सदा पैरोंके रोगोंसे पीड़ित दिखायी देते हैं ।
इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि क्रोधलोभसमन्विताः ।
मनुजा देवतास्थानं स्वपादैभ्रंशयन्त्युत ॥
जानुभिः पार्ष्णिभिश्चैव प्राणिहिंसां प्रकुर्वते ॥
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
पादरोगैर्बहुविधैर्बाध्यन्ते श्वपदादिभिः ॥
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श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! जो मनुष्य पहले क्रोध और लोभके वशीभूत होकर देवताके स्थानको अपने पैरोंसे भ्रष्ट करते, घुटनों और एड़ियोंसे मारकर प्राणियोंकी हिंसा करते हैं; शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्म लेनेपर श्वपद आदि नाना प्रकारके पाद - रोगोंसे पीड़ित होते हैं ॥ उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिद् दृश्यन्ते बहवो भुवि ।
वातजैः पित्तजै रोगैर्युगपत् संनिपातकैः ॥
रोगैर्बहुविधैर्देव क्लिश्यमानाः सुदुःखिताः । उमाने पूछा — भगवन्! देव! इस भूतलपर कुछ ऐसे लोगोंकी बहुत बड़ी संख्या दिखायी देती है, जो वात, पित्त और कफजनित रोगोंसे तथा एक ही साथ इन तीनोंके संनिपातसे तथा दूसरे - दूसरे अनेक रोगोंसे कष्ट पाते हुए बहुत दुःखी रहते हैं ॥ असमस्तैः समस्तैश्च आढ्या वा दुर्गतास्तथा ॥ केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ वे धनी हों या दरिद्र, पूर्वात रोगोंमेंसे कुछके द्वारा अथवा समस्त रोगोंके द्वारा कष्ट पाते रहते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ॥
ये पुरा मनुजा देवि त्वासुरं भावमाश्रिताः ।
स्ववशाः कोपनपरा गुरुविद्वेषिणस्तथा ॥
परेषां दुःखजनका मनोवाक्कायकर्मभिः ।
छिन्दन् भिन्दंस्तुदन्नेव नित्यं प्राणिषु निर्दयाः ॥
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
यदि वै मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथाविधाः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा – कल्याणि! इसका कारण मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो । देवि! जो मनुष्य पूर्वजन्ममें असुरभावका आश्रय ले स्वच्छन्दचारी, क्रोधी और गुरुद्रोही हो जाते हैं, मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा दूसरोंको दुःख देते हैं, काटते, विदीर्ण करते और पीड़ा देते हुए सदा ही प्राणियोंके प्रति निर्दयता दिखाते हैं । शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्मके समय यदि मनुष्य जन्म पाते हैं तो वे वैसे ही होते हैं ॥ तत्र ते बहुभिर्घोरैस्तप्यन्ते व्याधिभिः प्रिये ॥
केचिच्च छर्दिसंयुक्ताः केचित्काससमन्विताः ।
ज्वरातिसारतृष्णाभिः पीड्यमानास्तथा परे ॥
पादगुल्मैश्च बहुभिः श्लेष्मदोषसमन्विताः ।
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पादरोगैश्च विविधैर्व्रणकुष्ठभगन्दरैः ॥ आढ्या वा दुर्गता वापि दृश्यन्ते व्याधिपीडिताः ॥ प्रिये! उस शरीरमें वे बहुतेरे भयंकर रोगोंसे संतप्त होते हैं । किसीको उलटी होती है तो कोई खाँसीसे कष्ट पाते हैं । दूसरे बहुत- से मनुष्य ज्वर, अतिसार और तृष्णासे पीड़ित रहते हैं । किन्हींको अनेक प्रकारके पादगुल्म सताते हैं । कुछ लोग कफदोषसे पीड़ित होते हैं । कितने ही नाना प्रकारके पादरोग, व्रणकुष्ठ और भगन्दर रोगोंसे रुग्ण रहते हैं । वे धनी हों या दरिद्र सब लोग रोगोंसे पीड़ित दिखायी देते हैं ॥
एवमात्मकृतं कर्म भुञ्जते तत्र तत्र ते ।
ग्रहीतुं न च शक्यं हि केनचिद्ध्यकृतं फलम् ॥
इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
इस प्रकार उन- उन शरीरोंमें वे अपने किये हुए कर्मका ही फल भोगते हैं । कोई भी बिना किये हुए कर्मके फलको नहीं पा सकता । देवि! इस प्रकार यह विषय मैंने तुम्हें बताया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ उमोवाच
भगवन् देवदेवेश भूतपाल नमोऽस्तु ते ।
ह्रस्वाङ्गाश्चैव वक्राङ्गा कुब्जा वामनकास्तथा ॥
अपरे मानुषा देव दृश्यन्ते कुणिबाहवः ।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा — भगवन्! देवदेवेश्वर! भूतनाथ! आपको नमस्कार है। देव! दूसरे मनुष्य छोटे शरीरवाले, टेढ़े - मेढ़े अंगोंवाले, कुबड़े, बौने और लूले दिखायी देते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि लोभमोहसमन्विताः ।
धान्यमानान् विकुर्वन्ति क्रयविक्रयकारणात् ॥
तुलादोषं तदा देवि धृतमानेषु नित्यशः ।
अर्धापकर्षणाच्चैव सर्वेषां क्रयविकये ॥
अङ्गदोषकरा ये 'तुतु परेषां कोपकारणात् ।
मांसादाश्चैव ये मूर्खा अयथावत्प्रथाः सदा ॥
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
ह्रस्वाङ्गा वामनाश्चैव कुब्जाश्चैव भवन्ति ते ॥
श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! जो मनुष्य पहले लोभ और मोहसे युक्त हो खरीद - बिक्रीके लिये अनाज तौलनेके बाटोंको तोड़ - फोड़कर छोटे कर देते हैं, तराजूमें भी कुछ दोष रख
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लेते हैं और प्रतिदिन क्रय -विक्रयके समय जब उन बाटोंको रखकर अनाज तौलते हैं, तब सभीके मालमेंसे आधेकी चोरी कर लेते हैं । जो क्रोध करते, दूसरोंके शरीरपर चोट करके उसके अंगोंमें दोष उत्पन्न कर देते हैं, जो मूर्ख मांस खाते और सदा झूठ बोलते हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर छोटे शरीरवाले बौने और कुबड़े होते हैं ॥ उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिद् दृश्यन्ते मानुषेषु वै ।
उन्मत्ताश्च पिशाचाश्च पर्यटन्तो यतस्ततः ॥
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा — भगवन्! मनुष्योंमेंसे कुछ लोग उन्मत्त और पिशाचोंके समान इधर-उधर घूमते दिखायी देते हैं । उनकी ऐसी अवस्थामें कौन -सा कर्म - फल कारण है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि दर्पाहङ्कारसंयुताः ।
बहुधा प्रलपन्त्येव हसन्ति च परान् भृशम् ॥
मोहयन्ति परान् भोगैर्मदनैर्लोभकारणात् ।
वृद्धान् गुरूंश्च ये मूर्खा वृथैवापहसन्ति च ॥
शौण्डा विदग्धाः शास्त्रेषु तथैवानृतवादिनः ॥
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
उन्मत्ताश्च पिशाचाश्च भवन्त्येव न संशयः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा – देवि! जो मनुष्य पहले दर्प और अहंकारसे युक्त हो नाना प्रकारकी अंटशंट बातें करते हैं, दूसरोंकी खूब हँसी उड़ाते हैं, लोभवश, उन्मत्त बना देनेवाले भोगोंद्वारा दूसरोंको मोहित करते हैं, जो मूर्ख वृद्धों और गुरुजनोंका व्यर्थ ही उपहास करते हैं तथा शास्त्रज्ञानमें चतुर एवं प्रवीण होनेपर भी सदा झूठ बोलते हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर उन्मत्तों और पिशाचोंके समान भटकते फिरते हैं; इसमें संशय नहीं है ॥ उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिन्निरपत्याः सुदुःखिताः ।
यतन्तो न लभन्त्येव अपत्यानि यतस्ततः ॥
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— भगवन्! कुछ मनुष्य संतानहीन होनेके कारण अत्यन्त दुःखी रहते हैं । वे जहाँ - तहाँसे प्रयत्न करनेपर भी संतानलाभसे वंचित ही रह जाते हैं । किस कर्मविपाकसे
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ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि सर्वप्राणिषु निर्दयाः ।
घ्नन्ति बालांश्च भुञ्जन्ते मृगाणां पक्षिणामपि ॥
गुरुविद्वेषिणश्चैव परपुत्राभ्यसूयकाः ।
पितृपूजां न कुर्वन्ति यथोक्तां चाष्टकादिभिः ॥
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
मानुष्यं सुचिरात् प्राप्य निरपत्या भवन्ति ते ।
पुत्रशोकयुताश्चापि नास्ति तत्र विचारणा ॥
श्रीमहेश्वरने कहा- देवि! जो मनुष्य पहले समस्त प्राणियोंके प्रति निर्दयताका बर्ताव करते हैं, मृगों और पक्षियोंके भी बच्चोंको मारकर खा जाते हैं, गुरुसे द्वेष रखते, दूसरोंके पुत्रोंके दोष देखते हैं, पार्वण आदि श्राद्धोंके द्वारा शास्त्रोक्त रीतिसे पितरोंकी पूजा नहीं करते; शोभने! ऐसे आचरणवाले जीव फिर जन्म लेनेपर दीर्घकालके पश्चात् मानवयोनिको पाकर संतानहीन तथा पुत्रशोकसे संतप्त होते हैं; इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचित् प्रदृश्यन्ते सुदुःखिताः ।
उद्वेगवासनिरताः सोद्वेगाश्च यतव्रताः ॥
नित्यं शोकसमाविष्टा दुर्गताश्च तथैव च ।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने कहा — भगवन्! मनुष्योंमें कुछ लोग अत्यन्त दुःखी दिखायी देते हैं । उनके निवासस्थानमें उद्वेगका वातावरण छाया रहता है । वे उद्विग्न रहकर संयमपूर्वक व्रतका पालन करते हैं । नित्य शोकमग्न तथा दुर्गतिग्रस्त रहते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा नित्यमुत्कोचनपरायणाः ।
भीषयन्ति परान् नित्यं विकुर्वन्ति तथैव च ॥
ऋणवृद्धिकराश्चैव दरिद्रेभ्यो यथेष्टतः ।
ये श्वभिः क्रीडमानाश्च त्रासयन्ति वने मृगान् ।
प्राणिहिंसां तथा देवि कुर्वन्ति च यतस्ततः ॥
येषां गृहेषु वै श्वानः त्रासयन्ति वृथा नरान् ॥
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एवंयुक्तसमाचाराः कालधर्मगताः पुनः ।
पीडिता यमदण्डेन निरयस्थाश्चिरं प्रिये ॥
कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते दुःखसंयुताः ॥
कुदेशे दुःखभूयिष्ठे व्याघातशतसंकुले ।
जायन्ते तत्र शोचन्तः सोद्वेगाश्च यतस्ततः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! जो मनुष्य पहले प्रतिदिन घूस लेते हैं, दूसरोंको डराते और उनके मनमें विकार उत्पन्न कर देते हैं, अपने इच्छानुसार दरिद्रोंका ऋण बढ़ाते हैं, जो कुत्तोंसे खेलते और वनमें मृगोंको त्रास पहुँचाते हैं, जहाँ-तहाँ प्राणियोंकी हिंसा करते हैं, जिनके घरोंमें पले हुए कुत्ते व्यर्थ ही लोगोंको डराते रहते हैं, प्रिये! ऐसे आचरणवाले मनुष्य मृत्युको प्राप्त होकर यमदण्डसे पीड़ित हो चिरकालतक नरकमें पड़े रहते हैं । फिर किसी प्रकार मनुष्यका जन्म पाकर अधिक दुःखसे भरे हुए सैकड़ों बाधाओंसे व्याप्त कुत्सित देशमें उत्पन्न हो वहाँ दुःखी, शोकमग्न और सब ओरसे उद्विग्न बने रहते हैं ॥ उमोवाच
भगवन् भगनेत्रघ्न मानुषेषु च केचन ।
क्लीबा नपुंसकाश्चैव दृश्यन्ते षण्ढकास्तथा ॥
नीचकर्मरता नीचा नीचसख्यास्तथा भुवि ।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा — भगवन्! भगदेवताके नेत्रको नष्ट करनेवाले महादेव! मनुष्योंमें कुछ लोग कायर, नपुंसक और हिजड़े देखे जाते हैं, जो इस भूतलपर स्वयं तो नीच हैं ही, नीच कर्मोंमें तत्पर रहते और नीचोंका ही साथ करते हैं । उनके नपुंसक होनेमें कौन - सा कर्मविपाक कारण होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।
ये पुरा मनुजा भूत्वा घोरकर्मरतास्तथा ।
पशुपुंस्त्वोपघातेन जीवन्ति च रमन्ति च ॥
एवंयुक्तसमाचाराः कालधर्मं गतास्तु ते ॥
दण्डिता यमदण्डेन निरयस्थाश्चिरं प्रिये ॥
यदि चेन्मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथाविधाः ।
क्लीबा वर्षवराश्चैव षण्ढकाश्च भवन्ति ते ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! मैं वह कारण तुम्हें बताता हूँ, सुनो! जो मनुष्य पहले भयंकर कर्ममें तत्पर होकर पशुके पुरुषत्वका नाश करने अर्थात् पशुओंको बधिया करनेके कार्यद्वारा जीवननिर्वाह करते और उसीमें सुख मानते हैं, प्रिये! ऐसे आचरणवाले मनुष्य
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मृत्युको पाकर यमदण्डसे दण्डित हो चिरकालतक नरकमें निवास करते हैं । यदि मनुष्यजन्म धारण करते हैं तो वैसे ही कायर, नपुंसक और हिजड़े होते हैं ॥
स्त्रीणामपि तथा देवि यथा पुंसां तु कर्मजम् ।
इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
देवि! जैसे पुरुषोंको कर्मजनित फल प्राप्त होता है, उसी प्रकार स्त्रियोंको भी अपने- अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है । यह विषय मैंने तुम्हें बता दिया । अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )
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[ उमा - महेश्वर- संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन ] उमोवाच
भगवन् देवदेवेश प्रमदा विधवा भृशम् ।
दृश्यन्ते मानुषे लोके सर्वकल्याणवर्जिताः ॥
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि । उमाने पूछा — भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्यलोकमें बहुत-सी युवती स्त्रियाँ समस्त कल्याणोंसे रहित विधवा दिखायी देती हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
याः पुरा मनुजा देवि बुद्धिमोहसमन्विताः ।
कुटुम्बं तत्र वै पत्युर्नाशयन्ति वृथा तथा ॥
विषदाश्चाग्निदाश्चैव पतीन् प्रति सुनिर्दयाः ।
अन्यासां हि पतीन् यान्ति स्वपतीन् द्वेष्यकारणात् ॥
एवंयुक्तसमाचारा यमलोके सुदण्डिताः ॥
निरयस्थाश्चिरं कालं कथंचित् प्राप्य मानुषम् ॥
तत्रता भोगरहिता विधवाश्च भवन्ति वै ॥
श्रीमहेश्वरने कहा- देवि! जो स्त्रियाँ पहले जन्ममें बुद्धिमें मोह छा जानेके कारण पतिके कुटुम्बका व्यर्थ नाश करती हैं, विष देती, आग लगाती और पतियोंके प्रति अत्यन्त निर्दय होती हैं, अपने पतियोंसे द्वेष रखनेके कारण दूसरी स्त्रियोंके पतियोंसे सम्बन्ध स्थापित कर लेती हैं, ऐसे आचरणवाली नारियाँ यमलोकमें भलीभाँति दण्डित हो चिरकालतक नरकमें पड़ी रहती हैं । फिर किसी तरह मनुष्य योनि पाकर वे भोगरहित विधवा हो जाती हैं ॥ उमोवाच
भगवन् देवदेवेश मानुषेष्वेव केचन ।
दासभूताः प्रदृश्यन्ते सर्वकर्मपरा भृशम् ॥
आघातभर्त्सनसहाः पीड्यमानाश्च सर्वशः ।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा — भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें ही कोई दासभावको प्राप्त दिखायी देते हैं, जो सब प्रकारके कर्मोंमें सर्वथा संलग्न रहते हैं । वे पीटे जाते हैं, डाँट- फटकार सहते हैं
और सब तरहसे सताये जाते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
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तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ॥ ये पुरा मनुजा देवि परेषां वित्तहारकाः ॥
ऋणवृद्धिकरं क्रौर्यान्न्यासदत्तं तथैव च ।
निक्षेपकारणाद् दत्तपरद्रव्यापहारिणः ॥
प्रमादाद् विस्मृतं नष्टं परेषां धनहारकाः ।
वधबन्धपरिक्लेशैर्दासत्वं कुर्वते परान् ॥
तादृशा मरणं प्राप्ता दण्डिता यमशासनैः ।
कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते देवि सर्वथा ॥
दासभूता भविष्यन्ति जन्मप्रभृति मानवाः ॥
तेषां कर्माणि कुर्वन्ति येषां ते धनहारकाः ।
आसमाप्तेः स्वपापस्य कुर्वन्तीति विनिश्चयः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा – कल्याणि! वह कारण मैं बताता हूँ, सुनो । देवि! जो मनुष्य पहले दूसरोंके धनका अपहरण करते हैं, जो क्रूरतावश किसीके ऐसे धनको हड़प लेते हैं, जिसके कारण उसके ऊपर ऋण बढ़ जाता है, जो रखनेके लिये दिये हुए या धरोहरके तौरपर रखे हुए पराये धनको दबा लेते हैं अथवा प्रमादवश दूसरोंके भूले या खोये हुए धनको हर लेते हैं, दूसरोंको वध - बन्धन और क्लेशमें डालकर उनसे अपनी दासता कराते हैं; देवि! ऐसे लोग मृत्युको प्राप्त हो यमदण्डसे दण्डित होकर जब किसी तरह मनुष्य योनिमें जन्म लेते हैं, तब जन्मसे ही दास होते हैं और उन्हींकी सेवा करते हैं, जिनका धन उन्होंने पूर्वजन्ममें हर लिया है । जबतक उनके पापका भोग समाप्त नहीं हो जाता, तबतक वे दासकर्म ही करते रहते हैं, यही शास्त्रका निश्चय है ॥
पशुभूतास्तथा चान्ये भवन्ति धनहारकाः ।
तत् तथा क्षीयते कर्म तेषां पूर्वापराधजम् ॥
पराये धनका अपहरण करनेवाले दूसरे लोग पशु होकर भी धनीकी सेवा करते हैं ।
ऐसा करनेसे उनका पूर्वापराधजनित कर्म क्षीण होता है ॥
किंतु मोक्षविधिस्तेषां सर्वथा तत्प्रसादनम् ।
अयथावन्मोक्षकामः पुनर्जन्मनि चेष्यते ॥
सब प्रकारसे उस धनके स्वामीको प्रसन्न कर लेना ही उसके ऋणसे छुटकारा पानेका उपाय है, किंतु जो यथावत् रूपसे उस ऋणसे छूटना नहीं चाहता, उसे पुनर्जन्म लेकर उसकी सेवा करनी पड़ती है ॥
मोक्षकामी यथान्यायं कुर्वन् कर्माणि सर्वशः ।
भर्तुः प्रसादमाकांक्षेदायासान् सर्वथा सहन् ॥
जो उस बन्धनसे छूटना चाहता हो, वह यथोचित रूपसे सारे काम करता और परिश्रमको सर्वथा सहता हुआ स्वामीको प्रसन्न करनेकी आकांक्षा रखे ॥
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प्रीतिपूर्वं तु यो भर्त्रा मुक्तो मुक्तः स पावनः ।
तथाभूतान् कर्मकरान् सदा संतोषयेत् पतिः ॥
जिसे स्वामी प्रसन्न्तापूर्वक दासताके बन्धनसे मुक्त कर देता है, वह मुक्त एवं शुद्ध हो जाता है । स्वामीको भी चाहिये कि वह ऐसे सेवकोंको सदा संतुष्ट रखे ॥ यथार्हं कारयेत् कर्म दण्डं कारणतः क्षिपेत् ।
वृद्धान् बालांस्तथा क्षीणान् पालयन् धर्ममाप्नुयात् ।
इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
उनसे यथायोग्य कार्य कराये और विशेष कारणसे ही उन्हें दण्ड दे । जो वृद्धों, बालकों और दुर्बल मनुष्योंका पालन करता है, वह धर्मका भागी होता है । देवि! यह विषय तुम्हें बताया गया । अब और क्या सुनना चाहती हो ॥ उमोवाच
भगवन् भुवि मर्त्यानां दण्डितानां नरेश्वरैः ।
दण्डेनैव कृतेनेह पापनाशो भवेन्न वा ॥
एतन्मया संशयितं तद् भवांश्छेत्तुमर्हति ॥
उमाने पूछा — भगवन्! इस भूतलपर राजा लोग जिन मनुष्योंको दण्ड दे देते हैं, अब उस दण्डसे ही उनके पापोंका नाश हो जाता है या नहीं? यह मेरा संदेह है । आप इसका निवारण करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्त्वं समाहिता ॥
ये नृपैर्दण्डिता भूमावपराधापदेशतः ।
यमलोके न दण्ड्यन्ते तत्र ते यमदण्डनैः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! तुम्हारा संदेह ठीक है, तुम एकाग्रचित्त होकर इसका यथार्थ उत्तर सुनो । इस भूमिपर राजालोग जिस अपराधका नाम लेकर जिन मनुष्योंको दण्ड दे देते हैं, उसके लिये वे यमलोकमें यमराजके दण्डद्वारा दण्डित नहीं होते हैं ॥
अदण्डिता वा ये तथ्या मिथ्या वा दण्डिता भुवि ।
तान् यमो दण्डयत्येव स हि वेद कृताकृतम् ॥
इस पृथ्वीपर जो वास्तविक अपराधी बिना दण्ड पाये रह जाते हैं अथवा झूठे ही दूसरे लोग दण्डित हो जाते हैं, उस दशामें यमराज उन वास्तविक अपराधियोंको अवश्य दण्ड देते हैं; क्योंकि वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि किसने अपराध किया है और किसने नहीं किया है ॥
नातिक्रमेद् यमं कश्चित् कर्म कृत्वेह मानुषः ।
राजा यमश्च कुर्वाते दण्डमात्रं तु शोभने ॥