श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1271–1280

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1271–1280

पृष्ठ 1271

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कोई भी मनुष्य इस लोकमें कर्म करके यमराजको नहीं लाँघ सकता, उसे अवश्य दण्ड भोगना पड़ता है । शोभने! राजा और यम सबको भरपूर दण्ड देते हैं ॥

नास्ति कर्मफलच्छेत्ता कश्चिल्लोकत्रयेऽपि च ।

इति ते कथितं सर्वं निर्विशङ्का भव प्रिये ॥

तीनों लोकोंमें कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है, जो कर्मोंके फलका बिना भोगे नाश कर

सके । प्रिये! इस विषयमें तुम्हें सारी बातें बता दीं । अब संदेहरहित हो जाओ ॥

उमोवाच

किमर्थं दुष्कृतं कृत्वा मानुषा भुवि नित्यशः ।

पुनस्तत्कर्मनाशाय प्रायश्चित्तानि कुर्वते ॥

उमाने पूछा — भगवन्! यदि ऐसी बात है तो भूमण्डलके मनुष्य पाप- कर्म करके उसके निवारणके लिये प्रायश्चित्त क्यों करते हैं? ॥

सर्वपापहरं चेति हयमेधं वदन्ति च ।

प्रायश्चित्तानि चान्यानि पापनाशाय कुर्वते ॥

तस्मान्मया संशयितं त्वं तच्छेत्तुमिहार्हसि । कहते हैं कि अश्वमेधयज्ञ सम्पूर्ण पापोंको हर लेनेवाला है। लोग दूसरे दूसरे प्रायश्चित्त भी पापोंका नाश करनेके लिये ही करते हैं ( इधर आप कहते हैं कि तीनों लोकोंमें कोई कर्मफलका नाश करनेवाला है ही नहीं ) अतः इस विषयमें मुझे संदेह हो गया है । आप मेरे इस संदेहका निवारण करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्त्वं समाहिता ।

संशयो हि महानेव पूर्वेषां च मनीषिणाम् ॥

श्रीमहेश्वरने कहा – देवि! तुमने ठीक संशय उपस्थित किया है । अब एकाग्रचित्त होकर इसका वास्तविक उत्तर सुनो । पहलेके महर्षियोंके मनमें भी यह महान् संदेह बना रहा है ॥

द्विधा तु क्रियते पापं सद्भिश्चासद्भिरेव च ।

अभिसंधाय वा नित्यमन्यथा वा यदृच्छया ॥

सज्जन हों या असज्जन, सभीके द्वारा दो प्रकारका पाप बनता है, एक तो वह पाप है, जिसे सदा किसी उद्देश्यको मनमें लेकर जान- बूझकर किया जाता है और दूसरा वह है, जो अकस्मात् दैवेच्छासे बिना जाने ही बन जाता है ॥

केवलं चाभिसंधाय संरम्भाच्च करोति यत् ।

कर्मणस्तस्य नाशस्तु न कथंचन विद्यते ॥

पृष्ठ 1272

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जो उद्देश्य- सिद्धिकी कामना रखकर क्रोधपूर्वक कोई असत् कर्म करता है, उसके उस कर्मका किसी तरह नाश नहीं होता है ॥

अभिसंधिकृतस्यैव नैव नाशोऽस्ति कर्मणः ।

अश्वमेधसहस्रैश्च प्रायश्चित्तशतैरपि ॥

अन्यथा यत् कृतं पापं प्रमादाद् वा यदृच्छया ।

प्रायश्चित्ताश्वमेधाभ्यां श्रेयसा तत् प्रणश्यति ॥

फलाभिसन्धिपूर्वक किये गये कर्मोंका नाश सहस्रों अश्वमेधयज्ञों और सैकड़ों प्रायश्चित्तोंसे भी नहीं होता । इसके सिवा और प्रकारसे - असावधानी या दैवेच्छासे जो पाप बन जाता है, वह प्रायश्चित्त और अश्वमेधयज्ञसे तथा दूसरे किसी श्रेष्ठ कर्मसे नष्ट हो जाता है ॥

विद्ध्येवं पापके कार्ये निर्विशंका भव प्रिये ।

इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥

प्रिये! इस प्रकार पाप कर्मके विषयमें तुम्हारा यह संदेह अब दूर हो जाना चाहिये ।

देवि! यह विषय मैंने तुम्हें बताया । अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥

उमोवाच

भगवन् देवदेवेश मानुषाश्चेतरा अपि ।

म्रियन्ते मानुषा लोके कारणाकारणादपि ॥

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! देवदेवेश्वर! जगत्के मनुष्य तथा दूसरे प्राणी, जो किसी कारणसे या अकारण भी मृत्युको प्राप्त हो जाते हैं, इसमें कौन- सा कर्मविपाक कारण है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि कारणाकारणादपि ।

यथासुभिर्वियुज्यन्ते प्राणिनः प्राणिनिर्दयाः ॥

तथैव ते प्राप्नुवन्ति यथैवात्मकृतं फलम् ।

विषदास्तु विषेणैव शस्त्रैः शस्त्रेण घातकाः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! जो निर्दयी मनुष्य पहले किसी कारणसे या अकारण भी दूसरे प्राणियोंके प्राण लेते हैं, वे उसी प्रकार अपनी करनीका फल पाते हैं । विष देनेवाले विषसे ही मरते हैं और शस्त्रद्वारा दूसरोंकी हत्या करनेवाले लोग स्वयं भी जन्मान्तरमें शस्त्रोंके आघातसे ही मारे जाते हैं ॥ इति सत्यं प्रजानीहि लोके तत्र विधिं प्रति । कर्मकर्ता नरोऽभोक्ता स नास्ति दिवि वा भुवि ।

पृष्ठ 1273

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तुम इसीको सत्य समझो । कर्म करनेवाला मनुष्य उन कर्मोंका फल न भोगे, ऐसा कोई पुरुष न इस पृथ्वीपर है न स्वर्गमें ॥ न शक्यं कर्म चाभोक्तुं सदेवासुरमानुषैः ॥ कर्मणा ग्रथितो लोक आदिप्रभृति वर्तते ।

देवता, असुर और मनुष्य कोई भी अपने कर्मोंका फल भोगे बिना नहीं रह सकता ।

आदिकालसे ही यह संसार कर्मसे गुँथा हुआ है ॥

एतदुद्देशतः प्रोक्तं कर्मपाकफलं प्रति ॥

यदन्यच्च मया नोक्तं यस्मिंस्ते कर्मसंग्रहे ।

बुद्धितर्केण तत् सर्वं तथा वेदितुमर्हसि ॥

कथितं श्रोतुकामाया भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥

कर्मोंके परिणामके विषयमें ये बातें संक्षेपसे बतायी गयी हैं । कर्मसंचयके विषयमें जो बात मैंने अबतक नहीं कही हो, उसे भी तुम्हें अपनी बुद्धिद्वारा तर्क -ऊहापोह करके जान लेना चाहिये । तुम्हें सुननेकी इच्छा थी, इसलिये मैंने ये सारी बातें बतायीं । अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? ॥ उमोवाच

भगवन् भगनेत्रघ्न मानुषाणां विचेष्टितम् ।

सर्वमात्मकृतं चेति श्रुतं मे भगवन्मतम् ॥

लोके ग्रहकृतं सर्वं मत्वा कर्म शुभाशुभम् ।

तदेव ग्रहनक्षत्रं प्रायशः पर्युपासते ॥

एष मे संशयो देव तं मे त्वं छेत्तुमर्हसि । उमाने पूछा — भगवन्! भगनेत्रनाशन! आपका मत है कि मनुष्योंकी जो भली -बुरी अवस्था है, वह सब उनकी अपनी ही करनीका फल है । आपके इस मतको मैंने अच्छी तरह सुना; परंतु लोकमें यह देखा जाता है कि लोग समस्त शुभाशुभ कर्मफलको ग्रहजनित मानकर प्रायः उन ग्रहनक्षत्रोंकी ही आराधना करते रहते हैं । क्या उनकी यह मान्यता ठीक

है? देव! यही मेरा संशय है । आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्त्वविनिश्चयम् ॥

नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव शुभाशुभनिवेदकाः ।

मानवानां महाभागे न तु कर्मकराः स्वयम् ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! तुमने उचित संदेह उपस्थित किया है । इस विषयमें जो सिद्धान्त मत है, उसे सुनो । महाभागे! ग्रह और नक्षत्र मनुष्योंके शुभ और अशुभकी

सूचनामात्र देनेवाले हैं । वे स्वयं कोई काम नहीं करते हैं ॥

पृष्ठ 1274

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प्रजानां तु हितार्थाय शुभाशुभविधिं प्रति ।

अनागतमतिक्रान्तं ज्योतिश्चक्रेण बोध्यते ॥

प्रजाके हितके लिये ज्यौतिषचक्र (ग्रह- नक्षत्र मण्डल) के द्वारा भूत और भविष्यके शुभाशुभ फलका बोध कराया जाता है ॥

किंतु तत्र शुभं कर्म सुग्रहैस्तु निवेद्यते ।

दुष्कृतस्याशुभैरेव समवायो भवेदिति ॥

किंतु वहाँ शुभ कर्मफलकी सूचना ( उत्तम) शुभ ग्रहोंद्वारा प्राप्त होती है और दुष्कर्मके फलकी सूचना अशुभ ग्रहोंद्वारा ॥

केवलं ग्रहनक्षत्रं न करोति शुभाशुभम् ।

सर्वमात्मकृतं कर्म लोकवादो ग्रहा इति ॥

केवल ग्रह और नक्षत्र ही शुभाशुभ कर्मफलको उपस्थित नहीं करते हैं । सारा अपना ही किया हुआ कर्म शुभाशुभ फलका उत्पादक होता है । ग्रहोंने कुछ किया है — यह कथन लोगोंका प्रवादमात्र है ॥ उमोवाच

भगवन् विविधं कर्म कृत्वा जन्तुः शुभाशुभम् ।

किं तयोः पूर्वकतरं भुङ्क्ते जन्मान्तरे पुनः ॥

एष मे संशयो देव तं मे त्वं छेत्तुमर्हसि । उमाने पूछा— भगवन्! जीव नाना प्रकारके शुभाशुभ कर्म करके जब दूसरा जन्म धारण करता है, तब दोनोंमेंसे पहले किसका फल भोगता है, शुभका या अशुभका? देव!

यह मेरा संशय है । आप इसे मिटा दीजिये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच स्थाने संशयितं देवि तत् ते वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥

अशुभं पूर्वमित्याहुरपरे शुभमित्यपि ।

मिथ्या तदुभयं प्रोक्तं केवलं तद् ब्रवीमि ते ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! तुम्हारा संदेह उचित ही है, अब मैं तुम्हें इसका यथार्थ उत्तर देता हूँ । कुछ लोगोंका कहना है कि पहले अशुभ कर्मका फल मिलता है, दूसरे कहते हैं कि पहले शुभ कर्मका फल प्राप्त होता है । परंतु ये दोनों ही बातें मिथ्या कही गयी हैं। सच्ची बात क्या है? यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ ॥

भुञ्जानाश्चापि दृश्यन्ते क्रमशो भुवि मानवाः ।

ऋद्धिं हानिं सुखं दुःखं तत् सर्वमभयं भयम् ॥

इस पृथ्वीपर मनुष्य क्रमशः दोनों प्रकारके फल भोगते देखे जाते हैं । कभी धनकी वृद्धि होती है कभी हानि, कभी सुख मिलता है कभी दुःख, कभी निर्भयता रहती है और कभी

पृष्ठ 1275

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 1275 का मूल पृष्ठ
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भय प्राप्त होता है । इस प्रकार सभी फल क्रमशः भोगने पड़ते हैं ॥

दुःखान्यनुभवन्त्याढ्या दरिद्राश्च सुखानि च ।

यौगपद्याद्धि भुञ्जाना दृश्यन्ते लोकसाक्षिकम् ॥

कभी धनाढ्य लोग दुःखका अनुभव करते हैं और कभी दरिद्र भी सुख भोगते हैं । इस प्रकार एक ही साथ लोग शुभ और अशुभका भोग करते देखे जाते हैं । सारा जगत् इस बातका साक्षी है ॥

नरके स्वर्गलोके च न तथा संस्थितिः प्रिये ।

नित्यं दुःखं हि नरके स्वर्गे नित्यं सुखं तथा ॥

प्रिये! किंतु नरक और स्वर्गलोकमें ऐसी स्थिति नहीं है। नरकमें सदा दुःख ही दुःख है और स्वर्गमें सदा सुख ही सुख ॥

तत्रापि सुमहद् भुक्त्वा पूर्वमल्पं पुनः शुभे ।

एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

शुभे! वहाँ भी शुभ या अशुभमेंसे जो बहुत अधिक होता है, उसका भोग पहले और जो बहुत कम होता है, उसका भोग पीछे होता है । ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दीं, अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ उमोवाच

भगवन् प्राणिनो लोके म्रियन्ते केन हेतुना ।

जाता जाता न तिष्ठन्ति तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! इस लोकमें प्राणी किस कारणसे मर जाते हैं? जन्म ले - लेकर वे यहीं बने क्यों नहीं रहते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सत्यं समाहिता ।

आत्मा कर्मक्षयाद् देहं यथा मुञ्चति तच्छृणु ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! इस विषयमें जो यथार्थ बात है, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। कर्मोंका भोग समाप्त होनेपर आत्मा इस शरीरको कैसे छोड़ता है? यह एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥

शरीरात्मसमाहारो जन्तुरित्यभिधीयते ।

तत्रात्मानं नित्यमाहुरनित्यं क्षेत्रमुच्यते ॥

शरीर और आत्माका ( जड और चेतनका ) जो संयोग है, उसीको जीव या प्राणी कहते हैं । इनमें आत्माको नित्य और शरीरको अनित्य बताया जाता है ॥

एवं कालेन संक्रान्तं शरीरं जर्जरीकृतम् ।

अकर्मयोग्यं संशीर्णं त्यक्त्वा देही ततो व्रजेत् ॥

पृष्ठ 1276

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जब कालसे आक्रान्त होकर शरीर जरावस्थासे जर्जर हो जाता है, कोई कर्म करने योग्य नहीं रह जाता और सर्वथा गल जाता है, तब देहधारी जीव उसे त्यागकर चल देता है ॥

नित्यस्यानित्यसंत्यागाल्लोके तन्मरणं विदुः ।

कालं नातिक्रमेरन् हि सदेवासुरमानवाः ॥

नित्य जीवात्मा जब अनित्य शरीरको त्यागकर चला जाता है, तब लोकमें उस प्राणीकी मृत्यु हुई मानी जाती है । देवता, असुर और मनुष्य कोई भी कालका उल्लंघन नहीं कर सकते ॥

यथाऽऽकाशे न तिष्ठेत द्रव्यं किंचिदचेतनम् ।

तथा धावति कालोऽयं क्षणं किंचिन्न तिष्ठति ॥

जैसे आकाशमें कोई भी जड द्रव्य स्थिर नहीं रह सकता, उसी प्रकार यह काल

निरन्तर दौड़ लगाता रहता है । एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता ॥

स पुनर्जायते ऽन्यत्र शरीरं नवमाविशन् ।

एवं लोकगतिर्नित्यमादिप्रभृति वर्तते ॥

वह जीव फिर किसी दूसरे शरीरमें प्रवेश करके अन्यत्र जन्म लेता है। इस प्रकार आदि कालसे ही लोककी सदा ऐसी ही गति चल रही है ॥ उमोवाच

भगवन् प्राणिनो बाला दृश्यन्ते मरणं गताः ।

अतिवृद्धाश्च जीवन्तो दृश्यन्ते चिरजीविनः ॥

उमाने पूछा — भगवन्! इस संसारमें बाल्यावस्थामें भी प्राणियोंकी मृत्यु होती देखी जाती है और अत्यन्त वृद्ध मनुष्य भी चिरजीवी होकर जीवित दिखायी देते हैं ॥

केवलं कालमरणं न प्रमाणं महेश्वर ।

तस्मान्मे संशयं ब्रूहि प्राणिनां जीवकारणम् ॥

महेश्वर! केवल काल - मृत्यु अर्थात् वृद्धावस्थामें ही मृत्यु होनेकी बात प्रमाणभूत नहीं रह गयी है; अतः प्राणियोंके जीवनके लिये उठे हुए मेरे इस संदेहका आप निवारण कीजिये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

शृणु तत् कारणं देवि निर्णयस्त्वेक एव सः ।

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! इसका कारण सुनो । इस विषयमें एक ही निर्णय है ॥

यावत् पूर्वकृतं कर्म तावज्जीवति मानवः ।

तत्र कर्मवशाद् बाला म्रियन्ते कालसंक्षयात् ॥

चिरं जीवन्ति वृद्धाश्च तथा कर्मप्रमाणतः ।

पृष्ठ 1277

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इति ते कथितं देवि निर्विशङ्का भव प्रिये ॥ जबतक पूर्वकृत कर्म ( प्रारब्ध) शेष है, तबतक मनुष्य जीवित रहता है । उसी कर्मके अधीन होकर प्रारब्ध भोगका काल समाप्त होनेपर बालक भी मर जाते हैं और उसी कर्मकी मात्राके अनुसार वृद्ध पुरुष भी दीर्घकालतक जीवित रहते हैं । देवि! यह सब विषय तुम्हें बताया गया । प्रिये इस विषयमें अब तुम संशयरहित हो जाओ ॥ उमोवाच

भगवन् केन वृत्तेन भवन्ति चिरजीविनः ।

अल्पायुषो नराः केन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! किस आचरणसे मनुष्य चिरजीवी होते हैं और किससे अल्पायु हो जाते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

शृणु तत् सर्वमखिलं गुह्यं पथ्यतरं नृणाम् ।

येन वृत्तेन सम्पन्ना भवन्ति चिरजीविनः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! यह सारा गूढ़ रहस्य मनुष्योंके लिये परम लाभदायक है ।

जिस आचरणसे सम्पन्न मनुष्य चिरजीवी होते हैं, वह सब सुनो ॥

अहिंसा सत्यवचनमक्रोधः क्षान्तिरार्जवम् ।

गुरूणां नित्यशुश्रूषा वृद्धानामपि पूजनम् ॥

शौचादकार्यसंत्यागः सदा पथ्यस्य भोजनम् ।

एवमादिगुणं वृत्तं नराणां दीर्घजीविनाम् ॥

अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोधका त्याग, क्षमा, सरलता, गुरुजनोंकी नित्य सेवा, बड़े-बूढ़ोंका पूजन, पवित्रताका ध्यान रखकर न करनेयोग्य कर्मोंका त्याग, सदा ही पथ्य भोजन इत्यादि गुणोंवाला आचार दीर्घजीवी मनुष्योंका है ॥

तपसा ब्रह्मचर्येण रसायननिषेवणात् ।

उदग्रसत्त्वा बलिनो भवन्ति चिरजीविनः ॥

तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा रसायनके सेवनसे मनुष्य अधिक धैर्यशाली, बलवान् और चिरजीवी होते हैं ॥ स्वर्गे वा मानुषे वापि चिरं तिष्ठन्ति धार्मिकाः ॥

अपरे पापकर्माणः प्रायशोऽनृतवादिनः ।

हिंसाप्रिया गुरुद्विष्टा निष्क्रियाः शौचवर्जिताः ॥

नास्तिका घोरकर्माणः सततं मांसपानपाः ।

पापाचारा गुरुद्विष्टाः कोपनाः कलहप्रियाः ॥

एवमेवाशुभाचारास्तिष्ठन्ति निरये चिरम् ।

पृष्ठ 1278

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तिर्यग्योनौ तथात्यन्तमल्पास्तिष्ठन्ति मानवाः ॥ धर्मात्मा पुरुष स्वर्गमें हो या मनुष्यलोकमें, वे दीर्घकालतक अपने पदपर बने रहते हैं । इनके सिवा दूसरे जो पापकर्मी प्रायः झूठ बोलनेवाले, हिंसाप्रेमी, गुरुद्रोही, अकर्मण्य, शौचाचारसे रहित, नास्तिक, घोरकर्मी, सदा मांस खाने और मद्य पीनेवाले, पापाचारी, गुरुसे द्वेष रखनेवाले, क्रोधी और कलहप्रेमी हैं, ऐसे असदाचारी पुरुष चिरकालतक नरकमें पड़े रहते हैं तथा तिर्यग्योनिमें स्थित होते हैं, वे मनुष्य - शरीरमें अत्यन्त अल्प समयतक ही रहते हैं ॥ तस्मादल्पायुषो मर्त्यास्तादृशाः सम्भवन्ति ते ॥

अगम्यदेशगमनादपथ्यानां च भोजनात् ।

आयुःक्षयो भवेन्नृणामायुःक्षयकरा हि ते ॥

इसीलिये ऐसे मनुष्य अल्पायु होते हैं । अगम्य स्थानोंमें जानेसे, अपथ्य वस्तुओंका भोजन करनेसे मनुष्योंकी आयु क्षीण होती है, क्योंकि वे आयुका नाश करनेवाले हैं ॥

भवन्त्यल्पायुषस्तैस्तैरन्यथा चिरजीविनः ।

एतत् ते कथितं सर्वं भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥

ऊपर बताये हुए कारणोंसे'मनुष्य अल्पायु होते हैं, अन्यथा चिरजीवी होते हैं । यह सारा

विषय मैंने तुम्हें बता दिया । अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥

उमोवाच

देवदेव महादेव श्रुतं मे भगवन्निदम् ।

आत्मनो जातिसम्बन्धं ब्रूहि स्त्रीपुरुषान्तरे ॥

उमाने पूछा— देवदेव! महादेव! भगवन्! यह विषय तो मैंने अच्छी तरह सुन लिया ।

अब यह बताइये कि आत्माका स्त्री या पुरुषमेंसे किस जातिके साथ सम्बन्ध है? ॥

स्त्रीप्राणः पुरुषप्राण एकः स पृथगेव वा ।

एष मे संशयो देव तं मे छेत्तुं त्वमर्हसि ॥

जीवात्मा स्त्रीरूप है या पुरुषरूप? एक है या अलग- अलग? देव! यह मेरा संशय है ।

आप इसका निवारण करें ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

निर्विकारः सदैवात्मा स्त्रीत्वं पुंस्त्वं न चात्मनि ।

कर्मप्रकारेण तथा जात्यां जात्यां प्रजायते ॥

कृत्वा तु पौरुषं कर्म स्त्री पुमानपि जायते ।

स्त्रीभावयुक् पुमान् कृत्वा कर्मणा प्रमदा भवेत् ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— जीवात्मा सदा ही निर्विकार है! वह न स्त्री है न पुरुष । वह कर्मके अनुसार विभिन्न जातियोंमें जन्म लेता है । पुरुषोचित कर्म करके स्त्री भी पुरुष हो सकती है

पृष्ठ 1279

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और स्त्री- भावनासे युक्त पुरुष तदनुरूप कर्म करके उस कर्मके अनुसार स्त्री हो सकता है ॥ उमोवाच

भगवन् सर्वलोकेश कर्मात्मा न करोति चेत् ।

कोऽन्यः कर्मकरो देहे तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥

उमाने पूछा— भगवन्! सर्वलोकेश्वर! यदि आत्मा कर्म नहीं करता तो शरीरमें दूसरा कौन कर्म करनेवाला है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

शृणु भामिनि कर्तारमात्मा हि न च कर्मकृत् ।

प्रकृत्या गुणयुक्तेन क्रियते कर्म नित्यशः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — भामिनि! कर्ता कौन है? यह सुनो । आत्मा कर्म नहीं करता है ।

प्रकृतिके गुणोंसे युक्त प्राणीद्वारा ही सदा कर्म किया जाता है ॥

शरीरं प्राणिनां लोके यथा पित्तकफानिलैः ।

व्याप्तमेभिस्त्रिभिर्दोषैस्तथा व्याप्तं त्रिभिर्गुणैः ॥

जगत्में प्राणियोंका शरीर जैसे वात, पित्त और कफ - इन तीन दोषोंसे व्याप्त रहता है, इसी प्रकार प्राणी सत्त्व, रज और तम - इन गुणोंसे व्याप्त होता है ॥

सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणास्त्वेते शरीरिणः ।

प्रकाशात्मकमेतेषां सत्त्वं सततमिष्यते ॥

रजो दुःखात्मकं तत्र तमो मोहात्मकं स्मृतम् ।

त्रिभिरेतैर्गुणैर्युक्तं लोके कर्म प्रवर्तते ॥

सत्त्व, रज और तम— ये तीनों शरीरधारीके गुण हैं। इनमें से सत्त्व सदा प्रकाशस्वरूप माना गया है । रजोगुण दुःखरूप और तमोगुण मोहरूप बताया गया है । लोकमें इन तीनों गुणोंसेयुक्त कर्मी प्रवृत्ति होती है ॥

सत्यं प्राणिदया शौचं श्रेयः प्रीतिः क्षमा दमः ।

एवमादि तथान्यच्च कर्म सात्त्विकमुच्यते ॥

सत्यभाषण, प्राणियोंपर दया, शौच, श्रेय, प्रीति, क्षमा और इन्द्रिय- संयम — ये तथा ऐसे ही अन्य कर्म भी सात्त्विक कहलाते हैं ॥

दाक्ष्यं कर्मपरत्वं च लोभो मोहो विधिं प्रति ।

कलत्रसङ्गो माधुर्यं नित्यमैश्वर्यलुब्धता ॥

रजसश्चोद्भवं चैतत् कर्म नानाविधं सदा ॥

दक्षता, कर्मपरायणता, लोभ, विधिके प्रति मोह, स्त्री- संग, माधुर्य तथा सदा ऐश्वर्यका लोभ — ये नाना प्रकारके भाव और कर्म रजोगुणसे प्रकट होते हैं ॥

पृष्ठ 1280

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अनृतं चैव पारुष्यं धृतिर्विद्वेषिता भृषम् ।

हिंसासत्यं च नास्तिक्यं निद्रालस्यभयानि च ॥

तमसश्चोद्भवं चैतत् कर्म पापयुतं तथा ॥

असत्यभाषण, रूखापन, अत्यन्त अधीरता, हिंसा, असत्य, नास्तिकता, निद्रा, आलस्य और भय — ये तथा पापयुक्त कर्म तमोगुणसे प्रकट होते हैं ॥

तस्माद् गुणमयः सर्वः कार्यारम्भः शुभाशुभः ।

तस्मादात्मानमव्यग्रं विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥

इसलिये समस्त शुभाशुभ कार्यारम्भ गुणमय है, अतः आत्माको व्यग्रतारहित, अकर्ता और अविनाशी समझो ||

सात्त्विकाः पुण्यलोकेषु राजसा मानुषे पदे ।

तिर्यग्योनौ च नरके तिष्ठेयुस्तामसा नराः ॥

सात्त्विक मनुष्य पुण्यलोकोंमें जाते हैं । राजस जीव मनुष्यलोकमें स्थित होते हैं तथा तमोगुणी मनुष्य पशु- पक्षियोंकी योनिमें और नरकमें स्थित होते हैं ॥ उमोवाच

किमर्थमात्मा भिन्नेऽस्मिन् देहे शस्त्रेण वा हते ।

स्वयं प्रयास्यति तदा तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — इस शरीरके भेदनसे अथवा शस्त्रद्वारा मारे जानेसे आत्मा स्वयं ही क्यों चला जाता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।

एतन्नैर्मापिकैश्चापि मुह्यन्ते सूक्ष्मबुद्धिभिः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा – कल्याणि! इसका कारण मैं बताता हूँ, सुनो । इस विषयमें सूक्ष्म बुद्धिवाले विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं ॥

कर्मक्षये तु सम्प्राप्ते प्राणिनां जन्मधारिणाम् ।

उपद्रवो भवेद् देहे येन केनापि हेतुना ॥

तन्निमित्तं शरीरी तु शरीरं प्राप्य संक्षयम् ।

अपयाति परित्यज्य ततः कर्मवशेन सः ॥

जन्मधारी प्राणियोंके कर्मोंका क्षय हो जानेपर इस देहमें जिस किसी भी कारणसे उपद्रव होने लगता है । उसके कारण शरीरका क्षय हो जानेपर देहाभिमानी जीव कर्मके अधीन हो उस शरीरको त्यागकर चला जाता है ॥

देहः क्षयति नैवात्मा वेदनाभिर्न चाल्यते ।

तिष्ठेत् कर्मफलं यावद् व्रजेत् कर्मक्षये पुनः ॥