श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1251–1260

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1251–1260

पृष्ठ 1251

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उमोवाच

मूर्खा लोके प्रदृश्यन्ते दृढमूला विचेतसः ।

ज्ञानविज्ञानरहिताः समृद्धाश्च समन्ततः ॥

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! इस जगत् में मूर्ख, अचेत तथा ज्ञान- विज्ञानसे रहित मनुष्य भी सब ओरसे समृद्धिशाली और दृढमूल दिखायी देते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि बालिशा अपि सर्वतः ।

समाचरन्ति दानानि दीनानुग्रहकारणात् ॥

अबुद्धिपूर्वं वा दानं ददत्येव ततस्ततः ।

ते पुनर्जन्मनि शुभे प्राप्नुवन्त्येव तत् तथा ॥

पण्डितोऽपण्डितो वापि भुङ्क्ते दानफलं नरः ।

बुद्ध्याऽनपेक्षितं दानं सर्वथा तत् फलत्युत ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले मूर्ख होनेपर भी सब ओर दीन - दु: खियोंपर अनुग्रह करके उन्हें दान देते रहे हैं, जो पहलेसे दानके महत्त्वको न समझकर भी जहाँ- तहाँ दान देते ही रहे हैं, शुभे! वे मनुष्य पुनर्जन्म प्राप्त होनेपर वैसी अवस्थाको प्राप्त होते ही हैं । कोई मूर्ख हो या पण्डित, प्रत्येक मनुष्य दानका फल भोगता है। बुद्धिसे अनपेक्षित दान भी सर्वथा फल देता ही है ॥ उमोवाच

भगवन् देवदेवेश मानुषेषु च केचन ।

मेधाविनः श्रुतिधरा भवन्ति विशदाक्षराः ॥

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें ही कुछ लोग बड़े मेधावी, किसी बातको एक बार सुनकर ही उसे याद कर लेनेवाले और विशद अक्षर-ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि गुरुशुश्रूषका भृशम् ।

ज्ञानार्थं ते तु संगृह्य तीर्थं ते विधिपूर्वकम् ॥

विधिनैव परांश्चैव ग्राहयन्ति च नान्यथा ।

अश्लाघमाना ज्ञानेन प्रशान्ता यतवाचकाः ॥

पृष्ठ 1252

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विद्यास्थानानि ये लोके स्थापयन्ति च यत्नतः ।

तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने ॥

मेधाविनः श्रुतिधरा भवन्ति विशदाक्षराः । श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! जो मनुष्य पहले गुरुकी अत्यन्त सेवा करनेवाले रहे हैं और ज्ञानके लिये विधिपूर्वक गुरुका आश्रय लेकर स्वयं भी दूसरोंको विधिसे ही अपनी विद्या ग्रहण कराते रहे हैं, अविधिसे नहीं । अपने ज्ञानके द्वारा जो कभी अपनी झूठी बड़ाई नहीं करते रहे हैं, अपितु शान्त और मौन रहे हैं तथा जो जगत्में यत्नपूर्वक विद्यालयोंकी स्थापना करते रहे हैं, शोभने! ऐसे पुरुष जब मृत्युको प्राप्त होकर पुनर्जन्म लेते हैं, तब मेधावी, किसी बातको एक बार ही सुनकर उसे याद कर लेनेवाले और विशद अक्षर-ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं ॥ उमोवाच

अपरे मानुषा देव यतन्तोऽपि यतस्ततः ।

बहिष्कृताः प्रदृश्यन्ते श्रुतविज्ञानबुद्धितः ॥

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा- देव! दूसरे मनुष्य यत्न करनेपर भी जहाँ -तहाँ शास्त्रज्ञान और बुद्धिसे

बहिष्कृत दिखायी देते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि ज्ञानदर्पसमन्विताः ।

श्लाघमानाश्च तत् प्राप्य ज्ञानाहङ्कारमोहिताः ॥

वदन्ति ये परान् नित्यं ज्ञानाधिक्येन दर्पिताः ।

ज्ञानादसूयां कुर्वन्ति न सहन्ते हि चापरान् ॥

तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने ।

मानुष्यं सुचिरात् प्राप्य तत्र बोधविवर्जिताः ॥

भवन्ति सततं देवि यतन्तो हीनमेधसः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! जो मनुष्य ज्ञानके घमंडमें आकर अपनी झूठी प्रशंसा करते हैं और ज्ञान पाकर उसके अहंकारसे मोहित हो दूसरोंपर आक्षेप करते हैं, जिन्हें सदा अपने अधिक ज्ञानका गर्व रहता है, जो ज्ञानसे दूसरोंके दोष प्रकट किया करते हैं और दूसरे ज्ञानियोंको नहीं सहन कर पाते हैं, शोभने! ऐसे मनुष्य मृत्युके पश्चात् पुनर्जन्म लेनेपर चिरकालके बाद मनुष्य योनि पाते हैं । देवि! उस जन्ममें वे सदा यत्न करनेपर भी बोधहीन और बुद्धिरहित होते हैं ॥ उमोवाच

पृष्ठ 1253

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भगवन् मानुषाः केचित् सर्वकल्याणसंयुताः ।

पुत्रैदरिर्गुणयुतैर्दासीदासपरिच्छदैः ॥

परस्परर्द्धिसंयुक्ताः स्थानैश्वर्यमनोहरैः ।

व्याधिहीना निराबाधा रूपारोग्यबलैर्युताः ॥

धनधान्येन सम्पन्नाः प्रसादैर्यानवाहनैः ।

सर्वोपभोगसंयुक्ता नानाचित्रैर्मनोहरैः ॥

ज्ञातिभिः सह मोदन्ते अविघ्नं तु दिने दिने ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! कितने ही मनुष्य समस्त कल्याणमय गुणोंसे युक्त होते हैं । वे गुणवान् स्त्री- पुत्र, दास-दासी तथा अन्य उपकरणोंसे सम्पन्न होते हैं । स्थान, ऐश्वर्य तथा मनोहर भोगों और पारस्परिक समृद्धिसे संयुक्त होते हैं । रोगहीन, बाधाओंसे रहित, रूप-आरोग्य और बलसे सम्पन्न, धन - धान्यसे परिपूर्ण, भाँति - भाँतिके विचित्र एवं मनोहर महल, यान और वाहनोंसे युक्त एवं सब प्रकारके भोगोंसे संयुक्त हो वे प्रतिदिन जाति- भाइयोंके

साथ निर्विघ्न आनन्द भोगते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वं समाहिता ॥

ये पुरा मनुजा देवि आढ्या वा इतरेऽपि वा ।

श्रुतवृत्तसमायुक्ता दानकामाः श्रुतप्रियाः ॥

परेङ्गितपरा नित्यं दातव्यमिति निश्चिताः ।

सत्यसंधाः क्षमाशीला लोभमोहविवर्जिताः ॥

दातारः पात्रतो दानं व्रतैर्नियमसंयुताः ।

स्वदुःखमिव संस्मृत्य परदुःखविवर्जिताः ॥

सौम्यशीलाः शुभाचारा देवब्राह्मणपूजकाः ॥

एवंशीलसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।

दिवि वा भूवि वा देवि जायन्ते कर्मभोगिनः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! यह मैं तुम्हें बताता हूँ, तुम एकाग्रचित होकर सब बातें सुनो । जो धनाढ्य या निर्धन मनुष्य पहले शास्त्रज्ञान और सदाचारसे युक्त, दान करनेके इच्छुक, शास्त्रप्रेमी, दूसरोंके इशारेको समझकर सदा दान देनेके लिये दृढ़ विचार रखनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ, क्षमाशील, लोभ- मोहसे रहित, सुपात्रको दान देनेवाले, व्रत और नियमोंसे युक्त तथा अपने दुःखके समान ही दूसरोंके भी दुःखको समझकर किसीको दुःख न देनेवाले होते हैं, जिनका शील- स्वभाव सौम्य होता है, आचार- व्यवहार शुभ होते हैं, जो देवताओं तथा

पृष्ठ 1254

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ब्राह्मणोंके पूजक होते हैं, शोभामयी देवि! ऐसे शील- सदाचारवाले मानव पुनर्जन्म पानेपर स्वर्गमें या पृथ्वीपर अपने सत्कर्मोंके फल भोगते हैं ॥

मानुषेष्वपि ये जातास्तादृशाः सम्भवन्ति ते ।

यादृशास्तु त्वया प्रोक्ताः सर्वे कल्याणसंयुताः ॥

रूपं द्रव्यं बलं चायुर्भोगैश्वर्यं कुलं श्रुतम् ।

इत्येतत् सर्वसाद्गुण्यं दानाद् भवति नान्यथा ॥

तपोदानमयं सर्वमिति विद्धि शुभानने ॥

वैसे पुरुष जब मनुष्योंमें जन्म ग्रहण करते हैं, तब वे सभी तुम्हारे बताये अनुसार कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न होते हैं । उन्हें रूप, द्रव्य, बल, आयु, भोग, ऐश्वर्य, उत्तम कुल और शास्त्रज्ञान प्राप्त होते हैं । इन सभी सद्गुणोंकी प्राप्ति दानसे ही होती है, अन्यथा नहीं । शुभानने! तुम यह जान लो कि सब कुछ तपस्या और दानका ही फल है ॥ उमोवाच

अथ केचित् प्रदृश्यन्ते मानुषेष्वेव मानुषाः ।

दुर्गताः क्लेश भूयिष्ठा दानभोगविवर्जिताः ॥

भयैस्त्रिभिः समायुक्ता व्याधिक्षुद्भयसंयुताः ।

दुष्कलत्राभिभूताश्च सततं विघ्नदर्शकाः ॥

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा-प्रभो! मनुष्यों में ही कुछ लोग दुर्गतियुक्त अधिक क्लेशसे पीड़ित, दान और भोगसे वंचित, तीन प्रकारके भयोंसे युक्त, रोग और भोगके भयसे पीड़ित, दुष्ट पत्नीसे तिरस्कृत तथा सदा सभी कार्योंमें विघ्नका ही दर्शन करनेवाले होते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि आसुरं भावमाश्रिताः ।

क्रोधलोभसमायुक्ता निरन्नाद्याश्च निष्क्रियाः ॥

नास्तिकाश्चैव धूर्ताश्च मूर्खाश्चात्मपरायणाः ।

परोपतापिनो देवि प्रायशः प्राणिनिर्दयाः ॥

एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।

कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते दुःखपीडिताः ॥

सर्वतः सम्भवन्त्येव पूर्वमात्मप्रमादतः ।

यथा ते पूर्वकथितास्तथा ते सम्भवन्त्युत ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले आसुरभावके आश्रित, क्रोध और लोभसे युक्त, भोजन - सामग्रीसे वंचित, अकर्मण्य, नास्तिक, धूर्त, मूर्ख, अपना ही पेट पालनेवाले,

पृष्ठ 1255

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दूसरोंको सतानेवाले तथा प्रायः सभी प्राणियोंके प्रति निर्दय होते हैं । शोभने! ऐसे आचार-व्यवहारसे युक्त मनुष्य पुनर्जन्म के समय किसी प्रकार मनुष्ययोनिको पाकर जहाँ- कहीं भी उत्पन्न होते हैं, सर्वत्र अपने ही प्रमादके कारण दुःखसे पीड़ित होते हैं और जैसा तुमने बताया है, वैसे ही अवांछनीय दोषसे युक्त होते हैं ॥

शुभाशुभं कृतं कर्म सुखदुःखफलोदयम् ।

इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥

देवि! मनुष्यका किया हुआ शुभ या अशुभ कर्म ही उसे सुख या दुःखरूप फलकी प्राप्ति करानेवाला है । यह बात मैंने तुम्हें बता दी । अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )

पृष्ठ 1256

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[ अन्धत्व और पंगुत्व आदि नाना प्रकारके दोषों और रोगोंके कारणभूत दुष्कर्मोंका वर्णन] उमोवाच

भगवन् देवदेवेश मम प्रीतिविवर्धन ।

जात्यन्धाश्चैव दृश्यन्ते जाता वा नष्टचक्षुषः ॥

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि । उमाने कहा – भगवन्! मेरी प्रीति बढ़ानेवाले देवदेवेश्वर! इस संसारमें कुछ लोग जन्मसे ही अन्धे दिखायी देते हैं और कुछ लोगोंके जन्म लेनेके पश्चात् उनकी आँखें नष्ट हो जाती हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा कामकारेण परवेश्मसु लोलुपाः ।

परस्त्रियोऽभिवीक्षन्ते दुष्टेनैव स्वचक्षुषा ॥

अन्धीकुर्वन्ति ये मर्त्याः क्रोधलोभसमन्विताः ।

लक्षणज्ञाश्च रूपेषु अयथावत्प्रदर्शकाः ॥

एवंयुक्तसमाचाराः कालधर्मवशास्तु ते ।

दण्डिता यमदण्डेन निरयस्थाश्चिरं प्रिये ॥

श्रीमहेश्वरने कहा – प्रिये! जो पूर्वजन्ममें काम या स्वेच्छाचारवश पराये घरोंमें अपनी लोलुपताका परिचय देते हैं और परायी स्त्रियोंपर अपनी दूषित दृष्टि डालते हैं तथा जो मनुष्य क्रोध और लोभके वशीभूत होकर दूसरोंको अन्धा बना देते हैं, अथवा रूपविषयक लक्षणोंको जानकर उसका मिथ्या प्रदर्शन करते हैं । ऐसे आचारवाले मनुष्य मृत्युको प्राप्त होनेपर यमदण्डसे दण्डित हो चिरकालतक नरकोंमें पड़े रहते हैं ॥

यदि चेन्मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथापि वा ।

स्वभावतो वा जाता वा अन्धा एव भवन्ति ते ॥

अक्षिरोगयुता वापि नास्ति तत्र विचारणा ॥

उसके बाद यदि वे मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं, तब स्वभावतः अन्धे होते हैं अथवा जन्म लेनेके बाद अन्धे हो जाते हैं या सदा ही नेत्ररोगसे पीड़ित रहते हैं । इस विषयमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ उमोवाच

मुखरोगयुताः केचिद् दृश्यन्ते सततं नराः ।

दन्तकण्ठकपोलस्थैर्व्याधिभिर्बहुपीडिताः ॥

आदिप्रभृति वै मर्त्या जाता वाप्यथ कारणात् ।

पृष्ठ 1257

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केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ उमाने पूछा — प्रभो! कुछ मनुष्य सदा मुखके रोगसे व्यथित रहते हैं, दाँत, कण्ठ और कपोलोंके रोगसे अत्यन्त कष्ट भोगते हैं, कुछ तो जन्मसे ही रोगी होते हैं और कुछ जन्म लेनेके बाद कारणवश उन रोगोंके शिकार हो जाते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच हन्त ते कथयिष्यामि शृणु देवि समाहिता ॥

कुवक्तारस्तु ये देवि जिह्वया कटुकं भृशम् ।

असत्यं परुषं घोरं गुरून् प्रति परान् प्रति ॥

जिह्वाबाधां तदान्येषां कुर्वते कोपकारणात् ।

प्रायशोऽनृतभूयिष्ठा नराः कार्यवशेन वा ॥

तेषां जिह्वाप्रदेशस्था व्याधयः सम्भवन्ति ते ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! एकाग्रचित होकर सुनो, मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें सब कुछ बताता हूँ । जो कुवाक्य बोलनेवाले मनुष्य अपनी जिह्वासे गुरुजनों या दूसरोंके प्रति अत्यन्त कड़वे, झूठे, रूखे तथा घोर वचन बोलते हैं, जो क्रोधके कारण दूसरोंकी जीभ काट लेते हैं अथवा जो कार्यवश प्रायः अधिकाधिक झूठ ही बोलते हैं, उनके जिह्वाप्रदेशमें ही रोग होते हैं ॥

कुश्रोतारस्तु ये चार्थं परेषां कर्णनाशकाः ।

कर्णरोगान् बहुविधाँल्लभन्ते ते पुनर्भवे ॥

जो परदोष और निन्दादियुक्त कुवचन सुनते हैं तथा जो दूसरोंके कानोंको हानि पहुँचाते हैं, वे दूसरे जन्ममें कर्ण- सम्बन्धी नाना प्रकारके रोगोंका कष्ट भोगते हैं ॥

दन्तरोगशिरोरोगकर्णरोगास्तथैव च ।

अन्ये मुखाश्रिताः दोषाः सर्वे चात्मकृतं फलम् ॥

ऐसे ही लोगोंको दन्तरोग, शिरोरोग, कर्णरोग तथा अन्य सभी मुखसम्बन्धी दोष अपनी करनीके फलरूपसे प्राप्त होते हैं ॥ उमोवाच

पीड्यन्ते सततं देव मानुषेष्वेव केचन ।

कुक्षिपक्षाश्रितैर्दोषैर्व्याधिभिश्चोदराश्रितैः ॥

उमाने पूछा —देव! मनुष्योंमें कुछ लोग सदा कुक्षि और पक्षसम्बन्धी दोषों तथा उदरसम्बन्धी रोगोंसे पीड़ित रहते हैं ॥

तीक्ष्णशूलैश्च पीड्यन्ते नरा दुःखपरिप्लुताः ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

पृष्ठ 1258

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कुछ लोगोंके उदरमें तीखे शूल से उठते हैं, जिनसे वे बहुत पीड़ित होते और दुःखमें डूब जाते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि कामक्रोधवशा भृशम् ।

आत्मार्थमेव चाहारं भुञ्जन्ते निरपेक्षकाः ॥

अभक्ष्याहारदानैश्च विश्वस्तानां विषप्रदाः ।

अभक्ष्यभक्षदाश्चैव शौचमङ्गवर्जिताः ॥

एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।

कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते व्याधिपीडिताः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! पहले जो मनुष्य काम और क्रोधके अत्यन्त वशीभूत हो दूसरोंकी परवा न करके केवल अपने ही लिये आहार जुटाते और खाते हैं, अभक्ष्य भोजनका दान करते हैं, विश्वस्त मनुष्योंको जहर दे देते हैं, न खानेयोग्य वस्तुएँ खिला देते हैं, शौच और मंगलाचारसे रहित होते हैं; शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्म लेनेपर किसी तरह मानव - शरीरको पाकर उन्हीं रोगोंसे पीड़ित होते हैं ॥

तैस्तैर्बहुविधाकारैर्व्याधिभिर्दुःखसंश्रिताः ।

भवन्त्येव तथा देवि यथा चैव कृतं पुरा ॥

देवि! नाना प्रकारके रूपवाले उन रोगोंसे पीड़ित हो वे दुःखमें निमग्न हो जाते हैं ।

पूर्वजन्ममें जैसा किया था वैसा भोगते हैं ॥

उमोवाच

दृश्यन्ते सततं देव व्याधिभिर्मेहनाश्रितैः ।

पीड्यमानास्तथा मर्त्या अश्मरीशर्करादिभिः ॥

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा- देव! बहुत - से मनुष्य प्रमेहसम्बन्धी रोगोंसे पीड़ित देखे जाते हैं, कितने ही पथरी और शर्करा ( पेशाबसे चीनी आना ) आदि रोगोंके शिकार हो जाते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि परदारप्रधर्षकाः ।

तिर्यग्योनिषु धूर्ता वै मैथुनार्थं चरन्ति च ॥

कामदोषेण ये धूर्ताः कन्यासु विधवासु च ।

बलात्कारेण गच्छन्ति रूपदर्पसमन्विताः ॥

तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने ।

पृष्ठ 1259

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यदि चेन्मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथाविधाः ॥ मेहनस्थैस्ततो घोरैः पीड्यन्ते व्याधिभिः प्रिये । श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! जो मनुष्य पूर्वजन्ममें परायी स्त्रियोंका सतीत्व नष्ट करनेवाले होते हैं, जो धूर्त मानव पशुयोनिमें मैथुनके लिये चेष्टा करते हैं, रूपके घमंडमें भरे हुए जो धूर्त काम- दोषसे कुमारी कन्याओं और विधवाओंके साथ बलात्कार करते हैं, शोभने! ऐसे मनुष्य मृत्युके पश्चात् जब फिर जन्म लेते हैं, तब मनुष्ययोनिमें आनेके बाद वैसे ही रोगी होते हैं । प्रिये! वे प्रमेहसम्बन्धी भयंकर रोगोंसे पीड़ित रहते हैं ॥ उमोवाच

भगवन् - मानुषाः केचिद् दृश्यन्ते शोषिणः कृशाः ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! कुछ मनुष्य सूखारोग ( जिसमें शरीर सूख जाता है ) से पीड़ित

एवं दुर्बल दिखायी देते हैं । किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ये'पुरा मनुजा देवि मांसलुब्धाः सुलोलुपाः ।

आत्मार्थं स्वादुगृद्धाश्च परभोगोपतापिनः ॥

अभ्यसूयापराश्चापि परभोगेषु ये नराः ॥

एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।

शोषव्याधियुतास्तत्र नरा धमनिसंतताः ॥

भवन्त्येव नरा देवि पापकर्मोपभोगिनः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! जो मनुष्य मांसपर लुभाये रहते हैं, अत्यन्त लोलुप हैं, अपने लिये स्वादिष्ट भोजन चाहते हैं, दूसरोंकी भोगसामग्री देखकर जलते हैं तथा जो दूसरोंके भोगों में दोषदृष्टि रखते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर सूखारोगसे पीड़ित हो इतने दुर्बल हो जाते हैं कि उनके शरीरमें फैली हुई नस- नाड़ियाँतक दिखायी देती हैं । देवि! वे पापकर्मोंका फल भोगनेवाले मनुष्य वैसे ही होते हैं ॥ उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचित् क्लिश्यन्ते कुष्ठरोगिणः ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमा ` पूछा — भगवन्! कुछ मनुष्य कोढ़ी होकर कष्ट पाते हैं, यह किस कर्मविपाकका फल है? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच येपुरा मनुजा देवि परेषां रूपनाशनाः ।

पृष्ठ 1260

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आघातवधबन्धैश्च वृथा दण्डेन मोहिताः ॥

इष्टनाशकरा ये तु अपथ्याहारदा नराः ।

चिकित्सका वा दुष्टाश्च द्वेषलोभसमन्विताः ॥

निर्दयाः प्राणिहिंसायां मलदाश्चित्तनाशनाः ॥

एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।

यदि वै मानुषं जन्म लभेरस्तेषु दुःखिताः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! जो मनुष्य पहले मोहवश आघात, वध, बन्धन तथा व्यर्थ दण्डके द्वारा दूसरोंके रूपका नाश करते हैं, किसीकी प्रिय वस्तु नष्ट कर देते हैं । चिकित्सक होकर दूसरोंको अपथ्य भोजन देते हैं, द्वेष और लोभके वशीभूत होकर दुष्टता करते हैं, प्राणियोंकी हिंसाके लिये निर्दय बन जाते हैं, मल देते और दूसरोंकी चेतनाका नाश करते हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले पुरुष पुनर्जन्मके समय यदि मनुष्य जन्म पाते हैं तो मनुष्योंमें सदा दुःखी ही रहते हैं ॥ अत्र ते क्लेशसंयुक्ताः कुष्ठरोगशतैर्वृताः ॥

केचित् त्वग्दोषसंयुक्ता व्रणकुष्ठैश्च संयुताः ।

श्वित्रकुष्ठयुता वापि बहुधा कुष्ठसंयुताः ॥

भवन्त्येव नरा देवि यथा येन कृतं फलम् ॥

उस जन्ममें वे सैकड़ों कुष्ठ रोगोंसे घिरकर क्लेशसे पीड़ित होते हैं । कोई चर्मदोषसे युक्त होते हैं, कोई व्रणकुष्ठ ( कोढ़के घाव ) से पीड़ित होते हैं अथवा कोई सफेद कोढ़से लांछित दिखायी देते हैं । देवि! जिसने जैसा किया है उसके अनुसार फल पाकर वे सब मनुष्य नाना प्रकारके कुष्ठ रोगोंके शिकार हो जाते हैं ॥ उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचिदङ्गहीनाश्च पङ्गवः ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — भगवन्! किस कर्मके विपाकसे कुछ मनुष्य अंगहीन एवं पंगु हो जाते हैं, यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि लोभमोहसमावृताः ।

प्राणिनां प्राणहिंसार्थमङ्गविघ्नं प्रकुर्वते ॥

शस्त्रेणोत्कृत्य वा देवि प्राणिनां चेष्टनाशकाः ॥

एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।

तदङ्गहीना वै प्रेत्य भवन्त्येव न संशयः ॥

स्वभावतो वा जाता वा पङ्गवस्ते भवन्ति वै ॥