06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 131–140
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140
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भेदयामास तान् गत्वा नगरं वै नृपात्मजान् ॥ २८ ॥
तब देवराज इन्द्रने ब्राह्मणका रूप धारण करके उस नगरमें जाकर उन राजकुमारोंमें फूट डाल दी ॥ २८ ॥
भ्रातॄणां नास्ति सौभ्रात्रं येष्वेकस्य पितुः सुताः ।
राज्यहेतोर्विवदिताः कश्यपस्य सुरासुराः ॥ २ ९ ॥
वे बोले — ‘ राजकुमारो! जो एक पिताके पुत्र हैं, ऐसे भाइयोंमें भी प्रायः उत्तम भ्रातृप्रेम नहीं रहता । देवता और असुर दोनों ही कश्यपजीके पुत्र हैं तथापि राज्यके लिये परस्पर विवाद करते रहते हैं ' ॥ २ ९ ॥
यूयं भङ्गास्वनापत्यास्तापसस्येतरे सुताः ।
कश्यपस्य सुराश्चैव असुराश्च सुतास्तथा ॥ ३० ॥
' तुमलोग तो भंगास्वनके पुत्र हो और दूसरे सौ भाई एक तापसके लड़के हैं । फिर तुममें प्रेम कैसे रह सकता है? देवता और असुर तो कश्यपके ही पुत्र हैं, फिर भी उनमें प्रेम नहीं हो पाता है ॥ ३० ॥
युष्माकं पैतृकं राज्यं भुज्यते तापसात्मजैः ।
इन्द्रेण भेदितास्ते तु युद्धेऽन्योन्यमपातयन् ॥ ३१ ॥
' तुमलोगोंका जो पैतृक राज्य है, उसे तापसके लड़के आकर भोग रहे हैं । ' इस प्रकार इन्द्रके द्वारा फूट डालनेपर वे आपसमें लड़ पड़े। उन्होंने युद्धमें एक- दूसरेको मार गिराया ॥ ३१ ॥
तच्छ्रुत्वा तापसी चापि संतप्ता प्ररुरोद ह ।
ब्राह्मणच्छद्मनाभ्येत्य तामिन्द्रोऽथान्वपृच्छत ॥ ३२ ॥
यह समाचार सुनकर तापसीको बड़ा दुःख हुआ । वह फूट- फूटकर रोने लगी । उस समय ब्राह्मणका वेश धारण करके इन्द्र उसके पास आये और पूछने लगे- ॥ ३२ ॥
केन दुःखेन संतप्ता रोदिषि त्वं वरानने ।
ब्राह्मणं तं ततो दृष्ट्वा सा स्त्री करुणमब्रवीत् ॥ ३३ ॥
' सुमुखि! तुम किस दुःखसे संतप्त होकर रो रही हो? ' उस ब्राह्मणको देखकर वह स्त्री करुणस्वरमें बोली- ॥ ३३ ॥
पुत्राणां द्वे शते ब्रह्मन् कालेन विनिपातिते ।
अहं राजाभवं विप्र तत्र पूर्वं शतं मम ॥ ३४ ॥
समुत्पन्नं स्वरूपाणां पुत्राणां ब्राह्मणोत्तम ।
कदाचिन्मृगयां यात उद्भ्रान्तो गहने वने ॥ ३५ ॥
' ब्रह्मन्! मेरे दो सौ पुत्र कालके द्वारा मारे गये । विप्रवर! मैं पहले राजा था । तब मेरे सौ पुत्र हुए थे । द्विजश्रेष्ठ! वे सभी मेरे अनुरूप थे । एक दिन मैं शिकार खेलनेके लिये गहन वनमें गया और वहाँ अकारण भ्रमित- सा होकर इधर- उधर भटकने लगा ॥ ३४-३५ ॥
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अवगाढश्च सरसि स्त्रीभूतो ब्राह्मणोत्तम ।
पुत्रान् राज्ये प्रतिष्ठाप्य वनमस्मि ततो गतः ॥ ३६ ॥
‘ ब्राह्मणशिरोमणे! वहाँ एक सरोवरमें स्नान करते ही मैं पुरुषसे स्त्री हो गया और पुत्रोंको राज्यपर बिठाकर वनमें चला आया ॥ ३६ ॥
स्त्रियाश्च मे पुत्रशतं तापसेन महात्मना ।
आश्रमे जनितं ब्रह्मन् नीतं तन्नगरं मया ॥ ३७ ॥
‘ स्त्रीरूपमें आनेपर महामना तापसने इस आश्रममें मुझसे सौ पुत्र उत्पन्न किये । ब्रह्मन्! मैं उन सब पुत्रोंको नगरमें ले गयी और उन्हें भी राज्यपर प्रतिष्ठित करायी ॥ ३७ ॥
तेषां च वैरमुत्पन्नं कालयोगेन वै द्विज ।
एतत् शोचाम्यहं ब्रह्मन् दैवेन समभिप्लुता ॥ ३८ ॥
‘ विप्रवर! कालकी प्रेरणासे उन सब पुत्रोंमें वैर उत्पन्न हो गया और वे आपसमें ही लड़-भिड़कर नष्ट हो गये । इस प्रकार दैवकी मारी हुई मैं शोकमें डूब रही हूँ' ॥ ३८ ॥
इन्द्रस्तां दुःखितां दृष्ट्वा अब्रवीत् परुषं वचः ।
पुरा सुदुःसहं भद्रे मम दुःखं त्वया कृतम् ॥ ३ ९ ॥
इन्द्रने उसे दुःखी देख कठोर वाणीमें कहा – भद्रे! जब पहले तुम राजा थीं, तब तुमने भी मुझे दुःसह दुःख दिया था ॥ ३ ९ ॥
इन्द्रद्विष्टेन यजता मामनाहूय धिष्ठितम् ।
इन्द्रोऽहमस्मि दुर्बुद्धे वैरं ते पातितं मया ॥ ४० ॥
‘ तुमने उस यज्ञका अनुष्ठान किया जिसका मुझसे वैर है । मेरा आवाहन न करके तुमने वह यज्ञ पूरा कर लिया । खोटी बुद्धिवाली स्त्री! मैं वही इन्द्र हूँ और तुमसे मैंने ही अपने वैरका बदला लिया है ' ॥ ४० ॥
इन्द्रं दृष्ट्वा तु राजर्षिः पादयोः शिरसा गतः ।
प्रसीद त्रिदशश्रेष्ठ पुत्रकामेन स क्रतुः ॥ ४१ ॥
इष्टस्त्रिदशशार्दूल तत्र मे क्षन्तुमर्हसि । इन्द्रको देखकर वे स्त्रीरूपधारी राजर्षि उनके चरणोंमें सिर रखकर बोले- ' सुरश्रेष्ठ! आप प्रसन्न हों । मैंने पुत्रकी इच्छासे वह यज्ञ किया था । देवेश्वर! उसके लिये आप मुझे क्षमा करें' ॥ ४१३ ॥
प्रणिपातेन तस्येन्द्रः परितुष्टो वरं ददौ ॥ ४२ ॥
पुत्रास्ते कतमे राजन् जीवन्त्वेतत् प्रचक्ष्व मे ।
स्त्रीभूतस्य हि ये जाताः पुरुषस्याथ येऽभवन् ॥ ४३ ॥
‘ इनके इस प्रकार प्रणाम करनेपर इन्द्र संतुष्ट हो गये और वर देनेके लिये उद्यत होकर बोले — राजन्! तुम्हारे कौन - से पुत्र जीवित हो जायँ? तुमने स्त्री होकर जिन्हें उत्पन्न किया था; वे अथवा पुरुषावस्थामें जो तुमसे उत्पन्न हुए थे? ' ॥ ४२-४३ ॥
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तापसी तु ततः शक्रमुवाच प्रयताञ्जलिः ।
स्त्रीभूतस्य हि ये पुत्रास्ते मे जीवन्तु वासव ॥ ४४ ॥
तब तापसीने इन्द्रसे हाथ जोड़कर कहा –' देवेन्द्र! स्त्रीरूप हो जानेपर मुझसे जो पुत्र उत्पन्न हुए हैं, वे ही जीवित हो जायँ' ॥ ४४ ॥
इन्द्रस्तु विस्मितो'दृष्ट्वा स्त्रियं पप्रच्छ तां पुनः ।
पुरुषोत्पादिता ये ते कथं द्वेष्याः सुतास्तव ॥ ४५ ॥
स्त्रीभूतस्य हि ये जाताः स्नेहस्तेभ्योऽधिकः कथम् ।
कारणं श्रोतुमिच्छामि तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥ ४६ ॥
तब इन्द्रने विस्मित होकर उस स्त्रीसे पूछा— ' तुमने पुरुषरूपसे जिन्हें उत्पन्न किया था, वे पुत्र तुम्हारे द्वेषके पात्र क्यों हो गये? तथा स्त्रीरूप होकर तुमने जिनको जन्म दिया है, उनपर तुम्हारा अधिक स्नेह क्यों है? मैं इसका कारण सुनना चाहता हूँ। तुम्हें मुझसे यह बताना चाहिये ' ॥ ४५-४६ ॥ स्त्र्युवाच
स्त्रियास्त्वभ्यधिकः स्नेहो न तथा पुरुषस्य वै ।
तस्मात् ते शक्र जीवन्तु ये जाताः स्त्रीकृतस्य वै ॥ ४७ ॥
- स्त्रीने कहा – इन्द्र! स्त्रीका अपने पुत्रोंपर अधिक स्नेह होता है, वैसा स्नेह पुरुषका नहीं होता है । अतः इन्द्र! स्त्रीरूपमें आनेपर मुझसे जिनका जन्म हुआ है, वे ही जीवित हो जायँ ॥ ४७ ॥
भीष्म उवाच
एवमुक्तस्ततस्त्विन्द्रः प्रीतो वाक्यमुवाच ह ।
सर्व एवेह जीवन्तु पुत्रास्ते सत्यवादिनि ॥ ४८ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तापसीके यों कहनेपर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले — ‘ सत्यवादिनि! तुम्हारे सभी पुत्र जीवित हो जायँ ॥ ४८ ॥
वरं च वृणु राजेन्द्र यं त्वमिच्छसि सुव्रत ।
पुरुषत्वमथ स्त्रीत्वं मत्तो यदभिकाङ्क्षते ॥ ४ ९ ॥
‘ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजेन्द्र! तुम मुझसे अपनी इच्छाके अनुसार दूसरा वर भी माँग लो । बोलो, फिरसे पुरुष होना चाहते हो या स्त्री ही रहनेकी इच्छा है? जो चाहो वह मुझसे ले लो ' ॥ ४ ९ ॥ स्त्र्युवाच
स्त्रीत्वमेव वृणे शक्र पुंस्त्वं नेच्छामि वासव ।
एवमुक्तस्तु देवेन्द्रस्तां स्त्रियं प्रत्युवाच ह ॥ ५० ॥
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स्त्रीने कहा – इन्द्र! मैं स्त्रीत्वका ही वरण करती हूँ। वासव! अब मैं पुरुष होना नहीं चाहती । उसके ऐसा कहनेपर देवराजने उस स्त्रीसे पूछा- ॥ ५० ॥
पुरुषत्वं कथं त्यक्त्वा स्त्रीत्वं चोदयसे विभो ।
एवमुक्तः प्रत्युवाच स्त्रीभूतो राजसत्तमः ॥ ५१ ॥
'प्रभो! तुम्हें पुरुषत्वका त्याग करके स्त्री बने रहनेकी इच्छा क्यों होती है? ' इन्द्रके यों पूछनेपर उन स्त्रीरूपधारी नृपश्रेष्ठने इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ ५१ ॥
स्त्रियाः पुरुषसंयोगे प्रीतिरभ्यधिका सदा ।
एतस्मात् कारणाच्छक्र स्त्रीत्वमेव वृणोम्यहम् ॥ ५२ ॥
' देवेन्द्र! स्त्रीका पुरुषके साथ संयोग होनेपर स्त्रीको ही पुरुषकी अपेक्षा अधिक विषयसुख प्राप्त होता है, इसी कारणसे मैं स्त्रीत्वका ही वरण करती हूँ' ॥ ५२ ॥
रमिताभ्यधिकं स्त्रीत्वे सत्यं वै देवसत्तम ।
स्त्रीभावेन हि तुष्यामि गम्यतां त्रिदशाधिप ॥ ५३ ॥
‘ देवश्रेष्ठ! सुरेश्वर! मैं सच कहती हूँ, स्त्रीरूपमें मैंने अधिक रति- सुखका अनुभव किया
है, अतः स्त्रीरूपसे ही संतुष्ट हूँ । आप पधारिये' ॥ ५३ ॥
एवमस्त्विति चोक्त्वा तामापृच्छ्य त्रिदिवं गतः ।
एवं स्त्रिया महाराज अधिका प्रीतिरुच्यते ॥ ५४ ॥
महाराज! तब ‘ एवमस्तु' कहकर उस तापसीसे विदा ले इन्द्र स्वर्गलोकको चले गये । इस प्रकार स्त्रीको विषय- भोगमें पुरुषकी अपेक्षा अधिक सुख प्राप्ति बतायी जाती है ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि भङ्गास्वनोपाख्याने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भङ्गास्वनका उपाख्यानविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल ८० श्लोक हैं )
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त्रयोदशोऽध्यायः शरीर, वाणी और मनसे होनेवाले पापोंके परित्यागका उपदेश युधिष्ठिर उवाच
किं कर्तव्यं मनुष्येण लोकयात्राहितार्थिना ।
कथं वै लोकयात्रां तु किंशीलश्च समाचरेत् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा – पितामह! लोकयात्राका भली- भाँति निर्वाह करनेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको क्या करना चाहिये? कैसा स्वभाव बनाकर किस प्रकार लोकमें जीवन बिताना चाहिये? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
कायेन त्रिविधं कर्म वाचा चापि चतुर्विधम् ।
मनसा त्रिविधं चैव दशकर्मपथांस्त्यजेत् ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! शरीरसे तीन प्रकारके कर्म, वाणीसे चार प्रकारके कर्म और मनसे भी तीन प्रकारके कर्म -इस तरह कुल दस तरहके कर्मोंका त्याग कर दे ॥ २ ॥
प्राणातिपातः स्तैन्यं च परदारानथापि च ।
त्रीणि पापानि कायेन सर्वतः परिवर्जयेत् ॥ ३ ॥
दूसरोंके प्राणनाश करना, चोरी करना और परायी स्त्रीसे संसर्ग रखना — ये तीन
शरीरसे होनेवाले पाप हैं । इन सबका परित्याग कर देना उचित है ॥ ३ ॥
असत्प्रलापं पारुष्यं पैशुन्यमनृतं तथा ।
चत्वारि वाचा राजेन्द्र न जल्पेन्नानुचिन्तयेत् ॥ ४ ॥
मुँहसे बुरी बातें निकालना, कठोर बोलना, चुगली खाना और झूठ बोलना– ये चार वाणीसे होनेवाले पाप हैं । राजेन्द्र! इन्हें न तो कभी जबानपर लाना चाहिये और न मनमें ही सोचना चाहिये ॥ ४ ॥
अनभिध्या परस्वेषु सर्वसत्त्वेषु सौहृदम् ।
कर्मणां फलमस्तीति त्रिविधं मनसा चरेत् ॥ ५ ॥
दूसरेके धनको लेनेका उपाय न सोचना, समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव रखना और कर्मोंका फल अवश्य मिलता है, इस बातपर विश्वास रखना - ये तीन मनसे आचरण करने योग्य कार्य हैं । इन्हें सदा करना चाहिये । ( इनके विपरीत दूसरोंके धनका लालच करना,
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समस्त प्राणियोंसे वैर रखना और कर्मोंके फलपर विश्वास न करना- ये तीन मानसिक पाप हैं- इनसे सदा बचे रहना चाहिये ) ॥ ५ ॥
तस्माद् वाक्कायमनसा नाचरेदशुभं नरः ।
शुभाशुभान्याचरन् हि तस्य तस्याश्नुते फलम् ॥ ६ ॥
इसलिये मनुष्यका कर्तव्य है कि वह मन, वाणी या शरीरसे कभी अशुभ कर्म न करे; क्योंकि वह शुभ या अशुभ जैसा कर्म करता है; उसका वैसा ही फल उसे भोगना पड़ता है ॥ ६ ॥
[ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड- कश्यप - संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा ]
अमृतस्य समुत्पत्तौ देवानामसुरैः सह ।
षष्टिवर्षसहस्राणि देवासुरमवर्तत ॥
एक समय अमृतकी उत्पत्ति हो जानेपर उसकी प्राप्तिके लिये देवताओंका असुरोंके साथ साठ हजार वर्षोंतक युद्ध हुआ, जो देवासुर संग्रामके नामसे प्रसिद्ध है ॥
तत्र देवास्तु दैतेयैर्वध्यन्ते भृशदारुणैः ।
त्रातारं नाधिगच्छन्ति वध्यमाना महासुरैः ॥
उस युद्धमें अत्यन्त भयंकर दैत्यों एवं बड़े -बड़े असुरोंकी मार खाकर देवता किसी रक्षकको नहीं पाते थे ॥
आर्तास्ते देवदेवेशं प्रपन्नाः शरणैषिणः ।
पितामहं महाप्राज्ञं वध्यमानाः सुरेतरैः ॥
दैत्योंद्वारा सताये जानेवाले देवता दुःखी होकर अपने लिये आश्रय ढूँढ़ते हुए देवदेवेश्वर महाज्ञानी ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ वैकुण्ठं शरणं देवं प्रतिपेदे च तैः सह ॥ तब ब्रह्माजी उन सबके साथ भगवान् विष्णुकी शरणमें गये ॥
ततः स देवैः सहितः पद्मयोनिनरेश्वर ।
तुष्टाव प्राञ्जलिर्भूत्वा नारायणमनामयम् ॥
नरेश्वर! तदनन्तर देवताओंसहित कमलयोनि ब्रह्माजी हाथ जोड़कर रोग- शोकसे रहित भगवान् नारायणकी स्तुति करने लगे ॥ ब्रह्मोवाच
त्वद्रूपचिन्तनान्नाम्नां स्मरणादर्चनादपि ।
तपोयोगादिभिश्चैव श्रेयो यान्ति मनीषिणः ॥
ब्रह्माजी बोले- प्रभो! आपके रूपका चिन्तन करनेसे, नामोंके स्मरण और जपसे, पूजनसे तथा तप और योग आदिसे मनीषी पुरुष कल्याणको प्राप्त होते हैं ॥ भक्तवत्सल पद्माक्ष परमेश्वर पापहन् ।
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परमात्माविकाराद्य नारायण नमोऽस्तु ते ॥ भक्तवत्सल! कमलनयन! परमेश्वर! पापहारी परमात्मन्! निर्विकार! आदिपुरुष! नारायण! आपको नमस्कार है ॥
नमस्ते सर्वलोकादे सर्वात्मामितविक्रम ।
सर्वभूतभविष्येश सर्वभूतमहेश्वर ॥
सम्पूर्ण लोकोंके आदिकारण! सर्वात्मन्! अमित पराक्रमी नारायण! सम्पूर्ण भूत और भविष्यके स्वामी! सर्वभूतमहेश्वर! आपको नमस्कार है ॥
देवानामपि देवस्त्वं सर्वविद्यापरायणः ।
जगद्बीजसमाहार जगतः परमो ह्यसि ॥
प्रभो! आप देवताओंके भी देवता और समस्त विद्याओंके परम आश्रय हैं । जगत्के जितने भी बीज हैं, उन सबका संग्रह करनेवाले आप ही हैं । आप ही जगत्के परम कारण हैं ॥
त्रायस्व देवता वीर दानवाद्यैः सुपीडिताः ।
लोकांश्च लोकपालांश्च ऋषींश्च जयतां वर ॥
वीर! ये देवता दानव, दैत्य आदिसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे हैं । आप इनकी रक्षा कीजिये । विजयशीलोंमें सबसे श्रेष्ठ नारायणदेव! आप लोकों, लोकपालों तथा ऋषियोंका संरक्षण कीजिये ॥
वेदाः साङ्गोपनिषदः सरहस्याः ससंग्रहाः ।
सोङ्काराः सवषट्काराः प्राहुस्त्वां यज्ञमुत्तमम् ॥
सम्पूर्ण अंगों और उपनिषदोंसहित वेद, उनके रहस्य, संग्रह, ॐकार और वषट्कार आपहीको उत्तम यज्ञका स्वरूप बताते हैं ॥
पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
तपस्विनां तपश्चैव दैवतं देवतास्वपि ॥
आप पवित्रोंके भी पवित्र, मंगलोंके भी मंगल, तपस्वियोंके तप और देवताओंके भी देवता हैं ॥ भीष्म उवाच
एवमादिपुरस्कारैर्ऋक्सामयजुषां गणैः ।
वैकुण्ठं तुष्टुवुर्देवाः समेत्य ब्रह्मणा सह ॥
भीष्मजी कहते हैं — राजन्! इस प्रकार ब्रह्मासहित देवताओंने एकत्र होकर ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रोंद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति की ॥ ततोऽन्तरिक्षे वागासीन्मेघगम्भीरनिःस्वना । जेष्यध्वं दानवान् यूयं मयैव सह सङ्गरे ।
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तब मेघके समान गम्भीर स्वरमें आकाशवाणी हुई—' देवताओ! तुम युद्धमें मेरे साथ रहकर दानवोंको अवश्य जीत लोगे ' ॥
ततो देवगणानां च दानवानां च युध्यताम् ।
प्रादुरासीन्महातेजाः शङ्खचक्रगदाधरः ॥
तत्पश्चात् परस्पर युद्ध करनेवाले देवताओं और दानवोंके बीच शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महातेजस्वी भगवान् विष्णु प्रकट हुए ॥
सुपर्णपृष्ठमास्थाय तेजसा प्रदहन्निव ।
व्यधमद् दानवान् सर्वान् बाहुद्रविणतेजसा ॥
उन्होंने गरुडकी पीठपर बैठकर तेजसे विरोधियोंको दग्ध करते हुए- से अपनी भुजाओंके तेज और वैभवसे समस्त दानवोंका संहार कर डाला ॥
तं समासाद्य समरे दैत्यदानवपुङ्गवाः ।
व्यनश्यन्त महाराज पतङ्गा इव पावकम् ॥
महाराज! समरभूमिमें दैत्यों और दानवोंके प्रमुख वीर भगवान्से टक्कर लेकर वैसे ही नष्ट हो गये, जैसे पतंगे आगमें कूदकर अपने प्राण दे देते हैं ॥
स विजित्यासुरान् सर्वान् दानवांश्च महामतिः ।
पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत ॥
परम बुद्धिमान् श्रीहरि समस्त असुरों और दानवोंको परास्त करके देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये ॥
तं दृष्ट्वान्तर्हितं देवं विष्णुं देवामितद्युतिम् ।
विस्मयोत्फुल्लनयना ब्रह्माणमिदमब्रुवन् ॥
अनन्त तेजस्वी श्रीविष्णुदेवको अदृश्य हुआ देख आश्चर्यसे चकित नेत्रवाले देवता ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले – ॥ देवा ऊचुः
भगवन् सर्वलोकेश सर्वलोकपितामह ।
इदमत्यद्भुतं वृत्तं त्वं नः शंसितुमर्हसि ॥
देवताओंने पूछा — सर्वलोकेश्वर! सम्पूर्ण जगत् के पितामह! भगवन्! यह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त हमें बतानेकी कृपा करें ॥
कोऽयमस्मान् परित्राय तूष्णीमेव यथागतम् ।
प्रतिप्रयातो दिव्यात्मा तं नः शंसितुमर्हसि ॥
कौन दिव्यात्मा पुरुष हमारी रक्षा करके चुपचाप जैसे आया था; वैसे लौट गया? यह हमें बतानेकी कृपा करें ॥ भीष्म उवाच
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एवमुक्तः सुरैः सर्वैर्वचनं वचनार्थवित् ।
उवाच पद्मनाभस्य पूर्वरूपं प्रति प्रभो ॥
भीष्मजी कहते हैं- प्रभो! सम्पूर्ण देवताओंके ऐसा कहनेपर वचनके तात्पर्यको समझानेवाले ब्रह्माजीने भगवान् पद्मनाभ ( विष्णु ) -के पूर्वरूपके विषयमें इस प्रकार कहा - || ब्रह्मोवाच
न ह्येनं वेद तत्त्वेन भुवनं भुवनेश्वरम् ।
संख्यातुं नैव चात्मानं निर्गुणं गुणिनां वरम् ॥
ब्रह्माजी बोले – देवताओ! ये भगवान् सम्पूर्ण भुवनोंके अधीश्वर हैं। इन्हें जगत्का कोई भी प्राणी यथार्थरूपसे नहीं जानता । गुणवानोंमें श्रेष्ठ निर्गुण परमात्माकी महिमाका कोई पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकता ॥
अत्र वो वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् ।
सुपर्णस्य च संवादमृषीणां चापि देवताः ॥
देवगण! इस विषयमें मैं तुमलोगोंको गरुड और ऋषियोंका संवादरूप प्राचीन इतिहास बता रहा हूँ ॥
पुरा ब्रह्मर्षयश्चैव सिद्धाश्च भुवनेश्वरम् ।
आश्रित्य हिमवत्पृष्ठे चक्रिरे विविधाः कथाः ॥
पूर्वकालकी बात है, हिमालयके शिखरपर ब्रह्मर्षि और सिद्धगण जगदीश्वर श्रीहरिकी शरण ले उन्हींके विषयमें नाना प्रकारकी बातें कर रहे थे ॥
तेषां कथयतां तत्र कथान्ते पततां वरः ।
प्रादुरासीन्महातेजा वाहश्चक्रगदाभृतः ॥
उनकी बातचीत पूरी होते ही चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णुके वाहन महातेजस्वी पक्षिराज गरुड वहाँ आ पहुँचे ॥
स तानृषीन् समासाद्य विनयावनताननः ।
अवतीर्य महावीर्यस्तानृषीनभिजग्मिवान् ॥
उन ऋषियोंके पास पहुँचकर महापराक्रमी गरुड नीचे उतर पड़े और विनयसे मस्तक झुकाकर उनके समीप गये ।
अभ्यर्चितः स ऋषिभिः स्वागतेन महाबलः ।
उपाविशत तेजस्वी भूमौ वेगवतां वरः ॥
ऋषियोंने स्वागतपूर्वक वेगवानोंमें श्रेष्ठ महान् बलवान् एवं तेजस्वी गरुडका पूजन किया । उनसे पूजित होकर वे पृथ्वीपर बैठे ॥ तमासीनं महात्मानं वैनतेयं महाद्युतिम् ।
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ऋषयः परिपप्रच्छुर्महात्मानं तपस्विनः ॥ बैठ जानेपर उन महाकाय, महामना और महातेजस्वी विनतानन्दन गरुडसे वहाँ बैठे हुए तपस्वी ऋषियोंने पूछा ॥ ऋषय ऊचुः
कौतूहलं वैनतेय परं नो हृदि वर्तते ।
तस्य नान्योऽस्ति वक्तेह त्वामृते पन्नगाशन ॥
तदाख्यातमिहेच्छामो भवता प्रश्नमुत्तमम् । ऋषि बोले- विनतानन्दन गरुड! हमारे हृदयमें एक प्रश्नको लेकर बड़ा कौतूहल उत्पन्न हो गया है । उसका समाधान करनेवाला यहाँ आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है, अतः हम आपके द्वारा अपने उस उत्तम प्रश्नका विवेचन कराना चाहते हैं ॥ गरुड उवाच किं मया ब्रूत वक्तव्यं कार्यं च वदतां वराः ॥ यूयं हि मां यथायुक्तं सर्वे वै देष्टुमर्हथ । गरुड बोले — वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वरो! मेरे द्वारा किस विषयमें आप प्रवचन कराना चाहते हैं? यह बताइये । आप मुझे सभी यथोचित कार्योंके लिये आज्ञा दे सकते हैं ॥ ब्रह्मोवाच
नमस्कृत्वा ह्यनन्ताय ततस्ते हृदि सत्तमाः ।
प्रष्टुं प्रचक्रमुस्तत्र वैनतेयं महाबलम् ॥
ब्रह्माजी कहते हैं – देवताओ! तदनन्तर उन श्रेष्ठतम ऋषियोंने अन्तरहित भगवान् नारायणको नमस्कार करके महाबली गरुडसे वहाँ इस प्रकार पूछना आरम्भ किया ॥ ऋषय ऊचुः
देवदेवं महात्मानं नारायणमनामयम् ।
भवानुपास्ते वरदं कुतोऽसौ कश्च तत्त्वतः ॥
ऋषि बोले- विनतानन्दन! जिस रोग- शोकसे रहित वरदायक देवाधिदेव महात्मा नारायणकी आप उपासना करते हैं, उनका प्राकट्य कहाँसे हुआ है? तथा वे वास्तवमें कौन हैं? ॥
प्रकृतिर्विकृतिर्वास्य कीदृशी क्व नु संस्थितिः ।
एतद् भवन्तं पृच्छामो देवोऽयं क्व कृतालयः ॥
उनकी प्रकृति अथवा विकृति कैसी है? उनकी स्थिति कहाँ है? तथा वे नारायणदेव कहाँ अपना घर बनाये हुए हैं? ये सब बातें हमलोग आपसे पूछते हैं ॥ एष भक्तप्रियो देवः प्रियभक्तस्तथैव च ।