श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 121–130
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130
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जो स्त्री निर्दयतापूर्वक पापाचारमें तत्पर रहनेवाली, अपवित्र, चटोर, धैर्यहीन, कलहप्रिय, नींदमें बेसुध होकर सदा खाटपर पड़ी रहनेवाली होती है, ऐसी नारीसे मैं सदा दूर ही रहती हूँ ॥ १२३ ॥
सत्यासु नित्यं प्रियदर्शनासु सौभाग्ययुक्तासु गुणान्वितासु ॥ १३ ॥
वसामि नारीषु पतिव्रतासु कल्याणशीलासु विभूषितासु । जो स्त्रियाँ सत्यवादिनी और अपनी सौम्य वेश- भूषाके कारण देखनेमें प्रिय होती हैं, जो सौभाग्यशालिनी, सद्गुणवती, पतिव्रता एवं कल्याणमय आचार-विचारवाली होती हैं तथा जो सदा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित रहती हैं, ऐसी स्त्रियोंमें मैं सदा निवास करती हूँ ॥ १३ || यानेषु कन्यासु विभूषणेषु यज्ञेषु मेघेषु च वृष्टिमत्सु ॥ १४ ॥
वसामि फुल्लासु च पद्मिनीषु नक्षत्रवीथीषु च शारदीषु । गजेषु गोष्ठेषु तथाऽऽसनेषु सरःसु फुल्लोत्पलपङ्कजेषु ॥ १५ ॥
सुन्दर सवारियोंमें, कुमारी कन्याओंमें, आभूषणोंमें, यज्ञोंमें, वर्षा करनेवाले मेघोंमें, खिले हुए कमलोंमें, शरद् ऋतुकी नक्षत्र- मालाओंमें, हाथियों और गोशालाओंमें, सुन्दर आसनोंमें तथा खिले हुए उत्पल और कमलोंसे सुशोभित सरोवरोंमें मैं सदा निवास करती हूँ ॥ १४-१५ ॥ नदीषु हंसस्वननादितासु क्रौञ्चावघुष्टस्वरशोभितासु । विकीर्णकूलद्रुमराजितासु तपस्विसिद्धद्विजसेवितासु ॥ १६ ॥
वसामि नित्यं सुबहूदकासु सिंहैर्गजैश्चाकुलितोदकासु । जहाँ हँसोंकी मधुर ध्वनि गूँजती रहती है, क्रौंच पक्षीके कलरव जिनकी शोभा बढ़ाते हैं, जो अपने तटोंपर फैले हुए वृक्षोंकी श्रेणियोंसे शोभायमान हैं, जिनके किनारे तपस्वी, सिद्ध और ब्राह्मण निवास करते हैं, जिनमें बहुत जल भरा रहता है तथा सिंह और हाथी जिनके जलमें अवगाहन करते रहते हैं, ऐसी नदियोंमें भी मैं सदा निवास करती रहती हूँ ॥ १६३ ॥
मत्ते गजे गोवृषभे नरेन्द्रे
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सिंहासने सत्पुरुषेषु नित्यम् ॥ १७ ॥
यस्मिञ्जनो हव्यभुजं जुहोति गोब्राह्मणं चार्चति देवताश्च । काले च पुष्पैर्बलयः क्रियन्ते तस्मिन् गृहे नित्यमुपैमि वासम् ॥ १८ ॥
मतवाले हाथी, साँड़, राजा, सिंहासन और सत्पुरुषोंमें मेरा नित्य - निवास है । जिस घरमें लोग अग्निमें आहुति देते हैं, गौ, ब्राह्मण तथा देवताओंकी पूजा करते हैं और समय-समयपर जहाँ फूलोंसे देवताओंको उपहार समर्पित किये जाते हैं, उस घरमें मैं नित्य निवास करती हूँ ॥ १७-१८ ॥ स्वाध्यायनित्येषु सदा द्विजेषु क्षत्रे च धर्माभिरते सदैव । वैश्ये च कृष्याभिरते वसामि शूद्रे च शुश्रूषणनित्ययुक्ते ॥ १ ९ ॥ सदा वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले ब्राह्मणों, स्वधर्मपरायण क्षत्रियों, कृषि कर्ममें लगे हुए वैश्यों तथा नित्य सेवापरायण शूद्रोंके यहाँ भी मैं सदा निवास करती हूँ ॥ १ ९ ॥ नारायणे त्वेकमना वसामि सर्वेण भावेन शरीरभूता । तस्मिन् हि धर्मः सुमहान् निविष्टो ब्रह्मण्यता चात्र तथा प्रियत्वम् ॥ २० ॥
मैं मूर्तिमती एवं अनन्यचित्त होकर तो भगवान् नारायणमें ही सम्पूर्ण भावसे निवास करती हूँ; क्योंकि उनमें महान् धर्म संनिहित है । उनका ब्राह्मणोंके प्रति प्रेम है और उनमें स्वयं सर्वप्रिय होनेका गुण भी है ॥ नाहं शरीरेण वसामि देवि नैवं मया शक्यमिहाभिधातुम् । भावेन यस्मिन् निवसामि पुंसि वर्धते धर्मयशोऽर्थकामैः ॥ २१ ॥
देवि! मैं नारायणके सिवा अन्यत्र शरीरसे नहीं निवास करती हूँ । मैं यहाँ ऐसा नहीं कह सकती कि सर्वत्र इसी रूपमें रहती हूँ । जिस पुरुषमें भावनाद्वारा निवास करती हूँ वह धर्म, यश, धन और कामसे सम्पन्न होकर सदा बढ़ता रहता है ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्रीरुक्मिणीसंवादे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लक्ष्मी और रुक्मिणीका संवादविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २३ श्लोक हैं )
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द्वादशोऽध्यायः कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री - पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान (युधिष्ठिर उवाच
प्रायश्चित्तं कृतघ्नानां प्रतिब्रूहि पितामह ।
मातापितॄन् गुरूंश्चैव येऽवमन्यन्ति मोहिताः ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! जो मोहवश माता- पिता तथा गुरुजनोंका अपमान करते हैं उन कृतघ्नोंके लिये क्या प्रायश्चित्त है? यह बताइये ॥
ये चाप्यन्ये परे तात कृतघ्ना निरपत्रपाः ।
तेषां गतिं महाबाहो श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
तात! महाबाहो! दूसरे भी जो निर्लज्ज एवं कृतघ्न हैं उनकी गति कैसी होती है? यह सब मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ भीष्म उवाच
कृतघ्नानां गतिस्तात नरके शाश्वतीः समाः ।
मातापितृगुरूणां च ये न तिष्ठन्ति शासने ॥
कृमिकीटपिपीलेषु जायन्ते स्थावरेषु च ।
दुर्लभो हि पुनस्तेषां मानुष्ये पुनरुद्भवः ॥
भीष्मजीने कहा— तात! कृतघ्नोंकी एक ही गति है, सदाके लिये नरकमें पड़े रहना । जो माता- पिता तथा गुरुजनोंकी आज्ञाके अधीन नहीं रहते हैं वे कृमि, कीट, पिपीलिका और वृक्ष आदिकी योनियोंमें जन्म लेते हैं । मनुष्ययोनिमें फिर जन्म होना उनके लिये दुर्लभ हो जाता है ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वत्सनाभो महाप्राज्ञो महर्षिः संशितव्रतः ॥
वल्मीकभूतो ब्रह्मर्षिस्तप्यते सुमहत्तपः । इस विषयमें जानकार मनुष्य इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण देते हैं । वत्सनाभ नामवाले एक परम बुद्धिमान् महर्षि कठोर व्रतके पालनमें लगे थे । उनके शरीरपर दीमकोंने घर बना लिया था; अतः वे ब्रह्मर्षि बाँबीरूप हो गये थे और उसी अवस्थामें वे बड़ी भारी तपस्या करते थे ॥ तस्मिंश्च तप्यति तपो वासवो भरतर्षभ ॥
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ववर्ष सुमहद् वर्षं सविद्युत्स्तनयित्नुमान् । भरतश्रेष्ठ! उनके तप करते समय इन्द्रने बिजलीकी चमक और मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके साथ बड़ी भारी वर्षा आरम्भ कर दी ॥
तत्र सप्ताहवर्षं तु मुमुचे पाकशासनः ।
निमीलिताक्षस्तद्वर्षं प्रत्यगृह्णीत वै द्विजः ॥
पाकशासन इन्द्रने लगातार एक सप्ताहतक वहाँ जल बरसाया और वे ब्राह्मण वत्सनाभ आँख मूँदकर चुपचाप उस वर्षाका आघात सहन करते रहे ॥
तस्मिन् पतति वर्षे तु शीतवातसमन्विते ।
विशीर्णध्वस्तशिखरो वल्मीकोऽशनिताडितः ॥
सर्दी और हवासे युक्त वह वर्षा हो ही रही थी कि बिजलीसे आहत हो उस वल्मीक ( बाँबी ) -का शिखर टूटकर बिखर गया ॥
ताड्यमाने ततस्तस्मिन् वत्सनाभे महात्मनि ।
कारुण्यात् तस्य धर्मः स्वमानृशंस्यमथाकरोत् ॥
अब महामना वत्सनाभपर उस वर्षाकी चोट पड़ने लगी। यह देख धर्मके हृदयमें करुणा भर आयी और उन्होंने वत्सनाभपर अपनी सहज दया प्रकट की ॥
चिन्तयानस्य ब्रह्मर्षि तपन्तमधिधार्मिकम् ।
अनुरूपा मतिः क्षिप्रमुपजाता स्वभावजा ॥
तपस्यामें लगे हुए उन अत्यन्त धार्मिक ब्रह्मर्षिकी चिन्ता करते हुए धर्मके हृदयमें शीघ्र ही स्वाभाविक सुबुद्धिका उदय हुआ, जो उन्हींके अनुरूप थी ॥
स्वं रूपं माहिषं कृत्वा सुमहान्तं मनोहरम् ।
त्राणार्थं वत्सनाभस्य चतुष्पादुपरि स्थितः ॥
वे विशाल और मनोहर भैंसेका- सा अपना स्वरूप बनाकर वत्सनाभकी रक्षाके लिये उनके चारों ओर अपने चारों पैर जमाकर उनके ऊपर खड़े हो गये ॥
यदा त्वपगतं वर्षं शीतवातसमन्वितम् ।
ततो महिषरूपी स धर्मो धर्मभृतां वर ॥
शनैर्वल्मीकमुत्सृज्य प्राद्रवद् भरतर्षभ ।
स्थितेऽस्मिन् वृष्टिसम्पाते रक्षितः स महातपाः ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरतभूषण युधिष्ठिर! जब शीतल हवासे युक्त वह वर्षा बंद हो गयी तब भैंसेका रूप धारण करनेवाले धर्म धीरेसे उस वल्मीकको छोड़कर वहाँसे दूर खिसक गये । उस मूसलाधार वर्षामें महिषरूपधारी धर्मके खड़े हो जानेसे महातपस्वी वत्सनाभकी रक्षा हो गयी ॥ दिशः सुविपुलास्तत्र गिरीणां शिखराणि च ॥ दृष्ट्वा च पृथिवीं सर्वां सलिलेन परिप्लुताम् ।
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जलाशयान् स तान् दृष्ट्वा विप्रः प्रमुदितोऽभवत् ॥ तदनन्तर वहाँ सुविस्तृत दिशाओं, पर्वतोंके शिखरों, जलमें डूबी हुई सारी पृथ्वी और जलाशयोंको देखकर ब्राह्मण वत्सनाभ बहुत प्रसन्न हुए ॥
अचिन्तयद् विस्मितश्च वर्षात् केनाभिरक्षितः ।
ततोऽपश्यत् तं महिषमवस्थितमदूरतः ॥
फिर वे विस्मित होकर सोचने लगे कि ' इस वर्षासे किसने मेरी रक्षा की है । इतनेहीमें पास ही खड़े हुए उस भैंसेपर उनकी दृष्टि पड़ी ॥ तिर्यग्योनावपि कथं दृश्यते धर्मवत्सलः ।
अतो नु भद्रं महिषः शिलापट्ट इव स्थितः ।
पीवरश्चैव शूल्यश्च बहुमांसो भवेदयम् ॥
' अहो! पशुयोनिमें पैदा होकर भी यह कैसा धर्मवत्सल दिखायी देता है? निश्चय ही यह भैंसा मेरे ऊपर शिलापट्टके समान खड़ा हो गया था । इसीलिये मेरा भला हुआ है । यह बड़ा मोटा और बहुत मांसल है ' ॥
तस्य बुद्धिरियं जाता धर्मसंसक्तिजा मुनेः ।
कृतघ्ना नरकं यान्ति ये तु विश्वासघातिनः ॥
तदनन्तर धर्ममें अनुराग होनेके कारण मुनिके हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘ जो विश्वासघाती एवं कृतघ्न मनुष्य हैं, वे नरकमें पड़ते हैं ॥
निष्कृतिं नैव पश्यामि कृतघ्नानां कथंचन ।
ऋते प्राणपरित्यागं धर्मज्ञानां वचो यथा ॥
‘ मैं प्राण- त्यागके सिवा कृतघ्नोंके उद्धारका दूसरा कोई उपाय किसी तरह नहीं देख पाता । धर्मज्ञ पुरुषोंका कथन भी ऐसा ही है ॥
अकृत्वा भरणं पित्रोरदत्त्वा गुरुदक्षिणाम् ।
कृतघ्नतां च सम्प्राप्य मरणान्ता च निष्कृतिः ॥
‘ पिता- माताका भरण - पोषण न करके तथा गुरुदक्षिणा न देकर मैं कृतघ्नभावको प्राप्त हो गया हूँ। इस कृतघ्नताका प्रायश्चित्त है स्वेच्छासे मृत्युको वरण कर लेना ॥
आकाङ्क्षायामुपेक्षायां चोपपातकमुत्तमम् ।
तस्मात् प्राणान् परित्यक्ष्ये प्रायश्चित्तार्थमित्युत ॥
' अपने कृतघ्न जीवनकी आकांक्षा और प्रायश्चित्तकी उपेक्षा करनेपर भी भारी उपपातक भी बढ़ता रहेगा । अतः मैं प्रायश्चित्तके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करूँगा ' ॥
स मेरुशिखरं गत्वा निस्सङ्गेनान्तरात्मना ।
प्रायश्चित्तं कर्तुकामः शरीरं त्यक्तुमुद्यतः ॥
निगृहीतश्च धर्मात्मा हस्ते धर्मेण धर्मवित् ॥
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अनासक्त चित्तसे मेरु पर्वतके शिखरपर जाकर प्रायश्चित्त करनेकी इच्छासे अपने शरीरको त्याग देनेके लिये उद्यत हो गये । इसी समय धर्मने आकर उन धर्मज्ञ, धर्मात्मा वत्सनाभका हाथ पकड़ लिया ॥ धर्म उवाच
वत्सनाभ महाप्राज्ञ बहुवर्षशतायुषः ।
परितुष्टोऽस्मि त्यागेन निःसङ्गेन तथाऽऽत्मनः ॥
धर्मने कहा — महाप्राज्ञ वत्सनाभ! तुम्हारी आयु कई सौ वर्षोंकी है । तुम्हारे इस आसक्तिरहित आत्मत्यागके विचारसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ ॥
एवं धर्मभृतः सर्वे विमृशन्ति तथा कृतम् ।
न स कश्चिद् वत्सनाभ यस्य नोपहतं मनः ॥
यश्चानवद्यश्चरति शक्तो धर्मं तु सर्वशः । निवर्तस्व महाप्राज्ञ भूतात्मा ह्यसि शाश्वतः ॥ ) इसी प्रकार सभी धर्मात्मा पुरुष अपने किये हुए कर्मकी आलोचना करते हैं । वत्सनाभ! जगत्में कोई ऐसा पुरुष नहीं है जिसका मन कभी दूषित न हुआ हो । जो मनुष्य निन्द्य कर्मोंसे दूर रहकर सब तरहसे धर्मका आचरण करता है वही शक्तिशाली है । महाप्राज्ञ! अब तुम प्राणत्यागके संकल्पसे निवृत्त हो जाओ, क्योंकि तुम सनातन ( अजर-अमर ) आत्मा हो ॥ युधिष्ठिर उवाच
स्त्रीपुंसयोः सम्प्रयोगे स्पर्शः कस्याधिको भवेत् ।
एतस्मिन् संशये राजन् यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- राजन्! स्त्री और पुरुषके संयोगमें विषयसुखकी अनुभूति किसको अधिक होती है ( स्त्रीको या पुरुषको )? इस संशयके विषयमें आप यथावत्रूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
भंगास्वनेन शक्रस्य यथा वैरमभूत् पुरा ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! इस विषयमें भी भंगास्वनके साथ इन्द्रका पहले जो वैर हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
पुरा भंगास्वनो नाम राजर्षिरतिधार्मिकः ।
अपुत्रः पुरुषव्याघ्र पुत्रार्थं यज्ञमाहरत् ॥ ३ ॥
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पुरुषसिंह! पहलेकी बात है, भंगास्वन नामसे प्रसिद्ध अत्यन्त धर्मात्मा राजर्षि पुत्रहीन होनेके कारण पुत्र - प्राप्तिके लिये यज्ञ करते थे ॥ ३ ॥
अग्निष्टुतं स राजर्षिरिन्द्रद्विष्टं महाबलः ।
प्रायश्चित्तेषु मर्त्यानां पुत्रकामेषु चेष्यते ॥ ४ ॥
उन महाबली राजर्षिने अग्निष्टुत नामक यज्ञका आयोजन किया था। उसमें इन्द्रकी प्रधानता न होनेके कारण इन्द्र उस यज्ञसे द्वेष रखते हैं । वह यज्ञ मनुष्योंके प्रायश्चित्तके अवसरपर अथवा पुत्रकी कामना होनेपर अभीष्ट मानकर किया जाता है ॥ ४ ॥
इन्द्रो ज्ञात्वा तु तं यज्ञं महाभागः सुरेश्वरः ।
अन्तरं तस्य राजर्षेरन्विच्छन्नियतात्मनः ॥ ५ ॥
महाभाग देवराज इन्द्रको जब उस यज्ञकी बात मालूम हुई तब वे मनको वशमें रखनेवाले राजर्षि भंगास्वनका छिद्र ढूँढ़ने लगे ॥ ५ ॥
न चैवास्यान्तरं राजन् स ददर्श महात्मनः ।
कस्यचित्त्वथ कालस्य मृगयां गतवान् नृपः ॥ ६ ॥
राजन्! बहुत ढूँढ़नेपर भी वे उस महामना नरेशका कोई छिद्र न देख सके । कुछ कालके अनन्तर राजा भंगास्वन शिकार खेलनेके लिये वनमें गये ॥ ६ ॥
इदमन्तरमित्येव शक्रो नृपममोहयत् ।
एकाश्वेन च राजर्षिर्भ्रान्त इन्द्रेण मोहितः ॥ ७ ॥
न दिशोऽविन्दत नृपः क्षुत्पिपासार्दितस्तदा ।
इतश्चेतश्च वै राजन् श्रमतृष्णान्वितो नृप ॥ ८ ॥
नरेश्वर! ‘ यही बदला लेनेका अवसर है ' ऐसा निश्चय करके इन्द्रने राजाको मोहमें डाल दिया । इन्द्रद्वारा मोहित एवं भ्रान्त हुए राजर्षि भंगास्वन एकमात्र घोड़ेके साथ इधर- उधर भटकने लगे । उन्हें दिशाओंका भी पता नहीं चलता था । वे भूख- प्याससे पीड़ित तथा परिश्रम और तृष्णासे विकल हो इधर- उधर घूमते रहे ॥ ७-८ ॥
सरोऽपश्यत् सुरुचिरं पूर्णं परमवारिणा ।
सोऽवगाह्य सरस्तात पाययामास वाजिनम् ॥ ९ ॥
तात! घूमते - घूमते उन्होंने उत्तम जलसे भरा हुआ एक सुन्दर सरोवर देखा । उन्होंने घोड़ेको उस सरोवरमें स्नान कराकर पानी पिलाया ॥ ९ ॥
अथ पीतोदकं सोऽश्वं वृक्षे बद्ध्वा नृपोत्तमः ।
अवगाह्य ततः स्नातस्तत्र स्त्रीत्वमवाप्तवान् ॥ १० ॥
जब घोड़ा पानी पी चुका तब उसे एक वृक्षमें बाँधकर वे श्रेष्ठ नरेश स्वयं भी जलमें उतरे । उसमें स्नान करते ही वे राजा स्त्रीभावको प्राप्त हो गये ॥ १० ॥
आत्मानं स्त्रीकृतं दृष्ट्वा व्रीडितो नृपसत्तमः ।
चिन्तानुगतसर्वात्मा व्याकुलेन्द्रियचेतनः ॥ ११ ॥
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अपनेको स्त्रीरूपमें देखकर राजाको बड़ी लज्जा हुई । उनके सारे अन्तःकरणमें भारी
चिन्ता व्याप्त हो गयी । उनकी इन्द्रियाँ और चेतना व्याकुल हो उठीं ॥
आरोहिष्ये कथं त्वश्वं कथं यास्यामि वै पुरम् ।
इष्टेनाग्निष्टुता चापि पुत्राणां शतमौरसम् ॥ १२ ॥
जातं महाबलानां मे तान् प्रवक्ष्यामि किं त्वहम् ।
दारेषु चात्मकीयेषु पौरजानपदेषु च ॥ १३ ॥
वे स्त्रीरूपमें इस प्रकार सोचने लगे- अब मैं कैसे घोड़ेपर चहूँगी? कैसे नगरको जाऊँगी? मेरे अग्निष्टुत यज्ञके अनुष्ठानसे मुझे सौ महाबलवान् औरस पुत्र प्राप्त हुए हैं । उन सबसे क्या कहूँगी? अपनी स्त्रियों तथा नगर और जनपदके लोगोंमें कैसे जाऊँगी? ॥ १२-१३ ॥
मृदुत्वं च तनुत्वं च विक्लवत्वं तथैव च ।
स्त्रीगुणा ऋषिभिः प्रोक्ता धर्मतत्त्वार्थदर्शिभिः ॥ १४ ॥
‘ धर्मके तत्त्वको देखने और जाननेवाले ऋषियोंने मृदुता, कृशता और व्याकुलता — ये स्त्रीके गुण बताये हैं ॥ १४ ॥
व्यायामे कर्कशत्वं च वीर्यं च पुरुषे गुणाः ।
पौरुषं विप्रणष्टं वै स्त्रीत्वं केनापि मेऽभवत् ॥ १५ ॥
‘ परिश्रम करनेमें कठोरता और बल- पराक्रम- ये पुरुषके गुण हैं । मेरा पौरुष नष्ट हो गया और किसी अज्ञात कारणसे मुझमें स्त्रीत्व प्रकट हो गया ॥ १५ ॥
स्त्रीभावात् पुनरश्वं तं कथमारोढुमुत्सहे ।
महता त्वथ यत्नेन आरुह्याश्वं नराधिपः ॥ १६ ॥
पुनरायात् पुरं तात स्त्रीकृतो नृपसत्तमः । ‘ अब स्त्रीभाव आ जानेसे उस अश्वपर कैसे चढ़ सकूँगी? ' तात! किसी - किसी तरह महान् प्रयत्न करके वे स्त्रीरूपधारी नरेश घोड़ेपर चढ़कर अपने नगरमें आये ॥ १६३ ॥
पुत्रा दाराश्च भृत्याश्च पौरजानपदाश्च ते ॥ १७ ॥
किंत्विदं त्विति विज्ञाय विस्मयं परमं गताः । राजाके पुत्र, स्त्रियाँ, सेवक तथा नगर और जनपदके लोग, ' यह क्या हुआ?' –ऐसी जिज्ञासा करते हुए बड़े आश्चर्यमें पड़ गये ॥ १७३ ॥
अथोवाच स राजर्षिः स्त्रीभूतो वदतां वरः ॥ १८ ॥
मृगयामस्मि निर्यातो बलैः परिवृतो दृढम् ।
उद्भ्रान्तः प्राविशं घोरामटवीं दैवचोदितः ॥ १ ९ ॥
तब स्त्रीरूपधारी, वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजर्षि भंगास्वन बोले- ' मैं अपनी सेनासे घिरकर शिकार खेलनेके लिये निकला था; परंतु दैवकी प्रेरणासे भ्रान्तचित्त होकर एक भयानक वनमें जा घुसा ॥ १८-१९ ॥
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अटव्यां च सुघोरायां तृष्णार्तो नष्टचेतनः ।
सरः सुरुचिरप्रख्यमपश्यं पक्षिभिर्वृतम् ॥ २० ॥
उस घोर वनमें प्याससे पीड़ित एवं अचेत-सा होकर मैंने एक सरोवर देखा, जो पक्षियोंसे घिरा हुआ और मनोहर शोभासे सम्पन्न था ॥ २० ॥
तत्रावगाढः स्त्रीभूतो दैवेनाहं कृतः पुरा ।
नामगोत्राणि चाभाष्य दाराणां मन्त्रिणां तथा ॥ २१ ॥
आह पुत्रांस्ततः सोऽथ स्त्रीभूतः पार्थिवोत्तमः ।
सम्प्रीत्या भुज्यतां राज्यं वनं यास्यामि पुत्रकाः ॥ २२ ॥
उस सरोवरमें उतरकर स्नान करते ही दैवने मुझे स्त्री बना दिया । अपनी स्त्रियों और मन्त्रियोंके नाम- गोत्र बताकर उन स्त्रीरूपधारी श्रेष्ठ नरेशने अपने पुत्रोंसे कहा - ' पुत्रो! तुमलोग आपसमें प्रेमपूर्वक रहकर राज्यका उपभोग करो । अब मैं वनको चला जाऊँगा ' ॥ २१-२२ ॥
एवमुक्त्वा पुत्रशतं वनमेव जगाम ह ।
गत्वा चैवाश्रमं सा तु तापसं प्रत्यपद्यत ॥ २३ ॥
अपने सौ पुत्रोंसे ऐसा कहकर राजा वनको चले गये । वह स्त्री किसी आश्रममें जाकर एक तापसके आश्रयमें रहने लगी ॥ २३ ॥
तापसेनास्य पुत्राणामाश्रमेष्वभवच्छतम् ।
अथ साऽऽदाय तान् सर्वान् पूर्वपुत्रानभाषत ॥ २४ ॥
पुरुषत्वे सुता यूयं स्त्रीत्वे चेमे शतं सुताः ।
एकत्र भूज्यतां राज्यं भ्रातृभावेन पुत्रकाः ॥ २५ ॥
उस तपस्वीसे आश्रममें उसके सौ पुत्र हुए । तब वह रानी अपने उन पुत्रोंको लेकर पहलेवाले पुत्रोंके पास गयी और उनसे इस प्रकार बोली - ' पुत्रो! जब मैं पुरुषरूपमें थी तब तुम मेरे सौ पुत्र हुए थे और जब स्त्रीरूपमें आयी हूँ तब ये मेरे सौ पुत्र हुए हैं । तुम सब लोग एकत्र होकर साथ - साथ भ्रातृभावसे इस राज्यका उपभोग करो' ॥ २४-२५ ॥
सहिता भ्रातरस्तेऽथ राज्यं बुभुजिरे तदा ।
तान् दृष्ट्वा भ्रातृभावेन भुञ्जानान् राज्यमुत्तमम् ॥ २६ ॥
चिन्तयामास देवेन्द्रो मन्युनाथ परिप्लुतः ।
उपकारोऽस्य राजर्षेः कृतो नापकृतं मया ॥ २७ ॥
तब वे सब भाई एक साथ होकर उस राज्यका उपभोग करने लगे । उन सबको भ्रातृभावसे एक साथ रहकर उस उत्तम राज्यका उपभोग करते देख क्रोधमें भरे हुए देवराज इन्द्रने सोचा कि मैंने तो इस राजर्षिका उपकार ही कर दिया, अपकार तो कुछ किया ही नहीं ॥ २६-२७ ॥ ततो ब्राह्मणरूपेण देवराजः शतक्रतुः ।