श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 141–150
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150
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त्वं प्रियश्चास्य भक्तश्च नान्यः काश्यप विद्यते ॥ कश्यपकुमार! ये भगवान् नारायण भक्तोंके प्रिय हैं तथा भक्त भी उन्हें बहुत प्रिय हैं
और आप भी उनके प्रिय एवं भक्त हैं । आपके समान दूसरा कोई उन्हें प्रिय नहीं है ॥
मुष्णन्निव मनश्चक्षूंष्यविभाव्यतनुर्विभुः ।
अनादिमध्यनिधनो न विद्मनं कुतो ह्यसौ ॥
उनका विग्रह इन्द्रियोंद्वारा प्रत्यक्ष अनुभवमें आने योग्य नहीं है । वे सबके मन और नेत्रोंको मानो चुराये लेते हैं । उनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है । हम इनके विषयमें यह नहीं समझ पाते कि ये कहाँसे प्रकट हुए हैं? ॥
वेदेष्वपि च विश्वात्मा गीयते न च विद्महे ।
तत्त्वतस्तत्त्वभूतात्मा विभुर्नित्यः सनातनः ॥
वेदोंमें भी विश्वात्मा कहकर इनकी महिमाका गान किया गया है, परंतु हम यह नहीं जानते कि वे तत्त्वभूतस्वरूप नित्य सनातन प्रभु वस्तुतः कैसे हैं? ॥
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ।
गुणाश्चैषां यथासंख्यं भावाभावौ तथैव च ॥
तमः सत्त्वं रजश्चैव भावाश्चैव तदात्मकाः ।
मनो बुद्धिश्च तेजश्च बुद्धिगम्यानि तत्त्वतः ॥
पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नि- ये पाँच भूत; क्रमशः इन भूतोंके गुण; भाव-अभाव; सत्त्व, रज, तम, सात्त्विक, राजस और तामस भाव; मन, बुद्धि और तेज –ये वास्तवमें बुद्धिगम्य हैं ॥
जायन्ते तात तस्माद्धि तिष्ठते तेष्वसौ विभुः ।
संचिन्त्य बहुधा बुद्ध्या नाध्यवस्यामहे परम् ॥
तस्य देवस्य तत्त्वेन तन्नः शंस यथातथम् । तात! ये सब उन्हीं श्रीहरिसे उत्पन्न होते हैं और वे भगवान् इन सबमें व्यापकरूपसे स्थित हैं । हम उनके विषयमें अपनी बुद्धिके द्वारा नाना प्रकारसे विचार करते हैं तथापि किसी उत्तम निश्चयपर नहीं पहुँच पाते, अतः आप यथार्थ रूपसे हमें उनका तत्त्व बताइये ॥ सुपर्णउवाच
स्थूलतो यस्तु भगवांस्तेनैव स्वेन हेतुना ।
त्रैलोक्यस्य तु रक्षार्थं दृश्यते रूपमास्थितः ॥
गरुडजीने कहा — महात्माओ! जो स्थूलस्वरूप भगवान् हैं, वे तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये उसी कारणभूत अपने स्वरूपसे लोगोंको दृष्टिगोचर होते हैं ॥ मया तु महदाश्चर्यं पुरा दृष्टं सनातने ।
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देवे श्रीवत्सनिलये तच्छृणुध्वमशेषतः ॥ मैंने पूर्वकालमें श्रीवत्सचिह्नके आश्रयभूत सनातन देव श्रीहरिके विषयमें जो महान् आश्चर्यकी बात देखी है, वह सब बताता हूँ, सुनिये ॥ न स्म शक्यो मया वेत्तुं न भवद्भिः कथंचन ॥ यथा मां प्राह भगवांस्तथा तच्छूयतां मम ।
मैं या आपलोग कोई भी किसी तरह भगवान्के यथार्थ स्वरूपको नहीं जान सकते ।
भगवान्ने स्वयं ही अपने विषयमें मुझसे जो कुछ जैसा कहा है, वह उसी रूपमें सुनिये ॥
मयामृतं देवतानां मिषतामृषिसत्तमाः ॥
हृतं विपाट्य तं यन्त्रं विद्राव्यामृतरक्षिणः ।
देवता विमुखीकृत्य सेन्द्राः समरुतो मृधे ॥
तं दृष्ट्वा मम विक्रान्तं वागुवाचाशरीरिणी । मुनिश्रेष्ठगण! मैंने देवताओंके देखते - देखते उनके रक्षायन्त्रको विदीर्ण करके अमृतके रक्षकोंको खदेड़कर युद्धमें इन्द्र और मरुद्गणोंसहित सम्पूर्ण देवताओंको पराजित करके
शीघ्र ही अमृतका अपहरण कर लिया । मेरे उस पराक्रमको देखकर आकाशवाणीने कहा ॥
अशरीरिणी वागुवाच
प्रीतोऽस्मि ते वैनतेय कर्मणानेन सुव्रत ।
अवृथा तेऽस्तु मद्वाक्यं ब्रूहि किं करवाणि ते ॥
आकाशवाणी बोली— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले विनतानन्दन! मैं तुम्हारे इस पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हूँ। मेरी यह वाणी व्यर्थ नहीं जानी चाहिये; इसलिये बताओ, मैं तुम्हारा कौन- सा मनोरथ पूर्ण करूँ? ॥ सुपर्णउवाच
तामेवंवादिनीं वाचमहं प्रत्युक्तवांस्तदा ।
ज्ञातुमिच्छामि कस्त्वं हि ततो मे दास्यसे वरम् ॥
गरुड कहते हैं —ऋषिगण! आकाशवाणीकी ऐसी बात सुनकर मैंने उस समय यों उत्तर दिया — ‘ पहले मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप कौन हैं? फिर मुझे वर दीजियेगा ' ॥
ततो जलदगम्भीरं प्रहस्य गदतां वरः ।
उवाच वरदः प्रीतः काले त्वं माभिवेत्स्यसि ॥
तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ वरदायक भगवान्ने बड़े जोरसे हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें प्रसन्नतापूर्वक कहा - ' समय आनेपर मेरे विषयमें तुम सब कुछ जान लोगे ॥
वाहनं भव मे साधु वरं दद्मि तवोत्तमम् ।
न ते वीर्येण सदृशः कश्चिल्लोके भविष्यति ॥
पतङ्ग पततां श्रेष्ठ न देवो नापि दानवः ।
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मत्सखित्वमनुप्राप्तो दुर्धर्षश्च भविष्यसि ॥ पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड! मैं तुम्हें यह उत्तम वर देता हूँ कि देवता हो या दानव, कोई भी इस संसारमें तुम्हारे समान पराक्रमी न होगा। तुम मेरे अच्छे वाहन हो जाओ, मेरे सखाभावको प्राप्त होनेके कारण तुम सदा दुर्जय बने रहोगे ' ॥
तमब्रवं देवदेवं मामेवं वादिनं परम् ।
प्रयतः प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रणम्य शिरसा विभुम् ॥
तब मैंने हाथ जोड़ पवित्र हो उपर्युक्त बात कहनेवाले सर्वव्यापी देवाधिदेव भगवान् परम पुरुषको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा- एवमेतन्महाबाहो सर्वमेतद् भविष्यति । वाहनं ते भविष्यामि यथा वदति मां भवान् ॥ ध्वजस्तेऽहं भविष्यामि रथस्थस्य न संशयः । ‘ महाबाहो! आपका यह कथन ठीक है। यह सब कुछ आपकी आज्ञाके अनुसार ही होगा । आप मुझे जैसा आदेश दे रहे हैं, उसके अनुसार मैं आपका वाहन अवश्य होऊँगा । आप रथपर विराजमान होंगे, उस समय मैं आपकी ध्वजापर स्थित रहूँगा, इसमें संशय नहीं है ' ॥ तथास्त्विति स मामुक्त्वा यथाभिप्रायतो गतः ॥ तब भगवान्ने मुझसे ‘ तथास्तु ' कहकर वे अपनी इच्छाके अनुसार चले गये ॥
ततोऽहं कृतसंवादस्तेन केनापि सत्तमाः ।
कौतूहलसमाविष्टः पितरं काश्यपं गतः ॥
साधुशिरोमणियो! तदनन्तर उन अनिर्वचनीय देवतासे वार्तालाप करके मैं कौतूहलवश अपने पिता कश्यपजीके पास गया ॥
सोऽहं पितरमासाद्य प्रणिपत्याभिवाद्य च ।
सर्वमेतद् यथातथ्यमुक्तवान् पितुरन्तिके ॥
पिताके पास पहुँचकर मैंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और यह सारा वृत्तान्त उनसे यथावत्रूपसे कह सुनाया ॥
श्रुत्वा तु भगवान् मह्यं ध्यानमेवान्वपद्यत ।
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा मामाह वदतां वरः ॥
यह सुनकर मेरे पूज्यपाद पिताने ध्यान लगाया । दो घड़ीतक ध्यान करके वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनि मुझसे बोले – ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यत् त्वं तेन महात्मना ।
संवादं कृतवांस्तात गुह्येन परमात्मना ॥
‘ तात! मैं धन्य हूँ, भगवान्की कृपाका पात्र हूँ, जिसके पुत्र होकर तुमने उन महामनस्वी गुह्य परमात्मासे वार्तालाप कर लिया ॥
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या हि स महातेजा नान्ययोगसमाधिना ।
तपसोग्रेण तेजस्वी तोषितस्तपसां निधिः ॥
मैंने अनन्यभावसे मनको एकाग्र करके उग्र तपस्याद्वारा उन महातेजस्वी तपस्याकी निधिरूप ( प्रतापी ) श्रीहरिको संतुष्ट किया था ॥
ततो मे दर्शयामास तोषयन्निव पुत्रक ।
श्वेतपीतारुणनिभः कद्रूकपिलपिङ्गलः ॥
बेटा! तब मुझे संतुष्ट करते हुए- से भगवान् श्रीहरिने मुझे दर्शन दिया । उनके विभिन्न अंगोंकी कान्ति श्वेत, पीत, अरुण, भूरी, कपिश और पिंगल वर्णकी थी ॥
रक्तनीलासितनिभः सहस्रोदरपाणिमान् ।
द्विसाहस्रमहावक्त्र एकाक्षः शतलोचनः ॥
वे लाल, नीले और काले - जैसे भी दीखते थे । उनके सहस्रों उदर और हाथ थे । उनके महान् मुख दो सहस्रकी संख्यामें दिखायी देते थे । वे एक नेत्र तथा सौ नेत्रोंसे युक्त थे ॥
समासाद्य तु तं विश्वमहं मूर्ध्ना प्रणम्य च ।
ऋग्यजुः[ःरसामभिः: स्तुत्वा शरण्यं शरणं गतः ॥
उन विश्वात्माको निकट पाकर मैंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और ऋक्, यजुः तथा साम- मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करके मैं उन शरणागतवत्सल देवकी शरणमें गया ॥
तेन त्वं कृतसंवादः स्वतः सर्वहितैषिणा ।
विश्वरूपेण देवेन पुरुषेण महात्मना ॥
तमेवाराधय क्षिप्रं तमाराध्य न सीदसि । बेटा गरुड! सबका हित चाहनेवाले उन विश्वरूपधारी अन्तर्यामी परमात्मदेवसे तुमने वार्तालाप किया है; अतः शीघ्र उन्हींकी आराधना करो । उनकी आराधना करके तुम कभी कष्टमें नहीं पड़ोगे ' ॥ सोऽहमेवं भगवता पित्रा ब्रह्मर्षिसत्तमाः ॥
अनुनीतो यथान्यायं स्वमेव भवनं गतः ।
सोऽहमामन्त्र्य पितरं तद्भावगतमानसः ॥
स्वमेवालयमासाद्य तमेवार्थमचिन्तयम् । ब्रह्मर्षिशिरोमणियो! इस प्रकार अपने पूज्य पिताके यथोचितरूपसे समझानेपर मैं अपने घरको गया । पितासे विदा ले अपने घर आकर मैं उन्हीं परमात्माके ध्यानमें मन लगाकर उन्हींका चिन्तन करने लगा ॥ तद्भावगतभावात्मा तद्भूतगतमानसः ॥ गोविन्दं चिन्तयन्नास्से शाश्वतं परमव्ययम् । मेरा भावभक्तिसे युक्त मन उन्हींकी भावनामें लगा हुआ था । मेरा चित्त उनका चिन्तन करते- करते तदाकार हो गया था। इस प्रकार मैं उन सनातन अविनाशी परम पुरुष
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गोविन्दके चिन्तनमें तत्पर हो बैठा रहा ॥ धृतं बभूव हृदयं नारायणदिदृक्षया ॥
सोऽहं वेगं समास्थाय मनोमारुतवेगवान् ।
रम्यां विशालां बदरीं गतो नारायणाश्रमम् ॥
ऐसा करनेसे मेरा हृदय नारायणके दर्शनकी इच्छासे स्थिर हो गया और मैं मन एवं वायुके समान वेगशाली हो महान् वेगका आश्रय ले रमणीय बदरीविशाल तीर्थमें भगवान् नारायणके आश्रमपर जा पहुँचा ॥
ततस्तत्र हरिं दृष्ट्वा जगतः प्रभवं विभुम् ।
गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं प्रणतः शिरसा हरिम् ॥
ऋग्यजुःसामभिश्चैनं तुष्टाव परया मुदा । तदनन्तर वहाँ जगत्की उत्पत्तिके कारणभूत सर्वव्यापी कमलनयन श्रीगोविन्द हरिका दर्शन करके मैं उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और बड़ी प्रसन्नताके साथ ऋक्, यजुः एवं साममन्त्रोंके द्वारा उनका स्तवन किया ॥
सोऽहं प्रपन्नः शरणं देवदेवं सनातनम् ।
प्राञ्जलिर्मनसा भूत्वा वाक्यमेतत् तदोक्तवान् ॥
तब मैं मन- ही - मन उन सनातन देवदेवकी शरणमें गया और हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला– ॥
भगवन् भूतभव्येश भवद्भूतकृदव्यय ।
शरणं सम्प्रपन्नं मां त्रातुमर्हस्यरिंदम ॥
‘ भगवन्! भूत और भविष्यके स्वामी, वर्तमान भूतोंके निर्माता, शत्रुदमन, अविनाशी!
मैं आपकी शरणमें आया हूँ । आप मेरी रक्षा करें ॥
अहं तु तत्त्वजिज्ञासुः कोऽसि कस्यासि कुत्र वा ।
सम्प्राप्तः पदवीं देव स मां संत्रातुमर्हसि ॥
' मैं तो ' आप कौन हैं, किसके हैं और कहाँ रहते हैं? ' इस बातको तत्त्वसे जाननेकी
इच्छा रखकर आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ । देव! आप मेरी रक्षा करें ' ॥
श्रीभगवानुवाच
मम त्वं विदितः सौम्य यथावत् तत्त्वदर्शने ।
ज्ञापितश्चापि यत् पित्रा तच्चापि विदितं महत् ॥
श्रीभगवान्ने कहा — सौम्य! तुम यथावत्रूपसे मेरे तत्त्वका साक्षात्कार करनेके लिये सचेष्ट होओ । यह बात मुझे पहले से ही विदित है । तुम्हारे पिताने तुम्हें मेरे विषयमें जो कुछ ज्ञान दिया है वह सब कुछ मुझे ज्ञात है ॥ वैनतेय न कस्यापि अहं वैद्यः कथंचन ।
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मां हि विन्दन्ति विद्वांसो ये ज्ञाने परिनिष्ठिताः ॥
विनतानन्दन! किसीको भी किसी तरह मेरे स्वरूपका पूर्णतः ज्ञान नहीं हो सकता ।
ज्ञाननिष्ठ विद्वान् ही मेरे विषयमें कुछ जान पाते हैं ॥
निर्ममा निरहङ्कारा निराशीर्बन्धनायुताः ।
भवांस्तु सततं भक्तो मन्मनाः पक्षिसत्तम ॥
स्थूलं मां वेत्स्यसे तस्माज्जगतः कारणे स्थितम् । जो ममता और अहंकारसे रहित तथा कामनाओंके बन्धनसे मुक्त हैं, वे ही मुझे जान पाते हैं । पक्षिप्रवर! तुम मेरे भक्त हो और सदा ही मुझमें मन लगाये रखते हो । इसलिये जगत्के कारणरूपमें स्थित मेरे स्थूलस्वरूपका बोध प्राप्त करोगे ॥ सुपर्णउवाच
एवं दत्ताभयस्तेन ततोऽहमृषिसत्तमाः ।
नष्टखेदश्रमभयः क्षणेन ह्यभवं तदा ॥
गरुड कहते हैं —ऋषिशिरोमणियो! इस प्रकार भगवान्के अभय देनेपर क्षणभरमें मेरे खेद, श्रम और भय सब नष्ट हो गये ॥
स शनैर्याति भगवान् गत्या लघुपराक्रमः ।
अहं तु सुमहावेगमास्थायानुव्रजामि तम् ॥
उस समय शीघ्रगामी भगवान् अपनी गतिसे धीरे - धीरे चल रहे थे और मैं महान् वेगका आश्रय लेकर उनका अनुसरण करता था ॥
स गत्वा दीर्घमध्वानमाकाशममितद्युतिः ।
मनसाप्यगमं देशमाससादात्मतत्त्ववित् ॥
वे अमित तेजस्वी एवं आत्मतत्त्वके ज्ञाता भगवान् श्रीहरि आकाशमें बहुत दूरतकका मार्ग तै करके ऐसे देशमें जा पहुँचे जो मनके लिये भी अगम्य था ॥
अथ देवः समासाद्य मनसः सदृशं जवम् ।
मोहयित्वा च मां तत्र क्षणेनान्तरधीयत ॥
तदनन्तर भगवान् मनके समान वेगको अपनाकर मुझे मोहित करके वहीं क्षणभरमें अदृश्य हो गये ॥
तत्राम्बुधरधीरेण भोःशब्देनानुनादिना ।
अयं भोऽहमिति प्राह वाक्यं वाक्यविशारदः ॥
वहाँ मेघके समान धीर- गम्भीर स्वरमें उच्चारित ' भो ' शब्दके द्वारा बोलनेमें कुशल भगवान् इस प्रकार बोले— ' हे गरुड! यह मैं हूँ' ॥
शब्दानुसारी तु ततस्तं देशमहमाव्रजम् ।
तत्रापश्यं ततश्चाहं श्रीमद्धंसयुतं सरः ॥
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मैं उसी शब्दका अनुसरण करता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा । वहाँ मैंने एक सुन्दर सरोवर देखा जिसमें बहुत- से हंस शोभा पा रहे थे ॥
स तत्सरः समासाद्य भगवानात्मवित्तमः ।
भोःशब्दप्रतिसृष्टेन स्वरेणाप्रतिवादिना ॥
विवेश देवः स्वां योनिं मामिदं चाभ्यभाषत । आत्मतत्त्वके ज्ञाताओंमें सर्वोत्तम भगवान् नारायण उस सरोवरके पास पहुँचकर ‘ भो ’ शब्दसे युक्त अनुपम गम्भीर स्वरसे मुझे पुकारते हुए अपने शयन- स्थान जलमें प्रविष्ट हो गये और मुझसे इस प्रकार बोले— ॥ श्रीभगवानुवाच
विशस्व सलिलं सौम्य सुखमत्र वसामहे ।
श्रीभगवान्ने कहा— सौम्य! तुम भी जलमें प्रवेश करो । हम दोनों यहाँ सुखसे रहेंगे ॥
सुपर्णउवाच
ततश्च प्राविशं तत्र सह तेन महात्मना ।
दृष्टवानद्भुततरं तस्मिन् सरसि भास्वताम् ॥
अग्नीनां सुप्रणीतानामिद्धानामिन्धनैर्विना ।
दीप्तानामाज्यसिक्तानां स्थानेष्वार्चिष्मतां सदा ॥
गरुड कहते हैं —ऋषियो! तब मैं उन महात्मा श्रीहरिके साथ उस सरोवरमें घुसा । वहाँ मैंने अत्यन्त अद्भुत दृश्य देखा। भिन्न -भिन्न स्थानोंपर विधिपूर्वक स्थापित की हुई प्रज्वलित अग्नियाँ बिना ईंधनके ही जल रही थीं और घीकी आहुति पाकर उद्दीप्त हो उठी थीं ॥
दीप्तिस्तेषामनाज्यानां प्राप्ताज्यानामिवाभवत् ।
अनिद्धानामिव सतामिद्धानामिव भास्वताम् ॥
घी न मिलनेपर भी उन अग्नियोंकी दीप्ति घीकी आहुति पायी हुई अग्नियोंके समान थी और बिना ईंधनके भी ईंधनयुक्त आगके तुल्य उनकी प्रभा प्रकाशित होती रहती थी ॥
अथाहं वरदं देवं नापश्यं तत्र सङ्गतम् ।
वहाँ जानेपर भी उन वरदायक देवता नारायण - देवका मुझे दर्शन न हो सका ॥
तेषां तत्राग्निहोत्राणामीडितानां सहस्रशः ॥
समीपेत्वद्भुततममपश्यमहमव्ययम् ॥
सहस्रों स्थानोंमें प्रशंसित होनेवाले उन अग्निहोत्रोंके समीप मैंने उन अद्भुत एवं अविनाशी श्रीहरिको ढूँढ़ना आरम्भ किया ॥ एषु चाग्निसमीपेषु शुश्राव सुपदाक्षराः ॥ प्रभावान्तरितानां तु प्रस्पष्टाक्षरभाषिणाम् ।
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ऋग्यजुःसामगानां च मधुराः सुस्वरा गिरः । इन अग्नियोंके समीप अक्षरोंका स्पष्ट उच्चारण करनेवाले तथा अपने प्रभावसे अदृश्य रहनेवाले, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके विद्वानोंकी सुस्वर मधुर वाणी मैंने सुनी । उनके पद और अक्षर बहुत सुन्दर ढंगसे उच्चारित हो रहे थे ॥
तान्यनेकसहस्राणि परीयंस्तु महाजवात् ।
अपश्यमानस्तं देवं ततोऽहं व्यथितोऽभवम् ॥
मैं बड़े वेगसे वहाँके हजारों घरोंमें घूम आया; परंतु कहीं भी अपने उन आराध्यदेवको न देख सका, इससे मुझे बड़ी व्यथा हुई ॥
ततस्तेष्वग्निहोत्रेषु ज्वलत्सु विमलार्चिषु ।
भानुमत्सु न पश्यामि देवदेवं सनातनम् ॥
ततोऽहं तानि दीप्तानि परीय व्यथितेन्द्रियः ।
नान्तं तेषां प्रपश्यामि येनाहमिह चोदितः ॥
निर्मल ज्वालाओंसे युक्त वे अग्निहोत्र पूर्ववत् प्रकाशित हो रहे थे । उनके समीप भी मुझे कहीं सनातन देवाधिदेव श्रीहरि नहीं दिखायी दिये । तब मैं उन प्रदीप्त अग्निहोत्रोंकी परिक्रमा करते - करते थक गया । मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं; परंतु उनका कहीं अन्त नहीं दिखायी दिया । जिन भगवान्ने मुझे यहाँ आनेके लिये प्रेरित किया था, उनका दर्शन नहीं हो सका ॥
एवं चिन्तासमापन्नः प्रध्यातुमुपचक्रमे ।
विनयावनतो भूत्वा नमश्चक्रे महात्मने ॥
अनादिनिधनायैभिर्नामभिः परमात्मने । इस तरह चिन्तामें पड़कर मैं भगवान्का ध्यान करने लगा; एवं विनयसे नतमस्तक होकर मैंने निम्नांकित नामोंद्वारा आदि-अन्तसे रहित परमात्मा महामनस्वी नारायणकी वन्दना आरम्भ की- ॥ नारायणाय शुद्धाय शाश्वताय ध्रुवाय च ॥
भूतभव्यभवेशाय शिवाय शिवमूर्तये ।
शिवयोनेः शिवाद्याय शिवपूज्यतमाय च ॥
'जो शुद्ध, सनातन, ध्रुव, भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी, शिवस्वरूप और मंगलमूर्ति हैं, कल्याणके उत्पत्तिस्थान हैं, शिवके भी आदिकारण तथा भगवान् शिवके भी परम पूजनीय हैं, उन नारायणदेवको नमस्कार है ॥ घोररूपाय महते युगान्तकरणाय च । विश्वाय विश्वदेवाय विश्वेशाय महात्मने । ‘ जो कल्पका अन्त करनेके लिये अत्यन्त घोर रूप धारण करते हैं, जो विश्वरूप, विश्वदेव, विश्वेश्वर एवं परमात्मा हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार है ॥
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सहस्रोदारपादाय सहस्रनयनाय च ।
सहस्रबाहवे चैव सहस्रवदनाय च ॥
‘ जिनके सहस्रों उदर, सहस्रों पैर और सहस्रों नेत्र हैं, जो सहस्रों भुजाओं और सहस्रों मुखोंसे सुशोभित हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ॥
शुचिश्रवाय महते ऋतुसंवत्सराय च ।
ऋग्यजुःसामवक्त्राय अथर्वशिरसे नमः ॥
‘ जिनका यश पवित्र है, जो महान् तथा ऋतु एवं संवत्सररूप हैं, ऋक्, यजुः और सामवेद जिनके मुख हैं तथा अथर्ववेद जिनका सिर है, उन नारायण- देवको नमस्कार है ॥
हृषीकेशाय कृष्णाय द्रुहिणोरुक्रमाय च ।
ब्रह्मेन्द्रकाय तार्क्ष्याय वराहायैकशृङ्गिणे ॥
'जो हृषीकेश ( सम्पूर्ण इन्द्रियोंके नियन्ता ), कृष्ण ( सच्चिदानन्दस्वरूप), द्रुहिण ( ब्रह्मा), ऊरुक्रम ( बहुत बड़े डग भरनेवाले त्रिविक्रम), ब्रह्मा एवं इन्द्ररूप, गरुडस्वरूप तथा एक सींगवाले वराहरूपधारी हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ॥
शिपिविष्टाय सत्याय हरयेऽथ शिखण्डिने ।
हुतायोर्ध्वाय वक्त्राय रौद्रानीकाय साधवे ॥
सिन्धवे सिन्धुवर्षघ्ने देवानां सिन्धवे नमः । ‘ जो शिपिविष्ट ( तेजसे व्याप्त), सत्य, हरि और शिखण्डी ( मोरपंखधारी श्रीकृष्ण) आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं, जो हुत ( हविष्यको ग्रहण करनेवाले अग्निरूप), ऊर्ध्वमुख, रुद्रकी सेना, साधु, सिन्धु समुद्रमें वर्षाका हनन करनेवाले तथा देवसिन्धु ( गंगास्वरूप ) हैं, उन भगवान् विष्णुको प्रणाम है ॥ गरुत्मते त्रिनेत्राय सुधामाय वृषावृषे ॥ सम्राडुग्रे संकृतये विरजे सम्भवे भवे । ‘ जो गरुडरूपधारी, तीन नेत्रोंसे युक्त ( रुद्ररूप ), उत्तम धामवाले, वृषावृष, धर्मपालक, सबके सम्राट्, उग्ररूपधारी, उत्तम कृतिवाले, रजोगुणरहित, सबकी उत्पत्तिके कारण तथा भवरूप हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार है ॥ वृषाय वृषरूपाय विभवे भूर्भुवाय च ॥ दीप्तसृष्टाय यज्ञाय स्थिराय स्थविराय च । ' जो वृष ( अभीष्ट वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले ), वृषरूप ( धर्मस्वरूप), विभु ( व्यापक ) तथा भूर्लोक और भुवर्लोकमय हैं, जो तेजस्वी पुरुषोंद्वारा सम्पादित यज्ञरूप हैं, स्थिर हैं और स्थविररूप ( वृद्ध ) हैं, उन भगवान्को नमस्कार है ॥ अच्युताय तुषाराय वीराय च समाय च ॥ जिष्णवे पुरुहूताय वशिष्ठाय वराय च ।
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' जो अपनी महिमासे कभी च्युत नहीं होते, हिमके समान शीतल हैं, जिनमें वीरत्व है, जो सर्वत्र समभावसे स्थित हैं, विजयशील हैं, जिन्हें बहुत लोग पुकारते हैं अथवा जो इन्द्ररूप हैं तथा जो सर्वश्रेष्ठ वसिष्ठ हैं, उन भगवान्को नमस्कार है ॥ सत्येशाय सुरेशाय हरयेऽथ शिखण्डिने ॥ बर्हिषाय वरेण्याय वसवे विश्ववेधसे । 'जो सत्य और देवताओंके स्वामी हैं, हरि ( श्यामसुन्दर) और शिखण्डी ( मोरमुकुटधारी ) हैं, जो कुशापर बैठनेवाले सर्वश्रेष्ठ वसुरूप हैं, उन विश्वस्रष्टा भगवान् विष्णुको नमस्कार है ॥ किरीटिने सुकेशाय वासुदेवाय शुष्मिणे ॥ बृहदुक्थसुषेणाय युग्ये दुन्दुभये तथा । जो किरीटधारी, सुन्दर केशोंसे सुशोभित तथा पराक्रमी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णरूप हैं, बृहदुक्थ साम जिनका स्वरूप है, जो सुन्दर सेनासे युक्त हैं, जुएका भार सँभालनेवाले वृषभरूप हैं तथा दुन्दुभि नामक वाद्यविशेष हैं, उन भगवान्को नमस्कार है ॥ भवेसखाय विभवे भरद्वाजाभयाय च ॥ भास्कराय वरेन्द्राय पद्मनाभाय भूरिणे । ‘जो इस जगत्में जीवमात्रके सखा हैं, व्यापकरूप हैं, भरद्वाजको अभय देनेवाले हैं, सूर्यरूपसे प्रभाका विस्तार करनेवाले हैं, श्रेष्ठ पुरुषोंके स्वामी हैं, जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है और जो महान् हैं, उन भगवान् नारायणको नमस्कार है ॥ पुनर्वसुभृतत्वाय जीवप्रभविषाय च ॥
वषट्काराय स्वाहायै स्वधायै निधनाय च ।
ऋचे च यजुषे साम्ने त्रैलोक्यपतये नमः ॥
‘ जो पुनर्वसु नामक नक्षत्रसे पालित और जीवमात्रकी उत्पत्तिके स्थान हैं, वषट्कार, स्वाहा, स्वधा और निधन —ये जिनके ही नाम और रूप हैं तथा जो ऋक्, यजुष्, सामवेद-स्वरूप हैं और त्रिलोकीके अधिपति हैं, उन भगवान् विष्णुको मेरा प्रणाम है ॥
श्रीपद्मायात्मसदृशे धरणे धारणे परे ।
सौम्याय सौम्यरूपाय सौम्ये सुमनसे नमः ॥
' जो शोभाशाली कमलको हाथमें लिये रहते हैं, जो अपने समान स्वयं ही हैं, जो धारण करने और करानेवाले परम पुरुष हैं, जो सौम्य, सौम्यरूपधारी तथा सौम्य एवं सुन्दर मनवाले हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार है ॥
विश्वाय च सुविश्वाय विश्वरूपधराय च ।
केशवाय सुकेशाय रश्मिकेशाय भूरिणे ॥
‘ जो विश्वरूप, सुन्दर विश्वके निर्माता तथा विश्वरूपधारी हैं, जो केशव, सुन्दर केशोंसे युक्त किरणरूपी केशवाले और अधिक बलशाली हैं, उन भगवान् विष्णुको मेरा प्रणाम