06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1311–1320
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1311–1320
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बाह्यशौचं भवेदेतत् तथैवाचमनादिना ॥ सदा ही विशुद्ध आहार ग्रहण करना, शरीरको धो - पोंछकर साफ रखना तथा आचमन आदिके द्वारा भी शरीरको शुद्ध बनाये रखना, यह बाह्य शौच है ॥
मृच्चैव शुद्धदेशस्था गोशकृन्मूत्रमेव च ।
द्रव्याणि गन्धयुक्तानि यानि पुष्टिकराणि च ॥
एतैः सम्मार्जनैः कायमम्भसा च पुनः पुनः । अच्छे स्थानकी मिट्टी, गोबर, गोमूत्र, सुगन्धित द्रव्य तथा पौष्टिक पदार्थ–इन सब वस्तुओंसे मिश्रित जलके द्वारा मार्जन करके शरीरको बारंबार जलसे प्रक्षालित करे ॥ अक्षोभ्यं यत् प्रकीर्णं च नित्यस्रोतश्च यज्जलम् ॥ प्रायशस्तादृशे मज्जेदन्यथा च विवर्जयेत् ॥ जहाँका जल अक्षोभ्य (नहानेसे गँदला न होनेवाला) और फैला हुआ हो, जिसका प्रवाह कभी टूटता न हो । प्रायः ऐसे ही जलमें गोता लगाना चाहिये । अन्यथा उस जलको त्याग देना चाहिये ॥
त्रिस्त्रिराचमनं श्रेष्ठं निर्मलैरुद्धृतैर्जलैः ।
तथा विण्मूत्रयोः शुद्धिरद्भिर्बहुमृदा भवेत् ॥
निर्मल जलको हाथमें लेकर उसके द्वारा तीन - तीन बार आचमन करना श्रेष्ठ माना गया है । मल और मूत्रके स्थानोंकी शुद्धि बहुत- सी मिट्टी लगाकर जलके द्वारा धोनेसे होती है ॥ तथैव जलसंशुद्धिर्यत् संशुद्धं तु संस्पृशेत् ॥ इसी प्रकार जलकी शुद्धिका भी ध्यान रखना आवश्यक है । जो शुद्ध जल हो उसीका स्पर्श करे — उसीसे हाथ- मुँह धोकर कुल्ला करे और नहाये ॥
शकृता भूमिशुद्धिः स्याल्लौहानां भस्मना स्मृतम् ।
तक्षणं घर्षणं चैव दारवाणां विशोधनम् ॥
गोबरसे लीपनेपर भूमिकी शुद्धि होती है, राखसे मलनेपर धातुके पात्रोंकी शुद्धि होती है । लकड़ीके बने हुए पात्रोंकी शुद्धि छीलने, काटने और रगड़नेसे होती है ॥
दहनं मृण्मयानां च मर्त्यानां कृच्छ्रधारणम् ।
शेषाणां देवि सर्वेषामातपेन जलेन च ॥
ब्राह्मणानां च वाक्येन सदा संशोधनं भवेत् । मिट्टीके पात्रोंकी शुद्धि आगमें जलानेसे होती है, मनुष्योंकी शुद्धि कृच्छ्र सांतपन आदि व्रत धारण करनेसे होती है । देवि! शेष सब वस्तुओंकी शुद्धि सदा धूपमें तपाने, जलके द्वारा धोने और ब्राह्मणोंके वचनसे होती है ॥
अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते ।
एवमापदि संशुद्धिरेवं शौचं विधीयते ॥
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जिसका दोष देखा न गया हो ऐसी वस्तुको जलसे धो दिया जाय तो वह शुद्ध हो जाता है । जिसकी वाणीद्वारा प्रशंसा की जाती है, वह भी शुद्ध ही समझना चाहिये । इसी प्रकार आपत्तिकालमें शुद्धिकी व्यवस्था है और इसी तरह शौचका विधान है ॥ उमोवाच आहारशुद्धिस्तु कथं देवदेव महेश्वर ॥ उमाने पूछा — देवदेव! महेश्वर! आहारकी शुद्धि कैसे होती है? ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
अमांसमद्यमक्लेद्यमपर्युषितमेव च ।
अतिकट्वम्ललवणहीनं च शुभगन्धि च ॥
कृमिकेशमलैर्हीनं संवृतं शुद्धदर्शनम् ।
एवंविधं सदाऽऽहार्यं देवब्राह्मणसत्कृतम् ॥
श्रेष्ठमित्येव तज्ज्ञेयमन्यथा मन्यतेऽशुभम् । श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! जिसमें मांस और मद्य न हो, जो सड़ा हुआ या पसीजा न हो, बासी न हो, अधिक कड़वा, अधिक खट्टा और अधिक नमकीन न हो, जिससे उत्तम गन्ध आती हो, जिसमें कीड़े या केश न पड़े हों, जो निर्मल हो, ढका हुआ हो और देखनेमें भी शुद्ध हो, जिसका देवताओं और ब्राह्मणोंद्वारा सत्कार किया गया हो, ऐसे अन्नको सदा भोजन करना चाहिये । उसे श्रेष्ठ ही जानना चाहिये । इसके विपरीत जो अन्न है, उसे अशुभ माना गया है ॥ ग्राम्यादारण्यकैः सिद्धं श्रेष्ठमित्यवधारय ॥ अतिमात्रगृहीतात् तु अल्पदत्तं भवेच्छुचि । ग्राम्य अन्नकी अपेक्षा वनमें उत्पन्न होनेवाले पदार्थोंसे बना हुआ अन्न श्रेष्ठ होता है । इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो। अधिक- से - अधिक ग्रहण किये हुए अन्नकी अपेक्षा थोड़ा - सा दिया हुआ अन्न पवित्र होता है ॥ यज्ञशेषं हविःशेषं पितृशेषं च निर्मलम् ॥ इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥ यज्ञशेष ( देवताओंको अर्पण करनेसे बचा हुआ ), हविःशेष ( अग्निमें आहुति देनेसे बचा हुआ ) तथा पितृशेष ( श्राद्धसे अवशिष्ट ) अन्न निर्मल माना गया है । देवि! यह विषय तुम्हें बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ उमोवाच
भक्षयन्त्यपरे मांसं वर्जयन्त्यपरे विभो ।
तन्मे वद महादेव भक्ष्याभक्ष्यविनिर्णयम् ॥
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उमा पूछा — प्रभो! कुछ लोग तो मांस खाते हैं और दूसरे लोग उसका त्याग कर देते हैं । महादेव! ऐसी दशामें मुझे भक्ष्य- अभक्ष्यका निर्णय करके बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
मांसस्य भक्षणे दोषो यश्चास्या भक्षणे गुणः ।
तदहं कीर्तयिष्यामि तन्निबोध यथातथम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मांस खानेमें जो दोष है और उसे न खानेमें जो गुण है, उसका मैं यथार्थ रूपसे वर्णन करता हूँ, उसे सुनो ॥
इष्टं दत्तमधीतं च क्रतवश्च सदक्षिणाः ।
अमांसभक्षणस्यैव कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥
यज्ञ, दान, वेदाध्ययन तथा दक्षिणासहित अनेकानेक क्रतु— ये सब मिलकर मांस-भक्षणके परित्यागकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं होते ॥
आत्मार्थं यः परप्राणान् हिंस्यात् स्वादुफलेप्सया ।
व्याघ्रगृध्रशृगालैश्च राक्षसैश्च समस्तु सः ॥
जो स्वादकी इच्छासे अपने लिये दूसरेके प्राणोंकी हिंसा करता है, वह बाघ, गीध, सियार और राक्षसोंके समान है ॥
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
उद्विग्नवासं लभते यत्र यत्रोपजायते ॥
जो पराये मांससे अपने मांसको बढ़ाना चाहता है, वह जहाँ -कहीं भी जन्म लेता है वहीं उद्वेगमें पड़ा रहता है ॥
संछेदनं स्वमांसस्य यथा संजनयेद् रुजम् ।
तथैव परमांसे s पि वेदितव्यं विजानता ॥
जैसे अपने मांसको काटना अपने लिये पीड़ाजनक होता है, उसी तरह दूसरेका मांस
काटनेपर उसे भी पीड़ा होती है । यह प्रत्येक विज्ञ पुरुषको समझना चाहिये ॥
यस्तु सर्वाणि मांसानि यावज्जीवं न भक्षयेत् ।
स स्वर्गे विपुलं स्थानं लभते नात्र संशयः ॥
जो जीवनभर सब प्रकारके मांस त्याग देता है - कभी मांस नहीं खाता है, वह स्वर्गमें विशाल स्थान पाता है, इसमें संशय नहीं है ॥
यत् तु वर्षशतं पूर्णं तप्यते परमं तपः ।
यच्चापि वर्जयेन्मांसं सममेतन्न वा समम् ॥
मनुष्य जो पूरे सौ वर्षोंतक उत्कृष्ट तपस्या करता है और जो वह सदाके लिये मांसका परित्याग कर देता है— उसके ये दोनों कर्म समान हैं अथवा समान नहीं भी हो सकते हैं [ मांसका त्याग तपस्यासे भी उत्कृष्ट है ] ॥
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न हि प्राणैः प्रियतमं लोके किंचन विद्यते ।
तस्मात् प्राणिदया कार्या यथाऽऽत्मनि तथा परे ॥
संसारमें प्राणोंके समान प्रियतम दूसरी कोई वस्तु नहीं है । अतः समस्त प्राणियोंपर दया करनी चाहिये । जैसे अपने ऊपर दया अभीष्ट होती है, वैसे ही दूसरोंपर भी होनी चाहिये ॥
इत्येवं मुनयः प्राहुर्मांसस्याभक्षणे गुणान् ।
इस प्रकार मुनियोंने मांस न खानेमें गुण बताये हैं ॥
उमोवाच गुरुपूजा कथं देव क्रियते धर्मचारिभिः ॥ उमाने पूछा — देव! धर्मचारी मनुष्य गुरुजनोंकी पूजा कैसे करते हैं? ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
गुरुपूजां प्रवक्ष्यामि यथावत् तव शोभने ।
कृतज्ञानां परो धर्म इति वेदानुशासनम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा — शोभने! अब मैं तुम्हें यथावत् रूपसे गुरुजनोंकी पूजाकी विधि बता रहा हूँ । वेदकी यह आज्ञा है कि कृतज्ञ पुरुषोंके लिये गुरुजनोंकी पूजा परम धर्म है ॥
तस्मात् स्वगुरवः पूज्यास्ते हि पूर्वोपकारिणः ।
गुरूणां च गरीयांसस्त्रयो लोकेषु पूजिताः ॥
उपाध्यायः पिता माता सम्पूज्यास्ते विशेषतः । अतः सबको अपने - अपने गुरुजनोंका पूजन करना चाहिये; क्योंकि वे गुरुजन संतान और शिष्यपर पहले उपकार करनेवाले हैं । गुरुजनोंमें उपाध्याय ( अध्यापक ) पिता और माता — ये तीन अधिक गौरवशाली हैं । इनकी तीनों लोकोंमें पूजा होती है; अतः इन सबका विशेषरूपसे आदर- सत्कार करना चाहिये ॥ ये पितुर्भ्रातरो ज्येष्ठा ये च तस्यानुजास्तथा ॥ पितुः पिता च सर्वे ते पूजनीयाः पिता तथा ॥ - जो पिताके बड़े तथा छोटे भाई हों, वे तथा पिताके भी पिता – ये सब - के - सब पिताके ही तुल्य पूजनीय हैं ॥
मातुर्या भगिनी ज्येष्ठा मातुर्या च यवीयसी ।
मातामही च धात्री च सर्वास्ता मातरः स्मृताः ॥
माताकी जो जेठी बहिन तथा छोटी बहिन हैं, वे और नानी एवं धाय – इन सबको माताके ही तुल्य माना गया है ॥
उपाध्यायस्य यः पुत्रो यश्च तस्य भवेद् गुरुः ।
ऋत्विग् गुरुः पिता चेति गुरवः सम्प्रकीर्तिताः ॥
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उपाध्यायका जो पुत्र है वह गुरु है, उसका जो गुरु है वह भी अपना गुरु है, ऋत्विक् गुरु है और पिता भी गुरु है – ये सब - के - सब गुरु कहे गये हैं ॥
ज्येष्ठो भ्राता नरेन्द्रश्च मातुलः श्वशुरस्तथा ।
भयत्राता च भर्ता च गुरवस्ते प्रकीर्तिताः ॥
बड़ा भाई, राजा, मामा, श्वशुर, भयसे रक्षा करनेवाला तथा भर्ता ( स्वामी) – ये सब गुरु कहे गये हैं ॥
इत्येष कथितः साध्वि गुरूणां सर्वसंग्रहः ।
अनुवृत्तिं च पूजां च तेषामपि निबोध मे ॥
पतिव्रते! यह गुरु- कोटिमें जिनकी गणना है, उन सबका संग्रह करके यहाँ बताया गया है । अब उनकी अनुवृत्ति और पूजाकी भी बात सुनो ॥
आराध्या मातापितरावुपाध्यायस्तथैव च ।
कथंचिन्नावमन्तव्या नरेण हितमिच्छता ॥
अपना हित चाहनेवाले पुरुषको माता, पिता और उपाध्याय- इन तीनोंकी आराधना करनी चाहिये । किसी तरह भी इनका अपमान नहीं करना चाहिये ॥
तेन प्रीणन्ति पितरस्तेन प्रीतः प्रजापतिः ।
येन प्रीणाति चेन्माता प्रीताः स्युर्देवमातरः ॥
येन प्रीणात्युपाध्यायो ब्रह्मा तेनाभिपूजितः ।
अप्रीतेषु पुनस्तेषु नरो नरकमेति हि ॥
इससे पितर प्रसन्न होते हैं । प्रजापतिको प्रसन्नता होती है । जिस आराधनाके द्वारा वह माताको प्रसन्न करता है, उससे देवमाताएँ प्रसन्न होती हैं । जिससे वह उपाध्यायको संतुष्ट करता है, उससे ब्रह्माजी पूजित होते हैं । यदि मनुष्य आराधना द्वारा इन सबको संतुष्ट न करे तो वह नरकमें जाता है ॥
गुरूणां वैरनिर्बन्धो न कर्तव्यः कथंचन ।
नरकं स्वगुरुप्रीत्या मनसापि न गच्छति ॥
गुरुजनोंके साथ कभी वैर नहीं बाँधना चाहिये । अपने गुरुजनके प्रसन्न होनेपर मनुष्य कभी मनसे भी नरकमें नहीं पड़ता ॥
न ब्रूयाद् विप्रियं तेषामनिष्टं न प्रवर्तयेत् ।
विगृह्य न वदेत् तेषां समीपे स्पर्धया क्वचित् ॥
उन्हें जो अप्रिय लगे, ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिये, जिससे उनका अनिष्ट हो, ऐसा काम भी नहीं करना चाहिये । उनसे झगड़कर नहीं बोलना चाहिये और उनके समीप कभी किसी बातके लिये होड़ नहीं लगानी चाहिये ॥
यद् यदिच्छन्ति ते कर्तुमस्वतन्त्रस्तदाचरेत् ।
वेदानुशासनसमं गुरुशासनमिष्यते ॥
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वे जो- जो काम कराना चाहें, उनकी आज्ञाके अधीन रहकर वह सब कुछ करना चाहिये । वेदोंकी आज्ञाके समान गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन अभीष्ट माना गया है ॥
कलहांश्च विवादांश्च गुरुभिः सह वर्जयेत् ।
कैतवं परिहासांश्च मन्युकामाश्रयांस्तथा ॥
गुरुजनोंके साथ कलह और विवाद छोड़ दे, उनके साथ छल- कपट, परिहास तथा काम-म- क्रोधके आधारभूत बर्ताव भी न करे ॥
गुरूणां योऽनहंवादी करोत्याज्ञामतन्द्रितः ।
न तस्मात् सर्वमर्त्येषु विद्यते पुण्यकृत्तमः ॥
जो आलस्य और अहंकार छोड़कर गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करता है, समस्त मनुष्योंमें उससे बढ़कर पुण्यात्मा दूसरा कोई नहीं है ॥
असूयामपवादं च गुरूणां परिवर्जयेत् ।
तेषां प्रियहितान्वेषी भूत्वा परिचरेत् सदा ॥
गुरुजनोंके दोष देखना और उनकी निन्दा करना छोड़ दे, उनके प्रिय और हितका ध्यान रखते हुए सदा उनकी परिचर्या करे ॥
न तद् यज्ञफलं कुर्यात् तपो वाऽऽचरितं महत् ।
यत् कुर्यात् पुरुषस्येह गुरुपूजा सदा कृता ॥
यज्ञोंका फल और किया हुआ महान् तप भी इस जगत् में मनुष्यको वैसा लाभ नहीं पहुँचा सकता, जैसा सदा किया हुआ गुरुपूजन पहुँचा सकता है ॥
अनुवृत्तेर्विना धर्मो नास्ति सर्वाश्रमेष्वपि ।
तस्मात् क्षमावृतः क्षान्तो गुरुवृत्तिं समाचरेत् ॥
सभी आश्रमोंमें अनुवृत्ति ( गुरुसेवा) के बिना कोई भी धर्म सफल नहीं हो सकता ।
इसलिये क्षमासे युक्त और सहनशील होकर गुरुसेवा करे ॥
स्वमर्थं स्वशरीरं च गुर्वर्थे संत्यजेद् बुधः ।
विवादं धनहेतोर्वा मोहाद् वा तैर्न रोचयेत् ॥
विद्वान् पुरुष गुरुके लिये अपने धन और शरीरको समर्पण कर दे । धनके लिये अथवा मोहवश उनके साथ विवाद न करे ॥
ब्रह्मचर्यमहिंसा च दानानि विविधानि च ।
गुरुभिः प्रतिषिद्धस्य सर्वमेतदपार्थकम् ॥
जो गुरुजनोंसे अभिशप्त है, उसके किये हुए ब्रह्मचर्य, अहिंसा और नाना प्रकारके दान — ये सब व्यर्थ हो जाते हैं ॥ उपाध्यायं पितरं मातरं च येऽभिद्रुह्युर्मनसा कर्मणा वा । तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं
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तेभ्यो नान्यः पापकृदस्ति लोके ॥ जो लोग उपाध्याय, पिता और माताके साथ मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा द्रोह करते हैं, उन्हें भ्रूणहत्यासे भी बड़ा पाप लगता है । उनसे बढ़कर पापाचारी इस संसारमें दूसरा कोई नहीं है ॥ उमोवाच उपवासविधिं तत्र तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ उमाने कहा — प्रभो! अब आप मुझे उपवासकी विधि बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
शरीरमलशान्त्यर्थमिन्द्रियोच्छोषणाय च ।
एकभुक्तोपवासैस्तु धारयन्ते व्रतं नराः ॥
लभन्ते विपुलं धर्मं तथाऽऽहारपरिक्षयात् । श्रीमहेश्वर बोले — प्रिये! शारीरिक दोषकी शान्तिके लिये और इन्द्रियोंको सुखाकर वशमें करनेके लिये मनुष्य एक समय भोजन अथवा दोनों समय उपवासपूर्वक व्रत धारण करते हैं और आहार क्षीण कर देनेके कारण महान् धर्मका फल पाते हैं ॥ बहूनामुपरोधं तु न कुर्यादात्मकारणात् ॥ जीवोपघातं च तथा स जीवन् धन्य इष्यते । जो अपने लिये बहुतसे प्राणियोंको बन्धनमें नहीं डालता और न उनका वध ही करता है, वह जीवन भर धन्य माना जाता है ॥ तस्मात् पुण्यं लभेन्मर्त्यः स्वयमाहारकर्शनात् ॥ तद् गृहस्थैर्यथाशक्ति कर्तव्यमिति निश्चयः ॥ अतः यह सिद्ध होता है कि स्वयं आहारको घटा देनेसे मनुष्य अवश्य पुण्यका भागी होता है । इसलिये गृहस्थोंको यथाशक्ति आहार- संयम करना चाहिये, यह शास्त्रोंका निश्चित आदेश है ॥
उपवासार्दिते काये आपदर्थं पयो जलम् ।
भुञ्जन्नप्रतिघाती स्याद् ब्राह्मणाननुमान्य च ॥
उपवाससे जब शरीरको अधिक पीड़ा होने लगे, तब उस आपत्तिकालमें ब्राह्मणोंसे आज्ञा लेकर यदि मनुष्य दूध अथवा जल ग्रहण कर ले तो इससे उसका व्रत भंग नहीं होता ॥ उमोवाच ब्रह्मचर्यं कथं देव रक्षितव्यं विजानता ॥ उमाने पूछा — देव! विज्ञ पुरुषको ब्रह्मचर्यकी रक्षा कैसे करनी चाहिये? ॥
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श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता ॥
ब्रह्मचर्यं परं शौचं ब्रह्मचर्यं परं तपः ।
केवलं ब्रह्मचर्येण प्राप्यते परमं पदम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा – देवि! यह विषय मैं तुम्हें बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो । ब्रह्मचर्य सर्वोत्तम शौचाचार है, ब्रह्मचर्य उत्कृष्ट तपस्या है तथा केवल ब्रह्मचर्यसे भी परमपदकी प्राप्ति होती है ॥
संकल्पाद् दर्शनाच्चैव तद्युक्तवचनादपि ।
संस्पर्शादथ संयोगात् पञ्चधा रक्षितं व्रतम् ॥
संकल्पसे, दृष्टिसे, न्यायोचित वचनसे, स्पर्शसे और संयोगसे – इन पाँच प्रकारोंसे व्रतकी रक्षा होती है ॥
व्रतवद्धारितं चैव ब्रह्मचर्यमकल्मषम् ।
नित्यं संरक्षितं तस्य नैष्ठिकानां विधीयते ॥
व्रतपूर्वक धारण किया हुआ निष्कलंक ब्रह्मचर्य सदा सुरक्षित रहे, ऐसा नैष्ठिक ब्रह्मचारियोंके लिये विधान है ॥ तदिष्यते गृहस्थानां कालमुद्दिश्य कारणम् ॥
जन्मनक्षत्रयोगेषु पुण्यवासेषु पर्वसु ।
देवताधर्मकार्येषु ब्रह्मचर्यव्रतं चरेत् ॥
वही ब्रह्मचर्य गृहस्थोंके लिये भी अभीष्ट है, इसमें काल ही कारण है । जन्म- नक्षत्रका योग आनेपर पवित्र स्थानोंमें पर्वोंके दिन तथा देवतासम्बन्धी धर्म - कृत्योंमें गृहस्थोंको ब्रह्मचर्य व्रतका पालन अवश्य करना चाहिये ॥
ब्रह्मचर्यव्रतफलं लभेद् दारव्रती सदा ।
शौचमायुस्तथाऽऽरोग्यं लभ्यते ब्रह्मचारिभिः ॥
जो सदा एकपत्नीव्रती रहता है, वह ब्रह्मचर्य व्रतके पालनका फल पाता है ।
ब्रह्मचारियोंको पवित्रता, आयु तथा आरोग्यकी प्राप्ति होती है ॥
उमोवाच
तीर्थचर्याव्रतं देव क्रियते धर्मकांक्षिभिः ।
कानि तीर्थानि लोकेषु तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा- देव! बहुत - से धर्माभिलाषी पुरुष तीर्थयात्राका व्रत धारण करते हैं; अतः लोकोंमें कौन - कौनसे तीर्थ हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच हन्त ते कथयिष्यामि तीर्थस्नानविधिं प्रिये ।
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पावनार्थं च शौचार्थं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा ॥ श्रीमहेश्वरने कहा – प्रिये! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें तीर्थस्नानकी विधि बताता हूँ, सुनो । पूर्वकालमें ब्रह्माजीने दूसरोंको पवित्र करने तथा स्वयं भी पवित्र होनेके लिये इस विधिका निर्माण किया था ॥
यास्तु लोके महानद्यस्ताः सर्वास्तीर्थसंज्ञिकाः ।
तासां प्राक्स्रोतसः श्रेष्ठाः सङ्गमश्च परस्परम् ॥
लोकमें जो बड़ी -बड़ी नदियाँ हैं, उन सबका नाम तीर्थ है । उनमें भी जिनका प्रवाह पूरबकी ओर है, वे श्रेष्ठ हैं और जहाँ दो नदियाँ परस्पर मिलती हैं, वह स्थान भी उत्तम तीर्थ कहा गया है ॥ तासां सागरसंयोगो वरिष्ठश्चेति विद्यते ॥
तासामुभयतः कूलं तत्र तत्र मनीषिभिः ।
देवैर्वा सेवितं देवि तत् तीर्थं परमं स्मृतम् ॥
और उन नदियोंका जहाँ समुद्रके साथ संयोग हुआ है, वह स्थान सबसे श्रेष्ठ तीर्थ बताया गया है । देवि! उन नदियोंके दोनों तटोंपर मनीषी पुरुषोंने जिस स्थानका सेवन किया है, वह उत्कृष्ट तीर्थ माना गया है ॥
समुद्रश्च महातीर्थं पावनं परमं शुभम् ।
तस्य कूलगतास्तीर्था महद्भिश्च समाप्लुताः ॥
समुद्र भी परम पावन एवं शुभ महातीर्थ है । उसके तटपर जो तीर्थ हैं, उनमें महात्मा पुरुषोंने गोता लगाया है ॥
स्रोतसां पर्वतानां च जोषितानां महर्षिभिः ।
अपि कूलं तटाकं वा सेवितं मुनिभिः प्रिये ॥
प्रिये! महर्षियोंद्वारा सेवित जो जलस्रोत और पर्वत हैं, उनके तटों और तड़ागोंपर भी बहुतसे मुनि निवास करते हैं ॥ तत् तु तीर्थमिति ज्ञेयं प्रभावात् तु तपस्विनाम् ॥
तदाप्रभृति तीर्थत्वं लभेल्लोकहिताय वै ।
एवं तीर्थं भवेद् देवि तस्य स्नानविधिं शृणु ॥
उन तपस्वी मुनियोंके प्रभावसे उस स्थानको तीर्थ समझना चाहिये । ऋषियोंके निवासकालसे ही वह स्थान जगत्के हितके लिये तीर्थत्व प्राप्त कर लेता है । देवि! इस
प्रकार स्थानविशेष तीर्थ बन जाता है । अब उसकी स्नानविधि सुनो ॥
जन्मना व्रतभूयिष्ठो गत्वा तीर्थानि कांक्षया ।
उपवासत्रयं कुर्यादेकं वा नियमान्वितः ॥
जो जन्मकालसे ही बहुत - से व्रत करता आया हो, वह पुरुष तीर्थोंके सेवनकी इच्छासे यदि वहाँ जाय तो नियमसे रहकर तीन या एक उपवास करे ॥
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पुण्यमासयुते काले पौर्णमास्यां यथाविधि ।
बहिरेव शुचिर्भूत्वा तत् तीर्थं मन्मना विशेत् ॥
पवित्र माससे युक्त समयमें पूर्णिमाको विधिपूर्वक बाहर ही पवित्र हो मुझमें मन लगाकर उस तीर्थके भीतर प्रवेश करे ॥
त्रिराप्लुत्स जलाभ्याशे दत्त्वा ब्राह्मणदक्षिणाम् ।
अभ्यर्च्य देवायतनं ततः प्रायाद् यथागतम् ॥
उसमें तीन बार गोता लगाकर जलके निकट ही ब्राह्मणको दक्षिणा दे, फिर देवालयमें देवताकी पूजा करके जहाँ इच्छा हो, वहाँ जाय ॥
एतद् विधानं सर्वेषां तीर्थं तीर्थमिति प्रिये ।
समीपतीर्थस्नानात् तु दूरतीर्थं सुपूजितम् ॥
प्रिये! प्रत्येक तीर्थमें सबके लिये स्नानका यही विधान है । निकटवर्ती तीर्थमें स्नान करनेकी अपेक्षा दूरवर्ती तीर्थमें स्नान आदि करना अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है ॥
आदिप्रभृति शुद्धस्य तीर्थस्नानं शुभं भवेत् ।
तपोऽर्थं पापनाशार्थं शौचार्थं तीर्थगाहनम् ॥
जो पहलेसे ही शुद्ध हो, उसके लिये तीर्थस्थान शुभकारक माना जाता है । तपस्या, पापनाश और बाहर- भीतरकी पवित्रताके लिये तीर्थोंमें स्नान किया जाता है ॥
एवं पुण्येषु तीर्थेषु तीर्थस्नानं शुभं भवेत् ।
एतन्नैयमिकं सर्वं सुकृतं कथितं तव ॥
इस प्रकार पुण्यतीर्थोंमें स्नान करना कल्याणकारी होता है । यह सब नियमपूर्वक सम्पादित होनेवाले पुण्यका तुम्हारे सामने वर्णन किया गया है ॥ उमोवाच
लोकसिद्धं तु यद् द्रव्यं सर्वसाधारणं भवेत् ।
तद् ददत् सर्वसामान्यं कथं धर्मं लभेन्नरः ॥
उमाने पूछा — भगवन्! जो द्रव्य लोकमें सबको प्राप्त है, जो सर्वसाधारणकी वस्तु है, उस सर्वसामान्य वस्तुका दान करनेवाला मनुष्य कैसे धर्मका भागी होता है? ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
लोके भूतमयं द्रव्यं सर्वसाधारणं तथा ।
तथैव तद् ददन्मर्त्यो लभेत् पुण्यं स तच्छृणु ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! लोकमें जो भौतिक द्रव्य हैं, वे सबके लिये साधारण हैं; उन वस्तुओंका दान करनेवाला मनुष्य किस तरह पुण्यका भागी होता है, यह बताता हूँ, सुनो ॥
दाता प्रतिग्रहीता च देयं सोपक्रमं तथा ।
देशकालौ च यत् त्वेतद् दानं षड्गुणमुच्यते ॥