श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1301–1310
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1301–1310
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एवं ते नरकान् भुक्त्वा तत्र क्षपितकल्मषाः ।
नरकेभ्यो विमुक्ताश्च जायन्ते कृमिजातियु ॥
इस प्रकार नरकोंका कष्ट भोग लेनेके बाद पाप कट जानेपर मनुष्य उन नरकोंसे छूटकर कीटयोनिमें जन्म लेते हैं ॥
उद्भेदजेषु वा केचिदत्रापि क्षीणकल्मषाः ।
पुनरेव प्रजायन्ते मृगपक्षिषु शोभने ॥
मृगपक्षिषु तद् भुक्त्वा लभन्ते मानुषं पदम् ॥
शोभने! अथवा कोई- कोई उद्भिज्ज योनिमें जन्म लेते हैं । उसमें भी कुछ पापोंका क्षय होनेके बाद वे पुनः पशु - पक्षियोंकी योनिमें जन्म पाते हैं । वहाँ कर्मफल भोग लेनेपर उन्हें मनुष्यशरीरकी प्राप्ति होती है ॥ उमोवाच नानाजातिषु केनैव जायन्ते पापकारिणः ॥ उमाने पूछा - प्रभो! पापाचारी मनुष्य किस प्रकारसे नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेते हैं? ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि यत् त्वमिच्छसि शोभने ।
सर्वदाऽऽत्मा कर्मवशो नानाजातिषु जायते ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— शोभने! तुम जो चाहती हो, उसे बता रहा हूँ । जीवात्मा सदा कर्मके अधीन होकर नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेता है ॥
यश्च मांसप्रियो नित्यं काकगृध्रान् स संस्पृशेत् ।
सुरापः सततं मर्त्यः सूकरत्वं व्रजेद् ध्रुवम् ॥
जो प्रतिदिन मांसके लिये लालायित रहता है, वह कौओं और गीधोंकी योनिमें जन्म लेता है । सदा शराब पीनेवाला मनुष्य निश्चय ही सूअर होता है ॥
अभक्ष्यभक्षणो मर्त्यः काकजातिषु जायते ।
आत्मघ्नो यो नरः कोपात् प्रेतजातिषु तिष्ठति ॥
अभक्ष्य भक्षण करनेवाला मनुष्य कौएके कुलमें उत्पन्न होता है तथा क्रोधपूर्वक आत्महत्या करनेवाला पुरुष प्रेतयोनिमें पड़ा रहता है ॥
पैशुन्यात् परिवादाच्च कुक्कुटत्वमवाप्नुयात् ।
नास्तिकश्चैव यो मूर्खो मृगजातिं स गच्छति ॥
दूसरोंकी चुगली और निन्दा करनेसे मुर्गेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है । जो मूर्ख नास्तिक होता है, वह मृगजातिमें जन्म ग्रहण करता है ॥ हिंसाविहारस्तु नरः कृमिकीटेषु जायते ।
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अतिमानयुतो नित्यं प्रेत्य गर्दभतां व्रजेत् ॥
हिंसा या शिकारके लिये भ्रमण करनेवाला मानव कीड़ोंकी योनिमें जन्म लेता है ।
अत्यन्त अभिमानयुक्त पुरुष सदा मृत्युके पश्चात् गदहेकी योनिमें जन्म पाता है ॥
अगम्यागमनाच्चैव परदारनिषेवणात् ।
मूषिकत्वं व्रजेन्मर्त्यो नास्ति तत्र विचारणा ॥
अगम्या - गमन और परस्त्रीसेवन करनेसे मनुष्य चूहा होता है, इसमें शंका करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥
कृतघ्नो मित्रघाती च शृगालवृकजातिषु ।
कृतघ्नः पुत्रघाती च स्थावरेष्वथ तिष्ठति ॥
कृतघ्न और मित्रघाती मनुष्य सियार और भेड़ियोंकी योनिमें जन्म लेता है । दूसरोंके किये हुए उपकारको न माननेवाला और पुत्रघाती मनुष्य स्थावरयोनिमें जन्म लेता है ॥
एवमाद्यशुभं कृत्वा नरा निरयगामिनः ।
तां तां योनिं प्रपद्यन्ते स्वकृतस्यैव कारणात् ॥
इत्यादि प्रकारके अशुभ कर्म करके मनुष्य नरकगामी होते हैं और अपनी ही करनीके कारण पूर्वोक्त भिन्न- भिन्न योनिमें जन्म ग्रहण करते हैं ॥
एवं जातिषु निर्देश्याः प्राणिनः पापकारिणः ।
कथंचित् पुनरुत्पद्य लभन्ते मानुषं पदम् ॥
इसी तरह विभिन्न जातियोंमें जन्म लेनेवाले पापाचारी प्राणियोंका निर्देश करना चाहिये । ये किसी तरह उन योनियोंसे छूटकर जब पुनः जन्म लेते हैं, तब मनुष्यका पद पाते हैं ॥
बहुशश्चाग्निसंक्रान्तं लोहं शुचिमयं यथा ।
बहुदुःखाभिसंतप्तस्तथाऽऽत्मा शोध्यते बलात् ॥
तस्मात् सुदुर्लभं चेति विद्धि जन्मसु मानुषम् ॥
जैसे लोहेको बार- बार आगमें तपानेसे वह शुद्ध होता है, उसी प्रकार बहुत दुःखसे व-जन्मको अत्यन्त संतप्त हुआ जीवात्मा बलात् शुद्ध हो जाता है । अतः सभी जन्मोंमें मानव-दुर्लभ समझो ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
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[ शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार- शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास- विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश- काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक - वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण ] उमोवाच
श्रोतुं भूयोऽहमिच्छामि प्रजानां हितकारणात् ।
शुभाशुभमिति प्रोक्तं कर्म स्वं स्वं समासतः ॥
उमाने पूछा — भगवन्! अब मैं पुनः प्रजावर्गके हितके लिये शुभ और अशुभ कहे जानेवाले अपने - अपने कर्मका संक्षेपसे वर्णन सुनना चाहती हूँ ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि तत् सर्वं शृणु शोभने ।
सुकृतं दुष्कृतं चेति द्विविधं कर्मविस्तरम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा — शोभने! वह सब मैं तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो । जहाँतक कर्मोंका विस्तार है, उसे दो भागोंमें बाँटा जा सकता है । पहला भाग सुकृत ( पुण्य) और दूसरा दुष्कृत ( पाप) ॥
तयोर्यद् दुष्कृतं कर्म तच्च संजायते त्रिधा ।
मनसा कर्मणा वाचा बुद्धिमोहसमुद्भवात् ॥
उन दोनोंमें जो दुष्कृत कर्म है, वह तीन प्रकारका होता है । एक मनसे, दूसरा क्रियासे और तीसरा वाणीसे होनेवाला दुष्कर्म है । बुद्धिमें मोहका प्रादुर्भाव होनेसे ही ये पाप बनते हैं ॥
मनःपूर्वं तु वा कर्म वर्तते वाङ्मयं ततः ।
जायते वै क्रियायोगमनु चेष्टाक्रमः प्रिये ॥
प्रिये! पहले मनके द्वारा कर्मका चिन्तन होता है, फिर वाणीद्वारा उसे प्रकाशमें लाया जाता है । तदनन्तर क्रियाद्वारा उसे सम्पन्न किया जाता है । इसके साथ चेष्टाका क्रम चलता रहता है ॥
अभिद्रोहोऽभ्यसूया च परार्थेषु च स्पृहा ।
धर्मकार्ये यदाश्रद्धा पापकर्मणि हर्षणम् ॥
एवमाद्यशुभं कर्म मनसा पापमुच्यते । अभिद्रोह, असूया, पराये अर्थकी अभिलाषा - ये मानसिक अशुभ कर्म हैं । जब धर्म-कार्यमें अश्रद्धा हो, पाप-कर्ममें हर्ष और उत्साह बढ़े तो इस तरहके अशुभ कर्म मानसिक
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पाप कहलाते हैं ॥
अनृतं यच्च परुषमबद्धं यच्च शंकरि ।
असत्यं परिवादश्च पापमेतत् तु वाङ्मयम् ॥
असत्य कल्याण करनेवाली देवि! जो झूठ, कठोर तथा असम्बद्ध वचन बोला जाता है, भाषण तथा दूसरोंकी निन्दा की जाती है - यह सब वाणीसे होनेवाला पाप है ॥
अगम्यागमनं चैव परदारनिषेवणम् ।
वधबन्धपरिक्लेशैः परप्राणोपतापनम् ॥
चौर्यं परेषां द्रव्याणां हरणं नाशनं तथा ।
अभक्ष्यभक्षणं चैव व्यसनेष्वभिषङ्गता ॥
दर्पात् स्तम्भाभिमानाच्च परेषामुपतापनम् ।
अकार्याणां च करणमशौचं पानसेवनम् ॥
दौःशील्यं पापसम्पर्के साहाय्यं पापकर्मणि ।
अधर्म्यमयशस्यं च कार्यं तस्य निषेवणम् ॥
एवमाद्यशुभं चान्यच्छारीरं पापमुच्यते ॥
अगम्या स्त्रीके साथ समागम, परायी स्त्रीका सेवन, प्राणियोंका वध, बन्धन तथा नाना प्रकारके क्लेशोंद्वारा दूसरे प्राणियोंको सताना, पराये धनकी चोरी, अपहरण तथा नाश करना, अभक्ष्य पदार्थोंका भक्षण, दुर्व्यसनोंमें आसक्ति, दर्प, उद्दण्डता और अभिमानसे दूसरोंको सताना, न करनेयोग्य काम करना, अपवित्र वस्तुको पीना अथवा उसका सेवन करना, पापियोंके सम्पर्क में रहकर दुराचारी होना, पापकर्ममें सहायता करना, अधर्म और अपयश बढ़ानेवाले कार्योंको अपनाना इत्यादि जो दूसरे दूसरे अशुभ कर्म हैं, वे शारीरिक पाप कहलाते हैं ॥
मानसाद् वाङ्मयं पापं विशिष्टमिति लक्ष्यते ।
वाङ्मयादपि वै पापाच्छारीरं गण्यते बहु ॥
मानस पापसे वाणीका पाप बढ़कर समझा जाता है । वाचिक पापसे शारीरिक पापको अधिक गिना जाता है ॥
एवं पापयुतं कर्म त्रिविधं पातयेन्नरम् ।
परोपतापजननमत्यन्तं पातकं स्मृतम् ॥
इस प्रकार जो तीन तरहका पापकर्म है, वह मनुष्यको नीचे गिराता है । दूसरोंको संताप देना अत्यन्त पातक माना गया है ॥
त्रिविधं तत् कृतं पापं कर्तारं पापकं नयेत् ।
पातकं चापि यत् कर्म कर्मणा बुद्धिपूर्वकम् ॥
सापदेशमवश्यं तु कर्तव्यमिति तत् कृतम् ।
कथंचित् तत् कृतमपि कर्ता तेन न लिप्यते ॥
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अपना किया हुआ त्रिविध पाप कर्ताको पापमय योनिमें ले जाता है । पातकरूप कर्म भी यदि बुद्धि - पूर्वक किसीके प्राण बचाने आदिके उद्देश्यसे अवश्य कर्तव्य मानकर क्रिया ( शरीर ) द्वारा किसी प्रकार किया गया हो तो उससे कर्ता लिप्त नहीं होता ॥ उमोवाच भगवन् पापकं कर्म यथा कृत्वा न लिप्यते ॥ उमाने पूछा — भगवन्! किस तरह पापकर्म करके मनुष्य उससे लिप्त नहीं होता? ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
यो नरोऽनपराधी च स्वात्मप्राणस्य रक्षणात् ।
शत्रुमुद्यतशस्त्रं वा पूर्वं तेन हतोऽपि वा ॥
प्रतिहन्यान्नरो हिंस्यान्न स पापेन लिप्यते । श्रीमहेश्वरने कहा- देवि! जो निरपराध मनुष्य शस्त्र उठाकर मारनेके लिये आये हुए शत्रुको पहले उसीके द्वारा आघात होनेपर अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये उसपर बदलेमें प्रहार करे और मार डाले, वह पापसे लिप्त नहीं होता ॥
चोरादधिकसंत्रस्तस्तत्प्रतीकारचेष्टया ।
यः प्रजघ्नन् नरो हन्यान्न स पापेन लिप्यते ॥
जो चोरसे अधिक भयभीत हो उससे बदला लेनेकी चेष्टा करते हुए उसपर प्रहार करता और उसे मार डालता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता ॥
ग्रामार्थं भर्तृपिण्डार्थं दीनानुग्रहकारणात् ।
वधबन्धपरिक्लेशान् कुर्वन् पापात् प्रमुच्यते ॥
जो ग्रामरक्षाके लिये, स्वामीके अन्नका बदला चुकानेके लिये अथवा दीन- दुःखियोंपर अनुग्रह करके किसी शत्रुका वध करता या उसे बन्धनमें डालकर क्लेश पहुँचाता है, वह भी पापसे मुक्ता हो जाता है ॥
दुर्भिक्षे चात्मवृत्त्यर्थमेकायनगतस्तथा ।
अकार्यं वाप्यभक्ष्यं वा कृत्वा पापान्न लिप्यते ॥
जो अकालमें अपनी जीविका चलानेके लिये तथा दूसरा कोई मार्ग न रह जानेपर अकार्य या अभक्ष्य भक्षण करता है, वह उसके पापसे लिप्त नहीं होता ॥
केचिद्धसन्ति तत् पीत्वा प्रवदन्ति तथा परे ।
नृत्यन्ति मुदिताः केचिद् गायन्ति च शुभाशुभान् ॥
( अब मदिरा पीनेके दोष बताता हूँ) मदिरा पीने -वाले उसे पीकर नशेमें अट्टहास करते हैं, अंट - संट बातें बकते हैं, कितने ही प्रसन्न होकर नाचते हैं और भले - बुरे गीत गाते हैं ॥
कलिं ते कुर्वतेऽभीष्टं प्रहरन्ति परस्परम् ।
क्वचिद् धावन्ति सहसा प्रस्खलन्ति पतन्ति च ॥
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वे आपसमें इच्छानुसार कलह करते और एक दूसरेको मारते - पीटते हैं । कभी सहसा दौड़ पड़ते हैं, कभी लड़खड़ाते और गिरते हैं ॥
अयुक्तं बहु भाषन्ते यत्र क्वचन शोभने ।
नग्ना विक्षिप्य गात्राणि नष्टज्ञाना इवासते ॥
शोभने! वे जहाँ कहीं भी अनुचित बातें बकने लगते हैं और कभी नंग - धड़ंग हो हाथ-पैर पटकते हुए अचेत- से हो जाते हैं ॥
एवं बहुविधान् भावान् कुर्वन्ति भ्रान्तचेतनाः ।
ये पिबन्ति महामोहं पानं पापयुता नराः ॥
इस प्रकार भ्रान्तचित्त होकर वे नाना प्रकारके भाव प्रकट करते हैं । जो महामोहमें डालनेवाली मदिरा पीते हैं, वे मनुष्य पापी होते हैं ॥
धृतिं लज्जां च बुद्धिं च पानं पीतं प्रणाशयेत् ।
तस्मान्नराः सम्भवन्ति निर्लज्जा निरपत्रपाः ॥
पी हुई मदिरा मनुष्यके धैर्य, लज्जा और बुद्धिको नष्ट कर देती है । इससे मनुष्य निर्लज्ज और बेहया हो जाते हैं ॥
पानपस्तु सुरां पीत्वा तदा बुद्धिप्रणाशनात् ।
कार्याकार्यस्य चाज्ञानाद् यथेष्टकरणात् स्वयम् ॥
विदुषामविधेयत्वात् पापमेवाभिपद्यते ॥
शराब पीनेवाला मनुष्य उसे पीकर बुद्धिका नाश हो जानेसे कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान न रह जानेसे, इच्छानुसार कार्य करनेसे तथा विद्वानोंकी आज्ञाके अधीन न रहनेसे पापको ही प्राप्त होता है ॥
परिभूतो भवेल्लोके मद्यपो मित्रभेदकः ।
सर्वकालमशुद्धश्च सर्वभक्षस्तथा भवेत् ॥
मदिरा पीनेवाला पुरुष जगत्में अपमानित होता है । मित्रोंमें फूट डालता है, सब कुछ खाता और हर समय अशुद्ध रहता है ॥
विनष्टो ज्ञानविद्वद्भ्यः सततं कलिभावगः ।
परुषं कटुकं घोरं वाक्यं वदति सर्वशः ॥
वह स्वयं हर प्रकारसे नष्ट होकर विद्वान् विवेकी पुरुषोंसे झगड़ा किया करता है ।
सर्वथा रूखा, कड़वा और भयंकर वचन बोलता रहता है ॥
गुरूनतिवदेन्मत्तः परदारान् प्रधर्षयेत् ।
संविदं कुरुते शौण्डैर्न शृणोति हितं क्वचित् ॥
वह मतवाला होकर गुरुजनोंसे बहकी - बहकी बातें करता है, परायी स्त्रियोंसे बलात्कार करता है, धूर्तों और जुआरियोंके साथ बैठकर सलाह करता है और कभी किसीकी कही हुई हितकर बात भी नहीं सुनता है ॥
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एवं बहुविधा दोषाः पानपे सन्ति शोभने ।
केवलं नरकं यान्ति नास्ति तत्र विचारणा ॥
शोभने! इस प्रकार मदिरा पीनेवालेमें बहुत - से दोष हैं । वे केवल नरकमें जाते हैं, इस विषयमें कोई विचार करनेकी बात नहीं है ॥
तस्मात् तद् वर्जितं सद्भिः पानमात्महितैषिभिः ।
यदि पानं न वर्जेरन् सन्तश्चारित्रकारणात् ॥
भवेदेतज्जगत् सर्वममर्यादं च निष्क्रियम् ॥
इसलिये अपना हित चाहनेवाले सत्पुरुषोंने मदिरा- पानका सर्वथा त्याग किया है । यदि सदाचारकी रक्षाके लिये सत्पुरुष मदिरा पीना न छोड़े तो यह सारा जगत् मर्यादारहित और अकर्मण्य हो जाय ( यह शरीर- सम्बन्धी महापाप है ) ॥
तस्माद् बुद्धेर्हि रक्षार्थं सद्भिः पानं विवर्जितम् ।
अतः श्रेष्ठ पुरुषोंने बुद्धिकी रक्षाके लिये मद्यपानको त्याग दिया है ॥
विधानं सुकृतस्यापि भूयः शृणु शुचिस्मिते ।
प्रोच्यते तत् त्रिधा देवि सुकृतं च समासतः ॥
शुचिस्मिते! अब पुण्यका भी विधान सुनो । देवि! थोड़ेमें तीन प्रकारका पुण्य भी बताया गया है ॥
त्रैविध्यदोषोपरमे यस्तु दोषव्यपेक्षया ।
स हि प्राप्नोति सकलं सर्वदुष्कृतवर्जनात् ॥
मानसिक, वाचिक और कायिक तीनों दोषोंकी निवृत्ति हो जानेपर जो दोषकी उपेक्षा करके सम्पूर्ण दुष्कर्मोंका त्याग कर देता है, वही समस्त शुभ कर्मोंका फल पाता है ॥
प्रथमं वर्जयेद् दोषान् युगपत् पृथगेव वा ।
तथा धर्ममवाप्नोति दोषत्यागो हि दुष्करः ॥
पहले सब दोषोंको एक साथ या बारी- बारीसे त्याग देना चाहिये । ऐसा करनेसे मनुष्यको धर्माचरणका फल प्राप्त होता है; क्योंकि दोषोंका परित्याग करना बहुत ही कठिन है ॥ दोषसाकल्यसंत्यागान्मुनिर्भवति मानवः ॥
सौकर्यं पश्य धर्मस्य कार्यारम्भादृतेऽपि च ।
आत्मोपलब्धोपरमाल्लभन्ते सुकृतं परम् ॥
समस्त दोषोंका त्याग कर देनेसे मनुष्य मुनि हो जाता है । देखो, धर्म करनेमें कितनी सुविधा या सुगमता है कि कोई कार्य किये बिना ही अपनेको प्राप्त हुए दोषोंका त्याग कर देनेमात्रसे मनुष्य परम पुण्य प्राप्त कर लेते हैं ॥
अहो नृशंसाः पच्यन्ते मानुषाः स्वल्पबुद्धयः ।
ये तादृशं न बुध्यन्ते आत्माधीनं च निर्वृताः ॥
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दुष्कृतत्यागमात्रेण पदमूर्ध्वं हि लभ्यते ॥ अहो! अल्पबुद्धि मानव कैसे क्रूर हैं कि पाप कर्म करके अपने -आपको नरककी आगमें पकाते हैं । वे संतोषपूर्वक यह नहीं समझ पाते कि वैसा पुण्यकर्म सर्वथा अपने अधीन है । दुष्कर्मोंका त्याग करनेमात्रसे ऊर्ध्वपद ( स्वर्गलोक) की प्राप्ति होती है ॥
पापभीरुत्वमात्रेण दोषाणां परिवर्जनात् ।
सुशोभनो भवेद् देवि ऋजुर्धर्मव्यपेक्षया ॥
देवि! पापसे डरने, दोषोंको त्यागने और निष्कपट धर्मकी अपेक्षा रखनेसे मनुष्य उत्तम परिणामका भागी होता है ॥
श्रुत्वा च बुद्धसंयोगादिन्द्रियाणां च निग्रहात् ।
संतोषाच्च धृतेश्चैव शक्यते दोषवर्जनम् ॥
ज्ञानी पुरुषोंके सम्पर्कसे धर्मोपदेश सुनकर इन्द्रियोंका निग्रह करने तथा संतोष और धैर्य धारण करनेसे दोषोंका परित्याग किया जा सकता है ॥
तदेव धर्ममित्याहुर्दोषसंयमनं प्रिये ।
यमधर्मेण धर्मोऽस्ति नान्यः शुभतरः प्रिये ॥
प्रिये! दोष - संयमको धर्म कहा गया है । संयमरूप धर्मका पालन करनेसे जो धर्म होता है, वही सबसे अधिक कल्याणकारी है, दूसरा नहीं ॥ यमधर्मेण यतयः प्राप्नुवन्त्युत्तमां गतिम् ॥
ईश्वराणां प्रभवतां दरिद्राणां च वै नृणाम् ।
सफलो दोषसंत्यागो दानादपि शुभादपि ॥
संयमधर्मके पालनसे यतिजन उत्तम गतिको पाते हैं । प्रभावशाली धनियोंके दान करनेसे और दरिद्र मनुष्योंके शुभकर्मोंके आचरणसे भी दोषोंका त्याग क्षणिक फल देनेवाला है ॥
तपो दानं महादेवि दोषमल्पं हि निर्हरेत् ।
सुकृतं यामिकं चोक्तं वक्ष्ये निरुपसाधनम् ॥
महादेवि! तप और दान अल्प दोषको हर लेते हैं । यहाँ संयमसम्बन्धी सुकृत बताया गया । अब सहायक साधनोंके बिना होनेवाले सुकृतका वर्णन करूँगा ॥
सुखाभिसंधिर्लोकानां सत्यं शौचमथार्जवम् ।
व्रतोपवासः प्रीतिश्च ब्रह्मचर्यं दमः शमः ॥
एवमादि शुभं कर्म सुकृतं नियमाश्रितम् ।
शृणु तेषां विशेषांश्च कीर्तयिष्यामि भामिनि ॥
जगत्के लोगोंके सुखी होनेकी कामना, सत्य, शौच, सरलता, व्रतसम्बन्धी उपवास, प्रीति, ब्रह्मचर्य, दम और शम- इत्यादि शुभ कर्म नियमोंपर अवलम्बित सुकृत है । भामिनि! अब उनके विशेष भेदोंका वर्णन करूँगा, सुनो ॥
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सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव ।
नास्ति सत्यात् परं दानं नास्ति सत्यात् परं तपः ॥
जैसे नौका या जहाज समुद्रसे पार होनेका साधन है, उसी प्रकार सत्य स्वर्गलोकमें पहुँचनेके लिये सीढ़ीका काम देता है। सत्यसे बढ़कर दान नहीं है और सत्यसे बढ़कर तप नहीं है ।
यथा श्रुतं यथा दृष्टमात्मना यद् यथा कृतम् ।
तथा तस्याविकारेण वचनं सत्यलक्षणम् ॥
जो जैसा सुना गया हो, जैसा देखा गया हो और अपने द्वारा जैसा किया गया हो, उसको बिना किसी परिवर्तनके वाणीद्वारा प्रकट करना सत्यका लक्षण है ॥
यच्छलेनाभिसंयुक्तं सत्यरूपं मृषैव तत् ।
सत्यमेव प्रवक्तव्यं पारावर्यं विजानता ॥
जो सत्य छलसे युक्त हो, वह मिथ्या ही है । अतः सत्यासत्यके भले - बुरे परिणामको जाननेवाले पुरुषको चाहिये कि वह सदा सत्य ही बोले ॥
दीर्घायुश्च भवेत् सत्यात् कुलसंतानपालकः ।
लोकसंस्थितिपालश्च भवेत् सत्येन मानवः ॥
सत्यके पालनसे मनुष्य दीर्घायु होता है । सत्यसे कुल परम्पराका पालक होता है और सत्यका आश्रय लेनेसे वह लोक मर्यादाका संरक्षक होता है ॥ उमोवाच कथं संधारयन् मर्त्यो व्रतं शुभमवाप्नुयात् ॥ उमाने पूछा — भगवन्! मनुष्य किस प्रकार व्रत धारण करके शुभ फलको पाता है? ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
पूर्वमुक्तं तु यत् पापं मनोवाक्कायकर्मभिः ।
व्रतवत् तस्य संत्यागस्तपोव्रतमिति स्मृतम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! पहले जो मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा होनेवाले पापोंका वर्णन किया गया है, व्रतकी भाँति उनके त्यागका नियम लेना तपोव्रत कहा गया है ॥
शुद्धकायो नरो भूत्वा स्नात्वा तीर्थे यथाविधि ।
पञ्चभूतानि चन्द्रार्कौ संध्ये धर्मयमौ पितॄन् ॥
आत्मनैव तथाऽऽत्मानं निवेद्य व्रतवच्चरेत् । मनुष्य तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके शुद्धशरीर हो स्वयं ही अपने आपको पंच महाभूत, चन्द्रमा, सूर्य, दोनों कालकी संध्या, धर्म, यम तथा पितरोंकी सेवामें निवेदन करके व्रत लेकर धर्माचरण करे ॥
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व्रतमामरणाद् वापि कालच्छेदेन वा हरेत् ॥
शाकादिषु व्रतं कुर्यात् तथा पुष्पफलादिषु ।
ब्रह्मचर्यव्रतं कुर्यादुपवासव्रतं तथा ॥
अपने व्रतको मृत्युपर्यन्त निभावे अथवा समयकी सीमा बाँधकर उतने समयतक उसका निर्वाह करे । शाक आदि तथा फल- फूल आदिका आहार करके व्रत करे । उस समय ब्रह्मचर्यका पालन तथा उपवास भी करना चाहिये ॥ एवमन्येषु बहुषु व्रतं कार्यं हितैषिणा व्रतभङ्गो यथा न स्याद् रक्षितव्यं तथा बुधैः ॥ अपना हित चाहनेवाले पुरुषको दुग्ध आदि अन्य बहुत - सी वस्तुओंमेंसे किसी एकका उपयोग करके व्रतका पालन करना चाहिये । विद्वानोंको उचित है कि वे अपने व्रतको भंग न होने दें । सब प्रकारसे उसकी रक्षा करें ॥ व्रतभङ्गे महत् पापमिति विद्धि शुभेक्षणे ॥
औषधार्थं यदज्ञानाद् गुरूणां वचनादपि ।
अनुग्रहार्थं बन्धूनां व्रतभङ्गो न दुष्यते ॥
शुभेक्षणे! तुम यह जान लो कि व्रत भंग करनेसे महान् पाप होता है, परंतु ओषधिके लिये, अनजानमें, गुरुजनोंकी आज्ञासे तथा बन्धुजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये यदि व्रतभंग हो जाय तो वह दूषित नहीं होता ॥
व्रतापवर्गकाले तु दैवब्राह्मणपूजनम् ।
नरेण तु यथावद्धि कार्यसिद्धिं यथाप्नुयात् ॥
व्रतकी समाप्तिके समय मनुष्यको देवताओं और ब्राह्मणोंकी यथावत् पूजा करनी चाहिये । इससे उसे अपने कार्यमें सफलता प्राप्त होती है ॥ उमोवाच कथं शौचविधिस्तत्र तन्मे शंसितुमर्हसि । उमाने पूछा— भगवन्! व्रत ग्रहण करनेके समय शौचाचारका विधान कैसा है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
बाह्यमाभ्यन्तरं चेति द्विविधं शौचमिष्यते ।
मानसं सुकृतं यत् तच्छौचमाभ्यन्तरं स्मृतम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! शौच दो प्रकारका माना गया है –एक बाह्य शौच, दूसरा आभ्यन्तर शौच । जिसे पहले मानसिक सुकृत बताया गया है, उसीको यहाँ आभ्यन्तर शौच कहा गया है ॥ सदाऽऽहारविशुद्धिश्च कायप्रक्षालनं तु यत् ।