06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1381–1390

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1381–1390

पृष्ठ 1381

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पक्वाशयस्त्वधो नाभेरूर्ध्वमामाशयस्तथा ।

नाभिर्मध्ये शरीरस्य सर्वप्राणाश्च संश्रिताः ॥

स्थिताः प्राणादयः सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधश्चराः ।

वहन्त्यन्नरसान् नाड्यो दशप्राणाग्निचोदिताः ॥

योगिनामेष मार्गस्तु पञ्चस्वेतेषु तिष्ठति ।

जितश्रमः समासीनो मूर्धन्यात्मानमादधेत् ॥

नाभिके नीचे पक्वाशय और ऊपर आमाशय है । शरीरके ठीक मध्यभागमें नाभि है और समस्त प्राण उसीका आश्रय लेकर स्थित हैं । समस्त प्राण आदि ऊपर- नीचे तथा अगल-बगलमें विचरनेवाले हैं । दस प्राणोंसे तथा अग्निसे प्रेरित हो नाड़ियाँ अन्नरसका वहन करती हैं । यह योगियोंका मार्ग है, जो पाँचों प्राणोंमें स्थित है । साधकको चाहिये कि श्रमको जीतकर आसनपर आसीन हो आत्माको ब्रह्मरन्ध्रमें स्थापित करे ॥

मूर्धन्यात्मानमाधाय भ्रुवोर्मध्ये मनस्तथा ।

संनिरुध्य ततः प्राणानात्मानं चिन्तयेत् परम् ॥

प्राणे त्वपानं युञ्जीत प्राणांश्चापानकर्मणि ।

प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरो भवेत् ॥

मूर्धामें आत्माको स्थापित करके दोनों भौंहोंके बीचमें मनका अवरोध करे । तत्पश्चात् प्राणको भलीभाँति रोककर परमात्माका चिन्तन करे । प्राणमें अपानका और अपान कर्ममें प्राणोंका योग करे । फिर प्राण और अपानकी गतिको अवरुद्ध करके प्राणायाममें तत्पर हो जाय ॥

एवमन्तः प्रयुञ्जीत पञ्च प्राणान् परस्परम् ।

विजने सम्मिताहारो मुनिस्तूष्णीं निरुच्छ्वसन् ॥

अश्रान्तश्चिन्तयेद् योगी उत्थाय च पुनः पुनः ।

तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् वापि युञ्जीतैवमतन्द्रितः ॥

इस प्रकार एकान्त प्रदेशमें बैठकर मिताहारी मुनि अपने अन्तःकरणमें पाँचों प्राणोंका परस्पर योग करे और चुपचाप उच्छ्वासरहित हो बिना किसी थकावटके ध्यानमग्न रहे । योगी पुरुष बारंबार उठकर भी चलते, सोते या ठहरते हुए भी आलस्य छोड़कर योगाभ्यासमें ही लगा रहे ॥

एवं नियुञ्जतस्तस्य योगिनो युक्तचेतसः ।

प्रसीदति मनः क्षिप्रं प्रसन्ने दृश्यते परम् ॥

विधूम इव दीप्तोऽग्निरादित्य इव रश्मिमान् ।

वैद्युतोऽग्निरिवाकाशे पुरुषो दृश्यतेऽव्ययः ॥

इस प्रकार जिसका चित्त ध्यानमें लगा हुआ है, ऐसे योगाभ्यासपरायण योगीका मन शीघ्र ही प्रसन्न हो जाता है और मनके प्रसन्न होनेपर परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार हो जाता

पृष्ठ 1382

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है । उस समय अविनाशी पुरुष परमात्मा धूमरहित प्रकाशित अग्नि, अंशुमाली सूर्य और आकाशमें चमकने वाली बिजलीके समान दिखायी देता है ॥

दृष्ट्वा तदा मनो ज्योतिरैश्वर्याष्टगुणैर्युतः ।

प्राप्नोति परमं स्थानं स्मृहणीयं सुरैरपि ॥

उस अवस्थामें मनके द्वारा ज्योतिर्मय परमेश्वरका दर्शन करके योगी अणिमा आदि आठ ऐश्वर्योंसे युक्त हो देवताओंके लिये भी स्पृहणीय परमपदको प्राप्त कर लेता है ॥

इमान् योगस्य दोषांश्च दशैव परिचक्षते ।

दोषैर्विघ्नो वरारोहे योगिनां कविभिः स्मृतः ॥

वरारोहे! विद्वानोंने दोषोंसे योगियोंके मार्गमें विघ्नकी प्राप्ति बतायी है । वे योगके निम्नांकित दस ही दोष बताते हैं ॥

कामः क्रोधो भयं स्वप्नः स्नेहमत्यशनं तथा ।

वैचित्त्यं व्याधिरालस्यं लोभश्च दशमः स्मृतः ॥

काम, क्रोध, भय, स्वप्न, स्नेह, अधिक भोजन, वैचित्त्य ( मानिसक विकलता ), व्याधि,

आलस्य और लोभ—ये ही उन दोषोंके नाम हैं । इनमें लोभ दसवाँ दोष है ॥

एतैस्तेषां भवेद् विघ्नो दशभिर्देवकारितैः ।

तस्मादेतानपास्यादौ युञ्जीत च परं मनः ॥

इमानपि गुणानष्टौ योगस्य परिचक्षते ।

गुणैस्तैरष्टभिर्दिव्यमैश्वर्यमधिगम्यते ॥

देवताओंद्वारा पैदा किये गये इन दस दोषोंसे योगियोंको विघ्न होता है; अतः पहले इन दस दोषोंको हटाकर मनको परमात्मामें लगावे । योगके निम्नांकित आठ गुण बताये जाते हैं, जिनसे युक्त दिव्य ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है ॥

अणिमा महिमा चैव प्राप्तिः प्राकाम्यमेव हि ।

ईशित्वं च वशित्वं च यत्र कामावसायिता ॥

एतानष्टौ गुणान् प्राप्य कथंचिद् योगिनां वराः ।

ईशाः सर्वस्य लोकस्य देवानप्यतिशेरते ॥

योगोऽस्ति नैवात्यशिनो न चैकान्तमनश्नतः ।

न चातिस्वप्नशीलस्य नातिजागरतस्तथा ॥

अणिमा, महिमा और गरिमा, लघिमा तथा प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व, जिसमें इच्छाओंकी पूर्ति होती है । योगियोंमें श्रेष्ठ पुरुष किसी तरह इन आठ गुणोंको पाकर सम्पूर्ण जगत्पर शासन करनेमें समर्थ हो देवताओंसे भी बढ़ जाते हैं । जो अधिक खानेवाला अथवा सर्वथा न खानेवाला है, अधिक सोनेवाला अथवा सर्वथा जागनेवाला है, उसका योग सिद्ध नहीं होता ॥ युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।

पृष्ठ 1383

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युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

अनेनैव विधानेन सायुज्यं तत् प्रकल्प्यते ।

सायुज्यं देवसात् कृत्वा प्रयुञ्जीतात्मभक्तितः ॥

अनन्यमनसा देवि नित्यं तद्गतचेतसा ।

सायुज्यं प्राप्यते देवैर्यत्नेन महता चिरात् ॥

हविर्भिरर्चनैर्होमैः प्रणामैर्नित्यचिन्तया ।

अर्चयित्वा यथाशक्ति स्वकं देवं विशन्ति ते ॥

दुःखोंका नाश करनेवाला यह योग उसी पुरुषका सिद्ध होता है, जो यथायोग्य आहार-विहार करनेवाला है, कर्मोंमें उपयुक्त चेष्टा करता है तथा उचित मात्रामें सोता और जागता है । इसी विधानसे देवसायुज्य प्राप्त होता है । अपनी भक्तिसे देवताओंका सायुज्य प्राप्त करके योगसाधनामें तत्पर रहे । देवि! प्रतिदिन एकाग्र और अनन्य चित्त हो चिरकालतक महान् यत्न करनेसे देवताओंके साथ सायुज्य प्राप्त होता है । योगीजन हविष्य, पूजा, हवन, प्रणाम तथा नित्य चिन्तनके द्वारा यथाशक्ति आराधना करके अपने इष्टदेवके स्वरूपमें प्रवेश कर जाते हैं ॥ सायुज्यानां विशिष्टं च मामकं वैष्णवं तथा । मां प्राप्य न निवर्तन्ते विष्णुं वा शुभलोचने ।

इति ते कथितो देवि योगधर्मः सनातनः ।

न शक्यं प्रष्टुमन्यैर्यो योगधर्मस्त्वया विना ॥

शुभलोचने! सायुज्योंमें मेरा तथा श्रीविष्णुका सायुज्य श्रेष्ठ हैं । मुझे या भगवान् विष्णुको प्राप्त करके मनुष्य पुनः संसारमें नहीं लौटते हैं । देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे सनातन योग- धर्मका वर्णन किया है । तुम्हारे सिवा दूसरा कोई इस योगधर्मके विषयमें प्रश्न नहीं कर सकता था ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )

पृष्ठ 1384

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[ पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग[-पूजनका- प माहात्म्य] उमोवाच

त्रियक्ष त्रिदशश्रेष्ठ त्र्यम्बक त्रिदशाधिप ।

त्रिपुरान्तक कामाङ्गहर त्रिपथगाधर ॥

दक्षयज्ञप्रमथन शूलपाणेऽरिसूदन ।

नमस्ते लोकपालेश लोकपालवरप्रद ॥

उमाने पूछा- तीन नेत्रधारी! त्रिदशश्रेष्ठ! देवेश्वर! त्र्यम्बक! त्रिपुरोंका विनाश और कामदेवके शरीरको भस्म करनेवाले गंगाधर! दक्षयज्ञका नाश करनेवाले त्रिशूलधारी! शत्रुसूदन! लोकपालोंको भी वर देनेवाले लोकपालेश्वर! आपको नमस्कार है ॥

नैकशाखमपर्यन्तमध्यात्मज्ञानमुत्तमम् ।

अप्रतर्क्यमविज्ञेयं सांख्ययोगसमन्वितम् ॥

भवता परिपृष्टेन शृण्वन्त्या मम भाषितम् ।

इदानीं श्रोतुमिच्छामि सायुज्यं त्वद्गतं विभो ॥

कथं परिचरन्त्येते भक्तास्त्वां परमेष्ठिनम् ।

आचारः कीदृशस्तेषां केन तुष्टो भवेद् भवान् ॥

वर्ण्यमानं त्वया साक्षात् प्रीणयत्यधिकं हि माम् ॥

आपने मेरे पूछनेपर सुननेके लिये उत्सुक हुई मुझ दासीको वह उत्तम अध्यात्मज्ञान बताया है, जो अनेक शाखाओंसे युक्त, अनन्त, अतर्क्य, अविज्ञेय और सांख्ययोगसे युक्त है । प्रभो! इस समय मैं आपसे आपका ही सायुज्य सुनना चाहती हूँ। ये भक्तजन आप परमेष्ठीकी परिचर्या कैसे करते हैं? उनका आचार कैसा होता है? किस साधनसे आप संतुष्ट होते हैं? साक्षात् आपके द्वारा प्रतिपादित होनेपर यह विषय मुझे अधिक प्रसन्नता प्रदान करता है ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि मम सायुज्यमद्भुतम् ।

येन ते न निवर्तन्ते युक्ताः परमयोगिनः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे अपने अद्भुत सायुज्यका वर्णन करता हूँ, जिससे युक्त हो वे परम योगी पुरुष फिर संसारमें नहीं लौटते हैं ॥

अव्यक्तोऽहमचिन्त्योऽहं पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।

सांख्ययोगौ मया सृष्टौ सर्वं चापि चराचरम् ॥

पहलेके मुमुक्षुओंद्वारा भी मैं अव्यक्त और अचिन्त्य ही रहा हूँ । मैंने ही सांख्य और योगकी सृष्टि की है । समस्त चराचर जगत्को भी मैंने ही उत्पन्न किया है ॥ अर्चनीयोऽहमीशोऽहमव्ययोऽहं सनातनः ।

पृष्ठ 1385

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अहं प्रसन्नो भक्तानां ददाम्यमरतामपि ॥ मैं पूजनीय ईश्वर हूँ । मैं ही अविनाशी सनातन पुरुष हूँ । मैं प्रसन्न होकर अपने भक्तोंको अमरत्व भी देता हूँ ॥

न मां विदुः सुरगणा मुनयश्च तपोधनाः ।

त्वत्प्रियार्थमहं देवि मद्विभूतिं ब्रवीमि ते ॥

आश्रमेभ्यश्चतुर्भ्योऽहं चतुरो ब्राह्मणान् शुभे ।

मद्भक्तान् निर्मलान् पुण्यान् समानीय तपस्विनः ॥

व्याचख्येऽहं तथा देवि योगं पाशुपतं महत् ॥

देवता तथा तपोधन मुनि भी मुझे अच्छी तरह नहीं जानते हैं । देवि! तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैं अपनी विभूति बतलाता हूँ । शुभे! देवि! मैंने चारों आश्रमोंसे चार पुण्यात्मा तपस्वी ब्राह्मणोंको, जो मेरे भक्त और निर्मलचित्त थे, लाकर उनके समक्ष महान् पाशुपत योगकी व्याख्या की थी ।

गृहीतं तच्च तैः सर्वं मुखाच्च मम दक्षिणात् ।

श्रुत्वा तत् त्रिषु लोकेषु स्थापितं चापि तैः पुनः ॥

इदानीं च त्वया पृष्टो वदाम्येकमनाः शृणु ॥

अहं पशुपतिर्नाम मद्भक्ता ये च मानवाः ।

सर्वे पाशुपता ज्ञेया भस्मदिग्धतनूरुहाः ॥

मेरे दक्षिणवर्ती मुखसे वह सब उपदेश सुनकर उन्होंने ग्रहण किया और पुनः उसकी तीनों लोकोंमें स्थापना की । इस समय तुम्हारे पूछनेपर मैं उसी पाशुपत योगका वर्णन करता हूँ, एकचित्त होकर सुनो । मेरा ही नाम पशुपति है। अपने रोम- रोममें भस्म रमाये रहनेवाले जो मेरे भक्त मनुष्य हैं, उन्हें पाशुपत जानना चाहिये ॥

रक्षार्थं मङ्गलार्थं च पवित्रार्थं च भामिनि ।

लिङ्गार्थं चैव भक्तानां भस्म दत्तं मया पुरा ॥

तेन संदिग्धसर्वाङ्गा भस्मना ब्रह्मचारिणः ।

जटिला मुण्डिता वापि नानाकारशिखण्डिनः ॥

विकृताः पिङ्गलाभाश्च नग्ना नानाप्रकारिणः ।

भैक्षं चरन्तः सर्वत्र निःस्पृहा निष्परिग्रहाः ॥

मृत्पात्रहस्ता मद्भक्ता मन्निवेशितबुद्धयः ।

चरन्तो निखिलं लोकं मम हर्षविवर्धनाः ॥

भामिनि! पूर्वकालमें मैंने रक्षाके लिये, मंगलके लिये, पवित्रताके लिये और पहचानके लिये भी अपने भक्तोंको भस्म प्रदान किया था । उस भस्मसे सम्पूर्ण अंगोंको लिप्त करके ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले जटाधारी, मुण्डित अथवा नाना प्रकारकी शिखा धारण करनेवाले, विकृत वेश, पिंगलवर्ण, नग्न देह और नाना वेश धारण किये मेरे निःस्पृह और

पृष्ठ 1386

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 1386 का मूल पृष्ठ
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परिग्रहशून्य भक्त मुझमें ही मन- बुद्धि लगाये, मिट्टीका पात्र हाथमें लिये सब ओर भिक्षाके लिये विचरते रहते हैं । समस्त लोकमें विचरते हुए वे भक्तजन मेरे हर्षकी वृद्धि करते हैं ॥

मम पाशुपतं दिव्यं योगशास्त्रमनुत्तमम् ।

सूक्ष्मं सर्वेषु लोकेषु विमृशन्तश्चरन्ति ते ॥

सभी लोकोंमें मेरे परम उत्तम सूक्ष्म एवं दिव्य पाशुपत योगशास्त्रका विचार करते हुए वे विचरण करते हैं ॥

एवं नित्याभियुक्तानां मद्भक्तानां तपस्विनाम् ।

उपायं चिन्तयाम्याशु येन मामुपयान्ति ते ॥

इस तरह नित्य मेरे ही चिन्तनमें संलग्न रहनेवाले अपने तपस्वी भक्तोंके लिये मैं ऐसा उपाय सोचता रहता हूँ, जिससे वे शीघ्र मुझे प्राप्त हो जाते हैं ॥

स्थापितं त्रिषु लोकेषु शिवलिङ्गं मया मम ।

नमस्कारेण वा तस्य मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ॥

इष्टं दत्तमधीतं च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः ।

शिवलिङ्गप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥

तीनों लोकोंमें मैंने अपने स्वरूपभूत शिवलिंगोंकी स्थापना की है, जिनको नमस्कारमात्र करके मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं । होम, दान, अध्ययन और बहुत - सी दक्षिणावाले यज्ञ भी शिवलिंगको प्रणाम करनेसे मिले हुए पुण्यकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते ॥

अर्चया शिवलिङ्गस्य परितुष्याम्यहं प्रिये ।

शिवलिङ्गार्चनायां तु विधानमपि मे शृणु ॥

प्रिये! शिवलिंगकी पूजासे मैं बहुत संतुष्ट होता हूँ। तुम शिवलिंग पूजनका विधान मुझसे सुनो ॥

गोक्षीरनवनीताभ्यामर्चयेद् यः शिवं मम ।

इष्टस्य हयमेधस्य यत् फलं तत् फलं भवेत् ॥

घृतमण्डेन यो नित्यमर्चयेद् यः शिवं मम ।

स फलं प्राप्नुयान्मर्त्यो ब्राह्मणस्याग्निहोत्रिणः ॥

केवलेनापि तोयेन स्नापयेद् यः शिवं मम ।

स चापि लभते पुण्यं प्रियं च लभते नरः ॥

जो गोदुग्ध और माखनसे मेरे शिवलिंगकी पूजा करता है, उसे वही फल प्राप्त होता है जो कि अश्वमेध यज्ञ करनेसे मिलता है । जो प्रतिदिन घृतमण्डसे मेरे शिवलिंगका पूजन करता है, वह मनुष्य प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मणके समान पुण्यफलका भागी होता है । जो केवल जलसे भी मेरे शिवलिंगको नहलाता है, वह भी पुण्यका भागी होता और अभीष्ट फल पा लेता है ॥

पृष्ठ 1387

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सघृतं गुग्गुलं सम्यग् धूपयेद् यः शिवान्तिके ।

गोसवस्य तु यज्ञस्य यत् फलं तस्य तद् भवेत् ॥

यस्तु गुग्गुलपिण्डेन केवलेनापि धूपयेत् ।

तस्य रुक्मप्रदानस्य यत् फलं तस्य तद् भवेत् ॥

यस्तु नानाविधैः पुष्पैर्मम लिङ्गं समर्चयेत् ।

स हि धेनुसहस्रस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात् ॥

यस्तु देशान्तरं गत्वा शिवलिङ्गं समर्चयेत् ।

तस्मात् सर्वमनुष्येषु नास्ति मे प्रियकृत्तमः ॥

जो शिवलिंगके निकट घृतमिश्रित गुग्गुलका उत्तम धूप निवेदन करता है, उसे गोसव नामक यज्ञका फल प्राप्त होता है। जो केवल गुग्गुलके पिण्डसे धूप देता है, उसे सुवर्णदानका फल मिलता है । जो नाना प्रकारके फूलोंसे मेरे लिंगकी पूजा करता है, उसे सहस्र धेनुदानका फल प्राप्त होता है । जो देशान्तरमें जाकर शिवलिंगकी पूजा करता है, उससे बढ़कर समस्त मनुष्योंमें मेरा प्रिय करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ॥

एवं नानाविधैर्द्रव्यैः शिवलिङ्गं समर्चयेत् ।

मत्समानो मनुष्येषु न पुनर्जायते नरः ॥

अर्चनाभिर्नमस्कारैरुपहारैः स्तवैरपि ।

भक्तो मामर्चयेन्नित्यं शिवलिङ्गेष्वतन्द्रितः ॥

पलाशबिल्वपत्राणि राजवृक्षस्रजस्तथा ।

अर्कपुष्पाणि मेध्यानि मत्प्रियाणि विशेषतः ॥

इस प्रकार भाँति - भाँतिके द्रव्योंद्वारा जो शिवलिंगकी पूजा करता है, वह मनुष्योंमें मेरे समान है । वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता है । अतः भक्त पुरुष अर्चनाओं, नमस्कारों, उपहारों और स्तोत्रोंद्वारा प्रतिदिन आलस्य छोड़कर शिवलिंगोंके रूपमें मेरी पूजा करे । पलाश और बेलके पत्ते, राजवृक्षके फूलोंकी मालाएँ तथा आकके पवित्र फूल मुझे विशेष प्रिय हैं ॥ फलं वा यदि वा शाकं पुष्पं वा यदि वा जलम् । दत्तं सम्प्रीणयेद् देवि भक्तैर्मद्गतमानसैः ।

ममापि परितुष्टस्य नास्ति लोकेषु दुर्लभम् ।

तस्मात् ते सततं भक्ता मामेवाभ्यर्चयन्त्युत ॥

देवि! मुझमें मन लगाये रहनेवाले मेरे भक्तोंका दिया हुआ फल, फूल, साग अथवा जल भी मुझे विशेष प्रिय लगता है । मेरे संतुष्ट हो जानेपर लोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है; इसलिये भक्तजन सदा मेरी ही पूजा किया करते हैं ॥

मद्भक्ता न विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः ।

मद्भक्ताः सर्वलोकेषु पूजनीया विशेषतः ॥

पृष्ठ 1388

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मद्द्द्वेषिणश्च ये मर्त्या मद्भक्तद्वेषिणोऽपि वा ।

यान्ति ते नरकं घोरमिष्ट्वा क्रतुशतैरपि ॥

मेरे भक्त कभी नष्ट नहीं होते । उनके सारे पाप दूर हो जाते हैं तथा मेरे भक्त तीनों लोकोंमें विशेषरूपसे पूजनीय हैं । जो मनुष्य मुझसे या मेरे भक्तोंसे द्वेष करते हैं, वे सौ यज्ञोंका अनुष्ठान कर लें तो भी घोर नरकमें पड़ते हैं ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं योगं पाशुपतं महत् ।

मद्भक्तैर्मनुजैर्देवि श्राव्यमेतद् दिने दिने ॥

शृणुयाद् यः पठेद् वापि ममेदं धर्मनिश्चयम् ।

स्वर्गं कीर्तिं धनं धान्यं लभते स नरोत्तमः ॥

देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे महान् पाशुपत योगकी व्याख्या की है । मुझमें भक्ति रखनेवाले मनुष्योंको प्रतिदिन इसका श्रवण करना चाहिये । जो श्रेष्ठ मानव मेरे इस धर्मनिश्चयका श्रवण अथवा पाठ करता है, वह इस लोकमें धनधान्य और कीर्ति तथा परलोकमें स्वर्ग पाता है ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त ) इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १४५ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२० ९ श्लोक मिलाकर कुल १२७३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1389

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षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः पार्वतीजीके द्वारा स्त्री - धर्मका वर्णन नारद उवाच

एवमुक्त्वा महादेवः श्रोतुकामः स्वयं प्रभुः ।

अनुकूलां प्रियां भार्यां पार्श्वस्थां समभाषत ॥ १ ॥

नारदजी कहते हैं- ऐसा कहकर महादेवजी स्वयं भी पार्वतीजीके मुँहसे कुछ सुननेकी इच्छा करने लगे । अतएव स्वयं भगवान् शिवने पास ही बैठी हुई अपनी प्रिय एवं अनुकूल भार्या पार्वतीसे कहा ॥ १ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

परावरज्ञे धर्मज्ञे तपोवननिवासिनि ।

साध्वि सुभ्रु सुकेशान्ते हिमवत्पर्वतात्मजे ॥ २ ॥

दक्षे शमदमोपेते निर्ममे धर्मचारिणि ।

पृच्छामि त्वां वरारोहे पृष्टा वद ममेप्सितम् ॥ ३ ॥

श्रीमहेश्वर बोले – तपोवनमें निवास करनेवाली देवि! तुम भूत और भविष्यको जाननेवाली, धर्मके तत्त्वको समझनेवाली और स्वयं भी धर्मका आचरण करनेवाली हो । सुन्दर केशों और भौंहोंवाली सती-साध्वी हिमवान् कुमारी! तुम कार्यकुशल हो, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रहसे भी सम्पन्न हो । तुममें अहंता और ममताका सर्वथा अभाव है; अतः वरारोहे! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ । मेरे पूछनेपर तुम मुझे मेरे अभीष्ट विषयको बताओ ॥ सावित्री ब्रह्मणःसाध्वी कौशिकस्य शची सती । ( लक्ष्मीर्विष्णोः प्रिया भार्या धृतिर्भार्या यमस्य तु) मार्कण्डेयस्य धूमोर्णा ऋद्धिर्वैश्रवणस्य च ॥ ४ ॥

वरुणस्य तथा गौरी सूर्यस्य च सुवर्चला ।

रोहिणी शशिनः साध्वी स्वाहा चैव विभावसोः ॥ ५ ॥

अदितिः कश्यपस्याथ सर्वास्ताः पतिदेवताः ।

पृष्टाश्चोपासिताश्चैव तास्त्वया देवि नित्यशः ॥ ६ ॥

ब्रह्माजीकी पत्नी सावित्री साध्वी हैं । इन्द्रपत्नी शची भी सती हैं । विष्णुकी प्यारी पत्नी लक्ष्मी पतिव्रता हैं । इसी प्रकार यमकी भार्या धृति, मार्कण्डेयकी पत्नी धूमोर्णा, कुबेरकी स्त्री ऋद्धि, वरुणकी भार्या गौरी, सूर्यकी पत्नी सुवर्चला, चन्द्रमाकी साध्वी स्त्री रोहिणी,

पृष्ठ 1390

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- सबअग्निकी भार्या स्वाहा और कश्यपकी पत्नी अदिति- ये सब -की- पतिव्रता देवियाँ हैं । देवि! तुमने इन सबका सदा संग किया है और इन सबसे धर्मकी बात पूछी है ॥ ४–६ ॥

तेन त्वां परिपृच्छामि धर्मज्ञे धर्मवादिनि ।

स्त्रीधर्म श्रोतुमिच्छामि त्वयोदाहृतमादितः ॥ ७ ॥

अतः धर्मवादिनि धर्मज्ञे! मैं तुमसे स्त्रीधर्मके विषयमें प्रश्न करता हूँ और तुम्हारे मुखसे वर्णित नारीधर्म आद्योपान्त सुनना चाहता हूँ ॥ ७ ॥

सधर्मचारिणी मे त्वं समशीला समव्रता ।

समानसारवीर्या च तपस्तीव्रं कृतं च ते ॥ ८ ॥

तुम मेरी सहधर्मिणी हो । तुम्हारा शील- स्वभाव तथा व्रत मेरे समान ही है । तुम्हारी

सारभूत शक्ति भी मुझसे कम नहीं है । तुमने तीव्र तपस्या भी की है ॥ ८ ॥

त्वया ह्युक्तो विशेषेण गुणवान् स भविष्यति ।

लोके चैव त्वया देवि प्रमाणत्वमुपैष्यति ॥ ९ ॥

अतः देवि! तुम्हारे द्वारा कहा गया स्त्रीधर्म विशेष गुणवान् होगा और लोकमें प्रमाणभूत माना जायगा ॥ ९ ॥

स्त्रियश्चैव विशेषेण स्त्रीजनस्य गतिः परा ।

गौर्यां गच्छति सुश्रोणि लोकेष्वेषा गतिः सदा ॥ १० ॥

विशेषतः स्त्रियाँ ही स्त्रियोंकी परम गति हैं । सुश्रोणि! संसारमें भूतलपर यह बात सदासे प्रचलित है ॥

मम चार्धं शरीरस्य तव चार्धेन निर्मितम् ।

सुरकार्यकरी च त्वं लोकसंतानकारिणी ॥ ११ ॥

मेरा आधा शरीर तुम्हारे आधे शरीरसे निर्मित हुआ है । तुम देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाली तथा लोक- संततिका विस्तार करनेवाली हो ॥ ११ ॥

(प्रमदोक्तं तु यत् किंचित् तत् स्त्रीषु बहु मन्यते । न तथा मन्यते स्त्रीषु पुरुषोक्तमनिन्दिते ॥ ) अनिन्दिते! नारीकी कही हुई जो बात होती है, उसे ही स्त्रियोंमें अधिक महत्त्व दिया जाता है । पुरुषोंकी कही हुई बातको स्त्रियोंमें वैसा महत्त्व नहीं दिया जाता ॥

तव सर्वः सुविदितः स्त्रीधर्मः शाश्वतः शुभे ।

तस्मादशेषतो ब्रूहि स्वधर्मं विस्तरेण मे ॥ १२ ॥

शुभे! तुम्हें सम्पूर्ण सनातन स्त्रीधर्मका भलीभाँति ज्ञान है; अतः अपने धर्मका पूर्णरूपसे विस्तारपूर्वक मेरे आगे वर्णन करो ॥ १२ ॥

उमोवाच भगवन् सर्वभूतेश भूतभव्यभवोत्तम ।