06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1391–1400

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1391–1400

पृष्ठ 1391

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त्वत्प्रभावादियं देव वाक् चैव प्रतिभाति मे ॥ १३ ॥

इमास्तु नद्यो देवेश सर्वतीर्थोदकैर्युताः ।

उपस्पर्शनहेतोस्त्वामुपयान्ति समीपतः ॥ १४ ॥

एताभिः सह सम्मन्त्र्य प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।

प्रभवन् योऽनहंवादी स वै पुरुष उच्यते ॥ १५ ॥

उमाने कहा - भगवन्! सर्वभूतेश्वर! भूत, भविष्य और वर्तमानकालस्वरूप सर्वश्रेष्ठ महादेव! आपके प्रभावसे मेरी यह वाणी प्रतिभासम्पन्न हो रही है— अब मैं स्त्री - धर्मका वर्णन कर सकती हूँ । किंतु देवेश्वर! ये नदियाँ सम्पूर्ण तीर्थोंके जलसे सम्पन्न हो आपके स्नान और आचमन आदिके लिये अथवा आपके चरणोंका स्पर्श करनेके लिये यहाँ आपके निकट आ रही हैं । मैं इन सबके साथ सलाह करके क्रमशः स्त्रीधर्मका वर्णन करूँगी । जो व्यक्ति समर्थ होकर भी अहंकारशून्य हो, वही पुरुष कहलाता है ॥

स्त्री च भूतेश सततं स्त्रियमेवानुधावति ।

मया सम्मानिताश्चैव भविष्यन्ति सरिद्वराः ॥ १६ ॥

भूतनाथ! स्त्री सदा स्त्रीका ही अनुसरण करती है । मेरे ऐसा करनेसे ये श्रेष्ठ सरिताएँ मेरे द्वारा सम्मानित होंगी ॥

एषा सरस्वती पुण्या नदीनामुत्तमा नदी ।

प्रथमा सर्वसरितां नदी सागरगामिनी ॥ १७ ॥

विपाशा च वितस्ता च चन्द्रभागा इरावती ।

शतद्रूर्देविका सिन्धुः कौशिकी गौतमी तथा ॥ १८ ॥

( यमुना नर्मदां चैव कावेरीमथ निम्नगाम्) ये नदियोंमें उत्तम पुण्यसलिला सरस्वती विराजमान हैं, जो समुद्रमें मिली हुई हैं । ये समस्त सरिताओंमें प्रथम ( प्रधान ) मानी जाती हैं । इनके सिवा विपाशा ( व्यास ), वितस्ता ( झेलम ), चन्द्रभागा (चनाव ), इरावती ( रावी ), शतद्रू ( शतलज), देविका, सिन्धु, कौशिकी ( कोसी ), गौतमी ( गोदावरी ), यमुना, नर्मदा तथा कावेरी नदी भी यहाँ विद्यमान हैं ॥ १७-१८ ॥

तथा देवनदी चेयं सर्वतीर्थाभिसम्भृता ।

गगनाद् गां गता देवी गङ्गा सर्वसरिद्वरा ॥ १ ९ ॥

ये समस्त तीर्थोंसे सेवित तथा सम्पूर्ण सरिताओंमें श्रेष्ठ देवनदी गंगादेवी भी, जो आकाशसे पृथ्वीपर उतरी हैं, यहाँ विराजमान हैं ॥ १ ९ ॥

इत्युक्त्वा देवदेवस्य पत्नी धर्मभृतां वरा ।

स्मितपूर्वमथाभाष्य सर्वास्ताः सरितस्तथा ॥ २० ॥

अपृच्छद् देवमहिषी स्त्रीधर्मं धर्मवत्सला ।

स्त्रीधर्मकुशलास्ता वै गङ्गाद्याः सरितां वराः ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1392

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ऐसा कहकर देवाधिदेव महादेवजीकी पत्नी, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, धर्मवत्सला, देवमहिषी उमाने स्त्री - धर्मके ज्ञानमें निपुण गंगा आदि उन समस्त श्रेष्ठ सरिताओंको मन्द मुसकानके साथ सम्बोधित करके उनसे स्त्रीधर्मके विषयमें प्रश्न किया ॥ २०-२१ ॥ उमोवाच ( हे पुण्याः सरितः श्रेष्ठाः सर्वपापविनाशिकाः । ज्ञानविज्ञानसम्पन्नाः शृणुध्वं वचनं मम ॥ )

अयं भगवता प्रोक्ताः प्रश्नः स्त्रीधर्मसंश्रितः ।

तं तु सम्मन्त्र्य युष्माभिर्वक्तुमिच्छामि शंकरम् ॥ २२ ॥

उमा बोलीं- हे समस्त पापोंका विनाश करनेवाली, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न पुण्यसलिला श्रेष्ठ नदियो! मेरी बात सुनो । भगवान् शिवने यह स्त्रीधर्मसम्बन्धी प्रश्न उपस्थित किया है । उसके विषयमें मैं तुमलोगोंसे सलाह लेकर ही भगवान् शंकरसे कुछ कहना चाहती हूँ ॥ २२ ॥

न चैकसाध्यं पश्यामि विज्ञानं भुवि कस्यचित् ।

दिवि वा सागरगमास्तेन वो मानयाम्यहम् ॥ २३ ॥

समुद्रगामिनी सरिताओ! पृथ्वीपर या स्वर्गमें मैं किसीका भी ऐसा कोई विज्ञान नहीं देखती, जिसे उसने अकेले ही - दूसरोंका सहयोग लिये बिना ही सिद्ध कर लिया हो, इसीलिये मैं आपलोगोंसे सादर सलाह लेती हूँ ॥

एवं सर्वाः सरिच्छ्रेष्ठाः पृष्टाः पुण्यतमाः शिवाः ।

ततो देवनदी गङ्गा नियुक्ता प्रतिपूज्य च ॥ २४ ॥

इस प्रकार उमाने जब समस्त कल्याणस्वरूपा परम पुण्यमयी श्रेष्ठ सरिताओंके समक्ष यह प्रश्न उपस्थित किया, तब उन्होंने इसका उत्तर देनेके लिये देवनदी गंगाको सम्मानपूर्वक नियुक्त किया ॥ २४ ॥

बह्वीभिर्बुद्धिभिः स्फीता स्त्रीधर्मज्ञा शुचिस्मिता ।

शैलराजसुतां देवीं पुण्या पापभयापहा ॥ २५ ॥

बुद्ध्या विनयसम्पन्ना सर्वधर्मविशारदा ।

सस्मितं बहुबुद्धयाढ्या गङ्गा वचनमब्रवीत् ॥ २६ ॥

पवित्र मुसकानवाली गंगाजी अनेक बुद्धियोंसे बढ़ी चढ़ी, स्त्री धर्मको जाननेवाली, पाप- भयको दूर करनेवाली, पुण्यमयी, बुद्धि और विनयसे सम्पन्न, सर्वधर्मविशारद तथा प्रचुर बुद्धिसे संयुक्त थीं । उन्होंने गिरिराजकुमारी उमादेवीसे मन्द मन्द मुसकराते हुए कहा ॥ २५-२६ ॥ गङ्गोवाच धन्यास्म्यनुगृहीतास्मि देवि धर्मपरायणे ।

पृष्ठ 1393

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या त्वं सर्वजगन्मान्या नदीं मानयसेऽनघे ॥ २७ ॥

गंगाजीने कहा -देवि! धर्मपरायणे! अनघे! मैं धन्य हूँ । मुझपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह है; क्योंकि आप सम्पूर्ण जगत्की सम्माननीया होनेपर भी एक तुच्छ नदीको मान्यता प्रदान कर रही हैं ॥ २७ ॥

प्रभवन् पृच्छते यो हि सम्मानयति वा पुनः ।

नूनं जनमदुष्टात्मा पण्डिताख्यां स गच्छति ॥ २८ ॥

जो सब प्रकारसे समर्थ होकर भी दूसरोंसे पूछता तथा उन्हें सम्मान देता है और जिसके मनमें कभी दुष्टता नहीं आती, वह मनुष्य निस्संदेह पण्डित कहलाता है ॥

ज्ञानविज्ञानसम्पन्नानूहापोहविशारदान् ।

प्रवक्तृन् पृच्छते योऽन्यान् स वै नापदमृच्छति ॥ २ ९ ॥

अन्यथा बहुबुद्धयाढ्यो वाक्यं वदति संसदि ।

अन्यथैव ह्यहंवादी दुर्बलं वदते वचः ॥ ३० ॥

जो मनुष्य ज्ञान- विज्ञानसे सम्पन्न और ऊहापोहमें कुशल दूसरे दूसरे वक्ताओंसे अपना संदेह पूछता है, वह आपत्तिमें नहीं पड़ता है । विशेष बुद्धिमान् पुरुष सभामें और तरहकी बात करता है और अहंकारी मनुष्य और ही तरहकी दुर्बलतायुक्त बातें करता है ॥ २ ९ -३० ॥

दिव्यज्ञाने दिवि श्रेष्ठे दिव्यपुण्यैः सहोत्थिते ।

त्वमेवार्हसि नो देवि स्त्रीधर्माननुभाषितुम् ॥ ३१ ॥

देवि! तुम दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न और देवलोकमें सर्वश्रेष्ठ हो । दिव्य पुण्योंके साथ तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है । तुम्हीं हम सब लोगोंको स्त्री - धर्मका उपदेश देनेके योग्य हो ॥

ततः साऽऽराधिता देवी गङ्गया बहुभिर्गुणैः ।

प्राह सर्वमशेषेण स्त्रीधर्मं सुरसुन्दरी ॥ ३२ ॥

तदनन्तर गंगाजीके द्वारा अनेक गुणोंका बखान करके पूजित होनेपर देवसुन्दरी देवी उमाने सम्पूर्ण स्त्री - धर्मका पूर्णतः वर्णन किया ॥ ३२ ॥

उमोवाच

स्त्रीधर्मो मां प्रति यथा प्रतिभाति यथाविधि ।

तमहं कीर्तयिष्यामि तथैव प्रश्रिता भव ॥ ३३ ॥

उमा बोलीं- स्त्री - धर्मका स्वरूप मेरी बुद्धिमें जैसा प्रतीत होता है, उसे मैं विधिपूर्वक बताऊँगी । तुम विनय और उत्सुकतासे युक्त होकर इसे सुनो ॥ ३३ ॥

स्त्रीधर्मः पूर्व एवायं विवाहे बन्धुभिः कृतः ।

सहधर्मचरी भर्तुर्भवत्यग्निसमीपतः ॥ ३४ ॥

पृष्ठ 1394

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विवाहके समय कन्याके भाई- बन्धु पहले ही उसे स्त्री- धर्मका उपदेश कर देते हैं । जब कि वह अग्निके समीप अपने पतिकी सहधर्मिणी बनती है ॥ ३४ ॥

सुस्वभावा सुवचना सुवृत्ता सुखदर्शना ।

अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तुः सा धर्मचारिणी ॥ ३५ ॥

सा भवेद् धर्मपरमा सा भवेद् धर्मभागिनी ।

देववत् सततं साध्वी या भर्तारं प्रपश्यति ॥ ३६ ॥

जिसके स्वभाव, बात - चीत और आचरण उत्तम हों, जिसको देखनेसे पतिको सुख मिलता हो, जो अपने पतिके सिवा दूसरे किसी पुरुषमें मन नहीं लगाती हो और स्वामीके समक्ष सदा प्रसन्नमुखी रहती हो, वह स्त्री धर्माचरण करनेवाली मानी गयी है । जो साध्वी स्त्री अपने स्वामीको सदा देवतुल्य समझती है, वही धर्मपरायणा और वही धर्मके फलकी भागिनी होती है ॥ ३५-३६ ॥

शुश्रूषां परिचारं च देववद् या करोति च ।

नान्यभावा ह्यविमनाः सुव्रता सुखदर्शना ॥ ३७ ॥

पुत्रवक्त्रमिवाभीक्ष्णं भर्तुर्वदनमीक्षते ।

या साध्वी नियताहारा सा भवेद् धर्मचारिणी ॥ ३८ ॥

जो पतिकी देवताके समान सेवा और परिचर्या करती हैं, पतिके सिवा दूसरे किसीसे हार्दिक प्रेम नहीं करती, कभी नाराज नहीं होती तथा उत्तम व्रतका पालन करती है, जिसका दर्शन पतिको सुखद जान पड़ता है, जो पुत्रके मुखकी भाँति स्वामीके मुखकी ओर सदा निहारती रहती है तथा जो साध्वी एवं नियमित आहारका सेवन करनेवाली है, वह स्त्री धर्मचारिणी कही गयी है ॥

श्रुत्वा दम्पतिधर्मं वै सहधर्मं कृतं शुभम् ।

या भवेद् धर्मपरमा नारी भर्तृसमव्रता ॥ ३ ९ ॥

‘ पति और पत्नीको एक साथ रहकर धर्माचरण करना चाहिये । ' इस मंगलमय दाम्पत्य धर्मको सुनकर जो स्त्री धर्मपरायण हो जाती है, वह पतिके समान व्रतका पालन करनेवाली ( पतिव्रता ) है ॥ ३ ९ ॥

देववत् सततं साध्वी भर्तारमनुपश्यति ।

दम्पत्योरेष वै धर्मः सहधर्मकृतः शुभः ॥ ४० ॥

साध्वी स्त्री सदा अपने पतिको देवताके समान समझती है । पति और पत्नीका यह सहधर्म ( साथ - साथ रहकर धर्माचरण करना ) रूप धर्म परम मंगलमय है ॥ शुश्रूषां परिचारं च देवतुल्यं प्रकुर्वती ।

वश्या भावेन सुमनाः सुव्रता सुखदर्शना ।

अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तुः सा धर्मचारिणी ॥। ४१ ॥

परुषाण्यपि चोक्ता या दृष्टा दृष्टेन चक्षुषा ।

पृष्ठ 1395

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सुप्रसन्नमुखी भर्तुर्या नारी सा पतिव्रता ॥ ४२ ॥

जो अपने हृदयके अनुरागके कारण स्वामीके अधीन रहती है, अपने चित्तको प्रसन्न रखती है, देवताके समान पतिकी सेवा और परिचर्या करती है, उत्तम व्रतका आश्रय लेती है ओर पतिके लिये सुखदायक सुन्दर वेष धारण किये रहती है, जिसका चित्त पतिके सिवा और किसीकी ओर नहीं जाता, पतिके समक्ष प्रसन्नवदन रहनेवाली वह स्त्री धर्मचारिणी मानी गयी है । जो स्वामीके कठोर वचन कहने या दोषपूर्ण दृष्टिसे देखनेपर भी प्रसन्नतासे मुसकराती रहती है, वही स्त्री पतिव्रता है ॥ ४१-४२ ॥

न चन्द्रसूर्यौ न तरुं पुंनाम्ना या निरीक्षते ।

भर्तृवर्जं वरारोहा सा भवेद् धर्मचारिणी ॥ ४३ ॥

दरिद्रं व्याधितं दीनमध्वना परिकर्शितम् ।

पतिं पुत्रमिवोपास्ते सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४४ ॥

जो सुन्दरी नारी पतिके सिवा पुरुष नामधारी चन्द्रमा, सूर्य और किसी वृक्षकी ओर भी दृष्टि नहीं डालती, वही पातिव्रतधर्मका पालन करनेवाली है । जो नारी अपने दरिद्र, रोगी, दीन अथवा रास्तेकी थकावटसे खिन्न हुए पतिकी पुत्रके समान सेवा करती है, वह धर्मफलकी भागिनी होती है ॥

या नारी प्रयता दक्षा या नारी पुत्रिणी भवेत् ।

पतिप्रिया पतिप्राणा सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४५ ॥

शुश्रूषां परिचर्यां च करोत्यविमनाः सदा ।

सुप्रीता विनीता च सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४६ ॥

जो स्त्री अपने हृदयको शुद्ध रखती, गृहकार्य करनेमें कुशल और पुत्रवती होती, पतिसे प्रेम करती और पतिको ही अपने प्राण समझती है, वही धर्मफल पानेकी अधिकारिणी होती है । जो सदा प्रसन्नचित्तसे पतिकी सेवा- शुश्रूषामें लगी रहती है, पतिके ऊपर पूर्ण विश्वास रखती और उसके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करती है, वही नारी धर्मके श्रेष्ठ फलकी भागिनी होती है ॥ ४५-४६ ॥

न कामेषु न भोगेषु नैश्वर्ये न सुखे तथा ।

स्पृहा यस्या यथा पत्यौ सा नारी धर्मभागिनी ॥ ४७ ॥

जिसके हृदयमें पतिके लिये जैसी चाह होती है, वैसी काम, भोग और सुखके लिये भी नहीं होती । वह स्त्री पातिव्रतधर्मकी भागिनी होती है ॥ ४७ ॥

कल्योत्थानरतिर्नित्यं गहशुश्रूषणे रता ।

सुसम्मृष्टक्षया चैव गोशकृत्कृतलेपना ॥ ४८ ॥

अग्निकार्यपरा नित्यं सदा पुष्पबलिप्रदा ।

देवतातिथिभृत्यानां निर्वाप्य पतिना सह ॥ ४ ९ ॥

शेषान्नमुपभुञ्जाना यथान्यायं यथाविधि ।

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महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 1396 का मूल पृष्ठ
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तुष्टपुष्टजना नित्यं नारी धर्मेण युज्यते ॥ ५० ॥

जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठनेमें रुचि रखती है, घरोंके काम - काजमें योग देती है, घरको झाड़ - बुहारकर साफ रखती है और गोबरसे लीप - पोतकर पवित्र बनाये रखती है, जो पतिके साथ रहकर प्रतिदिन अग्निहोत्र करती है, देवताओंको पुष्प और बलि अर्पण करती है तथा देवता, अतिथि और पोष्यवर्गको भोजनसे तृप्त करके न्याय और विधिके अनुसार शेष अन्नका स्वयं भोजन करती है तथा घरके लोगोंको हृष्ट- पुष्ट एवं संतुष्ट रखती है, ऐसी ही नारी सती - धर्मके फलसे युक्त होती है ॥ ४८–५० ॥

श्वश्रूश्वशुरयोः पादौ जोषयन्ती गुणान्विता ।

मातापितृपरा नित्यं या नारी सा तपोधना ॥ ५१ ॥

ब्राह्मणान् दुर्बलानाथान् दीनान्धकृपणांस्तथा ।

बिभर्त्यन्नेन या नारी सा पतिव्रतभागिनी ॥ ५२ ॥

जो उत्तम गुणोंसे युक्त होकर सदा सास- ससुरके चरणोंकी सेवामें संलग्न रहती है तथा माता - पिताके प्रति भी सदा उत्तम भक्तिभाव रखती है, वह स्त्री तपस्यारूपी धनसे सम्पन्न मानी गयी है । जो नारी ब्राह्मणों, दुर्बलों, अनाथों, दीनों, अन्धों और कृपणों ( कंगालों) का अन्नके द्वारा भरण-पोषण करती है, वह पातिव्रतधर्मके पालनका फल पाती है ॥ ५१-५२ ॥

व्रतं चरति या नित्यं दुश्चरं लघुसत्त्वया ।

पतिचित्ता पतिहिता सा पतिव्रतभागिनी ॥ ५३ ॥

जो प्रतिदिन शीघ्रतापूर्वक मर्यादाका बोध करानेवाली बुद्धिके द्वारा दुष्कर व्रतका आचरण करती है, पतिमें ही मन लगाती है और निरन्तर पतिके हित- साधनमें लगी रहती है, उसे पतिव्रत- धर्मके पालनका सुख प्राप्त होता है ॥

पुण्यमेतत् तपश्चैतत् स्वर्गश्चैष सनातनः ।

या नारी भर्तृपरमा भवेद् भर्तृव्रता सती ॥ ५४ ॥

जो साध्वी नारी पतिव्रत धर्मका पालन करती हुई पतिकी सेवामें लगी रहती है, उसका यह कार्य महान् पुण्य, बड़ी भारी तपस्या और सनातन स्वर्गका साधन है ॥ ५४ ॥

पतिर्हि देवो नारीणां पतिर्बन्धुः पतिर्गतिः ।

पत्या समा गतिर्नास्ति दैवतं वा यथा पतिः ॥ ५५ ॥

पति ही नारियोंका देवता, पति ही बन्धु बान्धव और पति ही उनकी गति है । नारीके लिये पतिके समान न दूसरा कोई सहारा है और न दूसरा कोई देवता ॥ ५५ ॥

पतिप्रसादः स्वर्गो वा तुल्यो नार्या न वा भवेत् ।

अहं स्वर्गं न हीच्छेयं त्वय्यप्रीते महेश्वरे ॥ ५६ ॥

एक ओर पतिकी प्रसन्नता और दूसरी ओर स्वर्ग – ये दोनों नारीकी दृष्टिमें समान हो सकते हैं या नहीं, इसमें संदेह है । मेरे प्राणनाथ महेश्वर! मैं तो आपको अप्रसन्न रखकर

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स्वर्गको नहीं चाहती ॥ ५६ ॥

यद्यकार्यमधर्मं वा यदि वा प्राणनाशनम् ।

पतिर्ब्रूयाद् दरिद्रो वा व्याधितो वा कथंचन ॥ ५७ ॥

आपन्नो रिपुसंस्थो वा ब्रह्मशापार्दितोऽपि वा ।

आपद्धर्माननुप्रेक्ष्य तत्कार्यमविशङ्कया ॥ ५८ ॥

पति दरिद्र हो जाय, किसी रोगसे घिर जाय, आपत्तिमें फँस जाय, शत्रुओंके बीचमें पड़ जाय अथवा ब्राह्मणके शापसे कष्ट पा रहा हो, उस अवस्थामें वह न करनेयोग्य कार्य, अधर्म अथवा प्राणत्यागकी भी आज्ञा दे दे, तो उसे आपत्तिकालका धर्म समझकर निःशंकभावसे तुरंत पूरा करना चाहिये ॥ ५७-५८ ॥

एष देव मया प्रोक्तः स्त्रीधर्मो वचनात् तव ।

या त्वेवंभाविनी नारी सा पतिव्रतभागिनी ॥ ५ ९ ॥

देव! आपकी आज्ञासे मैंने यह स्त्रीधर्मका वर्णन किया है । जो नारी ऊपर बताये अनुसार अपना जीवन बनाती है, वह पातिव्रत धर्मके फलकी भागिनी होती है ॥ ५ ९ ॥ भीष्म उवाच

इत्युक्तः स तु देवेशः प्रतिपूज्य गिरेः सुताम् ।

लोकान् विसर्जयामास सर्वैरनुचरैर्वृतान् ॥ ६० ॥

ततो ययुर्भूतगणाः सरितश्च यथागतम् ।

गन्धर्वाप्सरसश्चैव प्रणम्य शिरसा भवम् ॥ ६१ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! पार्वतीजीके द्वारा इस प्रकार नारीधर्मका वर्णन सुनकर देवाधिदेव महादेवजीने गिरिराजकुमारीका बड़ा आदर किया और वहाँ समस्त अनुचरोंके साथ आये हुए लोगोंको जानेकी आज्ञा दी । तब समस्त भूतगण, सरिताएँ गन्धर्व और अप्सराएँ भगवान् शंकरको सिरसे प्रणाम करके अपने - अपने स्थानको चली गयीं ॥ ६०-६१ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे स्त्रीधर्मकथने षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमेंउमा--महेश्वरसंवादकेम प्रसङ्गमें स्त्रीधर्मका वर्णनविषयक एक सौछियालिसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १४६ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६४ श्लोक हैं ) OFF FULL

पृष्ठ 1398

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सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः वंशपरम्पराका कथन और भगवान् श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन ऋषय ऊचुः

पिनाकिन् भगनेत्रघ्न सर्वलोकनमस्कृत ।

माहात्म्यं वासुदेवस्य श्रोतुमिच्छामि शङ्कर ॥ १ ॥

ऋषियोंने कहा— भगदेवताके नेत्रोंका विनाश करनेवाले पिनाकधारी विश्ववन्दित भगवान् शंकर! अब हम वासुदेव ( श्रीकृष्ण) -का माहात्म्य सुनना चाहते हैं ॥ १ ॥

ईश्वर उवाच

पितामहादपि वरः शाश्वतः पुरुषो हरिः ।

कृष्णो जाम्बूनदाभासो व्यभ्रे सूर्य इवोदितः ॥ २ ॥

महेश्वरने कहा - मुनिवरो! भगवान् सनातन पुरुष श्रीकृष्ण ब्रह्माजीसे भी श्रेष्ठ हैं । वे श्रीहरि जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान श्याम कान्तिसे युक्त हैं । बिना बादलके आकाशमें उदित सूर्यके समान तेजस्वी हैं ॥ २ ॥

दशबाहुर्महातेजा देवतारिनिषूदनः ।

श्रीवत्साङ्को हृषीकेशः सर्वदैवतपूजितः ॥ ३ ॥

उनकी भुजाएँ दस हैं, वे महान् तेजस्वी हैं, देवद्रोहियोंका नाश करनेवाले श्रीवत्सभूषित भगवान् हृषीकेश सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित होते हैं ॥ ३ ॥

ब्रह्मा तस्योदरभवस्तस्याहं च शिरोभवः ।

शिरोरुहेभ्यो ज्योतींषि रोमभ्यश्च सुरसुराः ॥ ४ ॥

ब्रह्माजी उनके उदरसे और मैं उनके मस्तकसे प्रकट हुआ हूँ। उनके सिरके केशोंसे नक्षत्रों और ताराओंका प्रादुर्भाव हुआ है । रोमावलियोंसे देवता और असुर प्रकट हुए हैं ॥ ४ ॥

ऋषयो देहसम्भूतास्तस्य लोकाश्च शाश्वताः ।

पितामहगृहं साक्षात् सर्वदेवगृहं च सः ॥ ५ ॥

समस्त ऋषि और सनातन लोक उनके श्रीविग्रहसे उत्पन्न हुए हैं । वे श्रीहरि स्वयं ही सम्पूर्ण देवताओंके गृह और ब्रह्माजीके भी निवासस्थान हैं ॥ ५ ॥

सोऽस्याः पृथिव्याः कृत्स्नायाः स्रष्टा त्रिभुवनेश्वरः ।

संहर्ता चैव भूतानां स्थावरस्य चरस्य च ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1399

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इस सम्पूर्ण पृथ्वीके स्रष्टा और तीनों लोकोंके स्वामी भी वे ही हैं । वे ही चराचर प्राणियोंका संहार भी करते हैं ॥ ६ ॥

स हि देववरः साक्षाद् देवनाथः परंतपः ।

सर्वज्ञः सर्वसंश्लिष्टः सर्वगः सर्वतोमुखः ॥ ७ ॥

वे देवताओंमें श्रेष्ठ, देवताओंके रक्षक, शत्रुओंको संताप देनेवाले, सर्वज्ञ, सबमें ओतप्रोत, सर्वव्यापक तथा सब ओर मुखवाले हैं ॥ ७ ॥

परमात्मा हृषीकेशः सर्वव्यापी महेश्वरः ।

न तस्मात् परमं भूतं त्रिषु लोकेषु किंचन ॥ ८ ॥

वे ही परमात्मा, इन्द्रियोंके प्रेरक और सर्वव्यापी महेश्वर हैं । तीनों लोकोंमें उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ॥ ८ ॥

सनातन वै मधुहा गोविन्द इति विश्रुतः ।

स सर्वान् पार्थिवान् संख्ये घातयिष्यति मानदः ॥ ९ ॥

वे ही सनातन, मधुसूदन और गोविन्द आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं । सज्जनोंको आदर देनेवाले वे भगवान् श्रीकृष्ण महाभारत- युद्धमें समस्त राजाओंका संहार करायेंगे ॥ ९ ॥

सुरकार्यार्थमुत्पन्नो मानुषं वपुरास्थितः ।

न हि देवगणाः सक्तास्त्रिविक्रमविनाकृताः ॥ १० ॥

वे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये पृथ्वीपर मानव शरीर धारण करके प्रकट हुए हैं । उन भगवान् त्रिविक्रमकी शक्ति और सहायताके बिना सम्पूर्ण देवता भी कोई कार्य नहीं कर सकते ॥ १० ॥

भुवने देवकार्याणि कर्तुं नायकवर्जिताः ।

नायकः सर्वभूतानां सर्वदेवनमस्कृतः ॥ ११ ॥

संसारमें नेताके बिना देवता अपना कोई भी कार्य करनमें असमर्थ हैं और ये भगवान् श्रीकृष्ण सब प्राणियोंके नेता हैं । इसलिये समस्त देवता उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं ॥ ११ ॥

एतस्य देवनाथस्य देवकार्यपरस्य च ।

ब्रह्मभूतस्य सततं ब्रह्मर्षिशरणस्य च ॥ १२ ॥

ब्रह्मा वसति गर्भस्थः शरीरे सुखसंस्थितः ।

शर्वः सुखं संश्रितश्च शरीरे सुखसंस्थितः ॥ १३ ॥

देवताओंकी रक्षा और उनके कार्यसाधनमें संलग्न रहनेवाले वे भगवान् वासुदेव ब्रह्मस्वरूप हैं । वे ही ब्रह्मर्षियोंको सदा शरण देते हैं । ब्रह्माजी उनके शरीरके भीतर अर्थात् उनके गर्भमें बड़े सुखके साथ रहते हैं । सदा सुखी रहनेवाला मैं शिव भी उनके श्रीविग्रहके भीतर सुखपूर्वक निवास करता हूँ ॥ १२-१३ ॥ सर्वाः सुखं संश्रिताश्च शरीरे तस्य देवताः ।

पृष्ठ 1400

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स देवः पुण्डरीकाक्षः श्रीगर्भः श्रीसहोषितः ॥ १४ ॥