06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1401–1410

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1401–1410

पृष्ठ 1401

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भगवान् शंकर श्रीकृष्णका माहात्म्य कह रहे हैं

पृष्ठ 1402

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सम्पूर्ण देवता उनके श्रीविग्रहमें सुखपूर्वक निवास करते हैं । वे कमलनयन श्रीहरि अपने गर्भ ( वक्षःस्थल ) -में लक्ष्मीको निवास देते हैं । लक्ष्मीके साथ ही वे रहते हैं ॥ १४ ॥

शार्ङ्गचक्रायुधः खड्गी सर्वनागरिपुध्वजः ।

उत्तमेन स शीलेन दमेन च शमेन च ॥ १५ ॥

पराक्रमेण वीर्येण वपुषा दर्शनेन च ।

आरोहेण प्रमाणेन धैर्येणार्जवसम्पदा ॥ १६ ॥

आनृशंस्येन रूपेण बलेन च समन्वितः ।

अस्त्रैः समुदितः सर्वैर्दिव्यैरद्भुतदर्शनैः ॥ १७ ॥

शार्ङ्गधनुष, सुदर्शनचक्र और नन्दक नामक खड्ग–उनके आयुध हैं । उनकी ध्वजामें सम्पूर्ण नागोंके शत्रु गरुड़का चिह्न सुशोभित है । वे उत्तम शील, शम, दम, पराक्रम, वीर्य, सुन्दर शरीर, उत्तम दर्शन, सुडौल आकृति, धैर्य, सरलता, कोमलता, रूप और बल आदि सद्गुणोंसे सम्पन्न हैं । सब प्रकारके दिव्य और अद्भुत अस्त्र- शस्त्र उनके पास सदा मौजूद रहते हैं ॥ १५–१७ ॥

योगमायः सहस्राक्षो निरपायो महामनाः ।

वीरो मित्रजनश्लाघी ज्ञातिबन्धुजनप्रियः ॥ १८ ॥

क्षमावांश्चानहंवादी ब्रह्मण्यो ब्रह्मनायकः ।

भयहर्ता भयार्तानां मित्राणां नन्दिवर्धनः ॥ १ ९ ॥

वे योगमायासे सम्पन्न और हजारों नेत्रोंवाले हैं । उनका हृदय विशाल है । वे अविनाशी, वीर, मित्रजनोंके प्रशंसक, ज्ञाति एवं बन्धु- बान्धवोंके प्रिय, क्षमाशील, अहंकाररहित, ब्राह्मणभक्त, वेदोंका उद्धार करनेवाले, भयातुर पुरुषोंका भय दूर करनेवाले और मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाले हैं ॥ १८-१९ ॥

शरण्यः सर्वभूतानां दीनानां पालने रतः ।

श्रुतवानर्थसम्पन्नः सर्वभूतनमस्कृतः ॥ २० ॥

समाश्रितानां वरदः शत्रूणामपि धर्मवित् ।

नीतिज्ञो नीतिसम्पन्नो ब्रह्मवादी जितेन्द्रियः ॥ २१ ॥

वे समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले, दीन- दुखियोंके पालनमें तत्पर, शास्त्रज्ञानसम्पन्न, धनवान्, सर्वभूतवन्दित, शरणमें आये हुए शत्रुओंको भी वर देनेवाले, धर्मज्ञ, नीतिज्ञ, नीतिमान्, ब्रह्मवादी और जितेन्द्रिय हैं ॥ २०-२१ ॥

भवार्थमिह देवानां बुद्धया परमया युतः ।

प्राजापत्ये शुभे मार्गे मानवे धर्मसंस्कृते ॥ २२ ॥

समुत्पत्स्यति गोविन्दो मनोर्वंशे महात्मनः ।

अङ्गो नाम मनोः पुत्रो अन्तर्धामा ततः परः ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1403

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परम बुद्धिसे सम्पन्न भगवान् गोविन्द यहाँ देवताओंकी उन्नतिके लिये प्रजापतिके शुभमार्गपर स्थित हो मनुके धर्म - संस्कृत कुलमें अवतार लेंगे । महात्मा मनुके वंशमें मनुपुत्र अंग नामक राजा होंगे । उनसे अन्तर्धामा नामवाले पुत्रका जन्म होगा ॥ २२-२३ ॥

अन्तर्धाम्नो हविर्धामा प्रजापतिरनिन्दितः ।

प्राचीनबर्हिर्भविता हविर्धाम्नः सुतो महान् ॥ २४ ॥

अन्तर्धामासे अनिन्द्य प्रजापति हविर्धामाकी उत्पत्ति होगी । हविर्धामाके पुत्र महाराज प्राचीनबर्हि होंगे ॥ २४ ॥

तस्य प्रचेतः प्रमुखा भविष्यन्ति दशात्मजाः ।

प्राचेतसस्तथा दक्षो भवितेह प्रजापतिः ॥ २५ ॥

प्राचीनबर्हिके प्रचेता आदि दस पुत्र होंगे । उन दसों प्रचेताओंसे इस जगत्में प्रजापति दक्षका प्रादुर्भाव होगा ॥ २५ ॥

दाक्षायण्यास्तथाऽऽदित्यो मनुरादित्यतस्तथा ।

मनोश्च वंशज इला सुद्युम्नश्च भविष्यति ॥ २६ ॥

दक्षकन्या अदितिसे आदित्य ( सूर्य) उत्पन्न होंगे । सूर्यसे मनु उत्पन्न होंगे । मनुके वंशमें इला नामक कन्या होगी, जो आगे चलकर सुद्युम्न नामक पुत्रके रूपमें परिणत हो जायगी ॥ २६ ॥

बुधात् पुरूरवाश्चापि तस्मादायुर्भविष्यति ।

नहुषो भविता तस्माद् ययातिस्तस्य चात्मजः ॥ २७ ॥

कन्यावस्थामें बुधसे समागम होनेपर उससे पुरूरवाका जन्म होगा । पुरूरवासे आयु

नामक पुत्रकी उत्पत्ति होगी । आयुके पुत्र नहुष और नहुषके ययाति होंगे ॥ २७ ॥

यदुस्तस्मान्महासत्त्वः क्रोष्टा तस्माद् भविष्यति ।

क्रोष्टुश्चैव महान् पुत्रो वृजिनीवान् भविष्यति ॥ २८ ॥

ययातिसे महान् बलशाली यदु होंगे । बहुसे क्रोष्टाका जन्म होगा, क्रोष्टासे महान् पुत्र वृजिनीवान् होंगे ॥ २८ ॥

वृजिनीवतश्च भविता उषङ्गुरपराजितः ।

उषङ्गोर्भविता पुत्रः शूरश्चित्ररथस्तथा ॥ २ ९ ॥

वृजिनीवान्से विजय वीर उषंगुका जन्म होगा। उषंगुका पुत्र शूरवीर चित्ररथ होगा ॥ २ ९ ॥

तस्य त्ववरजः पुत्रः शूरो नाम भविष्यति ।

तेषां विख्यातवीर्याणां चरित्रगुणशालिनाम् ॥ ३० ॥

यज्वनां सुविशुद्धानां वंशे ब्राह्मणसम्मते ।

स शूरः क्षत्रियश्रेष्ठो महावीर्यो महायशाः ।

स्ववंशविस्तरकरं जनयिष्यति मानदः ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1404

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वसुदेव इति ख्यातं पुत्रमानकदुन्दुभिम् ।

तस्य पुत्रश्चतुर्बाहुर्वासुदेवो भविष्यति ॥ ३२ ॥

उसका छोटा पुत्र शूर नामसे विख्यात होगा । वे सभी यदुवंशी विख्यात पराक्रमी, सदाचार और सद्गुणसे सुशोभित, यज्ञशील और विशुद्ध आचार-विचारवाले होंगे । उनका कुल ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित होगा । उस कुलमें महापराक्रमी, महायशस्वी और दूसरोंको सम्मान देनेवाले क्षत्रिय- शिरोमणि शूर अपने वंशका विस्तार करनेवाले वसुदेव नामक पुत्रको जन्म देंगे, जिसका दूसरा नाम आनकदुन्दुभि होगा । उन्हींके पुत्र चार भुजाधारी भगवान् वासुदेव होंगे ॥ ३०–३२ ॥

दाता ब्राह्मणसत्कर्ता ब्रह्मभूतो द्विजप्रियः ।

राज्ञो मागधसंरुद्धान् मोक्षयिष्यति यादवः ॥ ३३ ॥

भगवान् वासुदेव दानी, ब्राह्मणोंका सत्कार करनेवाले, ब्रह्मभूत और ब्राह्मणप्रिय होंगे । वे यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण मगधराज जरासंधकी कैदमें पड़े हुए राजाओंको बन्धनसे छुड़ायेंगे ॥ ३३ ॥

जरासंधं तुतु राजानं निर्जित्य गिरिगह्वरे ।

सर्वपार्थिवरत्नाढ्यो भविष्यति स वीर्यवान् ॥ ३४ ॥

वे पराक्रमी श्रीहरि पर्वतकी कन्दरा ( राजगृह) - में राजा जरासंधको जीतकर समस्त राजाओंके द्वारा उपहृत रत्नोंसे सम्पन्न होंगे ॥ ३४ ॥

पृथिव्यामप्रतिहतो वीर्येण च भविष्यति ।

विक्रमेण च सम्पन्नः सर्वपार्थिवपार्थिवः ॥ ३५ ॥

वे इस भूमण्डलमें अपने बल पराक्रमद्वारा अजेय होंगे । विक्रमसे सम्पन्न तथा समस्त राजाओंके भी राजा होंगे ॥ ३५ ॥

शूरसेनेषु भूत्वा स द्वारकायां वसन् प्रभुः ।

पालयिष्यति गां देवीं विजित्य नयवित् सदा ॥ ३६ ॥

नीतिवेत्ता भगवान् श्रीकृष्ण शूरसेन देश ( मथुरा-मण्डल) - में अवतीर्ण होकर वहाँसे द्वारकापुरीमें जाकर रहेंगे और समस्त राजाओंको जीतकर सदा इस पृथ्वीदेवीका पालन करेंगे ॥ ३६ ॥

तं भवन्तः समासाद्य वाङ्माल्यैरर्हणैर्वरैः ।

अर्चयन्तु यथान्यायं ब्रह्माणमिव शाश्वतम् ॥ ३७ ॥

आपलोग उन्हीं भगवान्‌की शरण लेकर अपनी वाङ्मयी मालाओं तथा श्रेष्ठ पूजनोपचारोंसे सनातन ब्रह्माकी भाँति उनका यथोचित पूजन करें ॥ ३७ ॥

यो हि मां द्रष्टुमिच्छेत ब्रह्माणं च पितामहम् ।

द्रष्टव्यस्तेन भगवान् वासुदेवः प्रतापवान् ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 1405

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जो मेरा और पितामह ब्रह्माजीका दर्शन करना चाहता हो, उसे प्रतापी भगवान् वासुदेवका दर्शन करना चाहिये ॥ ३८ ॥

दृष्टे तस्मिन्नहं दृष्टो न मेऽत्रास्ति विचारणा ।

पितामहो वा देवेश इति वित्त तपोधनाः ॥ ३ ९ ॥

तपोधनो! उनका दर्शन हो जानेपर मेरा ही दर्शन हो गया, अथवा उनके दर्शनसे देवेश्वर ब्रह्माजीका दर्शन हो गया ऐसे समझो, इस विषयमें मुझे कोई विचार नहीं करना है अर्थात् संदेह नहीं है ॥ ३ ९ ॥

स यस्य पुण्डरीकाक्षः प्रीतियुक्तो भविष्यति ।

तस्य देवगणः प्रीतो ब्रह्मपूर्वो भविष्यति ॥ ४० ॥

जिसपर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न होंगे, उसके ऊपर ब्रह्मा आदि देवताओंका समुदाय प्रसन्न हो जायगा ॥ ४० ॥

यश्च तं मानवे लोके संश्रयिष्यति केशवम् ।

तस्य कीर्तिर्जयश्चैव स्वर्गश्चैव भविष्यति ॥ ४१ ॥

मानवलोकमें जो भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेगा, उसे कीर्ति, विजय तथा उत्तम स्वर्गकी प्राप्ति होगी ॥ ४१ ॥

धर्माणां देशिकः साक्षात् स भविष्यति धर्मभाक् ।

धर्मवद्भिः स देवेशो नमस्कार्यः सदोद्यतैः ॥ ४२ ॥

इतना ही नहीं, वह धर्मोंका उपदेश देनेवाला साक्षात् धर्माचार्य एवं धर्मफलका भागी होगा । अतः धर्मात्मा पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा उत्साहित रहकर देवेश्वर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करें ॥ ४२ ॥

धर्म एव परो हि स्यात् तस्मिन्नभ्यर्चिते विभौ ।

स हि देवो महातेजाः प्रजाहितचिकीर्षया ॥ ४३ ॥

धर्मार्थं पुरुषव्याघ्र ऋषिकोटीः ससर्ज ह ।

ताः सृष्टास्तेन विभुना पर्वते गन्धमादने ॥ ४४ ॥

सनत्कुमारप्रमुखास्तिष्ठन्ति तपसान्विताः ।

तस्मात् स वाग्मी धर्मज्ञो नमस्यो द्विजपुङ्गवाः ॥ ४५ ॥

उन सर्वव्यापी परमेश्वरकी पूजा करनेसे परम धर्मकी सिद्धि होगी । वे महान् तेजस्वी देवता हैं । उन पुरुषसिंह श्रीकृष्णने प्रजाका हित करनेकी इच्छासे धर्मका अनुष्ठान करने लिये करोड़ों ऋषियोंकी सृष्टि की है । भगवान्‌के उत्पन्न किये हुए वे सनत्कुमार आदि ऋषि गन्धमादन पर्वतपर सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं । अतः द्विजवरो! उन प्रवचन- कुशल, धर्मज्ञ वासुदेवको सदा प्रणाम करना चाहिये ॥ ४३–४५ ॥ दिवि श्रेष्ठो हि भगवान् हरिर्नारायणः प्रभुः । वन्दितो हि स वन्देत मानितो मानयीत च ।

पृष्ठ 1406

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अर्हितश्चार्हयेन्नित्यं पूजितः प्रतिपूजयेत् ॥ ४६ ॥

वे भगवान् नारायण हरि देवलोकमें सबसे श्रेष्ठ हैं । जो उनकी वन्दना करता है, उसकी वे भी वन्दना करते हैं । जो उनका आदर करता है, उसका वे भी आदर करते हैं । इसी प्रकार अर्चित होनेपर वे भी अर्चना करते और पूजित या प्रशंसित होनेपर वे भी पूजा या प्रशंसा करते हैं ॥ ४६ ॥

दृष्टः पश्येदहरहः संश्रितः प्रतिसंश्रयेत् ।

अर्चितश्चार्चयेन्नित्यं स देवो द्विजसत्तमाः ॥ ४७ ॥

श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो प्रतिदिन उनका दर्शन करता है, उसकी ओर वे भी कृपादृष्टि करते हैं । जो उनका आश्रय लेता है, उसके हृदयमें वे भी आश्रय लेते हैं तथा जो उनकी पूजा करता है, उसकी वे भी सदा पूजा करते हैं ॥ ४७ ॥

एतत् तस्यानवद्यस्य विष्णोर्वै परमं व्रतम् ।

आदिदेवस्य महतः सज्जनाचरितं सदा ॥ ४८ ॥

उन प्रशंसनीय आदि देवता भगवान् महाविष्णुका यह उत्तम व्रत है, जिसका साधु पुरुष सदा आचरण करते आये हैं ॥ ४८ ॥

भुवनेऽभ्यर्चितो नित्यं देवैरपि सनातनः ।

अभयेनानुरूपेण युज्यन्ते तमनुव्रताः ॥ ४ ९ ॥

वे सनातन देवता हैं, अतः इस त्रिभुवनमें देवता भी सदा उन्हींकी पूजा करते हैं । जो उनके अनन्य भक्त हैं, वे अपने भजनके अनुरूप ही निर्भय पद प्राप्त करते हैं ॥ ४ ९ ॥

कर्मणा मनसा वाचा स नमस्यो द्विजैः सदा ।

यत्नवद्भिरुपस्थाय द्रष्टव्यो देवकीसुतः ॥ ५० ॥

द्विजोंको चाहिये कि वे मन, वाणी और कर्मसे सदा उन भगवान्‌को प्रणाम करें और यत्नपूर्वक उपासना करके उन देवकीनन्दनका दर्शन करें ॥ ५० ॥

एष वोऽभिहितो मार्गो मया वै मुनिसत्तमाः ।

तं दृष्ट्वा सर्वशो देवं दृष्टाः स्युः सुरसत्तमाः ॥ ५१ ॥

मुनिवरो! यह मैंने आपलोगोंको उत्तम मार्ग बता दिया है । उन भगवान् वासुदेवका सब प्रकारसे दर्शन कर लेनेपर सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवताओंका दर्शन करना हो जायगा ॥ ५१ ॥

महावराहं तं देवं सर्वलोकपितामहम् ।

अहं चैव नमस्यामि नित्यमेव जगत्पतिम् ॥ ५२ ॥

मैं भी महावराहरूप धारण करनेवाले उन सर्वलोक - पितामह जगदीश्वरको नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ ५२ ॥

तत्र च त्रितयं दृष्टं भविष्यति न संशयः ।

समस्ता हि वयं देवास्तस्य देहे वसामहे ॥ ५३ ॥

पृष्ठ 1407

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हम सब देवता उनके श्रीविग्रहमें निवास करते हैं । अतः उनका दर्शन करनेसे तीनों देवताओं ( ब्रह्मा, विष्णु और शिव) -का दर्शन हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५३ ॥

तस्य चैवाग्रजो भ्राता सिताद्रिनिचयप्रभः ।

हली बल इति ख्यातो भविष्यति धराधरः ॥ ५४ ॥

उनके बड़े भाई कैलासकी पर्वतमालाओंके समान श्वेत कान्तिसे प्रकाशित होनेवाले हलधर और बलरामके नामसे विख्यात होंगे । पृथ्वीको धारण करनेवाले शेषनाग ही बलरामके रूपमें अवतीर्ण होंगे ॥ ५४ ॥

त्रिशिरास्तस्य दिव्यश्च शातकुम्भमयो द्रुमः ।

ध्वजस्तृणेन्द्रो देवस्य भविष्यति रथाश्रितः ॥ ५५ ॥

बलदेवजीके रथपर तीन शिखाओंसे युक्त दिव्य सुवर्णमय तालवृक्ष ध्वजके रूपमें सुशोभित होगा ॥ ५५ ॥

शिरो नागैर्महाभोगैः परिकीर्णं महात्मभिः ।

भविष्यति महाबाहोः सर्वलोकेश्वरस्य च ॥ ५६ ॥

सर्वलोकेश्वर महाबाहु बलरामजीका मस्तक बड़े- बड़े फनवाले विशालकाय सर्पोंसे घिरा हुआ होगा ॥ ५६ ॥

चिन्तितानि समेष्यन्ति शस्त्राण्यस्त्राणि चैव ह ।

अनन्तश्च स एवोक्तो भगवान् हरिरव्ययः ॥ ५७ ॥

उनके चिन्तन करते ही सम्पूर्ण दिव्य अस्त्र- शस्त्र उन्हें प्राप्त हो जायँगे । अविनाशी भगवान् श्रीहरि ही अनन्त शेषनाग कहे गये हैं ॥ ५७ ॥

समादिष्टश्च विबुधैर्दर्शय त्वमिति प्रभो ।

सुपर्णो यस्य वीर्येण कश्यपस्यात्मजो बली ।

अन्तं नैवाशकद् द्रष्टुं देवस्य परमात्मनः ॥ ५८ ॥

पूर्वकालमें देवताओंने गरुड़जीसे यह अनुरोध किया कि ' आप हमें भगवान् शेषका अन्त दिखा दीजिये । ' तब कश्यपके बलवान् पुत्र गरुड़ अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उन परमात्मदेव अनन्तका अन्त न देख सके ॥ ५८ ॥

स च शेषो विचरते परया वै मुदा युतः ।

अन्तर्वसति भोगेन परिरभ्य वसुन्धराम् ॥ ५ ९ ॥

वे भगवान् शेष बड़े आनन्दके साथ सर्वत्र विचरते हैं और अपने विशाल शरीरसे पृथिवीको आलिंगनपाशमें बाँधकर पाताललोकमें निवास करते हैं ॥ ५ ९ ॥

य एव विष्णुः सोऽनन्तो भगवान् वसुधाधरः ।

यो रामः स हृषीकेशो योऽच्युतः स धराधरः ॥ ६० ॥

जो भगवान् विष्णु हैं, वे ही इस पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त हैं । जो बलराम हैं वे ही श्रीकृष्ण हैं, जो श्रीकृष्ण हैं वे ही भूमिधर बलराम हैं ॥ ६० ॥

पृष्ठ 1408

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तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ दिव्यौ दिव्यपराक्रमौ ।

द्रष्टव्यौ माननीयौ च चक्रलाङ्गलधारिणौ ॥ ६१ ॥

वे दोनों दिव्य रूप और दिव्य पराक्रमसे सम्पन्न पुरुषसिंह बलराम और श्रीकृष्ण क्रमशः चक्र एवं हल धारण करनेवाले हैं । तुम्हें उन दोनोंका दर्शन एवं सम्मान करना चाहिये ॥ ६१ ॥

एष वोऽनुग्रहः प्रोक्तो मया पुण्यस्तपोधनाः ।

यद् भवन्तो यदुश्रेष्ठं पूजयेयुः प्रयत्नतः ॥ ६२ ॥

तपोधनो! आपलोगोंपर अनुग्रह करके मैंने भगवान्‌का पवित्र माहात्म्य इसलिये बताया है कि आप प्रयत्नपूर्वक उन यदुकुलतिलक श्रीकृष्णकी पूजा करें ॥ ६२ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पुरुषमाहात्म्ये सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४७ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें परमपुरुष श्रीकृष्णका माहात्म्यविषयक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४७ ॥

पृष्ठ 1409

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अष्टचत्वारिशंदधिकशततमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन और भीष्मजीका युधिष्ठिरको राज्य करनेके लिये आदेश देना नारद उवाच

अथ व्योम्नि महान् शब्दः सविद्युत्स्तनयित्नुमान् ।

मेघैश्च गगनं नीलं संरुद्धमभवद् घनैः ॥ १ ॥

नारदजी कहते हैं - तदनन्तर आकाशमें बिजलीकी गड़गड़ाहट और मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके साथ महान् शब्द होने लगा । मेघोंकी घनघोर घटासे घिरकर सारा आकाश नीला हो गया ॥ १ ॥

प्रावृषीव च पर्जन्यो ववृषे निर्मलं पयः ।

तमश्चैवाभवद् घोरं दिशश्च न चकाशिरे ॥ २ ॥

वर्षाकालकी भाँति मेघसमूह निर्मल जलकी वर्षा करने लगा । सब ओर घोर अन्धकार छा गया । दिशाएँ नहीं सूझती थीं ॥ २ ॥

ततो देवगिरौ तस्मिन् रम्ये पुण्ये सनातने ।

न शर्वं भूतसंघं वा ददृशुर्मुनयस्तदा ॥ ३ ॥

उस समय उस रमणीय, पवित्र एवं सनातन देवगिरिपर ऋषियोंने जब दृष्टिपात किया, तब उन्हें वहाँ न तो भगवान् शंकर दिखायी दिये और न भूतोंके समुदायका ही दर्शन हुआ ॥ ३ ॥

व्यभ्रं च गगनं सद्यः क्षणेन समपद्यत ।

तीर्थयात्रां ततो विप्रा जग्मुश्चान्ये यथागतम् ॥ ४ ॥

फिर तो तत्काल एक ही क्षणमें सारा आसमान साफ हो गया । कहीं भी बादल नहीं रह गया। तब ब्राह्मणलोग वहाँसे तीर्थयात्राके लिये चल दिये और अन्य लोग भी जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये ॥ ४ ॥

तदद्भुतमचिन्त्यं च दृष्ट्वा ते विस्मिताऽभवन् ।

शङ्करस्योमया सार्धं संवादं त्वत्कथाश्रयम् ॥ ५ ॥

स भवान् पुरुषव्याघ्र ब्रह्मभूतः सनातनः ।

यदर्थमनुशिष्टाः स्मो गिरिपृष्ठे महात्मना ॥ ६ ॥

यह अद्भुत और अचिन्त्य घटना देखकर सब लोग आश्चर्यचकित हो उठे । पुरुषसिंह देवकीनन्दन! भगवान् शंकरका पार्वतीजीके साथ जो आपके सम्बन्धमें संवाद हुआ, उसे

पृष्ठ 1410

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सुनकर हम इस निश्चयपर पहुँच गये हैं कि वे ब्रह्मभूत सनातन पुरुष आप ही हैं । जिनके लिये हिमालयके शिखरपर महादेवजीने हमलोगोंको उपदेश दिया था ॥ ५-६ ॥ द्वितीयं त्वद्भुतमिदं त्वत्तेजः कृतमद्य वै ।I दृष्ट्वा च विस्मिताः कृष्ण सा च नः स्मृतिरागता ॥ ७ ॥

श्रीकृष्ण! आपके तेजसे दूसरी अद्भुत घटना आज यह घटित हुई है, जिसे देखकर हम चकित हो गये हैं और हमें पूर्वकालकी वह शंकरजीवाली बात पुनः स्मरण हो रही है ॥ ७ ॥

एतत् ते देवदेवस्य माहात्म्यं कथितं प्रभो ।

कपर्दिनो गिरीशस्य महाबाहो जनार्दन ॥ ८ ॥

प्रभो! महाबाहु जनार्दन! यह मैंने आपके समक्ष जटाजूटधारी देवाधिदेव गिरीशके माहात्म्यका वर्णन किया है ॥ ८ ॥

इत्युक्तः स तदा कृष्णस्तपोवननिवासिभिः ।

मानयामास तान् सर्वानृषीन् देवकिनन्दनः ॥ ९ ॥

तपोवन- निवासी मुनियोंके ऐसा कहनेपर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने उस समय उन सबका विशेष सत्कार किया ॥ ९ ॥

अथर्षयः सम्प्रहृष्टाः पुनस्ते कृष्णमब्रुवन् ।

पुनः पुनः दर्शयास्मान् सदैव मधुसूदन ॥ १० ॥

तदनन्तर वे महर्षि पुनः हर्षमें भरकर श्रीकृष्णसे बोले – ' मधुसूदन! आप सदा ही हमें बारंबार दर्शन देते रहें ॥ १० ॥

न हि नः सा रतिः स्वर्गे या च त्वद्दर्शने विभो ।

तदृतं च महाबाहो यदाह भगवान् भवः ॥ ११ ॥

‘ प्रभो! आपके दर्शनमें हमारा जितना अनुराग है, उतना स्वर्गमें भी नहीं है । महाबाहो! भगवान् शिवने जो कहा था, वह सर्वथा सत्य हुआ ॥ ११ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं रहस्यमरिकर्शन ।

त्वमेव ह्यर्थतत्त्वज्ञः पृष्टोऽस्मान् पृच्छसे यदा ॥ १२ ॥

तदस्माभिरिदं गुह्यं त्वत्प्रियार्थमुदाहृतम् ।

न च तेऽविदितं किंचित्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ १३ ॥

' शत्रुसूदन! यह सारा रहस्य मैंने आपसे कहा है, आप ही अर्थ-तत्त्वके ज्ञाता हैं । हमने आपसे पूछा था, परंतु आप स्वयं ही जब हमसे प्रश्न करने लगे, तब हमलोगोंने आपकी प्रसन्नताके लिये इस गोपनीय रहस्यका वर्णन किया है । तीनों लोकोंमें कोई ऐसी बात नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो ॥ १२-१३ ॥

जन्म चैव प्रसूतिश्च यच्चान्यत् कारणं विभो ।

वयं तु बहुचापल्यादशक्ता गुह्यधारणे ॥ १४ ॥