श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1411–1420

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1411–1420

पृष्ठ 1411

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‘प्रभो! आपका जो यह अवतार अर्थात् मानव - शरीरमें जन्म हुआ है तथा जो इसका गुप्त कारण है, यह सब तथा अन्य बातें आपसे छिपी नहीं हैं । हमलोग तो अपनी अत्यन्त चपलताके कारण इस गूढ़ विषयको अपने मनमें ही छिपाये रखनेमें असमर्थ हो गये ॥ १४ ॥

ततः स्थिते त्वयि विभो लघुत्वात् प्रलपामहे ।

न हि किंचित् तदाश्चर्यं यन्न वेत्ति भवानिह ॥ १५ ॥

दिवि वा भुवि वा देव सर्वं हि विदितं तव । ‘ भगवन्! इसीलिये आपके रहते हुए भी हम अपने ओछेपनके कारण प्रलाप करते हैं —छोटे मुँह बड़ी बात कर रहे हैं । देव! पृथ्वीपर या स्वर्गमें कोई भी ऐसी आश्चर्यकी बात

नहीं है, जिसे आप नहीं जानते हों । आपको सब कुछ ज्ञात है ॥ १५३ ॥

साधयाम वयं कृष्ण बुद्धिं पुष्टिमवाप्नुहि ॥ १६ ॥

‘ श्रीकृष्ण! अब आप हमें जानेकी आज्ञा दें, जिससे हम अपना कार्य साधन करें ।

आपको उत्तम बुद्धि और पुष्टि प्राप्त हो ॥ १६ ॥

पुत्रस्ते सदृशस्तात विशिष्टो वा भविष्यति ।

महाप्रभावसंयुक्तो दीप्तिकीर्तिकरः प्रभुः ॥ १७ ॥

तात! आपको आपके समान अथवा आपसे भी बढ़कर पुत्र प्राप्त हो । वह महान् प्रभावसे युक्त, दीप्तिमान्, कीर्तिका विस्तार करनेवाला और सर्वसमर्थ हो' ॥ १७ ॥

भीष्मउवाच

ततः प्रणम्य देवेशं यादवं पुरुषोत्तमम् ।

प्रदक्षिणमुपावृत्य प्रजग्मुस्ते महर्षयः ॥ १८ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर वे महर्षि उन यदुकुलरत्न देवेश्वर पुरुषोत्तमको प्रणाम और उनकी परिक्रमा करके चले गये ॥ १८ ॥

सोऽयं नारायणः श्रीमान् दीप्त्या परमया युतः ।

व्रतं यथावत् तच्चीर्त्वा द्वारकां पुनरागमत् ॥ १ ९ ॥

तत्पश्चात् परम कान्तिसे युक्त ये श्रीमान् नारायण अपने व्रतको यथावत्रूपसे पूर्ण करके पुनः द्वारकापुरीमें चले आये ॥ १ ९ ॥

पूर्णे च दशमे मासि पुत्रोऽस्य परमाद्भुतः ।

रुक्मिण्यां सम्मतो जज्ञे शूरो वंशधरः प्रभो ॥ २० ॥

प्रभो! दसवाँ मास पूर्ण होनेपर इन भगवान्‌के रुक्मिणी देवीके गर्भसे एक परम अद्भुत, मनोरम एवं शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो इनका वंश चलानेवाला है ॥ २० ॥

स कामः सर्वभूतानां सर्वभावगतो नृप ।

असुराणां सुराणां च चरत्यन्तर्गतः सदा ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1412

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नरेश्वर! जो सम्पूर्ण प्राणियोंके मानसिक संकल्पमें व्याप्त रहनेवाला है और देवताओं तथा असुरोंके भी अन्तःकरणमें सदा विचरता रहता है, वह कामदेव ही भगवान् श्रीकृष्णका वंशधर है ॥ २१ ॥

सोऽयं पुरुषशार्दूलो मेघवर्णश्चतुर्भुजः ।

संश्रितःपाण्डवान् प्रेम्णा भवन्तश्चैनमाश्रिताः ॥ २२ ॥

वे ही ये चार भुजाधारी घनश्याम पुरुषसिंह श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक तुम पाण्डवोंके आश्रित और तुमलोग भी इनके शरणागत हो ॥ २२ ॥

कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिश्चैव स्वर्गमार्गस्तथैव च ।

यत्रैष संस्थितस्तत्र देवो विष्णुस्त्रिविक्रमः ॥ २३ ॥

ये त्रिविक्रम विष्णुदेव जहाँ विद्यमान हैं, वहीं कीर्ति, लक्ष्मी, धृति तथा स्वर्गका मार्ग है ॥ २३ ॥

सेन्द्रा देवास्त्रयस्त्रिंशदेष नात्र विचारणा ।

आदिदेवो महादेवः सर्वभूतप्रतिश्रयः ॥ २४ ॥

इन्द्र आदि तैंतीस देवता इन्हींके स्वरूप हैं, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये । ये ही सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले आदिदेव महादेव हैं ॥ २४ ॥

अनादिनिधनोऽव्यक्तो महात्मा मधुसूदनः ।

अयं जातो महातेजाः सुराणामर्थसिद्धये ॥ २५ ॥

इनका न आदि है न अन्त। ये अव्यक्तस्वरूप, महातेजस्वी महात्मा मधुसूदन देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये यदुकुलमें उत्पन्न हुए हैं ॥ २५ ॥

सुदुस्तरार्थतत्त्वस्य वक्ता कर्ता च माधवः ।

तव पार्थ जयः कृत्स्नस्तव कीर्तिस्तथातुला ॥ २६ ॥

तवेयं पृथिवी देवी कृत्स्ना नारायणाश्रयात् ।

अयं नाथस्तवाचिन्त्यो यस्य नारायणो गतिः ॥ २७ ॥

ये माधव दुर्बोध तत्त्वके वक्ता और कर्ता हैं । कुन्तीनन्दन! तुम्हारी सम्पूर्ण विजय, अनुपम कीर्ति और अखिल भूमण्डलका राज्य – ये सब भगवान् नारायणका आश्रय लेनेसे ही तुम्हें प्राप्त हुए हैं । ये अचिन्त्यस्वरूप नारायण ही तुम्हारे रक्षक और परमगति हैं ॥ २६-२७ ॥

स भवांस्त्वमुपाध्वर्यू रणाग्नौ हुतवान् नृपान् ।

कृष्णस्रुवेण महता युगान्ताग्निसमेन वै ॥ २८ ॥

तुमने स्वयं होता बनकर प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी श्रीकृष्णरूपी विशाल स्रुवाके द्वारा समराग्निकी ज्वालामें सम्पूर्ण राजाओंकी आहुति दे डाली है ॥ २८ ॥

दुर्योधनश्च शोच्चोऽसौ सपुत्रभ्रातृबान्धवः ।

कृतवान् योऽबुद्धिः क्रोधाद्धरिगाण्डीविविग्रहम् ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 1413

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आज वह दुर्योधन अपने पुत्र, भाई और सम्बन्धियोंसहित शोकका विषय हो गया है; क्योंकि उस मूर्खने क्रोधके आवेशमें आकर श्रीकृष्ण और अर्जुनसे युद्ध ठाना था ॥ २ ९ ॥

दैतेया दानवेन्द्राश्च महाकाया महाबलाः ।

चक्राग्नौ क्षयमापन्ना दावाग्नौ शलभा इव ॥ ३० ॥

कितने ही विशाल शरीरवाले महाबली दैत्य और दानव दावानलमें दग्ध होनेवाले पतंगोंकी तरह श्रीकृष्णकी चक्राग्निमें स्वाहा हो चुके हैं ॥ ३० ॥

प्रतियोद्धुं न शक्यो हि मानुषैरेष संयुगे ।

विहीनैः पुरुषव्याघ्र सत्त्वशक्तिबलादिभिः ॥ ३१ ॥

पुरुषसिंह! सत्त्व ( धैर्य), शक्ति और बल आदिसे स्वभावतः हीन मनुष्य युद्धमें इन श्रीकृष्णका सामना नहीं कर सकते ॥ ३१ ॥

यो योगी युगान्ताभः सव्यसाची रणाग्रगः ।

तेजसा हतवान् सर्वं सुयोधनबलं नृप ॥ ३२ ॥

अर्जुन भी योगशक्तिसे सम्पन्न और युगान्तकालकी अग्निके समान तेजस्वी हैं । ये बायें हाथसे भी बाण चलाते हैं और रणभूमिमें सबसे आगे रहते हैं । नरेश्वर! इन्होंने अपने तेजसे दुर्योधनकी सारी सेनाका संहार कर डाला है ॥ ३२ ॥

यत् तु गोवृषभांकेन मुनिभ्यः समुदाहृतम् ।

पुराणं हिमवत्पृष्ठे तन्मे निगदतः शृणु ॥ ३३ ॥

वृषभध्वज भगवान् शंकरने हिमालयके शिखरपर मुनियोंसे जो पुरातन रहस्य बताया था, वह मेरे मुँहसे सुनो ॥ ३३ ॥

यावत् तस्य भवेत् पुष्टिस्तेजो दीप्तिः पराक्रमः ।

प्रभावः सन्नतिर्जन्म कृष्णे तन्त्रिगुणं विभो ॥ ३४ ॥

विभो! अर्जुनमें जैसी पुष्टि है, जैसा तेज, दीप्ति, पराक्रम, प्रभाव, विनय और जन्मकी उत्तमता है, वह सब कुछ श्रीकृष्णमें अर्जुनसे तिगुना है ॥ ३४ ॥

कः शक्नोत्यन्यथाकर्तुं तद् यदि स्यात् तथा शृणु ।

यत्र कृष्णो हि भगवांस्तत्र पुष्टिरनुत्तमा ॥ ३५ ॥

संसारमें कौन ऐसा है जो मेरे इस कथनको अन्यथा सिद्ध कर सके । श्रीकृष्णका जैसा प्रभाव है, उसे सुनो — जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वहाँ सर्वोत्तम पुष्टि विद्यमान है ॥ ३५ ॥

वयं त्विहाल्पमतयः परतन्त्राः सुविक्लवाः ।

ज्ञानपूर्वं प्रपन्नाः स्मो मृत्योः पन्थानमव्ययम् ॥ ३६ ॥

हम इस जगत्में मन्दबुद्धि, परतन्त्र और व्याकुलचित्त मनुष्य हैं । हमने जान - बूझकर मृत्युके अटल मार्गपर पैर रखा है ॥ ३६ ॥

भवांश्चाप्यार्जवपरः पूर्वं कृत्वा प्रतिश्रयम् ।

राजवृत्तं न लभते प्रतिज्ञापालने रतः ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 1414

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युधिष्ठिर! तुम अत्यन्त सरल हो, इसीसे तुमने पहले ही भगवान् वासुदेवकी शरण ली और अपनी प्रतिज्ञाके पालनमें तत्पर रहकर राजोचित बर्तावको तुम ग्रहण नहीं कर रहे हो ॥ ३७ ॥

अप्येवात्मवधं लोके राजंस्त्वं बहु मन्यसे ।

न हि प्रतिज्ञा या दत्ता तां प्रहातुमरिंदम ॥ ३८ ॥

राजन्! तुम इस संसारमें अपनी हत्या कर लेनेको ही अधिक महत्त्व दे रहे हो । शत्रुदमन! जो प्रतिज्ञा तुमने कर ली है, उसे मिटा देना तुम्हारे लिये उचित नहीं है ( तुमने शत्रुओंको जीतकर न्यायपूर्वक प्रजापालनका व्रत लिया है । अब शोकवश आत्महत्याका विचार मनमें लाकर तुम उस व्रतसे गिर रहे हो, यह ठीक नहीं है ) ॥ ३८ ॥

कालेनायं जनः सर्वो निहतो रणमूर्धनि ।

वयं च कालेन हताः कालो हि परमेश्वरः ॥ ३ ९ ॥

ये सब राजालोग युद्धके मुहानेपर कालके द्वारा मारे गये हैं, हम भी कालसे ही मारे गये हैं; क्योंकि काल ही परमेश्वर है ॥ ३ ९ ॥

न हि कालेन कालज्ञः स्पृष्टः शोचितुमर्हसि ।

कालो लोहितरक्ताक्षः कृष्णो दण्डी सनातनः ॥ ४० ॥

जो कालके स्वरूपको जानता है, वह कालके थपेड़े खाकर भी शोक नहीं करता ।

श्रीकृष्ण ही लाल नेत्रोंवाले दण्डधारी सनातन काल हैं ॥ ४० ॥

तस्मात् कुन्तीसुत ज्ञातीन् नेह शोचितुमर्हसि ।

व्यपेतमन्युर्नित्यं त्वं भव कौरवनन्दन ॥ ४१ ॥

माधवस्यास्य माहात्म्यं श्रुतं यत् कथितं मया ।

तदेव तावत् पर्याप्तं सज्जनस्य निदर्शनम् ॥ ४२ ॥

अतः कुन्तीनन्दन! तुम्हें अपने भाई-बन्धुओं और सगे -सम्बन्धियोंके लिये यहाँ शोक नहीं करना चाहिये । कौरव-कुलका आनन्द बढ़ानेवाले युधिष्ठिर! तुम सदा क्रोधहीन एवं शान्त रहो । मैंने इन माधव श्रीकृष्णका माहात्म्य जैसा सुना था, वैसा कह सुनाया । इनकी महिमाको समझनेके लिये इतना ही पर्याप्त है । सज्जनके लिये दिग्दर्शन मात्र उपस्थित होता है ॥ ४१-४२ ॥

व्यासस्य वचनं श्रुत्वा नारदस्य च धीमतः ।

स्वयं चैव महाराज कृष्णस्यार्हतमस्य वै ॥ ४३ ॥

प्रभावश्चर्षिपूगस्य कथितः सुमहान् मया ।

महेश्वरस्य संवादं शैलपुत्र्याश्च भारत ॥ ४४ ॥

महाराज! व्यासजी तथा बुद्धिमान् नारदजीके वचन सुनकर मैंने परम पूज्य श्रीकृष्ण तथा महर्षियोंके महान् प्रभावका वर्णन किया है। भारत! गिरिराजनन्दिनी उमा और महेश्वरका जो संवाद हुआ था, उसका भी मैंने उल्लेख किया है ॥ ४३-४४ ॥

पृष्ठ 1415

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धारयिष्यति यश्चैनं महापुरुषसम्भवम् ।

शृणुयात् कथयेद् वा यः स श्रेयो लभते परम् ॥ ४५ ॥

जो महापुरुष श्रीकृष्णके इस प्रभावको सुनेगा, कहेगा और याद रखेगा, उसको परम कल्याणकी प्राप्ति होगी ॥ ४५ ॥

भवितारश्च तस्याथ सर्वे कामा यथेप्सिताः ।

प्रेत्य स्वर्गं च लभते नरो नास्त्यत्र संशयः ॥ ४६ ॥

उसके सारे अभीष्ट मनोरथ पूर्ण होंगे और वह मनुष्य मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोक पाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४६ ॥

न्याय्यं श्रेयोऽभिकामेन प्रतिपत्तुं जनार्दनः ।

एष एवाक्षयो विप्रैः स्तुतो राजन् जनार्दनः ॥ ४७ ॥

अतः जिसे कल्याणकी इच्छा हो, उस पुरुषको जनार्दनकी शरण लेनी चाहिये । राजन्! इन अविनाशी श्रीकृष्णकी ही ब्राह्मणोंने स्तुति की है ॥ ४७ ॥

महेश्वरमुखोत्सृष्टा ये च धर्मगुणाः स्मृताः ।

ते त्वया मनसा धार्याः कुरुराज दिवानिशम् ॥ ४८ ॥

कुरुराज! भगवान् शंकरके मुखसे जो धर्म- सम्बन्धी गुण प्रतिपादित हुए हैं, उन सबको तुम्हें दिन - रात अपने हृदयमें धारण करना चाहिये ॥ ४८ ॥

एवं ते वर्तमानस्य सम्यग्दण्डधरस्य च ।

प्रजापालनदक्षस्य स्वर्गलोको भविष्यति ॥ ४ ९ ॥

ऐसा बर्ताव करते हुए यदि तुम न्यायोचित रीतिसे दण्ड धारण करके प्रजापालनमें कुशलतापूर्वक लगे रहोगे तो तुम्हें स्वर्गलोक प्राप्त होगा ॥ ४ ९ ॥

धर्मेणापि सदा राजन् प्रजा रक्षितुमर्हसि ।

यस्तस्य विपुलो दण्डः सम्यग्धर्मः स कीर्त्यते ॥ ५० ॥

राजन्! तुम धर्मपूर्वक सदा प्रजाकी रक्षा करते रहो । प्रजापालनके लिये जो दण्डका उचित उपयोग किया जाता है, वह धर्म ही कहलाता है ॥ ५० ॥

य एष कथितो राजन् मया सज्जनसंनिधौ ।

शङ्करस्योमया सार्धं संवादो धर्मसंहितः ॥ ५१ ॥

नरेश्वर! भगवान् शंकरका पार्वतीजीके साथ जो धर्मविषयक संवाद हुआ था, उसे इन सत्पुरुषोंके निकट मैंने तुम्हें सुना दिया ॥ ५१ ॥

श्रुत्वा वा श्रोतुकामो वाप्यर्चयेद् वृषभध्वजम् ।

विशुद्धेनेह भावेन य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ ५२ ॥

जो अपना कल्याण चाहता हो, वह पुरुष यह संवाद सुनकर अथवा सुननेकी कामना रखकर विशुद्धभावसे भगवान् शंकरकी पूजा करे ॥ ५२ ॥

एष तस्यानवद्यस्य नारदस्य महात्मनः ।

पृष्ठ 1416

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संदेशो देवपूजार्थं तं तथा कुरु पाण्डव ॥ ५३ ॥

पाण्डुनन्दन! उन अनिन्द्य महात्मा देवर्षि नारदजीका ही यह संदेश है कि

महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये । इसलिये तुम भी ऐसा ही करो ॥ ५३ ॥

एतदत्यद्भुतं वृत्तं पुण्ये हि भवति प्रभो ।

वासुदेवस्य कौन्तेय स्थाणोश्चैव स्वभावजम् ॥ ५४ ॥

प्रभो! कुन्तीनन्दन! भगवान् श्रीकृष्ण और महादेवजीका यह अद्भुत एवं स्वाभाविक वृत्तान्त पूर्वकालमें पुण्यमय पर्वत हिमालयपर संघटित हुआ था ॥ ५४ ॥

दशवर्षसहस्राणि बदर्यामेष शाश्वतः ।

तपश्चचार विपुलं सह गाण्डीवधन्वना ॥ ५५ ॥

इन सनातन श्रीकृष्णने गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ ( नर-नारायणरूपमें रहकर) बदरिकाश्रममें दस हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की थी ॥ ५५ ॥

त्रियुगौ पुण्डरीकाक्षौ वासुदेवधनञ्जयौ ।

विदितौ नारदादेतौ मम व्यासाच्च पार्थिव ॥ ५६ ॥

पृथ्वीनाथ! कमलनयन! श्रीकृष्ण और अर्जुन -ये दोनों सत्ययुग आदि तीनों युगोंमें प्रकट होनेके कारण त्रियुग कहलाते हैं। देवर्षि नारद तथा व्यासजीने इन दोनोंके स्वरूपका परिचय दिया था ॥ ५६ ॥

बाल एव महाबाहुश्चकार कदनं महत् ।

कंसस्य पुण्डरीकाक्षो ज्ञातित्राणार्थकारणात् ॥ ५७ ॥

महाबाहु कमलनयन श्रीकृष्णने बचपनमें ही अपने बन्धु बान्धवोंकी रक्षाके लिये कंसका बड़ा भारी संहार किया था ॥ ५७ ॥

कर्मणामस्य कौन्तेय नान्तं संख्यातुमुत्सहे ।

शाश्वतस्य पुराणस्य पुरुषस्य युधिष्ठिर ॥ ५८ ॥

कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर! इन सनातन पुराणपुरुष श्रीकृष्णके चरित्रोंकी कोई सीमा या संख्या नहीं बतायी जा सकती ॥ ५८ ॥

ध्रुवं श्रेयः परं तात भविष्यति तवोत्तमम् ।

यस्य ते पुरुषव्याघ्रः सखा चायं जनार्दनः ॥ ५ ९ ॥

तात! तुम्हारा तो अवश्य ही परम उत्तम कल्याण होगा; क्योंकि ये पुरुषसिंह जनार्दन तुम्हारे मित्र हैं ॥ ५ ९ ॥

दुर्योधनं तु शोचामि प्रेत्य लोकेऽपि दुर्मतिम् ।

यत्कृते पृथिवी सर्वा विनष्टा सहयद्विपा ॥ ६० ॥

दुर्बुद्धि दुर्योधन यद्यपि परलोकमें चला गया है, तो भी मुझे तो उसीके लिये अधिक शोक हो रहा है; क्योंकि उसीके कारण हाथी, घोड़े आदि वाहनोंसहित सारी पृथ्वीका नाश हुआ है ॥ ६० ॥

पृष्ठ 1417

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दुर्योधनापराधेन कर्णस्य शकुनेस्तथा ।

दुःशासनचतुर्थानां कुरवो निधनं गताः ॥ ६१ ॥

दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण और शकुनि - इन्हीं चारोंके अपराधसे सारे कौरव मारे गये ॥ ६१ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं सम्भाषमाणे तु गाङ्गेये पुरुषर्षभे ।

तूष्णीं बभूव कौरव्यो मध्ये तेषां महात्मनाम् ॥ ६२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! पुरुषप्रवर गंगानन्दन भीष्मजीके ऐसा कहनेपर उन महामनस्वी पुरुषोंके बीचमें बैठे हुए कुरुकुलकुमार युधिष्ठिर चुप हो गये ॥ ६२ ॥

तच्छ्रुत्वा विस्मयं जग्मुर्धृतराष्ट्रादयो नृपाः ।

सम्पूज्य मनसा कृष्णं सर्वे प्राञ्जलयोऽभवन् ॥ ६३ ॥

भीष्मजीकी बात सुनकर धृतराष्ट्र आदि राजाओंको बड़ा विस्मय हुआ और वे सभी मन- ही- मन श्रीकृष्णकी पूजा करते हुए उन्हें हाथ जोड़ने लगे ॥ ६३ ॥

ऋषयश्चापि ते सर्वे नारदप्रमुखास्तदा ।

प्रतिगृह्याभ्यनन्दन्त तद्वाक्यं प्रतिपूज्य च ॥ ६४ ॥

नारद आदि सम्पूर्ण महर्षि भी भीष्मजीके वचन सुनकर उनकी प्रशंसा करते हुए बहुत प्रसन्न हुए ॥ ६४ ॥

इत्येतदखिलं सर्वैः पाण्डवो भ्रातृभिः सह ।

श्रुतवान् सुमहाश्चर्यं पुण्यं भीष्मानुशासनम् ॥ ६५ ॥

इस प्रकार पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंके साथ यह भीष्मजीका सारा पवित्र अनुशासन सुना, जो अत्यन्त आश्चर्यजनक था ॥ ६५ ॥

युधिष्ठिरस्तु गाङ्गेयं विश्रान्तं भूरिदक्षिणम् ।

पुनरेव महाबुद्धिः पर्यपृच्छन्महीपतिः ॥ ६६ ॥

तदनन्तर बड़ी- बड़ी दक्षिणाओंका दान करनेवाले गंगानन्दन भीष्मजी जब विश्राम ले चुके, तब महाबुद्धिमान् राजा युधिष्ठिर पुनः प्रश्न करने लगे ॥ ६६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि महापुरुषप्रस्तावे अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महापुरुष श्रीकृष्णकी प्रशंसाविषयक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४८ ॥

पृष्ठ 1418

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एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्

( यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् ।

विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥

जिनके स्मरण करनेमात्रसे मनुष्य जन्म- मृत्यु -रूप संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है, सबकी उत्पत्तिके कारणभूत उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ॥ नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते । अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ) सम्पूर्ण प्राणियोंके आदिभूत, पृथ्वीको धारण करनेवाले, अनेक रूपधारी और सर्वसमर्थ भगवान् विष्णुको प्रणाम है ॥ वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः ।

युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने सम्पूर्ण विधिरूप धर्म तथा पापोंका क्षय करनेवाले धर्म- रहस्योंको सब प्रकार सुनकर शान्तनुपुत्र भीष्मसे फिर पूछा ॥ १ ॥

युधिष्ठिर उवाच

किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ।

स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ २ ॥

युधिष्ठिर बोले- दादाजी! समस्त जगत्में एक ही देव कौन है तथा इस लोकमें एक ही परम आश्रयस्थान कौन है? किस देवकी स्तुति- गुण - कीर्तन करनेसे तथा किस देवका नाना प्रकारसे बाह्य और आन्तरिक पूजन करनेसे मनुष्य कल्याणकी प्राप्ति कर सकते हैं? ॥ २ ॥

को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।

किं जपन् मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ३ ॥

आप समस्त धर्मोंमें किस धर्मको परम श्रेष्ठ मानते हैं? तथा किसका जप करनेसे जीव जन्म- मरणरूप संसार- बन्धनसे मुक्त हो जाता है? ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् ।

पृष्ठ 1419

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स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ ४ ॥

भीष्मजीने कहा — बेटा! स्थावर- जंगमरूप संसारके स्वामी, ब्रह्मादि देवोंके देव, देश-काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्न, क्षर- अक्षरसे श्रेष्ठ पुरुषोत्तमका सहस्रनामोंके द्वारा निरन्तर तत्पर रहकर गुण- संकीर्तन करनेसे पुरुष सब दुःखोंसे पार हो जाता है ॥ ४ ॥

तमेव चार्चयन् नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् ।

ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ ५ ॥

तथा उसी विनाशरहित पुरुषका सब समय भक्तिसे युक्त होकर पूजन करनेसे, उसीका ध्यान करनेसे तथा स्तवन एवं नमस्कार करनेसे पूजा करनेवाला सब दुःखोंसे छूट जाता है ॥ ५ ॥

अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् ।

लोकाध्यक्षं स्तुवन् नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ ६ ॥

उस जन्म- मृत्यु आदि छः भाव - विकारोंसे रहित, सर्वव्यापक, सम्पूर्ण लोकोंके महेश्वर, लोकाध्यक्ष देवकी निरन्तर स्तुति करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे पार हो जाता है ॥ ६ ॥

ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् ।

लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ ७ ॥

ब्राह्मणोंके हितकारी, सब धर्मोंको जाननेवाले, प्राणियोंकी कीर्तिको बढ़ानेवाले, सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी, समस्त भूतोंके उत्पत्ति-स्थान एवं संसारके कारणरूप परमेश्वरका स्तवन करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे छूट जाता है ॥ ७ ॥

एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः ।

यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ ८ ॥

सम्पूर्ण धर्मोंमें मैं इसी धर्मको सबसे बड़ा मानता हूँ कि मनुष्य कमलनयन भगवान् वासुदेवका भक्तिपूर्वक गुण- संकीर्तनरूप स्तुतियोंसे सदा अर्चन करे ॥ ८ ॥

परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।

परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ ९ ॥

पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।

दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १० ॥

यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।

यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ ११ ॥

तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।

विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥ १२ ॥

पृथ्वीपते! जो परम महान् तेजःस्वरूप है, जो परम महान् तपःस्वरूप है, जो परम महान् ब्रह्म है, जो सबका परम आश्रय है, जो पवित्र करनेवाले तीर्थादिकोंमें परम पवित्र है, मंगलोंका भी मंगल है, देवोंका भी देव है तथा जो भूतप्राणियोंका अविनाशी पिता है,

पृष्ठ 1420

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कल्पके आदिमें जिससे सम्पूर्ण भूत उत्पन्न होते हैं और फिर युगका क्षय होनेपर महाप्रलयमें जिसमें वे विलीन हो जाते हैं, उस लोकप्रधान, संसारके स्वामी, भगवान् विष्णुके हजार नामोंको मुझसे सुनो, जो पाप और संसार- भयको दूर करनेवाले हैं ॥ ९- १२ ॥

यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।

ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १३ ॥

महान् आत्मस्वरूप विष्णुके जो नाम गुणके कारण प्रवृत्त हुए हैं, उनमेंसे जो - जो प्रसिद्ध हैं और मन्त्रद्रष्टा मुनियोंद्वारा जो सर्वत्र गाये गये हैं, उन समस्त नामोंको पुरुषार्थ-सिद्धिके लिये वर्णन करता हूँ ॥ १३ ॥

ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।

भूतकृद् भूतभूद् भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १४ ॥

ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, १ विश्वम्- विराट्स्वरूप, २ विष्णुः सर्वव्यापी, ३ वषट्कारः-जिनके उद्देश्यसे यज्ञमें वषट् क्रिया की जाती है, ऐसे यज्ञस्वरूप, ४ भूतभव्यभवत्प्रभुः- भूत, भविष्यत् और वर्तमानके स्वामी, ५ भूतकृत्- रजोगुणको स्वीकार करके ब्रह्मारूपसे सम्पूर्ण भूतोंकी रचना करनेवाले, ६ भूतभृत-सत्त्वगुणको स्वीकार करके सम्पूर्ण भूतोंका पालन - पोषण करनेवाले, ७ भावः- नित्यस्वरूप होते हुए भी स्वतः उत्पन्न होनेवाले, भूतात्मा-सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा, ९ भूतभावनः- भूतोंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाले ॥ १४ ॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।

अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ १५ ॥

१० पूतात्मा-पवित्रात्मा, ११ परमात्मा- परमश्रेष्ठ नित्यशुद्ध-बुद्ध -मुक्तस्वभाव, १२ मुक्तानां परमा गतिः -मुक्त पुरुषोंकी सर्वश्रेष्ठ गतिस्वरूप, १३ अव्ययः - कभी विनाशको प्राप्त न होनेवाले, १४ पुरुषः-पुर अर्थात शरीरमें शयन करनेवाले, १५ साक्षी - बिना किसी व्यवधानके सब कुछ देखनेवाले, १६ क्षेत्रज्ञः - क्षेत्र अर्थात् समस्त प्रकृतिरूप शरीरको पूर्णतया जाननेवाले, १७ अक्षरः- कभी क्षीण न होनेवाले ॥ १५ ॥

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।

नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ १६ ॥

१८ योगः- मनसहित सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियोंके निरोधरूप योगसे प्राप्त होनेवाले, १ ९ योगविदां नेता - योगको जाननेवाले भक्तोंके स्वामी २० प्रधानपुरुषेश्वरः प्रकृति और पुरुषके स्वामी, २१ नारसिंहवपुः- मनुष्य और सिंह दोनोंके - जैसा शरीर धारण करनेवाले नरसिंहरूप, २२ श्रीमान्- वक्षःस्थलमें सदा श्रीको धारण करनेवाले, २३ केशवः- ( क ) ब्रह्मा, ( अ ) विष्णु और ( ईश ) महादेव – इस प्रकार त्रिमूर्तिस्वरूप, २४ पुरुषोत्तमः - क्षर और अक्षर - इन दोनोंसे सर्वथा उत्तम ॥ १६ ॥