06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1571–1580
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1571–1580
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द्वितीयोऽध्यायः श्रीकृष्ण और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु राज्ञा स धृतराष्ट्रेण धीमता ।
तूष्णीं बभूव मेधावी तमुवाचाथ केशवः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर भी
मेधावी युधिष्ठिर चुप ही रहे । तब भगवान् श्रीकृष्णने कहा— ॥ १ ॥
अतीव मनसा शोकः क्रियमाणो जनाधिप ।
संतापयति चैतस्य पूर्वप्रेतान् पितामहान् ॥ २ ॥
'जनेश्वर! यदि मनुष्य मरे हुए प्राणीके लिये अपने मनमें अधिक शोक करता है तो उसका वह शोक उसके पहलेके मरे हुए पितामहोंको भारी संतापमें डाल देता है ॥ २ ॥
यजस्व विविधैर्यज्ञैर्बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः ।
देवांस्तर्पय सोमेन स्वधया च पितॄनपि ॥ ३ ॥
' इसलिये आप बड़ी - बड़ी दक्षिणावाले नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान कीजिये और सोमरसके द्वारा देवताओं तथा स्वधाद्वारा पितरोंको तृप्त कीजिये ॥ ३ ॥
अतिथीनन्नपानेन कामैरन्यैरकिंचनान् ।
विदितं वेदितव्यं ते कर्तव्यमपि ते कृतम् ॥ ४ ॥
‘ अतिथियोंको अन्न और जल देकर तथा अकिंचन मनुष्योंको दूसरी- दूसरी मनचाही वस्तुएँ देकर संतुष्ट कीजिये । आपने जाननेयोग्य तत्त्वको जान लिया है । करनेयोग्य कार्यको भी पूर्ण कर लिया है ॥ ४ ॥
श्रुताश्च राजधर्मास्ते भीष्माद् भागीरथीसुतात् ।
कृष्णद्वैपायनाच्चैव नारदाद् विदुरात् तथा ॥ ५ ॥
‘ आपने गंगानन्दन भीष्मसे राजधर्मोंका वर्णन सुना है । श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद और विदुरजीसे कर्तव्यका उपदेश श्रवण किया है ॥ ५ ॥
मामर्हसि मूढानां वृत्तिं त्वमनुवर्तितुम् ।
पितृपैतामहं वृत्तमास्थाय धुरमुद्वह ॥ ६ ॥
अतः आपको मूढ़ पुरुषोंके इस बर्तावका अनुसरण नहीं करना चाहिये । पिता-पितामहोंके बर्तावका आश्रय लेकर राजकार्यका भार सँभालिये ॥ ६ ॥
युक्तं हि यशसा क्षात्रं स्वर्गं प्राप्तुमसंशयम् ।
न हि कश्चिद्धि शूराणां निहतोऽत्र पराङ्मुखः ॥ ७ ॥
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‘ इस युद्धमें वीरोचित सुयशसे युक्त हुआ सारा क्षत्रियसमुदाय स्वर्गलोक पानेका अधिकारी है, क्योंकि इन शूरवीरोंमेंसे कोई भी युद्धमें पीठ दिखाकर नहीं मारा गया है ॥ ७ ॥
त्यज शोकं महाराज भवितव्यं हि तत्तथा ।
न शक्यास्ते पुनर्द्रष्टुं त्वया येऽस्मिन् रणे हताः ॥ ८ ॥
‘ महाराज! शोक त्याग दीजिये, क्योंकि जो कुछ हुआ है, वैसी ही होनहार थी । इस युद्धमें जो लोग मारे गये हैं, उन्हें आप फिर नहीं देख सकते ' ॥ ८ ॥
एतावदुक्त्वा गोविन्दो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
विरराम महातेजास्तमुवाच युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
धर्मराज युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्ण चुप हो गये । तब युधिष्ठिरने उनसे कहा ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
गोविन्द मयि या प्रीतिस्तव सा विदिता मम ।
सौहृदेन तथा प्रेम्णा सदा मय्यनुकम्पसे ॥ १० ॥
युधिष्ठिर बोले — गोविन्द! आपका जो मेरे ऊपर प्रेम है, वह मुझे अच्छी तरह ज्ञात है । आप स्नेह और सौहार्दवश सदा ही मुझपर कृपा करते रहते हैं ॥ १० ॥
प्रियं तु मे स्यात् सुमहत्कृतं चक्रगदाधर ।
श्रीमन् प्रीतेन मनसा सर्वं यादवनन्दन ॥ ११ ॥
यदि मामनुजानीयाद् भवान् गन्तुं तपोवनम् । ( कृतकृत्यो भविष्यामि इति मे निश्चिता मतिः । ) चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीमान् यादवनन्दन! यदि आप प्रसन्न मनसे मुझे तपोवनमें जानेकी आज्ञा दे दें तो मेरा सारा और महान् प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय । उस दशामें मैं कृतकार्य हो जाऊँगा, यह मेरा निश्चित विचार है ॥ ११३ ॥
न हि शान्तिं प्रपश्यामि पातयित्वा पितामहम् ॥ १२ ॥
(नृशंसः पुरुषव्याघ्रं गुरुं वीर्यबलान्वितम् । ) कर्णं च पुरुषव्याघ्रं संग्रामेष्वपलायिनम् । मैं क्रूरतापूर्वक पितामह भीष्मको, बल- पराक्रमसे सम्पन्न पुरुषसिंह गुरुदेव द्रोणाचार्यको और युद्धसे कभी पीठ न दिखानेवाले नरश्रेष्ठ कर्णको मरवाकर कभी शान्ति नहीं पा सकता ॥ १२३ ॥
कर्मणा येन मुच्येयमस्मात् क्रूरादरिंदम ॥ १३ ॥
कर्मणा तद् विधत्स्वेह येन शुध्यति मे मनः ।
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शत्रुदमन श्रीकृष्ण! अब जिस कर्मके द्वारा मुझे अपने इस क्रूरतापूर्ण पापसे छुटकारा मिले तथा जिससे मेरा चित्त शुद्ध हो, वही कीजिये ॥ १३३ ॥
तमेवं वादिनं पार्थं व्यासः प्रोवाच धर्मवित् ॥ १४ ॥
सान्त्वयन् सुमहातेजाः शुभं वचनमर्थवत् ।
अकृता ते मतिस्तात पुनर्बाल्येन मुह्यसे ॥ १५ ॥
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको ऐसी बातें करते देख धर्मके तत्त्वको जाननेवाले महातेजस्वी व्यासजीने उन्हें सान्त्वना देते हुए यह शुभ एवं सार्थक वचन कहा– ' तात! तुम्हारी बुद्धि अभी शुद्ध नहीं हुई है। तुम पुनः बालकोचित अविवेकके कारण मोहमें पड़ गये ॥ १४-१५ । |
किमाकारा वयं तात प्रलपामो मुहुर्मुहुः ।
विदिताः क्षत्रधर्मास्ते येषां युद्धेन जीविका ॥ १६ ॥
‘ तात! अब हमलोग किस लायक रह गये । हम बारंबार जो कुछ कहते या समझाते हैं वह सब व्यर्थका प्रलाप सिद्ध हो रहा है । युद्धसे ही जिनकी जीविका चलती है, उन क्षत्रियोंके धर्म भलीभाँति तुम्हें विदित हैं ॥ १६ ॥
तथाप्रवृत्तो नृपतिर्नाधिबन्धेन युज्यसे ।
मोक्षधर्माश्च निखिला याथातथ्येन ते श्रुताः ॥ १७ ॥
‘ उनके अनुसार बर्ताव करनेवाला राजा कभी मानसिक चिन्तासे ग्रस्त नहीं होता । तुमने सम्पूर्ण मोक्षधर्मोंको भी यथार्थरूपसे सुना है ॥ १७ ॥
( यथा वै कामजां मायां परित्यक्तुं त्वमर्हसि । तथा तु कुर्वन् नृपतिर्नानुबन्धेन युज्यते ॥ ) ' तुम्हें कामजनित मायाका जिस प्रकार परित्याग करना चाहिये, उस प्रकार उसका त्याग करनेवाला नरेश कभी बन्धनमें नहीं पड़ता ॥
असकृच्चापि संदेहाश्छिन्नास्ते कामजा मया ।
अश्रद्दधानो दुर्मेधा लुप्तस्मृतिरसि ध्रुवम् ॥ १८ ॥
' मैंने अनेक बार तुम्हारे कामजनित संदेहोंका निवारण किया है; परंतु तुम दुर्बुद्धि होनेके कारण उसपर श्रद्धा नहीं करते। निश्चय इसीलिये तुम्हारी स्मरणशक्ति लुप्त हो गयी है ॥ १८ ॥
मैवं भव न ते युक्तमिदमज्ञानमीदृशम् ।
प्रायश्चित्तानि सर्वाणि विदितानि च तेऽनघ ।
राजधर्माश्च ते सर्वे दानधर्माश्च ते श्रुताः ॥ १ ९ ॥
' तुम ऐसे न बनो, तुम्हारे लिये इस तरह अज्ञानका अवलम्बन उचित नहीं है । निष्पाप नरेश! तुम्हें सब प्रकारके प्रायश्चित्तोंका भी ज्ञान है । तुमने सब प्रकारके राजधर्म और दानधर्म भी सुने हैं ॥ १ ९ ॥
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स कथं सर्वधर्मज्ञः सर्वागमविशारदः ।
परिमुह्यसि भूयस्त्वमज्ञानादिव भारत ॥ २० ॥
‘ भारत! इस प्रकार सब धर्मोंके ज्ञाता और सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान् होकर भी तुम अज्ञानवश बारंबार मोहमें क्यों पड़ते हो? ' ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २२ श्लोक हैं ) Fard
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तृतीयोऽध्यायः व्यासजीका युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञके लिये धनकी प्राप्तिका उपाय बताते हुए संवर्त और मरुत्तका प्रसंग उपस्थित करना व्यास उवाच
युधिष्ठिर तव प्रज्ञा न सम्यगिति मे मतिः ।
न हि कश्चित्स्वयं मर्त्यः स्ववशः कुरुते क्रियाम् ॥ १ ॥
व्यासजीने कहा — युधिष्ठिर! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारी बुद्धि ठीक नहीं है । कोई भी मनुष्य स्वाधीन होकर अपने - आप कोई काम नहीं करता है ॥ १ ॥
ईश्वरेण च युक्तोऽयं साध्वसाधु च मानवः ।
करोति पुरुषः कर्म तत्र का परिदेवना ॥ २ ॥
यह मनुष्य अथवा पुरुषसमुदाय ईश्वरसे प्रेरित होकर ही भले - बुरे काम करता है । * अतः इसके लिये शोक करनेकी क्या आवश्यकता है? ॥ २ ॥
आत्मानं मन्यसे चाथ पापकर्माणमन्ततः ।
शृणु तत्र यथापापमपकृष्येत भारत ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! यदि तुम अन्ततोगत्वा अपने- आपको ही युद्धरूपी पापकर्मका प्रधान हेतु मानते हो तो वह पाप जिस प्रकार नष्ट हो सकता है, वह उपाय बताता हूँ, सुनो ॥ ३ ॥
तपोभिः क्रतुभिश्चैव दानेन च युधिष्ठिर ।
तरन्ति नित्यं पुरुषा ये स्म पापानि कुर्वते ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर! जो लोग पाप करते हैं, वे तप, यज्ञ और दानके द्वारा ही सदा अपना उद्धार करते हैं ॥ ४ ॥
यज्ञेन तपसा चैव दानेन च नराधिप ।
पूयन्ते नरशार्दूल नरा दुष्कृतकारिणः ॥ ५ ॥
नरेश्वर! पुरुषसिंह! पापाचारी मनुष्य यज्ञ, दान और तपस्यासे ही पवित्र होते हैं ॥ ५ ॥
असुराश्च सुराश्चैव पुण्यहेतोर्मखक्रियाम् ।
प्रयतन्ते महात्मानस्तस्माद् यज्ञाः परायणम् ॥ ६ ॥
महामना देवता और दैत्य पुण्यके लिये यज्ञ करनेका ही प्रयत्न करते हैं, अतः यज्ञ परम आश्रय है ॥ ६ ॥
यज्ञैरेव महात्मानो बभूवुरधिकाः सुराः ।
ततो देवाः क्रियावन्तो दानवानभ्यधर्षयन् ॥ ७ ॥
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यज्ञोंद्वारा ही महामनस्वी देवताओंका महत्त्व अधिक हुआ है और यज्ञोंसे ही क्रियानिष्ठ देवताओंने दानवोंको परास्त किया है ॥ ७ ॥
राजसूयाश्वमेधौ च सर्वमेधं च भारत ।
नरमेधं च नृपते त्वमाहर युधिष्ठिर ॥ ८ ॥
भरतवंशी नरेश युधिष्ठिर! तुम राजसूय, अश्वमेध, सर्वमेध और नरमेध यज्ञ करो ॥ ८ ॥
यजस्व वाजिमेधेन विधिवद् दक्षिणावता ।
बहुकामान्नवित्तेन रामो दाशरथिर्यथा ॥ ९ ॥
विधिवत् दक्षिणा देकर बहुत - से मनोवांछित पदार्थ, अन्न और धनसे सम्पन्न अश्वमेध यज्ञके द्वारा दशरथनन्दन श्रीरामकी भाँति यजन करो ॥ ९ ॥
यथा च भरतो राजा दौष्यन्तिः पृथिवीपतिः ।
शाकुन्तलो महावीर्यस्तव पूर्वपितामहः ॥ १० ॥
तथा तुम्हारे पूर्वपितामह महापराक्रमी दुष्यन्तकुमार शकुन्तलानन्दन पृथ्वीपति राजा भरतने जैसे यज्ञ किया था, उसी प्रकार तुम भी करो ॥ १० ॥
युधिष्ठिरउवाच
असंशयं वाजिमेधः पावयेत् पृथिवीमपि ।
अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तं त्वं श्रोतुमिहार्हसि ॥ ११ ॥
युधिष्ठिरने कहा — विप्रवर! इसमें संदेह नहीं कि अश्वमेध यज्ञ सारी पृथ्वीको भी पवित्र कर सकता है, किंतु इसके विषयमें मेरा एक अभिप्राय है, उसे आप यहाँ सुन लें ॥ ११ ॥
इमं ज्ञातिवधं कृत्वा सुमहान्तं द्विजोत्तम ।
दानमल्पं न शक्नोमि दातुं वित्तं च नास्ति मे ॥ १२ ॥
द्विजश्रेष्ठ! अपने जाति- भाइयोंका यह महान् संहार करके अब मुझमें थोड़ा - सा भी दान देनेकी शक्ति नहीं रह गयी है; क्योंकि मेरे पास धन नहीं है ॥ १२ ॥
न तु बालानिमान् दीनानुत्सहे वसु याचितुम् ।
तथैवार्द्रव्रणान् कृच्छ्रे वर्तमानान् नृपात्मजान् ॥ १३ ॥
यहाँ जो राजकुमार उपस्थित हैं, ये सब- के - सब बालक और दीन हैं, महान् संकटमें पड़े हुए हैं और इनके शरीरका घाव भी अभी सूखने नहीं पाया है; अतः इन सबसे मैं धनकी याचना नहीं कर सकता ॥ १३ ॥
स्वयं विनाश्य पृथिवीं यज्ञार्थं द्विजसत्तम ।
करमाहारयिष्यामि कथं शोकपरायणः ॥ १४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! स्वयं ही सारी पृथ्वीका विनाश कराकर शोकमग्न हुआ मैं इनसे यज्ञके लिये कर किस तरह वसूल करूँगा ॥ १४ ॥
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दुर्योधनापराधेन वसुधा वसुधाधिपाः ।
प्रणष्टा योजयित्वास्मानकीर्त्या मुनिसत्तम ॥ १५ ॥
मुनिश्रेष्ठ! दुर्योधनके अपराधसे यह पृथ्वी और अधिकांश राजा हमलोगोंके माथे अपयशका टीका लगाकर नष्ट हो गये ॥ १५ ॥
दुर्योधनेन पृथिवी क्षयिता वित्तकारणात् ।
कोशश्चापि विशीर्णोऽसौ धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥ १६ ॥
दुर्योधनने धनके लोभसे समस्त भूमण्डलका संहार कराया; किन्तु धन मिलना तो दूर रहा, उस दुर्बुद्धिका अपना खजाना भी खाली हो गया ॥ १६ ॥
पृथिवी दक्षिणा चात्र विधिः प्रथमकल्पितः ।
विद्वद्भिः परिदृष्टोऽयं शिष्टो विधिविपर्ययः ॥ १७ ॥
अश्वमेध यज्ञमें समूची पृथ्वीकी दक्षिणा देनी चाहिये । यही विद्वानोंने मुख्य कल्प माना है । इसके सिवा जो कुछ किया जाता है, वह विधिके विपरीत है ॥ १७ ॥
न च प्रतिनिधिं कर्तुं चिकीर्षामि तपोधन ।
अत्र मे भगवन् सम्यक् साचिव्यं कर्तुमर्हसि ॥ १८ ॥
तपोधन! मुख्य वस्तुके अभावमें जो दूसरी कोई वस्तु दी जाती है, वह प्रतिनिधि दक्षिणा कहलाती है; किंतु प्रतिनिधि दक्षिणा देनेकी मेरी इच्छा नहीं होती; अतः भगवन्! इस विषयमें आप मुझे उचित सलाह देनेकी कृपा करें ॥ १८ ॥
एवमुक्तस्तु पार्थेन कृष्णद्वैपायनस्तदा ।
मुहूर्तमनुसंचिन्त्य धर्मराजानमब्रवीत् ॥ १ ९ ॥
कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने दो घड़ीतक सोच - विचारकर धर्मराजसे कहा- ॥ १ ९ ॥
कोशश्चापि विशीर्णोऽयं परिपूर्णो भविष्यति ।
विद्यते द्रविणं पार्थ गिरौ हिमवति स्थितम् ॥ २० ॥
उत्सृष्टं ब्राह्मणैर्यज्ञे मरुत्तस्य महात्मनः ।
तदानयस्व कौन्तेय पर्याप्तं तद् भविष्यति ॥ २१ ॥
‘ पार्थ! यद्यपि तुम्हारा खजाना इस समय खाली हो गया है तथापि वह बहुत शीघ्र भर जायगा । हिमालय पर्वतपर महात्मा मरुत्तके यज्ञमें ब्राह्मणोंने जो धन छोड़ दिया था, वह वहीं पड़ा हुआ है । कुन्तीकुमार! उसे ले आओ । वह तुम्हारे लिये पर्याप्त होगा ' ॥ २०-२१ ॥ युधिष्ठिर उवाच
कथं यज्ञे मरुत्तस्य द्रविणं तत् समाचितम् ।
कस्मिंश्च काले स नृपो बभूव वदतां वर ॥ २२ ॥
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युधिष्ठिरने पूछा — वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! मरुत्तके यज्ञमें इतने धनका संग्रह किस प्रकार किया गया था तथा वे महाराज मरुत्त किस समय इस पृथ्वीपर प्रकट हुए थे? ॥ २२ ॥
व्यास उवाच
यदि शुश्रूषसे पार्थ शृणु कारन्धमं नृपम् ।
यस्मिन् काले महीवीर्यः स राजासीन्महाधनः ॥ २३ ॥
व्यासजीने कहा — पार्थ! यदि तुम सुनना चाहते हो तो करन्धमके पौत्र मरुत्तका वृत्तान्त सुनो । वे महाधनी और महापराक्रमी राजा किस कालमें इस पृथ्वीपर प्रकट हुए थे, यह बता रहा हूँ ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
*- यह कथन युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये गौणरूपमें इस दृष्टिसे है कि मरनेवालोंकी मृत्यु उनके प्रारब्ध - कर्मानुसार अवश्यम्भावी थी; अतः यह जो कुछ हुआ है, ईश्वर प्रेरणाके ही अनुसार हुआ है ।
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चतुर्थोऽध्यायः मरुत्तके पूर्वजोंका परिचय देते हुए व्यासजीके द्वारा उनके गुण, प्रभाव एवं यज्ञका दिग्दर्शन युधिष्ठिर उवाच
शुश्रूषे तस्य धर्मज्ञ राजर्षेः परिकीर्तनम् ।
द्वैपायन मरुत्तस्य कथां प्रब्रूहि मेऽनघ ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — धर्मके ज्ञाता, निष्पाप महर्षि द्वैपायन! मैं राजर्षि मरुत्तकी कथा
और उनके गुणोंका कीर्तन सुनना चाहता हूँ । कृपया मुझसे कहिये ॥ १ ॥
व्यास उवाच
आसीत् कृतयुगे तात मनुर्दण्डधरः प्रभुः ।
तस्य पुत्रो महाबाहुः प्रसन्धिरिति विश्रुतः ॥ २ ॥
व्यासजीने कहा — तात! सत्ययुगमें राजदण्ड धारण करनेवाले शक्तिशाली वैवस्वत
मनु एक प्रसिद्ध राजा थे । उनके पुत्र महाबाहु प्रसन्धिके नामसे विख्यात थे ॥ २ ॥
प्रसन्धेरभवत् पुत्रः क्षुप इत्यभिविश्रुतः ।
क्षुपस्य पुत्र इक्ष्वाकुर्महीपालोऽभवत् प्रभुः ॥ ३ ॥
प्रसन्धिके पुत्र क्षुप और क्षुपके पुत्र शक्तिशाली महाराज इक्ष्वाकु हुए ॥ ३ ॥
तस्य पुत्रशतं राजन्नासीत् परमधार्मिकम् ।
तांस्तु सर्वान् महीपालानिक्ष्वाकुरकरोत् प्रभुः ॥ ४ ॥
राजन्! इक्ष्वाकुके सौ पुत्र हुए, जो बड़े धार्मिक थे । प्रभावशाली इक्ष्वाकुने उन सभी पुत्रोंको इस पृथ्वीका पालक बना दिया ॥ ४ ॥
तेषां ज्येष्ठस्तु विंशोऽभूत् प्रतिमानं धनुष्मताम् ।
विंशस्य पुत्रः कल्याणो विविंशो नाम भारत ॥ ५ ॥
उनमें सबसे ज्येष्ठ पुत्रका नाम था विंश, जो धनुर्धर वीरोंका आदर्श था । भारत! विंशके कल्याणमय पुत्रका नाम विविंश हुआ ॥ ५ ॥
विविंशस्य सुता राजन् बभूवुर्दश पञ्च च ।
सर्वे धनुषि विक्रान्ता ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ॥ ६ ॥
दानधर्मरताः शान्ताः सततं प्रियवादिनः ।
तेषां ज्येष्ठः खनीनेत्रः स तान् सर्वानपीडयत्I ॥ ७ ॥
राजन्! विविंशके पन्द्रह पुत्र हुए । वे सब- के - सब धनुर्विद्यामें पराक्रमी, ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, दान- धर्मपरायण, शान्त और सर्वदा मधुर भाषण करनेवाले थे । इन सबमें जो
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ज्येष्ठ था, उसका नाम खनीनेत्र था । वह अपने उन सभी छोटे भाइयोंको बहुत कष्ट देता था ॥ ६-७ ॥
खनीनेत्रस्तु विक्रान्तो जित्वा राज्यमकण्टकम् ।
नाशकद् रक्षितुं राज्यं नान्वरज्यन्त तं प्रजाः ॥ ८ ॥
खनीनेत्र पराक्रमी होनेके कारण निष्कण्टक राज्यको जीतकर भी उसकी रक्षा न कर सका; क्योंकि प्रजाका उसमें अनुराग न था ॥ ८ ॥
तमपास्य च तद्राज्ये तस्य पुत्रं सुवर्चसम् ।
अभ्यषिञ्चन्त राजेन्द्र मुदिता ह्यभवंस्तदा ॥ ९ ॥
राजेन्द्र! उसे राज्यसे हटाकर प्रजाने उसीके पुत्र सुवर्चाको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया । उस समय प्रजावर्गको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ९ ॥
स पितुर्विक्रियां दृष्ट्वा राज्यान्निरसनं च तत् ।
नियतो वर्तयामास प्रजाहितचिकीर्षया ॥ १० ॥
सुवर्चा अपने पिताकी वह दुर्दशा, वह राज्यसे निष्कासन देखकर सावधान हो नियमपूर्वक प्रजाके हितकी इच्छासे सबके साथ उत्तम बर्ताव करने लगे ॥ १० ॥
ब्रह्मण्यः सत्यवादी च शुचिः शमदमान्वितः ।
प्रजास्तं चान्वरज्यन्त धर्मनित्यं मनस्विनम् ॥ ११ ॥
वे ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति रखते, सत्य बोलते, बाहर- भीतरसे पवित्र रहते और मन तथा इन्द्रियोंको अपने वशमें रखते थे । सदा धर्ममें लगे रहनेवाले उन मनस्वी नरेशपर प्रजाजनोंका विशेष अनुराग था ॥ ११ ॥
तस्य धर्मप्रवृत्तस्य व्यशीर्यत् कोशवाहनम् ।
तं क्षीणकोशं सामन्ताः समन्तात् पर्यपीडयन् ॥ १२ ॥
किंतु केवल धर्ममें ही प्रवृत्त रहनेके कारण कुछ ही दिनोंमें राजाका खजाना खाली हो गया और उनके वाहन आदि भी नष्ट हो गये । उनका खजाना खाली हो गया, यह जानकर सामन्त नरेश चारों ओरसे धावा करके उन्हें पीड़ा देने लगे ॥ १२ ॥
स पीड्यमानो बहुभिः क्षीणकोशाश्ववाहनः ।
आर्तिमार्च्छत् परां राजा सह भृत्यैः पुरेण च ॥ १३ ॥
उनका कोष और घोड़े आदि वाहन तो नष्ट हो ही गये थे । बहुसंख्यक शत्रुओंने एक साथ धावा करके उन्हें सताना आरम्भ कर दिया । इससे राजा सुवर्चा अपने सेवकों और पुरवासियोंसहित भारी संकटमें पड़ गये ॥ १३ ॥
न चैनमभिहन्तुं ते शक्नुवन्ति बलक्षये ।
सम्यग्वृत्तो हि राजा स धर्मनित्यो युधिष्ठिर ॥ १४ ॥
युधिष्ठिर! सेना और खजाना नष्ट हो जानेपर भी वे आक्रमणकारी शत्रु सुवर्चाका वध न कर सके; क्योंकि वे राजा नित्यधर्मपरायण और सदाचारी थे ॥ १४ ॥