श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1561–1570
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1561–1570
पृष्ठ 1561
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जगाम भित्त्वा मूर्धानं दिवमभ्युत्पपात ह । भीष्मजीने अपने देहके सभी द्वारोंको बंद करके प्राणोंको सब ओरसे रोक लिया था; इसलिये वह उनका मस्तक ( ब्रह्मरन्ध्र ) फोड़कर आकाशमें चला गया ॥ ६३ ॥
देवदुन्दुभिनादश्च पुष्पवर्षैः सहाभवत् ॥ ७ ॥
सिद्धा ब्रह्मर्षयश्चैव साधु साध्विति हर्षिताः । उस समय देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और साथ ही दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होने लगी । सिद्धों तथा ब्रह्मर्षियोंको बड़ा हर्ष हुआ । वे भीष्मजीको साधुवाद देने लगे ॥ ७३ ॥
महोल्केव च भीष्मस्य मूर्धदेशाज्जनाधिप ॥ ८ ॥
निःसृत्याकाशमाविश्य क्षणेनान्तरधीयत । जनेश्वर! भीष्मजीका प्राण उनके ब्रह्मरन्ध्रसे निकलकर बड़ी भारी उल्काकी भाँति आकाशमें उड़ा और क्षणभरमें अन्तर्धान हो गया ॥ ८३ ॥
एवं स राजशार्दूल नृपः शान्तनवस्तदा ॥ ९ ॥
समयुज्यत कालेन भरतानां कुलोद्वहः । नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार भरतवंशका भार वहन करनेवाले शान्तनुनन्दन राजा भीष्म कालके अधीन हुए ॥ ९ ३ ॥ ततस्त्वादाय दारूणि गन्धांश्च विविधान् बहून् ॥ १० ॥
चितां चक्रुर्महात्मानः पाण्डवा विदुरस्तथा ।
युयुत्सुश्चापि कौरव्य प्रेक्षकास्त्वितरेऽभवन् ॥ ११ ॥
कुरुनन्दन! तदनन्तर बहुत - से काष्ठ और नाना प्रकारके सुगन्धित द्रव्य लेकर महात्मा पाण्डव, विदुर और युयुत्सुने चिता तैयार की और शेष सब लोग अलग खड़े होकर देखते रहे ॥ १०-११ ॥
युधिष्ठिरश्च गाङ्गेयं विदुरश्च महामतिः ।
छादयामासतुरुभौ क्षौमैर्माल्यैश्च कौरवम् ॥ १२ ॥
राजा युधिष्ठिर और परम बुद्धिमान् विदुर इन दोनोंने रेशमी वस्त्रों और मालाओंसे कुरुनन्दन गंगापुत्र भीष्मको आच्छादित किया और चितापर सुलाया ॥ १२ ॥
धारयामास तस्याथ युयुत्सुश्छत्रमुत्तमम् ।
चामरव्यजने शुभ्रे भीमसेनार्जुनावुभौ ॥ १३ ॥
उस समय युयुत्सुने उनके ऊपर उत्तम छत्र लगाया और भीमसेन तथा अर्जुन श्वेत चँवर एवं व्यजन डुलाने लगे ॥ १३ ॥
उष्णीषे परिगृह्णीतां माद्रीपुत्रावुभौ तथा ।
स्त्रियः कौरवनाथस्य भीष्मं कुरुकुलोद्वहम् ॥ १४ ॥
तालवृन्तान्युपादाय पर्यवीजन्त सर्वशः ।
पृष्ठ 1562
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
माद्रीकुमार नकुल और सहदेवने पगड़ी हाथमें लेकर भीष्मजीके मस्तकपर रखी । कौरवराजके रनिवासकी स्त्रियाँ ताड़के पंखे हाथमें लेकर कुरुकुलधुरन्धर भीष्मजीके शवको सब ओरसे हवा करने लगीं ॥ १४३ ॥
ततोऽस्य विधिवच्चक्रुः पितृमेधं महात्मनः ॥ १५ ॥
यजनं बहुशश्चाग्नौ जगुः सामानि सामगाः ।
ततश्चन्दनकाष्ठैश्च तथा कालीयकैरपि ॥ १६ ॥
कालागुरुप्रभृतिभिर्गन्धैश्चोच्चावचैस्तथा ।
समवच्छाद्य गाङ्गेयं सम्प्रज्वाल्य हुताशनम् ॥ १७ ॥
अपसव्यमकुर्वन्त धृतराष्ट्रमुखाश्चिताम् । तदनन्तर पाण्डवोंने विधिपूर्वक महात्मा भीष्मका पितृमेध कर्म सम्पन्न किया । अग्निमें बहुत - सी आहुतियाँ दी गयीं । साम- गान करनेवाले ब्राह्मण साममन्त्रोंका गान करने लगे तथा धृतराष्ट्र आदिने चन्दनकी लकड़ी, कालीचन्दन और सुगन्धित वस्तुओंसे भीष्मके शरीरको आच्छादित करके उनकी चितामें आग लगा दी । फिर धृतराष्ट्र आदि सब कौरवोंने इस जलती हुई चिताकी प्रदक्षिणा की ॥ १५ – १७३ ॥ संस्कृत्य च कुरुश्रेष्ठं गाङ्गेयं कुरुसत्तमाः ॥ १८ ॥
जग्मुर्भागीरथीं पुण्यामृषिजुष्टां कुरूद्वहाः ।
अनुगम्यमाना व्यासेन नारदेनासितेन च ॥ १ ९ ॥
कृष्णेन भरतस्त्रीभिर्ये च पौराः समागताः ।
उदकं चक्रिरे चैव गाङ्गेयस्य महात्मनः ॥ २० ॥
विधिवत् क्षत्रियश्रेष्ठाः स च सर्वो जनस्तदा । इस प्रकार कुरुश्रेष्ठ भीष्मजीका दाह- संस्कार करके समस्त कौरव अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर ऋषि - मुनियोंसे सेवित परम पवित्र भागीरथीके तटपर गये । उनके साथ महर्षि व्यास, देवर्षि नारद, असित, भगवान् श्रीकृष्ण तथा नगरनिवासी मनुष्य भी पधारे थे । वहाँ पहुँचकर उन क्षत्रियशिरोमणियों और अन्य सब लोगोंने विधिपूर्वक महात्मा भीष्मको जलांजलि दी ॥ १८—२०३ ॥ ततो भागीरथी देवी तनयस्योदके कृते ॥ २१ ॥
उत्थाय सलिलात् तस्माद् रुदती शोकविह्वला ।
परिदेवयती तत्र कौरवानभ्यभाषत ॥ २२ ॥
निबोधत यथावृत्तमुच्यमानं मयानघाः ।
राजवृत्तेन सम्पन्नः प्रज्ञयाभिजनेन च ॥ २३ ॥
उस समय कौरवोंद्वारा अपने पुत्र भीष्मको जलांजलि देनेका कार्य पूरा हो जानेपर भगवती भागीरथी जलके ऊपर प्रकट हुई और शोकसे विह्वल हो रोदन एवं विलाप करती हुई कौरवोंसे कहने लगी- ' निष्पाप पुत्रगण! मैं जो कहती हूँ, उस बातको यथार्थरूपसे
पृष्ठ 1563
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुनो । भीष्म राजोचित सदाचारसे सम्पन्न थे । वे उत्तम बुद्धि और श्रेष्ठ कुलसे सम्पन्न थे ॥ २१–२३ ॥
सत्कर्ता कुरुवृद्धानां पितृभक्तो महाव्रतः ।
जामदग्न्येन रामेण यः पुरा न पराजितः ॥ २४ ॥
दिव्यैरस्त्रैर्महावीर्यः स हतोऽद्य शिखण्डिना । ' महान् व्रतधारी भीष्म कुरुकुलवृद्ध पुरुषोंके सत्कार करनेवाले और अपने पिताके बड़े भक्त थे । हाय! पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुराम भी अपने दिव्य अस्त्रोंद्वारा जिस मेरे महापराक्रमी पुत्रको पराजित न कर सके, वह इस समय शिखण्डीके हाथसे मारा गया । यह कितने कष्टकी बात है ॥ २४ ॥
अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम पार्थिवाः ॥ २५ ॥
अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं यन्न दीर्यति मेऽद्य वै । ‘ राजाओ! अवश्य ही मेरा हृदय पत्थर और लोहेका बना हुआ है, तभी तो अपने प्रिय पुत्रको जीवित न देखकर भी आज यह फट नहीं जाता है ॥ २५३ ॥
समेतं पार्थिवं क्षत्रं काशिपुर्यां स्वयंवरे ॥ २६ ॥
विजित्यैकरथेनैव कन्याश्चायं जहार ह । ‘ काशीपुरीके स्वयंवरमें समस्त भूमण्डलके क्षत्रिय एकत्र हुए थे, किंतु भीष्मने एकमात्र रथकी ही सहायतासे उन सबको जीतकर काशिराजकी तीनों कन्याओंका अपहरण किया था ॥ २६३ ॥
यस्य नास्ति बले तुल्यः पृथिव्यामपि कश्चन ॥ २७ ॥
हतं शिखण्डिना श्रुत्वा न विदीर्येत यन्मनः । ‘ हाय! इस पृथ्वीपर बलमें जिसकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, उसीको शिखण्डीके हाथसे मारा गया सुनकर आज मेरी छाती क्यों नहीं फट जाती ॥ २७ ॥
जामदग्न्यः कुरुक्षेत्रे युधि येन महात्मना ॥ २८ ॥
पीडितो नातियत्नेन स हतोऽद्य शिखण्डिना । ‘जिस महामना वीरने जमदग्निनन्दन परशुरामको कुरुक्षेत्रके युद्धमें अनायास ही पीड़ित कर दिया था, वही शिखण्डीके हाथसे मारा गया, यह कितने दुःखकी बात है' ॥ २८३ ॥
एवंविधं बहु तदा विलपन्तीं महानदीम् ॥ २ ९ ॥ आश्वासयामास तदा गङ्गां दामोदरो विभुः ।
पृष्ठ 1564
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीकृष्ण और व्यासजीके द्वारा पुत्र - शोकाकुला गङ्गाजीको सान्त्वना
पृष्ठ 1565
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ऐसी बातें कहकर जब महानदी गंगाजी बहुत विलाप करने लगीं, तब भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा- ॥ २ ९ ३ ॥ समाश्वसिहि भद्रे त्वं मा शुचः शुभदर्शने ॥ ३० ॥
गतः स परमं लोकं तव पुत्रो न संशयः । ‘ भद्रे! धैर्य धारण करो । शुभदर्शने! शोक न करो । तुम्हारे पुत्र भीष्म अत्यन्त उत्तम लोकमें गये हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ३० ॥
वसुरेष महातेजाः शापदोषेण शोभने ॥ ३१ ॥
मानुषत्वमनुप्राप्तो नैनं शोचितुमर्हसि । ‘ शोभने! ये महातेजस्वी वसु थे, वसिष्ठजीके शाप-दोषसे इन्हें मनुष्य योनिमें आना पड़ा था । अतः इनके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ३१३ ॥
स एष क्षत्रधर्मेण अयुध्यत रणाजिरे ॥ ३२ ॥
धनंजयेन निहतो नैष देवि शिखण्डिना । ‘ देवि! इन्होंने समरांगणमें क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध किया था । ये अर्जुनके हाथसे मारे गये हैं, शिखण्डीके हाथसे नहीं ॥ ३२ ॥
भीष्मं हि कुरुशार्दूलमुद्यतेषु महारणे ॥ ३३ ॥
न शक्तः संयुगे हन्तुं साक्षादपि शतक्रतुः ।
स्वच्छन्दतस्तव सुतो गतः स्वर्गं शुभानने ॥ ३४ ॥
' शुभानने! तुम्हारे पुत्र कुरुश्रेष्ठ भीष्म जब हाथमें धनुष- बाण लिये रहते, उस समय साक्षात् इन्द्र भी उन्हें युद्धमें मार नहीं सकते थे । ये तो अपनी इच्छासे ही शरीर त्यागकर स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ ३३-३४ ॥ न शक्ता विनिहन्तुं हि रणे तं सर्वदेवताः ।
तस्मान्मा त्वं सरिच्छ्रेष्ठे शोचस्व कुरुनन्दनम् ।
वसूनेष गतो देवि पुत्रस्ते विज्वरा भव ॥ ३५ ॥
' सरिताओंमें श्रेष्ठ देवि! सम्पूर्ण देवता मिलकर भी युद्धमें उन्हें मारनेकी शक्ति नहीं रखते थे । इसलिये तुम कुरुनन्दन भीष्मजीके लिये शोक मत करो । ये तुम्हारे पुत्र भीष्म
वसुओंके स्वरूपको प्राप्त हुए हैं । अतः इनके लिये चिन्तारहित हो जाओ ' ॥ ३५ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्ता सा तु कृष्णेन व्यासेन तु सरिद्वरा ।
त्यक्त्वा शोकं महाराज स्वं वार्यवततार ह ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज! जब भगवान् श्रीकृष्ण और व्यासजीने इस प्रकार समझाया, तब नदियोंमें श्रेष्ठ गंगाजी शोक त्यागकर अपने जलमें उतर गयीं ॥ ३६ ॥
सत्कृत्य ते तां सरितं ततः कृष्णमुखा नृप ।
पृष्ठ 1566
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अनुज्ञातास्तया सर्वे न्यवर्तन्त जनाधिपाः ॥ ३७ ॥
नरेश्वर! श्रीकृष्ण आदि सब नरेश गंगाजीका सत्कार करके उनकी आज्ञा ले वहाँसे लौट आये ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्यां संहितायां वैयासिक्यामनुशासनपर्वणि भीष्मस्वर्गारोहणपर्वणि दानधर्मे भीष्मयुधिष्ठिरसंवादे भीष्ममुक्तिर्नामाष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६८ ॥
इसप्रकार व्यासनिर्मित श्रीमहाभारत शतसाहस्री संहितामें अनुशासनपर्वके अन्तर्गत भीष्मस्वर्गारोहणपर्वमें दानधर्म तथा भीष्म-युधिष्ठिरसंवादके प्रसंगमें भीष्मजीकी मुक्ति नामक एक सौ अड़सठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १६८ ॥
॥ अनुशासनपर्व सम्पूर्णम् ॥ Fac कुल योग अनुष्टुप् ( अन्य बड़े छन्द ) बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपर उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये ७३५८ ॥ ( 34011 ) ४८१ ॥। ७८४० 14 दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये १९ ५४ ( १२ ) १६ ॥ १ ९ ७० ॥ अनुशासनपर्वकी कुल श्लोकसंख्या- ९८१० ॥। ८
पृष्ठ 1567
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ श्रीमहाभारतम् आश्वमेधिकपर्व अश्वमेधपर्व प्रथमोऽध्यायः युधिष्ठिरका शोकमग्न होकर गिरना और धृतराष्ट्रका उन्हें समझाना
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, ( उनके नित्य सखा ) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली ) भगवती सरस्वती और (उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले ) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय ( महाभारत) -का पाठ करना चाहिये ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
कृतोदकं तु राजानं धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः ।
पुरस्कृत्य महाबाहुरुत्तताराकुलेन्द्रियः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब राजा धृतराष्ट्र भीष्मको जलांजलि दे चुके, तब महाबाहु युधिष्ठिर उन्हें आगे करके जलसे बाहर निकले। उस समय उनकी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो रही थीं ॥ २ ॥
उत्तीर्य तु महाबाहुर्बाष्पव्याकुललोचनः ।
पपात तीरे गङ्गाया व्याधविद्ध इव द्विपः ॥ ३ ॥
बाहर निकलकर विशालबाहु युधिष्ठिर गंगाजीके तटपर व्याधके बाणोंसे बिंधे हुए गजराजके समान गिर पड़े । उस समय उनके दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी ॥ ३ ॥
पृष्ठ 1568
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तं सीदमानं जग्राह भीमः कृष्णेन चोदितः ।
मैवमित्यब्रवीच्चैनं कृष्णः परबलार्दनः ॥ ४ ॥
उन्हें शिथिल होते देख श्रीकृष्णकी प्रेरणासे भीमसेनने उन्हें पकड़ लिया । तत्पश्चात् शत्रुसेनाका संहार करनेवाले श्रीकृष्णने उनसे कहा – ' राजन्! आपको ऐसा अधीर नहीं होना चाहिये ' ॥ ४ ॥
तमार्तं पतितं भूमौ श्वसन्तं च पुनः पुनः ।
ददृशुः पार्थिवा राजन् धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ५ ॥
राजन्! वहाँ आये हुए समस्त भूपालोंने देखा कि धर्मपुत्र युधिष्ठिर शोकार्त होकर पृथ्वीपर पड़े हैं और बारंबार लंबी साँस खींच रहे हैं ॥ ५ ॥
तं दृष्ट्वा दीनमनसं गतसत्त्वं नरेश्वरम् ।
भूयः शोकसमाविष्टाः पाण्डवाः समुपाविशन् ॥ ६ ॥
राजाको इतना दीनचित्त और हतोत्साह देखकर पाण्डव फिर शोकमें डूब गये और उन्हींके पास बैठ रहे ॥ ६ ॥
राजा तु धृतराष्ट्रश्च पुत्रशोकाभिपीडितः ।
वाक्यमाह महाबुद्धिः प्रज्ञाचक्षुर्नरेश्वरम् ॥ ७ ॥
उस समय पुत्रशोकसे पीड़ित हुए परम बुद्धिमान् प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रने महाराज युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ७ ॥
उत्तिष्ठ कुरुशार्दूल कुरु कार्यमनन्तरम् ।
क्षत्रधर्मेण कौन्तेय जितेयमवनी त्वया ॥ ८ ॥
' कुरुवंशके सिंह! कुन्तीकुमार! उठो और इसके बाद जो कार्य प्राप्त है, उसे पूर्ण करो । तुमने क्षत्रियधर्मके अनुसार इस पृथ्वीपर विजय पायी है ॥ ८ ॥
भुङ्क्ष्व भोगान् भ्रातृभिश्च सुहृद्भिश्च मनोऽनुगान् ।
शोचितव्यं न पश्यामि त्वया धर्मभृतां वर ॥ ९ ॥
‘ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! अब तुम अपने भाइयों और सुहृदोंके साथ मनोवांछित भोग भोगो । तुम्हारे लिये शोक करनेका कोई कारण मुझे नहीं दिखायी देता ॥ ९ ॥
शोचितव्यं मया चैव गान्धार्या च महीपते ।
ययोः पुत्रशतं नष्टं स्वप्नलब्धं यथा धनम् ॥ १० ॥
‘ पृथ्वीनाथ! शोक तो मुझको और गान्धारीको करना चाहिये, जिनके सौ पुत्र स्वप्नमें प्राप्त हुए धनकी भाँति नष्ट हो गये ॥ १० ॥
अश्रुत्वा हितकामस्य विदुरस्य महात्मनः ।
वाक्यानि सुमहार्थानि परितप्यामि दुर्मतिः ॥ ११ ॥
‘ अपने हितैषी महात्मा विदुरके महान् अर्थयुक्त वचनोंको अनसुना करके आज मैं दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र अत्यन्त संतप्त हो रहा हूँ ॥ ११ ॥
पृष्ठ 1569
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उक्तवान् विदुरो यन्मां धर्मात्मा दिव्यदर्शनः ।
दुर्योधनापराधेन कुलं ते विनशिष्यति ॥ १२ ॥
स्वस्ति चेदिच्छसे राजन् कुलस्य कुरु मे वचः ।
वध्यतामेष दुष्टात्मा मन्दो राजा सुयोधनः ॥ १३ ॥
‘ दिव्य दृष्टि रखनेवाले धर्मात्मा विदुरने मुझसे यह पहले ही कह दिया था कि ‘ दुर्योधनके अपराधसे आपका सारा कुल नष्ट हो जायगा । यदि आप अपने कुलका कल्याण करना चाहते हैं तो मेरी बात मान लीजिये । इस मन्दबुद्धि दुष्टात्मा राजा दुर्योधनको मार डालिये ॥ १२-१३ ॥
कर्णश्च शकुनिश्चैव नैनं पश्यतु कर्हिचित् ।
द्यूतसंघातमप्येषामप्रमादेन वारय ॥ १४ ॥
“ कर्ण और शकुनिको इससे कभी मिलने न दीजिये । आप पूर्ण सावधान रहकर इन सबके द्यूतविषयक संगठनको रोकिये ॥ १४ ॥
अभिषेचय राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
स पालयिष्यति वशी धर्मेण पृथिवीमिमाम् ॥ १५ ॥
“ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरको अपने राज्यपर अभिषिक्त कीजिये । ये मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले हैं, अतः धर्मपूर्वक इस पृथ्वीका पालन करेंगे ॥ १५ ॥
अथ नेच्छसि राजानं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
मेढीभूतः स्वयं राज्यं प्रतिगृह्णीष्व पार्थिव ॥ १६ ॥
“ नरेश्वर! यदि आप कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको राजा बनाना नहीं चाहते तो स्वयं ही मेठ बनकर सारे राज्यका भार स्वयं ही लिये रहिये ॥ १६ ॥
समं सर्वेषु भूतेषु वर्तमानं नराधिप ।
अनुजीवन्तु सर्वे त्वां ज्ञातयो भ्रातृभिः सह ॥ १७ ॥
“ महाराज! आप सभी प्राणियोंके प्रति समान बर्ताव करें और सभी सजातीय मनुष्य अपने भाई- बन्धुओंके साथ आपके आश्रित रहकर जीवन - निर्वाह करें' ॥ १७ ॥
एवं ब्रुवति कौन्तेय विदुरे दीर्घदर्शिनि ।
दुर्योधनमहं पापमन्ववर्तं वृथामतिः ॥ १८ ॥
'कुन्तीनन्दन! दूरदर्शी विदुरके ऐसा कहनेपर भी मैंने पापी दुर्योधनका ही अनुसरण किया । मेरी बुद्धि निरर्थक हो गयी थी ॥ १८ ॥
अश्रुत्वा तस्य धीरस्य वाक्यानि मधुराण्यहम् ।
फलं प्राप्य महद् दुःखं निमग्नः शोकसागरे ॥ १ ९ ॥
' धीर विदुरके मधुर वचनोंको अनसुना करके मुझे यह महान् दुःखरूपी फल प्राप्त हुआ है। मैं शोकके महान् समुद्रमें डूब गया हूँ ॥ १ ९ ॥ वृद्धौ हि तेऽद्य पितरौ पश्य नौ दुःखितौ नृप ।
पृष्ठ 1570
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
न शोचितव्यं भवता पश्यामीह जनाधिप ॥ २० ॥
‘ नरेश्वर! दुःखमें डूबे हुए हम दोनों बूढ़े माता-पिताकी ओर देखो । तुम्हारे लिये शोक करनेका औचित्य मैं नहीं देख पाता हूँ' ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
PPP