06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1581–1590

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1581–1590

पृष्ठ 1581

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यदा तु परमामार्तिं गतोऽसौ सपुरो नृपः ।

ततः प्रदध्मौ स करं प्रादुरासीत् ततो बलम् ॥ १५ ॥

जब वे नरेश नगरवासियोंसहित भारी विपत्तिमें पड़ गये, तब उन्होंने अपने हाथको

मुँहसे लगाकर उसे शंखकी भाँति बजाया । इससे बहुत बड़ी सेना प्रकट हो गयी ॥ १५ ॥

ततस्तानजयत् सर्वान् प्रातिसीमान् नराधिपान् ।

एतस्मात् कारणाद् राजन् विश्रुतः स करन्धमः ॥ १६ ॥

राजन्! उसीकी सहायतासे उन्होंने अपने राज्यकी सीमापर निवास करनेवाले सम्पूर्ण शत्रु नरेशोंको परास्त कर दिया । इसी कारणसे अर्थात् करका धमन करने ( हाथको बजाने ) -से उनका नाम करन्धम हो गया ॥ १६ ॥

तस्य कारन्धमः पुत्रस्त्रेतायुगमुखेऽभवत् ।

इन्द्रादनवरः श्रीमान् देवैरपि सुदुर्जयः ॥ १७ ॥

करन्धमके त्रेतायुगके आरम्भमें एक कान्तिमान् पुत्र हुआ, जो कारन्धम कहलाया । वह इन्द्रसे किसी भी बातमें कम नहीं था । उसे परास्त करना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था ॥ १७ ॥

तस्य सर्वे महीपाला वर्तन्ते स्म वशे तदा ।

स हि सम्राडभूत् तेषां वृत्तेन च बलेन च ॥ १८ ॥

उस समयके सभी भूपाल कारन्धमके अधीन हो गये थे । वह अपने सदाचार और बलके द्वारा उन सबका सम्राट् हो गया था ॥ १८ ॥

अविक्षिन्नाम धर्मात्मा शौर्येणेन्द्रसमोऽभवत् ।

यज्ञशीलो धर्मरतिर्धृतिमान् संयतेन्द्रियः ॥ १ ९ ॥

उस धर्मात्मा करन्धमकुमारका नाम अविक्षित् था । वह अपने शौर्यके द्वारा इन्द्रकी समानता करता था । वह यज्ञशील, धर्मानुरागी, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय था ॥ १ ९ ॥

तेजसाऽऽदित्यसदृशः क्षमया पृथिवीसमः ।

बृहस्पतिसमो बुद्धया हिमवानिव सुस्थिरः ॥ २० ॥

में सूर्य, क्षमा पृथ्वी, बुद्धिमें बृहस्पति और सुस्थिरतामें हिमवान् पर्वतके समान माना जाता था ॥ २० ॥

कर्मणा मनसा वाचा दमेन प्रशमेन च ।

मनांस्याराधयामास प्रजानां स महीपतिः ॥ २१ ॥

राजा अविक्षित् मन, वाणी, क्रिया, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रहके द्वारा प्रजाजनोंका चित्त संतुष्ट किये रहते थे ॥ २१ ॥

य ईजे हयमेधानां शतेन विधिवत् प्रभुः ।

याजयामास यं विद्वान् स्वयमेवाङ्गिराः प्रभुः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1582

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उन प्रभावशाली नरेशने विधिपूर्वक सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था । साक्षात् विद्वान् प्रभु, अंगिरा मुनिने ही उनका यज्ञ कराया था ॥ २२ ॥

तस्य पुत्रोऽतिचक्राम पितरं गुणवत्तया ।

मरुत्तो नाम धर्मज्ञश्चक्रवर्ती महायशाः ॥ २३ ॥

उन्हींके पुत्र हुए महायशस्वी, चक्रवर्ती, धर्मज्ञ राजा मरुत्त। जो अपने गुणोंके कारण पितासे भी बढ़े - चढ़े थे ॥ २३ ॥

नागायुतसमप्राणः साक्षाद् विष्णुरिवापरः ।

स यक्ष्यमाणो धर्मात्मा शातकुम्भमयान्युत ॥ २४ ॥

कारयामास शुभ्राणि भाजनानि सहस्रशः । उनमें दस हजार हाथियोंके समान बल था । वे साक्षात् दूसरे विष्णुके समान जान पड़ते थे । धर्मात्मा मरुत्त जब यज्ञ करनेको उद्यत हुए, उस समय उन्होंने सहस्रों सोनेके समुज्ज्वल पात्र बनवाये ॥ २४ ॥

मेरुं पर्वतमासाद्य हिमवत्पार्श्व उत्तरे ॥ २५ ॥

काञ्चनः सुमहान् पादस्तत्र कर्म चकार सः ।

ततः कुण्डानि पात्रीश्च पिठराण्यासनानि च ॥ २६ ॥

चक्रुः सुवर्णकर्तारो येषां संख्या न विद्यते ।

तस्यैव च समीपे तु यज्ञवाटो बभूव ह ॥ २७ ॥

हिमालय पर्वतके उत्तर भागमें मेरु पर्वतके निकट एक महान् सुवर्णमय पर्वत है । उसीके समीप उन्होंने यज्ञशाला बनवायी और वहीं यज्ञ-कार्य आरम्भ किया । उनकी आज्ञासे अनेक सुनारोंने आकर सुवर्णमय कुण्ड, सोनेके बर्तन, थाली और आसन ( चौकी आदि ) तैयार किये । उन सब वस्तुओंकी गणना असम्भव है ॥ २५-२७ ॥

ईजे तत्र स धर्मात्मा विधिवत् पृथिवीपतिः ।

मरुत्तः सहितैः सर्वैः प्रजापालैर्नराधिपः ॥ २८ ॥

जब सब सामग्री तैयार हो गयी, तब वहाँ धर्मात्मा, पृथ्वीपति राजा मरुत्तने अन्य सब प्रजापालोंके साथ विधिपूर्वक यज्ञ किया ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥

पृष्ठ 1583

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पञ्चमोऽध्यायः इन्द्रकी प्रेरणासे बृहस्पतिजीका मनुष्यको यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा करना युधिष्ठिर उवाच

कथंवीर्यः समभवत् स राजा वदतां वर ।

कथं च जातरूपेण समयुज्यत स द्विज ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! राजा मरुत्तका पराक्रम कैसा था? तथा उन्हें सुवर्णकी प्राप्ति कैसे हुई? ॥ १ ॥

क्व च तत् साम्प्रतं द्रव्यं भगवन्नवतिष्ठते ।

कथं च शक्यमस्माभिस्तदवाप्तुं तपोधन । २ ॥

भगवन्! तपोधन! वह द्रव्य इस समय कहाँ है? और हम उसे किस तरह प्राप्त कर सकते हैं? ॥ २ ॥

व्यास उवाच

असुराश्चैव देवाश्च दक्षस्यासन् प्रजापतेः ।

अपत्यं बहुलं तात संस्पर्धन्त परस्परम् ॥ ३ ॥

व्यासजीने कहा — तात! प्रजापति दक्षके देवता और असुर नामक बहुत - सी संतानें हैं, जो आपसमें स्पर्धा रखती हैं ॥ ३ ॥

तथैवाङ्गिरसः पुत्री व्रततुल्यौ बभूवतुः ।

बृहस्पतिर्बृहत्तेजाः संवर्तश्च तपोधनः ॥ ४ ॥

इसी प्रकार महर्षि अंगिराके दो पुत्र हुए, जो व्रतका पालन करनेमें एक समान हैं ।

उनमेंसे एक हैं महातेजस्वी बृहस्पति और दूसरे हैं तपस्याके धनी संवर्त ॥ ४ ॥

तावतिस्पर्धिनौ राजन् पृथगास्तां परस्परम् ।

बृहस्पतिः स संवर्तं बाधते स्म पुनः पुनः ॥ ५ ॥

राजन्! वे दोनों भाई एक- दूसरेसे अलग रहते और आपसमें बड़ी स्पर्धा रखते थे ।

बृहस्पति अपने छोटे भाई संवर्तको बारंबार सताया करते थे ॥ ५ ॥

स बाध्यमानः सततं भ्रात्रा ज्येष्ठेन भारत ।

अर्थानुत्सृज्य दिग्वासा वनवासमरोचयत् ॥ ६ ॥

भारत! अपने बड़े भाईके द्वारा सदा सताये जानेपर संवर्त धन- दौलतका मोह छोड़ घरसे निकल गये और दिगम्बर होकर वनमें रहने लगे । घरकी अपेक्षा वनवासमें ही उन्होंने सुख माना ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1584

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वासवोऽप्यसुरान् सर्वान् विजित्य च निपात्य च ।

इन्द्रत्वं प्राप्य लोकेषु ततो वव्रे पुरोहितम् ॥ ७ ॥

पुत्रमङ्गिरसो ज्येष्ठं विप्रज्येष्ठं बृहस्पतिम् । इसी समय इन्द्रने समस्त असुरोंको जीतकर मार गिराया तथा त्रिभुवनका साम्राज्य प्राप्त कर लिया । तदनन्तर उन्होंने अंगिराके ज्येष्ठ पुत्र विप्रवर बृहस्पतिको अपना पुरोहित बनाया ॥ ७३ ॥

याज्यस्त्वङ्गिरसः पूर्वमासीद् राजा करंधमः ॥ ८ ॥

वीर्येणाप्रतिमो लोके वृत्तेन च बलेन च ।

शतक्रतुरिवौजस्वी धर्मात्मा संशितव्रतः ॥ ९ ॥

इसके पहले अंगिराके यजमान राजा करन्धम थे । संसारमें बल, पराक्रम और सदाचारके द्वारा उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं था । वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी, धर्मात्मा और कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे ॥ ८ - ९ ॥

वाहनं यस्य योधाश्च मित्राणि विविधानि च ।

शयनानि च मुख्यानि महार्हाणि च सर्वशः ॥ १० ॥

ध्यानादेवाभवद् राजन् मुखवातेन सर्वशः ।

स गुणैः पार्थिवान् सर्वान् वशे चक्रे नराधिपः ॥ ११ ॥

राजन्! उनके लिये वाहन, योद्धा, नाना प्रकारके मित्र तथा श्रेष्ठ और सब प्रकारकी बहुमूल्य शय्याएँ चिन्तन करनेसे और मुखजनित वायुसे ही प्रकट हो जाती थीं । राजा करन्धमने अपने गुणोंसे समस्त राजाओंको अपने वशमें कर लिया था ॥ १०-११ ॥

संजीव्य कालमिष्टं च सशरीरो दिवं गतः ।

बभूव तस्य पुत्रस्तु ययातिरिव धर्मवित् ॥ १२ ॥

अविक्षिन्नाम शत्रुंजित् स वशे कृतवान् महीम् ।

विक्रमेण गुणैश्चैव पितेवासीत् स पार्थिवः ॥ १३ ॥

कहते हैं राजा करन्धम अभीष्ट कालतक इस संसारमें जीवन धारण करके अन्तमें सशरीर स्वर्गलोकको चले गये थे। उनके पुत्र अविक्षित् ययातिके समान धर्मज्ञ थे । उन्होंने अपने पराक्रम और गुणोंके द्वारा शत्रुओं पर विजय पाकर सारी पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया था । वे राजा अपनी प्रजाके लिये पिताके समान थे ॥ १२-१३ ॥

तस्य वासवतुल्योऽभून्मरुत्तो नाम वीर्यवान् ।

पुत्रस्तमनुरक्ताभूत् पृथिवी सागराम्बरा ॥ १४ ॥

अविक्षित्के पुत्रका नाम मरुत्त था, जो इन्द्रके समान पराक्रमी थे । समुद्ररूपी वस्त्रसे आच्छादित हुई यह सारी पृथ्वी– समस्त भूमण्डलकी प्रजा उनमें अनुराग रखती थी ॥ १४ ॥

स्पर्धते स स्म सततं देवराजेन नित्यदा ।

पृष्ठ 1585

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वासवोऽपि मरुत्तेन स्पर्धते पाण्डुनन्दन ॥ १५ ॥

पाण्डुनन्दन! राजा मरुत्त सदा देवराज इन्द्रसे स्पर्धा रखते थे और इन्द्र भी मरुत्तके साथ स्पर्धा रखते थे ॥ १५ ॥

शुचिः स गुणवानासीन्मरुत्तः पृथिवीपतिः ।

यतमानोऽपि यं शक्रो न विशेषयति स्म ह ॥ १६ ॥

पृथ्वीपति मरुत्त पवित्र एवं गुणवान् थे। इन्द्र उनसे बढ़नेके लिये सदा प्रयत्न करते थे तो भी कभी बढ़ नहीं पाते थे ॥ १६ ॥

सोऽशक्नुवन् विशेषाय समाहूय बृहस्पतिम् ।

उवाचेदं वचो देवैः सहितो हरिवाहनः ॥ १७ ॥

जब देवताओंसहित इन्द्र किसी तरह बढ़ न सके, तब बृहस्पतिको बुलाकर उनसे इस प्रकार कहने लगे- ॥ १७ ॥

बृहस्पते मरुत्तस्य मा स्म कार्षीः कथंचन ।

दैवं कर्माथ पित्र्यं वा कर्तासि मम चेत् प्रियम् ॥ १८ ॥

' बृहस्पतिजी! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो राजा मरुत्तका यज्ञ तथा श्राद्धकर्म किसी तरह न कराइयेगा ॥ १८ ॥

अहं हि त्रिषु लोकेषु सुराणां च बृहस्पते ।

इन्द्रत्वं प्राप्तवानेको मरुत्तस्तु महीपतिः ॥ १ ९ ॥

‘ बृहस्पते! एकमात्र मैं ही तीनों लोकोंका स्वामी और देवताओंका इन्द्र हूँ । मरुत्त तो केवल पृथ्वीके राजा हैं ॥ १ ९ ॥

कथं ह्यमर्त्यं ब्रह्मंस्त्वं याजयित्वा सुराधिपम् ।

याजयेर्मृत्युसंयुक्तं मरुत्तमविशङ्कया ॥ २० ॥

‘ब्रह्मन्! आप अमर देवराजका यज्ञ कराकर- देवेन्द्रके पुरोहित होकर मरणधर्मा मरुत्तका यज्ञ कैसे निःशंक होकर कराइयेगा? ॥ २० ॥

मां वा वृणीष्व भद्रं ते मरुत्तं वा महीपतिम् ।

परित्यज्य मरुत्तं वा यथाजोषं भजस्व माम् ॥ २१ ॥

‘ आपका कल्याण हो । आप मुझे अपना यजमान बनाइये अथवा पृथ्वीपति मरुत्तको ।

या तो मुझे छोड़िये या मरुत्तको छोड़कर चुपचाप मेरा आश्रय लीजिये ' ॥ २१ ॥

एवमुक्तः स कौरव्य देवराज्ञा बृहस्पतिः ।

मुहूर्तमिव संचिन्त्य देवराजानमब्रवीत् ॥ २२ ॥

कुरुनन्दन! देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर बृहस्पतिने दो घड़ीतक सोच- विचारकर उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया – ॥ २२ ॥

त्वं भूतानामधिपतिस्त्वयि लोकाः प्रतिष्ठिताः ।

नमुचेर्विश्वरूपस्य निहन्ता त्वं बलस्य च ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1586

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‘ देवराज! तुम सम्पूर्ण जीवोंके स्वामी हो, तुम्हारे ही आधारपर समस्त लोक टिके हुए हैं । तुम नमुचि, विश्वरूप और बलासुरके विनाशक हो ॥ २३ ॥

त्वमाजहर्थ देवानामेको वीरश्रियं पराम् ।

त्वं बिभर्षि भुवं द्यां च सदैव बलसूदन ॥ २४ ॥

‘ बलसूदन! तुम अद्वितीय वीर हो । तुमने उत्तम सम्पत्ति प्राप्त की है । तुम पृथ्वी और स्वर्ग दोनोंका भरण - पोषण एवं संरक्षण करते हो ॥ २४ ॥

पौरोहित्यं कथं कृत्वा तव देवगणेश्वर ।

याजयेयमहं मर्त्यं मरुत्तं पाकशासन ॥ २५ ॥

‘ देवेश्वर! पाकशासन! तुम्हारी पुरोहिती करके मैं मरणधर्मा मरुत्तका यज्ञ कैसे करा सकता हूँ ॥ २५ ॥

समाश्वसिहि देवेन्द्र नाहं मर्त्यस्य कर्हिचित् ।

ग्रहीष्यामि स्रुवं यज्ञे शृणु चेदं वचो मम ॥ २६ ॥

‘ देवेन्द्र! धैर्य धारण करो । अब मैं कभी किसी मनुष्यके यज्ञमें जाकर स्रुवा हाथमें नहीं लूँगा । इसके सिवा मेरी यह बात भी ध्यानसे सुन लो ॥ २६ ॥

हिरण्यरेता नोष्णः स्यात् परिवर्तेत मेदिनी ।

भासं तु न रविः कुर्यान्न तु सत्यं चलेन्मयि ॥ २७ ॥

‘ आग चाहे ठण्डी हो जाय, पृथ्वी उलट जाय और सूर्यदेव प्रकाश करना छोड़ दें; किंतु मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा नहीं टल सकती' ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच

बृहस्पतिवचः श्रुत्वा शक्रो विगतमत्सरः ।

प्रशस्यैनं विवेशाथ स्वमेव भवनं तदा ॥ २८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! बृहस्पतिजीकी बात सुनकर इन्द्रका मात्सर्य दूर हो गया और तब वे उनकी प्रशंसा करके अपने घरमें चले गये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये पञ्चमोऽध्यायः ॥५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक पाँचवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1587

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षष्ठोऽध्यायः नारदजीकी आज्ञासे मरुत्तका उनकी बतायी हुई युक्तिके अनुसार संवर्तसे भेंट करना व्यास उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

बृहस्पतेश्च संवादं मरुत्तस्य च धीमतः ॥ १ ॥

व्यासजी कहते हैं — राजन्! इस प्रसंगमें बुद्धिमान् राजा मरुत्त और बृहस्पतिके इस पुरातन संवादविषयक इतिहासका उल्लेख किया जाता है ॥ १ ॥

देवराजस्य समयं कृतमाङ्गिरसेन ह ।

श्रुत्वा मरुत्तो नृपतिर्यज्ञमाहारयत् परम् ॥ २ ॥

राजा मरुत्तने जब यह सुना कि अंगिराके पुत्र बृहस्पतिजीने मनुष्यके यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा कर ली है, तब उन्होंने एक महान् यज्ञका आयोजन किया ॥ २ ॥

संकल्प्य मनसा यज्ञं करन्धमसुतात्मजः ।

बृहस्पतिमुपागम्य वाग्मी वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥

बातचीत करनेमें कुशल करन्धमपौत्र मरुत्तने मन-ही- मन यज्ञका संकल्प करके बृहस्पतिजीके पास जाकर उनसे इस प्रकार कहा- ॥ ३ ॥

भगवन् यन्मया पूर्वमभिगम्य तपोधन ।

कृतोऽभिसंधिर्यज्ञस्य भवतो वचनाद् गुरो ॥ ४ ॥

तमहं यष्टुमिच्छामि सम्भाराः सम्भृताश्च मे ।

याज्योऽस्मि भवतः साधो तत् प्राप्नुहि विधत्स्व च ॥ ५ ॥

' भगवन्! तपोधन! गुरुदेव! मैंने पहले एक बार आकर जो आपसे यज्ञके विषयमें सलाह ली थी और आपने जिसके लिये मुझे आज्ञा दी थी, उस यज्ञको अब मैं प्रारम्भ करना चाहता हूँ। आपके कथनानुसार मैंने सब सामग्री एकत्र कर ली है । साधु पुरुष! मैं आपका

पुराना यजमान भी हूँ । इसलिये चलिये, मेरा यज्ञ करा दीजिये ' ॥ ४-५ ॥

बृहस्पतिरुवाच

न कामये याजयितुं त्वामहं पृथिवीपते ।

वृतोऽस्मि देवराजेन प्रतिज्ञातं च तस्य मे ॥ ६ ॥

बृहस्पतिजीने कहा — राजन्! अब मैं तुम्हारा यज्ञ कराना नहीं चाहता । देवराज इन्द्रने मुझे अपना पुरोहित बना लिया है और मैंने भी उनके सामने यह प्रतिज्ञा कर ली है ॥ ६ ॥

मरुत्त उवाच

पृष्ठ 1588

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पित्र्यमस्मि तव क्षेत्रं बहु मन्ये च ते भृशम् ।

तवास्मि याज्यतां प्राप्तो भजमानं भजस्व माम् ॥ ७ ॥

मरुत्त बोले — विप्रवर! मैं आपके पिताके समयसे ही आपका यजमान हूँ तथा विशेष सम्मान करता हूँ । आपका शिष्य हूँ और आपकी सेवामें तत्पर रहता हूँ। अतः मुझे अपनाइये ॥ ७ ॥

बृहस्पतिरुवाच

अमर्त्यं याजयित्वाहं याजयिष्ये कथं नरम् ।

मरुत्त गच्छ वा मा वा निवृत्तोऽस्म्यद्य याजनात् ॥ ८ ॥

बृहस्पतिजीने कहा — मरुत्त! अमरोंका यज्ञ करानेके बाद मैं मरणधर्मा मनुष्योंका यज्ञ कैसे कराऊँगा? तुम जाओ या रहो । अब मैं मनुष्योंका यज्ञकार्य करानेसे निवृत्त हो गया ॥ ८ ॥

न त्वां याजयितास्म्यद्य वृणु यं त्वमिहेच्छसि ।

उपाध्यायं महाबाहो यस्ते यज्ञं करिष्यति ॥ ९ ॥

महाबाहो! मैं तुम्हारा यज्ञ नहीं कराऊँगा । तुम दूसरे जिसको चाहो उसीको अपना

पुरोहित बना लो । जो तुम्हारा यज्ञ करायेगा ॥ ९ ॥

व्यास उवाच

एवमुक्तस्तु नृपतिर्मरुत्तो व्रीडितोऽभवत् ।

प्रत्यागच्छन् सुसंविग्नो ददर्श पथि नारदम् ॥ १० ॥

व्यासजी कहते हैं — राजन्! बृहस्पतिजीसे ऐसा उत्तर पाकर महाराज मरुत्तको बड़ा संकोच हुआ । वे बहुत खिन्न होकर लौटे जा रहे थे, उसी समय मार्गमें उन्हें देवर्षि नारदजीका दर्शन हुआ ॥ १० ॥

देवर्षिणा समागम्य नारदेन स पार्थिवः ।

विधिवत् प्राञ्जलिस्तस्थावथैनं नारदोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥

देवर्षि नारदके साथ समागम होनेपर राजा मरुत्त यथाविधि हाथ जोड़कर खड़े हो गये ।

तब नारदजीने उनसे कहा— ॥ ११ ॥

राजर्षे नातिहृष्टोऽसि कच्चित् क्षेमं तवानघ ।

क्व गतोऽसि कुतश्चेदमप्रीतिस्थानमागतम् ॥ १२ ॥

‘ राजर्षे! तुम अधिक प्रसन्न नहीं दिखायी देते हो । निष्पाप नरेश! तुम्हारे यहाँ कुशल तो है न? कहाँ गये थे और किस कारण तुम्हें यह खेदका अवसर प्राप्त हुआ है? ॥ १२ ॥

श्रोतव्यं चेन्मया राजन् ब्रूहि मे पार्थिवर्षभ ।

व्यपनेष्यामि ते मन्युं सर्वयत्नैर्नराधिप ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1589

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' राजन्! नृपश्रेष्ठ! यदि मेरे सुनने योग्य हो तो बताओ । नरेश्वर! मैं पूर्ण यत्न करके तुम्हारा दुःख दूर करूँगा' ॥ १३ ॥

एवमुक्तो मरुत्तः स नारदेन महर्षिणा ।

विप्रलम्भमुपाध्यायात् सर्वमेव न्यवेदयत् ॥ १४ ॥

महर्षि नारदके ऐसा कहनेपर राजा मरुत्तने उपाध्याय ( पुरोहित ) - से बिछोह होनेका सारा समाचार उन्हें कह सुनाया ॥ १४ ॥

मरुत्त उवाच

गतोऽस्म्यङ्गिरसः पुत्रं देवाचार्यं बृहस्पतिम् ।

यज्ञार्थमृत्विजं द्रष्टुं स च मां नाभ्यनन्दत ॥ १५ ॥

मरुत्तने कहा –नारदजी! मैं अंगिराके पुत्र देवगुरु बृहस्पतिके पास गया था। मेरी यात्राका उद्देश्य यह था कि उन्हें अपना यज्ञ करानेके लिये ऋत्विज्‌के रूपमें देखूँ; किंतु उन्होंने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की ॥ १५ ॥

प्रत्याख्यातश्च तेनाहं जीवितुं नाद्य कामये ।

परित्यक्तश्च गुरुणा दूषितश्चास्मि नारद ॥ १६ ॥

नारदजी! मेरे गुरुने मुझपर मरणधर्मा मनुष्य होनेका दोष लगाकर मुझे त्याग दिया । उनके द्वारा इस प्रकार अस्वीकार किये जानेके कारण अब मैं जीवित रहना नहीं चाहता ॥ १६ ॥

व्यास उवाच

एवमुक्तस्तु राज्ञा स नारदः प्रत्युवाच ह ।

आविक्षितं महाराज वाचा संजीवयन्निव ॥ १७ ॥

व्यासजी कहते हैं - महाराज! राजा मरुत्तके ऐसा कहनेपर देवर्षि नारदने अपनी अमृतमयी वाणीके द्वारा अविक्षित्कुमारको जीवन प्रदान करते हुए- से कहा ॥ १७ ॥

नारद उवाच

राजन्नङ्गिरसः पुत्रः संवर्तो नाम धार्मिकः ।

चङ्क्रमीति दिशः सर्वा दिग्वासा मोहयन् प्रजाः ॥ १८ ॥

तं गच्छ यदि याज्यं त्वां न वाञ्छति बृहस्पतिः ।

प्रसन्नस्त्वां महातेजाः संवर्तो याजयिष्यति ॥ १ ९ ॥

नारदजी बोले – राजन्! अंगिराके दूसरे पुत्र संवर्त बड़े धार्मिक हैं । वे दिगम्बर होकर प्रजाको मोहमें डालते हुए अर्थात् सबसे छिपे रहकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते रहते हैं । यदि बृहस्पति तुम्हें अपना यजमान बनाना नहीं चाहते तो तुम संवर्तके ही पास चले जाओ । संवर्त बड़े तेजस्वी हैं, वे प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा यज्ञ करा देंगे ॥ १८-१९ ॥

पृष्ठ 1590

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मरुत्त उवाच

संजीवितोऽहं भवता वाक्येनानेन नारद ।

पश्येयं क्व नु संवर्तं शंस मे वदतां वर ॥ २० ॥

कथं च तस्मै वर्तेयं कथं मां न परित्यजेत् ।

प्रत्याख्यातश्च तेनापि नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ २१ ॥

मरुत्त बोले- वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजी! आपने यह बात बताकर मुझे जिला दिया । अब यह बताइये कि मैं संवर्त मुनिका दर्शन कहाँ कर सकूँगा? मुझे उनके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये? मैं कैसा व्यवहार करूँ, जिससे वे मेरा परित्याग न करें । यदि उन्होंने भी मेरी प्रार्थना ठुकरा दी तब मैं जीवित नहीं रह सकूँगा ॥ २०-२१ ॥ नारद उवाच

उन्मत्तवेषं बिभ्रत् स चङ्क्रमीति यथासुखम् ।

वाराणस्यां महाराज दर्शनेप्सुर्महेश्वरम् ॥ २२ ॥

नारदजीने कहा —महाराज! वे इस समय वाराणसीमें महेश्वर विश्वनाथके दर्शनकी इच्छासे पागलका - सा वेष धारण किये अपनी मौजसे घूम रहे हैं ॥ २२ ॥

तस्या द्वारं समासाद्य न्यसेथाः कुणपं क्वचित् ।

तं दृष्ट्वा यो निवर्तेत संवर्तः स महीपते ॥ २३ ॥