06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1591–1600
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1591–1600
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महाराज मरुत्तकी देवर्षिसे भेंट
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महाराज मरुत्तका संवर्तमुनिसे संवाद
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तं पृष्ठतोऽनुगच्छेथा यत्र गच्छेत् स वीर्यवान् ।
तनेकान्ते समासाद्य प्राञ्जलिः शरणं व्रजेः ॥ २४ ॥
तुम उस पुरीके प्रवेश- द्वारपर पहुँचकर वहाँ कहींसे एक मुर्दा लाकर रख देना । पृथ्वीनाथ! जो उस मुर्देको देखकर सहसा पीछेकी ओर लौट पड़े, उसे ही संवर्त समझना और वे शक्तिशाली मुनि जहाँ कहीं जायँ उनके पीछे - पीछे चले जाना । जब वे किसी एकान्त स्थानमें पहुचें, तब हाथ जोड़कर शरणापन्न हो जाना ॥ २३-२४ ॥
पृच्छेत् त्वां यदि केनाहं तवाख्यात इति स्म ह ।
ब्रूयास्त्वं नारदेनेति संवर्त कथितोऽसि मे ॥ २५ ॥
यदि तुमसे पूछें कि किसने तुम्हें मेरा पता बताया है तो कह देना—‘संवर्तजी! नारदजीने मुझे आपका पता बताया है ' ॥ २५ ॥
स चेत् त्वामनुयुञ्जीत ममानुगमनेप्सया ।
शंसेथा वह्निमारूढं मामपि त्वमशङ्कया ॥ २६ ॥
यदि वे तुमसे मेरे पास आनेके लिये मेरा पता पूछें तो तुम निर्भीक होकर कह देना कि ' नारदजी आगमें समा गये ' ॥ २६ ॥
व्यास उवाच
स तथेति प्रतिश्रुत्य पूजयित्वा च नारदम् ।
अभ्यनुज्ञाय राजर्षिर्ययौ वाराणसीं पुरीम् ॥ २७ ॥
व्यासजी कहते हैं - राजन्! यह सुनकर राजर्षि मरुत्तने ' बहुत अच्छा' कहकर नारदजीकी भूरि- भूरि प्रशंसा की और उनसे जानेकी आज्ञा ले वे वाराणसीपुरीकी ओर चल दिये ॥ २७ ॥
तत्र गत्वा यथोक्तं स पुर्या द्वारे महायशाः ।
कुणपं स्थापयामास नारदस्य वचः स्मरन् ॥ २८ ॥
वहाँ जाकर नारदजीके कथनका स्मरण करते हुए महायशस्वी नरेशने उनके बताये अनुसार काशीपुरीके द्वारपर एक मुर्दा लाकर रख दिया ॥ २८ ॥
यौगपद्येन विप्रश्च पुरीद्वारमथाविशत् ।
ततः स कुणपं दृष्ट्वा सहसा संन्यवर्तत ॥ २ ९ ॥
इसी समय विप्रवर संवर्त भी पुरीके द्वारपर आये; किंतु उस मुर्देको देखकर वे सहसा पीछेकी ओर लौट पड़े ॥ २ ९ ॥
स तं निवृत्तमालक्ष्य प्राञ्जलिः पृष्ठतोऽन्वगात् ।
आविक्षितो महीपालः संवर्तमुपशिक्षितुम् ॥ ३० ॥
उन्हें लौटा देख राजा मरुत्त संवर्तसे शिक्षा लेनेके लिये हाथ जोड़े उनके पीछे - पीछे गये ॥ ३० ॥
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स च तं विजने दृष्ट्वा पांसुभिः कर्दमेन च ।
श्लेष्मणा चैव राजानं ष्ठीवनैश्च समाकिरत् ॥ ३१ ॥
एकान्तमें पहुँचनेपर राजाको अपने पीछे - पीछे आते देख संवर्तने उनपर धूल फेंकी, कीचड़ उछाला तथा थूक और खखार डाल दिये ॥ ३१ ॥
स तथा बाध्यमानो वै संवर्तेन महीपतिः ।
अन्वगादेव तमृषिं प्राञ्जलिः सम्प्रसादयन् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार संवर्तके सतानेपर भी राजा मरुत्त हाथ जोड़ उन्हें प्रसन्न करनेके उद्देश्यसे उन महर्षिके पीछे - पीछे चले ही गये ॥ ३२ ॥
ततो निवर्त्य संवर्तः परिश्रान्त उपाविशत् ।
शीतलच्छायमासाद्य न्यग्रोधं बहुशाखिनम् ॥ ३३ ॥
तब संवर्त मुनि लौटकर शीतल छायासे युक्त तथा अनेक शाखाओंसे सुशोभित एक बरगदके नीचे थककर बैठ गये ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
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सप्तमोऽध्यायः संवर्त और मरुत्तकी बातचीत, मरुत्तके विशेष आग्रहपर संवर्तका यज्ञ करानेकी स्वीकृति देना संवर्तउवाच
कथमस्मि त्वया ज्ञातः केन वा कथितोऽस्मि ते ।
एतदाचक्ष्व मे तत्त्वमिच्छसे चेन्मम प्रियम् ॥ १ ॥
संवर्त बोले — राजन्! तुमने मुझे कैसे पहचाना है? किसने तुम्हें मेरा परिचय दिया है? यदि मेरा प्रिय चाहते हो तो यह सब मुझे ठीक- ठीक बताओ ॥ १ ॥
सत्यं ते ब्रुवतः सर्वे सम्पत्स्यन्ते मनोरथाः ।
मिथ्या च ब्रुवतो मूर्धा शतधा ते स्फुटिष्यति ॥ २ ॥
यदि सच- सच बता दोगे तो तुम्हारे सारे मनोरथ पूर्ण होंगे और यदि झूठ बोलोगे तो तुम्हारे मस्तकके सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे ॥ २ ॥
मरुत्त उवाच
नारदेन भवान् मह्यमाख्यातो ह्यटता पथि ।
गुरुपुत्रो ममेति त्वं ततो मे प्रीतिरुत्तमा ॥ ३ ॥
मरुत्तने कहा – मुने! भ्रमणशील नारदजीने रास्तेमें मुझे आपका परिचय दिया और पता बताया । आप मेरे गुरु अंगिराके पुत्र हैं, यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ ३ ॥
संवर्तउवाच
सत्यमेतद् भवानाह स मां जानाति सत्रिणम् ।
कथयस्व तदेतन्मे क्व नु सम्प्रति नारदः ॥ ४ ॥
संवर्त बोले- राजन्! तुम ठीक कहते हो, नारदको यह मालूम है कि मैं यज्ञ कराना जानता हूँ और गुप्त वेषमें घूम रहा । अच्छा यह तो बताओ, इस समय नारद कहाँ हैं? ॥ ४ ॥
मरुत्त उवाच
भवन्तं कथयित्वा तु मम देवर्षिसत्तमः ।
ततो मामभ्यनुज्ञाय प्रविष्टो हव्यवाहनम् ॥ ५ ॥
मरुत्तने कहा – मुने! मुझे आपका परिचय और पता बताकर देवर्षिशिरोमणि नारद मुझे जानेकी आज्ञा दे स्वयं अग्निमें प्रवेश कर गये थे ॥ ५ ॥
व्यास उवाच
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श्रुत्वा तु पार्थिवस्यैतत् संवर्तः प्रमुदं गतः ।
एतावदहमप्येवं शक्नुयामिति सोऽब्रवीत् ॥ ६ ॥
व्यासजी कहते हैं — राजन्! राजाकी यह बात सुनकर संवर्तको बड़ी प्रसन्नता हुई और बोले— ' इतना तो मैं भी कर सकता हूँ' ॥ ६ ॥
ततो मरुत्तमुन्मत्तो वाचा निर्भर्त्सयन्निव ।
रूक्षया ब्राह्मणो राजन् पुनः पुनरथाब्रवीत् ॥ ७ ॥
राजन्! वे उन्मत वेषधारी ब्राह्मण देवता मरुत्तको अपनी रूखी वाणीद्वारा बारंबार फटकारते हुए - से बोले – ॥ ७ ॥
वातप्रधानेन मया स्वचित्तवशवर्तिना ।
एवं विकृतरूपेण कथं याजितुमिच्छसि ॥ ८ ॥
‘नरेश्वर! मैं तो वायु - प्रधान - बावला हूँ, अपने मनकी मौजसे ही सब काम करता हूँ, मेरा रूप भी विकृत है । अतः मुझ जैसे व्यक्तिसे तुम क्यों यज्ञ कराना चाहते हो? ॥ ८ ॥
भ्राता मम समर्थश्च वासवेन च संगतः ।
वर्तते याजने चैव तेन कर्माणि कारय ९ ॥
' मेरे भाई बृहस्पति इस कार्यमें पूर्णतः समर्थ हैं । आजकल इन्द्रके साथ उनका मेलजोल बढ़ा हुआ है । वे उनके यज्ञ करानेमें लगे रहते हैं । अतः उन्हींसे अपने सारे यज्ञकर्म कराओ ॥ ९ ॥
गार्हस्थ्यं चैव याज्याश्च सर्वा गृह्याश्च देवताः ।
पूर्वजेन ममाक्षिप्तं शरीरं वर्जितं त्विदम् ॥ १० ॥
‘ घर- गृहस्थीका सारा सामान, यजमान तथा गृहदेवताओंके पूजन आदि कर्म—इन सबको इस समय मेरे बड़े भाईने अपने अधिकारमें कर लिया है । मेरे पास तो केवल मेरा एक शरीर ही छोड़ रखा है ॥ १० ॥
नाहं तेनाननुज्ञातस्त्वामाविक्षित कर्हिचित् ।
याजयेयं कथंचिद् वै स हि पूज्यतमो मम ॥ ११ ॥
‘ अविक्षित्- कुमार! मैं उनकी आज्ञा प्राप्त किये बिना कभी किसी तरह भी तुम्हारा यज्ञ नहीं करा सकता; क्योंकि वे मेरे परम पूजनीय भाई हैं ॥ ११ ॥
स त्वं बृहस्पतिं गच्छ तमनुज्ञाप्य चाव्रज ।
ततोऽहं याजयिष्ये त्वां यदि यष्टुमिहेच्छसि ॥ १२ ॥
‘ अतः तुम बृहस्पतिके पास जाओ और उनकी आज्ञा लेकर आओ । उस दशामें यदि तुम यज्ञ कराना चाहो तो मैं यज्ञ करा दूँगा ' ॥ १२ ॥
मरुत्त उवाच बृहस्पतिं गतः पूर्वमहं संवर्त तच्छृणु ।
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न मां कामयते याज्यमसौ वासवकाम्यया ॥ १३ ॥
मरुत्तने कहा — संवर्तजी! मैं पहले बृहस्पतिजीके ही पास गया था । वहाँका समाचार बताता हूँ, सुनिये । वे इन्द्रको प्रसन्न रखनेकी इच्छासे अब मुझे अपना यजमान बनाना नहीं चाहते हैं ॥ १३ ॥
अमरं याज्यमासाद्य याजयिष्ये न मानुषम् ।
शक्रेण प्रतिषिद्धोऽहं मरुत्तं मा स्म याजयेः ॥ १४ ॥
स्पर्धते हि मया विप्र सदा हि स तु पार्थिवः ।
एवमस्त्विति चाप्युक्तो भ्रात्रा ते बलसूदनः ॥ १५ ॥
उन्होंने स्पष्ट कह दिया है कि ' अमर यजमान पाकर अब मैं मरणधर्मा मनुष्यका यज्ञ नहीं कराऊँगा । ' साथ ही इन्द्रने मना भी किया है कि ' आप मरुत्तका यज्ञ न कराइयेगा; क्योंकि ब्रह्मन्! वह राजा सदा मेरे साथ ईर्ष्या रखता है । ' इन्द्रकी इस बातको आपके भाईने ‘ एवमस्तु' कहकर स्वीकार कर लिया है ॥ १४-१५ ॥
स मामधिगतं प्रेम्णा याज्यत्वेन बुभूषति ।
देवराजं समाश्रित्य तद् विद्धि मुनिपुङ्गव ॥ १६ ॥
मुनिप्रवर! मैं बड़े प्रेमसे उनके पास गया था; परंतु वे देवराज इन्द्रका आश्रय लेकर मुझे अपना यजमान बनाना ही नहीं चाहते हैं । इस बातको आप अच्छी तरह जान लें ॥ १६ ॥
सोऽहमिच्छामि भवता सर्वस्वेनापि याजितुम् ।
कामये समतिक्रान्तुं वासवं त्वत्कृतैर्गुणैः ॥ १७ ॥
अतः मेरी इच्छा यह है कि मैं सर्वस्व देकर भी आपसे ही यज्ञ कराऊँ और आपके द्वारा सम्पादित गुणोंके प्रभावसे इन्द्रको भी मात कर दूँ ॥ १७ ॥
न हि मे वर्तते बुद्धिर्गन्तुं ब्रह्मन् बृहस्पतिम् ।
प्रत्याख्यातो हि तेनास्मि तथानपकृते सति ॥ १८ ॥
ब्रह्मन्! अब बृहस्पतिके पास जानेका मेरा विचार नहीं है; क्योंकि बिना अपराधके ही उन्होंने मेरी प्रार्थना अस्वीकृत कर दी है ॥ १८ ॥
संवर्त उवाच
चिकीर्षसि यथाकामं सर्वमेतत् त्वयि ध्रुवम् ।
यदि सर्वानभिप्रायान् कर्तासि मम पार्थिव ॥ १ ९ ॥
संवर्तने कहा — पृथ्वीनाथ! यदि मेरी इच्छाके अनुसार काम करो तो तुम जो कुछ चाहोगे, वह निश्चय ही पूर्ण होगा ॥ १ ९ ॥
याज्यमानं मया हि त्वां बृहस्पतिपुरन्दरौ ।
द्विषेतां समभिक्रुद्धावेतदेकं समर्थसेः ॥ २० ॥
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जब मैं तुम्हारा यज्ञ कराऊँगा, तब बृहस्पति और इन्द्र दोनों ही कुपित होकर मेरे साथ द्वेष करेंगे । उस समय तुम्हें मेरे पक्षका समर्थन करना होगा ॥ २० ॥
स्थैर्यमत्र कथं मे स्यात् सत्त्वं निःसंशयं कुरु ।
कुपितस्त्वां न हीदानीं भस्म कुर्यां सबान्धवम् ॥ २१ ॥
परंतु इस बातका मुझे विश्वास कैसे हो कि तुम मेरा साथ दोगे । अतः जैसे भी हो, मेरे मनका संशय दूर हो; नहीं तो अभी क्रोधमें भरकर मैं बन्धु बान्धवोंसहित तुम्हें भस्म कर डालूँगा ॥ २१ ॥
मरुत्त उवाच
यावत् तपेत् सहस्रांशुस्तिष्ठेरंश्चापि पर्वताः ।
तावल्लोकान्न लभेयं त्यजेयं सङ्गतं यदि ॥ २२ ॥
मरुत्तने कहा — ब्रह्मन्! यदि मैं आपका साथ छोड़ दूँ तो जबतक सूर्य तपते हों और जबतक पर्वत स्थिर रहें तबतक मुझे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति न हो ॥ २२ ॥
मा चापि शुभबुद्धित्वं लभेयमिह कर्हिचित् ।
विषयैः सङ्गतं चास्तु त्यजेयं सङ्गतं यदि ॥ २३ ॥
यदि आपका साथ छोड़ दूँ तो मुझे संसारमें शुभ बुद्धि कभी न प्राप्त हो और मैं सदा विषयोंमें ही रचा- पचा रह जाऊँ ॥ २३ ॥
संवर्तउवाच
आविक्षित शुभा बुद्धिर्वर्ततां तव कर्मसु ।
याजनं हि ममाप्येव वर्तते हृदि पार्थिव ॥ २४ ॥
संवर्तने कहा — अविक्षित्-कुमार! तुम्हारी शुभ बुद्धि सदा सत्कर्मोंमें ही लगी रहे । पृथ्वीनाथ! मेरे मनमें भी तुम्हारा यज्ञ करानेकी इच्छा तो है ही ॥ २४ ॥
अभिधास्ये च ते राजन्नक्षयं द्रव्यमुत्तमम् ।
येन देवान् सगन्धर्वान् शक्रं चाभिभविष्यसि ॥ २५ ॥
राजन्! इसके लिये मैं तुम्हें परम उत्तम अक्षय धनकी प्राप्तिका उपाय बतलाऊँगा, जिससे तुम गन्धर्वों - सहित सम्पूर्ण देवताओं तथा इन्द्रको भी नीचा दिखा सकोगे ॥ २५ ॥
न तु मे वर्तते बुद्धिर्धने याज्येषु वा पुनः ।
विप्रियं तु करिष्यामि भ्रातुश्चेन्द्रस्य चोभयोः ॥ २६ ॥
मुझको अपने लिये धन अथवा यजमानोंके संग्रहका विचार नहीं है । मुझे तो भाई बृहस्पति और इन्द्र दोनोंके विरुद्ध कार्य करना है ॥ २६ ॥
गमयिष्यामि शक्रेण समतामपि ते ध्रुवम् ।
प्रियं च ते करिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २७ ॥
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निश्चय ही मैं तुम्हें इन्द्रकी बराबरीमें बैठाऊँगा और तुम्हारा प्रिय करूँगा । मैं यह बात तुमसे सत्य कहता हूँ ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
PPP
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अष्टमोऽध्यायः संवर्तका मरुत्तको सुवर्णकी प्राप्तिके लिये महादेवजीकी नाममयी स्तुतिका उपदेश और धनकी प्राप्ति तथा मरुत्तकी सम्पत्तिसे बृहस्पतिका चिन्तित होना संवर्त उवाच
गिरेर्हिमवतः पृष्ठे मुञ्चवान् नाम पर्वतः ।
तप्यते यत्र भगवांस्तपो नित्यमुमापतिः ॥ १ ॥
संवर्तने कहा — राजन्! हिमालयके पृष्ठभागमें मुञ्चवान् नामक एक पर्वत है, जहाँ उमावल्लभ भगवान् शंकर सदा तपस्या किया करते हैं ॥ १ ॥
वनस्पतीनां मूलेषु शृङ्गेषु विषमेषु च ।
गुहासु शैलराजस्य यथाकामं यथासुखम् ॥ २ ॥
उमासहायो भगवान् यत्र नित्यं महेश्वरः ।
आस्ते शूली महातेजा नानाभूतगणावृतः ॥ ३ ॥
वहाँ वनस्पतियोंके मूलभागमें, दुर्गम शिखरोंपर तथा गिरिराजकी गुफाओंमें नाना प्रकारके भूतगणोंसे घिरे हुए महातेजस्वी त्रिशूलधारी भगवान् महेश्वर उमादेवीके साथ इच्छानुसार सुखपूर्वक सदा निवास करते हैं ॥ २-३ ॥
तत्र रुद्राश्च साध्याश्च विश्वेऽथ वसवस्तथा ।
यमश्च वरुणश्चैव कुबेरश्च सहानुगः ॥ ४ ॥
भूतानि च पिशाचाश्च नासत्यावपि चाश्विनौ ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव यक्षा देवर्षयस्तथा ॥ ५ ॥
आदित्या मरुतश्चैव यातुधानाश्च सर्वशः ।
उपासन्ते महात्मानं बहुरूपमुमापतिम् ॥ ६ ॥
उस पर्वतपर रुद्रगण, साध्यगण, विश्वेदेवगण, वसुगण, यमराज, वरुण, अनुचरोंसहित कुबेर, भूत, पिशाच, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, देवर्षि, आदित्यगण, मरुद्गण तथा यातुधानगण अनेक रूपधारी उमावल्लभ परमात्मा शिवकी सब प्रकारसे उपासना करते हैं ॥ ४–६ ॥
रमते भगवांस्तत्र कुबेरानुचरैः सह ।
विकृतैर्विकृताकारैः क्रीडद्भिः पृथिवीपते ॥ ७ ॥
पृथ्वीनाथ! वहाँ विकराल आकार और विकृत वेषवाले कुबेर- सेवक यक्ष भाँति-भाँतिकी क्रीडाएँ करते हैं और उनके साथ भगवान् शिव आनन्दपूर्वक रहते हैं ॥ ७ ॥