06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 161–170

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

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सुपर्णउवाच एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ पश्यतो मे महायोगी जगामात्मगतिर्गतिम् । गरुड कहते हैं —ऋषियो! ऐसा कहकर वे भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये । वे महायोगी तथा आत्मगतिरूप परमेश्वर मेरे देखते -देखते अदृश्य हो गये ॥ एतदेवंविधं तस्य महिमानं महात्मनः ॥ अच्युतस्याप्रमेयस्य दृष्टवानस्मि यत् पुरा । इस प्रकार मैंने पूर्वकालमें अप्रमेय महात्मा अच्युतकी महिमाका साक्षात्कार किया था । एतद् वः सर्वमाख्यातं चेष्टितं तस्य धीमतः ॥ मयानुभूतं प्रत्यक्षं दृष्ट्वा चाद्भुतकर्मणः । अद्भुतकर्मा परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीहरिकी यह सारी लीला जो मैंने प्रत्यक्ष देखकर अनुभव की है, आपको बता दी ॥ ऋषय ऊचुः अहो श्रावितमाख्यानं भवतात्यद्भुतं महत् ॥ पुण्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् । ऋषियोंने कहा - अहो! आपने यह बड़ा अद्भुत एवं महत्त्वपूर्ण आख्यान सुनाया । यह परम पवित्र प्रसंग यश, आयु एवं स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा महान् मंगलकारी है ॥ एतत् पवित्रं देवानामेतद् गुह्यं परंतप ॥ एतज्ज्ञानवतां ज्ञेयमेषा गतिरनुत्तमा । परंतप गरुडजी! यह पवित्र विषय देवताओंके लिये भी गुह्य रहस्य है । यही ज्ञानियोंका ज्ञेय है और यही सर्वोत्तम गति है ॥ य इमां श्रावयेद् विद्वान् कथां पर्वसु पर्वसु ॥ स लोकान् प्राप्नुयात् पुण्यान् देवर्षिभिरभिष्टुतान् । जो विद्वान् प्रत्येक पर्वके अवसरपर इस कथाको सुनायेगा वह देवर्षियोंद्वारा प्रशंसित पुण्य- लोकोंको प्राप्त होगा ॥ श्राद्धकाले च विप्राणां य इमां श्रावयेच्छुचिः ॥ न तत्र रक्षसां भागो नासुराणां च विद्यते । जो श्राद्धके समय पवित्र भावसे ब्राह्मणोंको यह प्रसंग सुनायेगा, उस श्राद्धमें राक्षसों और असुरोंको भाग नहीं मिलेगा ॥ अनसूयुर्जितक्रोधः सर्वसत्त्वहिते रतः ॥ यः पठेत् सततं युक्तः स व्रजेत् तत्सलोकताम् ।

पृष्ठ 162

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जो दोषदृष्टिसे रहित हो क्रोधको जीतकर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर हो सदा योगयुक्त रहकर इसका पाठ करेगा वह भगवान् विष्णुके लोकमें जायगा ॥ वेदान् पारयते विप्रो राजा विजयवान् भवेत् ॥ वैश्यस्तु धनधान्याढ्यः शूद्रः सुखमवाप्नुयात् । इसका पाठ करनेवाला ब्राह्मण वेदोंका पारंगत विद्वान् होगा । क्षत्रियको इसका पाठ करनेसे युद्धमें विजयकी प्राप्ति होगी । वैश्य धन- धान्यसे सम्पन्न और शूद्र सुखी होगा ॥ भीष्म उवाच

तत'मुनयः सर्वे सम्पूज्य विनतासुतम् ।

स्वानेव चाश्रमान् जग्मुर्बभूवुः शान्तितत्पराः ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर वे सम्पूर्ण महर्षि विनतानन्दन गरुडकी पूजा करके अपने - अपने आश्रमको चले गये और वहाँ शम- दमके साधनमें तत्पर हो गये ॥

स्थूलदर्शिभिराकृष्टो दुर्जेयो ह्यकृतात्मभिः ।

एषा श्रुतिर्महाराज धर्म्या धर्मभृतां वर ॥

सुराणां ब्रह्मणा प्रोक्ता विस्मितानां परंतप । धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज युधिष्ठिर! जिनका मन अपने वशमें नहीं है, उन स्थूलदर्शी पुरुषोंके लिये भगवान् श्रीहरिके तत्त्वका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है । यह धर्मसम्मत श्रुति है । परंतप! इसे ब्रह्माजीने आश्चर्यचकित हुए देवताओंको सुनाया था ॥ ममाप्येषा कथा तात कथिता मातुरन्तिके ॥ वसुभिः सत्त्वसम्पन्नैः तवाप्येषा मयोच्यते । तात! तत्त्वज्ञानी वसुओंने मेरी माता गंगाजीके निकट मुझसे यह कथा कही थी और अब तुमसे मैंने कही है ॥ तदग्निहोत्रपरमा जपयज्ञपरायणाः ॥ निराशीर्बन्धनाः सन्तः प्रयान्त्यक्षरसात्मताम् । जो अग्निहोत्रमें तत्पर, जप - यज्ञमें संलग्न तथा कामनाओंके बन्धनसे मुक्त होते हैं, वे अविनाशी परमात्माके स्वरूपको प्राप्त हो जाते हैं ॥

आरम्भयज्ञानुत्सृज्य जपहोमपरायणाः ।

ध्यायन्तो मनसा विष्णुं गच्छन्ति परमां गतिम् ॥

जो क्रियात्मक यज्ञोंका परित्याग करके जप और होममें तत्पर हो मन - ही- मन भगवान् विष्णुका ध्यान करते हैं वे परम गतिको प्राप्त होते हैं ॥

तदेव परमो मोक्षो मोक्षद्वारं च भारत ।

यदा विनिश्चितात्मानो गच्छन्ति परमां गतिम् ॥

पृष्ठ 163

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भरतनन्दन! जब निश्चित बुद्धिवाले पुरुष परमात्म-तत्त्वको जानकर परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं, वही परम मोक्ष या मोक्षद्वार कहलाता है ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि लोकयात्राकथने त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लोकयात्राके निर्वाहकी विधिका वर्णनविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २०४३ श्लोक मिलाकर कुल २१०३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 164

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चतुर्दशोऽध्यायः भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन युधिष्ठिर उवाच

त्वयाऽऽपगेन नामानि श्रुतानीह जगत्पतेः ।

पितामहेशाय विभो नामान्याचक्ष्व शम्भवे ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने कहा— गंगानन्दन! आपने ब्रह्माजीके भी ईश्वर कल्याणकारी जगदीश्वर भगवान् शिवके जो नाम सुने हों, उन्हें यहाँ बताइये ॥ १ ॥

बभ्रुवे विश्वरूपाय महाभाग्यं च तत्त्वतः ।

सुरासुरगुरौ देवे शंकरेऽव्यक्तयोनये ॥ २ ॥

जो विराट् विश्वरूपधारी हैं, अव्यक्तके भी कारण हैं, उन सुरासुरगुरु भगवान् शंकरके माहात्म्यका यथार्थरूपसे वर्णन कीजिये ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

अशक्तोऽहं गुणान् वक्तुं महादेवस्य धीमतः ।

यो हि सर्वगतो देवो न च सर्वत्र दृश्यते ॥ ३ ॥

ब्रह्मविष्णुसुरेशानां स्रष्टा च प्रभुरेव च ।

ब्रह्मादयः पिशाचान्ता यं हि देवा उपासते ॥ ४ ॥

प्रकृतीनां परत्वेन पुरुषस्य च यः परः ।

चिन्त्यते यो योगविद्भिरृषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।

अक्षरं परमं ब्रह्म असच्च सदसच्च यः ॥ ५ ॥

प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षोभयित्वा स्वतेजसा ।

ब्रह्माणमसृजत् तस्माद् देवदेवः प्रजापतिः ॥ ६ ॥

को हि शक्तो गुणान् वक्तुं देवदेवस्य धीमतः ।

गर्भजन्मजरायुक्तो मर्त्यो मृत्युसमन्वितः ॥ ७ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! मैं परम बुद्धिमान् महादेवजीके गुणोंका वर्णन करनेमें असमर्थ हूँ। जो भगवान् सर्वत्र व्यापक हैं, किन्तु ( सबके आत्मा होनेके कारण ) सर्वत्र देखनेमें नहीं आते हैं, ब्रह्मा, विष्णु और देवराज इन्द्रके भी स्रष्टा तथा प्रभु हैं, ब्रह्मा आदि

पृष्ठ 165

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देवताओंसे लेकर पिशाचतक जिनकी उपासना करते हैं, जो प्रकृतिसे भी परे और पुरुषसे भी विलक्षण हैं, योगवेत्ता तत्त्वदर्शी ऋषि जिनका चिन्तन करते हैं, जो अविनाशी परम ब्रह्म एवं सदसत्स्वरूप हैं, जिन देवाधिदेव प्रजापति शिवने अपने तेजसे प्रकृति और पुरुषको क्षुब्ध करके ब्रह्माजीकी सृष्टि की, उन्हीं देवदेव बुद्धिमान् महादेवजीके गुणोंका वर्णन करनेमें गर्भ, जन्म, जरा और मृत्युसे युक्त कौन मनुष्य समर्थ हो सकता है? ॥

को हि शक्तो भवं ज्ञातुं मद्विधः परमेश्वरम् ।

ऋते नारायणात् पुत्र शङ्खचक्रगदाधरात् ॥ ८ ॥

बेटा! शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् नारायणको छोड़कर मेरे - जैसा कौन पुरुष परमेश्वर शिवके तत्त्वको जान सकता है? ॥ ८ ॥

एष विद्वान् गुणश्रेष्ठो विष्णुः परमदुर्जयः ।

दिव्यचक्षुर्महातेजा वीक्षते योगचक्षुषा ॥ ९ ॥

ये भगवान् विष्णु सर्वज्ञ, गुणोंमें सबसे श्रेष्ठ, अत्यन्त दुर्जय, दिव्य नेत्रधारी तथा महातेजस्वी हैं । ये योगदृष्टिसे सब कुछ देखते हैं ॥ ९ ॥

रुद्रभक्त्या तु कृष्णेन जगद् व्याप्तं महात्मना ।

तं प्रसाद्य तदा देवं बदर्यां किल भारत ॥ १० ॥

अर्थात् प्रियतरत्वं च सर्वलोकेषु वै तदा ।

प्राप्तवानेव राजेन्द्र सुवर्णाक्षान्महेश्वरात् ॥ ११ ॥

भरतनन्दन! रुद्रदेवके प्रति भक्तिके कारण ही महात्मा श्रीकृष्णने सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है । राजन्! कहते हैं कि पूर्वकालमें महादेवजीको बदरिकाश्रममें प्रसन्न करके उन दिव्यदृष्टि महेश्वरसे श्रीकृष्णने सब पदार्थोंकी अपेक्षा प्रियतर भावको प्राप्त कर लिया; अर्थात् वे सम्पूर्ण लोकोंके प्रियतम बन गये ॥ १०-११ ॥

पूर्णं वर्षसहस्रं तु तप्तवानेष माधवः ।

प्रसाद्य वरदं देवं चराचरगुरुं शिवम् ॥ १२ ॥

इन माधवने वरदायक देवता चराचरगुरु भगवान् शिवको प्रसन्न करते हुए पूर्वकालमें पूरे एक हजार वर्षतक तपस्या की थी ॥ १२ ॥

युगे युगे तु कृष्णेन तोषितो वै महेश्वरः ।

भक्त्या परमया चैव प्रीतश्चैव महात्मनः ॥ १३ ॥

श्रीकृष्णने प्रत्येक युगमें महेश्वरको संतुष्ट किया है । महात्मा श्रीकृष्णकी परम भक्तिसे वे सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ १३ ॥

ऐश्वर्यं यादृशं तस्य जगद्योनेर्महात्मनः ।

तदयं दृष्टवान् साक्षात् पुत्रार्थे हरिरच्युतः ॥ १४ ॥

जगत्के कारणभूत परमात्मा शिवका ऐश्वर्य जैसा है, उसे पुत्रके लिये तपस्या करते हुए इन अच्युत श्रीहरिने प्रत्यक्ष देखा है ॥ १४ ॥

पृष्ठ 166

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यस्मात् परतरं चैव नान्यं पश्यामि भारत ।

व्याख्यातुं देवदेवस्य शक्तो नामान्यशेषतः ॥ १५ ॥

भारत! उसी ऐश्वर्यके कारण मैं परात्पर श्रीकृष्णके सिवा किसी दूसरेको ऐसा नहीं देखता जो देवाधिदेव महादेवजीके नामोंकी पूर्णरूपसे व्याख्या कर सके ॥ १५ ॥

एष शक्तो महाबाहुर्वक्तुं भगवतो गुणान् ।

विभूतिं चैव कार्त्स्न्येन सत्यां माहेश्वरीं नृप ॥ १६ ॥

नरेश्वर! ये महाबाहु श्रीकृष्ण ही भगवान् महेश्वरके गुणों तथा उनके यथार्थ ऐश्वर्यका पूर्णतः वर्णन करनेमें समर्थ हैं ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा तदा भीष्मो वासुदेवं महायशाः ।

भवमाहात्म्यसंयुक्तमिदमाह पितामहः ॥ १७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! महायशस्वी पितामह भीष्मने युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर भगवान् वासुदेवके प्रति शंकरजीकी महिमासे युक्त यह बात कही ॥ १७ ॥

भीष्म उवाच

सुरासुरगुरो देव विष्णो त्वं वक्तुमर्हसि ।

शिवाय विश्वरूपाय यन्मां पृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ १८ ॥

भीष्मजी बोले – देवासुरगुरो! विष्णुदेव! राजा युधिष्ठिरने मुझसे जो पूछा है, उस विश्वरूप शिवके माहात्म्यको बतानेके योग्य आप ही हैं ॥ १८ ॥

नाम्नां सहस्रं देवस्य तण्डिना ब्रह्मयोनिना ।

निवेदितं ब्रह्मलोके ब्रह्मणो यत् पुराभवत् ॥ १ ९ ॥

द्वैपायनप्रभृतयस्तथा चेमे तपोधनाः ।

ऋषयः सुव्रता दान्ताः शृण्वन्तु गदतस्तव ॥ २० ॥

पूर्वकालमें ब्रह्मपुत्र तण्डीमुनिके द्वारा ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके समक्ष जिस शिव-सहस्रनामका निरूपण किया गया था, उसीका आप वर्णन करें और ये उत्तम व्रतका पालन करनेवाले व्यास आदि तपोधन एवं जितेन्द्रिय महर्षि आपके मुखसे इसका श्रवण करें ॥

ध्रुवाय नन्दिने होत्रे गोप्त्रे विश्वसृजेऽग्नये ।

महाभाग्यं विभोब्रूहि मुण्डिनेऽथ कपर्दिने ॥ २१ ॥

जो ध्रुव ( कूटस्थ ), नन्दी ( आनन्दमय ), होता, गोप्ता (रक्षक ), विश्वस्रष्टा, गार्हपत्य आदि अग्नि, मुण्डी ( चूड़ारहित ) और कपर्दी (जटाजूटधारी ) हैं, उन भगवान् शंकरके महान् सौभाग्यका आप वर्णन कीजिये ॥ वासुदेव उवाच

पृष्ठ 167

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न गतिः कर्मणां शक्या वेलुमीशस्य तत्त्वतः ।

हिरण्यगर्भप्रमुखा देवाः सेन्द्रा महर्षयः ॥ २२ ॥

न विदुर्यस्य भवनमादित्याः सूक्ष्मदर्शिनः ।

स कथं नरमात्रेण शक्यो ज्ञातुं सतां गतिः ॥ २३ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा- भगवान् शंकरके कर्मोंकी गतिका यथार्थरूपसे ज्ञान होना अशक्य है । ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता, महर्षि तथा सूक्ष्मदर्शी आदित्य भी जिनके निवासस्थानको नहीं जानते, सत्पुरुषोंके आश्रयभूत उन भगवान् शिवके तत्त्वका ज्ञान मनुष्यमात्रको कैसे हो सकता है? ॥ २२-२३ ॥

तस्याहमसुरघ्नस्य कांश्चिद् भगवतो गुणान् ।

भवतां कीर्तयिष्यामि व्रतेशाय यथातथम् ॥ २४ ॥

अतः मैं उन असुरविनाशक व्रतेश्वर भगवान् शंकरके कुछ गुणोंका आपलोगोंके समक्ष यथार्थरूपसे वर्णन करूँगा ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा तु भगवान् गुणांस्तस्य महात्मनः ।

उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा कथयामास धीमतः ॥ २५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण आचमन करके पवित्र हो बुद्धिमान् परमात्मा शिवके गुणोंका वर्णन करने लगे ॥ २५ ॥

वासुदेव उवाच

शुश्रूषध्वं ब्राह्मणेन्द्रास्त्वं च तात युधिष्ठिर ।

त्वं चापगेय नामानि शृणुष्वेह कपर्दिने ॥ २६ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण बोले- यहाँ बैठे हुए ब्राह्मण- शिरोमणियो! सुनो, तात युधिष्ठिर! और गंगानन्दन भीष्म! आपलोग भी यहाँ भगवान् शंकरके नामोंका श्रवण करें ॥ २६ ॥

यदवाप्तं च मे पूर्वं साम्बहेतोः सुदुष्करम् ।

यथावद् भगवान् दृष्टो मया पूर्वं समाधिना ॥ २७ ॥

पूर्वकालमें साम्बकी उत्पत्तिके लिये अत्यन्त दुष्कर तप करके मैंने जिस दुर्लभ नामसमूहका ज्ञान प्राप्त किया था और समाधिके द्वारा भगवान् शंकरका जिस प्रकार यथावत्रूपसे साक्षात्कार किया था, वह सब प्रसंग सुना रहा हूँ ॥ २७ ॥

शम्बरे निहते पूर्वं रौक्मिणेयेन धीमता ।

अतीते द्वादशे वर्षे जाम्बवत्यब्रवीद्धि माम् ॥ २८ ॥

प्रद्युम्नचारुदेष्णादीन् रुक्मिण्या वीक्ष्य पुत्रकान् ।

पुत्रार्थिनी मामुपेत्य वाक्यमाह युधिष्ठिर ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 168

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युधिष्ठिर! बुद्धिमान् रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नके द्वारा पूर्वकालमें जब शम्बरासुर मारा गया और वे द्वारकामें आये, तबसे बारह वर्ष व्यतीत होनेके पश्चात् रुक्मिणीके प्रद्युम्न, चारुदेष्ण आदि पुत्रोंको देखकर पुत्रकी इच्छा रखनेवाली जाम्बवती मेरे पास आकर इस प्रकार बोली I ॥ २८-२९ ॥

शूरं बलवतां श्रेष्ठं कान्तरूपमकल्मषम् ।

आत्मतुल्यं मम सुतं प्रयच्छाच्युत माचिरम् ॥ ३० ॥

'अच्युत! आप मुझे अपने ही समान शूरवीर, बलवानोंमें श्रेष्ठ तथा कमनीय रूप-सौन्दर्यसे युक्त निष्पाप पुत्र प्रदान कीजिये । इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये ॥ ३० ॥

न हि तेऽप्राप्यमस्तीह त्रिषु लोकेषु किंचन ।

लोकान् सृजेस्त्वमपरानिच्छन् यदुकुलोद्वह ॥ ३१ ॥

‘ यदुकुलधुरन्धर! आपके लिये तीनों लोकोंमें कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं है । आप चाहें तो दूसरे दूसरे लोकोंकी सृष्टि कर सकते हैं ॥ ३१ ॥

त्वया द्वादशवर्षाणि व्रतीभूतेन शुष्यता ।

आराध्य पशुभर्तारं रुक्मिण्यां जनिताः सुताः ॥ ३२ ॥

' आपने बारह वर्षोंतक व्रतपरायण हो अपने शरीरको सुखाकर भगवान् पशुपतिकी आराधना की और रुक्मिणीदेवीके गर्भसे अनेक पुत्र उत्पन्न किये ॥ ३२ ॥

चारुदेष्णः सुचारुश्च चारुवेशो यशोधरः ।

चारुश्रवाश्चारुयशाः प्रद्युम्नः शम्भुरेव च ॥ ३३ ॥

यथा ते जनिताः पुत्रा रुक्मिण्यां चारुविक्रमाः ।

तथा ममापि तनयं प्रयच्छ मधुसूदन ॥ ३४ ॥

‘ मधुसूदन! चारुदेष्ण, सुचारु, चारुवेश, यशोधर, चारुश्रवा, चारुयशा, प्रद्युम्न और शम्भु —इन सुन्दर पराक्रमी पुत्रोंको जिस प्रकार आपने रुक्मिणीदेवीके गर्भसे उत्पन्न किया है उसी प्रकार मुझे भी पुत्र प्रदान कीजिये ' ॥ ३३-३४ ॥

इत्येवं चोदितो देव्या तामवोचं सुमध्यमाम् ।

अनुजानीहि मां राज्ञि करिष्ये वचनं तव ॥ ३५ ॥

देवी जाम्बवतीके इस प्रकार प्रेरणा देनेपर मैंने उस सुन्दरीसे कहा - ' रानी! मुझे जानेकी अनुमति दो । मैं तुम्हारी प्रार्थना सफल करूँगा' ॥ ३५ ॥

सा च मामब्रवीद् गच्छ शिवाय विजयाय च ।

ब्रह्मा शिवः काश्यपश्च नद्यो देवा मनोऽनुगाः ॥ ३६ ॥

क्षेत्रौषध्यो यज्ञवाहाश्छन्दांस्यृषिगणाध्वराः ।

समुद्रा दक्षिणास्तोभा ऋक्षाणि पितरो ग्रहाः ॥ ३७ ॥

देवपत्न्यो देवकन्या देवमातर एव च ।

मन्वन्तराणि गावश्च चन्द्रमाः सविता हरिः ॥ ३८ ॥

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सावित्री ब्रह्मविद्या च ऋतवो वत्सरास्तथा ।

क्षणा लवा मुहूर्ताश्च निमेषा युगपर्ययाः ॥ ३ ९ ॥

रक्षन्तु सर्वत्र गतं त्वां यादव सुखाय च ।

अरिष्टं गच्छ पन्थानमप्रमत्तो भवानघ ॥ ४० ॥

उसने कहा — ‘ प्राणनाथ! आप कल्याण और विजय पानेके लिये जाइये । यदुनन्दन! ब्रह्मा, शिव, काश्यप, नदियाँ, मनोऽनुकूल देवगण, क्षेत्र, ओषधियाँ, यज्ञवाह ( मन्त्र), छन्द, ऋषिगण, यज्ञ, समुद्र, दक्षिणा, स्तोभ ( सामगानपूरक 'हावु ' ' हायि' आदि शब्द ), नक्षत्र, पितर, ग्रह, देवपत्नियाँ, देवकन्याएँ और देवमाताएँ, मन्वन्तर, गौ, चन्द्रमा, सूर्य, इन्द्र, सावित्री, ब्रह्मविद्या, ऋतु, वर्ष, क्षण, लव, मुहूर्त, निमेष और युग — ये सर्वत्र आपकी रक्षा करें । आप अपने मार्गपर निर्विघ्न यात्रा करें और अनघ! आप सतत सावधान रहें ' ॥ ३६ –४० ॥ एवं कृतस्वस्त्ययनस्तयाहं ततोऽभ्यनुज्ञाय नरेन्द्रपुत्रीम् । पितुः समीपं नरसत्तमस्य मातुश्च राज्ञश्च तथाऽऽहुकस्य ॥ ४१ ॥

गत्वा समावेद्य यदब्रवीन्मां विद्याधरेन्द्रस्य सुता भृशार्ता । तानभ्यनुज्ञाय तदातिदुःखाद् गदं तथैवातिबलं च रामम् । अथचतुः प्रीतियुती तदानीं तपःसमृद्धिर्भवतोऽस्त्वविघ्नम् ॥ ४२ ॥

इस तरह जाम्बवतीके द्वारा स्वस्तिवाचनके पश्चात् मैं उस राजकुमारीकी अनुमति ले नरश्रेष्ठ पिता वसुदेव, माता देवकी तथा राजा उग्रसेनके समीप गया । वहाँ जाकर विद्याधरराजकुमारी जाम्बवतीने अत्यन्त आर्त होकर मुझसे जो प्रार्थना की थी वह सब मैंने बताया और उन सबसे तपके लिये जानेकी आज्ञा ली । गद और अत्यन्त बलवान् बलरामजीसे विदा माँगी । उन दोनोंने बड़े दुःखसे अत्यन्त प्रेमपूर्वक उस समय मुझसे कहा —‘भाई! तुम्हारी तपस्या निर्विघ्न पूर्ण हो ' ॥ ४१-४२ ॥

प्राप्यानुज्ञां गुरुजनादहं तार्क्ष्यमचिन्तयम् ।

सोऽवहद्धिमवन्तं मां प्राप्य चैनं व्यसर्जयम् ॥ ४३ ॥

गुरुजनोंकी आज्ञा पाकर मैंने गरुडका चिन्तन किया । उसने ( आकर मुझे हिमालयपर पहुँचा दिया । वहाँ पहुँचकर मैंने गरुडको विदा कर दिया ॥ ४३ ॥

तत्राहमद्भुतान् भावानपश्यं गिरिसत्तमे ।

क्षेत्रं च तपसां श्रेष्ठं पश्याम्यद्भुतमुत्तमम् ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 170

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मैंने उस श्रेष्ठ पर्वतपर वहाँ अद्भुत भाव देखे। मुझे वहाँका स्थान तपस्याके लिये अद्भुत, उत्तम और श्रेष्ठ क्षेत्र दिखायी दिया ॥ ४४ ॥

दिव्यं वैयाघ्रपद्यस्य उपमन्योर्महात्मनः ।

पूजितं देवगन्धर्वैर्ब्राह्मया लक्ष्म्या समावृतम् ॥ ४५ ॥

वह व्याघ्रपादके पुत्र महात्मा उपमन्युका दिव्य आश्रम था, जो ब्राह्मी शोभासे सम्पन्न तथा देवताओं और गन्धर्वोद्वारा सम्मानित था ॥ ४५ ॥

धवककुभकदम्बनारिकेलैः कुरबककेतकजम्बुपाटलाभिः । वटवरुणकवत्सनाभबिल्वैः सरलकपित्थप्रियालसालतालैः ॥ ४६ ॥

बदरीकुन्दपुन्नागैरशोकाम्रातिमुक्तकैः ।

मधूकैः कोविदारैश्च चम्पकैः पनसैस्तथा ॥ ४७ ॥

वन्यैर्बहुविधैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युतम् ।

पुष्पगुल्मलताकीर्णं कदलीषण्डशोभितम् ॥ ४८ ॥

धव, ककुभ ( अर्जुन), कदम्ब, नारियल, कुरबक, केतक, जामुन, पाटल, बड़, वरुणक, वत्सनाभ, बिल्व, सरल, कपित्थ, प्रियाल, साल, ताल, बेर, कुन्द, पुन्नाग, अशोक, आम्र, अतिमुक्त, महुआ, कोविदार, चम्पा तथा कटहल आदि बहुत -से फल- फूल देनेवाले विविध वन्य वृक्ष उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे । फूलों, गुल्मों और लताओंसे वह व्याप्त था । केलेके कुंज उसकी शोभाको और भी बढ़ा रहे थे ॥ ४६-४८ ॥

नानाशकुनिसम्भोज्यैः फलैर्वृक्षैरलंकृतम् ।

यथास्थानविनिक्षिप्तैर्भूषितं भस्मराशिभिः ॥ ४ ९ ॥

नाना प्रकारके पक्षियोंके खाने योग्य फल और वृक्ष उस आश्रमके अलंकार थे ।

यथास्थान रखी हुई भस्मराशिसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४ ९ ॥

रुरुवानरशार्दूलसिंहद्वीपिसमाकुलम् ।

कुरङ्गबर्हिणाकीर्णं मार्जारभुजगावृतम् ।

पूगैश्च मृगजातीनां महिषर्क्षनिषेवितम् ॥ ५० ॥

रुरु, वानर, शार्दूल, सिंह, चीते, मृग, मयूर, बिल्ली, सर्प, विभिन्न जातिके मृगोंके झुंड, भैंस तथा रीछोंसे उस आश्रमका निकटवर्ती वन भरा हुआ था ॥ ५० ॥

सकृत्प्रभिन्नैश्च गजैर्विभूषितं

प्रहृष्टनानाविधपक्षिसेवितम् ।

सुपुष्पितैरम्बुधरप्रकाशै- र्महीरुहाणां च वनैर्विचित्रैः ॥ ५१ ॥