श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 171–180
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180
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जिनके मस्तकसे पहली बार मदकी धारा फूटकर बही थी, ऐसे हाथी वहाँके उपवनकी शोभा बढ़ाते थे । हर्षमें भरे हुए नाना प्रकारके विहंगम वहाँके वृक्षोंपर बसेरे लेते थे । अनेकानेक वृक्षोंके विचित्र वन सुन्दर फूलोंसे सुशोभित हो मेघोंके समान प्रतीत होते थे और उन सबके द्वारा उस आश्रमकी अनुपम शोभा हो रही थी ॥ ५१ ॥
नानापुष्परजोमिश्रो गजदानाधिवासितः ।
दिव्यस्त्रीगीतबहुलो मारुतोऽभिमुखो ववौ ॥ ५२ ॥
सामनेसे नाना प्रकारके पुष्पोंके परागपुंजसे पूरित तथा हाथियोंके मदकी सुगन्धसे सुवासित मन्द-मन्द अनुकूल वायु आ रही थी; जिसमें दिव्य रमणियोंके मधुर गीतोंकी मनोरम ध्वनि विशेषरूपसे व्याप्त थी ॥ ५२ ॥
धारानिनादैर्विहगप्रणादैः शुभैस्तथा बृंहितैः कुञ्जराणाम् । गीतैस्तथा किन्नराणामुदारैः शुभैः स्वनैः सामगानां च वीर ॥ ५३ ॥
वीर! पर्वतशिखरोंसे झरते हुए झरनोंकी झर-झर ध्वनि, विहंगमोंके सुन्दर कलरव, हाथियोंकी गर्जना, किन्नरोंके उदार (मनोहर) गीत तथा सामगान करनेवाले सामवेदी विद्वानोंके मंगलमय शब्द उस वन- प्रान्तको संगीतमय बना रहे थे ॥ ५३ ॥
अचिन्त्यं मनसाप्यन्यैः सरोभिः समलंकृतम् ।
विशालैश्चाग्निशरणैर्भूषितं कुसुमावृतैः ॥ ५४ ॥
जिसके विषयमें दूसरे लोग मनसे सोच भी नहीं सकते, ऐसी अचिन्त्य शोभासे सम्पन्न वह पर्वतीय भाग अनेकानेक सरोवरोंसे अलंकृत तथा फूलोंसे आच्छादित विशाल अग्निशालाओंद्वारा विभूषित था ॥ ५४ ॥
विभूषितं पुण्यपवित्रतोयया
सदा च जुष्टं नृप जह्नुकन्यया ।
विभूषितं धर्मभृतां वरिष्ठै- महात्मभिर्वह्निसमानकल्पैः ॥ ५५ ॥
नरेश्वर! पुण्यसलिला जाह्नवी सदा उस क्षेत्रकी शोभा बढ़ाती हुई मानो उसका सेवन करती थीं । अग्निके समान तेजस्वी तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ अनेकानेक महात्माओंसे वह स्थान विभूषित था ॥ ५५ ॥
वाय्वाहारैरम्बुपैर्जप्यनित्यैः सम्प्रक्षालैर्योगिभिर्ध्याननित्यैः । धूमप्राशैरूष्मपैः क्षीरपैश्च संजुष्टं च ब्राह्मणेन्द्रैः समन्तात् ॥ ५६ ॥
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वहाँ चारों ओर श्रेष्ठ ब्राह्मण निवास करते थे । उनमेंसे कुछ लोग केवल वायु पीकर रहते थे । कुछ लोग जल पीकर जीवन धारण करते थे । कुछ लोग निरन्तर जपमें संलग्न रहते थे । कुछ साधक मैत्री - मुदिता आदि साधनाओंद्वारा अपने चित्तका शोधन करते थे । कुछ योगी निरन्तर ध्यानमग्न रहते थे । कोई अग्निहोत्रका धूआँ, कोई गरम - गरम सूर्यकी किरणें और कोई दूध पीकर रहते थे ॥ ५६ ॥
गोचारिणोऽथाश्मकुट्टा दन्तोलूखलिकास्तथा ।
मरीचिपाः फेनपाश्च तथैव मृगचारिणः ॥ ५७ ॥
कुछ लोग गोसेवाका व्रत लेकर गौओंके ही साथ रहते और विचरते थे । कुछ लोग खाद्य वस्तुओंको पत्थरसे पीसकर खाते थे और कुछ लोग दाँतोंसे ही ओखली- मूसलका काम लेते थे । कुछ लोग किरणों और फेनोंका पान करते थे तथा कितने ही ऋषि मृगचर्याका व्रत लेकर मृगोंके ही साथ रहते और विचरते थे ॥ ५७ ॥
अश्वत्थफलभक्षाश्च तथा ह्युदकशायिनः ।
चीरचर्माम्बरधरास्तथा वल्कलधारिणः ॥ ५८ ॥
कोई पीपलके फल खाकर रहते, कोई जलमें ही सोते तथा कुछ लोग चीर, वल्कल और मृगचर्म धारण करते थे ॥ ५८ ॥
सुदुःखान् नियमांस्तांस्तान् वहतः सुतपोधनान् ।
पश्यन् मुनीन् बहुविधान् प्रवेष्टुमुपचक्रमे ॥ ५ ९ ॥
अत्यन्त कष्टसाध्य नियमोंका निर्वाह करते हुए विविध तपस्वी मुनियोंका दर्शन करते हुए मैंने उस महान् आश्रममें प्रवेश करनेका उपक्रम किया ॥ ५ ९ ॥ सुपूजितं देवगणैर्महात्मभिः शिवादिभिर्भारत पुण्यकर्मभिः । रराज तच्चाश्रममण्डलं सदा दिवीव राजन् शशिमण्डलं यथा ॥ ६० ॥
भरतवंशी नरेश! महात्मा तथा पुण्यकर्मा शिव आदि देवताओंसे समादृत हो वह आश्रममण्डल सदा ही आकाशमें चन्द्रमण्डलकी भाँति शोभा पाता था ॥ ६० ॥
क्रीडन्ति सर्वैर्नकुला मृगैर्व्याघ्राश्च मित्रवत् ।
प्रभावाद् दीप्ततपसां सैनिकर्षान्महात्मनाम् ॥ ६१ ॥
वहाँ तीव्र तपस्यावाले महात्माओंके प्रभाव तथा सांनिध्यसे प्रभावित हो नेवले साँपोंके साथ खेलते थे और व्याघ्र मृगोंके साथ मित्रकी भाँति रहते थे ॥ ६१ ॥
तत्राश्रमपदे श्रेष्ठे सर्वभूतमनोरमे ।
सेविते द्विजशार्दूलैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ६२ ॥
नानानियमविख्यातैर्ऋषिभिः सुमहात्मभिः ।
प्रविशन्नेव चापश्यं जटाचीरधरं प्रभुम् ॥ ६३ ॥
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तेजसा तपसा चैव दीप्यमानं यथानलम् ।
शिष्यैरनुगतं शान्तं युवानं ब्राह्मणर्षभम् ॥ ६४ ॥
वेद- वेदांगोंके पारंगत विद्वान् श्रेष्ठ ब्राह्मण जिसका सेवन करते थे तथा नाना प्रकारके नियमोंद्वारा विख्यात हुए महात्मा महर्षि जिसकी शोभा बढ़ाते थे, समस्त प्राणियोंके लिये मनोरम उस श्रेष्ठ आश्रममें प्रवेश करते ही मैंने जटावल्कलधारी, प्रभावशाली, तेज और तपस्यासे अग्निके समान देदीप्यमान, शान्तस्वभाव और युवावस्थासे सम्पन्न ब्राह्मणशिरोमणि उपमन्युको शिष्योंसे घिरकर बैठा देखा ॥ ६२–६४ ॥ शिरसा वन्दमानं मामुपमन्युरभाषत ॥ ६५ ॥
स्वागतं पुण्डरीकाक्ष सफलानि तपांसि नः ।
यः पूज्यः पूजयसि मां द्रष्टव्यो द्रष्टुमिच्छसि ॥ ६६ ॥
मैंने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया । मुझे वन्दना करते देख उपमन्यु बोले ——पुण्डरीकाक्ष! आपका स्वागत है । आप पूजनीय होकर मेरी पूजा करते हैं और दर्शनीय होकर मेरा दर्शन चाहते हैं, इससे हमलोगोंकी तपस्या सफल हो गयी ' ॥ ६५-६६ ॥
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा मृगपक्षिष्वथाग्निषु ।
धर्मे च शिष्यवर्गे च समपृच्छमनामयम् ॥ ६७ ॥
तब मैंने हाथ जोड़कर आश्रमके मृग, पक्षी, अग्निहोत्र, धर्माचरण तथा शिष्यवर्गका कुशल- समाचार पूछा ॥ ६७ ॥
ततो मां भगवानाह साम्ना परमवल्गुना ।
लप्स्यसे तनयं कृष्ण आत्मतुल्यमसंशयम् ॥ ६८ ॥
तब भगवान् उपमन्युने परम मधुर सान्त्वनापूर्ण वाणीमें मुझसे कहा – श्रीकृष्ण! आप अपने समान पुत्र प्राप्त करेंगे — इसमें संशय नहीं है ॥ ६८ ॥
तपः सुमहदास्थाय तोषयेशानमीश्वरम् ।
इह देवः सपत्नीकः समाक्रीडत्यधोक्षज ॥ ६ ९ ॥
अधोक्षज! आप महान् तपका आश्रय लेकर यहाँ सर्वेश्वर भगवान् शिवको संतुष्ट कीजिये । यहाँ महादेवजी अपनी पत्नी भगवती उमाके साथ क्रीड़ा करते हैं ॥ ६ ९ ॥
इहैनं दैवतश्रेष्ठं देवाः सर्षिगणाः पुरा ।
तपसा ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च ॥ ७० ॥
तोषयित्वा शुभान् कामान् प्राप्तवन्तो जनार्दन । जनार्दन! यहाँ सुरश्रेष्ठ महादेवजीको तपस्या, ब्रह्मचर्य, सत्य और इन्द्रिय- संयमद्वारा संतुष्ट करके पहले कितने ही देवता और महर्षि अपने शुभ मनोरथ प्राप्त कर चुके हैं ॥ ७० || तेजसां तपसां चैव निधिः स भगवानिह ॥ ७१ ॥
शुभाशुभान्वितान् भावान् विसृजन् संक्षिपन्नपि ।
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आस्ते देव्या सदाचिन्त्यो यं प्रार्थयसि शत्रुहन् ॥ ७२ ॥
शत्रुनाशक श्रीकृष्ण! आप जिनकी प्रार्थना करते हैं, वे तेज और तपस्याकी निधि अचिन्त्य भगवान् शंकर यहाँ शम आदि शुभभावोंकी सृष्टि और काम आदि अशुभ भावोंका संहार करते हुए देवी पार्वतीके साथ सदा विराजमान रहते हैं ॥ ७१-७२ ॥
हिरण्यकशिपुर्योऽभूद् दानवो मेरुकम्पनः ।
तेन सर्वामरैश्वर्यं शर्वात् प्राप्तं समार्बुदम् ॥ ७३ ॥
पहले जो मेरुपर्वतको भी कम्पित कर देनेवाला हिरण्यकशिपु नामक दानव हुआ था, उसने भगवान् शंकरसे एक अर्बुद (दस करोड़) वर्षोंतकके लिये सम्पूर्ण देवताओंका ऐश्वर्य प्राप्त किया था ॥ ७३ ॥
तस्यैव पुत्रप्रवरो मन्दारो नाम विश्रुतः ।
महादेववराच्छक्रं वर्षार्बुदमयोधयत् ॥ ७४ ॥
उसीका श्रेष्ठ पुत्र मन्दार नामसे विख्यात हुआ, जो महादेवजीके वरसे एक अर्बुद वर्षोंतक इन्द्रके साथ युद्ध करता रहा ॥ ७४ ॥
विष्णोश्चक्रं च तद् घोरं वज्रमाखण्डलस्य च ।
शीर्णं पुराभवत् तात ग्रहस्याङ्गेषु केशव ॥ ७५ ॥
तात केशव! भगवान् विष्णुका वह भयंकर चक्र तथा इन्द्रका वज्र भी पूर्वकालमें उस ग्रहके अंगोंपर पुराने तिनकोंके समान जीर्ण- शीर्ण- सा हो गया था ॥ ७५ ॥
यत् तद् भगवता पूर्वं दत्तं चक्रं तवानघ ।
जलान्तरचरं हत्वा दैत्यं च बलगर्वितम् ॥ ७६ ॥
उत्पादितं वृषाङ्केन दीप्तज्वलनसंनिभम् ।
दत्तं भगवता तुभ्यं दुर्धर्षं तेजसाद्भुतम् ॥ ७७ ॥
निष्पाप श्रीकृष्ण! पूर्वकालमें जलके भीतर रहनेवाले गर्वीले दैत्यको मारकर भगवान् शंकरने आपको जो चक्र प्रदान किया था, उस अग्निके समान तेजस्वी शस्त्रको स्वयं भगवान् वृषध्वजने ही उत्पन्न किया और आपको दिया था, वह अस्त्र अद्भुत तेजसे युक्त एवं दुर्धर्ष है ॥ ७६-७७ ॥
न शक्यं द्रष्टुमन्येन वर्जयित्वा पिनाकिनम् ।
सुदर्शनं भवत्येवं भवेनोक्तं तदा तु तत् ॥ ७८ ॥
सुदर्शनं तदा तस्य लोके नाम प्रतिष्ठितम् ।
तज्जीर्णमभवत् तात ग्रहस्याङ्गेषु केशव ॥ ७९ ॥
पिनाकपाणि भगवान् शंकरको छोड़कर दूसरा कोई उसको देख नहीं सकता था । उस समय भगवान् शंकरने कहा - ' यह अस्त्र सुदर्शन (देखनेमें सुगम) हो जाय । ' तभीसे संसारमें उसका सुदर्शन नाम प्रचलित हो गया । तात केशव! ऐसा प्रसिद्ध अस्त्र भी उस ग्रहके अंगोंपर जीर्ण- सा हो गया ॥ ७८-७९ ॥
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ग्रहस्यातिबलस्याङ्गे वरदत्तस्य धीमतः ।
न शस्त्राणि वहन्त्यङ्गे चक्रवज्रशतान्यपि ॥ ८० ॥
भगवान् शंकरसे उसको वर मिला था । उस अत्यन्त बलशाली बुद्धिमान् ग्रहके अंगमें चक्र और वज्र - जैसे सैकड़ों शस्त्र भी काम नहीं देते थे ॥ ८० ॥
अर्द्यमानाश्च विबुधा ग्रहेण सुबलीयसा ।
शिवदत्तवरान् जघ्नुरसुरेन्द्रान् सुरा भृशम् ॥ ८१ ॥
जब उस बलवान् ग्रहने देवताओंको सताना आरम्भ कर दिया तब देवताओंने भी भगवान् शंकरसे वर पाये हुए उन असुरेन्द्रोंको बहुत पीटा । ( इस प्रकार उनमें दीर्घकालतक युद्ध होता रहा ॥ ८१ ॥
तुष्टो विद्युत्प्रभस्यापि त्रिलोकेश्वरतां ददौ ।
शतं वर्षसहस्राणां सर्वलोकेश्वरोऽभवत् ॥ ८२ ॥
इसी तरह विद्युत्प्रभ नामक दैत्यपर भी संतुष्ट होकर रुद्रदेवने उसे तीनों लोकोंका आधिपत्य प्रदान कर दिया । इस प्रकार वह एक लाख वर्षोंतक सम्पूर्ण लोकोंका अधीश्वर बना रहा ॥ ८२ ॥
ममैवानुचरो नित्यं भवितासीति चाब्रवीत् ।
तथा पुत्रसहस्राणामयुतं च ददौ प्रभुः ॥ ८३ ॥
भगवान्ने उसे यह भी वर दिया था कि ' तुम मेरे नित्य पार्षद हो जाओगे ' साथ ही उन प्रभुने उसे सहस्र अयुत (एक करोड़) पुत्र प्रदान किये ॥ ८३ ॥
कुशद्वीपं च स ददौ राज्येन भगवानजः ।
तथा शतमुखो नाम धात्रा सृष्टो महासुरः ॥ ८४ ॥
येन वर्षशतं साग्रमात्ममांसैर्हुतोऽनलः । अजन्मा भगवान् शिवने उसे राज्य करनेके लिये कुशद्वीप दिया था। इसी प्रकार भगवान् ब्रह्माने एक समय शतमुख नामक महान् असुरकी सृष्टि की थी, जिसने सौ वर्षसे अधिक कालतक अग्निमें अपने ही मांसकी आहुति दी थी ॥ ८४ ॥
तं प्राह भगवांस्तुष्टः किं करोमीति शंकरः ॥ ८५ ॥
तं वै शतमुखः प्राह योगो भवतु मेऽद्भुतः ।
बलं च दैवतश्रेष्ठ शाश्वतं सम्प्रयच्छ मे ॥ ८६ ॥
उससे संतुष्ट होकर भगवान् शंकरने पूछा — ' बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करूँ? ' तब शतमुखने उनसे कहा- ' सुरश्रेष्ठ! मुझे अद्भुत योगशक्ति प्राप्त हो । साथ ही आप मुझे सदा बना रहनेवाला बल प्रदान कीजिये ' ॥ ८५-८६ ॥
तथेति भगवानाह तस्य तद् वचनं प्रभुः ।
स्वायम्भुवः क्रतुश्चापि पुत्रार्थमभवत् पुरा ॥ ८७ ॥
आविश्य योगेनात्मानं त्रीणि वर्षशतान्यपि ।
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तस्य चोपददौ पुत्रान् सहस्रं क्रतुसम्मितान् ॥ ८८ ॥
उसकी वह बात सुनकर शक्तिशाली भगवान्ने ' तथास्तु ' कहकर उसे स्वीकार कर लिया । इसी तरह पूर्वकालमें स्वयम्भूके पुत्र क्रतुने पुत्र प्राप्तिके लिये तीन सौ वर्षोंतक योगके द्वारा अपने आपको भगवान् शिवके चिन्तनमें लगा रखा था; अतः क्रतुको भी भगवान् शंकरने उन्हींके समान एक हजार पुत्र प्रदान किये ॥ ८७-८८ ॥
योगेश्वरं देवगीतं वेत्थ कृष्ण न संशयः ।
याज्ञवल्क्य इति ख्यात ऋषिः परमधार्मिकः ॥ ८ ९ ॥
आराध्य स महादेवं प्राप्तवानतुलं यशः । श्रीकृष्ण! देवता जिनकी महिमाका गान करते हैं, उन योगेश्वर शिवको आप भलीभाँति जानते हैं, इसमें संशय नहीं है । याज्ञवल्क्य नामके विख्यात परम धर्मात्मा ऋषिने महादेवजीकी आराधना करके अनुपम यश प्राप्त किया ॥ ८ ९ ॥ वेदव्यासश्च योगात्मा पराशरसुतो मुनिः ॥ ९० ॥
सोऽपि शङ्करमाराध्य प्राप्तवानतुलं यशः । पराशरजीके पुत्र मुनिवर वेदव्यास तो योगके स्वरूप ही हैं । उन्होंने भी शंकरजीकी आराधना करके वह महान् यश पा लिया, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥ बालखिल्या मघवता ह्यवज्ञाताः पुरा किल ॥ ९ १ ॥ तैः क्रुद्धैर्भगवान् रुद्रस्तपसा तोषितो ह्यभूत् । कहते हैं, पूर्वकालमें किसी समय इन्द्रने बालखिल्य नामक ऋषियोंका अपमान कर दिया था । उन ऋषियोंने कुपित होकर तपस्या की और उसके द्वारा भगवान् रुद्रको संतुष्ट किया ॥ ९ १ ॥ तांश्चापि दैवतश्रेष्ठः प्राह प्रीतो जगत्पतिः ॥ ९ २ ॥ सुपर्णं सोमहर्तारं तपसोत्पादयिष्यथ । तब सुरश्रेष्ठ विश्वनाथ शिवने प्रसन्न होकर उनसे कहा- ' तुम अपनी तपस्याके बलसे गरुडको उत्पन्न करोगे, जो इन्द्रका अमृत छीन लायेगा' ॥ ९ २३ ॥ महादेवस्य रोषाच्च आपो नष्टाः पुराभवन् ॥ ९ ३ ॥
ताश्च सप्तकपालेन देवैरन्याः प्रवर्तिताः ।
ततः पानीयमभवत् प्रसन्ने त्र्यम्बके भुवि ॥ ९ ४ ॥
पहलेकी बात है, महादेवजीके रोषसे जल नष्ट हो गया था । तब देवताओंने, जिसके स्वामी रुद्र हैं, उस सप्त कपालयागके द्वारा दूसरा जल प्राप्त किया । इस प्रकार त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवके प्रसन्न होनेपर ही भूतलपर जलकी उपलब्धि हुई ॥ ९ ३ - ९ ४ ॥
अत्रेर्भार्यापि भर्तारं संत्यज्य ब्रह्मवादिनी ।
नाहं तस्य मुनेर्भूयो वशगा स्यां कथंचन ॥ ९ ५ ॥
इत्युक्त्वा सा महादेवमगच्छच्छरणं किल ।
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अत्रिकी पत्नी ब्रह्मवादिनी अनसूया भी किसी समय रुष्ट हो अपने पतिको त्यागकर चली गयीं और मनमें यह संकल्प करके कि ' अब मैं किसी तरह भी पुनः अत्रिमुनिके वशीभूत नहीं होऊँगी' महादेवजीकी शरण में गयीं ॥ ९ ५३ ॥ निराहारा भयादत्रेस्त्रीणि वर्षशतान्यपि ॥ ९ ६ ॥ अशेत मुसलेष्वेव प्रसादार्थं भवस्य सा । वे अत्रिमुनिके भयसे तीन सौ वर्षोंतक निराहार रहकर मुसलोंपर ही सोयीं और भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये तपस्या करती रहीं ॥ ९ ६३ ॥ तामब्रवीद्धसन् देवो भविता वै सुतस्तव ॥ ९ ७ ॥
विना भर्त्रा च रुद्रेण भविष्यति न संशयः ।
वंशे तवैव नाम्ना तु ख्यातिं यास्यति चेप्सिताम् ॥ ९ ८ ॥
तब महादेवजीने उनसे हँसते हुए कहा – ' देवि! मेरी कृपासे केवल यज्ञसम्बन्धी चरुका द्रव पीनेमात्रसे तुम्हें पतिके सहयोगके बिना ही एक पुत्र प्राप्त होगा- इसमें संशय नहीं है । वह तुम्हारे वंशमें तुम्हारे ही नामसे इच्छानुसार ख्याति प्राप्त करेगा' ॥ ९ ७- ९ ८ ॥
विकर्णश्च महादेवं तथा भक्तसुखावहम् ।
प्रसाद्य भगवान् सिद्धिं प्राप्तवान् मधुसूदन ॥ ९९ ॥
मधुसूदन! ऐश्वर्यशाली विकर्णने भक्तसुखदायक महादेवजीको प्रसन्न करके मनोवांछित सिद्धि प्राप्त की थी ॥ ९९ ॥
शाकल्यः संशितात्मा वै नववर्षशतान्यपि ।
आराधयामास भवं मनोयज्ञेन केशव ॥ १०० ॥
केशव! शाकल्य ऋषिके मनमें सदा संशय बना रहता था । उन्होंने मनोमय यज्ञ ( ध्यान ) -के द्वारा भगवान् शिवकी नौ सौ वर्षोंतक आराधना की ॥ १०० ॥
तं चाह भगवांस्तुष्टो ग्रन्थकारो भविष्यसि ।
वत्साक्षया च ते कीर्तिस्त्रैलोक्ये वै भविष्यति ॥ १०१ ॥
तब उनसे भी संतुष्ट होकर भगवान् शंकरने कहा- ' वत्स! तुम ग्रन्थकार होओगे तथा तीनों लोकोंमें तुम्हारी अक्षय कीर्ति फैल जायगी ॥ १०१ ॥
अक्षयं च कुलं तेऽस्तु महर्षिभिरलंकृतम् ।
भविष्यति द्विजश्रेष्ठः सूत्रकर्ता सुतस्तव ॥ १०२ ॥
' तुम्हारा कुल अक्षय एवं महर्षियोंसे अलंकृत होगा । तुम्हारा पुत्र एक श्रेष्ठ ब्राह्मण एवं सूत्रकार होगा' ॥ १०२ ॥
सावर्णिश्चापि विख्यात ऋषिरासीत् कृते युगे ।
इह तेन तपस्तप्तं षष्टिवर्षशतान्यथ ॥ १०३ ॥
सत्ययुगमें सावर्णिनामसे विख्यात एक ऋषि थे । उन्होंने यहाँ आकर छः हजार वर्षोंतक तपस्या की ॥ १०३ ॥
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तमाह भगवान् रुद्रः साक्षात् तुष्टोऽस्मि तेऽनघ ।
ग्रन्थकृल्लोकविख्यातो भवितास्यजरामरः ॥ १०४ ॥
तब भगवान् रुद्रने उन्हें साक्षात् दर्शन देकर कहा - ' अनघ! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ। तुम विश्वविख्यात ग्रन्थकार और अजर- अमर होओगे' ॥ १०४ ॥
शक्रेण तु पुरा देवो वाराणस्यां जनार्दन ।
आराधितोऽभूद् भक्तेन दिग्वासा भस्मगुण्ठितः ॥ १०५ ॥
आराध्य स महादेवं देवराजमवाप्तवान् । जनार्दन! पहलेकी बात है, इन्द्रने भक्तिभावके साथ काशीपुरीमें भस्मभूषित दिगम्बर महादेवजीकी आराधना की । महादेवजीकी आराधना करके ही उन्होंने देवराजपद प्राप्त किया ॥ १०५३ ॥
नारदेन तु भक्त्यासौ भव आराधितः पुरा ॥ १०६ ॥
तस्य तुष्टो महादेवो जगौ देवगुरुर्गुरुः ।
तेजसा तपसा कीर्त्या त्वत्समो न भविष्यति ॥ १०७ ॥
गीतेन वादितव्येन नित्यं मामनुयास्यसि । देवर्षि नारदने भी पहले भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी आराधना की थी । इससे संतुष्ट होकर गुरुस्वरूप देवगुरु महादेवजीने उन्हें यह वरदान दिया कि ' तेज, तप और कीर्तिमें कोई तुम्हारी समता करनेवाला नहीं होगा । तुम गीत और वीणावादनके द्वारा सदा मेरा अनुसरण करोगे ' ॥ १०६-१०७ ॥ मयापि च यथा दृष्टो देवदेवः पुरा विभो ॥ १०८ ॥
साक्षात् पशुपतिस्तात तच्चापि शृणु माधव । प्रभो! तात माधव! मैंने भी पूर्वकालमें साक्षात् देवाधिदेव पशुपतिका जिस प्रकार दर्शन किया था, वह प्रसंग सुनिये ॥ १०८३ ॥
यदर्थं च मया देवः प्रयतेन तथा विभो ॥ १० ९ ॥ प्रबोधितो महातेजास्तं चापि शृणु विस्तरम् । भगवन्! मैंने जिस उद्देश्यसे प्रयत्नपूर्वक महातेजस्वी महादेवजीको संतुष्ट किया था, वह सब विस्सारपूर्वक सुनिये ॥ १० ९ ३ ॥ यदवाप्तं च मे पूर्वं देवदेवान्महेश्वरात् ॥ ११० ॥
तत् सर्वं निखिलेनाद्य कथयिष्यामि तेऽनघ । अनघ! पूर्वकालमें मुझे देवाधिदेव महेश्वरसे जो कुछ प्राप्त हुआ था, वह सब आज पूर्णरूपसे तुम्हें बताऊँगा ॥ ११०३ ॥
पुरा कृतयुगे तात ऋषिरासीन्महायशाः ॥ १११ ॥
व्याघ्रपाद इति खातो वेदवेदाङ्गपारगः ।
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तात! पहले सत्ययुगमें एक महायशस्वी ऋषि हो गये हैं, जो व्याघ्रपादनामसे प्रसिद्ध थे । वे वेद - वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे ॥ १११३ ॥
तस्याहमभवं पुत्रो धौम्यश्चापि ममानुजः ॥ ११२ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य धौम्येन सह माधव ।
आगच्छमाश्रमं क्रडिन् मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ११३ ॥
उन्हींका मैं पुत्र हूँ । मेरे छोटे भाईका नाम धौम्य है । माधव! किसी समय मैं धौम्यके साथ खेलता हुआ पवित्रात्मा मुनियोंके आश्रमपर आया ॥ ११२-११३ ॥
तत्रापि च मया दृष्टा दुह्यमाना पयस्विनी ।
लक्षितं च मया क्षीरं स्वादुतो ह्यमृतोपमम् ॥ ११४ ॥
वहाँ मैंने देखा, एक दुधारू गाय दुही जा रही थी। वहीं मैंने दूध देखा, जो स्वादमें अमृतके समान होता है ॥ ११४ ॥
ततोऽहमब्रुवं बाल्याज्जननीमात्मनस्तथा ।
क्षीरोदनसमायुक्तं भोजनं हि प्रयच्छ मे ॥ ११५ ॥
तब मैंने बालस्वभाववश अपनी मातासे कहा - ' माँ! मुझे खानेके लिये दूध- भात दो' ॥ ११५ ॥
अभावाच्चैव दुग्धस्य दुःखिता जननी तदा ।
ततः पिष्टं समालोड्य तोयेन सह माधव ॥ ११६ ॥
आवयोः क्षीरमित्येव पानार्थं समुपानयत् । घरमें दूधका अभाव था; इसलिये मेरी माताको उस समय बड़ा दुःख हुआ। माधव! तब वह पानीमें आटा घोलकर ले आयी और दूध कहकर दोनों भाइयोंको पीनेके लिये दे दिया ॥ ११६३ ॥
अथ गव्यं पयस्तात कदाचित् प्राशितं मया ॥ ११७ ॥
पित्राहं यज्ञकाले हि नीतो ज्ञातिकुलं महत् ।
तत्र साक्षरते देवी दिव्या गौः सुरनन्दिनी ॥ ११८ ॥
तात! उसके पहले एक दिन मैंने गायका दूध पीया था । पिताजी यज्ञके समय एक बड़े भारी धनी कुटुम्बीके घर मुझे ले गये थे । वहाँ दिव्य सुरभी गाय दूध दे रही थी ॥ ११७-११८ ॥
तस्याहं तत् पयः पीत्वा रसेन ह्यमृतोपमम् ।
ज्ञात्वा क्षीरगुणांश्चैव उपलभ्य हि सम्भवम् ॥ ११ ९ ॥
उस अमृतके समान स्वादिष्ट दूधको पीकर मैं यह जान गया था कि दूधका स्वाद कैसा होता है और उसकी उपलब्धि किस प्रकार होती है ॥ ११ ९ ॥
स च पिष्टरसस्तात न मे प्रीतिमुपावहत् ।
ततोऽहमब्रुवं बाल्याज्जननीमात्मनस्तदा ॥ १२० ॥
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तात! इसीलिये वह आटेका रस मुझे प्रिय नहीं लगा; अतः मैंने बालस्वभाववश ही अपनी मातासे कहा– ॥
नेदं क्षीरोदनं मातर्यत् त्वं मे दत्तवत्यसि ।
ततो मामब्रवीन्माता दुःखशोकसमन्विता ॥ १२१ ॥
पुत्रस्नेहात् परिष्वज्य मूर्ध्नि चाघ्राय माधव ।
कुतः क्षीरोदनं वत्स मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ १२२ ॥
वने निवसतां नित्यं कन्दमूलफलाशिनाम् । 'माँ! तुमने मुझे जो दिया है, यह दूध- भात नहीं है । ' माधव! तब मेरी माता दुःख और शोकमें मग्न हो पुत्रस्नेहवश मुझे हृदयसे लगाकर मेरा मस्तक सूँघती हुई मुझसे बोली - ' बेटा! जो सदा वनमें रहकर कन्द, मूल और फल खाकर निर्वाह करते हैं, उन पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंको भला दूध - भात कहाँसे मिल सकता है? ॥ १२१-१२२३ ॥ आस्थितानां नदीं दिव्यां वालखिल्यैर्निषेविताम् ॥ १२३ ॥
कुतः क्षीरं वनस्थानां मुनीनां गिरिवासिनाम् । 'जो बालखिल्योंद्वारा सेवित दिव्य नदी गंगाका सहारा लिये बैठे हैं, पर्वतों और वनोंमें रहनेवाले उन मुनियोंको दूध कहाँसे मिलेगा? ॥ १२३ ॥
पावनानां वनाशानां वनाश्रमनिवासिनाम् ॥ १२४ ॥
ग्राम्याहारनिवृत्तानामारण्यफलभोजिनाम् । ' जो पवित्र हैं, वनमें ही होनेवाली वस्तुएँ खाते हैं, वनके आश्रमोंमें ही निवास करते हैं, ग्रामीण आहारसे निवृत्त होकर जंगलके फल- मूलोंका ही भोजन करते हैं, उन्हें दूध कैसे मिल सकता है? ॥ १२४ ॥
नास्ति पुत्र पयोऽरण्ये सुरभीगोत्रवर्जिते ॥ १२५ ॥
नदीगह्वरशैलेषु तीर्थेषु विविधेषु च ।
तपसा जप्यनित्यानां शिवो नः परमा गतिः ॥ १२६ ॥
‘ बेटा! यहाँ सुरभी गायकी कोई संतान नहीं है, अतः इस जंगलमें दूधका सर्वथा अभाव है । नदी, कन्दरा, पर्वत और नाना प्रकारके तीर्थोंमें तपस्यापूर्वक जपमें तत्पर रहनेवाले हम ऋषि- मुनियोंके भगवान् शंकर ही परम आश्रय हैं ॥ १२५-१२६ ॥
अप्रसाद्य विरूपाक्षं वरदं स्थाणुमव्ययम् ।
कुतः क्षीरोदनं वत्स सुखानि वसनानि च ॥ १२७ ॥
‘ वत्स! जो सबको वर देनेवाले, नित्य स्थिर रहनेवाले और अविनाशी ईश्वर हैं, उन भगवान् विरूपाक्षको प्रसन्न किये बिना दूध- भात और सुखदायक वस्त्र कैसे मिल सकते हैं? ॥ १२७ ॥
तं प्रपद्य सदा वत्स सर्वभावेन शङ्करम् ।
तत्प्रसादाच्च कामेभ्यः फलं प्राप्स्यसि पुत्रक ॥ १२८ ॥