श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 151–160

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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हिरण्यगर्भाय नमः सौम्याय वृषरूपिणे ।

नारायणाग्रवपुषे पुरुहूताय वज्रिणे ॥

धर्मिणे वृषसेनाय धर्मसेनाय रोधसे । ‘ जो हिरण्यगर्भ, सौम्य, वृषरूपधारी, नारायण, श्रेष्ठ शरीरधारी, पुरुहूत ( इन्द्र) तथा वज्र धारण करनेवाले हैं, जो धर्मात्मा, वृषसेन, धर्मसेन तथा तटरूप हैं, उन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है ॥ मुनये ज्वरमुक्ताय ज्वराधिपतये नमः ॥ अनेत्राय त्रिनेत्राय पिङ्गलाय विडूर्मिणे । ' जो मननशील मुनि, ज्वर आदि रोगोंसे मुक्त तथा ज्वरके अधिपति हैं, जिनके नेत्र नहीं हैं अथवा जिनके तीन नेत्र हैं, जो पिंगलवर्णवाले तथा प्रजारूपी लहरोंकी उत्पत्तिके लिये महासागरके समान हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ॥ तपोब्रह्मनिधानाय युगपर्यायिणे नमः ॥

शरणाय शरण्याय शक्तेष्टशरणाय च ।

नमः सर्वभवेशाय भूतभव्यभवाय च ॥

' जो तप और वेदकी निधि हैं, बारी- बारीसे युगोंका परिवर्तन करनेवाले हैं, सबके शरणदाता, शरणागतवत्सल और शक्तिशाली पुरुषके लिये अभीष्ट आश्रय हैं, सम्पूर्ण संसारके अधीश्वर एवं भूत, वर्तमान और भविष्यरूप हैं, उन भगवान् नारायणको नमस्कार है ॥

पाहि मां देवदेवेश कोऽप्यजोऽसि सनातन ।

एवं गतोऽसि शरणं शरण्यं ब्रह्मयोनिनाम् ॥

‘ देवदेवेश्वर! आप मेरी रक्षा करें । सनातन परमात्मन्! आप कोई अनिर्वचनीय अजन्मा पुरुष हैं, ब्राह्मणोंके शरणदाता हैं; मैं इस संकटमें पड़कर आपकी ही शरण लेता हूँ' ॥ स्तव्यं स्तवं स्तुतवतस्तत् तमो मे प्रणश्यत । शृणोमि च गिरं दिव्यामन्तर्धानगतां शिवाम् । इस प्रकार स्तवनीय परमेश्वरकी स्तुति करते ही मेरा वह सारा दुःख नष्ट हो गया । तत्पश्चात् मुझे किसी अदृश्य शक्तिके द्वारा कही हुई यह मंगलमयी दिव्य वाणी सुनायी दी ॥ श्रीभगवानुवाच मा भैर्गरुत्मन् दान्तोऽसि पुनः सेन्द्रान् दिवौकसः ॥ स्वं चैव भवनं गत्वा द्रक्ष्यसे पुत्रबान्धवान् ।

पृष्ठ 152

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श्रीभगवान् बोले — गरुड! तुम डरो मत । तुमने मन और इन्द्रियोंको जीत लिया है । अब तुम पुनः इन्द्र आदि देवताओंके सहित अपने घरमें जाकर पुत्रों और भाई - बन्धुओंको देखोगे ॥ सुपर्णउवाच ततस्तस्मिन् क्षणेनैव सहसैव महाद्युतिः ॥ प्रत्यदृश्यत तेजस्वी पुरस्तात् स ममान्तिके । गरुडजी कहते हैं - मुनियो! तदनन्तर उसी क्षण वे परम कान्तिमान् तेजस्वी नारायण सहसा मेरे सामने अत्यन्त निकट दिखायी दिये ॥ समागम्य ततस्तेन शिवेन परमात्मना ॥

अपश्यं चाहमायान्तं नरनारायणाश्रमे ।

चतुर्द्विगुणविन्यासं तं च देवं सनातनम् ॥

तब उन मंगलमय परमात्मासे मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर मैंने देखा, वे आठ भुजाओंवाले सनातनदेव पुनः नर- नारायणके आश्रमकी ओर आ रहे हैं ॥

यजतस्तानृषीन् देवान् वदतो ध्यायतो मुनीन् ।

युक्तान् सिद्धान् नैष्ठिकांश्च जपतो यजतो गृहीन् ॥

वहाँ मैंने देखा, ऋषि यज्ञ कर रहे हैं, देवता बातें कर रहे हैं, मुनिलोग ध्यानमें मग्न हैं, योगयुक्त सिद्ध और नैष्ठिक ब्रह्मचारी जप करते हैं तथा गृहस्थलोग यज्ञोंके अनुष्ठानमें संलग्न हैं ॥

पुष्पपूरपरिक्षिप्तं धूपितं दीपितं हितम् ।

वन्दितं सिक्तसम्मृष्टं नरनारायणाश्रमम् ॥

नर- नारायणका आश्रम धूपसे सुगन्धित और दीपसे प्रकाशित हो रहा था । वहाँ चारों ओर ढेर- के - ढेर फूल बिखरे हुए थे । वह आश्रम सबके लिये हितकर एवं सत्पुरुषोंद्वारा वन्दित था । झाड़ - बुहारकर स्वच्छ बनाया और सींचा गया था ॥

तदद्भुतमहं दृष्ट्वा विस्मितोऽस्मि तदानघाः ।

जगाम शिरसा देवं प्रयतेनान्तरात्मना ॥

निष्पाप मुनियो! उस अद्भुत दृश्यको देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ और मैंने पवित्र एवं एकाग्र हृदयसे मस्तक झुकाकर उन भगवान्की शरण ली ॥

तदत्यद्भुतसंकाशं किमेतदिति चिन्तयन् ।

नाध्यगच्छं परं दिव्यं तस्य सर्वभवात्मनः ॥

वह सब अद्भुत - सा दृश्य क्या था, यह बहुत सोचनेपर भी मेरी समझमें नहीं आया ।

सबकी उत्पत्तिके कारणभूत उन परमात्माके परम दिव्य भावको मैं नहीं समझ सका ॥

प्रणिपत्य सुदुर्धर्षं पुनः पुनरुदीक्ष्य च ।

पृष्ठ 153

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शिरस्यञ्जलिमाधाय विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥ अवोचं तमदीनार्थं श्रेष्ठानां श्रेष्ठमुत्तमम् । उन दुर्जय परमात्माको बारंबार प्रणाम करके उनकी ओर देखकर मेरे नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और मैंने मस्तकपर अंजलि बाँधे उन श्रेष्ठ पुरुषोंमें भी सर्वश्रेष्ठ एवं उदार पुरुषोत्तमसे कहा— ॥ नमस्ते भगवन् देव भूतभव्यभवत्प्रभो ॥

यदेतदद्भुतं देव मया दृष्टं त्वदाश्रयम् ।

अनादिमध्यपर्यन्तं किं तच्छंसितुमर्हसि ॥

‘ भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी भगवान् नारायणदेव! आपको नमस्कार है । देव! मैंने आपके आश्रित जो यह अद्भुत दृश्य देखा है, इसका कहीं आदि, मध्य और अन्त नहीं है । वह सब क्या है, यह बतानेकी कृपा करें ॥

यदि जानासि मां भक्तं यदि वानुग्रहो मयि ।

शंस सर्वमशेषेण श्रोतव्यं यदि चेन्मया ॥

' यदि आप मुझे अपना भक्त समझते हैं अथवा यदि आपका मुझपर अनुग्रह है तो यह सब यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो पूर्णरूपसे बताइये ॥

स्वभावस्तव दुर्ज्ञेयः प्रादुर्भावोऽभवस्य च ।

भवद्भूतभविष्येश सर्वथा गहनो भवान् ॥

‘ आपका स्वभाव दुर्ज्ञेय है । आप अजन्मा परमेश्वरका प्रादुर्भाव भी समझमें आना कठिन है । भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी नारायण! आप सर्वथा गहन ( अगम्य ) हैं ॥

ब्रूहि सर्वमशेषेण तदाश्चर्यं महामुने ।

किं तदत्यद्भुतं वृत्तं तेष्वग्निषु समन्ततः ॥

' महामुने! वह सारा आश्चर्यजनक एवं अद्भुत वृत्तान्त जो उन अग्नियोंके चारों ओर देखा गया, क्या था? यह पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥

कानि तान्यग्निहोत्राणि केषां शब्दः श्रुतो मया ।

शृण्वतां ब्रह्म सततमदृश्यानां महात्मनाम् ॥

‘ वे अग्निहोत्र कौन थे? निरन्तर वेदोंका श्रवण और पाठ करनेवाले वे अदृश्य महात्मा कौन थे, जिनका शब्दमात्र मैंने सुना था? ॥

एतन्मे भगवन् कृष्ण ब्रूहि सर्वमशेषतः ।

गृणन्त्यग्निसमीपेषु के च ते ब्रह्मराशयः ॥

‘ भगवान् श्रीकृष्ण! यह सब आप पूर्णरूपसे मुझे बताइये । जो लोग अग्निके समीप वेदोंका पारायण कर रहे थे, वे ब्राह्मणसमूह महात्मा कौन थे? ' ॥ श्रीभगवानुवाच

पृष्ठ 154

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मां न देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः ।

विदुस्तत्त्वेन तत्त्वस्थं सूक्ष्मात्मानमवस्थितम् ॥

श्रीभगवान् बोले – गरुड! मुझे न तो देवता, न गन्धर्व, न पिशाच और न राक्षस ही तत्त्वसे जानते हैं । मैं सम्पूर्ण तत्त्वोंमें उनके सूक्ष्म आत्मारूपसे अवस्थित हूँ ॥

चतुर्धाहं विभक्तात्मा लोकानां हितकाम्यया ।

भूतभव्यभविष्यादिरनादिर्विश्वकृत्तमः ॥

लोकोंके हितकी कामनासे मैंने अपने आपको चार स्वरूपोंमें विभक्त कर रखा है । मैं भूत, वर्तमान और भविष्यका आदि हूँ। मेरा आदि कोई नहीं है । मैं ही सबसे बड़ा विश्वस्रष्टा हूँ ॥

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ।

मनो बुद्धिश्च तेजश्च तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥

प्रकृतिर्विकृतिश्चेति विद्याविद्ये शुभाशुभे ।

मत्त एतानि जायन्ते नाहमेभ्यः कथंचन ॥

पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, मन, बुद्धि, तेज ( अहंकार ), सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण, प्रकृति, विकृति, विद्या, अविद्या तथा शुभ और अशुभ – ये सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं । मैं इनसे किसी प्रकार उत्पन्न नहीं होता ॥

यत् किंचिच्छ्रेयसा युक्तः श्रेष्ठभावं व्यवस्यति ।

धर्मयुक्तं च पुण्यं च सोऽहमस्मि निरामयः ॥

मनुष्य कल्याणभावनासे युक्त हो जिस किसी पवित्र, धर्मयुक्त एवं श्रेष्ठ भावका निश्चय करता है वह सब मैं निरामय परमेश्वर ही हूँ ॥

यः स्वभावात्मतत्त्वज्ञैः कारणैरुपलक्ष्यते ।

अनादिमध्यनिधनः सोऽन्तरात्मास्मि शाश्वतः ॥

स्वभाव एवं आत्माके तत्त्वको जाननेवाले पुरुष विभिन्न हेतुओंद्वारा जिसका साक्षात्कार करते हैं, वह आदि, मध्य और अन्तसे रहित सर्वान्तरात्मा सनातन पुरुष मैं ही हूँ ॥

यत् तु मे परमं गुह्यं रूपं सूक्ष्मार्थदर्शिभिः ।

गृह्यते सूक्ष्मभावज्ञैः स विभाव्योऽस्मि शाश्वतः ॥

सूक्ष्म अर्थको देखने और समझनेवाले तथा सूक्ष्मभावको जाननेवाले ज्ञानी पुरुष मेरे जिस परम गुह्य रूपको ग्रहण करते हैं, वह चिन्तनीय सनातन परमात्मा मैं ही हूँ ॥

यत् तु मे परमं गुह्यं येन व्याप्तमिदं जगत् ।

सोऽहं गतः सर्वसत्त्वः सर्वस्य प्रभवोऽप्ययः ॥

जो मेरा परम गुह्य रूप है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, वह सर्वसत्त्वरूप परमात्मा मैं ही हूँ, मैं ही सबका अविनाशी कारण हूँ ॥

पृष्ठ 155

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मत्तो जातानि भूतानि मया धार्यन्त्यहर्निशम् ।

मय्येव विलयं यान्ति प्रलये पन्नगाशन ॥

गरुड! सम्पूर्ण भूत प्राणी मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं, मेरे ही द्वारा वे अहर्निश जीवन धारण करते हैं और प्रलयके समय सब - के - सब मुझमें ही लीन हो जाते हैं ।

यो मां यथा वेदयति तस्य तस्यास्मि काश्यप ।

मनोबुद्धिगतः श्रेयो विदधामि विहङ्गम ॥

काश्यप! जो मुझे जैसा जानता है, उसके लिये मैं वैसा ही हूँ । विहंगम! मैं सभीके मन और बुद्धिमें रहकर सबका कल्याण करता हूँ ॥

मां तु ज्ञातुं कृता बुद्धिर्भवता पक्षिसत्तम ।

शृणु योऽहं यतश्चाहं यदर्थं चाहमुद्यतः ॥

पक्षिप्रवर! तुमने मेरे तत्त्वको जाननेका विचार किया था; अतः मैं कौन हूँ? कहाँसे आया हूँ? और किस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये उद्यत हुआ हूँ? यह सब बताता हूँ, सुनो ॥

ये केचिन्नियतात्मानस्त्रेताग्निपरमा द्विजाः ।

अग्निकार्यपरा नित्यं जपहोमपरायणाः ॥

आत्मन्यग्नीन् समाधाय नियता नियतेन्द्रियाः ।

अनन्यमनसस्ते मां सर्वे वै समुपासते ॥

यजन्तो जपयज्ञैर्मां मानसैश्च सुसंयताः ।

अग्नीनभ्युद्ययुः शश्वदग्निष्वेवाभिसंस्थिताः ॥

अनन्यकार्याः शुचयो नित्यमग्निपरायणाः ।

य एवं बुद्धयो धीरास्ते मां गच्छन्ति तादृशाः ॥

जो कोई ब्राह्मण अपने मनको वशमें करके त्रिविध अग्नियोंकी उपासना करते हैं, नित्य अग्निहोत्रमें तत्पर और जप- होममें संलग्न हैं, जो नियमपूर्वक रहकर अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अपने - आपमें ही अग्नियोंका आधान कर लेते हैं तथा सब- के - सब अनन्यचित्त होकर मेरी ही उपासना करते हैं, जो अपनेको पूर्ण संयममें रखकर जप, यज्ञ और मानसयज्ञोंद्वारा मेरी आराधना करते हैं, जो सदा अग्निहोत्रमें ही तत्पर रहकर अग्नियोंका स्वागत करते हैं तथा अन्य कार्यमें रत न होकर शुद्धभावसे सदा अग्निकी परिचर्या करते हैं; ऐसी बुद्धिवाले धीर पुरुष वैसे भक्तिभावसे सम्पन्न होते हैं, वे मुझे प्राप्त कर लेते हैं ॥

अकामहतसंकल्पा ज्ञाने नित्यं समाहिताः ।

आत्मन्यग्नीन् समाधाय निराहारा निराशिषः ॥

विषयेषु निरारम्भा विमुक्ता ज्ञानचक्षुषः ।

अनन्यमनसो धीराः स्वभावनियमान्विताः ॥

जिन्होंने निष्कामभावके द्वारा अपने सारे संकल्पोंको नष्ट कर दिया है, जो सदा ज्ञानमें ही चित्तको एकाग्र किये रहते हैं और अग्नियोंको अपने आत्मामें ही स्थापित करके आहार

पृष्ठ 156

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 156 का मूल पृष्ठ
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( भोग ) और कामनाओंका त्याग कर देते हैं, विषयोंकी उपलब्धिके लिये जिनकी कोई प्रवृत्ति नहीं होती, जो सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त एवं ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न हैं, वे स्वभावतः नियमपरायण एवं अनन्यचित्तसे मेरा चिन्तन करनेवाले धीर पुरुष मुझे ही प्राप्त होते हैं ॥

यत् तद् वियति दृष्टं तत् सरः पद्मोत्पलायुतम् ।

तत्राग्नयः संनिहिता दीप्यन्ते स्म निरिन्धनाः ॥

तुमने जो आकाशमें कमल और उत्पलसे भरा हुआ सुन्दर सरोवर देखा था, उसके समीप स्थापित हुई अग्नियाँ बिना ईंधनके ही प्रज्वलित होती हैं ॥

ज्ञानामलाशयास्तस्मिन् ये च चन्द्रांशुनिर्मलाः ।

उपासीना गृणन्तोऽग्निं प्रस्पष्टाक्षरभाषिणः ॥

आकाङ्क्षमाणाः शुचयस्तेष्वग्निषु विहङ्गम । जिनके अन्तःकरण ज्ञानके प्रकाशसे निर्मल हो गये हैं, जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल हैं, वे ही वहाँ स्पष्ट अक्षरका उच्चारण करते हुए वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक अग्निकी उपासना करते हैं । विहंगम! वे पवित्रभावसे रहकर उन अग्नियोंकी परिचर्याकी ही इच्छा रखते हैं ॥ ये मया भावितात्मानो मय्येभिरताः सदा ॥

उपासते च मामेव ज्योतिर्भूता निरामयाः ।

तैर्हि तत्रैव वस्तव्यं नीरागात्मभिरच्युतैः ॥

मेरा चिन्तन करनेके कारण जिनका अन्तःकरण पवित्र हो गया है, जो सदा मेरी ही उपासनामें रत हैं, वे ही वहाँ रोग- शोकसे रहित एवं ज्योतिःस्वरूप होकर मेरी ही उपासना किया करते हैं । वे अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होकर वीतराग हृदयसे सदा वहीं निवास करेंगे ॥

निराहारा ह्यनिष्यन्दाश्चन्द्रांशुसदृशप्रभाः ।

निर्मला निरहंकारा निरालम्बा निराशिषः ॥

मद्भक्ताः सततं ते वै भक्तस्तानपि चाप्यहम् । उनकी अंगकान्ति चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल है । वे निराहार, श्रमविन्दुओंसे रहित, निर्मल, अहंकारशून्य, आलम्बनरहित और निष्काम हैं । उनकी सदा मुझमें भक्ति बनी रहती है तथा मैं भी उनका भक्त ( प्रेमी ) बना रहता हूँ ॥ चतुर्धाहं विभक्तात्मा चरामि जगतो हितः ॥

लोकानां धारणार्थाय विधानं विदधामि च ।

यथावत्तदशेषेण श्रोतुमर्हति मे भवान् ॥

मैं अपनेको चार स्वरूपोंमें विभक्त करके जगत्के हितसाधनमें तत्पर हो विचरता रहता हूँ । सम्पूर्ण लोक जीवित एवं सुरक्षित रहें - इसके लिये मैं विधान बनाता हूँ । वह सब तुम यथार्थरूपसे सुननेके अधिकारी हो ॥

पृष्ठ 157

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एका मूर्तिर्निर्गुणाख्या योगं परममास्थिता ।

द्वितीया सृजते तात भूतग्रामं चराचरम् ॥

तात! मेरी एक निर्गुण मूर्ति है जो परम योगका आश्रय लेकर रहती है । दूसरी वह मूर्ति है जो चराचर प्राणिसमुदायकी सृष्टि करती है ॥

सृष्टं संहरते चैका जगत् स्थावरजङ्गमम् ।

जातात्मनिष्ठा क्षपयन् मोहयन्निव मायया ॥

तीसरी मूर्ति स्थावर- जङ्गम जगत्का संहार करती है और चौथी मूर्ति आत्मनिष्ठ है, जो आसुरी शक्तियोंको मायासे मोहित - सी करके उन्हें नष्ट कर देती है ॥

क्षिपन्ती मोहयन्ती च ह्यात्मनिष्ठा स्वमायया ।

चतुर्थी मे महामूर्तिर्जगद्वृद्धिं ददाति सा ॥

रक्षते चापि नियता सोऽहमस्मि नभश्चर । अपनी मायासे दुष्टोंको मोहित और नष्ट करनेवाली जो मेरी चौथी आत्मनिष्ठ महामूर्ति है, वह नियम - पूर्वक रहकर जगत्की वृद्धि और रक्षा करती है । गरुड! वही मैं हूँ ॥ मया सर्वमिदं व्याप्तं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ अहं सर्वजगद्बीजं सर्वत्रगतिरव्ययः । मैंने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है । सारा जगत् मुझमें ही प्रतिष्ठित है । मैं ही

सम्पूर्ण जगत्का बीज हूँ । मेरी सर्वत्र गति है और मैं अविनाशी हूँ ॥

यानि तान्यग्निहोत्राणि ये च चन्द्रांशुराशयः ।

गृणन्ति वेद सततं तेष्वग्निषु विहङ्गम ॥

क्रमेण मां समायान्ति सुखिनो ज्ञानसंयुताः ।

तेषामहं तपो दीप्तं तेजः सम्यक् समाहितम् ।

नित्यं ते मयि वर्तन्ते तेषु चाहमतन्द्रितः ॥

विहंगम! वे जो अग्निहोत्र थे तथा जो चन्द्रमाकी किरणोंके पुंज- जैसी कान्तिवाले पुरुष निरन्तर उन अग्नियोंके समीप बैठकर वेदोंका पाठ करते थे, वे ज्ञानसम्पन्न एवं सुखी होकर क्रमशः मुझे प्राप्त होते हैं । मैं ही उनका उद्दीप्त तप और सम्यक् रूपसे संचित तेज हूँ । वे सदा मुझमें विद्यमान हैं और मैं उनमें सावधान हुआ रहता हूँ ॥

सर्वतो मुक्तसङ्गेन मय्यनन्यसमाधिना ।

शक्यः समासादयितुमहं वै ज्ञानचक्षुषा ॥

जो सब ओरसे आसक्तिशून्य है, वह मुझमें अनन्यभावसे चित्तको एकाग्र करके ज्ञानदृष्टिसे मेरा साक्षात्कार कर सकता है ॥ एकान्तिनो ध्यानपरा यतिभावाद् व्रजन्ति माम् । जो संन्यासका आश्रय लेकर अनन्यभावसे मेरे ध्यानमें तत्पर रहते हैं, वे मुझे ही प्राप्त होते हैं ॥

पृष्ठ 158

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सत्त्वयुक्ता मतिर्येषां केवलात्मविनिश्चिता ॥ ते पश्यन्ति स्वमात्मानं परमात्मानमव्ययम् । जिनकी बुद्धि सत्त्वगुणसे युक्त है और केवल आत्मतत्त्वका निश्चय करके उसीके चिन्तनमें लगी हुई है, वे अपने आत्मरूप अविनाशी परमात्माका दर्शन करते हैं ॥ अहिंसा सर्वभूतेषु तेष्ववस्थितमार्जवम् ॥ तेष्वेव च समाधाय सम्यगेति स मामजम् । उन्हींका समस्त प्राणियोंके प्रति अहिंसाभाव होता है, उन्हींमें ‘ सरलता ' नामक सद्गुणकी स्थिति होती है और उन्हीं गुणोंमें स्थित हुआ जो चित्तको मुझ परमात्मामें भलीभाँति समाहित कर देता है वह मुझ अजन्मा परमेश्वरको प्राप्त होता है ॥ यदेतत् परमं गुह्यमाख्यानं परमाद्भुतम् ॥ यत्नेन तदशेषेण यथावच्छ्रोतुमर्हसि । यह जो परम गोपनीय एवं अत्यन्त अद्भुत आख्यान है, इसे पूर्णतः यत्नपूर्वक यथावत् रूपसे श्रवण करो ॥ ये त्वग्निहोत्रनियता जपयज्ञपरायणाः ॥ ये मामुपासते शश्वदेतांस्त्वं दृष्टवानसि । जो अग्निहोत्रमें संलग्न और जप यज्ञपरायण होते हैं, जो निरन्तर मेरी उपासना करते रहते हैं; उन्हींका तुमने प्रत्यक्ष दर्शन किया है ॥ शास्त्रदृष्टविधानज्ञा असक्ताः क्वचिदन्यथा ॥ शक्योऽहं वेदितुं तैस्तु यन्मे परममव्ययम् । जो शास्त्रोक्त विधिके ज्ञाता होकर अनासक्त- भावसे सत्कर्म करते हैं, कभी शास्त्रविपरीत — असत् कर्ममें नहीं लगते, उनके द्वारा ही मैं जाना जा सकता हूँ। मेरा जो अविनाशी परम तत्त्व है, उसे भी वे ही जान सकते हैं ॥ तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन प्रसन्नात्मात्मविच्छुचिः ॥ आसादयति तद् ब्रह्म यत्र गत्वा न शोचति । इसलिये विशुद्ध ज्ञानके द्वारा जिसका चित्त प्रसन्न ( निर्मल) है, जो आत्मतत्त्वका ज्ञाता और पवित्र है, वह ज्ञानी पुरुष ही उस ब्रह्मको प्राप्त होता है, जहाँ जाकर कोई शोकमें नहीं पड़ता ॥ शुद्धाभिजनसम्पन्नाः श्रद्धायुक्तेन चेतसा ॥ मद्भक्त्या च द्विजश्रेष्ठा गच्छन्ति परमां गतिम् । जो शुद्ध कुलमें उत्पन्न हैं, जो श्रेष्ठ द्विज श्रद्धायुक्त चित्तसे मेरा भजन करते हैं, वे मेरी भक्तिद्वारा परम गतिको प्राप्त होते हैं ॥ यद् गुह्यं परमं बुद्धेरलिङ्गग्रहणं च यत् ॥ तत् सूक्ष्मं गृह्यते विप्रैर्यतिभिस्तत्त्वदर्शभिः ।

पृष्ठ 159

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 159 का मूल पृष्ठ
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जो बुद्धिके लिये परम गुह्य रहस्य है, जो किसी आकृतिसे गृहीत नहीं होता— अनुभवमें नहीं आता उस सूक्ष्म परब्रह्मका तत्त्वदर्शी यति ब्राह्मण साक्षात्कार कर लेते हैं ॥ न वायुः पवते तत्र न तस्मिन् ज्योतिषां गतिः ॥ न चापः पृथिवी नैव नाकाशं न मनोगतिः । वहाँ यह वायु नहीं चलती, ग्रहों और नक्षत्रोंकी पहुँच नहीं होती तथा जल, पृथ्वी, आकाश और मनकी भी गति नहीं हो पाती है ॥ तस्माच्चैतानि सर्वाणि प्रजायन्ते विहङ्गम ॥ सर्वेभ्यश्च स तेभ्यश्च प्रभवत्यमलो विभुः । विहंगम! उसी ब्रह्मसे ये सारी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं। वह निर्मल एवं सर्वव्यापी परमात्मा उन सबके द्वारा ही सबको उत्पन्न करनेमें समर्थ है ॥ स्थूलदर्शनमेतन्मे यद् दृष्टं भवतानघ ॥ एतत् सूक्ष्मस्य च द्वारं कार्याणां कारणं त्वहम् । अनघ! तुमने जो मेरा यह स्थूल रूप देखा है, यही मेरे सूक्ष्म स्वरूपमें प्रवेश करनेका द्वार है । समस्त कार्योंका कारण मैं ही हूँ ॥ दृष्टो वै भवता तस्मात् सरस्यमितविक्रम ॥ अमित पराक्रमी गरुड! इसीलिये तुमने उस सरोवरमें मेरा दर्शन किया है ॥

मां यज्ञमाहुर्यज्ञज्ञा वेदं वेदविदो जनाः ।

मुनयश्चापि मामेव जपयज्ञं प्रचक्षते ॥

यज्ञके ज्ञाता मुझे यज्ञ कहते हैं । वेदोंके विद्वान् मुझे ही वेद बताते हैं और मुनि भी मुझे ही जप -यज्ञ कहते हैं ॥

वक्ता मन्ता रसयिता घ्राता द्रष्टा प्रदर्शकः ।

बोद्धा बोद्धयिता चाहं गन्ता श्रोता चिदात्मकः ॥

मैं ही वक्ता, मनन करनेवाला, रस लेनेवाला, सूँघनेवाला, देखने और दिखानेवाला, समझने और समझानेवाला तथा जाने और सुननेवाला चेतन आत्मा हूँ ॥

मामिष्ट्वा स्वर्गमायान्ति तथा चाप्नुवते महत् ।

ज्ञात्वा मामेव चैवं ते निःसङ्गेनान्तरात्मना ॥

मेरा ही यजन करके यजमान स्वर्गमें आते और महान् पद पाते हैं । इसी प्रकार जो अनासक्त हृदयसे मुझे ही जान लेते हैं, वे मुझ परमात्माको ही प्राप्त होते हैं ॥

अहं तेजो द्विजातीनां मम तेजो द्विजातयः ।

मम यस्तेजसा देहः सोऽग्निरित्यवगम्यताम् ॥

मैं ब्राह्मणोंका तेज हूँ और ब्राह्मण मेरे तेज हैं । मेरे तेजसे जो शरीर प्रकट हुआ है, उसीको तुम अग्नि समझो ॥ प्राणपालः शरीरेऽहं योगिनामहमीश्वरः ।

पृष्ठ 160

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 160 का मूल पृष्ठ
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सांख्यानामिदमेवाग्रे मयि सर्वमिदं जगत् ॥ मैं ही शरीरमें प्राणोंका रक्षक हूँ । मैं ही योगियोंका ईश्वर हूँ । सांख्योंका जो यह प्रधान

तत्त्व है, वह भी मैं ही हूँ । मुझमें ही यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है ॥

धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं चैवार्जवं जपम् ।

तमः सत्त्वं रजश्चैव कर्मजं च भवाप्ययम् ॥

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, सरलता, जप, सत्त्वगुण, तमोगुण, रजोगुण तथा कर्मजनित -जन्म- मरण– सब मेरे ही स्वरूप हैं ॥

स तदाहं तथारूपस्त्वया दृष्टः सनातनः ।

ततस्त्वहं परतरः शक्यः कालेन वेदितुम् ॥

मम यत् परमं गुह्यो शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ।

तदेवं परमो गुह्यो देवो नारायणो हरिः ॥

उस समय तुमने मुझ सनातन पुरुषका उस रूपमें दर्शन किया था । उससे भी उत्कृष्ट जो मेरा स्वरूप है, उसे तुम समयानुसार जान सकते हो । मेरा जो परम गोपनीय, शाश्वत, ध्रुव एवं अव्यय पद है, उसका ज्ञान भी तुम्हें समयानुसार हो सकता है । इस प्रकार मैं नारायणदेव एवं हरिनामसे प्रसिद्ध परमेश्वर परम गोपनीय माना गया हूँ ॥

न तच्छक्यं भुजङ्गारे वेत्तुमभ्युयान्वितैः ।

निरारम्भनमस्कारा निराशीर्बन्धनास्तथा ॥

गच्छन्ति तं महात्मानं परं ब्रह्म सनातनम् । गरुड! जो लौकिक अभ्युदयमें आसक्त हैं, वे मेरे उस स्वरूपको नहीं जान सकते । जो कर्मोंके आरम्भका मार्ग छोड़ चुके हैं, नमस्कारसे दूर हो गये हैं और कामनाओंके बन्धनसे मुक्त हैं, वे यतिजन उन सनातन परमात्मा परब्रह्मको प्राप्त होते हैं ॥ स्थूलोऽहमेवं विहग त्वया दृष्टस्तथानघ ॥ एतच्चापि न वेत्त्यन्यस्त्वामृते पन्नगाशन । निष्पाप पक्षिराज गरुड! इस प्रकार तुमने मेरे स्थूल स्वरूपका दर्शन किया है । परंतु तुम्हारे सिवा दूसरा कोई इस स्वरूपको भी नहीं जानता ॥ मा मतिस्तव गान्नाशमेषा गतिरनुत्तमा ॥ मद्भक्तो भव नित्यं त्वं ततो वेत्स्यसि मे पदम् । तुम्हारी बुद्धिका नाश न हो- यही सर्वोत्तम गति है । तुम नित्य निरन्तर मेरी भक्तिमें लगे रहो । इससे तुम्हें मेरे स्वरूपका यथार्थ बोध हो जायगा ॥ एतत् ते सर्वमाख्यातं रहस्यं दिव्यमानुषम् ॥ एतच्छ्रेयः परं चैतत् पन्थानं विद्धि मोक्षिणाम् ।

यह सब तुम्हें बताया गया । यह देवताओं और मनुष्योंके लिये भी रहस्यकी बात है ।

यही परम कल्याण है । तुम इसे मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंका मार्ग समझो ॥