06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1621–1630

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1621–1630

पृष्ठ 1621

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नरेश्वर! मैं अभी उन्हें स्तम्भित करता हूँ; अतः तुम इन्द्रसे न डरो । मैंने सम्पूर्ण देवताओंके अस्त्र- शस्त्र भी क्षीण कर दिये हैं। चाहे दसों दिशाओंमें वज्र गिरे, आँधी चले, इन्द्र स्वयं ही वर्षा बनकर सम्पूर्ण वनोंमें निरन्तर बरसते रहें, आकाशमें व्यर्थ ही जलप्लावन होता रहे और बिजली चमके तो भी तुम भयभीत न होओ ॥ वह्निर्देवस्त्रातु वा सर्वतस्ते कामान् सर्वान् वर्षतु वासवो वा । वज्रं तथा स्थापयतां वधाय महाघोरं प्लवमानं जलौघैः ॥ १५ ॥

अग्निदेव तुम्हारी सब ओरसे रक्षा करें । देवराज इन्द्र तुम्हारे लिये जलकी नहीं, सम्पूर्ण कामनाओंकी वर्षा करें और तुम्हारे वधके लिये उठे हुए और जलराशिके साथ चंचल गतिसे चले हुए महाघोर वज्रको वे देवेन्द्र अपने हाथमें ही रखे रहें ॥ १५ ॥

मरुत्त उवाच घोरः शब्दः श्रूयते वै महास्वनो

वज्रस्यैष सहितो मारुतेन ।

आत्मा हि मे प्रव्यथते मुहुर्मुहु- र्न मे स्वास्थ्यं जायते चाद्य विप्र ॥ १६ ॥

मरुत्तने कहा — विप्रवर! आँधीके साथ ही जोर-जोरसे होनेवाली वज्रकी भयंकर गड़गड़ाहट सुनायी दे रही है । इससे रह - रहकर मेरा हृदय काँप उठता है । आज मनमें तनिक भी शान्ति नहीं है ॥ १६ ॥

संवर्तउवाच वज्रादुग्राद् व्येतु भयं तवाद्य वातो भूत्वा हन्मि नरेन्द्र बज्रम् । भयं त्यक्त्वा वरमन्यं वृणीष्व कं ते कामं मनसा साधयामि ॥ १७ ॥

संवर्तने कहा — नरेन्द्र! तुम्हें इन्द्रके भयंकर वज्रसे आज भयभीत नहीं होना चाहिये । मैं वायुका रूप धारण करके अभी इस वज्रको निष्फल किये देता हूँ । तुम भय छोड़कर मुझसे कोई दूसरा वर माँगो। बताओ, मैं तुम्हारी कौन-सी मानसिक इच्छा पूर्ण करूँ? ॥ १७ ॥

मरुत्त उवाच इन्द्रः साक्षात् सहसाभ्येतु विप्र हविर्यज्ञे प्रतिगृह्णातु चैव ।

पृष्ठ 1622

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स्वं स्वं धिष्णयं चैव जुषन्तु देवा हुतं सोमं प्रतिगृह्णन्तु चैव ॥ १८ ॥

मरुत्तने कहा —– ब्रह्मर्षे! आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे साक्षात् इन्द्र मेरे यज्ञमें शीघ्रतापूर्वक पधारें और अपना हविष्य- भाग ग्रहण करें । साथ ही अन्य देवता भी अपने-अपने स्थानपर आकर बैठ जायँ और सब लोग एक साथ आहुतिरूपमें प्राप्त हुए सोमरसका पान करें ॥ १८ ॥

संवर्त उवाच अयमिन्द्रो हरिभिरायाति राजन् देवैः सर्वैस्त्वरितैः स्तूयमानः । मन्त्राहूतो यज्ञमिमं मयाद्य पश्यस्वैनं मन्त्रविस्रस्तकायम् ॥ १ ९ ॥ ( तदनन्तर संवर्तने अपने मन्त्रबलसे सम्पूर्ण देवताओंका आवाहन किया और) मरुत्तसे कहा— राजन्! ये इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा अपनी स्तुति सुनते शीघ्रगामी अश्वोंसे युक्त रथकी सवारीसे आ रहे हैं । मैंने मन्त्रबलसे आज इस यज्ञमें इनका आवाहन किया है । देखो, मन्त्रशक्तिसे इनका शरीर इधर खिंचता चला आ रहा है ॥ १ ९ ॥ ततो देवैः सहितो देवराजो

रथे युङ्क्त्वा तान् हरीन् वाजिमुख्यान् ।

आयाद् यज्ञमथ राज्ञः पिपासु- राविक्षितस्याप्रमेयस्य सोमम् ॥ २० ॥

तत्पश्चात् देवराज इन्द्र अपने रथमें उन सफेद रंगके अच्छे घोड़ोंको जोतकर देवताओंको साथ ले सोमपानकी इच्छासे अनुपम पराक्रमी राजा मरुत्तकी यज्ञशालामें आ पहुँचे ॥ २० ॥

तमायान्तं सहितं देवसंघैः प्रत्युद्ययौ सपुरोधा मरुत्तः । चक्रे पूजां देवराजाय चाग्रयां यथाशास्त्रं विधिवत् प्रीयमाणः ॥ २१ ॥

देववृन्दके साथ इन्द्रको आते देख राजा मरुत्तने अपने पुरोहित संवर्त मुनिके साथ आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और बड़ी प्रसन्नताके साथ शास्त्रीय विधिसे उनका अग्रपूजन किया ॥ २१ ॥

संवर्त उवाच स्वागतं ते पुरुहूतेह विद्वन् यज्ञोऽप्ययं संनिहिते त्वयीन्द्र ।

पृष्ठ 1623

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शोशुभ्यते बलवृत्रघ्न भूयः पिबस्व सोमं सुतमुद्यतं मया ॥ २२ ॥

संवर्तने कहा- पुरुहूत इन्द्र! आपका स्वागत है । विद्वन्! आपके यहाँ पधारनेसे इस यज्ञकी शोभा बहुत बढ़ गयी है । बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले देवराज! मेरेद्वारा तैयार किया हुआ यह सोमरस प्रस्तुत है, आप इसका पान कीजिये ॥ २२ ॥

मरुत्त उवाच शिवेन मां पश्य नमश्च तेऽस्तु प्राप्तो यज्ञः सफलं जीवितं मे । अयं यज्ञं कुरुते मे सुरेन्द्र बृहस्पतेरवरजो विप्रमुख्यः ॥ २३ ॥

मरुत्तने कहा – सुरेन्द्र! आपको नमस्कार है । आप मुझे कल्याणमयी दृष्टिसे देखिये । आपके पदार्पणसे मेरा यज्ञ और जीवन सफल हो गया । बृहस्पतिजीके छोटे भाई ये विप्रवर संवर्तजी मेरा यज्ञ करा रहे हैं ॥ २३ ॥

इन्द्रउवाच जानामि ते गुरुमेनं तपोधनं बृहस्पतेरनुजं तिग्मतेजसम् । यस्याह्वानादागतोऽहं नरेन्द्र प्रीतिर्मेऽद्य त्वयि मन्युः प्रणष्टः ॥ २४ ॥

इन्द्रने कहा — नरेन्द्र! आपके इन गुरुदेवको मैं जानता हूँ । ये बृहस्पतिजीके छोटे भाई और तपस्याके धनी हैं । इनका तेज दुःसह है । इन्हींके आवाहनसे मुझे आना पड़ा है । अब मैं आपपर प्रसन्न हूँ और मेरा सारा क्रोध दूर हो गया है ॥ २४ ॥

संवर्तउवाच यदि प्रीतस्त्वमसि वै देवराज तस्मात्स्वयं शाधि यज्ञे विधानम् । स्वयं सर्वान् कुरु भागान् सुरेन्द्र जानात्वयं सर्वलोकश्च देव ॥ २५ ॥

संवर्तने कहा —देवराज! यदि आप प्रसन्न हैं तो यज्ञमें जो -जो कार्य आवश्यक है, उसका स्वयं ही उपदेश दीजिये तथा सुरेन्द्र! स्वयं ही सब देवताओंके भाग निश्चित कीजिये । देव! यहाँ आये हुए सब लोग आपकी प्रसन्नताका प्रत्यक्ष अनुभव करें ॥ २५ ॥

व्यास उवाच एवमुक्तस्त्वाङ्गिरसेन शक्रः

पृष्ठ 1624

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समादिदेश स्वयमेव देवान् । सभाः क्रियन्तामावसथाश्च मुख्याः सहस्रशश्चित्रभूताः समृद्धाः ॥ २६ ॥

व्यासजी कहते हैं — राजन्! संवर्तके यों कहनेपर इन्द्रने स्वयं ही सब देवताओंको आज्ञा दी कि ‘ तुम सब लोग अत्यन्त समृद्ध एवं चित्र - विचित्र ढंगके हजारों अच्छे सभा-भवन बनाओ ॥ २६ ॥

क्लृप्ताः स्थूणाः कुरुतारोहणानि गन्धर्वाणामप्सरसां च शीघ्रम् । यत्र नृत्येरन्नप्सरसः समस्ताः स्वर्गोपमः क्रियतां यज्ञवाटः ॥ २७ ॥

‘ गन्धर्वों और अप्सराओंके लिये ऐसे रंगमण्डपका निर्माण करो, जिसमें बहुत - से सुन्दर स्तम्भ लगे हों । उनके रंगमंचपर चढ़नेके लिये बहुत - सी सीढ़ियाँ बना दो । यह सब कार्य शीघ्र हो जाना चाहिये । यह यज्ञशाला स्वर्गके समान सुन्दर एवं मनोहर बना दो । जिसमें सारी अप्सराएँ नृत्य कर सकें ' ॥ २७ ॥

इत्युक्तास्ते चक्रुराशु प्रतीता दिवौकसः शक्रवाक्यान्नरेन्द्र । ततो वाक्यं प्राह राजानमिन्द्रः प्रीतो राजन् पूज्यमानो मरुत्तम् ॥ २८ ॥

नरेन्द्र! देवराजके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण देवताओंने संतुष्ट होकर उनकी आज्ञाके अनुसार शीघ्र ही सबका निर्माण किया । राजन्! तत्पश्चात् पूजित एवं संतुष्ट हुए इन्द्रने राजा मरुत्तसे इस प्रकार कहा— ॥ २८ ॥

एष त्वयाहमिह राजन् समेत्य ये चाप्यन्ये तव पूर्वे नरेन्द्र । सर्वाश्चान्या देवताः प्रीयमाणा हविस्तुभ्यं प्रतिगृह्णन्तु राजन् ॥ २ ९ ॥ ‘ राजन्! यह मैं यहाँ आकर तुमसे मिला हूँ । नरेन्द्र! तुम्हारे जो अन्यान्य पूर्वज हैं, वे तथा अन्य सब देवता भी यहाँ प्रसन्नतापूर्वक पधारे हैं । राजन्! ये सब लोग तुम्हारा दिया हुआ हविष्य ग्रहण करेंगे ॥ २ ९ ॥ आग्नेयं वै लोहितमालभन्तां वैश्वदेवं बहुरूपं हि राजन् । नीलं चोक्षाणं मेध्यमप्यालभन्तां चलच्छिश्नं सम्प्रदिष्टं द्विजाग्रयाः ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1625

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‘ राजेन्द्र! अग्निके लिये लाल रंगकी वस्तुएँ प्रस्तुत की जायँ, विश्वेदेवोंके लिये अनेक रूप - रंगवाले पदार्थ दिये जायँ, श्रेष्ठ ब्राह्मण यहाँ छूकर दिये गये चंचल शिश्नवाले नील रंगके वृषभका दान ग्रहण करें ' ॥ ३० ॥

ततो यज्ञो ववृधे तस्य राजन् यत्र देवाः स्वयमन्नानि जह्नुः । यस्मिन् शक्रो ब्राह्मणैः पूज्यमानः सदस्योऽभूद्धरिमान् देवराजः ॥ ३१ ॥

नरेश्वर! तदनन्तर राजा मरुत्तके यज्ञका कार्य आगे बढ़ा, जिसमें देवतालोग स्वयं ही अन्न परोसने लगे । ब्राह्मणोंद्वारा पूजित, उत्तम अश्वोंसे युक्त देवराज इन्द्र उस यज्ञमण्डपमें सदस्य बनकर बैठे थे ॥ ३१ ॥

ततः संवर्तश्चैत्यगतो महात्मा यथा वह्निः प्रज्वलितो द्वितीयः । हवींष्युच्चैराह्वयन् देवसंघान् जुहावाग्नौ मन्त्रवत् सुप्रतीतः ॥ ३२ ॥

इसके बाद द्वितीय अग्निके समान तेजस्वी एवं यज्ञमण्डपमें बैठे हुए महात्मा संवर्तने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर देववृन्दका उच्चस्वरसे आह्वान करते हुए मन्त्रपाठपूर्वक अग्निमें हविष्यका हवन किया ॥ ३२ ॥

ततः पीत्वा बलभित् सोममग्रयं ये चाप्यन्ये सोमपा देवसंघाः । सर्वेऽनुज्ञाताः प्रययुः पार्थिवेन यथाजोषं तर्पिताः प्रीतिमन्तः ॥ ३३ ॥

तत्पश्चात् इन्द्र तथा सोमपानके अधिकारी अन्य देवताओंने उत्तम सोमरसका पान किया । इससे सबको तृप्ति एवं प्रसन्नता हुई । फिर सब देवता राजा मरुत्तकी अनुमति लेकर अपने - अपने स्थानको चले गये ॥ ३३ ॥

ततो राजा जातरूपस्य राशीन् पदे पदे कारयामास हृष्टः । द्विजातिभ्यो विसृजन् भूरि वित्तं रराज वित्तेश इवारिहन्ता ॥ ३४ ॥

तदनन्तर शत्रुहन्ता राजा मरुत्तने बड़े हर्षके साथ वहाँ ब्राह्मणोंको बहुत - से धनका दान करते हुए उनके लिये पग-पगपर सुवर्णके ढेर लगवा दिये । उस समय धनाध्यक्ष कुबेरके समान उनकी शोभा हो रही थी ॥ ३४ ॥

ततो वित्तं विविधं संनिधाय यथोत्साहं कारयित्वा च कोषम् ।

पृष्ठ 1626

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अनुज्ञातो गुरुणा संनिवृत्य शशास गामखिलां सागरान्ताम् ॥ ३५ ॥

इसके बाद ब्राह्मणोंके ले जानेसे जो नाना प्रकारका धन बच गया, उसको मरुत्तने उत्साहपूर्वक कोष -स्थान बनवाकर उसीमें जमा कर दिया । फिर अपने गुरु संवर्तकी आज्ञा लेकर वे राजधानीको लौट आये और समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राज्य करने लगे ॥ ३५ ॥

एवंगुणः सम्बभूवेह राजा यस्य क्रतौ तत् सुवर्णं प्रभूतम् । तत् त्वं समादाय नरेन्द्र वित्तं यजस्व देवांस्तर्पयानो निवापैः ॥ ३६ ॥

नरेन्द्र! राजा मरुत्त ऐसे प्रभावशाली हुए थे । उनके यज्ञमें बहुत - सा सुवर्ण एकत्र किया गया था । तुम उसी धनको मँगवाकर यज्ञभागसे देवताओंको तृप्त करते हुए यजन करो ॥ ३६ ॥

वैशम्पायन उवाच ततो राजा पाण्डवो हृष्टरूपः श्रुत्वा वाक्यं सत्यवत्याः सुतस्य । मनश्चक्रे तेन वित्तेन यष्टुं ततोऽमात्यैर्मन्त्रयामास भूयः ॥ ३७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! सत्यवतीनन्दन व्यासजीके ये वचन सुनकर पाण्डुकुमार राजा युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उस धनके द्वारा यज्ञ करनेका विचार किया तथा इस विषयमें मन्त्रियोंके साथ बारंबार मन्त्रणा की ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक दसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १० ॥

पृष्ठ 1627

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एकादशोऽध्यायः श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको इन्द्रद्वारा शरीरस्थ वृत्रासुरका संहार करनेका इतिहास सुनाकर समझाना वैशम्पायन उवाच

इत्युक्ते नृपतौ तस्मिन् व्यासेनाद्भुतकर्मणा ।

वासुदेवो महातेजास्ततो वचनमाददे ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! अद्भुत कर्मा वेदव्यासजीने युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा, तब महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्ण कुछ कहनेको उद्यत हुए ॥ १ ॥

तं नृपं दीनमनसं निहतज्ञातिबान्धवम् ।

उपप्लुतमिवादित्यं सधूममिव पावकम् ॥ २ ॥

निर्विण्णमनसं पार्थं ज्ञात्वा वृष्णिकुलोद्वहः ।

आश्वासयन् धर्मसुतं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ३ ॥

जाति- भाइयोंके मारे जानेसे युधिष्ठिरका मन शोकसे दीन एवं व्याकुल हो रहा था । वे राहुग्रस्त सूर्य और धूमयुक्त अग्निके समान निस्तेज हो गये थे । विशेषतः उनका मन राज्यकी ओरसे खिन्न एवं विरक्त हो गया था । यह सब जानकर वृष्णिवंशभूषण श्रीकृष्णने कुन्तीकुमार धर्मपुत्र युधिष्ठिरको आश्वासन देते हुए इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ २-३ ॥ वासुदेव उवाच

सर्वं जिह्मं मृत्युपदमार्जवं ब्रह्मणः पदम् ।

एतावान् ज्ञानविषयः किं प्रलापः करिष्यति ॥ ४ ॥

- भगवान् श्रीकृष्णने कहा – धर्मराज! कुटिलता मृत्युका स्थान है और सरलता ब्रह्मकी प्राप्तिका साधन है । इस बातको ठीक -ठीक समझ लेना ही ज्ञानका विषय है । इसके विपरीत जो कुछ कहा जाता है, वह प्रलाप है । भला वह किसीका क्या उपकार करेगा? ॥ ४ ॥

नैव ते निष्ठितं कर्म नैव ते शत्रवो जिताः ।

कथं शत्रुं शरीरस्थमात्मनो नावबुध्यसे ॥ ५ ॥

आपने अपने कर्तव्यकर्मको पूरा नहीं किया । आपने अभीतक शत्रुओंपर विजय भी नहीं पायी । आपका शत्रु तो आपके शरीरके भीतर ही बैठा हुआ है । आप अपने उस शत्रुको क्यों नहीं पहचानते हैं? ॥ ५ ॥

अत्र ते वर्तयिष्यामि यथाधर्मं यथाश्रुतम् ।

पृष्ठ 1628

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इन्द्रस्य सह वृत्रेण यथा युद्धमवर्तत ॥ ६ ॥

यहाँ मैं आपके समक्ष धर्मके अनुसार एक वृत्तान्त जैसा सुन रखा है, वैसा ही बता रहा हूँ । पूर्वकालमें वृत्रासुरके साथ इन्द्रका जैसा युद्ध हुआ था, वही प्रसंग सुना रहा हूँ ॥ ६ ॥

वृत्रेण पृथिवी व्याप्ता पुरा किल नराधिप ।

दृष्ट्वा स पृथिवीं व्याप्तां गन्धस्य विषये हृते ॥ ७ ॥

धराहरणदुर्गन्धो विषयः समपद्यत ।

शतक्रतुश्चुकोपाथ गन्धस्य विषये हृते ॥ ८ ॥

नरेश्वर! कहते हैं, प्राचीन कालमें वृत्रासुरने समूची पृथ्वीपर अधिकार जमा लिया था । इन्द्रने देखा, वृत्रासुरने पृथ्वीपर अधिकार कर लिया और गन्धके विषयका भी अपहरण कर लिया और इस प्रकार पृथ्वीका अपहरण करनेसे सब ओर दुर्गन्धका प्रसार हो गया है । तब गन्धके विषयका अपहरण होनेसे शतक्रतु इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ ॥ ७-८ ॥

वृत्रस्य स ततः क्रुद्धो घोरं वज्रमवासृजत् ।

स वध्यमानो वज्रेण सुभृशं भूरितेजसा ॥ ९ ॥

विवेश सहसा तोयं जग्राह विषयं ततः । तत्पश्चात् उन्होंने कुपित हो वृत्रासुरके ऊपर घोर वज्रका प्रहार किया । महातेजस्वी वज्रसे अत्यन्त आहत हो वह असुर सहसा जलमें जा घुसा और उसके विषयभूत रसको ग्रहण करने लगा ॥ ९ ३ ॥ अप्सु वृत्रगृहीतासु रसे च विषये हृते ॥ १० ॥

शतक्रतुरतिक्रुद्धस्तत्र वज्रमवासृजत् । जब जलपर भी वृत्रासुरका अधिकार तथा रसरूपी विषयका अपहरण हो गया, तब अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए इन्द्रने वहाँ भी उसपर वज्रका प्रहार किया ॥ १०३ ॥

स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा ॥ ११ ॥

विवेश सहसा ज्योतिर्जग्राह विषयं ततः । जलमें अमिततेजस्वी वज्रकी मार खाकर वृत्रासुर सहसा तेजस्तत्त्वमें घुस गया और उसके विषयको ग्रहण करने लगा ॥ ११३ ॥

व्याप्ते ज्योतिषि वृत्रेण रूपेऽथ विषये हृते ॥ १२ ॥

शतक्रतुरतिक्रुद्धस्तत्र वज्रमवासृजत् । वृत्रासुरके द्वारा तेजपर भी अधिकार कर लिया गया और उसके रूप नामक विषयका अपहरण हो गया, यह जानकर शतक्रतुके क्रोधकी सीमा न रह गयी । उन्होंने वहाँ भी वृत्रासुरपर वज्रका प्रहार किया ॥ १२३ ॥

स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा ॥ १३ ॥

विवेश सहसा वायुं जग्राह विषयं ततः ।

पृष्ठ 1629

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उस तेजमें स्थित हुआ वृत्रासुर अमिततेजस्वी वज्रके प्रहारसे पीड़ित हो सहसा वायुमें समा गया और उसके स्पर्श नामक विषयको ग्रहण करने लगा ॥ १३३ ॥

व्याप्ते वायौ तु वृत्रेण स्पर्शेऽथ विषये हृते ॥ १४ ॥

शतक्रतुरतिक्रुद्धस्तत्र वज्रमवासृजत् । जब वृत्रासुरने वायुको भी व्याप्त करके उसके स्पर्श नामक विषयका अपहरण कर लिया, तब शतक्रतुने अत्यन्त कुपित होकर वहाँ उसके ऊपर अपना वज्र छोड़ दिया ॥ १४ ¾ ॥ स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा ॥ १५ ॥

आकाशमभिदुद्राव जग्राह विषयं ततः । वायुके भीतर अमित तेजस्वी वज्रसे पीड़ित हो वृत्रासुर भागकर आकाशमें जा छिपा और उसके विषयको ग्रहण करने लगा ॥ १५३ ॥

आकाशे वृत्रभूतेऽथ शब्दे च विषये हृते ॥ १६ ॥

शतक्रतुरभिक्रुद्धस्तत्र वज्रमवासृजत् । जब आकाश वृत्रासुरमय हो गया और उसके शब्दरूपी विषयका अपहरण होने लगा, तब शतक्रतु इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने वहाँ भी उसपर वज्रका प्रहार किया ॥ १६३ ॥

स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा ॥ १७ ॥

विवेश सहसा शक्रं जग्राह विषयं ततः । आकाशके भीतर अमित तेजस्वी वज्रसे पीड़ित हो वृत्रासुर सहसा इन्द्रमें समा गया और उनके विषयको ग्रहण करने लगा ॥ १७३ ॥

तस्य वृत्रगृहीतस्य मोहः समभवन्महान् ॥ १८ ॥

रथन्तरेण तं तात वसिष्ठः प्रत्यबोधयत् । तात! वृत्रासुरसे गृहीत होनेपर इन्द्रके मनपर महान् मोह छा गया । तब महर्षि वसिष्ठने रथन्तर सामके द्वारा उन्हें सचेत किया ॥ १८३ ॥

ततो वृत्रं शरीरस्थं जघान भरतर्षभ ।

शतक्रतुरदृश्येन वज्रेणेतीह नः श्रुतम् ॥ १ ९ ॥

भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् शतक्रतुने अपने शरीरके भीतर स्थित हुए वृत्रासुरको अदृश्य वज्रके द्वारा मार डाला ऐसा हमने सुना है ॥ १९ ॥

इदं धर्म्यं रहस्यं वै शक्रेणोक्तं महर्षिषु ।

ऋषिभिश्च मम प्रोक्तं तन्निबोध जनाधिप ॥ २० ॥

जनेश्वर! यह धर्मसम्मत रहस्य इन्द्रने महर्षियोंको बताया और महर्षियोंने मुझसे कहा ।

वही रहस्य मैंने आपको सुनाया है । आप इसे अच्छी तरह समझें ॥ २० ॥

पृष्ठ 1630

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 1630 का मूल पृष्ठ
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इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि कृष्णधर्मसंवादे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरका संवादविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥