श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1611–1620

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1611–1620

पृष्ठ 1611

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शक्रो भृशं सुसुखी पार्थिवेन्द्र प्रीतिं चेच्छत्यजरां वै त्वया सः । देवाश्च सर्वे वशगास्तस्य राजन् संदेशं त्वं शृणु मे देवराज्ञः ॥ १४ ॥

अग्निदेवने कहा — राजेन्द्र! देवराज इन्द्र बड़े सुखसे हैं और आपके साथ अटूट मैत्री जोड़ना चाहते हैं । सम्पूर्ण देवता भी उनके अधीन ही हैं । अब आप मुझसे देवराज इन्द्रका संदेश सुनिये ॥ १४ ॥

यदर्थं मां प्राहिणोत् त्वत्सकाशं बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । अयं गुरुर्याजयतां नृप त्वां मर्त्यं सन्तममरं त्वां करोतु ॥ १५ ॥

उन्होंने जिस कामके लिये मुझे आपके पास भेजा है, उसे सुनिये । वे मेरे द्वारा बृहस्पतिजीको आपके पास भेजना चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि बृहस्पतिजी आपके गुरु हैं । अतः ये ही आपका यज्ञ करायेंगे । आप मरणधर्मा मनुष्य हैं । ये आपको अमर बना देंगे ॥ १५ ॥

मरुत्त उवाच संवर्तोऽयं याजयिता द्विजो मां बृहस्पतेरञ्जलिरेष तस्य । न चैवासौ याजयित्वा महेन्द्रं मर्त्यं सन्तं याजयन्नद्य शोभेत् ॥ १६ ॥

मरुत्तने कहा — भगवन्! मेरा यज्ञ ये विप्रवर संवर्तजी करायेंगे । बृहस्पतिजीके लिये तो मेरी यह अञ्चलि जुड़ी हुई है । महेन्द्रका यज्ञ कराकर अब मेरे जैसे मरणधर्मा मनुष्यका यज्ञ करानेमें उनकी शोभा नहीं है ॥ १६ ॥

अग्निरुवाच ये वै लोका देवलोके महान्तः

सम्प्राप्स्यसे तान् देवराजप्रसादात् ।

त्वां चेदसौ याजयेद् वै बृहस्पति- र्नूनं स्वर्गं त्वं जयेः कीर्तियुक्तः ॥ १७ ॥

तथा लोका मानुषा ये च दिव्याः प्रजापतेश्चापि ये वै महान्तः । ते ते जिता देवराज्यं च कृत्स्नं बृहस्पतिर्याजयेच्चेन्नरेन्द्र ॥ १८ ॥

पृष्ठ 1612

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अग्निदेवने कहा — राजन्! यदि बृहस्पतिजी आपका यज्ञ करायेंगे तो देवराज इन्द्रके प्रसादसे देवलोकके भीतर जितने बड़े- बड़े लोक हैं, वे सभी आपके लिये सुलभ हो जायँगे । निश्चय ही आप यशस्वी होनेके साथ ही स्वर्गपर भी विजय प्राप्त कर लेंगे । मानवलोक, दिव्यलोक, महान् प्रजापतिलोक और सम्पूर्ण देवराज्यपर भी आपका अधिकार हो जायगा ॥ १७-१८ ॥ संवर्तउवाच मा स्मैव त्वं पुनरागाः कथंचिद् बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । मा त्वां धक्ष्ये चक्षुषा दारुणेन संक्रुद्धोऽहं पावकत्वं निबोध ॥ १ ९ ॥ संवर्तने कहा — अग्ने! तुम मेरी इस बातको अच्छी तरह समझ लो कि अबसे फिर कभी बृहस्पतिको मरुत्तके पास पहुँचानेके लिये तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिये । नहीं तो क्रोधमें भरकर मैं अपनी दारुण दृष्टिसे तुम्हें भस्म कर डालूँगा ॥ १ ९ ॥ व्यास उवाच ततो देवानगमद् धूमकेतु- र्दाहाद् भीतो व्यथितोऽश्वत्थपर्णवत् । तं वै दृष्ट्वा प्राह शक्रो महात्मा बृहस्पतेः संनिधौ हव्यवाहम् ॥ २० ॥

यस्त्वं गतः प्रहितो जातवेदो बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । तत् किं प्राह स नृपो यक्ष्यमाणः कच्चिद् वचः प्रतिगृह्णाति तच्च ॥ २१ ॥

व्यासजी कहते हैं - संवर्तकी बात सुनकर अग्निदेव भस्म होनेके भयसे व्यथित हो पीपलके पत्तेकी तरह काँपते हुए तुरंत देवताओंके पास लौट गये । उन्हें आया देख महामना इन्द्रने बृहस्पतिजीके सामने ही पूछा -' अग्निदेव! तुम तो मेरे भेजनेसे बृहस्पतिजीको राजा मरुत्तके पास पहुँचानेका संदेश लेकर गये थे । बताओ, यज्ञकी तैयारी करनेवाले राजा मरुत्त क्या कहते हैं? वे मेरी बात मानते हैं या नहीं? ' ॥ २०-२१ ॥ अग्निरुवाच न ते वाचं रोचयते मरुत्तो बृहस्पतेरञ्चलिं प्राहिणोत् सः । संवर्तो मां याजयितेत्युवाच

पृष्ठ 1613

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पुनः पुनः स मया याच्यमानः ॥ २२ ॥

अग्निने कहा-देवराज! राजा मरुत्तको आपकी बात पंसद नहीं आयी । बृहस्पतिजीको तो उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम कहलाया है । मेरे बारंबार अनुरोध करनेपर भी उन्होंने यही उत्तर दिया है कि ' संवर्तजी ही मेरा यज्ञ करायेंगे' ॥ २२ ॥

उवाचेदं मानुषा ये च दिव्याः प्रजापतेर्ये च लोका महान्तः । तांश्चेल्लभेयं संविदं तेन कृत्वा तथापि नेच्छेयमिति प्रतीतः ॥ २३ । उन्होंने यह भी कहा है कि 'जो मनुष्यलोक, दिव्यलोक और प्रजापतिके महान् लोक हैं, उन्हें भी यदि इन्द्रके साथ समझौता करके ही पा सकता हूँ तो भी मैं बृहस्पतिजीको अपने यज्ञका पुरोहित बनाना नहीं चाहता हूँ। यह मैं दृढ़ निश्चयके साथ कह रहा हूँ' ॥ २३ ॥

इन्द्र उवाच पुनर्गत्वा पार्थिवं त्वं समेत्य

वाक्यं मदीयं प्रापय स्वार्थयुक्तम् ।

पुनर्यद् युक्तो न करिष्यते वच- स्त्वत्तो वज्रं सम्प्रहर्तास्मि तस्मै ॥ २४ ॥

इन्द्रने कहा — अग्निदेव! एक बार फिर जाकर राजा मरुत्तसे मिलो और मेरा अर्थयुक्त संदेश उनके पास पहुँचा दो । यदि तुम्हारे द्वारा दुबारा कहनेपर भी मेरी बात नहीं मानेंगे तो मैं उनके ऊपर वज्रका प्रहार करूँगा ॥ २४ ॥

अग्निरुवाच गन्धर्वराड् यत्वयं तत्र दूतो बिभेम्यहं वासव तत्र गन्तुम् । संरब्धो मामब्रवीत् तीक्ष्णरोषः संवर्तो वाक्यं चरितब्रह्मचर्यः ॥ २५ ॥

यद्यागच्छेः पुनरेवं कथंचिद् बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । दहेयं त्वां चक्षुषा दारुणेन संक्रुद्ध इत्येतदवैहि शक्र ॥ २६ ॥

अग्निने कहा — देवेन्द्र! ये गन्धर्वराज वहाँ दूत बनकर जायँ । मैं दुबारा वहाँ जानेसे डरता हूँ; क्योंकि ब्रह्मचारी संवर्तने तीव्र रोषमें भरकर मुझसे कहा था कि ' अग्ने! यदि फिर इस प्रकार किसी तरह बृहस्पतिको मरुत्तके पास पहुँचानेके लिये आओगे तो मैं कुपित हो

पृष्ठ 1614

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दारुण दृष्टिसे तुम्हें भस्म कर डालूँगा। ' इन्द्र! उनकी इस बातको अच्छी तरह समझ लीजिये ॥ २५-२६ ॥ शक्र उवाच त्वमेवान्यान् दहसे जातवेदो न हि त्वदन्यो विद्यते भस्मकर्ता । त्वत्संस्पर्शात् सर्वलोको बिभेति अश्रद्धेयं वदसे हव्यवाह ॥ २७ ॥

इन्द्रने कहा – हव्यवाहन! अग्निदेव! तुम तो ऐसी बात कह रहे हो, जिसपर विश्वास नहीं होता; क्योंकि तुम्हीं दूसरोंको भस्म करते हो । तुम्हारे सिवा दूसरा कोई भस्म करनेवाला नहीं है । तुम्हारे स्पर्शसे सभी लोग डरते हैं ॥ २७ ॥

अग्निरुवाच दिवं देवेन्द्र पृथिवीं च सर्वां संवेष्टयेस्त्वं स्वबलेनैव शक्र । एवंविधस्येह सतस्तवासौ कथं वृत्रस्त्रिदिवं प्राग् जहार ॥ २८ ॥

अग्निदेवने कहा —देवेन्द्र! आप भी तो अपने बलसे सारी पृथ्वी और स्वर्गलोकको आवेष्टित किये हुए हैं । ऐसे होनेपर भी आपके इस स्वर्गको पूर्वकालमें वृत्रासुरने कैसे हर लिया? ॥ २८ ॥

इन्द्र उवाच न गण्डिकाकारयोगं करेऽणुं न चारिसोमं प्रपिबामि वह्ने । न क्षीणशक्तौ प्रहरामि वज्रं को मे s सुखाय प्रहरेत मर्त्यः ॥ २ ९ ॥ इन्द्रने कहा — अग्निदेव! मैं पर्वतको भी मक्खीके समान छोटा कर सकता हूँ तो भी शत्रुका दिया हुआ सोमरस नहीं पीता हूँ और जिसकी शक्ति क्षीण हो गयी है, ऐसे शत्रुपर वज्रका प्रहार नहीं करता । फिर भी कौन ऐसा मनुष्य है जो मुझे कष्ट पहुँचानेके लिये मुझपर प्रहार कर सके? ॥ २ ९ ॥ प्रव्राजयेयं कालकेयान् पृथिव्या- मपाकर्षन् दानवानन्तरिक्षात् । दिवः प्रह्लादमवसानमानयं को मे s सुखाय प्रहरेत मानवः ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1615

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मैं चाहूँ तो कालकेय - जैसे दानवोंको आकाशसे खींचकर पृथ्वीपर गिरा सकता हूँ । इसी प्रकार स्वर्गसे प्रह्लादके प्रभुत्वका भी अन्त कर सकता हूँ, फिर मनुष्योंमें कौन ऐसा है जो कष्ट देनेके लिये मुझपर प्रहार कर सके? ॥ ३० ॥

अग्निरुवाच यत्र शर्यातिं च्यवनो याजयिष्यन्

सहाश्विभ्यां सोममगृह्णादेकः ।

तं त्वं क्रुद्धः प्रत्यषेधीः पुरस्ता- च्छर्यातियज्ञं स्मर तं महेन्द्र ॥ ३१ ॥

अग्निदेवने कहा – महेन्द्र! राजा शर्यातिके उस यज्ञका तो स्मरण कीजिये, जहाँ महर्षि च्यवन उनका यज्ञ करानेवाले थे । आप क्रोधमें भरकर उन्हें मना करते ही रह गये और उन्होंने अकेले अपने ही प्रभावसे सम्पूर्ण देवताओंसहित अश्विनीकुमारोंके साथ सोमरसका पान किया ॥ ३१ ॥

वज्रं गृहीत्वा च पुरन्दर त्वं सम्प्राहार्षीश्च्यवनस्यातिघोरम् । स ते विप्रः सह वज्रेण बाहु- मपागृह्णात् तपसा जातमन्युः ॥ ३२ ॥

पुरंदर! उस समय आप अत्यन्त भयंकर वज्र लेकर महर्षि च्यवनके ऊपर प्रहार करना ही चाहते थे; किंतु उन ब्रह्मर्षिने कुपित होकर अपने तपोबलसे आपकी बाँहको वज्रसहित जकड़ दिया ॥ ३२ ॥

ततो रोषात् सर्वतो घोररूपं सपत्नं ते जनयामास भूखः । मदं नामासुरं विश्वरूपं यं त्वं दृष्ट्वा चक्षुषी संन्यमीलः ॥ ३३ ॥

तदनन्तर उन्होंने पुनः रोषपूर्वक आपके लिये सब ओरसे भयानक रूपवाले एक शत्रुको उत्पन्न किया । जो सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त मद नामक असुर था और जिसे देखते ही आपने अपनी आँखें बंद कर ली थीं ॥ ३३ ॥

हनुरेका जगतीस्था तथैका दिवं गता महतो दानवस्य । सहस्रं दन्तानां शतयोजनानां सुतीक्ष्णानां घोररूपं बभूव ॥ ३४ ॥

उस विशालकाय दानवकी एक ठोढ़ी पृथ्वीपर टिकी हुई थी और दूसरा ऊपरका ओठ स्वर्गसे जा लगा था । उसके सैकड़ों योजन लंबे सहस्रों तीखे दाँत थे, जिससे उसका रूप

पृष्ठ 1616

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बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ ३४ ॥

वृत्ताः स्थूला रजतस्तम्भवर्णा

दंष्ट्राश्चतस्रो द्वे शते योजनानाम् ।

स त्वां दन्तान् विदशन्नभ्यधाव- ज्जिघांसया शूलमुद्यम्य घोरम् ॥ ३५ ॥

उसकी चार दाढ़ें गोलाकार, मोटी और चाँदीके खम्भोंके समान चमकीली थीं । उनकी लंबाई दो -दो सौ योजनकी थी । वह दानव भयंकर त्रिशूल लेकर आपको मार डालनेकी इच्छासे दाँत पीसता हुआ दौड़ा था ॥ ३५ ॥

अपश्यस्त्वं तं तदा घोररूपं

सर्वे वै त्वां ददृशुर्दर्शनीयम् ।

यस्माद् भीतः प्राञ्जलिस्त्वं महर्षि- मागच्छेथाः शरणं दानवघ्न ॥ ३६ ॥

दानवदलन देवराज! आपने उस समय उस घोररूपधारी दानवको देखा था और अन्य सब लोगोंने आपकी ओर भी दृष्टिपात किया था । उस अवसरपर भयके कारण आपकी जो दशा हुई थी, वह देखने ही योग्य थी । आप उस दानवसे भयभीत हो हाथ जोड़कर महर्षि च्यवनकी शरणमें गये थे ॥ ३६ ॥

क्षात्राद् बलाद् ब्रह्मबलं गरीयो

न ब्रह्मतः किंचिदन्यद् गरीयः ।

सोऽहं जानन् ब्रह्मतेजो यथाव- न्न संवर्तं जेतुमिच्छामि शक्र ॥ ३७ ॥

अतः देवेन्द्र! क्षात्रबलकी अपेक्षा ब्राह्मणबल श्रेष्ठतम है । ब्राह्मणसे बढ़कर दूसरी कोई शक्ति नहीं है । मैं ब्रह्मतेजको अच्छी तरह जानता हूँ; अतः संवर्तको जीतनेकी मुझे इच्छातक नहीं होती है ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये नवमोऽध्याय ॥ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक नवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥

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पृष्ठ 1617

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दशमोऽध्यायः इन्द्रका गन्धर्वराजको भेजकर मरुत्तको भय दिखाना और संवर्तका मन्त्रबलसे इन्द्रसहित सब देवताओंको बुलाकर मरुत्तका यज्ञ पूर्ण करना इन्द्र उवाच एवमेतद् ब्रह्मबलं गरीयो न ब्राह्मणात् किंचिदन्यद् गरीयः । आविक्षितस्य तु बलं न मृष्ये वज्रमस्मै प्रहरिष्यामि घोरम् ॥ १ ॥

इन्द्रने कहा — यह ठीक है कि ब्रह्मबल सबसे बढ़कर है । ब्राह्मणसे श्रेष्ठ दूसराकोई नहीं है; किंतु मैं राजा मरुत्तके बलको नहीं सह सकता । उनके ऊपर अवश्य अपने घोर वज्रका प्रहार करूँगा ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र प्रहितो गच्छ मरुत्तं संवर्तेन संगतं तं वदस्व । बृहस्पतिं त्वमुपशिक्षस्व राजन् वज्रं वा ते प्रहरिष्यामि घोरम् ॥ २ ॥

गन्धर्वराज धृतराष्ट्र! अब तुम मेरे भेजनेसे वहाँ जाओ और संवर्तके साथ मिले हुए राजा मरुत्तसे कहो — ‘ राजन्! आप बृहस्पतिको आचार्य बनाकर उनसे यज्ञकर्मकी शिक्षा-दीक्षा ग्रहण कीजिये । अन्यथा मैं इन्द्र आपपर घोर वज्रका प्रहार करूँगा ' ॥ २ ॥

व्यास उवाच ततो गत्वा धृतराष्ट्रो नरेन्द्रं प्रोवाचेदं वचनं वासवस्य ॥ ३ ॥

गन्धर्वं मां धृतराष्ट्रं निबोध त्वामागतं वक्तुकामं नरेन्द्र । ऐन्द्रं वाक्यं शृणु मे राजसिंह यत् प्राह लोकाधिपतिर्महात्मा ॥ ४ ॥

व्यासजी कहते हैं - तब गन्धर्वराज धृतराष्ट्र राजा मरुत्तके पास गये और उनसे इन्द्रका संदेश इस प्रकार कहने लगे- ' महाराज! आपको विदित हो कि मैं धृतराष्ट्र नामक गन्धर्व हूँ और आपको देवराज इन्द्रका संदेश सुनाने आया हूँ। राजसिंह! सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी महामना इन्द्रने जो कुछ कहा है, उनका वह वाक्य सुनिये ॥ ३-४ ॥

पृष्ठ 1618

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बृहस्पतिं याजकं त्वं वृणीष्व वज्रं वा ते प्रहरिष्यामि घोरम् । वचश्चेदेतन्न करिष्यसे मे प्राहैतदेतावदचिन्त्यकर्मा ॥ ५ ॥

अचिन्त्यकर्मा इन्द्र कहते हैं -' राजन्! आप बृहस्पतिको अपने यज्ञका पुरोहित बनाइये । यदि आप मेरी यह बात नहीं मानेंगे तो मैं आपपर भयंकर वज्रका प्रहार करूँगा' ॥ ५ ॥

मरुत्त उवाच त्वं चैवैतद् वेत्थ पुरंदरश्च विश्वेदेवा वसवश्चाश्विनौ च । मित्रद्रोहे निष्कृतिर्नास्ति लोके महत् पापं ब्रह्महत्यासमं तत् ॥ ६ ॥

मरुत्तने कहा — गन्धर्वराज! आप, इन्द्र, विश्वेदेव, वसुगण तथा अश्विनीकुमार भी इस बातको जानते हैं कि मित्रके साथ द्रोह करनेपर ब्रह्महत्याके समान महान् पाप लगता है । उससे छुटकारा पानेका संसारमें कोई उपाय नहीं है ॥ ६ ॥

बृहस्पतिर्याजयतां महेन्द्रं देवश्रेष्ठं वज्रभृतां वरिष्ठम् । संवर्तो मां याजयिताद्य राजन् न ते वाक्यं तस्य वा रोचयामि ॥ ७ ॥

गन्धर्वराज! बृहस्पतिजी वज्रधारियोंमें श्रेष्ठ देवेश्वर महेन्द्रका यज्ञ करायें । मेरा यज्ञ तो अब संवर्तजी ही करायेंगे । इसके विरुद्ध न तो मैं आपकी बात मानूँगा और न इन्द्रकी ही ॥ ७ ॥

गन्धर्वउवाच घोरो नादःश्रूयतां वासवस्य नभस्तले गर्जतो राजसिंह । व्यक्तं वज्रं मोक्ष्यते ते महेन्द्रः क्षेमं राजंश्चिन्त्यतामेष कालः ॥ ८ ॥

गन्धर्वराजने कहा — राजसिंह! आकाशमें गर्जना करते हुए इन्द्रका वह घोर सिंहनाद सुनिये । जान पड़ता है, महेन्द्र आपके ऊपर वज्र छोड़ना ही चाहते हैं; अतः राजन्! अपनी

रक्षा एवं भलाईका उपाय सोचिये । इसके लिये यही अवसर है ॥ ८ ॥

व्यासउवाच

पृष्ठ 1619

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इत्येवमुक्तो धृतराष्ट्रेण राजन् श्रुत्वा नादं नदतो वासवस्य । तपोनित्यं धर्मविदां वरिष्ठं संवर्तं तं ज्ञापयामास कार्यम् ॥ ९ ॥

व्यासजी कहते हैं — राजन्! धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर राजा मरुत्तने आकाशमें गरजते हुए इन्द्रका शब्द सुनकर सदा तपस्यामें तत्पर रहनेवाले धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ संवर्तको इन्द्रके इस कार्यकी सूचना दी ॥ ९ ॥

मरुत्तउवाच इममात्मानं प्लवमानमारा- दध्वा दूरं तेन न दृश्यतेऽद्य । प्रपद्येऽहं शर्म विप्रेन्द्र त्वत्तः प्रयच्छ तस्मादभयं विप्रमुख्य ॥ १० ॥

अयमायाति वै वज्री दिशो विद्योतयन् दश ।

अमानुषेण घोरेण सदस्यास्त्रासिता हि नः ॥ ११ ॥

मरुत्तने कहा – विप्रवर! देवराज इन्द्र दूरसे ही प्रहार करनेकी चेष्टा कर रहे हैं, वे दूरकी राहपर खड़े हैं, इसलिये उनका शरीर दृष्टिगोचर नहीं होता। ब्राह्मणशिरोमणे! मैं आपकी शरणमें हूँ और आपके द्वारा अपनी रक्षा चाहता हूँ, अतः आप कृपा करके मुझे अभय- दान दें । देखिये, ये वज्रधारी इन्द्र दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए चले आ रहे हैं । इनके भयंकर एवं अलौकिक सिंहनादसे हमारी यज्ञशालाके सभी सदस्य थर्रा उठे हैं ॥ १०-११ ॥

पृष्ठ 1620

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संवर्तउवाच भयं शक्राद् व्येतु ते राजसिंह प्रणोत्स्येऽहं भयमेतत् सुघोरम् । संस्तम्भिन्या विद्यया क्षिप्रमेव मा भैस्त्वमस्याभिभवात् प्रतीतः ॥ १२ ॥

संवर्तने कहा — राजसिंह! इन्द्रसे तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये । मैं स्तम्भिनी विद्याका प्रयोग करके बहुत जल्द तुम्हारे ऊपर आनेवाले इस अत्यन्त भयंकर संकटको दूर किये देता हूँ । मुझपर विश्वास करो और इन्द्रसे पराजित होनेका भय छोड़ दो ॥ १२ ॥

अहं संस्तम्भयिष्यामि मा भैस्त्वं शक्रतो नृप ।

सर्वेषामेव देवानां क्षयितान्यायुधानि मे ॥ १३ ॥

दिशो वज्रं व्रजतां वायुरेतु वर्षं भूत्वा वर्षतां काननेषु । आपः प्लवन्त्वन्तरिक्षे वृथा च सौदामनी दृश्यते मापि भैस्त्वम् ॥ १४ ॥