श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1631–1640
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1631–1640
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द्वादशोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको मनपर विजय करनेके लिये आदेश वासुदेव उवाच
द्विविधो जायते व्याधिः शारीरो मानसस्तथा ।
परस्परं तयोर्जन्म निर्द्वन्द्वं नोपपद्यते ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा–कुन्तीनन्दन! दो प्रकारके रोग उत्पन्न होते हैं —एक शरीरिक दूसरा मानसिक। इन दोनोंका जन्म एक- दूसरेके सहयोगसे होता है । दोनोंके पारस्परिक सहयोगके बिना इनकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है ॥ १ ॥
शरीरे जायते व्याधिः शारीरः स निगद्यते ।
मानसे जायते व्याधिर्मानसस्तु निगद्यते ॥ २ ॥
शरीरमें जो रोग उत्पन्न होता है, उसे शारीरिक रोग कहते हैं और मनमें जो व्याधि होती है, वह मानसिक रोग कहलाती है ॥ २ ॥
शीतोष्णे चैव वायुश्च गुणा राजन् शरीरजाः ।
तेषां गुणानां साम्यं चेत् तदाहुः स्वस्थलक्षणम् ॥ ३ ॥
राजन्! शीत, उष्ण और वायु- ये तीन शरीरके गुण हैं । यदि शरीरमें इन तीनों गुणोंकी समानता हो तो यह स्वस्थ पुरुषका लक्षण है ॥ ३ ॥
उष्णेन बाध्यते शीतं शीतेनोष्णं च बाध्यते ।
सत्त्वं रजस्तमश्चेति त्रय आत्मगुणाः स्मृताः ॥ ४ ॥
उष्ण शीतका निवारण करता और शीत उष्णका निवारण करता है । सत्त्व, रज और तम— ये तीन अन्तःकरणके गुण माने गये हैं ॥ ४ ॥
तेषां गुणानां साम्यं चेत् तदाहुः स्वस्थलक्षणम् ।
तेषामन्यतमोत्सेके विधानमुपदिश्यते ॥ ५ ॥
इन गुणोंकी समानता हो तो यह मानसिक स्वास्थ्यका लक्षण है । इनमेंसे किसी एककी वृद्धि होनेपर उसके निवारणका उपाय बताया जाता है ॥ ५ ॥
हर्षेण बाध्यते शोको हर्षः शोकेन बाध्यते ।
कश्चिद् दुःखे वर्तमानः सुखस्य स्मर्तुमिच्छति ।
कश्चित् सुखे वर्तमानो दुःखस्य स्मर्तुमिच्छति ॥ ६ ॥
हर्षसे शोक बाधित होता है और शोकसे हर्ष । कोई दुःखमें पड़कर सुखकी याद करना चाहता है और कोई सुखी होकर दुःखकी याद करना चाहता है ॥ ६ ॥
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स त्वं न दुःखी दुःखस्य न सुखी सुसुखस्य च ।
स्मर्तुमिच्छसि कौन्तेय किमन्यद् दुःखविभ्रमात् ॥ ७ ॥
कुन्तीनन्दन! आप न तो दुखी होकर दुःखकी और न सुखी होकर उत्तम सुखकी याद करना चाहते हैं । यह दुःखविभ्रमके सिवा और क्या है ॥ ७ ॥
अथवा ते स्वभावोऽयं येन पार्थावकृष्यसे ।
दृष्ट्वा सभागतां कृष्णामेकवस्त्रां रजस्वलाम् ।
मिषतां पाण्डवेयानां न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ ८ ॥
अथवा पार्थ! आपका यह स्वभाव ही है, जिससे आप आकृष्ट होते हैं । पाण्डवोंके देखते -देखते एकवस्त्रधारिणी रजस्वला कृष्णा सभामें घसीट लायी गयी । आप उसे उस अवस्थामें देखकर भी अब उसकी याद करना नहीं चाहते ॥ ८ ॥
प्रव्राजनं च नगरादजिनैश्च विवासनम् ।
महारण्यनिवासश्च न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ ९ ॥
आपलोगोंको नगरसे निकाला गया, मृगछाला पहनाकर वनवास दिया गया और बड़े-बड़े घोर जंगलोंमें रहना पड़ा । इन सब बातोंको आप कभी याद करना नहीं चाहते हैं ॥ ९ ॥
जटासुरात् परिक्लेशश्चित्रसेनेन चाहवः ।
सैन्धवाच्च परिक्लेशो न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ १० ॥
जटासुरसे जो क्लेश उठाना पड़ा, चित्रसेनके साथ जूझना पड़ा और सिन्धुराज जयद्रथसे जो अपमान और कष्ट प्राप्त हुआ, उसका स्मरण करनेकी इच्छा आपको नहीं होती है ॥ १० ॥
पुनरज्ञातचर्यायां कीचकेन पदा वधः ।
याज्ञसेन्यास्तथा पार्थ न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ ११ ॥
पार्थ! अज्ञातवासके दिनों कीचकने जो द्रौपदीको लात मारी थी, उसे भी आप नहीं याद करना चाहते हैं ॥
यच्च ते द्रोणभीष्माभ्यां युद्धमासीदरिंदम ।
मनसैकेन योद्धव्यं तत् ते युद्धमुपस्थितम् ॥ १२ ॥
शत्रुदमन! द्रोणाचार्य और भीष्मके साथ जो युद्ध हुआ था, वही युद्ध आपके सामने उपस्थित है । इस समय आपको अकेले अपने मनके साथ युद्ध करना होगा ॥
तस्मादभ्युपगन्तव्यं युद्धाय भरतर्षभ ।
परमव्यक्तरूपस्य पारं युक्त्या स्वकर्मभिः ॥ १३ ॥
भरतभूषण! अतः उस युद्धके लिये आपको तैयार हो जाना चाहिये । अपने कर्तव्यका पालन करते हुए योगके द्वारा मनको वशीभूत करके आप मायासे परे परब्रह्मको प्राप्त कीजिये ॥ १३ ॥
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यत्र नैव शरैः कार्यं न भृत्यैर्न च बन्धुभिः ।
आत्मनैकेन योद्धव्यं तत् ते युद्धमुपस्थितम् ॥ १४ ॥
मनके साथ होनेवाले इस युद्धमें न तो बाणोंका काम है और न सेवकों तथा बन्धु-बान्धवोंका ही । इस समय इसमें आपको अकेले ही युद्ध करना है और वह युद्ध सामने उपस्थित है ॥ १४ ॥
तस्मिन्ननिर्जिते युद्धे कामवस्थां गमिष्यसि ।
एतज्ज्ञात्वा तु कौन्तेय कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ १५ ॥
यदि इस युद्धमें आप मनको न जीत सके तो पता नहीं आपकी क्या दशा होगी ।
कुन्तीनन्दन! इस बातको अच्छी तरह समझ लेनेपर आप कृतकृत्य हो जायँगे ॥ १५ ॥
एतां बुद्धिं विनिश्चित्य भूतानामागतिं गतिम् ।
पितृपैतामहे वृत्ते शाधि राज्यं यथोचितम् ॥ १६ ॥
समस्त प्राणियोंका यों ही आवागमन होता रहता है । बुद्धिसे ऐसा निश्चय करके आप अपने बाप- दादोंके बर्तावका पालन करते हुए उचित रीतिसे राज्यका शासन कीजिये ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि कृष्णधर्मसंवादे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरका संवादविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
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त्रयोदशोऽध्यायः श्रीकृष्णद्वारा ममताके त्यागका महत्त्व, काम- गीताका उल्लेख और युधिष्ठिरको यज्ञके लिये प्रेरणा करना वासुदेव उवाच
न बाह्यं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति भारत ।
शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति वा न वा ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - भारत! केवल राज्य आदि बाह्य पदार्थोंका त्याग करनेसे ही सिद्धि नहीं प्राप्त होती । शारीरिक द्रव्यका त्याग करके भी सिद्धि प्राप्त होती है अथवा नहीं भी होती है ॥ १ ॥
बाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेषु च गृद्धयतः ।
यो धर्मो यत् सुखं चैव द्विषतामस्तु तत् तथा ॥ २ ॥
बाह्य पदार्थोंसे अलग होकर भी जो शारीरिक सुख - विलासमें आसक्त है, उसे जिस धर्म और सुखकी प्राप्ति होती है, वह तुम्हारे साथ द्वेष करनेवालोंको ही प्राप्त हो ॥ २ ॥
द्वयक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् ।
ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम् ॥ ३ ॥
' मम ' ( मेरा ) ये दो अक्षर ही मृत्युरूप हैं और 'न मम ' ( मेरा नहीं है ) यह तीन अक्षरोंका पद सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिका कारण है। ममता मृत्यु है और उसका त्याग सनातन अमृतत्व है ॥ ३ ॥
ब्रह्ममृत्यू ततो राजन्नात्मन्येव व्यवस्थितौ ।
अदृश्यमानौ भूतानि योधयेतामसंशयम् ॥ ४ ॥
राजन्! इस प्रकार मृत्यु और अमृत दोनों अपने भीतर ही स्थित हैं । ये दोनों अदृश्य रहकर प्राणियोंको लड़ाते हैं अर्थात् किसीको अपना मानना और किसीको अपना न मानना यह भाव ही युद्धका कारण है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥
अविनाशोऽस्य सत्त्वस्य नियतो यदि भारत ।
भित्त्वा शरीरं भूतानामहिंसां प्रतिपद्यते ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! यदि इस जगत्की सत्ताका विनाश न होना ही निश्चित हो, तब तो प्राणियोंके शरीरका भेदन करके भी मनुष्य अहिंसाका ही फल प्राप्त करेगा ॥ ५ ॥
लब्ध्वा हि पृथ्वीं कृत्स्नां सहस्थावरजङ्गमाम् ।
ममत्वं यस्य नैव स्यात् किं तया स करिष्यति ॥ ६ ॥
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चराचर प्राणियोंसहित समूची पृथ्वीको पाकर भी जिसकी उसमें ममता नहीं होती, वह उसको लेकर क्या करेगा अर्थात् उस सम्पत्तिसे उसका कोई अनर्थ नहीं हो सकता ॥ ६ ॥
अथवा वसतः पार्थ वने वन्येन जीवतः ।
ममता यस्य द्रव्येषु मृत्योरास्ये स वर्तते ॥ ७ ॥
किंतु कुन्तीनन्दन! जो वनमें रहकर जंगली फल- मूलोंसे ही जीवन निर्वाह करता है, उसकी भी यदि द्रव्योंमें ममता है तो वह मौतके मुखमें ही विद्यमान है ॥ ७ ॥
बाह्यान्तराणां शत्रूणां स्वभावं पश्य भारत ।
यन्न पश्यति तद् भूतं मुच्यते स महाभयात् ॥ ८ ॥
भारत! बाहरी और भीतरी शत्रुओंके स्वभावको देखिये- समझिये ( ये मायामय होनेके कारण मिथ्या हैं, ऐसा निश्चय कीजिये ) |। जो मायिक पदार्थोंको ममत्वकी दृष्टिसे नहीं देखता, वह महान् भयसे छुटकारा पा जाता है ॥ ८ ॥
कामात्मानं न प्रशंसन्ति लोके नेहाकामा काचिदस्ति प्रवृत्तिः । सर्वे कामा मनसोऽङ्गप्रभूता यान् पण्डितः संहरते विचिन्त्य ॥ ९ ॥
जिसका मन कामनाओंमें आसक्त है, उसकी संसारके लोग प्रशंसा नहीं करते हैं । कोई भी प्रवृत्ति बिना कामनाके नहीं होती और समस्त कामनाएँ मनसे ही प्रकट होती हैं । विद्वान् पुरुष कामनाओंको दुःखका कारण मानकर उनका परित्याग कर देते हैं ॥ ९ ॥
भूयो भूयोजन्मनोऽभ्यासयोगाद् योगी योगं सारमार्गं विचिन्त्य । दानं च वेदाध्ययनं तपश्च काम्यानि कर्माणि च वैदिकानि ॥ १० ॥
व्रतं यज्ञान् नियमान् ध्यानयोगान् कामेन यो नारभते विदित्वा । यद् यच्चायं कामयते स धर्मो न यो धर्मो नियमस्तस्य मूलम् ॥ ११ ॥
योगी पुरुष अनेक जन्मोंके अभ्याससे योगको ही मोक्षका मार्ग निश्चित करके कामनाओंका नाश कर डालता है । जो इस बातको जानता है, वह दान, वेदाध्ययन, तप, वेदोक्त कर्म, व्रत, यज्ञ, नियम और ध्यान - योगादिका कामनापूर्वक अनुष्ठान नहीं करता तथा जिस कर्मसे वह कुछ कामना रखता है, वह धर्म नहीं है । वास्तवमें कामनाओंका निग्रह ही धर्म है और वही मोक्षका मूल है ॥ १०-११ ॥ अत्र गाथाः कामगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । शृणु संकीर्त्यमानास्ता अखिलेन युधिष्ठिर ।
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नाहं शक्योऽनुपायेन हन्तुं भूतेन केनचित् ॥ १२ ॥
युधिष्ठिर! इस विषयमें प्राचीन बातोंके जानकार विद्वान् एक पुरातन गाथाका वर्णन किया करते हैं, जो कामगीता कहलाती है । उसे मैं आपको सुनाता हूँ, सुनिये । कामका कहना है कि कोई भी प्राणी वास्तविक उपाय ( निर्ममता और योगाभ्यास) - का आश्रय लिये बिना मेरा नाश नहीं कर सकता है ॥ १२ ॥
यो मां प्रयतते हन्तुं ज्ञात्वा प्रहरणे बलम् ।
तस्य तस्मिन् प्रहरणे पुनः प्रादुर्भवाम्यहम् ॥ १३ ॥
जो मनुष्य अपनेमें अस्त्रबलकी अधिकताका अनुभव करके मुझे नष्ट करनेका प्रयत्न करता है, उसके उस अस्त्रबलमें मैं अभिमानरूपसे पुनः प्रकट हो जाता हूँ ॥ १३ ॥
यो मां प्रयतते हन्तुं यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ।
जङ्गमेष्विव धर्मात्मा पुनः प्रादुर्भवाम्यहम् ॥ १४ ॥
जो नाना प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा मुझे मारनेका यत्न करता है, उसके चित्तमें मैं उसी प्रकार उत्पन्न होता हूँ, जैसे उत्तम जंगम योनियोंमें धर्मात्मा ॥ १४ ॥
यो मां प्रयतते नित्यं वेदैर्वेदान्तसाधनैः ।
स्थावरेष्विव भूतात्मा तस्य प्रादुर्भवाम्यहम् ॥ १५ ॥
जो वेद और वेदान्तके स्वाध्यायरूप साधनोंके द्वारा मुझे मिटा देनेका सदा प्रयास करता है, उसके मनमें मैं स्थावर प्राणियोंमें जीवात्माकी भाँति प्रकट होता हूँ ॥ १५ ॥
यो मां प्रयतते हन्तुं धृत्या सत्यपराक्रमः ।
भावो भवामि तस्याहं स च मां नावबुध्यते ॥ १६ ॥
जो सत्यपराक्रमी पुरुष धैर्यके बलसे मुझे नष्ट करनेकी चेष्टा करता है, उसके मानसिक भावोंके साथ मैं इतना घुल - मिल जाता हूँ कि वह मुझे पहचान नहीं पाता ॥ १६ ॥
यो मां प्रयतते हन्तुं तपसा संशितव्रतः ।
ततस्तपसि तस्याथ पुनः प्रादुर्भवाम्यहम् ॥ १७ ॥
जो कठोर व्रतका पालन करनेवाला मनुष्य तपस्याके द्वारा मेरे अस्तित्वको मिटा डालनेका प्रयास करता है, उसकी तपस्यामें ही मैं प्रकट हो जाता हूँ ॥ १७ ॥
यो मां प्रयतते हन्तुं मोक्षमास्थाय पण्डितः ।
तस्य मोक्षरतिस्थस्य नृत्यामि च हसामि च ।
अवध्यः सर्वभूतानामहमेकः सनातनः ॥ १८ ॥
जो विद्वान् पुरुष मोक्षका सहारा लेकर मेरे विनाशका प्रयत्न करता है, उसकी जो मोक्षविषयक आसक्ति है, उसीसे वह बँधा हुआ है । यह विचारकर मुझे उसपर हँसी आती है और मैं खुशीके मारे नाचने लगता हूँ । एकमात्र मैं ही समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य एवं सदा रहनेवाला हूँ ॥ १८ ॥
तस्मात्त्वमपि तं कामं यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ।
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धर्मे कुरु महाराज तत्र ते स भविष्यति ॥ १ ९ ॥ अतः महाराज! आप भी नाना प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा अपनी उस कामनाको
धर्ममें लगा दीजिये । वहाँ आपकी वह कामना सफल होगी ॥ १ ९ ॥
यजस्व वाजिमेधेन विधिवद् दक्षिणावता ।
अन्यैश्च विविधैर्यज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः ॥ २० ॥
मा ते व्यथास्तु निहतान् बन्धून् वीक्ष्य पुनः पुनः ।
न शक्यास्ते पुनर्द्रष्टुं ये हताऽस्मिन् रणाजिरे ॥ २१ ॥
विधिपूर्वक दक्षिणा देकर आप अश्वमेधका तथा पर्याप्त दक्षिणावाले अन्यान्य समृद्धिशाली यज्ञोंका अनुष्ठान कीजिये । अपने मारे गये भाई- बन्धुओंको बारंबार याद करके आपके मनमें व्यथा नहीं होनी चाहिये । इस समरांगणमें जिनका वध हुआ है, उन्हें आप फिर नहीं देख सकते ॥
स त्वमिष्ट्वा महायज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः ।
कीर्तिं लोके परां प्राप्य गतिमग्रयां गमिष्यसि ॥ २२ ॥
इसलिये आप पर्याप्त दक्षिणावाले समृद्धिशाली महायज्ञोंका अनुष्ठान करके इस लोकमें उत्तम कीर्ति और परलोकमें श्रेष्ठ गति प्राप्त करेंगे ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि कृष्णधर्मसंवादे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरका संवादविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
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चतुर्दशोऽध्यायः ऋषियोंका अन्तर्धान होना, भीष्म आदिका श्राद्ध करके युधिष्ठिर आदिका हस्तिनापुरमें जाना तथा युधिष्ठिरके धर्मराज्यका वर्णन वैशम्पायन उवाच
एवं बहुविधैर्वाक्यैर्मुनिभिस्तैस्तपोधनैः ।
समाश्वस्यत राजर्षिर्हतबन्धुर्युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
सोऽनुनीतो भगवता विष्टरश्रवसा स्वयम् ।
द्वैपायनेन कृष्णेन देवस्थानेन वा विभुः ॥ २ ॥
नारदेनाथ भीमेन नकुलेन च पार्थिव ।
कृष्णया सहदेवेन विजयेन च धीमता ॥ ३ ॥
अन्यैश्च पुरुषव्याघ्रैर्ब्राह्मणैः शास्त्रदृष्टिभिः ।
व्यजहाच्छोकजं दुःखं संतापं चैव मानसम् ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार साक्षात् विष्टरश्रवा ( विस्तृत यशवाले ) भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवस्थान, नारद, भीमसेन, नकुल, द्रौपदी, सहदेव, बुद्धिमान् अर्जुन तथा अन्यान्य श्रेष्ठ पुरुषों और शास्त्रदर्शी ब्राह्मणों एवं तपोधन मुनियोंके बहुविध वचनोंद्वारा समझाने - बुझानेपर जिनके भाई-बन्धु मारे गये थे, उन राजर्षि युधिष्ठिरका मन शान्त हुआ और उन्होंने शोकजनित दुःख तथा मानसिक संतापको त्याग दिया ॥ १–४ ॥
अर्चयामास देवांश्च ब्राह्मणांश्च युधिष्ठिरः ।
कृत्वाथ प्रेतकार्याणि बन्धूनां स पुनर्नृपः ॥ ५ ॥
अन्वशासच्च धर्मात्मा पृथिवीं सागराम्बराम् । तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने देवताओं और ब्राह्मणोंका पूजन किया और मरे हुए बन्धु-बान्धवोंका श्राद्ध करके वे धर्मात्मा नरेश समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका शासन करने लगे ॥ ५३ ॥
प्रशान्तचेताः कौरव्यः स्वराज्यं प्राप्य केवलम् ।
व्यासं च नारदं चैव तांश्चान्यानब्रवीन्नृपः ॥ ६ ॥
चित्त शान्त होनेपर केवल अपना राज्य ग्रहण करके कुरुवंशी नरेश युधिष्ठिरने व्यास, नारद तथा अन्यान्य मुनिवरोंसे कहा- ॥ ६ ॥
आश्वासितोऽहं प्राग्वृद्धैर्भवद्भिर्मुनिपुङ्गवैः ।
न सूक्ष्ममपि मे किंचिद् व्यलीकमिह विद्यते ॥ ७ ॥
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'महानुभावो! आप सब लोग वृद्ध और मुनियोंमें श्रेष्ठ हैं। आपकी बातोंसे मुझे बड़ी
सान्त्वना मिली है । अब मेरे मनमें तनिक भी दुःख नहीं है ॥ ७ ॥
अर्थश्च सुमहान् प्राप्तो येन यक्ष्यामि देवताः ।
पुरस्कृत्याद्य भवतः समानेष्यामहे मखम् ॥ ८ ॥
' इधर पर्याप्त धन भी मिल गया, जिससे मैं भलीभाँति देवताओंका यजन भी कर सकूँगा । अब आपलोगोंको आगे करके हमलोग उस धनको अपनी यज्ञशालामें ले आवेंगे ॥ ८ ॥
हिमवन्तं त्वया गुप्ता गमिष्यामः पितामह ।
बह्वाश्चर्यो हि देशः स श्रूयते द्विजसत्तम ॥ ९ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ पितामह! हमलोग आपसे ही सुरक्षित होकर हिमालय पर्वतकी यात्रा करेंगे ।
सुना जाता है, वह प्रदेश अनेक आश्चर्यजनक दृश्योंसे भरा हुआ है ॥ ९ ॥
तथा भगवता चित्रं कल्याणं बहुभाषितम् ।
देवर्षिणा नारदेन देवस्थानेन चैव ह ॥ १० ॥
‘ आपने, देवर्षि नारदने तथा मुनिवर देवस्थानने बहुत - सी अद्भुत बातें बतायी हैं, जो मेरा कल्याण करनेवाली हैं ॥ १० ॥
नाभागधेयः पुरुषः कश्चिदेवंविधान् गुरून् ।
लभते व्यसनं प्राप्य सुहृदः साधुसम्मतान् ॥ ११ ॥
‘जो सौभाग्यशाली नहीं है, ऐसा कोई भी पुरुष संकटमें पड़नेपर आप- जैसे साधुसम्मानित हितैषी गुरुजनोंको नहीं पा सकता' ॥ ११ ॥
एवमुक्तास्तु ते राज्ञा सर्व एव महर्षयः ।
अभ्यनुज्ञाप्य राजानं तथोभौ कृष्णफाल्गुनौ ॥ १२ ॥
पश्यतामेव सर्वेषां तत्रैवादर्शनं ययुः ।
ततो धर्मसुतो राजा तत्रैवोपाविशत् प्रभुः ॥ १३ ॥
राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार कृतज्ञता प्रकट करनेपर सभी महर्षि राजा युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण तथा अर्जुनकी अनुमति ले सबके देखते- देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गये । फिर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर उन्हें विदा करके वहीं बैठ गये ॥ १२-१३ ॥
एवं नातिमहान् कालः स तेषां संन्यवर्तत ।
कुर्वतां शौचकार्याणि भीष्मस्य निधने तदा ॥ १४ ॥
भीष्मकी मृत्युके पश्चात् शौचकार्य सम्पन्न करते हुए पाण्डवोंका कुछ काल वहीं व्यतीत हुआ ॥ १४ ॥
महादानानि विप्रेभ्यो ददतामौर्ध्वदेहिकम् ।
भीष्मकर्णपुरोगाणां कुरूणां कुरुसत्तम । १५ ॥
सहितो धृतराष्ट्रेण स ददावौर्ध्वदेहिकम् ।
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कुरुश्रेष्ठ! धृतराष्ट्रसहित उन्होंने भीष्म और कर्ण आदि कुरुवंशियोंके निमित्त और्ध्वदैहिक क्रिया ( श्राद्ध ) में ब्राह्मणोंको बड़े - बड़े दान दिये ॥ १५३ ॥
ततो दत्त्वा बहुधनं विप्रेभ्यः पाण्डवर्षभः ॥ १६ ॥
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य विवेश गजसाह्वयम् । तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन देकर पाण्डवशिरोमणि युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रको आगे करके हस्तिनापुरमें प्रवेश किया ॥ १६३ ॥
स समाश्वास्य पितरं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् ।
अन्वशाद् वै स धर्मात्मा पृथिवीं भ्रातृभिः सह ॥ १७ ॥
धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर प्रज्ञाचक्षु पितृव्य महाराज धृतराष्ट्रको सान्त्वना देकर भाइयोंके साथ पृथ्वीका राज्य करने लगे ॥ १७ ॥
(यथा मनुर्महाराजो रामो दाशरथिर्यथा ।
तथा भरतसिंहोऽपि पालयामास मेदिनीम् ॥
जैसे महाराज मनु तथा दशरथनन्दन श्रीरामने इस पृथ्वीका पालन किया था, उसी प्रकार भरतसिंह युधिष्ठिर भी भूमण्डलकी रक्षा करने लगे ॥
नाधर्म्यमभवत् तत्र सर्वो धर्मरुचिर्जनः ।
बभूव नरशार्दूल यथा कृतयुगे तथा ॥
उनके राज्यमें कहीं कोई अधर्मयुक्त कार्य नहीं होता था । सब लोग धर्मविषयक रुचि रखते थे । पुरुषसिंह! जैसे सत्ययुगमें समस्त प्रजा धर्मपरायण रहती थी, उसी प्रकार उस समय द्वापरमें भी हो गयी थी ॥
कलिमासन्नमाविष्टं निवास्य नृपनन्दनः ।
भ्रातृभिः सहितो धीमान् बभौ धर्मबलोद्धतः ॥
कलियुगको समीप आया देख बुद्धिमान् नृपनन्दन युधिष्ठिरने उसको भी निवास दिया और भाइयोंके साथ वे धर्मबलसे अजेय होकर शोभा पाने लगे ॥
ववर्ष भगवान् देवः काले देशे यथेप्सितम् ।
निरामयं जगदभूत् क्षुत्पिपासे न किंचन ॥
भगवान् पर्जन्यदेव उनके राज्यके प्रत्येक देशमें यथेष्ट वर्षा करते थे । सारा जगत् रोग-शोकसे रहित हो गया था, किसीको भी भूख-प्यासका थोड़ा-सा भी कष्ट नहीं रह गया था ॥
आधिर्नास्ति मनुष्याणां व्यसने नाभवन्मतिः ।
ब्राह्मणप्रमुखा वर्णास्ते स्वधर्मोत्तराः शिवाः ॥
धर्मः सत्यप्रधानश्च सत्यं सद्विषयान्वितम् । मनुष्योंको मानसिक व्यथा नहीं सताती थी । किसीका मन दुर्व्यसनमें नहीं लगता था । ब्राह्मण आदि सभी वर्णोंके लोग स्वधर्मको ही उत्कृष्ट मानकर उसमें लगे रहते थे । सभी