श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1671–1680

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1671–1680

पृष्ठ 1671

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जाता है ॥ ६ ॥

नैव धर्मी न चाधर्मी पूर्वोपचितहायकः ।

धातुक्षयप्रशान्तात्मा निर्द्वन्द्वः स विमुच्यते ॥ ७ ॥

जिसकी न धर्ममें आसक्ति है न अधर्ममें, जो पूर्वसंचित कर्मोंको त्याग चुका है, वासनाओंका क्षय हो जानेसे जिसका चित्त शान्त हो गया है तथा जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित है, वह मुक्त हो जाता है ॥ ७ ॥

अकर्मवान् विकाङ्क्षश्च पश्येज्जगदशाश्वतम् ।

अश्वत्थसदृशं नित्यं जन्ममृत्युजरायुतम् ॥ ८ ॥

वैराग्यबुद्धिः सततमात्मदोषव्यपेक्षकः ।

आत्मबन्धविनिर्मोक्षं स करोत्यचिरादिव ॥ ९ ॥

जो किसी भी कर्मका कर्ता नहीं बनता, जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, जो इस जगत्को अश्वत्थके समान अनित्य- कलतक न टिक सकनेवाला समझता है तथा जो सदा इसे जन्म, मृत्यु और जरासे युक्त जानता है, जिसकी बुद्धि वैराग्यमें लगी रहती है और जो निरन्तर अपने दोषोंपर दृष्टि रखता है, वह शीघ्र ही अपने बन्धनका नाश कर देता है ॥ ८ -९ ॥

अगन्धमरसस्पर्शमशब्दमपरिग्रहम् ।

अरूपमनभिज्ञेयं दृष्ट्वाऽऽत्मानं विमुच्यते ॥ १० ॥

जो आत्माको गन्ध, रस, स्पर्श, शब्द, परिग्रह, रूपसे रहित तथा अज्ञेय मानता है, वह मुक्त हो जाता है ॥ १० ॥

पञ्चभूतगुणैर्हीनममूर्तिमदहेतुकम् ।

अगुणं गुणभोक्तारं यः पश्यति स मुच्यते ॥ ११ ॥

जिसकी दृष्टिमें आत्मा पाञ्चभौतिक गुणोंसे हीन, निराकार, कारणरहित तथा निर्गुण होते हुए भी ( मायाके सम्बन्धसे ) गुणोंका भोक्ता है, वह मुक्त हो जाता है ॥ ११ ॥

विहाय सर्वसंकल्पान् बुद्ध्या शारीरमानसान् ।

शनैर्निर्वाणमाप्नोति निरिन्धन इवानलः ॥ १२ ॥

जो बुद्धिसे विचार करके शारीरिक और मानसिक सब संकल्पोंका त्याग कर देता है, वह बिना ईंधनकी आगके समान धीरे - धीरे शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ १२ ॥

सर्वसंस्कारनिर्मुक्तो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।

तपसा इन्द्रियग्रामं यश्चरेन्मुक्त एव सः ॥ १३ ॥

जो सब प्रकारके संस्कारोंसे रहित, द्वन्द्व और परिग्रहसे रहित हो गया है तथा जो तपस्याके द्वारा इन्द्रिय- समूहको अपने वशमें करके ( अनासक्त ) भावसे विचरता है, वह मुक्त ही है ॥ १३ ॥

विमुक्तः सर्वसंस्कारैस्ततो ब्रह्म सनातनम् ।

पृष्ठ 1672

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परमाप्नोति संशान्तमचलं नित्यमक्षरम् ॥ १४ ॥

जो सब प्रकारके संस्कारोंसे मुक्त होता है, वह मनुष्य शान्त, अचल, नित्य, अविनाशी एवं सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ १४ ॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि योगशास्त्रमनुत्तमम् ।

युञ्जन्तः सिद्धमात्मानं यथा पश्यन्ति योगिनः ॥ १५ ॥

अब मैं उस परम उत्तम योगशास्त्रका वर्णन करूँगा, जिसके अनुसार योग - साधन करनेवाले योगी पुरुष अपने आत्माका साक्षात्कार कर लेते हैं ॥ १५ ॥

तस्योपदेशं वक्ष्यामि यथावत् तन्निबोध मे ।

यैर्द्वारैश्चारयन्नित्यं पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ १६ ॥

मैं उसका यथावत् उपदेश करता हूँ। मनोनिग्रहके जिन उपायोंद्वारा चित्तको इस शरीरके भीतर ही वशीभूत एवं अन्तर्मुख करके योगी अपने नित्य आत्माका दर्शन करता है, उन्हें मुझसे श्रवण करो ॥ १६ ॥

इन्द्रियाणि तु संहृत्य मन आत्मनि धारयेत् ।

तीव्रं तप्त्वा तपः पूर्वं मोक्षयोगं समाचरेत् ॥ १७ ॥

इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटाकर मनमें और मनको आत्मामें स्थापित करे । इस प्रकार पहले तीव्र तपस्या करके फिर मोक्षोपयोगी उपायका अवलम्बन करना चाहिये ॥ १७ ॥

तपस्वी सततं युक्तो योगशास्त्रमथाचरेत् ।

मनीषी मनसा विप्रः पश्यन्नात्मानमात्मनि ॥ १८ ॥

मनीषी ब्राह्मणको चाहिये कि वह सदा तपस्यामें प्रवृत्त एवं यत्नशील होकर योगशास्त्रोक्त उपायका अनुष्ठान करे । इससे वह मनके द्वारा अन्तःकरणमें आत्माका साक्षात्कार करता है ॥ १८ ॥

स चेच्छक्नोत्ययं साधुर्योक्तुमात्मानमात्मनि ।

तत एकान्तशीलः स पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ १ ९ ॥

एकान्तमें रहनेवाला साधक पुरुष यदि अपने मनको आत्मामें लगाये रखनेमें सफल हो जाता है तो वह अवश्य ही अपनेमें आत्माका दर्शन करता है ॥ १ ९ ॥

संयतः सततं युक्त आत्मवान् विजितेन्द्रियः ।

तथा य आत्मनाऽऽत्मानं सम्प्रयुक्तः प्रपश्यति ॥ २० ॥

जो साधक सदा संयमपरायण, योगयुक्त, मनको वशमें करनेवाला और जितेन्द्रिय है, वही आत्मासे प्रेरित होकर बुद्धिके द्वारा उसका साक्षात्कार कर सकता है ॥

यथा हि पुरुषः स्वप्ने दृष्ट्वा पश्यत्यसाविति ।

तथा रूपमिवात्मानं साधुयुक्तः प्रपश्यति ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1673

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जैसे मनुष्य सपनेमें किसी अपरिचित पुरुषको देखकर जब पुनः उसे जाग्रत् अवस्थामें देखता है, तब तुरंत पहचान लेता है कि ' यह वही है । ' उसी प्रकार साधन - परायण योगी समाधि- अवस्थामें आत्माको जिस रूपमें देखता है, उसी रूपमें उसके बाद भी देखता रहता है ॥

इषीकां च यथा मुञ्जात् कश्चिन्निष्कृष्य दर्शयेत् ।

योगी निष्कृष्य चात्मानं तथा पश्यति देहतः ॥ २२ ॥

जैसे कोई मनुष्य मूँजसे सींकको अलग करके दिखा दे, वैसे ही योगी पुरुष आत्माको इस देहसे पृथक् करके देखता है ॥ २२ ॥

मु शरीरमित्याहुरिषीकामात्मनि श्रिताम् ।

एतन्निदर्शनं प्रोक्तं योगविद्भिरनुत्तमम् ॥ २३ ॥

यहाँ शरीरको मूँज कहा गया है और आत्माको सींक । योगवेत्ताओंने देह और आत्माके पार्थक्यको समझनेके लिये यह बहुत उत्तम दृष्टान्त दिया है ॥ २३ ॥

यदा हि युक्तमात्मानं सम्यक् पश्यति देहभृत् ।

न तस्येहेश्वरः कश्चित् त्रैलोक्यस्यापि यः प्रभुः ॥ २४ ॥

देहधारी जीव जब योगके द्वारा आत्माका यथार्थ- रूपसे दर्शन कर लेता है, उस समय उसके ऊपर त्रिभुवनके अधीश्वरका भी आधिपत्य नहीं रहता ॥ २४ ॥

अन्यान्याश्चैव तनवो यथेष्टं प्रतिपद्यते ।

विनिवृत्य जरां मृत्युं न शोचति न हृष्यति ॥ २५ ॥

वह योगी अपनी इच्छाके अनुसार विभिन्न प्रकारके शरीर धारण कर सकता है, बुढ़ापा और मृत्युको भी भगा देता है, वह न कभी शोक करता है न हर्ष ॥ २५ ॥

देवानामपि देवत्वं युक्तः कारयते वशी ।

ब्रह्म चाव्ययमाप्नोति हित्वा देहमशाश्वतम् ॥ २६ ॥

अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला योगी पुरुष देवताओंका भी देवता हो सकता है ।

वह इस अनित्य शरीरका त्याग करके अविनाशी ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ २६ ॥

विनश्यत्सु च भूतेषु न भयं तस्य जायते ।

क्लिश्यमानेषु भूतेषु न स क्लिश्यति केनचित् ॥ २७ ॥

सम्पूर्ण प्राणियोंका विनाश होनेपर भी उसे भय नहीं होता । सबके क्लेश उठानेपर भी उसको किसीसे क्लेश नहीं पहुँचता ॥ २७ ॥

दुःखशोकमयैर्घोरैः सङ्गस्नेहसमुद्भवैः ।

न विचाल्यति युक्तात्मा निःस्पृहः शान्तमानसः ॥ २८ ॥

शान्ताचित्त एवं निःस्पृह योगी आसक्ति और स्नेहसे प्राप्त होनेवाले भयंकर दुःख- शोक तथा भयसे विचलित नहीं होता ॥ २८ ॥

नैनं शस्त्राणि विध्यन्ते न मृत्युश्चास्य विद्यते ।

पृष्ठ 1674

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नातः सुखतरं किंचिल्लोके क्वचन दृश्यते ॥ २ ९ ॥ उसे शस्त्र नहीं बींध सकते, मृत्यु उसके पास नहीं पहुँच पाती, संसारमें उससे बढ़कर सुखी कहीं कोई नहीं दिखायी देता ॥ २ ९ ॥

सम्यग्युक्त्वा स आत्मानमात्मन्येव प्रतिष्ठते ।

विनिवृत्तजरादुःखः सुखं स्वपिति चापि सः ॥ ३० ॥

वह मनको आत्मामें लीन करके उसीमें स्थित हो जाता है तथा बुढ़ापाके दुःखोंसे छुटकारा पाकर सुखसे सोता - अक्षय आनन्दका अनुभव करता है ॥ ३० ॥

देहान्यथेष्टमभ्येति हित्वेमां मानुषीं तनुम् ।

निर्वेदस्तु न कर्तव्यो भुञ्जानेन कथंचन ॥ ३१ ॥

वह इस मानव- शरीरका त्याग करके इच्छानुसार दूसरे बहुत- से शरीर धारण करता है । योगजनित ऐश्वर्यका उपभोग करनेवाले योगीको योगसे किसी तरह विरक्त नहीं होना चाहिये ॥ ३१ ॥

सम्यग्युक्तो यदाऽऽत्मानमात्मन्येव प्रपश्यति ।

तदैव न स्पृहयते साक्षादपि शतक्रतोः ॥ ३२ ॥

अच्छी तरह योगका अभ्यास करके जब योगी अपनेमें ही आत्माका साक्षात्कार करने लगता है, उस समय वह साक्षात् इन्द्रके पदको भी पानेकी इच्छा नहीं करता है ॥ ३२ ॥

योगमेकान्तशीलस्तु यथा विन्दति तच्छृणु ।

दृष्टपूर्वां दिशं चिन्त्य यस्मिन् संनिवसेत् पुरे ॥ ३३ ॥

पुरस्याभ्यन्तरे तस्य मनः स्थाप्यं न बाह्यतः । एकान्तमें ध्यान करनेवाले पुरुषको जिस प्रकार योगकी प्राप्ति होती है, वह सुनो -जो उपदेश पहले श्रुतिमें देखा गया है, उसका चिन्तन करके जिस भागमें जीवका निवास माना

गया है, उसीमें मनको भी स्थापित करे । उसके बाहर कदापि न जाने दे ॥ ३३ ॥

पुरस्याभ्यन्तरे तिष्ठन् यस्मिन्नावसथे वसेत् ।

तस्मिन्नावसथे धार्यं सबाह्याभ्यन्तरं मनः ॥ ३४ ॥

शरीरके भीतर रहते हुए वह आत्मा जिस आश्रयमें स्थित होता है, उसीमें बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंसहित मनको धारण करे ॥ ३४ ॥

प्रचिन्त्यावसथे कृत्स्नं यस्मिन् काले स पश्यति ।

तस्मिन् काले मनश्चास्य न च किंचन बाह्यतः ॥ ३५ ॥

मूलाधार आदि किसी आश्रयमें चिन्तन करके जब वह सर्वस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करता है, उस समय उसका मन प्रत्यक्स्वरूप आत्मासे भिन्न कोई ‘ बाह्य ’ वस्तु नहीं रह जाता ॥ ३५ ॥

संनियम्येन्द्रियग्रामं निर्घोषं निर्जने वने ।

कायमभ्यन्तरं कृत्स्नमेकाग्रः परिचिन्तयेत् ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 1675

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निर्जन वनमें इन्द्रिय - समुदायको वशमें करके एकाग्रचित्त हो शब्दशून्य अपने शरीरके बाहर और भीतर प्रत्येक अंगमें परिपूर्ण परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करे ॥ ३६ ॥

दन्तांस्तालु च जिह्वां च गलं ग्रीवां तथैव च ।

हृदयं चिन्तयेच्चापि तथा हृदयबन्धनम् ॥ ३७ ॥

दन्त, तालु, जिह्वा, गला, ग्रीवा, हृदय तथा हृदय- बन्धन (नाडीमार्ग) -को भी परमात्मरूपसे चिन्तन करे ॥ ३७ ॥

इत्युक्तः स मया शिष्यो मेधावी मधुसूदन ।

पप्रच्छ पुनरेवेमं मोक्षधर्मं सुदुर्वचम् ॥ ३८ ॥

मधुसूदन! मेरे ऐसा कहनेपर उस मेधावी शिष्यने पुनः जिसका निरूपण करना अत्यन्त कठिन है, उस मोक्षधर्मके विषयमें पूछा— ॥ ३८ ॥

भुक्तं भुक्तमिदं कोष्ठे कथमन्नं विपच्यते ।

कथं रसत्वं व्रजति शोणितत्वं कथं पुनः ॥ ३ ९ ॥

‘ यह बारंबार खाया हुआ अन्न उदरमें पहुँचकर कैसे पचता है? किस तरह उसका रस बनता है और किस प्रकार वह रक्तके रूपमें परिणत हो जाता है? ॥ ३ ९ ॥

तथा मांसं च मेदश्च स्नाय्वस्थीनि च योषिति ।

कथमेतानि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम् ॥ ४० ॥

वर्धते वर्धमानस्य वर्धते च कथं बलम् ।

निरोधानां निर्गमनं मलानां च पृथक् पृथक् ॥ ४१ ॥

' स्त्री- शरीरमें मांस, मेदा, स्नायु और हड्डियाँ कैसे होती हैं? देहधारियोंके ये समस्त शरीर कैसे बढ़ते हैं? बढ़ते हुए शरीरका बल कैसे बढ़ता है? जिनका सब ओरसे अवरोध है, उन मलोंका पृथक् - पृथक् निःसारण कैसे होता है? ॥ ४०-४१ ॥

कुतो वायं प्रश्वसिति उच्छ्वसित्यपि वा पुनः ।

कंच देशमधिष्ठाय तिष्ठत्यात्मायमात्मनि ॥ ४२ ॥

‘ यह जीव कैसे साँस लेता, कैसे उच्छ्वास खींचता और किस स्थानमें रहकर इस शरीरमें सदा विद्यमान रहता है? ॥ ४२ ॥

जीवः कथं वहति च चेष्टमानः कलेवरम् ।

किं वर्णं कीदृशं चैव निवेशयति वै पुनः ॥ ४३ ॥

याथातथ्येन भगवन् वक्तुमर्हसि मेऽनघ । ' चेष्टाशील जीवात्मा इस शरीरका भार कैसे वहन करता है? फिर कैसे और किस रंगके शरीरको धारण करता है । निष्पाप भगवन्! यह सब मुझे यथार्थरूपसे बताइये ' ॥ ४३ ॥

इति सम्परिपृष्टोऽहं तेन विप्रेण माधव ॥ ४४ ॥

प्रत्यब्रुवं महाबाहो यथाश्रुतमरिंदम ।

पृष्ठ 1676

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शत्रुदमन महाबाहु माधव! उस ब्राह्मणके इस प्रकार पूछनेपर मैंने जैसा सुना था वैसा ही उसे बताया ॥ ४४३ ॥

यथा स्वकोष्ठे प्रक्षिप्य भाण्डं भाण्डमना भवेत् ॥ ४५ ॥

तथा स्वकाये प्रक्षिप्य मनो द्वारैरनिश्चलैः ।

आत्मानं तत्र मार्गेत प्रमादं परिवर्जयेत् ॥ ४६ ॥

जैसे घरका सामान अपने कोटेमें डालकर भी मनुष्य उन्हींके चिन्तनमें मन लगाये रहता है, उसी प्रकार इन्द्रियरूपी चंचल द्वारोंसे विचरनेवाले मनको अपनी कायामें ही स्थापित करके वहीं आत्माका अनुसंधान करे और प्रमादको त्याग दे ॥ ४५-४६ ॥

एवं सततमुद्युक्तः प्रीतात्मा नचिरादिव ।

आसादयति तद् ब्रह्म यद् दृष्ट्वा स्यात् प्रधानवित् ॥ ४७ ॥

इस प्रकार सदा ध्यानके लिये प्रयत्न करनेवाले पुरुषका चित्त शीघ्र ही प्रसन्न हो जाता है और वह उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, जिसका साक्षात्कार करके मनुष्य प्रकृति एवं उसके विकारोंको स्वतः जान लेता है ॥ ४७ ॥

न त्वसौ चक्षुषा ग्राह्यो न च सर्वैरपीन्द्रियैः ।

मनसैव प्रदीपेन महानात्मा प्रदृश्यते ॥ ४८ ॥

उस परमात्माका इन चर्म- चक्षुओंसे दर्शन नहीं हो सकता, सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे भी उसको ग्रहण नहीं किया जा सकता; केवल बुद्धिरूपी दीपककी सहायतासे ही उस महान् आत्माका दर्शन होता है ॥ ४८ ॥

सर्वतःपाणिपादान्तः सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः ।

सर्वतः श्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ ४ ९ ॥

वह सब ओर हाथ- पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कानवाला है; क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ ४ ९ ॥

जीवो निष्क्रान्तमात्मानं शरीरात् सम्प्रपश्यति ।

स तमुत्सृज्य देहे स्वं धारयन् ब्रह्म केवलम् ॥ ५० ॥

आत्मानमालोकयति मनसा प्रहसन्निव ।

तदेवमाश्रयं कृत्वा मोक्षं याति ततो मयि ॥ ५१ ॥

तत्त्वज्ञ जीव अपने - आपको शरीरसे पृथक् देखता है । वह शरीरके भीतर रहकर भी उसका त्याग करे — उसकी पृथक्ताका अनुभव करके अपने स्वरूपभूत केवल परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करता हुआ बुद्धिके सहयोगसे आत्माका साक्षात्कार करता है । उस समय वह यह सोचकर हँसता-सा रहता है कि अहो! मृगतृष्णामें प्रतीत होनेवाले जलकी भाँति मुझमें ही प्रतीत होनेवाले इस संसारने मुझे अबतक व्यर्थ ही भ्रममें डाल रखा था । जो इस प्रकार परमात्माका दर्शन करता है, वह उसीका आश्रय लेकर अन्तमें मुझमें ही मुक्त हो जाता है ( अर्थात् अपने - आपमें ही परमात्माका अनुभव करने लगता है ) ॥ ५०-५१ ॥

पृष्ठ 1677

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इदं सर्वरहस्यं ते मया प्रोक्तं द्विजोत्तम ।

आपृच्छे साधयिष्यामि गच्छ विप्र यथासुखम् ॥ ५२ ॥

द्विजश्रेष्ठ! यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया । अब मैं जानेकी अनुमति चाहता हूँ । विप्रवर! तुम भी सुखपूर्वक अपने स्थानको लौट जाओ ॥ ५२ ॥

इत्युक्तः स तदा कृष्ण मया शिष्यो महातपाः ।

अगच्छत यथाकामं ब्राह्मणः संशितव्रतः ॥ ५३ ॥

श्रीकृष्ण! मेरे इस प्रकार कहनेपर वह कठोर व्रतका पालन करनेवाला मेरा महातपस्वी शिष्य ब्राह्मण काश्यप इच्छानुसार अपने अभीष्ट स्थानको चला गया ॥ ५३ ॥

वासुदेव उवाच

इत्युक्त्वा स तदा वाक्यं मां पार्थ द्विजसत्तमः ।

मोक्षधर्माश्रितः सम्यक् तत्रैवान्तरधीयत ॥ ५४ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - अर्जुन! मोक्षधर्मका आश्रय लेनेवाले वे सिद्धमहात्मा श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझसे यह प्रसंग सुनाकर वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ५४ ॥

कच्चिदेतत् त्वया पार्थ श्रुतमेकाग्रचेतसा ।

तदापि हि रथस्थस्त्वं श्रुतवानेतदेव हि ॥ ५५ ॥

पार्थ! क्या तुमने मेरे बताये हुए इस उपदेशको एकाग्रचित्त होकर सुना है? उस युद्धके समय भी तुमने रथपर बैठे - बैठे इसी तत्त्वको सुना था ॥ ५५ ॥

नैतत् पार्थ सुविज्ञेयं व्यामिश्रेणेति मे मतिः ।

नरेणाकृतसंज्ञेन विशुद्धेनान्तरात्मना ॥ ५६ ॥

कुन्तीनन्दन! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि जिसका चित्त व्यग्र है, जिसे ज्ञानका उपदेश नहीं प्राप्त है, वह मनुष्य इस विषयको सुगमतापूर्वक नहीं समझ सकता । जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, वही इसे जान सकता है ॥ ५६ ॥

सुरहस्यमिदं प्रोक्तं देवानां भरतर्षभ ।

कच्चिन्नेदं श्रुतं पार्थ मनुष्येणेह कर्हिचित् ॥ ५७ ॥

भरतश्रेष्ठ! यह मैंने देवताओंका परम गोपनीय रहस्य बताया है । पार्थ! इस जगत्में कभी किसी भी मनुष्यने इस रहस्यका श्रवण नहीं किया है ॥ ५७ ॥

न ह्येतच्छ्रोतुमर्होऽन्यो मनुष्यस्त्वामृतेऽनघ ।

नैतदद्य सुविज्ञेयं व्यामिश्रेणान्तरात्मना ॥ ५८ ॥

अनघ! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मनुष्य इसे सुननेका अधिकारी भी नहीं है । जिसका चित्त दुविधेमें पड़ा हुआ है, वह इस समय इसे अच्छी तरह नहीं समझ सकता ॥ ५८ ॥

क्रियावद्भिर्हि कौन्तेय देवलोकः समावृतः ।

न चैतदिष्टं देवानां मर्त्यरूपनिवर्तनम् ॥ ५ ९ ॥

पृष्ठ 1678

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कुन्तीकुमार! क्रियावान् पुरुषोंसे देवलोक भरा पड़ा है । देवताओंको यह अभीष्ट नहीं है कि मनुष्यके मर्त्यरूपकी निवृत्ति हो ॥ ५ ९ ॥

परा हि सा गतिः पार्थ यत् तद् ब्रह्म सनातनम् ।

यत्रामृतत्वं प्राप्नोति त्यक्त्वा देहं सदा सुखी ॥ ६० ॥

पार्थ! जो सनातन ब्रह्म है, वही जीवकी परम गति है । ज्ञानी मनुष्य देहको त्यागकर उस ब्रह्ममें ही अमृतत्त्वको प्राप्त होता है और सदाके लिये सुखी हो जाता है ॥ ६० ॥

इमं धर्मं समास्थाय येऽपि स्युः पापयोनयः ।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ ६१ ॥

इस आत्मदर्शनरूप धर्मका आश्रय लेकर स्त्री, वैश्य और शूद्र तथा जो पापयोनिके मनुष्य हैं, वे भी परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ६१ ॥

किं पुनर्ब्राह्मणाः पार्थ क्षत्रिया वा बहुश्रुताः ।

स्वधर्मरतयो नित्यं ब्रह्मलोकपरायणाः ॥ ६२ ॥

पार्थ! फिर जो अपने धर्ममें प्रेम रखते और सदा ब्रह्मलोककी प्राप्तिके साधनमें लगे रहते हैं, उन बहुश्रुत ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी तो बात ही क्या है ॥ ६२ ॥

हेतुमच्चैतदुद्दिष्टमुपायाश्चास्य साधने ।

सिद्धिं फलं च मोक्षश्च दुःखस्य च विनिर्णयः ॥ ६३ ॥

इस प्रकार मैंने तुम्हें मोक्षधर्मका युक्तियुक्त उपदेश किया है । उसके साधनके उपाय भी बतलाये हैं और सिद्धि, फल, मोक्ष तथा दुःखके स्वरूपका भी निर्णय किया है ॥ ६३ ॥

नातः परं सुखं त्वन्यत् किंचित् स्याद् भरतर्षभ ।

बुद्धिमान् श्रद्दधानश्च पराक्रान्तश्च पाण्डव ॥ ६४ ॥

यः परित्यज्यते मर्त्यो लोकसारमसारवत् ।

एतैरुपायैः स क्षिप्रं परां गतिमवाप्नुते ॥ ६५ ॥

भरतश्रेष्ठ! इससे बढ़कर दूसरा कोई सुखदायक धर्म नहीं है । पाण्डुनन्दन! जो कोई बुद्धिमान्, श्रद्धालु और पराक्रमी मनुष्य लौकिक सुखको सारहीन समझकर उसे त्याग देता है, वह उपर्युक्त इन उपायोंके द्वारा बहुत शीघ्र परम गतिको प्राप्त कर लेता है ॥ ६४-६५ ॥

एतावदेव वक्तव्यं नातो भूयोऽस्ति किंचन ।

षण्मासान् नित्ययुक्तस्य योगः पार्थ प्रवर्तते ॥ ६६ ॥

पार्थ! इतना ही कहनेयोग्य विषय है । इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है । जो छः महीनेतक निरन्तर योगका अभ्यास करता है, उसका योग अवश्य सिद्ध हो जाता है ॥ ६६ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 1679

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पृष्ठ 1680

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विंशोऽध्यायः ब्राह्मणगीता - एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना वासुदेव उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

दम्पत्योः पार्थ संवादो योऽभवद् भरतर्षभ ॥ १ ॥

श्रीकृष्ण कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! अर्जुन! इसी विषयमें पति- पत्नीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ १ ॥

ब्राह्मणी ब्राह्मणं कंचिज्ज्ञानविज्ञानपारगम् ।

दृष्ट्वा विविक्त आसीनं भार्या भर्तारमब्रवीत् ॥ २ ॥

कं नु लोकं गमिष्यामि त्वामहं पतिमाश्रिता ।

न्यस्तकर्माणमासीनं कीनाशमविचक्षणम् ॥ ३ ॥

भार्याः पतिकृताँल्लोकानाप्नुवन्तीति नः श्रुतम् ।

त्वामहं पतिमासाद्य कां गमिष्यामि वै गतिम् ॥ ४ ॥

एक ब्राह्मण, जो ज्ञान- विज्ञानके पारगामी विद्वान् थे, एकान्त स्थानमें बैठे हुए थे, यह देखकर उनकी पत्नी ब्राह्मणी अपने उन पतिदेवके पास जाकर बोली — ‘ प्राणनाथ! मैंने सुना है कि स्त्रियाँ पतिके कर्मानुसार प्राप्त हुए लोकोंको जाती हैं; किंतु आप तो कर्म छोड़कर बैठे हैं और मेरे प्रति कठोरताका बर्ताव करते हैं । आपको इस बातका पता नहीं है कि मैं अनन्यभावसे आपके ही आश्रित हूँ। ऐसी दशामें आप- जैसे पतिका आश्रय लेकर मैं किस लोकमें जाऊँगी? आपको पतिरूपमें पाकर मेरी क्या गति होगी ' ॥ २–४ ॥