श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1791–1800

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1791–1800

पृष्ठ 1791

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इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक चौवालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 1792

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पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः देहरूपी कालचक्रका तथा गृहस्थ और ब्रह्मणके धर्मका कथन ब्रह्मोवाच

बुद्धिसारं मनःस्तम्भमिन्द्रियग्रामबन्धनम् ।

महाभूतपरिस्कन्धं निवेशपरिवेशनम् ॥ १ ॥

जराशोकसमाविष्टं व्याधिव्यसनसम्भवम् ।

देशकालविचारीदं श्रमव्यायामनिःस्वनम् ॥ २ ॥

अहोरात्रपरिक्षेपं शीतोष्णपरिमण्डलम् ।

सुखदुःखान्तसंश्लेषं क्षुत्पिपासावकीलकम् ॥ ३ ॥

छायातपविलेखं च निमेषोन्मेषविह्वलम् ।

घोरमोहजलाकीर्णं वर्तमानमचेतनम् ॥ ४ ॥

मासार्धमासगणितं विषमं लोकसंचरम् ।

तमोनियमपङ्कं च रजोवेगप्रवर्तकम् ॥ ५ ॥

महाहंकारदीप्तं च गुणसंजातवर्तनम् ।

अरतिग्रहणानीकं शोकसंहारवर्तनम् ॥ ६ ॥

क्रियाकारणसंयुक्तं रागविस्तारमायतम् ।

लोभेप्सापरिविक्षोभं विचित्राज्ञानसम्भवम् ॥ ७ ॥

भयमोहपरीवारं भूतसम्मोहकारकम् ।

आनन्दप्रीतिचारं च कामक्रोधपरिग्रहम् ॥ ८ ॥

महदादिविशेषान्तमसक्तं प्रभवाव्ययम् ।

मनोजवं मनःकान्तं कालचक्रं प्रवर्तते ॥ ९ ॥

ब्रह्माजीने कहा — महर्षियो! मनके समान वेगवाला ( देहरूपी ) मनोरम कालचक्र निरन्तर चल रहा है । यह महत्तत्त्वसे लेकर स्थूल भूतोंतक चौबीस तत्त्वोंसे बना हुआ है । इसकी गति कहीं भी नहीं रुकती । यह संसार- बन्धनका अनिवार्य कारण है । बुढ़ापा और शोक इसे घेरे हुए हैं । यह रोग और दुर्व्यसनोंकी उत्पत्तिका स्थान है । यह देश और कालके अनुसार विचरण करता रहता है । बुद्धि इस काल-चक्रका सार, मन खम्भा और इन्द्रियसमुदाय बन्धन हैं । पञ्चमहाभूत इसका तना है । अज्ञान ही इसका आवरण है । श्रम तथा व्यायाम इसके शब्द हैं । रात और दिन इस चक्रका संचालन करते हैं । सर्दी और गर्मी इसका घेरा है । सुख और दुःख इसकी सन्धियाँ ( जोड़ ) हैं । भूख और प्यास इसके कीलक

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तथा धूप और छाया इसकी रेखा हैं । आँखोंके खोलने और मीचनेसे इसकी व्याकुलता ( चंचलता ) प्रकट होती है । घोर मोहरूपी जल ( शोकाश्रु) - से यह व्याप्त रहता है । यह सदा ही गतिशील और अचेतन है । मास और पक्ष आदिके द्वारा इसकी आयुकी गणना की जाती है । यह कभी भी एक- सी अवस्थामें नहीं रहता । ऊपर- नीचे और मध्यवर्ती लोकोंमें सदा चक्कर लगाता रहता है । तमोगुणके वशमें होनेपर इसकी पापपङ्कमें प्रवृत्ति होती है और रजोगुणका वेग इसे भिन्न -भिन्न कर्मोंमें लगाया करता है । यह महान् दर्पसे उद्दीप्त रहता है । तीनों गुणोंके अनुसार इसकी प्रवृत्ति देखी जाती है। मानसिक चिन्ता ही इस चक्रकी बन्धनपट्टिका है । यह सदा शोक और मृत्युके वशीभूत रहनेवाला तथा क्रिया और कारणसे युक्त है । आसक्ति ही उसका दीर्घ विस्तार ( लंबाई- चौड़ाई ) है । लोभ और तृष्णा ही इस चक्रको ऊँचे - नीचे स्थानोंमें गिरानेके हेतु हैं । अद्भुत अज्ञान ( माया) इसकी उत्पत्तिका कारण है । भय और मोह इसे सब ओरसे घेरे हुए हैं। यह प्राणियोंको मोहमें डालनेवाला, आनन्द और प्रीतिके लिये विचरनेवाला तथा काम और क्रोधका संग्रह करनेवाला है ॥ १ –९ ॥

एतद् द्वन्द्वसमायुक्तं कालचक्रमचेतनम् ।

विसृजेत् संक्षिपेच्चापि बोधयेत् सामरं जगत् ॥ १० ॥

यह राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे युक्त जड देहरूपी कालचक्र ही देवताओंसहित सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि और संहारका कारण है । तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिका भी यही साधन है ॥ १० ॥

कालचक्रप्रवृत्तिं च निवृत्तिं चैव तत्त्वतः ।

यस्तु वेद नरो नित्यं न स भूतेषु मुह्यति ॥ ११ ॥

जो मनुष्य इस देहमय कालचक्रकी प्रवृत्ति और निवृत्तिको सदा अच्छी तरह जानता है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता ॥ ११ ॥

विमुक्तः सर्वसंस्कारैः सर्वद्वन्द्वविवर्जितः ।

विमुक्तः सर्वपापेभ्यः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ १२ ॥

वह सम्पूर्ण वासनाओं, सब प्रकारके द्वन्द्वों और समस्त पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त होता है ॥ १२ ॥

गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः ।

चत्वार आश्रमाः प्रोक्ताः सर्वे गार्हस्थ्यमूलकाः ॥ १३ ॥

ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास –ये चार आश्रम शास्त्रोंमें बताये गये हैं । गृहस्थ आश्रम ही इन सबका मूल है ॥ १३ ॥

यः कश्चिदिह लोकेऽस्मिन्नागमः परिकीर्तितः ।

तस्यान्तगमनं श्रेयः कीर्तिरेषा सनातनी ॥ १४ ॥

इस संसारमें जो कोई भी विधि -निषेधरूप शास्त्र कहा गया है, उसमें पारंगत विद्वान् होना गृहस्थ द्विजोंके लिये उत्तम बात है । इसीसे सनातन यशकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥

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संस्कारैः संस्कृतः पूर्वं यथावच्चरितव्रतः ।

जातौ गुणविशिष्टायां समावर्तेत तत्त्ववित् ॥ १५ ॥

पहले सब प्रकारके संस्कारोंसे सम्पन्न होकर वेदोक्त विधिसे अध्ययन करते हुए ब्रह्मचर्य- व्रतका पालन करना चाहिये । तत्पश्चात् तत्त्ववेत्ताको उचित है कि वह समावर्तन- संस्कार करके उत्तम गुणोंसे युक्त कुलमें विवाह करे ॥ १५ ॥

स्वदारनिरतो नित्यं शिष्टाचारो जितेन्द्रियः ।

पञ्चभिश्च महायज्ञैः श्रद्दधानो यजेदिह ॥ १६ ॥

अपनी ही स्त्रीपर प्रेम रखना, सदा सत्पुरुषोंके आचारका पालन करना और जितेन्द्रिय होना गृहस्थके लिये परम आवश्यक है। इस आश्रममें उसे श्रद्धापूर्वक पञ्चमहायज्ञोंके द्वारा देवता आदिका यजन करना चाहिये ॥ १६ ॥

देवतातिथिशिष्टाशी निरतो वेदकर्मसु ।

इज्याप्रदानयुक्तश्च यथाशक्ति यथासुखम् ॥ १७ ॥

गृहस्थको उचित है कि वह देवता और अतिथियोंको भोजन करानेके बाद बचे हुए अन्नका स्वयं आहार करे । वेदोक्त कर्मोंके अनुष्ठानमें संलग्न रहे । अपनी शक्तिके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ करे और दान दे ॥ १७ ॥

न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलो मुनिः ।

न च वागङ्गचपल इति शिष्टस्य गोचरः ॥ १८ ॥

मननशील गृहस्थको चाहिये कि हाथ, पैर, नेत्र, वाणी तथा शरीरके द्वारा होनेवाली चपलताका परित्याग करे अर्थात् इनके द्वारा कोई अनुचित कार्य न होने दे । यही सत्पुरुषोंका बर्ताव ( शिष्टाचार) है ॥ १८ ॥

नित्यं यज्ञोपवीती स्याच्छुक्लवासाः शुचिव्रतः ।

नियतो यमदानाभ्यां सदा शिष्टैश्च संविशेत् ॥ १ ९ ॥

सदा यज्ञोपवीत धारण किये रहे, स्वच्छ वस्त्र पहने, उत्तम व्रतका पालन करे, शौच- संतोष आदि नियमों और सत्य - अहिंसा आदि यमोंके पालनपूर्वक यथाशक्ति दान करता रहे तथा सदा शिष्ट पुरुषोंके साथ निवास करे ॥ १ ९ ॥

जितशिश्नोदरो मैत्रः शिष्टाचारसमन्वितः ।

वैणवीं धारयेद् यष्टिं सोदकं च कमण्डलुम् ॥ २० ॥

शिष्टाचारका पालन करते हुए जिह्वा और उपस्थको काबूमें रखे । सबके साथ मित्रताका बर्ताव करे । बाँसकी छड़ी और जलसे भरा हुआ कमण्डलु सदा साथ रखे ॥ २० ॥

(त्रीणि धारयते नित्यं कमण्डलुमतन्द्रितः । एकमाचमनार्थाय एकं वै पादधावनम् । एकं शौचविधानार्थमित्येतत् त्रितयं तथा ॥ )

पृष्ठ 1795

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वह आलस्य छोड़कर सदा तीन कमण्डलु धारण करे। एक आचमनके लिये, दूसरा पैर धोनेके लिये और तीसरा शौच- सम्पादनके लिये । इस प्रकार कमण्डलु धारणके ये तीन प्रयोजन हैं ॥

अधीत्याध्यापनं कुर्यात् तथा यजनयाजने ।

दानं प्रतिग्रहं वापि षड्गुणां वृत्तिमाचरेत् ॥ २१ ॥

ब्राह्मणको अध्ययन- अध्यापन, यजनयाजन और दान तथा प्रतिग्रह—इन छः वृत्तियोंका आश्रय लेना चाहिये ॥ २१ ॥

त्रीणि कर्माणि जानीत ब्राह्मणानां तु जीविका ।

याजनाध्यापने चोभे शुद्धाच्चापि प्रतिग्रहः ॥ २२ ॥

इनमेंसे तीन कर्म – याजन ( यज्ञ कराना ), अध्यापन ( पढ़ाना ) और श्रेष्ठ पुरुषोंसे दान लेना — ये ब्राह्मणकी जीविकाके साधन हैं ॥ २२ ॥

अथ शेषाणि चान्यानि त्रीणि कर्माणि यानि तु ।

दानमध्ययनं यज्ञो धर्मयुक्तानि तानि तु ॥ २३ ॥

शेष तीन कर्म –दान, अध्ययन तथा यज्ञानुष्ठान करना –ये धर्मोपार्जनके लिये हैं ॥ २३ ॥

तेष्वप्रमादं कुर्वीत त्रिषु कर्मसु धर्मवित् ।

दान्तो मैत्रः क्षमायुक्तः सर्वभूतसमो मुनिः ॥ २४ ॥

सर्वमेतद् यथाशक्ति विप्रो निर्वर्तयन् शुचिः ।

एवं युक्तो जयेत् स्वर्गं गृहस्थः संशितव्रतः ॥ २५ ॥

धर्मज्ञ ब्राह्मणको इनके पालनमें कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये । इन्द्रियसंयमी, मित्रभावसे युक्त, क्षमावान्, सब प्राणियोंके प्रति समानभाव रखनेवाला, मननशील, उत्तम व्रतका पालन करनेवाला और पवित्रतासे रहनेवाला गृहस्थ ब्राह्मण सदा सावधान रहकर अपनी शक्तिके अनुसार यदि उपर्युका नियमोंका पालन करता है तो वह स्वर्गलोकको जीत लेता है ॥ २४-२५ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥

पृष्ठ 1796

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षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासीके धर्मका वर्णन ब्रह्मोवाच

एवमेतेन मार्गेण पूर्वोक्तेन यथाविधि ।

अधीतवान् यथाशक्ति तथैव ब्रह्मचर्यवान् ॥ १ ॥

स्वधर्मनिरतो विद्वान् सर्वेन्द्रिययतो मुनिः ।

गुरोः प्रियहिते युक्तः सत्यधर्मपरः शुचिः ॥ २ ॥

ब्रह्माजीने कहा – महर्षिगण! इस प्रकार इस पूर्वोक्त मार्गके अनुसार गृहस्थको यथावत् आचरण करना चाहिये एवं यथाशक्ति अध्ययन करते हुए ब्रह्मचर्य- व्रतका पालन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह अपने धर्ममें तत्पर रहे, विद्वान् बने, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अधीन रखे, मुनि- व्रतका पालन करे, गुरुका प्रिय और हित करनेमें लगा रहे, सत्य बोले तथा धर्मपरायण एवं पवित्र रहे ॥ १-२ ॥

गुरुणा समनुज्ञातो भुञ्जीतान्नमकुत्सयन् ।

हविष्यभैक्ष्यभुक् चापि स्थानासनविहारवान् ॥ ३ ॥

गुरुकी आज्ञा लेकर भोजन करे । भोजनके समय अन्नकी निन्दा न करे । भिक्षाके अन्नको हविष्य मानकर ग्रहण करे । एक स्थानपर रहे । एक आसनसे बैठे और नियत समयमें भ्रमण करे ॥ ३ ॥

द्विकालमग्निं जुह्वानः शुचिर्भूत्वा समाहितः ।

धारीत सदा दण्डं बैल्वं पालाशमेव वा ॥ ४ ॥

पवित्र और एकाग्रचित्त होकर दोनों समय अग्निमें हवन करे । सदा बेल या पलाशका दण्ड लिये रहे ॥ ४ ॥

क्षौमं कार्पासिकं चापि मृगाजिनमथापि वा ।

सर्वं काषायरक्तं वा वासो वापि द्विजस्य ह ॥ ५ ॥

रेशमी अथवा सूती वस्त्र या मृगचर्म धारण करे । अथवा ब्राह्मणके लिये सारा वस्त्र गेरुए रंगका होना चाहिये ॥ ५ ॥

मेखला च भवेन्मौञ्जी जटी नित्योदकस्तथा ।

यज्ञोपवीती स्वाध्यायी अलुब्धो नियतव्रतः ॥ ६ ॥

ब्रह्मचारी मूँजकी मेखला पहने, जटा धारण करे, प्रतिदिन स्नान करे, यज्ञोपवीत पहने, वेदके स्वाध्यायमें लगा रहे तथा लोभहीन होकर नियमपूर्वक व्रतका पालन करे ॥ ६ ॥

पूताभिश्च तथैवाद्भिः सदा दैवततर्पणम् ।

भावेन नियतः कुर्वन् ब्रह्मचारी प्रशस्यते ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1797

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जो ब्रह्मचारी सदा नियमपरायण होकर श्रद्धाके साथ शुद्ध जलसे नित्य देवताओंका तर्पण करता है, उसकी सर्वत्र प्रशंसा होती है ॥ ७ ॥

एवं युक्तो जयेल्लोकान् वानप्रस्थो जितेन्द्रियः ।

न संसरति जातीषु परमं स्थानमाश्रितः ॥ ८ ॥

इसी प्रकार आगे बतलाये जानेवाले उत्तम गुणोंसे युक्त जितेन्द्रिय वानप्रस्थी पुरुष भी उत्तम लोकोंपर विजय पाता है । वह उत्तम स्थानको पाकर फिर इस संसारमें जन्म धारण नहीं करता ॥ ८ ॥

संस्कृतः सर्वसंस्कारैस्तथैव ब्रह्मचर्यवान् ।

ग्रामान्निष्क्रम्य चारण्ये मुनिः प्रव्रजितो वसेत् ॥ ९ ॥

वानप्रस्थ मुनिको सब प्रकारके संस्कारोंके द्वारा शुद्ध होकर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए घरकी ममता त्यागकर गाँवसे बाहर निकलकर वनमें निवास करना चाहिये ॥ ९ ॥

चर्मवल्कलसंवासी सायं प्रातरुपस्पृशेत् ।

अरण्यगोचरो नित्यं न ग्रामं प्रविशेत् पुनः ॥ १० ॥

वह मृगचर्म अथवा वल्कल- वस्त्र पहने । प्रातः और सायंकालके समय स्नान करे । सदा वनमें ही रहे । गाँवमें फिर कभी प्रवेश न करे ॥ १० ॥

अर्चयन्नतिथीन् काले दद्याच्चापि प्रतिश्रयम् ।

फलपत्रावरैर्मूलेः श्यामाकेन च वर्तयन् ॥ ११ ॥

अतिथिको आश्रय दे और समयपर उनका सत्कार करे । जंगली फल, मूल, पत्ता अथवा सावाँ खाकर जीवन निर्वाह करे ॥ ११ ॥

प्रवृत्तमुदकं वायुं सर्वं वानेयमाश्रयेत् ।

प्राश्नीयादानुपूर्व्येण यथादीक्षमतन्द्रितः ॥ १२ ॥

बहते हुए जल, वायु आदि सब वनकी वस्तुओंका ही सेवन करे । अपने व्रतके अनुसार सदा सावधान रहकर क्रमशः उपर्युक्त वस्तुओंका आहार करे ॥ १२ ॥

समूलफलभिक्षाभिरर्चेदतिथिमागतम् ।

यद् भक्ष्यं स्यात् ततो दद्याद् भिक्षां नित्यमतन्द्रितः ॥ १३ ॥

यदि कोई अतिथि आ जाय तो फल- मूलकी भिक्षा देकर उसका सत्कार करे । कभी आलस्य न करे । जो कुछ भोजन अपने पास उपस्थित हो, उसीमेंसे अतिथिको भिक्षा दे ॥ १३ ॥

देवतातिथिपूर्वं च सदा प्राश्नीत वाग्यतः ।

अस्पर्धितमनाश्चैव लघ्वाशी देवताश्रयः ॥ १४ ॥

नित्य प्रति पहले देवता और अतिथियोंको भोजन दे, उसके बाद मौन होकर स्वयं अन्न ग्रहण करे । मनमें किसीके साथ स्पर्धा न रखे, हलका भोजन करे, देवताओंका सहारा

पृष्ठ 1798

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ले ॥ १४ ॥

दान्तो मैत्रः क्षमायुक्तः केशान् श्मश्रु च धारयन् ।

जुह्वन् स्वाध्यायशीलश्च सत्यधर्मपरायणः ॥ १५ ॥

इन्द्रियोंका संयम करे, सबके साथ मित्रताका बर्ताव करे, क्षमाशील बने और दाढ़ी - मूँछ तथा सिरके बालोंको धारण किये रहे । समयपर अग्निहोत्र और वेदोंका स्वाध्याय करे तथा सत्य - धर्मका पालन करे ॥ १५ ॥

शुचिदेहः सदा दक्षो वननित्यः समाहितः ।

एवं युक्तो जयेत् स्वर्गं वानप्रस्थो जितेन्द्रियः ॥ १६ ॥

शरीरको सदा पवित्र रखे । धर्म - पालनमें कुशलता प्राप्त करे । सदा वनमें रहकर चित्तको एकाग्र किये रहे । इस प्रकार उत्तम धर्मोंको पालन करनेवाला जितेन्द्रिय वानप्रस्थी स्वर्गपर विजय पाता है ॥ १६ ॥

गृहस्थ ब्रह्मचारी च वानप्रस्थोऽथ वा पुनः ।

य इच्छेन्मोक्षमास्थातुमुत्तमां वृत्तिमाश्रयेत् ॥ १७ ॥

ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ कोई भी क्यों न हो, जो मोक्ष पाना चाहता हो, उसे उत्तम वृत्तिका आश्रय लेना चाहिये ॥ १७ ॥

अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत् ।

सर्वभूतसुखो मैत्रः सर्वेन्द्रिययतो मुनिः ॥ १८ ॥

( वानप्रस्थकी अवधि पूरी करके ) सम्पूर्ण भूतोंको अभय-दान देकर कर्म- त्यागरूप संन्यास- धर्मका पालन करे । सब प्राणियोंके सुखमें सुख माने । सबके साथ मित्रता रखे । समस्त इन्द्रियोंका संयम और मुनि- वृत्तिका पालन करे ॥ १८ ॥

अयाचितमसंक्लृप्तमुपपन्नं यदृच्छया ।

कृत्वा प्राह्णे चरेद् भैक्ष्यं विधूमे भुक्तवज्जने ॥ १ ९ ॥

वृत्ते शरावसम्पाते भैक्ष्यं लिप्सेत मोक्षवित् । बिना याचना किये, बिना संकल्पके दैवात् जो अन्न प्राप्त हो जाय, उस भिक्षासे ही जीवन- निर्वाह करे। प्रातःकालका नित्यकर्म करनेके बाद जब गृहस्थोंके यहाँ रसोई- घरसे धुआँ निकलना बंद हो जाय, घरके सब लोग खा- पी चुकें और बर्तन धो - माजकर रख दिये गये हों, उस समय मोक्षधर्मके ज्ञाता संन्यासीको भिक्षा लेनेकी इच्छा करनी चाहिये ॥ १ ९ ३ ||

लाभेन च न हृष्येत नालाभे विमना भवेत् ।

न चातिभिक्षां भिक्षेत केवलं प्राणयात्रिकः ॥ २० ॥

भिक्षा मिल जानेपर हर्ष और न मिलनेपर विषाद न करे । ( लोभवश ) बहुत अधिक भिक्षाका संग्रह न करे । जितनेसे प्राण-यात्राका निर्वाह हो उतनी ही भिक्षा लेनी चाहिये ॥ २० ॥

पृष्ठ 1799

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यात्रार्थी कालमाकाङ्क्षश्चरेद् भैक्ष्यं समाहितः ।

लाभं साधारणं नेच्छेन्न भुञ्जीताभिपूजितः ॥ २१ ॥

संन्यासी जीवन- निर्वाहके ही लिये भिक्षा माँगे । उचित समयतक उसके मिलनेकी बाट देखे । चित्तको एकाग्र किये रहे । साधारण वस्तुओंकी प्राप्तिकी भी इच्छा न करे । जहाँ अधिक सम्मान होता हो, वहाँ भोजन न करे ॥ २१ ॥

अभिपूजितलाभाद्धि विजुगुप्सेत भिक्षुकः ।

भुक्तान्यन्नानि तिक्तानि कषायकटुकानि च ॥ २२ ॥

मान- प्रतिष्ठाके लाभसे संन्यासीको घृणा करनी चाहिये । वह खाये हुए तिक्त, कसैले तथा कड़वे अन्नका स्वाद न ले ॥ २२ ॥

नास्वादयीत भुञ्जानो रसांश्च मधुरांस्तथा ।

यात्रामात्रं च भुञ्जीत केवलं प्राणधारणम् ॥ २३ ॥

भोजन करते समय मधुर रसका भी आस्वादन न करे । केवल जीवन- निर्वाहके उद्देश्यसे प्राण- धारणमात्रके लिये उपयोगी अन्नका आहार करे ॥ २३ ॥

असंरोधेन भूतानां वृत्तिं लिप्सेत मोक्षवित् ।

न चान्यमन्नं लिप्सेत भिक्षमाणः कथंचन ॥ २४ ॥

मोक्षके तत्त्वको जाननेवाला संन्यासी दूसरे प्राणियोंकी जीविकामें बाधा पहुँचाये बिना ही यदि भिक्षा मिल जाती हो तभी उसे स्वीकार करे । भिक्षा माँगते समय दाताके द्वारा दिये जानेवाले अन्नके सिवा दूसरा अन्न लेनेकी कदापि इच्छा न करे ॥ २४ ॥

न संनिकाशयेद् धर्मं विविक्ते चारजाश्चरेत् ।

शून्यागारमरण्यं वा वृक्षमूलं नदीं तथा ॥ २५ ॥

प्रतिश्रयार्थं सेवेत पार्वतीं वा पुनर्गुहाम् ।

ग्रामैकरात्रिको ग्रीष्मे वर्षास्वेकत्र वा वसेत् ॥ २६ ॥

उसे अपने धर्मका प्रदर्शन नहीं करना चाहिये । रजोगुणसे रहित होकर निर्जन स्थानमें विचरते रहना चाहिये । रातको सोनेके लिये सूने घर, जंगल, वृक्षकी जड़, नदीके किनारे अथवा पर्वतकी गुफाका आश्रय लेना चाहिये । ग्रीष्मकालमें गाँवमें एक रातसे अधिक नहीं रहना चाहिये, किंतु वर्षाकालमें किसी एक ही स्थानपर रहना उचित है ॥ २५-२६ ॥

अध्वा सूर्येण निर्दिष्टः कीटवच्च चरेन्महीम् ।

दयार्थं चैव भूतानां समीक्ष्य पृथिवीं चरेत् ॥ २७ ॥

संचयांश्च न कुर्वीत स्नेहवासं च वर्जयेत् । जबतक सूर्यका प्रकाश रहे तभीतक संन्यासीके लिये रास्ता चलना उचित है । वह कीड़ेकी तरह धीरे - धीरे समूची पृथ्वीपर विचरता रहे और यात्राके समय जीवोंपर दया करके पृथ्वीको अच्छी तरह देख - भालकर आगे पाँव रखे । किसी प्रकारका संग्रह न करे और कहीं भी आसक्तिपूर्वक निवास न करे ॥ २७३ ॥

पृष्ठ 1800

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पूताभिरद्भिर्नित्यं वै कार्यं कुर्वीत मोक्षवित् ॥ २८ ॥

उपस्पृशेदुद्धृताभिरद्भिश्च पुरुषः सदा । मोक्ष - धर्मके ज्ञाता संन्यासीको उचित है कि सदा पवित्र जलसे काम ले । प्रतिदिन तुरंत निकाले हुए जलसे स्नान करे ( बहुत पहलेके भरे हुए जलसे नहीं) ॥ २८३ ॥

अहिंसा ब्रह्मचर्यं च सत्यमार्जवमेव च ॥ २९ ॥

अक्रोधश्चानसूया च दमो नित्यमपैशुनम् ।

अष्टस्वेतेषु युक्तः स्याद् व्रतेषु नियतेन्द्रियः ॥ ३० ॥

अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, दोष-दृष्टिका त्याग, इन्द्रियसंयम और चुगली न खाना–इन आठ व्रतोंका सदा सावधानीके साथ पालन करे । इन्द्रियोंको वशमें रखे ॥ २ ९ -३० ॥

अपापमशठं वृत्तमजिह्मं नित्यमाचरेत् ।

जोषयेत सदा भोज्यं ग्रासमागतमस्पृहः ॥ ३१ ॥

उसे सदा पाप, शठता और कुटिलतासे रहित होकर बर्ताव करना चाहिये । नित्यप्रति जो अन्न अपने - आप प्राप्त हो जाय, उसको ग्रहण करना चाहिये, किंतु उसके लिये भी मनमें इच्छा नहीं रखनी चाहिये ॥ ३१ ॥

यात्रामात्रं च भुञ्जीत केवलं प्राणयात्रिकम् ।

धर्मलब्धमथाश्नीयान्न काममनुवर्तयेत् ॥ ३२ ॥

प्राणयात्राका निर्वाह करनेके लिये जितना अन्न आवश्यक है, उतना ही ग्रहण करे ।

धर्मतः प्राप्त हुए अन्नका ही आहार करे । मनमाना भोजन न करे ॥ ३२ ॥

ग्रासादाच्छादनादन्यन्न गृह्णीयात् कथंचन ।

यावदाहारयेत् तावत् प्रतिगृह्णीत नाधिकम् ॥ ३३ ॥

खानेके लिये अन्न और शरीर ढकनेके लिये वस्त्रके सिवा और किसी वस्तुका संग्रह न करे । भिक्षा भी, जितनी भोजनके लिये आवश्यक हो, उतनी ही ग्रहण करे, उससे अधिक नहीं ॥ ३३ ॥

परेभ्यो न प्रतिग्राह्यं न च देयं कदाचन ।

दैन्यभावाच्च भूतानां संविभज्य सदा बुधः ॥ ३४ ॥

बुद्धिमान् संन्यासीको चाहिये कि दूसरोंके लिये भिक्षा न माँगे तथा सब प्राणियोंके लिये दयाभावसे संविभागपूर्वक कभी कुछ देनेकी इच्छा भी न करे ॥ ३४ ॥

नाददीत परस्वानि न गृह्णीयादयाचितः ।

न किंचिद् विषयं भुक्त्वा स्पृहयेत् तस्य वै पुनः ॥ ३५ ॥

दूसरोंके अधिकारका अपहरण न करे । बिना प्रार्थनाके किसीकी कोई वस्तु स्वीकार न करे । किसी अच्छी वस्तुका उपभोग करके फिर उसके लिये लालायित न रहे ॥ ३५ ॥

मृदमापस्तथान्नानि पत्रपुष्पफलानि च ।