06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1811–1820
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1811–1820
पृष्ठ 1811
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः धर्मका निर्णय जाननेके लिये ऋषियोंका प्रश्न ऋषय ऊचुः
को वा स्विदिह धर्माणामनुष्ठेयतमो मतः ।
व्याहतामिव पश्यामो धर्मस्य विविधां गतिम् ॥ १ ॥
ऋषियोंने पूछा — ब्रह्मन्! इस जगत् में समस्त धर्मोंमें कौन- सा धर्म अनुष्ठान करनेके लिये सर्वोत्तम माना गया है, यह कहिये; क्योंकि हमें धर्मके विभिन्न मार्ग एक- दूसरेसे आहत हुए- से प्रतीत होते हैं ॥ १ ॥
ऊर्ध्वं देहाद् वदन्त्येके नैतदस्तीति चापरे ।
केचित् संशयितं सर्वं निःसंशयमथापरे ॥ २ ॥
कोई तो कहते हैं कि देहका नाश होनेके बाद धर्मका फल मिलेगा। दूसरे कहते हैं कि ऐसी बात नहीं है । कितने ही लोग सब धर्मोंको संशययुक्त बताते हैं और दूसरे संशयरहित कहते हैं ॥ २ ॥
अनित्यं नित्यमित्येके नास्त्यस्तीत्यपि चापरे ।
एकरूपं द्विधेत्येके व्यामिश्रमिति चापरे ॥ ३ ॥
कोई कहते हैं कि धर्म अनित्य है और कोई उसे नित्य कहते हैं । दूसरे कहते हैं कि धर्म नामकी कोई वस्तु है ही नहीं । कोई कहते हैं कि अवश्य है । कोई कहते हैं कि एक ही धर्म दो प्रकारका है तथा कुछ लोग कहते हैं कि धर्म मिश्रित है ॥ ३ ॥
मन्यन्ते ब्राह्मणा एव ब्रह्मज्ञास्तत्त्वदर्शिनः ।
एकमेके पृथक् चान्ये बहुत्वमिति चापरे ॥ ४ ॥
वेद - शास्त्रोंके ज्ञाता तत्त्वदर्शी ब्राह्मण लोग यह मानते हैं कि एक ब्रह्म ही है । अन्य कितने ही कहते हैं कि जीव और ईश्वर अलग- अलग हैं और दूसरे लोग सबकी सत्ता भिन्न और बहुत प्रकारसे मानते हैं ॥ ४ ॥
देशकालावुभौ केचिन्नैतदस्तीति चापरे ।
जटाजिनधराश्चान्ये मुण्डाः केचिदसंवृताः ॥५ ॥
कितने ही लोग देश और कालकी सत्ता मानते हैं । दूसरे लोग कहते हैं कि इनकी सत्ता नहीं है । कोई जटा और मृगचर्म धारण करनेवाले हैं, कोई सिर मुँडाते हैं और कोई दिगम्बर रहते हैं ॥ ५ ॥
अस्नानं केचिदिच्छन्ति स्नानमप्यपरे जनाः ।
मन्यन्ते ब्राह्मणा देवा ब्रह्मज्ञास्तत्त्वदर्शिनः ॥ ६ ॥
पृष्ठ 1812
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कितने ही मनुष्य स्नान नहीं करना चाहते और दूसरे लोग जो शास्त्रज्ञ तत्त्वदर्शी ब्राह्मणदेवता हैं, वे स्नानको ही श्रेष्ठ मानते हैं ॥ ६ ॥
आहारं केचिदिच्छन्ति केचिच्चानशने रताः ।
कर्म केचित् प्रशंसन्ति प्रशान्तिं चापरे जनाः ॥ ७ ॥
कई लोग भोजन करना अच्छा मानते हैं और कई भोजन न करनेमें अभिरत रहते हैं ।
कई कर्म करनेकी प्रशंसा करते हैं और दूसरे लोग परम शान्तिकी प्रशंसा करते हैं ॥ ७ ॥
केचिन्मोक्षं प्रशंसन्ति केचिद् भोगान् पृथग्विधान् ।
धनानि केचिदिच्छन्ति निर्धनत्वमथापरे ।
उपास्यसाधनं त्वेके नैतदस्तीति चापरे ॥ ८ ॥
कितने ही मोक्षकी प्रशंसा करते हैं और कितने ही नाना प्रकारके भोगोंकी प्रशंसा करते हैं । कुछ लोग बहुत- सा धन चाहते हैं और दूसरे निर्धनताको पसंद करते हैं । कितने ही मनुष्य अपने उपास्य इष्टदेवकी प्राप्तिकी साधना करते हैं और दूसरे कितने ही ऐसा कहते हैं कि ' यह नहीं है ' ॥ ८ ॥
अहिंसानिरताश्चान्ये केचिद् हिंसापरायणाः ।
पुण्येन यशसा चान्ये नैतदस्तीति चापरे ॥ ९ ॥
अन्य कई लोग अहिंसा- धर्मका पालन करनेमें रुचि रखते हैं और कई लोग हिंसाके परायण हैं । दूसरे कई पुण्य और यशसे सम्पन्न हैं । इनसे भिन्न दूसरे कहते हैं कि ‘ यह सब कुछ नहीं है ' ॥ ९ ॥
सद्भावनिरताश्चान्ये केचित् संशयिते स्थिताः ।
दुःखादन्ये सुखादन्ये ध्यानमित्यपरे जनाः ॥ १० ॥
अन्य कितने ही सद्भावमें रुचि रखते हैं । कितने ही लोग संशयमें पड़े रहते हैं । कितने ही साधक कष्ट सहन करते हुए ध्यान करते हैं और दूसरे कई सुखपूर्वक ध्यान करते हैं ॥ १० ॥
यज्ञमित्यपरे विप्राः प्रदानमिति चापरे ।
तपस्त्वन्ये प्रशंसन्ति स्वाध्यायमपरे जनाः ॥ ११ ॥
अन्य ब्राह्मण यज्ञको श्रेष्ठ बताते हैं और दूसरे दानकी प्रशंसा करते हैं । अन्य कई तपकी प्रशंसा करते हैं तथा दूसरे स्वाध्यायकी प्रशंसा करते हैं ॥ ११ ॥
ज्ञानं संन्यासमित्येके स्वभावं भूतचिन्तकाः ।
सर्वमेके प्रशंसन्ति न सर्वमिति चापरे ॥ १२ ॥
कई लोग कहते हैं कि ज्ञान ही संन्यास है । भौतिक विचारवाले मनुष्य स्वभावकी प्रशंसा करते हैं । कितने ही सभीकी प्रशंसा करते हैं और दूसरे सबकी प्रशंसा नहीं करते ॥ १२ ॥
एवं व्युत्थापिते धर्मे बहुधा विप्रबोधिते ।
पृष्ठ 1813
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
निश्चयं नाधिगच्छामः सम्मूढाः सुरसत्तम ॥ १३ ॥
सुरश्रेष्ठ ब्रह्मन्! इस प्रकार धर्मकी व्यवस्था अनेक ढंगसे परस्पर विरुद्ध बतलायी जानेके कारण हमलोग धर्मके विषयमें मोहित हो रहे हैं; अतः किसी निश्चयपर नहीं पहुँच पाते ॥ १३ ॥
इदं श्रेय इदं श्रेय इत्येवं व्युत्थितो जनः ।
यो हि यस्मिन् रतो धर्मे स तं पूजयते सदा ॥ १४ ॥
‘ यही कल्याण- मार्ग है, यही कल्याण- मार्ग है' –इस प्रकारकी बातें सुनकर मनुष्य-समुदाय विचलित हो गया है । जो जिस धर्ममें रत है, वह उसीका सदा आदर करता है ॥ १४ ॥
तेन नोऽविहिता प्रज्ञा मनश्च बहुलीकृतम् ।
एतदाख्यातमिच्छामः श्रेयः किमिति सत्तम ॥ १५ ॥
इस कारण हमलोगोंकी बुद्धि विचलित हो गयी है और मन भी बहुत- से संकल्प-विकल्पोंमें पड़कर चंचल हो गया है । श्रेष्ठ ब्रह्मन्! हम यह जानना चाहते हैं कि वास्तविक कल्याणका मार्ग क्या है? ॥ १५ ॥
अतः परं तु यद् गुह्यं तद् भवान् वक्तुमर्हति ।
सत्त्वक्षेत्रज्ञयोश्चापि सम्बन्धः केन हेतुना ॥ १६ ॥
इसलिये जो परम गुह्य तत्त्व है, वह आपको हमें बतलाना चाहिये । साथ ही यह भी बतलाइये कि बुद्धि और क्षेत्रज्ञका सम्बन्ध किस कारणसे हुआ है? ॥ १६ ॥
एवमुक्तः स तैर्विप्रैर्भगवाँल्लोकभावनः ।
तेभ्यः शशंस धर्मात्मा याथातथ्येन बुद्धिमान् ॥ १७ ॥
लोकोंकी सृष्टि करनेवाले धर्मात्मा बुद्धिमान् भगवान् ब्रह्माजी उन ऋषियोंकी यह बात सुनकर उनसे उनके प्रश्नोंका यथार्थ रूपसे उत्तर देने लगे ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥
पृष्ठ 1814
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन ब्रह्मोवाच
हन्त वः संप्रवक्ष्यामि यन्मां पृच्छथ सत्तमाः ।
गुरुणा शिष्यमासाद्य यदुक्तं तन्निबोधत ॥। १ ॥
ब्रह्माजी बोले- श्रेष्ठ महर्षियो! तुमलोगोंने जो विषय पूछा है, उसे अब मैं कहूँगा । गुरुने सुयोग्य शिष्यको पाकर जो उपदेश दिया है, उसे तुमलोग सुनो ॥ १ ॥
समस्तमिह तच्छ्रुत्वा सम्यगेवावधार्यताम् ।
अहिंसा सर्वभूतानामेतत् कृत्यतमं मतम् ॥२ ॥
एतत् पदमनुद्विग्नं वरिष्ठं धर्मलक्षणम् । उस विषयको यहाँ पूर्णतया सुनकर अच्छी प्रकार धारण करो । सब प्राणियोंकी अहिंसा ही सर्वोत्तम कर्तव्य है - ऐसा माना गया है । यह साधन उद्वेगरहित, सर्वश्रेष्ठ और धर्मको लक्षित करानेवाला है ॥ २३ ॥
ज्ञानं निःश्रेय इत्याहुर्वृद्धा निश्चितदर्शिनः ॥ ३ ॥
तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन मुच्यते सर्वकिल्बिषैः । निश्चयको साक्षात् करनेवाले वृद्ध लोग कहते हैं कि ' ज्ञान ही परम कल्याणका साधन है । ' इसलिये परम शुद्ध ज्ञानके द्वारा ही मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ३३ ॥
हिंसापराश्च ये केचिद् ये च नास्तिकवृत्तयः ।
लोभमोहसमायुक्तास्ते वै निरयगामिनः ॥ ४ ॥
जो लोग प्राणियोंकी हिंसा करते हैं, नास्तिक- वृत्तिका आश्रय लेते हैं और लोभ तथा मोहमें फँसे हुए हैं, उन्हें नरकमें गिरना पड़ता है ॥ ४ ॥
आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिताः ।
तेऽस्मिल्लोंके प्रमोदन्ते जायमानाः पुनः पुनः ॥ ५ ॥
जो लोग सावधान होकर सकाम कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं, वे बार- बार इस लोकमें जन्म ग्रहण करके सुखी होते हैं ॥ ५ ॥
कुर्वते ये तु कर्माणि श्रद्दधाना विपश्चितः ।
अनाशीर्योगसंयुक्तास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥ ६ ॥
पृष्ठ 1815
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जो विद्वान् समत्वयोगमें स्थित हो श्रद्धाके साथ कर्तव्य - कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और उनके फलमें आसक्त नहीं होते, वे धीर और उत्तम दृष्टिवाले माने गये हैं ॥ ६ ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि सत्त्वक्षेत्रज्ञयोर्यथा ।
संयोगो विप्रयोगश्च तन्निबोधत सत्तमाः ॥ ७ ॥
श्रेष्ठ महर्षियो! अब मैं यह बता रहा हूँ कि सत्त्व और क्षेत्रज्ञका परस्पर संयोग और वियोग कैसे होता है? इस विषयको ध्यान देकर सुनो ॥ ७ ॥
विषयो विषयित्वं च सम्बन्धोऽयमिहोच्यते ।
विषयी पुरुषो नित्यं सत्त्वं च विषयः स्मृतः ॥ ८ ॥
इन दोनोंमें यहाँ यह विषय - विषयिभाव सम्बन्ध माना गया है । इनमें पुरुष तो सदा विषयी और सत्त्व विषय माना जाता है ॥ ८ ॥
व्याख्यातं पूर्वकल्पेन मशकोदुम्बरं यथा ।
भुज्यमानं न जानीते नित्यं सत्त्वमचेतनम् ।
यस्त्वेवं तं विजानीते यो भुङ्क्ते यश्च भुज्यते ॥ ९ ॥
पूर्व अध्यायमें मच्छर और गूलरके उदाहरणसे यह बात बतायी जा चुकी है कि भोगा जानेवाला अचेतन सत्त्व नित्य स्वरूप क्षेत्रज्ञको नहीं जानता, किंतु जो क्षेत्रज्ञ है वह इस प्रकार जानता है कि जो भोगता है वह आत्मा है और जो भोगा जाता है, वह सत्त्व है ॥ ९ ॥
नित्यं द्वन्द्वसमायुक्तं सत्त्वमाहुर्मनीषिणः ।
निर्द्वन्द्वो निष्कलो नित्यः क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः ॥ १० ॥
मनीषी पुरुष सत्त्वको द्वन्द्वयुक्त कहते हैं और क्षेत्रज्ञ निर्द्वन्द्व, निष्कल, नित्य और निर्गुणस्वरूप है ॥ १० ॥
समं संज्ञानुगश्चैव स सर्वत्र व्यवस्थितः ।
उपभुङ्क्ते सदा सत्त्वमपः पुष्करपर्णवत् ॥ ११ ॥
वह क्षेत्रज्ञ समभावसे सर्वत्र भलीभाँति स्थित हुआ ज्ञानका अनुसरण करता है । जैसे कमलका पत्ता निर्लिप्त रहकर जलको धारण करता है, वैसे ही क्षेत्रज्ञ सदा सत्त्वका उपभोग करता है ॥ ११ ॥
सर्वैरपि गुणैर्विद्वान् व्यतिषक्तो न लिप्यते ।
जलबिन्दुर्यथा लोलः पद्मिनीपत्रसंस्थितः ॥ १२ ॥
एवमेवाप्यसंयुक्तः पुरुषः स्यान्न संशयः जैसे कमलके पत्तेपर पड़ी हुई जलकी चंचल बूँद उसे भिगो नहीं पाती, उसी प्रकार विद्वान् पुरुष समस्त गुणोंसे सम्बन्ध रखते हुए भी किसीसे लिप्त नहीं होता । अतः क्षेत्रज्ञ पुरुष वास्तविकमें असंग है, इसमें संदेह नहीं है ॥ १२३ ॥
द्रव्यमात्रभूत् सत्त्वं पुरुषस्येति निश्चयः ॥ १३ ॥
पृष्ठ 1816
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
यथा द्रव्यं च कर्ता च संयोगोऽप्यनयोस्तथा । यह निश्चित बात है कि पुरुषके भोगनेयोग्य द्रव्यमात्रकी संज्ञा सत्त्व है तथा जैसे द्रव्य और कर्ताका सम्बन्ध है, वैसे ही इन दोनोंका सम्बन्ध है ॥ १३३ ॥
यथा प्रदीपमादाय कश्चित् तमसि गच्छति ।
तथा सत्त्वप्रदीपेन गच्छन्ति परमैषिणः ॥ १४ ॥
जैसे कोई मनुष्य दीपक लेकर अन्धकारमें चलता है, वैसे ही परम तत्त्वको चाहनेवाले साधक सत्त्वरूप दीपकके प्रकाशमें साधनमार्गपर चलते हैं ॥ १४ ॥
यावद् द्रव्यं गुणस्तावत् प्रदीपः सम्प्रकाशते ।
क्षीणे द्रव्ये गुणे ज्योतिरन्तर्धानाय गच्छति ॥ १५ ॥
जबतक दीपकमें द्रव्य और गुण रहते हैं, तभीतक वह प्रकाश फैलाता है । द्रव्य और गुणका क्षय हो जानेपर ज्योति भी अन्तर्धान हो जाती है ॥ १५ ॥
व्यक्तः सत्त्वगुणस्त्वेवं पुरुषोऽव्यक्त इष्यते ।
एतद् विप्रा विजानीत हन्त भूयो ब्रवीमि वः ॥ १६ ॥
ब्रह्माजीका ऋषियोंको उपदेश
पृष्ठ 1817
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस प्रकार सत्त्वगुण तो व्यक्त है और पुरुष अव्यक्त माना गया है। ब्रह्मर्षियो! इस तत्त्वको समझो । अब मैं तुमलोगोंसे आगेकी बात बताता हूँ ॥ १६ ॥
सहस्रेणापि दुर्मेधा न बुद्धिमधिगच्छति ।
चतुर्थेनाप्यथांशेन बुद्धिमान् सुखमेधते ॥ १७ ॥
जिसकी बुद्धि अच्छी नहीं है, उसे हजार उपाय करनेपर भी ज्ञान नहीं होता और जो बुद्धिमान् है वह चौथाई प्रयत्नसे भी ज्ञान पाकर सुखका अनुभव करता है ॥ १७ ॥
एवं धर्मस्य विज्ञेयं संसाधनमुपायतः ।
उपायज्ञो हि मेधावी सुखमत्यन्तमश्नुते ॥ १८ ॥
ऐसा विचारकर किसी उपायसे धर्मके साधनका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये; क्योंकि उपायको जाननेवाला मेधावी पुरुष अत्यन्त सुखका भागी होता है ॥ १८ ॥
यथाध्वानमपाथेयः प्रपन्नो मनुजः क्वचित् ।
क्लेशेन याति महता विनश्येदन्तरापि च ॥ १ ९ ॥
जैसे कोई मनुष्य यदि राह-खर्चका प्रबन्ध किये बिना ही यात्रा करता है तो उसे मार्गमें बहुत क्लेश उठाना पड़ता है अथवा वह बीचहीमें मर भी सकता है ॥ १ ९ ॥
तथा कर्मसु विज्ञेयं फलं भवति वा न वा ।
पुरुषस्यात्मनिः श्रेयः शुभाशुभनिदर्शनम् ॥ २० ॥
ऐसे ही ( पूर्वजन्मोंके पुण्योंसे हीन पुरुष ) योगमार्गके साधनमें लगनेपर योगसिद्धिरूप फल कठिनतासे पाता है अथवा नहीं भी पाता । पुरुषका अपना कल्याण- साधन ही उसके पूर्वजन्मके शुभाशुभ- संस्कारोंको बतानेवाला है ॥ २० ॥
यथा च दीर्घमध्वानं पद्भ्यामेव प्रपद्यते ।
अदृष्टपूर्वं सहसा तत्त्वदर्शनवर्जितः ॥ २१ ॥
जैसे पहले न देखे हुए दूरके रास्तेपर जब मनुष्य सहसा पैदल ही चल पड़ता है ( तो वह अपने गन्तव्य स्थानपर नहीं पहुँच पाता ), यही दशा तत्त्वज्ञानसे रहित अज्ञानी पुरुषकी होती है ॥ २१ ॥
तमेव च यथाध्यानं रथेनेहाशुगामिना ।
गच्छत्यश्वप्रयुक्तेन तथा बुद्धिमतां गतिः ॥ २२ ॥
ऊर्ध्वं पर्वतमारुह्य नान्ववेक्षेत भूतलम् । किंतु उसी मार्गपर घोड़े जुते हुए शीघ्रगामी रथके द्वारा यात्रा करनेवाला पुरुष जिस प्रकार शीघ्र ही अपने लक्ष्य स्थानपर पहुँच जाता है तथा वह ऊँचे पर्वतपर चढ़कर नीचे पृथ्वीकी ओर नहीं देखता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुषोंकी गति होती है ॥ २२ ॥
रथेन रथिनं पश्य क्लिश्यमानमचेतनम् ॥ २३ ॥
यावद् रथपथस्तावद् रथेन स तु गच्छति ।
क्षीणे रथपदे विद्वान् रथमुत्सृज्य गच्छति ॥ २४ ॥
पृष्ठ 1818
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
देखो, रथके द्वारा जानेवाला भी मूर्ख मनुष्य ऊँचे पर्वतके पास पहुँचकर कष्ट पाता रहता है, किंतु बुद्धिमान् मनुष्य जहाँतक रथ जानेका मार्ग है वहाँतक रथसे जाता है और जब रथका रास्ता समाप्त हो जाता है तब वह उसे छोड़कर पैदल यात्रा करता ॥ २३-२४ ॥
एवं गच्छति मेधावी तत्त्वयोगविधानवित् ।
परिज्ञाय गुणज्ञश्च उत्तरादुत्तरोत्तरम् ॥ २५ ॥
इसी प्रकार तत्त्व और योगविधिको जाननेवाला बुद्धिमान् एवं गुणज्ञ पुरुष अच्छी तरह समझ -बूझकर उत्तरोत्तर आगे बढ़ता जाता है ॥ २५ ॥
यथार्णवं महाघोरमप्लवः सम्प्रगाहते ।
बाहुभ्यामेव सम्मोहाद् वधं वाञ्छत्यसंशयम् ॥ २६ ॥
जैसे कोई पुरुष मोहवश बिना नावके ही भयंकर समुद्रमें प्रवेश करता है और दोनों भुजाओंसे ही तैरकर उसके पार होनेका भरोसा रखता है तो निश्चय ही वह अपनी मौत बुलाना चाहता है ( उसी प्रकार ज्ञान - नौकाका सहारा लिये बिना मनुष्य भवसागरसे पार नहीं हो सकता ) ॥ २६ ॥
नावा चापि यथा प्राज्ञो विभागज्ञः स्वरित्रया ।
अश्रान्तः सलिले गच्छेच्छीघ्रं संतरते ह्रदम् ॥ २७ ॥
तीर्णो गच्छेत् परं पारं नावमुत्सृज्य निर्ममः ।
व्याख्यातं पूर्वकल्पेन यथा रथपदातिनोः ॥ २८ ॥
जिस तरह जलमार्गके विभागको जाननेवाला बुद्धिमान् पुरुष सुन्दर डाँडवाली नावके द्वारा अनायास ही जलपर यात्रा करके शीघ्र समुद्रसे तर जाता है एवं पार पहुँच जानेपर नावकी ममता छोड़कर चल देता है; ( उसी प्रकार संसार- सागरसे पार हो जानेपर बुद्धिमान् पुरुष पहलेके साधन -सामग्रीकी ममता छोड़ देता है । ) यह बात रथपर चलनेवाले और पैदल चलनेवालेके दृष्टान्तसे पहले भी कही जा चुकी है ॥ २७-२८ ॥
स्नेहात् सम्मोहमापन्नो नावि दाशो यथा तथा ।
ममत्वेनाभिभूतः संस्तत्रैव परिवर्तते ॥ २ ९ ॥
परंतु स्नेहवश मोहको प्राप्त हुआ मनुष्य ममतासे आबद्ध होकर नावपर सदा बैठे रहनेवाले मल्लाहकी भाँति वहीं चक्कर काटता रहता है ॥ २ ९ ॥
नावं न शक्यमारुह्य स्थले विपरिवर्तितुम् ।
तथैव रथमारुह्य नाप्सु चर्या विधीयते ॥ ३० ॥
एवं कर्म कृतं चित्रं विषयस्थं पृथक् पृथक् ।
यथा कर्म कृतं लोके तथैतानुपपद्यते ॥ ३१ ॥
नौकापर चढ़कर जिस प्रकार स्थलपर विचरण करना सम्भव नहीं है तथा रथपर चढ़कर जलमें विचरण करना सम्भव नहीं बताया गया है, इसी प्रकार किये हुए विचित्र कर्म
पृष्ठ 1819
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अलग- अलग स्थानपर पहुँचानेवाले हैं । संसारमें जिनके द्वारा जैसा कर्म किया गया है, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है ॥ ३०-३१ ॥
यन्नैव गन्धिनो रस्यं न रूपस्पर्शशब्दवत् ।
मन्यन्ते मुनयो बुद्धया तत् प्रधानं प्रचक्षते ॥ ३२ ॥
जो गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्दसे युक्त नहीं है तथा मुनिलोग बुद्धिके द्वारा जिसका मनन करते हैं, वह ' प्रधान' कहलाता है ॥ ३२ ॥
तत्र प्रधानमव्यक्तमव्यक्तस्य गुणो महान् ।
महत्प्रधानभूतस्य गुणोऽहंकार एव च ॥ ३३ ॥
प्रधानका दूसरा नाम अव्यक्त है । अव्यक्तका कार्य महत्तत्त्व है और प्रकृतिसे उत्पन्न महत्तत्त्वका कार्य अहंकार है ॥ ३३ ॥
अहंकारात् तु सम्भूतो महाभूतकृतो गुणः ।
पृथक्त्वेन हि भूतानां विषया वै गुणाः स्मृताः ॥ ३४ ॥
अहंकारसे पञ्च महाभूतोंको प्रकट करनेवाले गुणकी उत्पत्ति हुई है । पञ्च महाभूतोंके
कार्य हैं रूप, रस आदि विषय । वे पृथक् - पृथक् गुणोंके नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ३४ ॥
बीजधर्मं तथाव्यक्तं प्रसवात्मकमेव च ।
बीजधर्मा महानात्मा प्रसवश्चेति नः श्रुतम् ॥ ३५ ॥
अव्यक्त प्रकृति कारणरूपा भी है और कार्यरूपा भी । इसी प्रकार महत्तत्त्वके भी कारण और कार्य दोनों ही स्वरूप सुने गये हैं ॥ ३५ ॥
बीजधर्मस्त्वहंकारः प्रसवश्च पुनः पुनः ।
बीजप्रसवधर्माणि महाभूतानि पञ्च वै ॥ ३६ ॥
अहंकार भी कारणरूप तो है ही, कार्यरूपमें भी बारम्बार परिणत होता रहता है । पञ्च महाभूतों ( पञ्चतन्मात्राओं ) - में भी कारणत्व और कार्यत्व दोनों धर्म हैं । वे शब्दादि विषयोंको उत्पन्न करते हैं, इसलिये ऐसा कहा जाता है कि वे बीजधर्मी हैं ॥ ३६ ॥
बीजधर्मिण इत्याहुः प्रसवं च प्रकुर्वते ।
विशेषाः पञ्चभूतानां तेषां चित्तं विशेषणम् ॥ ३७ ॥
उन पाँचो भूतोंके विशेष कार्य शब्द आदि विषय हैं। उन विषयोंका प्रवर्तक चित्त ॥ ३७ ॥
तत्रैकगुणमाकाशं द्विगुणो वायुरुच्यते ।
त्रिगुणं ज्योतिरित्याहुरापश्चापि चतुर्गुणाः ॥ ३८ ॥
पञ्चमहाभूतोंमेंसे आकाशमें एक ही गुण माना गया है। वायुके दो गुण बतलाये जाते
हैं । तेज तीन गुणोंसे युक्त कहा गया है । जलके चार गुण हैं ॥ ३८ ॥
पृथ्वी पञ्चगुणा ज्ञेया चरस्थावरसंकुला ।
सर्वभूतकरी देवी शुभाशुभनिदर्शिनी ॥ ३ ९ ॥
पृष्ठ 1820
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पृथ्वीके पाँच गुण समझने चाहिये । यह देवी स्थावर- जंगम प्राणियोंसे भरी हुई, समस्त जीवोंको जन्म देनेवाली तथा शुभ और अशुभका निर्देश करनेवाली है ॥ ३ ९ ॥
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
एते पञ्च गुणा भूमेर्विज्ञेया द्विजसत्तमाः ॥ ४० ॥
विप्रवरो! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध -ये ही पृथ्वीके पाँच गुण जानने चाहिये ॥ ४० ॥
पार्थिवश्च सदा गन्धो गन्धश्च बहुधा स्मृतः ।
तस्य गन्धस्य वक्ष्यामि विस्तरेण बहून् गुणान् ॥ ४१ ॥
इनमें भी गन्ध उसका खास गुण है । गन्ध अनेक प्रकारकी मानी गयी है । मैं उस गन्धके गुणोंका विस्तारके साथ वर्णन करूँगा ॥ ४१ ॥
इष्टश्चानिष्टगन्धश्च मधुरोऽम्लः कटुस्तथा ।
निर्हारी संहतः स्निग्धो रूक्षो विशद एव च ॥ ४२ ॥
एवं दशविधो ज्ञेयः पार्थिवो गन्ध इत्युत । इष्ट ( सुगन्ध), अनिष्ट ( दुर्गन्ध ), मधुर, अम्ल, कटु, निहारी ( दुरतक फैलनेवाली ), मिश्रित, स्निग्ध, रूक्ष और विशद - ये पार्थिव गन्धके दस भेद समझने चाहिये ॥ ४२ ॥
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं द्रवश्चाणां गुणाः स्मृताः ॥ ४३ ॥
रसज्ञानं तु वक्ष्यामि रसस्तु बहुधा स्मृतः । शब्द, स्पर्श, रूप, रस —ये जलके चार गुण माने गये हैं ( इनमें रस ही जलका मुख्य गुण है ) । अब मैं रस - विज्ञानका वर्णन करता हूँ । रसके बहुत- से भेद बताये गये हैं ॥ ४३ || मधुरोऽम्लः कटुस्तिक्तः कषायो लवणस्तथा ॥ ४४ ॥
एवं षड्विधविस्तारो रसो वारिमयः स्मृतः । मीठा, खट्टा, कड़ुआ, तीता, कसैला और नमकीन- इस प्रकार छः भेदोंमें जलमय रसका विस्तार बताया गया है ॥ ४४ ॥
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते ॥ ४५ ॥
ज्योतिषश्च गुणो रूपं रूपं च बहुधा स्मृतम् । शब्द, स्पर्श और रूप —ये तेजके तीन गुण कहे गये हैं । इनमें रूप ही तेजका मुख्य गुण है । रूपके भी कई भेद माने गये हैं ॥ ४५३ ॥
शुक्लं कृष्णं तथा रक्तं नीलं पीतारुणं तथा ॥ ४६ ॥
ह्रस्वं दीर्घं कृशं स्थूलं चतुरस्रं तु वृत्तवत् ।
एवं द्वादशविस्तारं तेजसो रूपमुच्यते ॥ ४७ ॥
विज्ञेयं ब्राह्मणैर्वृद्धैर्धर्मज्ञैः सत्यवादिभिः ।