श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1801–1810

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1801–1810

पृष्ठ 1801

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असंवृतानि गृह्णीयात् प्रवृत्तानि च कार्यवान् ॥ ३६ ॥

मिट्टी, जल, अन्न, पत्र, पुष्प और फल - ये वस्तुएँ यदि किसीके अधिकारमें न हों तो आवश्यकता पड़नेपर क्रियाशील संन्यासी इन्हें काममें ला सकता है ॥ ३६ ॥

न शिल्पजीविकां जीवेद्धिरण्यं नोत कामयेत् ।

न द्वेष्टा नोपदेष्टा च भवेच्च निरुपस्कृतः ॥ ३७ ॥

वह शिल्पकारी करके जीविका न चलावे, सुवर्णकी इच्छा न करे। किसीसे द्वेष न करे और उपदेशक न बने तथा संग्रहरहित रहे ॥ ३७ ॥

श्रद्धापूतानि भुञ्जीत निमित्तानि च वर्जयेत् ।

सुधावृत्तिरसक्तश्च सर्वभूतैरसंविदम् ॥ ३८ ॥

श्रद्धासे प्राप्त हुए पवित्र अन्नका आहार करे । मनमें कोई निमित्त न रखे । सबके साथ अमृतके समान मधुर बर्ताव करे, कहीं भी आसक्त न हो और किसी भी प्राणीके साथ परिचय न बढ़ावे ॥ ३८ ॥

आशीर्युक्तानि सर्वाणि हिंसायुक्तानि यानि च ।

लोकसंग्रहधर्मं च नैव कुर्यान्न कारयेत् ॥ ३ ९ ॥

जितने भी कामना और हिंसासे युक्त कर्म हैं, उन सबका एवं लौकिक कर्मोंका न स्वयं अनुष्ठान करे और न दूसरोंसे करावे ॥ ३ ९ ॥

सर्वभावानतिक्रम्य लघुमात्रः परिव्रजेत् ।

समः सर्वेषु भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च ॥ ४० ॥

सब प्रकारके पदार्थोंकी आसक्तिका उल्लंघन करके थोड़ेमें संतुष्ट हो सब ओर विचरता रहे । स्थावर और जंगम सभी प्राणियोंके प्रति समान भाव रखे ॥ ४० ॥

परं नोद्वेजयेत् काचिन्न च कस्यचिदुद्विजेत् ।

विश्वास्यः सर्वभूतानामग्रयो मोक्षविदुच्यते ॥ ४१ ॥

किसी दूसरे प्राणीको उद्वेगमें न डाले और स्वयं भी किसीसे उद्विग्न न हो । जो सब प्राणियोंका विश्वासपात्र बन जाता है, वह सबसे श्रेष्ठ और मोक्ष- धर्मका ज्ञाता कहलाता है ॥ ४१ ॥

अनागतं च न ध्यायेन्नातीतमनुचिन्तयेत् ।

वर्तमानमुपेक्षेत कालाकाङ्क्षी समाहितः ॥ ४२ ॥

संन्यासीको उचित है कि भविष्यके लिये विचार न करे, बीती हुई घटनाका चिन्तन न करे और वर्तमानकी भी उपेक्षा कर दे । केवल कालकी प्रतीक्षा करता हुआ चित्तवृत्तियोंका समाधान करता रहे ॥ ४२ ॥

न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूषयेत् क्वचित् ।

न प्रत्यक्षं परोक्षं वा किंचिद् दुष्टं समाचरेत् ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 1802

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नेत्रसे, मनसे और वाणीसे कहीं भी दोषदृष्टि न करे। सबके सामने या दूसरोंकी आँख बचाकर कोई बुराई न करे ॥ ४३ ॥

इन्द्रियाण्युपसंहृत्य कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।

क्षीणेन्द्रियमनोबुद्धिर्निरीहः सर्वतत्त्ववित् ॥ ४४ ॥

जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकर इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटा ले । इन्द्रिय, मन और बुद्धिको दुर्बल करके निश्चेष्ट हो जाय । सम्पूर्ण तत्त्वोंका ज्ञान प्राप्त करे ॥ ४४ ॥

निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निःस्वाहाकार एव च ।

निर्ममो निरहंकारो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५ ॥

द्वन्द्वोंसे प्रभावित न हो, किसीके सामने माथा न टेके । स्वाहाकार (अग्निहोत्र आदि ) -का परित्याग करे । ममता और अहंकारसे रहित हो जाय, योगक्षेमकी चिन्ता न करे । मनपर विजय प्राप्त करे ॥ ४५ ॥

निराशीर्निर्गुणः शान्तो निरासक्तो निराश्रयः ।

आत्मसङ्गी च तत्त्वज्ञो मुच्यते नात्र संशयः ॥ ४६ ॥

जो निष्काम, निर्गुण, शान्त, अनासक्त, निराश्रय, आत्मपरायण और तत्त्वका ज्ञाता होता है, वह मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४६ ॥

अपादपाणिपृष्ठं तदशिरस्कमनूदरम् ।

प्रहीणगुणकर्माणं केवलं विमलं स्थिरम् ॥ ४७ ॥

अगन्धमरसस्पर्शमरूपाशब्दमेव च ।

अनुगम्यमनासक्तममांसमपि चैव यत् ॥ ४८ ॥

निश्चिन्तमव्ययं दिव्यं कूटस्थमपि सर्वदा ।

सर्वभूतस्थमात्मानं ये पश्यन्ति न ते मृताः ॥ ४९ ॥

जो मनुष्य आत्माको हाथ, पैर, पीठ, मस्तक और उदर आदि अंगोंसे रहित, गुण-कर्मोंसे हीन, केवल, निर्मल, स्थिर, रूप- रस- गन्ध - स्पर्श और शब्दसे रहित, ज्ञेय, अनासक्त, हाड़ - मांसके शरीरसे रहित, निश्चिन्त, अविनाशी, दिव्य और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित सदा एकरस रहनेवाला जानते हैं, उनकी कभी मृत्यु नहीं होती ॥ ४७–४९ ॥

न तत्र क्रमते बुद्धिर्नेन्द्रियाणि न देवताः ।

वेदा यज्ञाश्च लोकाश्च न तपो न व्रतानि च ॥ ५० ॥

यत्र ज्ञानवतां प्राप्तिरलिङ्गग्रहणा स्मृता ।

तस्मादलिङ्गधर्मज्ञो धर्मतत्त्वमुपाचरेत् ॥ ५१ ॥

उस आत्मतत्त्वतक बुद्धि, इन्द्रिय और देवताओंकी भी पहुँच नहीं होती । जहाँ केवल ज्ञानवान् महात्माओंकी ही गति है, वहाँ वेद, यज्ञ, लोक, तप और व्रतका भी प्रवेश नहीं

पृष्ठ 1803

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होता; क्योंकि वह बाह्य चिह्नसे रहित मानी गयी है । इसलिये बाह्य चिह्नोंसे रहित धर्मको जानकर उसका यथार्थरूपसे पालन करना चाहिये ॥ ५०-५१ ॥

गूढधर्माश्रितो विद्वान् विज्ञानचरितं चरेत् ।

अमूढो मूढरूपेण चरेद् धर्ममदूषयन् ॥ ५२ ॥

गुह्य धर्ममें स्थित विद्वान् पुरुषको उचित है कि वह विज्ञानके अनुरूप आचरण करे । मूढ़ न होकर भी मूढ़के समान बर्ताव करे, किंतु अपने किसी व्यवहारसे धर्मको कलंकित न करे ॥ ५२ ॥

तथैनमवमन्येरन् परे सततमेव हि ।

यथावृत्तश्चरेच्छान्तः सतां धर्मानकुत्सयन् ॥ ५३ ॥

य एवं वृत्तसम्पन्नः स मुनिः श्रेष्ठ उच्यते । जिस कामके करनेसे समाजके दूसरे लोग अनादर करें, वैसा ही काम शान्त रहकर सदा करता रहे, किंतु सत्पुरुषोंके धर्मकी निन्दा न करे । जो इस प्रकारके बर्तावसे सम्पन्न है, वह श्रेष्ठ मुनि कहलाता है ॥ ५३ ॥

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च महाभूतानि पञ्च च ॥ ५४ ॥

मनो बुद्धिरहंकारमव्यक्तं पुरुषं तथा ।

एतत् सर्वं प्रसंख्याय यथावत् तत्त्वनिश्चयात् ॥ ५५ ॥

ततः स्वर्गमवाप्नोति विमुक्तः सर्वबन्धनैः । जो मनुष्य इन्द्रिय, उनके विषय, पञ्चमहाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति और पुरुष —इन सबका विचार करके इनके तत्त्वका यथावत् निश्चय कर लेता है, वह सम्पूर्ण बन्धनोंसे मुक्त होकर स्वर्गको प्राप्त कर लेता है ॥ ५४-५५३ ॥ एतावदन्तवेलायां परिसंख्याय तत्त्ववित् ॥ ५६ ॥

ध्यायेदेकान्तमास्थाय मुच्यतेऽथ निराश्रयः ।

निर्मुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो वायुराकाशगो यथा ॥ ५७ ॥

क्षीणकोशो निरातङ्कस्तथेदं प्राप्नुयात् परम् ॥ ५८ ॥

जो तत्त्ववेत्ता अन्त समयमें इन तत्त्वोंका ज्ञान प्राप्त करके एकान्तमें बैठकर परमात्माका ध्यान करता है, वह आकाशमें विचरनेवाले वायुकी भाँति सब प्रकारकी आसक्तियोंसे छूटकर पञ्चकोशोंसे रहित, निर्भय तथा निराश्रय होकर मुक्त एवं परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥ ५६–५८ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 1804

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पृष्ठ 1805

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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान - खड्गसे उसे काटनेका वर्णन ब्रह्मोवाच

संन्यासं तप इत्याहुर्वृद्धा निश्चितवादिनः ।

ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्था ज्ञानं ब्रह्म परं विदुः ॥ १ ॥

ब्रह्माजीने कहा – महर्षियो! निश्चित बात कहनेवाले और वेदोंके कारणरूप परमात्मामें स्थित वृद्ध ब्राह्मण संन्यासको तप कहते हैं और ज्ञानको ही परब्रह्मका स्वरूप मानते हैं ॥ १ ॥

अतिदूरात्मकं ब्रह्म वेदविद्याव्यपाश्रयम् ।

निर्द्वन्द्वं निर्गुणं नित्यमचित्त्यगुणमुत्तमम् ॥ २ ॥

ज्ञानेन तपसा चैव धीराः पश्यन्ति तत् परम् । वह वेदविद्याका आधार ब्रह्म ( अज्ञानियोंके लिये ) अत्यन्त दूर है । वह निर्द्वन्द्व, निर्गुण, नित्य, अचिन्त्य गुणोंसे युक्त और सर्वश्रेष्ठ है । धीर पुरुष ज्ञान और तपस्याके द्वारा उस परमात्माका साक्षात्कार करते हैं ॥ २३ ॥

निर्णिक्तमनसः पूता व्युत्क्रान्तरजसोऽमलाः ॥ ३ ॥

तपसा क्षेममध्वानं गच्छन्ति परमेश्वरम् ।

संन्यासनिरता नित्यं ये च ब्रह्मविदो जनाः ॥ ४ ॥

जिनके मनकी मैल धुल गयी है, जो परम पवित्र हैं, जिन्होंने रजोगुणको त्याग दिया है, जिनका अन्तःकरण निर्मल है, जो नित्य संन्यासपरायण तथा ब्रह्मके ज्ञाता हैं, वे पुरुष तपस्याके द्वारा कल्याणमय पथका आश्रय लेकर परमेश्वरको प्राप्त होते हैं ॥ ३-४ ॥

तपः प्रदीप इत्याहुराचारो धर्मसाधकः ।

ज्ञानं वै परमं विद्यात् संन्यासं तप उत्तमम् ॥ ५ ॥

ज्ञानी पुरुषोंका कहना है कि तपस्या ( परमात्म-तत्त्वको प्रकाशित करनेवाला) दीपक है, आचार धर्मका साधक है, ज्ञान परब्रह्मका स्वरूप है और संन्यास ही उत्तम तप है ॥ ५ ॥

यस्तु वेद निराधारं ज्ञानं तत्त्वविनिश्चयात् ।

सर्वभूतस्थमात्मानं स सर्वगतिरिष्यते ॥ ६ ॥

जो तत्त्वका पूर्ण निश्चय करके ज्ञानस्वरूप, निराधार और सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर रहनेवाले आत्माको जान लेता है, वह सर्वव्यापक हो जाता है ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1806

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यो विद्वान् सहवासं च विवासं चैव पश्यति ।

तथैवैकत्वनानात्वे स दुःखात् प्रतिमुच्यते ॥ ७ ॥

जो विद्वान् संयोगको भी वियोगके रूपमें ही देखता है तथा वैसे ही नानात्वमें एकत्व देखता है, वह दुःखसे सर्वथा मुक्त हो जाता है ॥ ७ ॥

यो न कामयते किंचिन्न किंचिदवमन्यते ।

इहलोकस्थ एवैष ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ८ ॥

जो किसी वस्तुकी कामना तथा किसीकी अवहेलना नहीं करता, वह इस लोकमें रहकर भी ब्रह्मस्वरूप होनेमें समर्थ हो जाता है ॥ ८ ॥

प्रधानगुणतत्त्वज्ञः सर्वभूतप्रधानवित् ।

निर्ममो निरहंकारो मुच्यते नात्र संशयः ॥ ९ ॥

जो सब भूतोंमें प्रधान — प्रकृतिको तथा उसके गुण एवं तत्त्वको भलीभाँति जानकर ममता और अहंकारसे रहित हो जाता है, उसके मुक्त होनेमें संदेह नहीं है ॥ ९ ॥

निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च ।

निर्गुणं नित्यमद्वन्द्वं प्रशमेनैव गच्छति ॥ १० ॥

जो द्वन्द्वोंसे रहित, नमस्कारकी इच्छा न रखने वाला और स्वधाकार ( पितृ- कार्य) न करनेवाला संन्यासी है, वह अतिशय शान्तिके द्वारा ही निर्गुण, द्वन्द्वातीत, नित्यतत्त्वको प्राप्त कर लेता है ॥ १० ॥

हित्वा गुणमयं सर्वं कर्म जन्तुः शुभाशुभम् ।

उभे सत्यानृते हित्वा मुच्यते नात्र संशयः ॥ ११ ॥

शुभ और अशुभ समस्त त्रिगुणात्मक कर्मोंका तथा सत्य और असत्य – इन दोनोंका भी त्याग करके संन्यासी मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ११ ॥

अव्यक्तयोनिप्रभवो बुद्धिस्कन्धमयो महान् ।

महाहंकारविटप इन्द्रियाङ्कुरकोटरः ॥ १२ ॥

महाभूतविशालश्च विशेषयति शाखिनः ।

सदापत्रः सदापुष्पः शुभाशुभफलोदयः ॥ १३ ॥

आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः ।

एनं छित्त्वा च भित्त्वा च तत्त्वज्ञानासिना बुधः ॥ १४ ॥

हित्वा सङ्गमयान् पाशान् मृत्युजन्मजरोदयान् ।

निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते नात्र संशयः ॥ १५ ॥

यह देह एक वृक्षके समान है । अज्ञान इसका मूल (जड़ ) है, बुद्धि स्कन्ध ( तना) है, अहंकार शाखा है, इन्द्रियाँ अंकुर और खोखले हैं तथा पञ्चमहाभूत इसको विशाल बनानेवाले हैं और इस वृक्षकी शोभा बढ़ाते हैं । इसमें सदा ही संकल्परूपी पत्ते उगते और कर्मरूपी फूल खिलते रहते हैं। शुभाशुभ कर्मोंसे प्राप्त होनेवाले सुख-दुःखादि ही इसमें

पृष्ठ 1807

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सदा लगे रहनेवाले फल हैं । इस प्रकार ब्रह्मरूपी बीजसे प्रकट होकर प्रवाहरूपसे सदा मौजूद रहनेवाला यह देहरूपी वृक्ष समस्त प्राणियोंके जीवनका आधार है । बुद्धिमान् पुरुष तत्त्वज्ञानरूपी खड्गसे इस वृक्षको छिन्न -भिन्न कर जब जन्म-मृत्यु और जरावस्थाके चक्करमें डालनेवाले आसक्तिरूप बन्धनोंको तोड़ डालता है तथा ममता और अहंकारसे रहित हो जाता है, उस समय उसे अवश्य मुक्ति प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है ॥

द्वाविमौ पक्षिणो नित्यौ संक्षेपौ चाप्यचेतनौ ।

एताभ्यां तु परो योऽन्यश्चेतनावान् स उच्यते ॥ १६ ॥

इस वृक्षपर रहनेवाले ( मन- बुद्धिरूप) दो पक्षी हैं, जो नित्य क्रियाशील होनेपर भी अचेतन हैं । इन दोनोंसे श्रेष्ठ अन्य ( आत्मा ) है, वह ज्ञानसम्पन्न कहा जाता है ॥ अचेतनः सत्त्वसंख्याविमुक्तः

सत्त्वात् परं चेतयतेऽन्तरात्मा ।

स क्षेत्रवित् सर्वसंख्यातबुद्धि- गुणातिगो मुच्यते सर्वपापैः ॥ १७ ॥

संख्यासे रहित जो सत्त्व अर्थात् मूलप्रकृति है, वह अचेतन है । उससे भिन्न जो जीवात्मा है, उसे अन्तर्यामी परमात्मा ज्ञानसम्पन्न करता है । वही क्षेत्रको जाननेवाला जब सम्पूर्ण तत्त्वोंको जान लेता है, तब गुणातीत होकर सब पापोंसे छूट जाता है ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 1808

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अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः आत्मा और परमात्माके स्वरूपका विवेचन ब्रह्मोवाच केचिद् ब्रह्ममयं वृक्षं केचिद् ब्रह्मवनं महत् ।

केचित्तु ब्रह्म चाव्यक्तं केचित् परमनामयम् ।

मन्यन्ते सर्वमप्येतदव्यक्तप्रभवाव्ययम् ॥ १ ॥

ब्रह्माजीने कहा – महर्षिगण! इस अव्यक्त, उत्पत्तिशील, अविनाशी सम्पूर्ण वृक्षको कोई ब्रह्म - स्वरूप मानते हैं और कोई महान् ब्रह्मवन मानते हैं । कितने ही इसे अव्यक्त ब्रह्म और कितने ही परम अनामय मानते हैं ॥ १ ॥

उच्छ्वामात्रमपि चेद् योऽन्तकाले समो भवेत् ।

आत्मानमुपसङ्गम्य सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ २ ॥

जो मनुष्य अन्तकालमें आत्माका ध्यान करके, साँस लेनेमें जितनी देर लगती है, उतनी देर भी, समभावमें स्थित होता है, वह अमृतत्व ( मोक्ष) प्राप्त करनेका अधिकारी हो जाता है ॥ २ ॥

निमेषमात्रमपि चेत् संयम्यात्मानमात्मनि ।

गच्छत्यात्मप्रसादेन विदुषां प्राप्तिमव्ययाम् ॥ ३ ॥

जो एक निमेष भी अपने मनको आत्मामें एकाग्र कर लेता है, वह अन्तःकरणकी प्रसन्नताको पाकर विद्वानोंको प्राप्त होनेवाली अक्षय गतिको पा जाता है ॥ ३ ॥

प्राणायामैरथ प्राणान् संयम्य स पुनः पुनः ।

दशद्वादशभिर्वापि चतुर्विंशात् परं ततः ॥ ४ ॥

दस अथवा बारह प्राणायामोंके द्वारा पुनः पुनः प्राणोंका संयम करनेवाला पुरुष भी चौबीस तत्त्वोंसे परे पचीसवें तत्त्व परमात्माको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥

एवं पूर्वं प्रसन्नात्मा लभते यद् यदिच्छति ।

अव्यक्तात् सत्त्वमुद्रिक्तममृतत्वाय कल्पते ॥ ५ ॥

सत्त्वात् परतरं नान्यत् प्रशंसन्तीह तद्विदः । इस प्रकार जो पहले अपने अन्तःकरणको शुद्ध कर लेता है, वह जो - जो चाहता है उसी- उसी वस्तुको पा जाता है । अव्यक्तसे उत्कृष्ट जो सत्- स्वरूप आत्मा है, वह अमर होनेमें समर्थ है । अतः सत्त्वस्वरूप आत्माके महत्त्वको जाननेवाले विद्वान् इस जगत्में सत्त्वसे बढ़कर और किसी वस्तुकी प्रशंसा नहीं करते ॥ ५३ ॥

अनुमानाद् विजानीमः पुरुषं सत्त्वसंश्रयम् ।

न शक्यमन्यथा गन्तुं पुरुषं द्विजसत्तमाः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1809

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द्विजवरो! इस अनुमान -प्रमाणके द्वारा इस बातको अच्छी तरह जानते हैं कि अन्तर्यामी परमात्मा सत्त्वस्वरूप आत्मामें स्थित हैं । इस तत्त्वको समझे बिना परम पुरुषको प्राप्त करना सम्भव नहीं है ॥ ६ ॥

क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् ।

ज्ञानं त्यागोऽथ संन्यासः सात्त्विकं वृत्तमिष्यते ॥ ७ ॥

क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, ज्ञान, त्याग तथा संन्यास— ये सात्त्विक बर्ताव बताये गये हैं ॥ ७ ॥

एतेनैवानुमानेन मन्यन्ते वै मनीषिणः ।

सत्त्वं च पुरुषश्चैव तत्र नास्ति विचारणा ॥ ८ ॥

मनीषी पुरुष इसी अनुमानसे उस सत्त्वस्वरूप आत्माका और परमात्माका मनन करते हैं । इसमें कोई विचारणीय बात नहीं है ॥ ८ ॥

आहुरेके च विद्वांसो ये ज्ञानपरिनिष्ठिताः ।

क्षेत्रज्ञसत्त्वयोरैक्यमित्येतन्नोपपद्यते ॥ ९ ॥

ज्ञानमें भलीभाँति स्थित कितने ही विद्वान् कहते हैं कि क्षेत्रज्ञ और सत्त्वकी एकता युक्तिसंगत नहीं है ॥ ९ ॥

पृथग्भूतं ततः सत्त्वमित्येतदविचारितम् ।

पृथग्भावश्च विज्ञेयः सहजश्चापि तत्त्वतः ॥ १० ॥

उनका कहना है कि उस क्षेत्रज्ञसे सत्त्व पृथक् है, क्योंकि यह सत्त्व अविचारसिद्ध है । ये दोनों एक साथ रहनेवाले होनेपर भी तत्त्वतः अलग - अलग हैं – ऐसा समझना चाहिये ॥ १० ॥

तथैवैकत्वनानात्वमिष्यते विदुषां नयः ।

मशकोदुम्बरे चैक्यं पृथक्त्वमपि दृश्यते ॥ ११ ॥

इसी प्रकार दूसरे विद्वानोंका निर्णय दोनोंके एकत्व और नानात्वको स्वीकार करता है; क्योंकि मशक और उदुम्बरकी एकता और पृथक्ता देखी जाती है ॥ ११ ॥

मत्स्यो यथान्यः स्यादप्सु सम्प्रयोगस्तथा तयोः ।

सम्बन्धस्तोयबिन्दूनां पर्णे कोकनदस्य च ॥ १२ ॥

जैसे जलसे मछली भिन्न है तो भी मछली और जल-दोनोंका संयोग देखा जाता है एवं जलकी बूँदोंका कमलके पत्तेसे सम्बन्ध देखा जाता है ॥ १२ ॥

गुरुरुवाच

इत्युक्तवन्तस्ते विप्रास्तदा लोकपितामहम् ।

पुनः संशयमापन्नाः पप्रच्छुर्मुनिसत्तमाः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1810

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गुरूने कहा - इस प्रकार कहनेपर उन मुनिश्रेष्ठ ब्राह्मणोंने पुनः संशयमें पड़कर र समय लोकपितामह ब्रह्माजीसे पूछा ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ४८ ॥