06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1821–1830
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1821–1830
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शुक्रल, कृष्ण, रक्त, नील, पीत, अरुण, छोटा, बड़ा, मोटा, दुबला, चौकोना और गोल -इस प्रकार तैजस् रूपका बारह प्रकारसे विस्तार सत्यवादी धर्मज्ञ वृद्ध ब्राह्मणोंके द्वारा जानने योग्य कहा जाता है ॥ ४६-४७ ॥ शब्दस्पर्शी च विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरुच्यते ॥ ४८ ॥
वायोश्चापि गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च बहुधा स्मृतः । शब्द और स्पर्श — ये वायुके दो गुण जानने योग्य कहे जाते हैं। इनमें भी स्पर्श ही
वायुका प्रधान गुण है । स्पर्श भी कई प्रकारका माना गया है ॥ ४८३ ॥
रूक्षः शीतस्तथैवोष्णः स्निग्धो विशद एव च ॥ ४ ९ ॥
कठिनश्चिक्कणः श्लक्ष्णः पिच्छिलो दारुणो मृदुः ।
एवं द्वादशविस्तारो वायव्यो गुण उच्यते ॥ ५० ॥
विधिवद् ब्राह्मणैः सिद्धैर्धर्मज्ञैस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ५१ ॥
रूखा, ठंडा, गरम, स्निग्ध, विशद, कठिन, चिकना, श्लक्ष्ण ( हलका ), पिच्छिल, कठोर और कोमल– इन बारह प्रकारोंसे वायुके गुण स्पर्शका विस्तार तत्त्वदर्शी धर्मज्ञ सिद्ध ब्राह्मणोंद्वारा विधिवत् बतलाया गया है ॥ ४ ९ –५१ ॥ तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव च स्मृतः । आकाशका शब्दमात्र एक ही गुण माना गया है । उस शब्दके बहुत से गुण हैं । उनका विस्तारके साथ वर्णन करता हूँ ॥ ५१३ ॥
तस्य शब्दस्य वक्ष्यामि विस्तरेण बहून् गुणान् ॥ ५२ ॥
षडजर्षभः स गान्धारो मध्यमः पञ्चमस्तथा ।
अतः परं तु विज्ञेयो निषादो धैवतस्तथा ।
इष्टश्चानिष्टशब्दश्च संहतः प्रविभागवान् ॥ ५३ ॥
एवं दशविधो ज्ञेयः शब्द आकाशसम्भवः । षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, निषाद, धैवत, इष्ट ( प्रिय ), अनिष्ट ( अप्रिय ) और संहत ( श्लिष्ट ) — इस प्रकार विभागवाले आकाशजनित शब्दके दस भेद हैं ॥ आकाशमुत्तमं भूतमहंकारस्ततः परः ॥ ५४ ॥
अहंकारात् परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा ततः परः ।
तस्मात् तु परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः ॥ ५५ ॥
आकाश सब भूतोंमें श्रेष्ठ है । उससे श्रेष्ठ अहंकार, अहंकारसे श्रेष्ठ बुद्धि, उस बुद्धिसे श्रेष्ठ आत्मा, उससे श्रेष्ठ अव्यक्त प्रकृति और प्रकृतिसे श्रेष्ठ पुरुष है ॥ ५४-५५ ॥
परापरज्ञो भूतानां विधिज्ञः सर्वकर्मणाम् ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा गच्छत्यात्मानमव्ययम् ॥ ५६ ॥
जो मनुष्य सम्पूर्ण भूतोंकी श्रेष्ठता और न्यूनताका ज्ञाता, समस्त कर्मोंकी विधिका जानकार और सब प्राणियोंको आत्मभावसे देखनेवाला है, वह अविनाशी परमात्माको
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प्राप्त होता है ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्यसंवादविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥
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एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः तपस्याका प्रभाव, आत्माका स्वरूप और उसके ज्ञानकी महिमा तथा अनुगीताका उपसंहार ब्रह्मोवाच
भूतानामथ पञ्चानां यथैषामीश्वरं मनः ।
नियमे च विसर्गे च भूतात्मा मन एव च ॥ १ ॥
ब्रह्माजीने कहा — महर्षियो! जिस प्रकार इन पाँचों महाभूतोंकी उत्पत्ति और नियमन करनेमें मन समर्थ है, उसी प्रकार स्थितिकालमें भी मन ही भूतोंका आत्मा है ॥ १ ॥
अधिष्ठाता मनो नित्यं भूतानां महतां तथा ।
बुद्धिरैश्वर्यमाचष्टे क्षेत्रज्ञश्च स उच्यते ॥ २ ॥
उन पञ्चमहाभूतोंका नित्य आधार भी मन ही है । बुद्धि जिसके ऐश्वर्यको प्रकाशित करती है, वह क्षेत्रज्ञ कहा जाता है ॥ २ ॥
इन्द्रियाणि मनो युङ्क्ते सदश्वानिव सारथिः ।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः क्षेत्रज्ञे युज्यते सदा ॥ ३ ॥
जैसे सारथि अच्छे घोड़ोंको अपने काबूमें रखता है, उसी प्रकार मन सम्पूर्ण इन्द्रियोंपर शासन करता है । इन्द्रिय, मन और बुद्धि- ये सदा क्षेत्रज्ञके साथ संयुक्त रहते हैं ॥ ३ ॥
महदश्वसमायुक्तं बुद्धिसंयमनं रथम् ।
समारुह्य स भूतात्मा समन्तात् परिधावति ॥ ४ ॥
जिसमें इन्द्रियरूपी घोड़े जुते हुए हैं, जिसका बुद्धिरूपी सारथिके द्वारा नियन्त्रण हो रहा है, उस देहरूपी रथपर सवार होकर वह भूतात्मा ( क्षेत्रज्ञ) चारों ओर दौड़ लगाता रहता है ॥ ४ ॥
इन्द्रियग्रामसंयुक्तो मनःसारथिरेव च ।
बुद्धिसंयमनो नित्यं महान् ब्रह्ममयो रथः ॥ ५ ॥
ब्रह्ममय रथ सदा रहनेवाला और महान् है, इन्द्रियाँ उसके घोड़े, मन सारथि और बुद्धि चाबुक है ॥ ५ ॥
एवं यो वेत्ति विद्वान् वै सदा ब्रह्ममयं रथम् ।
स धीरः सर्वभूतेषु न मोहमधिगच्छति ॥ ६ ॥
इस प्रकार जो विद्वान् इस ब्रह्ममय रथकी सदा जानकारी रखता है, वह समस्त प्राणियोंमें धीर है और कभी मोहमें नहीं पड़ता ॥ ६ ॥
अव्यक्तादि विशेषान्तं सहस्थावरजङ्गमम् ।
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सूर्यचन्द्रप्रभालोकं ग्रहनक्षत्रमण्डितम् ॥ ७ ॥
नदीपर्वतजालैश्च सर्वतः परिभूषितम् ।
विविधाभिस्तथा चाद्भिः सततं समलंकृतम् ॥ ८ ॥
आजीवं सर्वभूतानां सर्वप्राणभृतां गतिः ।
एतद् ब्रह्मवनं नित्यं तस्मिंश्चरति क्षेत्रवित् ॥ ९ ॥
यह जगत् एक ब्रह्मवन है । अव्यक्त प्रकृति इसका आदि है । पाँच महाभूत, दस इन्द्रियाँ -और एक मन– इन सोलह विशेषोंतक इसका विस्तार है । यह चराचर प्राणियोंसे भरा हुआ है । सूर्य और चन्द्रमा आदिके प्रकाशसे प्रकाशित है । ग्रह और नक्षत्रोंसे सुशोभित है । नदियों और पर्वतोंके समूहसे सब ओर विभूषित है । नाना प्रकारके जलसे सदा ही अलंकृत है । यही सम्पूर्ण भूतोंका जीवन और सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति है । इस ब्रह्मवनमें क्षेत्रज्ञ विचरण करता है ॥ ७ – ९ ॥ लोकेऽस्मिन् यानि सत्त्वानि त्रसानि स्थावराणि च ।
तान्येवाग्रे प्रलीयन्ते पश्चाद् भूतकृता गुणाः ।
गुणेभ्यः पञ्चभूतानि एष भूतसमुच्छ्रयः ॥ १० ॥
इस लोकमें जो स्थावर- जंगम प्राणी हैं, वे ही पहले प्रकृतिमें विलीन होते हैं, उसके बाद पाँच भूतोंके कार्य लीन होते हैं और कार्यरूप गुणोंके बाद पाँच भूत लीन होते हैं । इस प्रकार यह भूतसमुदाय प्रकृतिमें लीन होता है ॥ १० ॥
देवा मनुष्या गन्धर्वाः पिशाचासुरराक्षसाः ।
सर्वे स्वभावतः सृष्टा न क्रियाभ्यो न कारणात् ॥ ११ ॥
देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पिशाच, असुर, राक्षस सभी स्वभावसे रचे गये हैं; किसी क्रियासे या कारणसे इनकी रचना नहीं हुई है ॥ ११ ॥
एते विश्वसृजो विप्रा जायन्तीह पुनः पुनः ।
तेभ्यः प्रसूतास्तेष्वेव महाभूतेषु पञ्चसु ।
प्रलीयन्ते यथाकालमूर्मयः सागरे यथा ॥ १२ ॥
विश्वकी सृष्टि करनेवाले ये मरीचि आदि ब्राह्मण समुद्रकी लहरोंके समान बारंबार पञ्चमहाभूतोंसे उत्पन्न होते हैं । और उत्पन्न हुए वे फिर समयानुसार उन्हींमें लीन हो जाते हैं ॥ १२ ॥
विश्वसृग्भ्यस्तु भूतेभ्यो महाभूतास्तु सर्वशः ।
भूतेभ्यश्चापि पञ्चभ्यो मुक्तो गच्छेत् परां गतिम् ॥ १३ ॥
इस विश्वकी रचना करनेवाले प्राणियोंसे पञ्च महाभूत सब प्रकार पर है । जो इन पञ्च महाभूतोंसे छूट जाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ॥ १३ ॥
प्रजापतिरिदं सर्वं मनसैवासृजत् प्रभुः ।
तथैव देवानृषयस्तपसा प्रतिपेदिरे ॥ १४ ॥
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शक्तिसम्पन्न प्रजापतिने अपने मनके ही द्वारा सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की है तथा ऋषि भी तपस्यासे ही देवत्वको प्राप्त हुए हैं ॥ १४ ॥
तपसश्चानुपूर्व्येण फलमूलाशिनस्तथा त्रैलोक्यं तपसा सिद्धाः पश्यन्तीह समाहिताः ॥ १५ ॥
फल- मूलका भोजन करनेवाले सिद्ध महात्मा यहाँ तपस्याके प्रभावसे ही चित्तको एकाग्र करके तीनों लोकोंकी बातोंको क्रमशः प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं ॥ १५ ॥
औषधान्यगदादीनि नानाविद्याश्च सर्वशः ।
तपसैव प्रसिद्धयन्ति तपोमूलं हि साधनम् ॥ १६ ॥
आरोग्यकी` साधनभूत ओषधियाँ और नाना प्रकारकी विद्याएँ तपसे ही सिद्ध होती हैं ।
सारे साधनोंकी जड़ तपस्या ही है ॥ १६ ॥
यद्दुरापं दुराम्नायं दुराधर्षं दुरन्वयम् ।
तत् सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥ १७ ॥
जिसको पाना, जिसका अभ्यास करना, जिसे दबाना और जिसकी संगति लगाना नितान्त कठिन है, वह तपस्याके द्वारा साध्य हो जाता है; क्योंकि तपका प्रभाव दुर्लङ्घ्य है ॥ १७ ॥
सुरापो ब्रह्महा स्तेयी भ्रूणहा गुरुतल्पगः ।
तपसैव सुतप्तेन मुच्यते किल्बिषात् ततः ॥ १८ ॥
शराबी, ब्रह्महत्यारा, चोर, गर्भ नष्ट करनेवाला और गुरुपत्नीकी शय्यापर सोनेवाला महापापी भी भलीभाँति तपस्या करके ही उस महान् पापसे छुटकारा पा सकता है ॥ १८ ॥
मनुष्याः पितरो देवाः पशवो मृगपक्षिणः ।
यानि चान्यानि भूतानि त्रसानि स्थावराणि च ॥ १ ९ ॥
तपःपरायणा नित्यं सिद्धयन्ते तपसा सदा ।
तथैव तपसा देवा महामाया दिवं गताः ॥ २० ॥
मनुष्य, पितर, देवता, पशु, मृग, पक्षी तथा अन्य जितने चराचर प्राणी हैं, वे सब नित्य तपस्यामें संलग्न होकर ही सदा सिद्धि प्राप्त करते हैं । तपस्याके बलसे ही महामायावी देवता स्वर्गमें निवास करते हैं ॥
आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिताः ।
अहंकारसमायुक्तास्ते सकाशे प्रजापतेः ॥ २१ ॥
जो लोग आलस्य त्यागकर अहंकारसे युक्त हो सकाम कर्मका अनुष्ठान करते हैं, वे प्रजापतिके लोकमें जाते हैं ॥ २१ ॥
ध्यानयोगेन शुद्धेन निर्ममा निरहंकृताः ।
आप्नुवन्ति महात्मानो महान्तं लोकमुत्तमम् ॥ २२ ॥
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जो अहंता- ममतासे रहित हैं, वे महात्मा विशुद्ध ध्यानयोगके द्वारा महान् उत्तम लोकको प्राप्त करते हैं ॥ २२ ॥
ध्यानयोगमुपागम्य प्रसन्नमतयः सदा ।
सुखोपचयमव्यक्तं प्रविशन्त्यात्मवित्तमाः ॥ २३ ॥
जो ध्यानयोगका आश्रय लेकर सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं, वे आत्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पुरुष सुखकी राशिभूत अव्यक्त परमात्मामें प्रवेश करते हैं ॥ २३ ॥
ध्यानयोगमादुपागम्य निर्ममा निरहंकृताः ।
अव्यक्तं प्रविशन्तीह महतां लोकमुत्तमम् ॥ २४ ॥
किंतु जो ध्यानयोगसे पीछे लौटकर अर्थात् ध्यानमें असफल होकर ममता और अहंकारसे रहित जीवन व्यतीत करता है, वह निष्काम पुरुष भी महापुरुषोंके उत्तम अव्यक्त लोकमें लीन होता है ॥ २४ ॥
अव्यक्तादेव सम्भूतः समसंज्ञां गतः पुनः ।
तमोरजोभ्यां निर्मुक्तः सत्त्वमास्थाय केवलम् ॥ २५ ॥
फिर स्वयं भी उसकी समताको प्राप्त होकर अव्यक्तसे ही प्रकट होता है और केवल सत्त्वका आश्रय लेकर तमोगुण एवं रजोगुणके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है ॥ २५ ॥
निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यः सर्वं सृजति निष्कलम् ।
क्षेत्रज्ञ इति तं विद्याद् यस्तं वेद स वेदवित् ॥ २६ ॥
जो सब पापोंसे मुक्त रहकर सबकी सृष्टि करता है, उस अखण्ड आत्माको क्षेत्रज्ञ समझना चाहिये । जो मनुष्य उसका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वही वेदवेत्ता है ॥
चित्तं चित्तादुपागम्य मुनिरासीत संयतः ।
यच्चित्तं तन्मयो वश्यं गुह्यमेतत् सनातनम् ॥ २७ ॥
मुनिको उचित है कि चिन्तनके द्वारा चेतना ( सम्यग्ज्ञान) पाकर मन और इन्द्रियोंको एकाग्र करके परमात्माके ध्यानमें स्थित हो जाय; क्योंकि जिसका चित्त जिसमें लगा होता है, वह निश्चय ही उसका स्वरूप हो जाता है - यह सनातन गोपनीय रहस्य है ॥ २७ ॥
अव्यक्तादिविशेषान्तमविद्यालक्षणं स्मृतम् ।
निबोधत तथा हीदं गुणैर्लक्षणमित्युत ॥ २८ ॥
अव्यक्तसे लेकर सोलह विशेषोंतक सभी अविद्याके लक्षण बताये गये हैं । ऐसा समझना चाहिये कि यह गुणोंका ही विस्तार है ॥ २८ ॥
द्वयक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् ।
ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम् ॥ २९ ॥
दो अक्षरका पद ' मम ' ( यह मेरा है - ऐसा भाव ) मृत्युरूप है और तीन अक्षरका पद ' न मम ' ( यह मेरा नहीं है - ऐसा भाव) सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ २ ९ ॥ कर्म केचित् प्रशंसन्ति मन्दबुद्धिरता नराः ।
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ये'तु वृद्धा महात्मानो न प्रशंसन्ति कर्म ते ॥ ३० ॥
कुछ मन्द- बुद्धियुक्त पुरुष (स्वर्गादि फल प्रदान करनेवाले ) काम्य- कर्मोंकी प्रशंसा करते हैं, किंतु वृद्ध महात्माजन उन कर्मोंको उत्तम नहीं बतलाते ॥ ३० ॥
कर्मणा जायते जन्तुर्मूर्तिमान् षोडशात्मकः ।
पुरुषं ग्रसतेऽविद्या तद् ग्राह्यममृताशिनाम् ॥ ३१ ॥
क्योंकि सकाम कर्मके अनुष्ठानसे जीवको सोलह विकारोंसे निर्मित स्थूल शरीर धारण करके जन्म लेना पड़ता है और वह सदा अविद्याका ग्रास बना रहता है । इतना ही नहीं, कर्मठ पुरुष देवताओंके भी उपभोगका विषय होता है ॥ ३१ ॥
तस्मात् कर्मसु निःस्नेहा ये केचित् पारदर्शिनः ।
विद्यामयोऽयं पुरुषो न तु कर्ममयः स्मृतः ॥ ३२ ॥
इसलिये जो कोई पारदर्शी विद्वान् होते हैं, वे कर्मोंमें आसक्त नहीं होते; क्योंकि यह पुरुष ( आत्मा ) ज्ञानमय है, कर्ममय नहीं ॥ ३२ ॥
य एवममृतं नित्यमग्राह्यं शश्वदक्षरम् ।
वश्यात्मानमसंश्लिष्टं यो वेद न मृतो भवेत् ॥ ३३ ॥
जो इस प्रकार चेतन आत्माको अमृतस्वरूप, नित्य, इन्द्रियातीत, सनातन, अक्षर, जितात्मा एवं असंग समझता है, वह कभी मृत्युके बन्धनमें नहीं पड़ता ॥ ३३ ॥
अपूर्वमकृतं नित्यं य एनमविचारिणम् ।
य एवं विन्देदात्मानमग्राह्यममृताशनम् ।
अग्राह्योऽमृतो भवति स एभिः कारणैर्ध्रुवः ॥ ३४ ॥
जिसकी दृष्टिमें आत्मा अपूर्व ( अनादि ), अकृत ( अजन्मा), नित्य, अचल, अग्राह्य और अमृताशी है, वह इन गुणोंका चिन्तन करनेसे स्वयं भी अग्राह्य ( इन्द्रियातीत ), निश्चल एवं अमृतस्वरूप हो जाता है ॥ ३४ ॥
आयोज्य सर्वसंस्कारान् संयम्यात्मानमात्मनि ।
स तद् ब्रह्म शुभं वेत्ति यस्माद् भूयो न विद्यते ॥ ३५ ॥
जो चित्तको शुद्ध करनेवाले सम्पूर्ण संस्कारोंका सम्पादन करके मनको आत्माके ध्यानमें लगा देता है, वही उस कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त करता है, जिससे बड़ा कोई नहीं है ॥ ३५ ॥
प्रसादे चैव सत्त्वस्य प्रसादं समवाप्नुयात् ।
लक्षणं हि प्रसादस्य यथा स्यात् स्वप्नदर्शनम् ॥ ३६ ॥
सम्पूर्ण अन्तःकरणके स्वच्छ हो जानेपर साधकको शुद्ध प्रसन्नता प्राप्त होती है । जैसे स्वप्नसे जगे हुए मनुष्यके लिये स्वप्न शान्त हो जाता है, उसी प्रकार चित्तशुद्धिका लक्षण है ॥ ३६ ॥
गतिरेषा तु मुक्तानां ये ज्ञानपरिनिष्ठिताः ।
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प्रवृत्तयश्च याः सर्वाः पश्यन्ति परिणामजाः ॥ ३७ ॥
ज्ञाननिष्ठ जीवन्मुक्त महात्माओंकी यही परम गति है; क्योंकि वे उन समस्त प्रवृत्तियोंको शुभाशुभ फल देनेवाली समझते हैं ॥ ३७ ॥
एषा गतिर्विरक्तानामेष धर्मः सनातनः ।
एषा ज्ञानवतां प्राप्तिरेतद् वृत्तमनिन्दितम् ॥ ३८ ॥
यही विरक्त पुरुषोंकी गति है, यही सनातन धर्म है, यही ज्ञानियोंका प्राप्तव्य स्थान है और यही अनिन्दित सदाचार है ॥ ३८ ॥
समेन सर्वभूतेषु निःस्पृहेण निराशिषा ।
शक्या गतिरियं गन्तुं सर्वत्र समदर्शिना ॥ ३ ९ ॥
जो सम्पूर्ण भूतोंमें समानभाव रखता है, लोभ और कामनासे रहित है तथा जिसकी सर्वत्र समान दृष्टि रहती है, वह ज्ञानी पुरुष ही इस परम गतिको प्राप्त कर सकता है ॥ ३ ९ ॥
एतद् वः सर्वमाख्यातं मया विप्रर्षिसत्तमाः ।
एवमाचरत क्षिप्रं ततः सिद्धिमवाप्स्यथ ॥ ४० ॥
ब्रह्मर्षियो! यह सब विषय मैंने विस्तारके साथ तुम लोगोंको बता दिया । इसीके अनुसार आचरण करो, इससे तुम्हें शीघ्र ही परम सिद्धि प्राप्त होगी ॥ ४० ॥
गुरुरुवाच
इत्युक्तास्ते तु मुनयो गुरुणा ब्रह्मणा तथा ।
कृतवन्तो महात्मानस्ततो लोकमवाप्नुवन् ॥ ४१ ॥
गुरूने कहा- बेटा! ब्रह्माजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर उन महात्मा मुनियोंने इसीके अनुसार आचरण किया । इससे उन्हें उत्तम लोककी प्राप्ति हुई ॥ ४१ ॥
त्वमप्येतन्महाभाग मयोक्तं ब्रह्मणो वचः ।
सम्यगाचर शुद्धात्मंस्ततः सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ ४२ ॥
महाभाग! तुम्हारा चित्त शुद्ध है, इसलिये तुम भी मेरे बताये हुए ब्रह्माजीके उत्तम
उपदेशका भलीभाँति पालन करो । इससे तुम्हें भी सिद्धि प्राप्त होगी ॥ ४२ ॥
वासुदेव उवाच
इत्युक्तः स तदा शिष्यो गुरुणा धर्ममुत्तमम् ।
चकार सर्वं कौन्तेय ततो मोक्षमवाप्तवान् ॥ ४३ ॥
श्रीकृष्णने कहा- अर्जुन! गुरुदेवके ऐसा कहनेपर उस शिष्यने समस्त उत्तम धर्मोंका पालन किया । इससे वह संसार- बन्धनसे मुक्त हो गया ॥ ४३ ॥
कृतकृत्यश्च स तदा शिष्यः कुरुकुलोद्वह ।
तत् पदं समनुप्राप्तो यत्र गत्वा न शोचति ॥ ४४ ॥
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कुरुकुलनन्दन! उस समय कृतार्थ होकर उस शिष्यने वह ब्रह्मपद प्राप्त किया, जहाँ जाकर शोक नहीं करना पड़ता ॥ ४४ ॥
अर्जुनउवाच
को न्वसौ ब्राह्मणः कृष्ण कश्च शिष्यो जनार्दन ।
श्रोतव्यं चेन्मयैतद् वै तत्त्वमाचक्ष्व मे विभो ॥ ४५ ॥
अर्जुनने पूछा –जनार्दन श्रीकृष्ण! वे ब्रह्मनिष्ठ गुरु कौन थे और शिष्य कौन थे? प्रभो! यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो ठीक- ठीक बतानेकी कृपा कीजिये ॥ ४५ ॥
वासुदेव उवाच
अहं गुरुर्महाबाहो मनः शिष्यं च विद्धि मे ।
त्वत्प्रीत्या गुह्यमेतच्च कथितं ते धनंजय ॥ ४६ ॥
श्रीकृष्णने कहा — महाबाहो! मैं ही गुरु हूँ और मेरे मनको ही शिष्य समझो । धनंजय! तुम्हारे स्नेहवश मैंने इस गोपनीय रहस्यका वर्णन किया है ॥ ४६ ॥
मयि चेदस्ति ते प्रीतिर्नित्यं कुरुकुलोद्वह ।
अध्यात्ममेतच्छ्रुत्वा त्वं सम्यगाचर सुव्रत ॥ ४७ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुरुकुलनन्दन! यदि मुझपर तुम्हारा प्रेम हो तो इस अध्यात्मज्ञानको सुनकर तुम नित्य इसका यथावत् पालन करो ॥ ४७ ॥
ततस्त्वं सम्यगाचीर्णे धर्मेऽस्मिन्नरिकर्षण ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो मोक्षं प्राप्स्यसि केवलम् ॥ ४८ ॥
शत्रुदमन! इस धर्मका पूर्णतया आचरण करनेपर तुम समस्त पापोंसे छूटकर विशुद्ध मोक्षको प्राप्त कर लोगे ॥ ४८ ॥
पूर्वमप्येतदेवोक्तं युद्धकाल उपस्थिते ।
मया तव महाबाहो तस्मादत्र मनः कुरु ॥ ४९ ॥
महाबाहो! पहले भी मैंने युद्धकाल उपस्थित होनेपर यही उपदेश तुमको सुनाया था ।
इसलिये तुम इसमें मन लगाओ ॥ ४ ९ ॥
मया तु भरतश्रेष्ठ चिरदृष्टः पिता प्रभुः ।
तमहं द्रष्टुमिच्छामि सम्मते तव फाल्गुन ॥ ५० ॥
भरतश्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं पिताजीका दर्शन करना चाहता हूँ । उन्हें देखे बहुत दिन हो गये । यदि तुम्हारी राय हो तो मैं उनके दर्शनके लिये द्वारका जाऊँ ॥ ५० ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तवचनं कृष्णं प्रत्युवाच धनंजयः ।
गच्छावो नगरं कृष्ण गजसाह्वयमद्य वै ॥ ५१ ॥
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समेत्य तत्र राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
समनुज्ञाप्य राजानं स्वां पुरीं यातुमर्हसि ॥ ५२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! भगवान् श्रीकृष्णकी बात सुनकर अर्जुनने कहा -' श्रीकृष्ण! अब हमलोग यहाँसे हस्तिनापुरको चलें । वहाँ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरसे मिलकर और उनकी आज्ञा लेकर आप अपनी पुरीको पधारें' ॥ ५१-५२ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरुशिष्यसंवादविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥