श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1831–1840
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1831–1840
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द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः श्रीकृष्णका अर्जुनके साथ हस्तिनापुर जाना और वहाँ सबसे मिलकर युधिष्ठिरकी आज्ञा ले सुभद्राके साथ द्वारकाको प्रस्थान करना वैशम्पायन उवाच
ततोऽभ्यनोदयत् कृष्णो युज्यतामिति दारुकम् ।
मुहूर्तादिव चाचष्ट युक्तमित्येव दारुकः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने दारुकको आज्ञा दी कि ' रथ जोतकर तैयार करो। ' दारुकने दो ही घड़ीमें लौटकर सूचना दी कि 'रथ जुत गया' ॥ १ ॥
तथैव चानुयात्रादि चोदयामास पाण्डवः ।
सज्जयध्वं प्रयास्यामो नगरं गजसाह्वयम् ॥ २ ॥
इसी प्रकार अर्जुनने भी अपने सेवकोंको आदेश दिया कि ' सब लोग रथको सुसज्जित करो । अब हमें हस्तिनापुरकी यात्रा करनी है ' ॥ २ ॥
इत्युक्ताः सैनिकास्ते तु सज्जीभूता विशाम्पते ।
आचख्युः सज्जमित्येवं पार्थायामिततेजसे ॥ ३ ॥
प्रजानाथ! आज्ञा पाते ही सम्पूर्ण सैनिक तैयार हो गये और महान् तेजस्वी अर्जुनके पास जाकर बोले — ‘ रथ सुसज्जित है और यात्राकी सारी तैयारी हो गयी ' ॥
ततस्तौ रथमास्थाय प्रयातौ कृष्णपाण्डवौ ।
विकुर्वाणौ कथाश्चित्राः प्रीयमाणौ विशाम्पते ॥ ४ ॥
राजन्! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन रथपर बैठकर आपसमें तरह- तरहकी विचित्र बातें करते हुए प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे चल दिये ॥ ४ ॥
रथस्थं तु महातेजा वासुदेवं धनंजयः ।
पुनरेवाब्रवीद् वाक्यमिदं भरतसत्तम ॥ ५ ॥
भरतभूषण! रथपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णसे पुनः इस प्रकार महातेजस्वी अर्जुन बोले– ॥ ५ ॥
त्वत्प्रसादाज्जयः प्राप्तो राज्ञा वृष्णिकुलोद्वह ।
नियताः शत्रवश्चापि प्राप्तं राज्यमकण्टकम् ॥ ६ ॥
‘ वृष्णिकुलधुरन्धर श्रीकृष्ण! आपकी कृपासे ही राजा युधिष्ठिरको विजय प्राप्त हुई है । उनके शत्रुओंका दमन हो गया और उन्हें निष्कण्टक राज्य मिला ॥ ६ ॥
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नाथवन्तश्च भवता पाण्डवा मधुसूदन ।
भवन्तं प्लवमासाद्य तीर्णाः स्म कुरुसागरम् ॥ ७ ॥
'मधुसूदन! हम सभी पाण्डव आपसे सनाथ हैं, आपको ही नौकारूप पाकर हमलोग कौरवसेनारूपी समुद्रसे पार हुए हैं ॥ ७ ॥
विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसत्तम ।
तथा त्वामभिजानामि यथा चाहं भवन्मतः ॥ ८ ॥
विश्वकर्मन्! आपको नमस्कार है । विश्वात्मन्! आप सम्पूर्ण विश्वमें सबसे श्रेष्ठ हैं । मैं आपको उसी तरह जानता हूँ, जिस तरह आप मुझे समझते हैं ॥ ८ ॥
त्वत्तेजः सम्भवो नित्यं भूतात्मा मधुसूदन ।
रतिः क्रीडामयी तुभ्यं माया ते रोदसी विभो ॥ ९ ॥
' मधुसूदन! आपके ही तेजसे सदा सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति होती है । आप ही सब प्राणियोंके आत्मा हैं । प्रभो! नाना प्रकारकी लीलाएँ आपकी रति ( मनोरंजन ) हैं । आकाश और पृथिवी आपकी माया है ॥ ९ ॥
त्वयि सर्वमिदं विश्वं यदिदं स्थाणु जङ्गमम् ।
त्वं हि सर्व विकुरुषे भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥ १० ॥
‘ यह जो स्थावर- जंगमरूप जगत् है, सब आपहीमें प्रतिष्ठित है । आप ही चार प्रकारके समस्त प्राणिसमुदायकी सृष्टि करते हैं ॥ १० ॥
पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव मधुसूदन ।
हसितं तेऽमला ज्योत्स्ना ऋतवश्चेन्द्रियाणि ते ॥ ११ ॥
'मधुसूदन! पृथ्वी, अन्तरिक्ष और आकाशकी सृष्टि भी आपने ही की है । निर्मल चाँदनी आपका हास्य है और ऋतुएँ आपकी इन्द्रियाँ हैं ॥ ११ ॥
प्राणो वायुः सततगः क्रोधो मृत्युः सनातनः ।
प्रसादे चापि पद्मा श्रीर्नित्यं त्वयि महामते ॥ १२ ॥
‘ सदा चलनेवाली वायु प्राण है, क्रोध सनातन मृत्यु है । महामते! आपके प्रसादमें लक्ष्मी विराजमान हैं । आपके वक्षःस्थलमें सदा ही श्रीजीका निवास है ॥ १२ ॥
रतिस्तुष्टिर्धृतिः क्षान्तिर्मतिः कान्तिश्चराचरम् ।
त्वमेवेह युगान्तेषु निधनं प्रोच्यसेऽनघ ॥ १३ ॥
‘ अनघ! आपमें ही रति, तुष्टि, धृति, क्षान्ति, मति, कान्ति और चराचर जगत् है । आप ही युगान्तकालमें प्रलय कहे जाते हैं ॥ १३ ॥
सुदीर्घेणापि कालेन न ते शक्या गुणा मया ।
आत्मा च परमात्मा च नमस्ते नलिनेक्षण ॥ १४ ॥
‘ दीर्घकालतक गणना करनेपर भी आपके गुणोंका पार पाना असम्भव है । आप ही
आत्मा और परमात्मा हैं । कमलनयन! आपको नमस्कार है ॥ १४ ॥
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विदितो मे सुदुर्धर्ष नारदाद् देवलात् तथा ।
कृष्णद्वैपायनाच्चैव तथा कुरुपितामहात् ॥ १५ ॥
'दुर्धर्ष परमेश्वर! मैंने देवर्षि नारद, देवल, श्रीकृष्णद्वैपायन तथा पितामह भीष्मके मुखसे आपके माहात्म्यका ज्ञान प्राप्त किया है ॥ १५ ॥
त्वयि सर्वं समासक्तं त्वमेवैको जनेश्वरः ।
यच्चानुग्रहसंयुक्तमेतदुक्तं त्वयानघ ॥ १६ ॥
एतत् सर्वमहं सम्यगाचरिष्ये जनार्दन । ‘ सारा जगत् आपमें ही ओत- प्रोत है । एकमात्र आप ही मनुष्योंके अधीश्वर हैं । निष्पाप जनार्दन! आपने मुझपर कृपा करके जो यह उपदेश दिया है, उसका मैं यथावत् पालन करूँगा ॥ १६ ॥
इदं चाद्भुतमत्यन्तं कृतमस्मत्प्रियेप्सया ॥ १७ ॥
यत्पापो निहतः संख्ये कौरव्यो धृतराष्ट्रजः । ‘ हमलोगोंका प्रिय करनेकी इच्छासे आपने यह अत्यन्त अद्भुत कार्य किया कि धृतराष्ट्रके पुत्र कुरुकुलकलंक पापी दुर्योधनको ( भैया भीमके द्वारा ) युद्धमें मरवा डाला ॥ १७३ ॥
त्वया दग्धं हि तत्सैन्यं मया विजितमाहवे ॥ १८ ॥
भवता तत्कृतं कर्म येनावाप्तो जयो मया । ‘ शत्रुकी सेनाको आपने ही अपने तेजसे दग्ध कर दिया था । तभी मैंने युद्धमें उसपर विजय पायी है । आपने ही ऐसे - ऐसे उपाय किये हैं, जिनसे मुझे विजय सुलभ हुई है ॥ १८ ३ ॥ दुर्योधनस्य संग्रामे तव बुद्धिपराक्रमैः ॥ १ ९ ॥
कर्णस्य च वधोपायो यथावत् सम्प्रदर्शितः ।
सैन्धवस्य च पापस्य भूरिश्रवस एव च ॥ २० ॥
' संग्राममें आपकी ही बुद्धि और पराक्रमसे दुर्योधन, कर्ण, पापी सिन्धुराज जयद्रथ तथा भूरिश्रवाके वधका उपाय मुझे यथावत् रूपसे दृष्टिगोचर हुआ ॥ १ ९ -२० ॥
अहं च प्रीयमाणेन त्वया देवकिनन्दन ।
यदुक्तस्तत् करिष्यामि न हि मेऽत्र विचारणा ॥ २१ ॥
‘ देवकीनन्दन! आपने प्रेमपूर्वक प्रसन्नताके साथ मुझे जो कार्य करनेके लिये कहा है, उसे अवश्य करूँगा; इसमें मुझे कुछ भी विचार नहीं करना है ॥ २१ ॥
राजानं च समासाद्य धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
चोदयिष्यामि धर्मज्ञ गमनार्थं तवानघ ॥ २२ ॥
रुचितं हि ममैतत्ते द्वारकागमनं प्रभो ।
अचिरादेव द्रष्टा त्वं मातुलं मे जनार्दन ॥ २३ ॥
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बलदेवं च दुर्धर्षं तथान्यान् वृष्णिपुङ्गवान् । ‘ धर्मज्ञ एवं निष्पाप भगवान् जनार्दन! मैं धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरके पास चलकर उनसे आपके जानेके लिये आज्ञा प्रदान करनेका अनुरोध करूँगा । इस समय आपका द्वारका जाना आवश्यक है, इसमें मेरी भी सम्मति है । अब आप शीघ्र ही मामाजीका दर्शन करेंगे और दुर्जय वीर बलदेवजी तथा अन्यान्य वृष्णिवंशी वीरोंसे मिल सकेंगे ' ॥ २२-२३ ॥ एवं सम्भाषमाणौ तौ प्राप्तौ वारणसाह्वयम् ॥ २४ ॥
तथा विविशतुश्चोभौ सम्प्रहृष्टनराकुलम् । इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों मित्र हस्तिनापुरमें जा पहुँचे । उन दोनोंने हृष्ट- पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए नगरमें प्रवेश किया ॥ २४ ॥
तौ गत्वा धृतराष्ट्रस्य गृहं शक्रगृहोपमम् ॥ २५ ॥
ददृशाते महाराज धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ।
विदुरं च महाबुद्धिं राजानं च युधिष्ठिरम् ॥ २६ ॥
महाराज! इन्द्रभवनके समान शोभा पानेवाले धृतराष्ट्रके महलमें उन दोनोंने राजा धृतराष्ट्र, महाबुद्धिमान् विदुर और राजा युधिष्ठिरका दर्शन किया ॥ २५-२६ ॥
भीमसेनं च दुर्धर्षं माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ।
धृतराष्ट्रमुपासीनं युयुत्सुं चापराजितम् ॥ २७ ॥
गान्धारीं च महाप्रज्ञां पृथां कृष्णां च भामिनीम् ।
सुभद्राद्याश्च ताः सर्वा भरतानां स्त्रियस्तथा ॥ २८ ॥
ददृशाते स्त्रियः सर्वा गान्धारीपरिचारिकाः । फिर क्रमशः दुर्जय वीर भीमसेन, माद्रीनन्दन पाण्डुपुत्र नकुल सहदेव, धृतराष्ट्रकी सेवामें लगे रहनेवाले अपराजित वीर युयुत्सु, परम बुद्धिमती गान्धारी, कुन्ती, भार्या द्रौपदी तथा सुभद्रा आदि भरतवंशकी सभी स्त्रियोंसे मिले । गान्धारीकी सेवामें रहनेवाली उन सभी स्त्रियोंका उन दोनोंने दर्शन किया ॥ २७-२८३ ॥ ततः समेत्य राजानं धृतराष्ट्रमरिंदमौ ॥ २ ९ ॥
निवेद्य नामधेये स्वे तस्य पादावगृह्णताम् ।
गान्धार्याश्च पृथायाश्च धर्मराजस्य चैव हि ॥ ३० ॥
भीमस्य च महात्मानौ तथा पादावगृह्णताम् । सबसे पहले उन शत्रुदमन वीरोंने राजा धृतराष्ट्रके पास जाकर अपने नाम बताते हुए उनके दोनों चरणोंका स्पर्श किया । उसके बाद उन महात्माओंने गान्धारी, कुन्ती, धर्मराज युधिष्ठिर और भीमसेनके पैर छूये ॥ २ ९-३०३ ॥ क्षत्तारं चापि संगृह्य पृष्टुत्वा कुशलमव्ययम् ॥ ३१ ॥
( परिष्वज्य महात्मानं वैश्यापुत्रं महारथम् । ) तैः सार्धं नृपतिं वृद्धं ततस्तौ पर्युपासताम् ।
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फिर विदुरजीसे मिलकर उनका कुशल- मंगल पूछा । इसके बाद वैश्यापुत्र महारथी महामना युयुत्सुको भी हृदयसे लगाया । तत्पश्चात् उन सबके साथ वे दोनों बूढ़े राजा धृतराष्ट्रके पास जा बैठे ॥ ३१३ ॥
ततो निशि महाराजो धृतराष्ट्रः कुरूद्वहान् ॥ ३२ ॥
जनार्दनं च मेधावी व्यसर्जयत वै गृहान् ।
तेऽनुज्ञाता नृपतिना ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ॥ ३३ ॥
रात हो जानेपर मेधावी महाराज धृतराष्ट्रने उन कुरुश्रेष्ठ वीरों तथा भगवान् श्रीकृष्णको अपने -अपने घरमें जानेके लिये विदा किया । राजाकी आज्ञा पाकर वे सब लोग अपने - अपने घरको गये ॥ ३२-३३ ॥
धनंजयगृहानेव ययौ कृष्णस्तु वीर्यवान् ।
तत्रार्चितो यथान्यायं सर्वकामैरुपस्थितः ॥ ३४ ॥
पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनके ही घरमें गये । वहाँ उनकी यथोचित पूजा हुई और सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थ उनकी सेवामें उपस्थित किये गये ॥ ३४ ॥
कृष्णः सुष्वाप मेधावी धनंजयसहायवान् ।
प्रभातायां तु शर्वर्यां कृत्वा पौर्वाह्निकीं क्रियाम् ॥ ३५ ॥
धर्मराजस्य भवनं जग्मतुः परमार्चितौ ।
यत्रास्ते स सहामात्यो धर्मराजो महाबलः ॥ ३६ ॥
भोजनके पश्चात् मेधावी श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ सोये । जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब पूर्वाह्नकालकी क्रिया - संध्या- वन्दन आदि करके वे दोनों परम पूजित मित्र धर्मराज युधिष्ठिरके महलमें गये । जहाँ महाबली धर्मराज अपने मन्त्रियोंके साथ रहते थे ॥ ३५-३६ ॥
तौ प्रविश्य महात्मानौ तद् गृहं परमार्चितम् ।
धर्मराजं ददृशतुर्देवराजमिवाश्विनौ ॥ ३७ ॥
उस परम सुन्दर एवं सुसज्जित भवनमें प्रवेश करके उन महात्माओंने धर्मराज युधिष्ठिरका दर्शन किया । मानो दोनों अश्विनीकुमार देवराज इन्द्रसे आकर मिले हों ॥ ३७ ॥
समासाद्य तु राजानं वार्ष्णेयकुरुपुङ्गवौ ।
निषीदतुरनुज्ञातौ प्रीयमाणेन तेन तौ ॥ ३८ ॥
श्रीकृष्ण और अर्जुन जब राजाके पास पहुँचे, तब उन्हें देख उनको बड़ी प्रसन्नता हुई । फिर उनके आज्ञा देनेपर वे दोनों मित्र आसनपर विराजमान हुए ॥ ३८ ॥
ततः स राजा मेधावी विवक्षू प्रेक्ष्य तावुभौ ।
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठो वचनं राजसत्तमः ॥ ३ ९ ॥
तत्पश्चात् वक्ताओंमें श्रेष्ठ भूपालशिरोमणि मेधावी युधिष्ठिरने उन्हें कुछ कहनेके लिये इच्छुक देख उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३ ९ ॥
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युधिष्ठिरउवाच
विवक्षु हि युवां मन्ये वीरौ यदुकुरूद्वहौ ।
ब्रूतं कर्तास्मि सर्वं वां नचिरान्मा विचार्यताम् ॥ ४० ॥
युधिष्ठिर बोले- यदुकुल और कुरुकुलको अलंकृत करनेवाले वीरो! मालूम होता है, तुमलोग मुझसे कुछ कहना चाहते हो । जो भी कहना हो, कहो; मैं तुम्हारी सारी इच्छाओंको
शीघ्र ही पूर्ण करूँगा । तुम मनमें कुछ अन्यथा विचार न करो ॥ ४० ॥
इत्युक्तः फाल्गुनस्तत्र धर्मराजानमब्रवीत् ।
विनीतवदुपागम्य वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ ४१ ॥
उनके इस प्रकार कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल अर्जुनने धर्मराजके पास जाकर बड़े विनीत भावसे कहा— ॥ ४१ ॥
अयं चिरोषितो राजन् वासुदेवः प्रतापवान् ।
भवन्तं समनुज्ञाप्य पितरं द्रष्टुमिच्छति ॥ ४२ ॥
स गच्छेदभ्यनुज्ञातो भवता यदि मन्यसे ।
आनर्तनगरीं वीरस्तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ४३ ॥
‘ राजन्! परम प्रतापी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको यहाँ रहते बहुत दिन हो गया । अब ये आपकी आज्ञा लेकर अपने पिताजीका दर्शन करना चाहते हैं । यदि आप स्वीकार करें और हर्षपूर्वक आज्ञा दे दें तभी ये वीरवर श्रीकृष्ण आनर्तनगरी द्वारकाको जायँगे । अतः आप इन्हें जानेकी आज्ञा दे दें' ॥ ४२-४३ ॥ युधिष्ठिर उवाच
पुण्डरीकाक्ष भद्रं ते गच्छ त्वं मधुसूदन ।
पुरीं द्वारवतीमद्य द्रष्टुं शूरसुतं प्रभो ॥ ४४ ॥
युधिष्ठिरने कहा— कमलनयन मधुसूदन! आपका कल्याण हो । प्रभो! आप शूरनन्दन वसुदेवजीका दर्शन करनेके लिये आज ही द्वारकाको प्रस्थान कीजिये ॥ ४४ ॥
रोचते मे महाबाहो गमनं तव केशव ।
मातुलश्चिरदृष्टो मे त्वया देवी च देवकी ॥ ४५ ॥
महाबाहु केशव! मुझे आपका जाना इसलिये ठीक लगता है कि आपने मेरे मामाजी और मामी देवकी देवीको बहुत दिनोंसे नहीं देखा है ॥ ४५ ॥
समेत्य मातुलं गत्वा बलदेवं च मानद ।
पूजयेथा महाप्राज्ञ मद्वाक्येन यथार्हतः ॥ ४६ ॥
मानद! महाप्राज्ञ! आप मामाजी तथा भैया बलदेवजीके पास जाकर उनसे मिलिये और मेरी ओरसे उनका यथायोग्य सत्कार कीजिये ॥ ४६ ॥
स्मरेथाश्चापि मां नित्यं भीमं च बलिनां वरम् ।
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फाल्गुनं सहदेवं च नकुलं चैव मानद ॥ ४७ ॥
भक्तोंको मान देनेवाले श्रीकृष्ण! द्वारकामें पहुँचकर आप मुझको, बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेनको, अर्जुन, सहदेव और नकुलको भी सदा याद रखियेगा ॥ ४७ ॥
आनर्तानवलोक्य त्वं पितरं च महाभुज ।
वृष्णींश्च पुनरागच्छेर्हयमेधे ममानघ ॥ ४८ ॥
महाबाहु निष्पाप श्रीकृष्ण! आनर्त देशकी प्रजा, अपने माता- पिता तथा वृष्णिवंशी बन्धु- बान्धवोंसे मिलकर पुनः मेरे अश्वमेध यज्ञमें पधारियेगा ॥ ४८ ॥
स गच्छ रत्नान्यादाय विविधानि वसूनि च ।
यच्चाप्यन्यन्मनोज्ञं ते तदप्यादत्स्व सात्वत ॥ ४ ९ ॥
इयं च वसुधा कृत्स्ना प्रसादात् तव केशव ।
अस्मानुपगता वीर निहताश्चापि शत्रवः ॥ ५० ॥
यदुनन्दन केशव! ये तरह- तरहके रत्न और धन प्रस्तुत हैं । इन्हें तथा दूसरी - दूसरी वस्तुएँ जो आपको पसंद हों लेकर यात्रा कीजिये । वीरवर! आपके प्रसादसे ही इस सम्पूर्ण भूमण्डलका राज्य हमारे हाथमें आया है और हमारे शत्रु भी मारे गये ॥ ४ ९ -५० ॥
एवं ब्रुवति कौरव्ये धर्मराजे युधिष्ठिरे ।
वासुदेवो वरः पुंसामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५१ ॥
कुरुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिर जब इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय पुरुषोत्तम वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने उनसे यह बात कही— ॥ ५१ ॥
तवैव रत्नानि धनं च केवलं धरा तु कृत्स्ना तु महाभुजाद्य वै । यदस्ति चान्यद् द्रविणं गृहे मम त्वमेव तस्येश्वर नित्यमीश्वरः ॥ ५२ ॥
‘ महाबाहो! ये रत्न, धन और समूची पृथ्वी अब केवल आपकी ही है । इतना ही नहीं, मेरे घरमें भी जो कुछ धन- वैभव है, उसको भी आप अपना ही समझिये । नरेश्वर! आप ही सदा उसके भी स्वामी हैं ' ॥ ५२ ॥
तथेत्यथोक्तः प्रतिपूजितस्तदा गदाग्रजो धर्मसुतेन वीर्यवान् । पितृष्वसारं त्ववदद् यथाविधि सम्पूजितश्चाप्यगमत् प्रदक्षिणम् ॥ ५३ ॥
उनके ऐसा कहनेपर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने जो आज्ञा कहकर उनके वचनोंका आदर किया । उनसे सम्मानित हो पराक्रमी श्रीकृष्णने अपनी बुआ कुन्तीके पास जाकर बातचीत की और उनसे यथोचित सत्कार पाकर उनकी प्रदक्षिणा की ॥ ५३ ॥
तया स सम्यक् प्रतिनन्दितस्तत-
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स्तथैव सर्वैर्विदुरादिभिस्तथा । विनिर्ययौ नागपुराद् गदाग्रजो रथेन दिव्येन चतुर्भुजः स्वयम् ॥ ५४ ॥
कुन्तीसे भलीभाँति अभिनन्दित हो विदुर आदि सब लोगोंसे सत्कारपूर्वक विदा ले चार भुजाधारी भगवान् श्रीकृष्ण अपने दिव्य रथद्वारा हस्तिनापुरसे बाहर निकले ॥ ५४ ॥
रथे सुभद्रामधिरोप्य भाविनीं युधिष्ठिरस्यानुमते जनार्दनः । पितृष्वसुश्चापि तथा महाभुजो विनिर्ययौ पौरजनाभिसंवृतः ॥ ५५ ॥
बुआ कुन्ती तथा राजा युधिष्ठिरकी आज्ञासे भाविनी सुभद्राको भी रथपर बिठाकर महाबाहु जनार्दन पुरवासियोंसे घिरे हुए नगरसे बाहर निकले ॥ ५५ ॥
तमन्वयाद् वानरवर्यकेतनः ससात्यकिर्माद्रवतीसुतावपि । अगाधबुद्धिर्विदुरश्च माधवं स्वयं च भीमो गजराजविक्रमः ॥ ५६ ॥
उस समय उन माधवके पीछे कपिध्वज अर्जुन, सात्यकि, नकुल सहदेव, अगाधबुद्धि विदुर और गजराजके समान पराक्रमी स्वयं भीमसेन भी कुछ दूरतक पहुँचानेके लिये गये ॥ ५६ ॥
निवर्तयित्वा कुरुराष्ट्रवर्धनां- स्ततः स सर्वान् विदुरं च वीर्यवान् । जनार्दनो दारुकमाह सत्वरः प्रचोदयाश्वानिति सात्यकिं तथा ॥ ५७ ॥
तदनन्तर पराक्रमी श्रीकृष्णने कौरवराज्यकी वृद्धि करनेवाले उन समस्त पाण्डवों तथा विदुरजीको लौटाकर दारुक तथा सात्यकिसे कहा- ' अब घोड़ोंको जोरसे हाँको ' ॥ ५७ ॥
ततो ययौ शत्रुगणप्रमर्दनः
शिनिप्रवीरानुगतो जनार्दनः ।
यथा निहत्यारिगणं शतक्रतु- र्दिवं तथाऽऽनर्तपुरीं प्रतापवान् ॥ ५८ ॥
तत्पश्चात् शिनिवीर सात्यकिको साथ लिये शत्रुदलमर्दन प्रतापी श्रीकृष्ण आनर्तपुरी द्वारकाकी ओर उसी प्रकार चल दिये, जैसे प्रतापी इन्द्र अपने शत्रुसमुदायका संहार करके स्वर्गमें जा रहे हों ॥ ५८ ॥
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इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि कृष्णप्रयाणे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकाको प्रस्थानविषयक बावनवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ५८३ श्लोक हैं )
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त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः मार्गमें श्रीकृष्णसे कौरवोंके विनाशकी बात सुनकर उत्तङ्ग मुनिका कुपित होना और श्रीकृष्णका उन्हें शान्त करना वैशम्पायन उवाच
तथा प्रयान्तं वार्ष्णेयं द्वारकां भरतर्षभाः ।
परिष्वज्य न्यवर्तन्त सानुयात्राः परंतपाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार द्वारका जाते हुए भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगाकर भरतवंशके श्रेष्ठ वीर शत्रुसंतापी पाण्डव अपने सेवकों - सहित पीछे लौटे ॥ १ ॥
पुनः पुनश्च वार्ष्णेयं पर्यष्वजत फाल्गुनः ।
आ चक्षुर्विषयाच्चैनं स ददर्श पुनः पुनः ॥ २ ॥
अर्जुनने वृष्णिवंशी प्यारे सखा श्रीकृष्णको बारंबार छातीसे लगाया और जबतक वे आँखोंसे ओझल नहीं हुए, तबतक उन्हींकी ओर वे बारंबार देखते रहे ॥ २ ॥
कृच्छ्रेणैव तु तां पार्थो गोविन्दे विनिवेशिताम् ।
संजहार ततो दृष्टिं कृष्णश्चाप्यपराजितः ॥ ३ ॥
जब रथ दूर चला गया, तब पार्थने बड़े कष्टसे श्रीकृष्णकी ओर लगी हुई अपनी दृष्टिको पीछे लौटाया । किसीसे पराजित न होनेवाले श्रीकृष्णकी भी यही दशा थी ॥ ३ ॥
तस्य प्रयाणे यान्यासन् निमित्तानि महात्मनः ।
बहून्यद्भुतरूपाणि तानि मे गदतः शृणु ॥ ४ ॥
महामना भगवान्की यात्राके समय जो बहुत -से अद्भुत शकुन प्रकट हुए, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥
वायुर्वेगेन महता रथस्य पुरतो ववौ ।
कुर्वन्निःशर्करं मार्गं विरजस्कमकण्टकम् ॥ ५ ॥
उनके रथके आगे बड़े वेगसे हवा आती और रास्तेकी धूल, कंकण तथा काँटोंको उड़ाकर अलग कर देती थी ॥ ५ ॥
ववर्ष वासवश्चैव तोयं शुचि सुगन्धि च ।
दिव्यानि चैव पुष्पाणि पुरतः शार्ङ्गधन्वनः ॥ ६ ॥
इन्द्र श्रीकृष्णके सामने पवित्र एवं सुगन्धित जल तथा दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करते थे ॥ ६ ॥
स प्रयातो महाबाहुः समेषु मरुधन्वसु ।