06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1951–1960
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1951–1960
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धनुषः पततस्तस्य सव्यसाचिकराद् विभो ।
बभूव सदृशं रूपं शक्रचापस्य भारत ॥ २३ ॥
प्रभो! भरतनन्दन! अर्जुनके हाथसे गिरते हुए उस धनुषका रूप इन्द्रधनुषके समान प्रतीत होता था ॥ २३ ॥
तस्मिन् निपतिते दिव्ये महाधनुषि पार्थिवः ।
जहास सस्वनं हासं धृतवर्मा महाहवे ॥ २४ ॥
उस दिव्य महाधनुषके गिर जानेपर महासमरमें खड़ा हुआ धृतवर्मा ठहाका मारकर जोर- जोरसे हँसने लगा ॥ २४ ॥
ततो रोषार्दितो जिष्णुः प्रमृज्य रुधिरं करात् ।
धनुरादत्त तद् दिव्यं शरवर्षैर्ववर्ष च ॥ २५ ॥
इससे अर्जुनका रोष बढ़ गया । उन्होंने हाथसे रक्त पोंछकर उस दिव्य धनुषको पुनः उठा लिया और धृतवर्मापर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २५ ॥
ततो हलहलाशब्दो दिवस्पृगभवत् तदा ।
नानाविधानां भूतानां तत्कर्माणि प्रशंसताम् ॥ २६ ॥
फिर तो अर्जुनके उस पराक्रमकी प्रशंसा करते हुए नाना प्रकारके प्राणियोंका कोलाहल समूचे आकाशमें व्याप्त हो गया ॥ २६ ॥
ततः सम्प्रेक्ष्य संक्रुद्धं कालान्तकयमोपमम् ।
जिष्णुं त्रैगर्तका योधाः परीताः पर्यवारयन् ॥ २७ ॥
अर्जुनको काल, अन्तक और यमराजके समान कुपित हुआ देख त्रिगर्तदेशीय योद्धाओंने चारों ओरसे आकर उन्हें घेर लिया ॥ २७ ॥
अभिसृत्य परीप्सार्थं ततस्ते धृतवर्मणः ।
परिवव्रुर्गुडाकेशं तत्राक्रुद्ध्यद् धनंजयः ॥ २८ ॥
धृतवर्माकी रक्षाके लिये सहसा आक्रमण करके त्रिगर्तोंने गुडाकेश अर्जुनको जब सब ओरसे घेर लिया, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ ॥ २८ ॥
ततो योधान् जघानाशु तेषां स दश चाष्ट च ।
महेन्द्रवज्रप्रतिमैरायसैर्बहुभिः शरैः ॥ २ ९ ॥
फिर तो उन्होंने इन्द्रके वज्रकी भाँति दुस्सह लौहनिर्मित बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बात-की- बातमें उनके अठारह प्रमुख योद्धाओंको यमलोक पहुँचा दिया ॥ २ ९ ॥
तान् सम्प्रभग्नान् सम्प्रेक्ष्य त्वरमाणो धनंजयः ।
शरैराशीविषाकारैर्जघान स्वनवद्धसन् ॥ ३० ॥
तब तो त्रिगर्तोंमें भगदड़ मच गयी । उन्हें भागते देख अर्जुनने जोर- जोरसे हँसते हुए बड़ी उतावलीके साथ सर्पाकार बाणोंद्वारा उन सबको मारना आरम्भ किया ॥ ३० ॥
ते भग्नमनसः सर्वे त्रैगर्तकमहारथाः ।
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दिशोऽभिदुद्रुवू राजन् धनंजयशरार्दिताः ॥ ३१ ॥
राजन्! धनंजयके बाणोंसे पीड़ित हुए समस्त त्रिगर्तदेशीय महारथियोंका युद्धविषयक उत्साह नष्ट हो गया; अतः वे चारों दिशाओंमें भाग चले ॥ ३१ ॥
तमूचुः पुरुषव्याघ्रं संशप्तकनिषूदनम् ।
तवास्म किंकराः सर्वे सर्वे वै वशगास्तव ॥ ३२ ॥
उनमेंसे कितने ही संशप्तकसूदन पुरुषसिंह अर्जुनसे इस प्रकार कहने लगे —' कुन्तीनन्दन! हम सब आपके आज्ञाकारी सेवक हैं और सभी सदा आपके अधीन रहेंगे ॥ ३२ ॥
आज्ञापयस्व नः पार्थ प्रह्वान् प्रेष्यानवस्थितान् ।
करिष्यामः प्रियं सर्वं तव कौरवनन्दन ॥ ३३ ॥
‘ पार्थ! हम सभी सेवक विनीत भावसे आपके सामने खड़े हैं । आप हमें आज्ञा दें ।
कौरवनन्दन! हम सब लोग आपके समस्त प्रिय कार्य सदा करते रहेंगे ' ॥ ३३ ॥
एतदाज्ञाय वचनं सर्वांस्तानब्रवीत् तदा ।
जीवितं रक्षत नृपाः शासनं प्रतिगृह्यताम् ॥ ३४ ॥
उनकी ये बातें सुनकर अर्जुनने उनसे कहा – ' राजाओ! अपने प्राणोंकी रक्षा करो ।
इसका एक ही उपाय है, हमारा शासन स्वीकार कर लो ' ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि त्रिगर्तपराभवे चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें त्रिगर्तोंकी पराजयविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ७४ ॥
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पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः अर्जुनका प्राग्ज्योतिषपुरके राजा वज्रदत्तके साथ युद्ध वैशम्पायन उवाच
प्राग्ज्योतिषमथाभ्येत्य व्यचरत् स हयोत्तमः ।
भगदत्तात्मजस्तत्र निर्ययौ रणकर्कशः ॥ १ ॥
स हयं पाण्डुपुत्रस्य विषयान्तमुपागतम् ।
युयुधे भरतश्रेष्ठ वज्रदत्तो महीपतिः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर वह उत्तम अश्व प्राग्ज्योतिषपुरके पास पहुँचकर विचरने लगा । वहाँ भगदत्तका पुत्र वज्रदत्त राज्य करता था, जो युद्धमें बड़ा ही कठोर था । भरतश्रेष्ठ! जब उसे पता लगा कि पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरका अश्व मेरे राज्यकी सीमामें आ गया है, तब राजा वज्रदत्त नगरसे बाहर निकला और युद्धके लिये तैयार हो गया ॥ १-२ ॥
सोऽभिनिर्याय नगराद् भगदत्तसुतो नृपः ।
अश्वमायान्तमुन्मथ्य नगराभिमुखो ययौ ॥३ ॥
नगरसे निकलकर भगदत्तकुमार राजा वज्रदत्तने अपनी ओर आते हुए घोड़ेको बलपूर्वक पकड़ लिया और उसे साथ लेकर वह नगरकी ओर चला ॥ ३ ॥
तमालक्ष्य महाबाहुः कुरूणामृषभस्तदा ।
गाण्डीवं विक्षिपंस्तूर्णं सहसा समुपाद्रवत् ॥ ४ ॥
उसको ऐसा करते देख कुरुश्रेष्ठ महाबाहु अर्जुनने गाण्डीव धनुषपर टंकार देते हुए सहसा वेगपूर्वक उसपर धावा किया ॥ ४ ॥
ततो गाण्डीवनिर्मुक्तैरिषुभिर्मोहितो नृपः ।
हयमुत्सृज्य तं वीरस्ततः पार्थमुपाद्रवत् ॥ ५ ॥
पुनः प्रविश्य नगरं दंशितः स नृपोत्तमः ।
आरुह्य नागप्रवरं निर्ययौ रणकर्कशः ॥ ६ ॥
गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंके प्रहारसे व्याकुल हो वीर राजा वज्रदत्तने उस घोड़ेको तो छोड़ दिया और स्वयं पुनः नगरमें प्रवेश करके कवच आदिसे सुसज्जित हो एक श्रेष्ठ गजराजपर चढ़कर वह रणकर्कश नरेश युद्धके लिये बाहर निकला । आते ही उसने पार्थपर धावा बोल दिया ॥ ५-६ ॥
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ।
दोधूयता चामरेण श्वेतेन च महारथः ॥ ७ ॥
ततः पार्थं समासाद्य पाण्डवानां महारथम् ।
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आह्वयामास बीभत्सुं बाल्यान्मोहाच्च संयुगे ॥ ८ ॥
उसने मस्तकपर श्वेत छत्र धारण कर रखा था । सेवक श्वेत चवँर खुला रहे थे । पाण्डव महारथी पार्थके पास पहुँचकर उस महारथी नरेशने बालचापल्य और मूर्खताके कारण उन्हें युद्धके लिये ललकारा ॥ ७-८ ॥
स वारणं नगप्रख्यं प्रभिन्नकरटामुखम् ।
प्रेषयामास संक्रुद्धः श्वेताश्वं प्रति पार्थिवः ॥ ९ ॥
क्रोधमें भरे हुए राजा वज्रदत्तने श्वेतवाहन अर्जुनकी ओर अपने पर्वताकार विशालकाय गजराजको, जिसके गण्डस्थलसे मदकी धारा बह रही थी, बढ़ाया ॥ ९ ॥
विक्षरन्तं महामेघं परवारणवारणम् ।
शास्त्रवत् कल्पितं संख्ये विवशं युद्धदुर्मदम् ॥ १० ॥
वह महान् मेघके समान मदकी वर्षा करता था । शत्रुपक्षके हाथियोंको रोकनेमें समर्थ था । उसे शास्त्रीय विधिके अनुसार युद्धके लिये तैयार किया गया था । वह स्वामीके अधीन रहनेवाला और युद्धमें दुर्धर्ष था ॥ १० ॥
प्रचोद्यमानः स गजस्तेन राज्ञा महाबलः ।
तदाङ्कुशेन विबभावुत्पतिष्यन्निवाम्बरम् ॥ ११ ॥
राजा वज्रदत्तने जब अंकुशसे मारकर उस महाबली हाथीको आगे बढ़नेके लिये प्रेरित किया, तब वह इस तरह आगेकी ओर झपटा, मानो वह आकाशमें उड़ जायगा ॥ ११ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य क्रुद्धो राजन् धनंजयः ।
भूमिष्ठो वारणगतं योधयामास भारत ॥ १२ ॥
राजन्! भरतनन्दन! उसे इस प्रकार आक्रमण करते देख अर्जुन कुपित हो उठे । वे पृथ्वीपर स्थित होते हुए भी हाथीपर चढ़े हुए वज्रदत्तके साथ युद्ध करने लगे ॥ १२ ॥
वज्रदत्तस्ततः क्रुद्धो मुमोचाशु धनंजये ।
तोमरानग्निसंकाशान् शलभानिव वेगितान् ॥ १३ ॥
उस समय वज्रदत्तने कुपित होकर तुरंत ही अर्जुनपर अग्निके समान प्रज्वलित तोमर चलाये, जो वेगसे उड़नेवाले पतंगोंके समान जान पड़ते थे ॥ १३ ॥
अर्जुनस्तानसम्प्राप्तान् गाण्डीवप्रभवैः शरैः ।
द्विधा त्रिधा च चिच्छेद ख एव खगमैस्तदा ॥ १४ ॥
वे तोमर अभी पास भी नहीं आने पाये थे कि अर्जुनने गाण्डीव धनुषद्वारा छोड़े गये आकाशचारी बाणोंद्वारा आकाशमें ही एक-एक तोमरके दो-दो, तीन-तीन टुकड़े कर डाले ॥ १४ ॥
स तान् दृष्ट्वा तथा छिन्नांस्तोमरान् भगदत्तजः ।
इषूनसक्तांस्त्वरितः प्राहिणोत् पाण्डवं प्रति ॥ १५ ॥
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इस प्रकार उन तोमरोंके टुकड़े - टुकड़े हुए देख भगदत्तके पुत्रने पाण्डुनन्दन अर्जुनपर शीघ्रतापूर्वक लगातार बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १५ ॥
ततोऽर्जुनस्तूर्णतरं रुक्मपुङ्खानजिह्मगान् ।
प्रेषयामास संक्रुद्धो भगदत्तात्मजं प्रति ॥ १६ ॥
स तैर्विद्धो महातेजा वज्रदत्तो महामृधे ।
भृशाहतः पपातोर्व्यां न त्वेनमजहात् स्मृतिः ॥ १७ ॥
तब कुपित हुए अर्जुनने तुरंत ही सोनेके पंखोंसे युक्त सीधे जानेवाले बाण वज्रदत्तपर चलाये । उन बाणोंसे अत्यन्त आहत और घायल होकर उस महासमरमें महातेजस्वी वज्रदत्त हाथीकी पीठसे पृथ्वीपर गिर पड़ा; परंतु इतनेपर भी वह बेहोश नहीं हुआ ॥ १६-१७ ॥
ततः स पुनरारुह्य वारणप्रवरं रणे ।
अव्यग्रः प्रेषयामास जयार्थी विजयं प्रति ॥ १८ ॥
तदनन्तर वज्रदत्तनें पुनः उस श्रेष्ठ गजराजपर आरूढ़ हो रणभूमिमें बिना किसी घबराहटके विजयकी अभिलाषा रखकर अर्जुनकी ओर उस हाथीको बढ़ाया ॥ १८ ॥
तस्मै बाणांस्ततो जिष्णुर्निर्मुक्ताशीविषोपमान् ।
प्रेषयामास संक्रुद्धो ज्वलितज्वलनोपमान् ॥ १९ ॥
यह देख अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ । उन्होंने उस हाथीके ऊपर केंचुलसे निकले हुए सर्पोंके समान भयंकर तथा प्रज्वलित अग्निके तुल्य तेजस्वी बाणोंका प्रहार किया ॥ २ ९ ॥
स तैर्विद्धो महानागो विस्रवन् रुधिरं वभौ ।
गैरिकाक्तमिवाम्भोऽद्रिर्बहुप्रस्रवणं तदा ॥ २० ॥
उन बाणोंसे घायल होकर वह महानाग खूनकी धारा बहाने लगा । उस समय वह गेरूमिश्रित जलकी धारा बहानेवाले अनेक झरनोंसे युक्त पर्वतके समान जान पड़ता था ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वज्रदत्तयुद्धे पञ्चसप्ततिमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अर्जुनका वज्रदत्तके साथ युद्धविषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥
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षट्सप्ततितमोऽध्यायः अर्जुनके द्वारा वज्रदत्तकी पराजय वैशम्पायन उवाच
एवं त्रिरात्रमभवत् तद् युद्धं भरतर्षभ ।
अर्जुनस्य नरेन्द्रेण वृत्रेणेव शतक्रतोः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! जैसे इन्द्रका वृत्रासुरके साथ युद्ध हुआ था, उसी प्रकार अर्जुनका राजा वझदत्तके साथ तीन दिन तीन रात युद्ध होता रहा ॥ १ ॥
ततश्चतुर्थे दिवसे वज्रदत्तो महाबलः ।
जहास सस्वनं हासं वाक्यं चेदमथाब्रवीत् ॥ २ ॥
तदनन्तर चौथे दिन महाबली वज्रदत्त ठहाका मारकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला - ॥ २ ॥
अर्जुनार्जुन तिष्ठस्व न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ।
त्वां निहत्य करिष्यामि पितुस्तोयं यथाविधि ॥ ३ ॥
‘ अर्जुन! अर्जुन! खड़े रहो । आज मैं तुम्हें जीवित नहीं छोडूंगा । तुम्हें मारकर पिताका विधिपूर्वक तर्पण करूँगा ॥ ३ ॥
त्वया वृद्धो मम पिता भगदत्तः पितुः सखा ।
तो वृद्धो मम पिता शिशुं मामद्य योधय ॥ ४ ॥
' मेरे वृद्ध पिता भगदत्त तुम्हारे बापके मित्र थे, तो भी तुमने उनकी हत्या की । मेरे पिता बूढ़े थे, इसलिये तुम्हारे हाथसे मारे गये । आज उनका बालक मैं तुम्हारे सामने उपस्थित हूँ; मेरे साथ युद्ध करो ' ॥ ४ ॥
इत्येवमुक्त्वा संक्रुद्धो वज्रदत्तो नराधिपः ।
प्रेषयामास कौरव्य वारणं पाण्डवं प्रति ॥ ५ ॥
कुरुनन्दन! ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए राजा वज्रदत्तने पुनः पाण्डुपुत्र अर्जुनकी ओर अपने हाथीको हाँक दिया ॥ ५ ॥
सम्प्रेष्यमाणो नागेन्द्रो वज्रदत्तेन धीमता ।
उत्पतिष्यन्निवाकाशमभिदुद्राव पाण्डवम् ॥ ६ ॥
बुद्धिमान् वज्रदत्तके द्वारा हाँके जानेपर वह गजराज पाण्डुपुत्र अर्जुनकी ओर इस प्रकार दौड़ा, मानो आकाशमें उड़ जाना चाहता हो ॥ ६ ॥
अग्रहस्तसुमुक्तेन शीकरेण स नागराट् ।
समौक्षत गुडाकेशं शैलं नीलमिवाम्बुदः ॥ ७ ॥
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उस गजराजने अपनी सूँडसे छोड़े गये जलकणोंद्वारा गुडाकेश अर्जुनको भिगो दिया ।
मानो मेघने नील पर्वतपर जलके फुहारे डाल दिये हों ॥ ७ ॥
स तेन प्रेषितो राज्ञा मेघवद् विनदन् मुहुः ।
मुखाडम्बरसंह्रादैरभ्यद्रवत फाल्गुनम् ॥ ८ ॥
राजासे प्रेरित होकर बारंबार मेघके समान गम्भीर गर्जना करता हुआ वह हाथी अपने मुखके चीत्कारपूर्ण कोलाहलके साथ अर्जुनपर टूट पड़ा ॥ ८ ॥
स नृत्यन्निव नागेन्द्रो वज्रदत्तप्रचोदितः ।
आससाद द्रुतं राजन् कौरवाणां महारथम् ॥ ९ ॥
राजन्! वज्रदत्तका हाँका हुआ वह गजराज नृत्य- सा करता हुआ तुरंत कौरव महारथी अर्जुनके पास जा पहुँचा ॥ ९ ॥
तमायान्तमथालक्ष्य वज्रदत्तस्य वारणम् ।
गाण्डीवमाश्रित्य बली न व्यकम्पत शत्रुहा ॥ १० ॥
वज्रदत्तके उस हाथीको आते देख शत्रुओंका संहार करनेवाले बलवान् अर्जुन गाण्डीवका सहारा लेकर तनिक भी विचलित नहीं हुए ॥ १० ॥
चुक्रोध बलवच्चापि पाण्डवस्तस्य भूपतेः ।
कार्यविघ्नमनुस्मृत्य पूर्ववैरं च भारत ॥ ११ ॥
भरतनन्दन! वज्रदत्तके कारण जो कार्यमें विघ्न पड़ रहा था, उसको तथा पहलेके वैरको याद करके पाण्डुपुत्र अर्जुन उस राजापर अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ ११ ॥
ततस्तं वारणं क्रुद्धः शरजालेन पाण्डवः ।
निवारयामास तदा वेलेव मकरालयम् ॥ १२ ॥
क्रोधमें भरे हुए पाण्डुकुमार अर्जुनने अपने बाणसमूहोंद्वारा उस हाथीको उसी तरह रोक दिया, जैसे तटकी भूमि उमड़ते हुए समुद्रको रोक देती है ॥ १२ ॥
स नागप्रवरः श्रीमानर्जुनेन निवारितः ।
तस्थौ शरैर्विनुन्नाङ्गः श्वाविच्छललितो यथा ॥ १३ ॥
उसके सारे अंगोंमें बाण धँसे हुए थे । अर्जुनके द्वारा रोका गया वह शोभाशाली गजराज काँटोंवाली साहीके समान खड़ा हो गया ॥ १३ ॥
निवारितं गजं दृष्ट्वा भगदत्तसुतो नृपः ।
उत्ससर्ज शितान् बाणानर्जुनं क्रोधमूर्च्छितः ॥ १४ ॥
अपने हाथीको रोका गया देख भगदत्तकुमार राजा वज्रदत्त क्रोधसे व्याकुल हो उठा और अर्जुनपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ १४ ॥
अर्जुनस्तु महाबाहुः शरैररिनिघातिभिः ।
वारयामास तान् बाणांस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १५ ॥
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परंतु महाबाहु अर्जुनने अपने शत्रुघाती सायकोंद्वारा उन सारे बाणोंको पीछे लौटा दिया । वह एक अद्भुत- सी घटना हुई ॥ १५ ॥
ततः पुनरभिक्रुद्धो राजा प्राग्ज्योतिषाधिपः ।
प्रेषयामास नागेन्द्रं बलवत् पर्वतोपमम् ॥ १६ ॥
तब प्राग्ज्योतिषपुरके स्वामी राजा वज्रदत्तने अत्यन्त कुपित हो अपने पर्वताकार गजराजको पुनः बलपूर्वक आगे बढ़ाया ॥ १६ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य बलवत् पाकशासनिः ।
नाराचमग्निसंकाशं प्राहिणोद् वारणं प्रति ॥ १७ ॥
उसे बलपूर्वक आक्रमण करते देख इन्द्रकुमार अर्जुनने उस हाथीके ऊपर एक अग्निके समान तेजस्वी नाराच चलाया ॥ १७ ॥
स तेन वारणो राजन् मर्मस्वभिहतो भृशम् ।
पपात सहसा भूमौ वज्ररुग्ण इवाचलः ॥ १८ ॥
राजन्! उस नाराचने हाथीके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी । वह वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति सहसा पृथ्वीपर ढह पड़ा ॥ १८ ॥
स पतन् शुशुभे नागो धनंजयशराहतः ।
विशन्निव महाशैलो महीं वज्रप्रपीडितः ॥ १ ९ ॥
अर्जुनके बाणोंसे घायल होकर गिरता हुआ वह हाथी ऐसी शोभा पाने लगा, मानो वज्रके आघातसे अत्यन्त पीड़ित हुआ महान् पर्वत पृथ्वीमें समा जाना चाहता हो ॥ १ ९ ॥
तस्मिन् निपतिते नागे वज्रदत्तस्य पाण्डवः ।
तं न भेतव्यमित्याह ततो भूमिगतं नृपम् ॥ २० ॥
वज्रदत्तके उस हाथीके धराशायी होते ही राजा वज्रदत्त स्वयं भी पृथ्वीपर जा पड़ा । उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुनने उससे कहा — ‘ राजन्! तुम्हें डरना नहीं चाहिये ' ॥ २० ॥
अब्रवीद्धि महातेजाः प्रस्थितं मां युधिष्ठिरः ।
राजानस्ते न हन्तव्या धनंजय कथंचन ॥ २१ ॥
जब मैं घरसे प्रस्थित हुआ, उस समय महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरने मुझसे कहा —'धनंजय! तुम्हें किसी तरह भी राजाओंका वध नहीं करना चाहिये ' ॥ २१ ॥
सर्वमेतन्नरव्याघ्र भवत्येतावता कृतम् ।
योधाश्चापि न हन्तव्या धनंजय रणे त्वया ॥ २२ ॥
“ पुरुषसिंह! इतना करनेसे सब कुछ हो जायगा । अर्जुन! तुम्हें युद्ध ठानकर योद्धाओंका वध कदापि नहीं करना चाहिये ॥ २२ ॥
वक्तव्याश्चापि राजानः सर्वे सहसुहृज्जनैः ।
युधिष्ठिरस्याश्वमेधो भवद्भिरनुभूयताम् ॥ २३ ॥
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' तुम सभी राजाओंसे कह देना कि आप सब लोग अपने सुहृदोंके साथ पधारें और युधिष्ठिरके अश्वमेधयज्ञ - सम्बन्धी उत्सवका आनन्द लें ' ॥ २३ ॥
इति भ्रातृवचः श्रुत्वा न हन्मि त्वां नराधिप ।
उत्तिष्ठ न भयं तेऽस्ति स्वस्तिमान् गच्छ पार्थिव ॥ २४ ॥
‘ नरेश्वर! भाईके इस वचनको सुनकर इसे शिरोधार्य करके मैं तुम्हें मार नहीं रहा हूँ ।
भूपाल! उठो, तुम्हें कोई भय नहीं है । तुम सकुशल अपने घरको लौट जाओ ॥ २४ ॥
आगच्छेथा महाराज परां चैत्रीमुपस्थिताम् ।
यदाश्वमेधो भविता धर्मराजस्य धीमतः ॥ २५ ॥
‘ महाराज! आगामी चैत्रमासकी उत्तम पूर्णिमा तिथि उपस्थित होनेपर तुम हस्तिनापुरमें आना । उस समय बुद्धिमान् धर्मराजका वह उत्तम यज्ञ होगा ' ॥ २५ ॥
एवमुक्तः स राजा तु भगदत्तात्मजस्तदा ।
तथेत्येवाब्रवीद्वाक्यं पाण्डवेनाभिनिर्जितः ॥ २६ ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर उनसे परास्त हुए भगदत्तकुमार राजा वज्रदत्तने कहा — ‘ बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा' ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वज्रदत्तपराजये षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें वज्रदत्तकी पराजयविषयकछिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥
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सप्तसप्ततितमोऽध्यायः अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध वैशम्पायन उवाच (जित्वा प्रसाद्य राजानं भगदत्तसुतं तदा । विसृज्य याते तुरगे सैन्धवान् प्रति भारत ॥ )
सैन्धवैरभवद् युद्धं ततस्तस्य किरीटिनः ।
हतशेषैर्महाराज हतानां च सुतैरपि ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतनन्दन! महाराज भगदत्तके पुत्र राजा वज्रदत्तको पराजित और प्रसन्न करनेके पश्चात् उसे विदा करके जब अर्जुनका घोड़ा सिंधुदेशमें गया, तब महाभारत - युद्धमें मरनेसे बचे हुए सिंधुदेशीय योद्धाओं तथा मारे गये राजाओंके पुत्रोंके साथ किरीटधारी अर्जुनका घोर संग्राम हुआ ॥ १ ॥
तेऽवतीर्णमुपश्रुत्य विषयं श्वेतवाहनम् ।
प्रत्युद्ययुरमृष्यन्तो राजानः पाण्डवर्षभम् ॥ २ ॥
यज्ञके घोड़ेको और श्वेतवाहन अर्जुनको अपने राज्यके भीतर आया हुआ सुनकर वे सिंधुदेशीय क्षत्रिय अमर्षमें भरकर उन पाण्डवप्रवर अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ २ ॥
अश्वं च तं परामृश्य विषयान्ते विषोपमाः ।
न भयं चक्रिरे पार्थाद् भीमसेनादनन्तरात् ॥ ३ ॥
वे विषके समान भयंकर क्षत्रिय अपने राज्यके भीतर आये हुए उस घोड़ेको पकड़कर भीमसेनके छोटे भाई अर्जुनसे तनिक भी भयभीत नहीं हुए ॥ ३ ॥
तेऽविदूराद् धनुष्पाणिं यज्ञियस्य हयस्य च ।
बीभत्सुं प्रत्यपद्यन्त पदातिनमवस्थितम् ॥ ४ ॥
यज्ञसम्बन्धी घोड़ेसे थोड़ी ही दूरपर अर्जुन हाथमें धनुष लिये पैदल ही खड़े थे । वे सभी क्षत्रिय उनके पास जा पहुँचे ॥ ४ ॥
ततस्ते तं महावीर्या राजानः पर्यवारयन् ।
जिगीषन्तो नरव्याघ्रं पूर्वं विनिकृता युधि ॥ ५ ॥
वे महापराक्रमी क्षत्रिय पहले युद्धमें अर्जुनसे परास्त हो चुके थे और अब उन पुरुषसिंह
पार्थको जीतना चाहते थे । अतः उन सबने उन्हें घेर लिया ॥ ५ ॥
ते नामान्यपि गोत्राणि कर्माणि विविधानि च ।
कीर्तयन्तस्तदा पार्थं शरवर्षैरवाकिरन् ॥ ६ ॥