श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1961–1970
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1961–1970
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वे अर्जुनसे अपने नाम, गोत्र और नाना प्रकारके कर्म बताते हुए उनपर बाणोंकी बौछार करने लगे ॥ ६ ॥
ते किरन्तः शरव्रातान् वारणप्रतिवारणान् ।
रणे जयमभीप्सन्तः कौन्तेयं पर्यवारयन् ॥ ७ ॥
वे ऐसे बाणसमूहोंकी वर्षा करते थे, जो हाथियोंको भी आगे बढ़नेसे रोक देनेवाले थे ।
उन्होंने रणभूमिमें विजयकी अभिलाषा रखकर कुन्तीकुमारको घेर लिया ॥ ७ ॥
ते समीक्ष्य च तं कृष्णमुग्रकर्माणमाहवे ।
सर्वे युयुधिरे वीरा रथस्थास्तं पदातिनम् ॥ ८ ॥
युद्धमें भयानक कर्म करनेवाले अर्जुनको पैदल देखकर वे सभी वीर रथपर आरूढ़ हो उनके साथ युद्ध करने लगे ॥ ८ ॥
ते तमाजघ्निरे वीरं निवातकवचान्तकम् ।
संशप्तकनिहन्तारं हन्तारं सैन्धवस्य च ॥ ९ ॥
निवातकवचोंका विनाश, संशप्तकोंका संहार और जयद्रथका वध करनेवाले वीर अर्जुनपर स्वैन्धवोंने सब ओरसे प्रहार आरम्भ कर दिया ॥ ९ ॥
ततो रथसहस्रेण हयानामयुतेन च ।
कोष्ठकीकृत्य बीभत्सुं प्रहृष्टमनसोऽभवन् ॥ १० ॥
एक हजार रथ और दस हजार घोड़ोंसे अर्जुनको घेरकर उन्हें कोष्ठबद्ध - सा करके वे मन- ही - मन बड़े प्रसन्न हो रहे थे ॥ १० ॥
तं स्मरन्तो वधं वीराः सिन्धुराजस्य चाहवे ।
जयद्रथस्य कौरव्य समरे सव्यसाचिना ॥ ११ ॥
कुरुनन्दन! कुरुक्षेत्रके समराङ्गणमें सव्यसाची अर्जुनके द्वारा जो सिंधुराज जयद्रथका वध हुआ था, उसकी याद उन वीरोंको कभी भूलती नहीं थी ॥ ११ ॥
ततः पर्जन्यवत् सर्वे शरवृष्टीरवासृजन् ।
तैः कीर्णः शुशुभे पार्थो रविर्मेघान्तरे यथा ॥ १२ ॥
वे सब योद्धा मेघके समान अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे । उन बाणोंसे आच्छादित होकर कुन्ती -नन्दन अर्जुन बादलोंमें छिपे हुए सूर्यकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ १२ ॥
स शरैः समवच्छन्नश्चकाशे पाण्डवर्षभः ।
पञ्चरान्तरसंचारी शकुन्त इव भारत ॥ १३ ॥
भरतनन्दन! बाणोंसे आच्छादित हुए पाण्डवप्रवर अर्जुन पींजड़ेके भीतर फुदकनेवाले पक्षीकी भाँति जान पड़ते थे ॥ १३ ॥
ततो हाहाकृतं सर्वं कौन्तेये शरपीडिते ।
त्रैलोक्यमभवद् राजन् रविरासीच्च निष्प्रभः ॥ १४ ॥
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राजन्! कुन्तीकुमार अर्जुन जब इस प्रकार बाणोंसे पीड़ित हो गये, तब उनकी ऐसी अवस्था देख त्रिलोकी हाहाकार कर उठी और सूर्यदेवकी प्रभा फीकी पड़ गयी ॥ १४ ॥
ततो ववौ महाराज मारुतो लोमहर्षणः ।
राहुरग्रसदादित्यं युगपत् सोममेव च ॥ १५ ॥
महाराज! उस समय रोंगटे खड़े कर देनेवाली प्रचण्ड वायु चलने लगी | राहुने एक ही समय सूर्य और चन्द्रमा दोनोंको ग्रस लिये ॥ १५ ॥
उल्काश्च जघ्निरे सूर्यं विकीर्यन्त्यः समन्ततः ।
वेपथुश्चाभवद् राजन् कैलासस्य महागिरेः ॥ १६ ॥
चारों ओर बिखरकर गिरती हुई उल्काएँ सूर्यसे टकराने लगीं । राजन्! उस समय महापर्वत कैलास भी काँपने लगा ॥ १६ ॥
मुमुचुः श्वासमत्युष्णं दुःखशोकसमन्विताः ।
सप्तर्षयो जातभयास्तथा देवर्षयोऽपि च ॥ १७ ॥
सप्तर्षियों और देवर्षियोंको भी भय होने लगा । | वे दुःख और शोकसे संतप्त हो अत्यन्त गरम - गरम साँस छोड़ने लगे ॥ १७ ॥
शशं चाशु विनिर्भिद्य मण्डलं शशिनोऽपतत् ।
विपरीता दिशश्चापि सर्वा धूमाकुलास्तथा ॥ १८ ॥
पूर्वोक्त उल्काएँ चन्द्रमामें स्थित हुए शश-चिह्नका भेदन करके चन्द्रमण्डलके चारों ओर गिरने लगीं । सम्पूर्ण दिशाएँ धूमाच्छन्न होकर विपरीत प्रतीत होने लगीं ॥ १८ ॥
रासभारुणसंकाशा धनुष्मन्तः सविद्युतः ।
आवृत्य गगनं मेघा मुमुचुर्मांसशोणितम् ॥ १ ९ ॥
गधेके समान रंग और लाल रंगके सम्मिश्रणसे जो रंग हो सकता है, वैसे वर्णवाले मेघ आकाशको घेरकर रक्त और मांसकी वर्षा करने लगे । उनमें इन्द्रधनुषका भी दर्शन होता था और बिजलियाँ भी कौंधती थीं ॥ १ ९ ॥
एवमासीत् तदा वीरे शरवर्षेण संवृते ।
फाल्गुने भरतश्रेष्ठ तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! वीर अर्जुनके उस समय शत्रुओंकी बाण- वर्षासे आच्छादित हो जानेपर
ऐसे - ऐसे उत्पात प्रकट होने लगे । वह अद्भुत- सी बात हुई ॥ २० ॥
तस्य तेनावकीर्णस्य शरजालेन सर्वतः ।
मोहात् पपात गाण्डीवमावापश्च करादपि ॥ २१ ॥
उस बाणसमूहके द्वारा सब ओरसे आच्छादित हुए अर्जुनपर मोह छा गया । उस समय उनके हाथसे गाण्डीव धनुष और दस्ताने गिर पड़े ॥ २१ ॥
तस्मिन् मोहमनुप्राप्ते शरजालं महत् तदा ।
सैन्धवा मुमुचुस्तूर्णं गतसत्त्वे महारथे ॥ २२ ॥
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महारथी अर्जुन जब मोहग्रस्त एवं अचेत हो गये, उस समय भी सिंधुदेशीय योद्धा उनपर वेगपूर्वक महान् बाणसमूहकी वर्षा करते रहे ॥ २२ ॥
ततो मोहसमापन्नं ज्ञात्वा पार्थं दिवौकसः ।
सर्वे वित्रस्तमनसस्तस्य शान्तिकृतोऽभवन् ॥ २३ ॥
अर्जुनको मोहके वशीभूत हुआ जान सम्पूर्ण देवता मन- ही- मन संत्रस्त हो गये और उनके लिये शान्तिका उपाय करने लगे ॥ २३ ॥
ततो देवर्षयः सर्वे तथा सप्तर्षयोऽपि च ।
ब्रह्मर्षयश्च विजयं जेपुः पार्थस्य धीमतः ॥ २४ ॥
फिर तो समस्त देवर्षि, सप्तर्षि और ब्रह्मर्षि मिलकर बुद्धिमान् अर्जुनकी विजयके लिये मन्त्र जप करने लगे ॥ २४ ॥
ततः प्रदीपिते देवैः पार्थतेजसि पार्थिव ।
तस्थावचलवद् धीमान् संग्रामे परमास्त्रवित् ॥ २५ ॥
पृथ्वीनाथ! तदनन्तर देवताओंके प्रयत्नसे अर्जुनका तेज पुनः उद्दीप्त हो उठा और उत्तम अस्त्र - विद्याके ज्ञाता परम बुद्धिमान् धनंजय संग्रामभूमिमें पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हो गये ॥ २५ ॥
विचकर्ष धनुर्दिव्यं ततः कौरवनन्दनः ।
यन्त्रस्येवेह शब्दोऽभून्महांस्तस्य पुनः पुनः ॥ २६ ॥
फिर तो कौरवनन्दन अर्जुनने अपने दिव्य धनुषकी प्रत्यंचा खींची । उस समय उससे बार- बार मशीनकी तरह बड़े जोर- जोरसे टंकार- ध्वनि होने लगी ॥ २६ ॥
ततः स शरवर्षाणि प्रत्यमित्रान् प्रति प्रभुः ।
ववर्ष धनुषा पार्थो वर्षाणीव पुरंदरः ॥ २७ ॥
इसके बाद जैसे इन्द्र पानीकी वर्षा करते हैं, उसी तरह प्रभावशाली पार्थने अपने धनुषद्वारा शत्रुओंपर बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ २७ ॥
ततस्ते सैन्धवा योधाः सर्व एव सराजकाः ।
नादृश्यन्त शरैः कीर्णाः शलभैरिव पादपाः ॥ २८ ॥
फिर तो पार्थके बाणोंसे आच्छादित हो समस्त सैन्धव योद्धा टिड्डियोंसे ढँके हुए वृक्षोंकी भाँति अपने राजासहित अदृश्य हो गये ॥ २८ ॥
तस्य शब्देन वित्रेसुर्भयार्ताश्च विदुद्रुवुः ।
मुमुचुश्चाश्रु शोकार्ताः शुशुचुश्चापि सैन्धवाः ॥ २ ९ ॥
कितने ही गाण्डीवकी टंकार- ध्वनिसे ही थर्रा उठे । बहुतेरे भयसे व्याकुल होकर भाग गये और अनेक सैन्धव योद्धा शोकसे आतुर होकर आँसू बहाने एवं शोक करने लगे ॥ २ ९ ॥ तांस्तु सर्वान् नरव्याघ्रः सैन्धवान् व्यचरद् बली ।
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अलातचक्रवद् राजन् शरजालैः समार्पयत् ॥ ३० ॥
राजन्! उस समय महाबली पुरुषसिंह अर्जुन अलातचक्रकी भाँति घूम- घूमकर सारे सैन्धवोंपर बाण - समूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३० ॥
तदिन्द्रजालप्रतिमं बाणजालममित्रहा ।
विसृज्य दिक्षु सर्वासु महेन्द्र इव वज्रभृत् ॥ ३१ ॥
शत्रुसूदन अर्जुनने वज्रधारी महेन्द्रकी भाँति सम्पूर्ण दिशाओंसे इन्द्रजालके समान बाणोंका जाल- सा फैला दिया ॥ ३१ ॥
मेघजालनिभं सैन्यं विदार्य शरवृष्टिभिः ।
विबभौ कौरवश्रेष्ठः शरदीव दिवाकरः ॥ ३२ ॥
जैसे शरत्कालके सूर्य मेघोंकी घटाको छिन्न - भिन्न करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार कौरवश्रेष्ठ अर्जुन अपने बाणोंकी वृष्टिसे शत्रुसेनाको विदीर्ण करके अत्यन्त शोभा पाने लगे ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सैन्धवयुद्धे सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सैन्धवोंके साथ अर्जुनका युद्धविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं )
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अष्टसप्ततितमोऽध्यायः अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दुःशलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति वैशम्पायन उवाच
ततो गाण्डीवभृच्छूरो युद्धाय समुपस्थितः ।
विबभौ युधि दुर्धर्षो हिमवानचलो यथा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर गाण्डीवधारी शूरवीर अर्जुन युद्धके लिये उद्यत हो गये । वे शत्रुओंके लिये दुर्जय थे और युद्धभूमिमें हिमवान् पर्वतके समान अचल भावसे डटे रहकर बड़ी शोभा पाने लगे ॥ १ ॥
ततस्ते सैन्धवा योधाः पुनरेव व्यवस्थिताः ।
व्यमुञ्चन्त सुसंरब्धा शरवर्षाणि भारत ॥ २ ॥
भरतनन्दन! तदनन्तर सिन्धुदेशीय योद्धा फिरसे संगठित होकर खड़े हो गये और अत्यन्त क्रोधमें भरकर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २ ॥
तान् प्रहस्य महाबाहुः पुनरेव व्यवस्थितान् ।
ततः प्रोवाच कौन्तेयो मुमूषून् श्लक्ष्णया गिरा ।
युध्यध्वं परया शक्त्या यतध्वं विजये मम ॥ ३ ॥
उस समय महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुन पुनः मरनेकी इच्छासे खड़े हुए सैन्धवोंको सम्बोधित करके हँसते हुए मधुर वाणीमें बोले – ' वीरो! तुम पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करो और मुझपर विजय पानेका प्रयत्न करते रहो ॥ ३ ॥
कुरुध्वं सर्वकार्याणि महद् वो भयमागतम् ।
एष योत्स्यामि सर्वांस्तु निवार्य शरवागुराम् ॥ ४ ॥
' तुम अपने सारे कार्य पूरे कर लो । तुमलोगोंपर महान् भय आ पहुँचा है । यह देखो — मैं तुम्हारे बाणोंका जाल छिन्न - भिन्न करके तुम सब लोगोंके साथ युद्ध करनेको उद्यत हूँ ॥ ४ ॥
तिष्ठध्वं युद्धमनसो दर्पं शमयितास्मि वः ।
एतावदुक्त्वा कौरव्यो रोषाद् गाण्डीवभृत् तदा ॥ ५ ॥
ततोऽथ वचनं स्मृत्वा भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भारत ।
न हन्तव्या रणे तात क्षत्रिया विजिगीषवः ॥ ६ ॥
जेतव्याश्चेति यत् प्रोक्तं धर्मराज्ञा महात्मना ।
चिन्तयामास स तदा फाल्गुनः पुरुषर्षभः ॥ ७ ॥
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' मनमें युद्धका हौसला लेकर खड़े रहो । मैं तुम्हारा घमण्ड चूर किये देता हूँ। ' भारत! गाण्डीवधारी कुरुनन्दन अर्जुन शत्रुओंसे ऐसा वचन कहकर अपने बड़े भाईकी कही हुई बातें याद करने लगे । महात्मा धर्मराजने कहा था कि ' तात! रणभूमिमें विजयकी इच्छा रखनेवाले क्षत्रियोंका वध न करना । साथ ही उन्हें पराजित भी करना । ' इस बातको याद करके पुरुषप्रवर अर्जुन इस प्रकार चिन्ता करने लगे ॥ ५–७ ॥
इत्युक्तोऽहं नरेन्द्रेण न हन्तव्या नृपा इति ।
कथं तन्न मृषेदं स्याद् धर्मराजवचः शुभम् ॥ ८ ॥
न हन्येरंश्च राजानो राज्ञश्चाज्ञा कृता भवेत् ।
इति संचिन्त्य स तदा फाल्गुनः पुरुषर्षभः ॥ ९ ॥
प्रोवाच वाक्यं धर्मज्ञः सैन्धवान् युद्धदुर्मदान् । ' अहो! महाराजने कहा था कि क्षत्रियोंका वध न करना । धर्मराजका वह मंगलमय वचन कैसे मिथ्या न हो । राजालोग मारे न जायँ और राजा युधिष्ठिरकी आज्ञाका पालन हो जाय, इसके लिये क्या करना चाहिये । ' ऐसा सोचकर धर्मके ज्ञाता पुरुषप्रवर अर्जुनने रणोन्मत्त सैन्धवोंसे इस प्रकार कहा- ॥ ८ -९ ३ ॥ श्रेयो वदामि युष्माकं न हिंसेयमवस्थितान् ॥ १० ॥
यश्च वक्ष्यति संग्रामे तवास्मीति पराजितः ।
एतच्छ्रुत्वा वचो मह्यं कुरुध्वं हितमात्मनः ॥ ११ ॥
' योद्धाओ! मैं तुम्हारे कल्याणकी बात बता रहा हूँ। तुममेंसे जो कोई अपनी पराजय स्वीकार करते हुए रणभूमिमें यह कहेगा कि मैं आपका हूँ, आपने मुझे युद्धमें जीत लिया है, वह सामने खड़ा रहे तो भी मैं उसका वध नहीं करूँगा। मेरी यह बात सुनकर तुम्हें जिसमें अपना हित दिखायी पड़े, वह करो ॥ १०-११ ॥
ततोऽन्यथा कृच्छ्रगता भविष्यथ मयार्दिताः ।
एवमुक्त्वा तु तान् वीरान् युयुधे कुरुपुङ्गवः ॥ १२ ॥
अर्जुनोऽतीव संक्रुद्धः संक्रुद्धैर्विजिगीषुभिः । ‘ यदि मेरे कथनके विपरीत तुमलोग युद्धके लिये उद्यत हुए तो मुझसे पीड़ित होकर भारी संकटमें पड़ जाओगे। ' उन वीरोंसे ऐसा कहकर कुरुकुलतिलक अर्जुन अत्यन्त कुपित हो क्रोधमें भरे हुए विजयाभिलाषी सैन्धवोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ १२३ ॥
शतं शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् ॥ १३ ॥
मुमुचुः सैन्धवा राजंस्तदा गाण्डीवधन्वनि । राजन्! उस समय सैन्धवोंने गाण्डीवधारी अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक करोड़ बाणोंका प्रहार किया ॥ १३३ ॥
शरानापततः क्रूरानाशीविषविषोपमान् ॥ १४ ॥
चिच्छेद निशितैर्बाणैरन्तरा स धनंजयः ।
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विषधर सर्पोंके समान उन कठोर बाणोंको अपनी ओर आते देख अर्जुनने तीखे सायकोंद्वारा उन सबको बीचसे काट डाला ॥ १४३ ॥
छित्त्वा तु तानाशु चैव कङ्कपत्रान् शिलाशितान् ॥ १५ ॥
एकैकमेषां समरे बिभेद निशितैः शरैः । सानपर चढ़ाकर तेज किये गये उन कंकपत्रयुक्त बाणोंके तुरन्त ही टुकड़े - टुकड़े करके समरांगणमें अर्जुनने सैन्धव वीरोंमेंसे प्रत्येकको पैने बाण मारकर घायल कर दिया ॥ १५३ || ततः प्रासांश्च शक्तीश्च पुनरेव धनंजयम् ॥ १६ ॥
जयद्रथं हतं स्मृत्वा चिक्षिपुः सैन्धवा नृपाः । तदनन्तर जयद्रथ - वधका स्मरण करके सैन्धवोंने अर्जुनपर पुनः बहुत -से प्रासों और शक्तियोंका प्रहार किया ॥ १६३ ॥
तेषां किरीटी संकल्पं मोघं चक्रे महाबलः ॥ १७ ॥
सर्वांस्तानन्तराच्छित्त्वा तदा चुक्रोश पाण्डवः ।
परंतु महाबली किरीटधारी पाण्डुकुमार अर्जुनने उनका सारा मनसूबा व्यर्थ कर दिया ।
उन्होंने उन सभी प्रासों और शक्तियोंको बीचसे ही काटकर बड़े जोरसे गर्जना की ॥ १७
|| तथैवापततां तेषां योधानां जयगृद्धिनाम् ॥ १८ ॥
शिरांसि पातयामास भल्लैः संनतपर्वभिः । साथ ही विजयकी अभिलाषा लेकर आक्रमण करनेवाले उन सैन्धव योद्धाओंके मस्तकोंको वे झुकी हुई गाँठवाले भल्लोंद्वारा काट- काटकर गिराने लगे ॥ १८३ ॥
तेषां प्रद्रवतां चापि पुनरेवाभिधावताम् ॥ १ ९ ॥ निवर्ततां च शब्दोऽभूत् पूर्णस्येव महोदधेः । उनमेंसे कुछ लोग भागने लगे, कुछ लोग फिरसे धावा करने लगे और कुछ लोग युद्धसे निवृत्त होने लगे । उन सबका कोलाहल जलसे भरे हुए महासागरकी गम्भीर गर्जनाके समान हो रहा था ॥ १ ९ ३ ॥ ते वध्यमानास्तु तदा पार्थेनामिततेजसा ॥ २० ॥
यथाप्राणं यथोत्साहं योधयामासुरर्जुनम् । अमित तेजस्वी अर्जुनके द्वारा मारे जानेपर भी सैन्धव योद्धा बल और उत्साहपूर्वक उनके साथ जूझते ही रहे ॥ २०६३ ॥
ततस्ते फाल्गुनेनाजौ शरैः संनतपर्वभिः ॥ २१ ॥
कृता विसंज्ञा भूयिष्ठाः क्लान्तवाहनसैनिकाः ।
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थोड़ी ही देरमें अर्जुनने युद्धस्थलमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा अधिकांश सैन्धव
वीरोंको संज्ञाशून्य कर दिया । उनके वाहन और सैनिक भी थकावटसे खिन्न हो रहे थे ॥ २१
¾ ॥
तांस्तु सर्वान् परिग्लानान् विदित्वा धृतराष्ट्रजा ॥ २२ ॥
दुःशला बालमादाय नप्तारं प्रययौ तदा ।
सुरथस्य सुतं वीरं रथेनाथागमत् तदा ॥ २३ ॥
शान्त्यर्थं सर्वयोधानामभ्यगच्छत पाण्डवम् । समस्त सैन्धव वीरोंको कष्ट पाते जान धृतराष्ट्रकी पुत्री दुःशला अपने बेटे सुरथके वीर बालकको जो उसका पौत्र था, साथ ले रथपर सवार हो रणभूमिमें पाण्डुकुमार अर्जुनके पास आयी । उसके आनेका उद्देश्य यह था कि सब योद्धा युद्ध छोड़कर शान्त हो जायँ ॥ २२-२३ ॥ सा धनंजयमासाद्य रुरोदार्तस्वरं तदा ॥ २४ ॥
धनंजयोऽपि तां दृष्ट्वा धनुर्विससृजे प्रभुः । वह अर्जुनके पास आकर आर्तस्वरसे फूट- फूटकर रोने लगी। शक्तिशाली अर्जुनने भी उसे सामने देख अपना धनुष नीचे डाल दिया ॥ २४ ॥
समुत्सृज्य धनुः पार्थो विधिवद् भगिनीं तदा ॥ २५ ॥
प्राह किं करवाणीति सा च तं प्रत्युवाच ह । धनुष त्यागकर कुन्तीकुमारने विधिपूर्वक बहिनका सत्कार किया और पूछा — ' बहिन! बताओ, मैं'तुम्हाराकौन--सास कार्य करूँ? ' तब दुःशलाने उत्तर दिया – ॥ एष ते भरतश्रेष्ठ स्वस्त्रीयस्यात्मजः शिशुः ॥ २६ ॥
अभिवादयते पार्थ तं पश्य पुरुषर्षभ ।
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' भैया! भरतश्रेष्ठ! यह तुम्हारे भानजे सुरथका औरस पुत्र है । पुरुषप्रवर पार्थ! इसकी ओर देखो, यह तुम्हें प्रणाम करता है ' ॥ २६३ ॥
इत्युक्तस्तस्य पितरं स पप्रच्छार्जुनस्तथा ॥ २७ ॥
क्वासाविति ततो राजन् दुःशला वाक्यमब्रवीत् । राजन्! दुःशलाके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उस बालकके पिताके विषयमें जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा — ‘ बहिन! सुरथ कहाँ है? ' तब दुःशला बोली- ॥ २७३ ॥
पितृशोकाभिसंतप्तो विषादार्तोऽस्य वै पिता ॥ २८ ॥
पञ्चत्वमगमद् वीरो यथा तन्मे निशामय । ‘ भैया! इस बालकका पिता वीर सुरथ पितृशोकसे संतप्त और विषादसे पीड़ित हो जिस प्रकार मृत्युको प्राप्त हुआ है, वह मुझसे सुनो ॥ २८३ ॥
स पूर्वं पितरं श्रुत्वा हतं युद्धे त्वयानघ ॥ २ ९ ॥
त्वामागतं च संश्रुत्य युद्धाय हयसारिणम् ।
पितुश्च मृत्युदुःखार्तोऽजहात् प्राणान् धनंजय ॥ ३० ॥
'निष्पाप अर्जुन! मेरे पुत्र सुरथने पहलेसे सुन रखा था कि अर्जुनके हाथसे ही मेरे पिताकी मृत्यु हुई है । इसके बाद जब उसके कानोंमें यह समाचार पड़ा है कि तुम घोड़ेके
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पीछे - पीछे युद्धके लिये यहाँतक आ पहुँचे हो तो वह पिताकी मृत्युके दुःखसे आतुर हो अपने प्राणोंका परित्याग कर बैठा है ॥ २ ९ -३०
प्राप्तो बीभत्सुरित्येव नाम श्रुत्वैव तेऽनघ ।
विषादार्तः पपातोर्व्यां ममार च ममात्मजः ॥ ३१ ॥
‘ अनघ! ‘ अर्जुन आये ’ इन शब्दोंके साथ तुम्हारा नाममात्र सुनकर ही मेरा बेटा विषादसे पीड़ित हो पृथ्वीपर गिरा और मर गया ॥ ३१ ॥
तं दृष्ट्वा पतितं तत्र ततस्तस्यात्मजं प्रभो ।
गृहीत्वा समनुप्राप्ता त्वामद्य शरणैषिणी ॥ ३२ ॥
‘ प्रभो! उसको ऐसी अवस्थामें पड़ा हुआ देख उसके पुत्रको साथ ले मैं शरण खोजती हुई आज तुम्हारे पास आयी हूँ' ॥ ३२ ॥
इत्युक्त्वाऽऽर्तस्वरं सा तु मुमोच धृतराष्ट्रजा ।
दीना दीनं स्थितं पार्थमब्रवीच्चाप्यधोमुखम् ॥ ३३ ॥
ऐसा कहकर धृतराष्ट्र- पुत्री दुःशला दीन होकर आर्तस्वरसे विलाप करने लगी । उसकी दीनदशा देख अर्जुन भी दीन भावसे अपना मुँह नीचे किये खड़े रहे । उस समय दुःशला उनसे फिर बोली- ॥ ३३ ॥
स्वसारं समवेक्षस्व स्वस्रीयात्मजमेव च ।
कर्तुमर्हसि धर्मज्ञ दयां कुरु कुलोद्वह ॥ ३४ ॥
' भैया! तुम कुरुकुलमें श्रेष्ठ और धर्मको जाननेवाले हो, अतः दया करो । अपनी इस दुखिया बहिनकी ओर देखो और भानजेके बेटेपर भी कृपादृष्टि करो ॥ ३४ ॥
विस्मृत्य कुरुराजानं तं च मन्दं जयद्रथम् ।
अभिमन्योर्यथा जातः परिक्षित् परवीरहा ॥ ३५ ॥
तथायं सुरथाज्जातो मम पौत्रो महाभुजः । ' मन्दबुद्धि दुर्योधन और जयद्रथको भूलकर हमें अपनाओ । जैसे अभिमन्युसे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले परीक्षित्का जन्म हुआ है, उसी प्रकार सुरथसे यह मेरा महाबाहु पौत्र उत्पन्न हुआ है ॥ ३५ ॥
तमादाय नरव्याघ्र सम्प्राप्तास्मि तवान्तिकम् ॥ ३६ ॥
शमार्थं सर्वयोधानां शृणु चेदं वचो मम । ‘ पुरुषसिंह! मैं इसीको लेकर समस्त योद्धाओंको शान्त करनेके लिये आज तुम्हारे पास आयी हूँ। तुम मेरी यह बात सुनो ॥ ३६३ ॥
आगतोऽयं महाबाहो तस्य मन्दस्य पुत्रकः ॥ ३७ ॥
प्रसादमस्य बालस्य तस्मात् त्वं कर्तुमर्हसि । ‘ महाबाहो! यह उस मन्दबुद्धि जयद्रथका पौत्र तुम्हारी शरणमें आया है । अतः इस बालकपर तुम्हें कृपा करनी चाहिये ॥ ३७ ॥