श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1941–1950
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1941–1950
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इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें यज्ञसामग्र् सम्पादनविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥
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त्रिसप्ततितमोऽध्यायः सेनासहित अर्जुनके द्वारा अश्वका अनुसरण वैशम्पायन उवाच
दीक्षाकाले तु सम्प्राप्ते ततस्ते सुमहर्त्विजः ।
विधिवद् दीक्षयामासुरश्वमेधाय पार्थिवम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब दीक्षाका समय आया, तब उन व्यास आदि महान् ऋत्विजोंने राजा युधिष्ठिरको विधिपूर्वक अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा दी ॥ १ ॥
कृत्वा स पशुबन्धांश्च दीक्षितः पाण्डुनन्दनः ।
धर्मराजो महातेजाः सहर्त्विग्भिर्व्यरोचत ॥ २ ॥
पशुबन्ध-ध- कर्म करके यज्ञकी दीक्षा लिये हुए महातेजस्वी पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिर ऋत्विजोंके साथ बड़ी शोभा पाने लगे ॥ २ ॥
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अश्वमेधयज्ञके लिये छोड़े हुए घोड़ेका अर्जुनके द्वारा अनुगमन
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हयश्च हयमेधार्थं स्वयं स ब्रह्मवादिना ।
उत्सृष्टः शास्त्रविधिना व्यासेनामिततेजसा ॥ ३ ॥
अमिततेजस्वी ब्रह्मवादी व्यासजीने अश्वमेधयज्ञके लिये चुने गये अश्वको स्वयं ही शास्त्रीय विधिके अनुसार छोड़ा ॥ ३ ॥
स राजा धर्मराड् राजन् दीक्षितो विबभौ तदा ।
हेममाली रुक्मकण्ठः प्रदीप्त इव पावकः ॥ ४ ॥
राजन्! यज्ञमें दीक्षित हुए धर्मराज राजा युधिष्ठिर सोनेकी माला और कण्ठमें सोनेकी कण्ठी धारण किये प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४ ॥
कृष्णाजिनी दण्डपाणिः क्षौमवासाः स धर्मजः ।
विबभौ द्युतिमान् भूयः प्रजापतिरिवाध्वरे ॥ ५ ॥
काला मृगचर्म, हाथमें दण्ड और रेशमी वस्त्र धारण किये धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अधिक कान्तिमान् हो यज्ञमण्डपमें प्रजापतिकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ५ ॥
तथैवास्यर्त्विजः सर्वे तुल्यवेषा विशाम्पते ।
बभूवुरर्जुनश्चापि प्रदीप्त इव पावकः ॥ ६ ॥
प्रजानाथ! उनके समस्त ऋत्विज् भी उन्हींके समान वेश- भूषा धारण किये सुशोभित होते थे । अर्जुन भी प्रज्वलित अग्निके समान दीप्तिमान् हो रहे थे ॥ ६ ॥
श्वेताश्वः कृष्णसारं तं ससाराश्वं धनंजयः ।
विधिवत् पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात् ॥ ७ ॥
भूपाल जनमेजय! श्वेत घोड़ेवाले अर्जुनने धर्मराजकी आज्ञासे उस यज्ञसम्बन्धी अश्वका विधिपूर्वक अनुसरण किया ॥ ७ ॥
विक्षिपन् गाण्डिवं राजन् बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ।
तमश्वं पृथिवीपाल मुदा युक्तः ससार च ॥ ८ ॥
पृथिवीपाल! राजन्! अर्जुनने अपने हाथोंमें गोधाके चमड़ेके बने दस्ताने पहन रखे थे । वे गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ अश्वके पीछे - पीछे जा रहे थे ॥ ८ ॥
आकुमारं तदा राजन्नागमत् तत्पुरं विभो ।
द्रष्टुकामं कुरुश्रेष्ठं प्रयास्यन्तं धनंजयम् ॥ ९ ॥
जनमेजय! प्रभो! उस समय यात्रा करते हुए कुरुश्रेष्ठ अर्जुनको देखनेके लिये बच्चोंसे लेकर बूढ़ोंतक सारा हस्तिनापुर वहाँ उमड़ आया था ॥ ९ ॥
तेषामन्योन्यसम्मर्दादूष्मेव समजायत ।
दिदृक्षूणां हयं तं च तं चैव हयसारिणम् ॥ १० ॥
यज्ञके घोड़े और उसके पीछे जानेवाले अर्जुनको देखनेकी इच्छासे लोगोंकी इतनी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी कि आपसकी धक्का- मुक्कीसे सबके बदनमें पसीने निकल
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आये ॥ १० ॥
ततः शब्दो महाराज दिशः खं प्रति पूरयन् ।
बभूव प्रेक्षतां नॄणां कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ॥ ११ ॥
महाराज! उस समय कुन्तीपुत्र धनंजयका दर्शन करनेवाले लोगोंके मुखसे जो शब्द निकलता था, वह सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशमें गूँज रहा था ॥ ११ ॥
एष गच्छति कौन्तेय तुरगश्चैव दीप्तिमान् ।
यमन्वेति'महाबाहुः संस्पृशन् धनुरुत्तमम् ॥ १२ ॥
( लोग कहते थे— ) ‘ ये कुन्तीकुमार अर्जुन जा रहे हैं और वह दीप्तिमान् अश्व जा रहा है, जिसके पीछे महाबाहु अर्जुन उत्तम धनुष धारण किये जा रहे हैं ' ॥ १२ ॥
एवं शुश्राव वदतां गिरो जिष्णुरुदारधीः ।
स्वस्ति तेऽस्तु व्रजारिष्टं पुनश्चैहीति भारत ॥ १३ ॥
उदारबुद्धि अर्जुनने परस्पर वार्तालाप करते हुए लोगोंकी बातें इस प्रकार सुनीं ——भारत! तुम्हारा कल्याण हो । तुम सुखसे जाओ और पुनः कुशलपूर्वक लौट आओ ' ॥ १३ ॥
अथापरे मनुष्येन्द्र पुरुषा वाक्यमब्रुवन् ।
नैनं पश्याम सम्मर्दे धनुरेतत् प्रदृश्यते ॥ १४ ॥
एतद्धि भीमनिर्ह्रादं विश्रुतं गाण्डिवं धनुः ।
स्वस्ति गच्छत्वरिष्टो वै पन्थानमकुतोभयम् ॥ १५ ॥
निवृत्तमेनं द्रक्ष्यामः पुनरेष्यति च ध्रुवम् । नरेन्द्र! दूसरे लोग ये बातें कहते थे - ' इस भीड़में हम अर्जुनको तो नहीं देखते हैं; किंतु उनका यह धनुष दिखायी देता है । यही वह भयंकर टंकार करनेवाला विख्यात गाण्डीव धनुष है । अर्जुनकी यात्रा सकुशल हो । उन्हें मार्गमें कोई कष्ट न हो । ये निर्भय मार्गपर आगे बढ़ते रहें । ये निश्चय ही कुशलपूर्वक लौटेंगे और उस समय हम फिर इनका दर्शन करेंगे' ॥ १४-१५३ ॥ एवमाद्या मनुष्याणां स्त्रीणां च भरतर्षभ ॥ १६ ॥
शुश्राव मधुरा वाचः पुनः पुनरुदारधीः । भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उदारबुद्धि अर्जुन स्त्रियों और पुरुषोंकी कही हुई मीठी - मीठी बातें बारंबार सुनते थे ॥ १६३ ॥
याज्ञवल्क्यस्य शिष्यश्च कुशलो यज्ञकर्मणि ॥ १७ ॥
प्रायात् पार्थेन सहितः शान्त्यर्थं वेदपारगः । याज्ञवल्क्य मुनिके एक विद्वान् शिष्य, जो यज्ञकर्ममें कुशल तथा वेदोंमें पारंगत थे, विघ्नकी शान्तिके लिये अर्जुनके साथ गये ॥ १७३ ॥
ब्राह्मणाश्च महीपाल बहवो वेदपारगाः ॥ १८ ॥
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अनुजग्मुर्महात्मानं क्षत्रियाश्च विशाम्पते ।
विधिवत् पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात् ॥ १ ९ ॥
महाराज! प्रजानाथ! उनके सिवा और भी बहुत- से वेदोंमें पारंगत ब्राह्मणों और क्षत्रियोंने धर्मराजकी आज्ञासे विधिपूर्वक महात्मा अर्जुनका अनुसरण किया ॥ १८-१९ ॥
पाण्डवैः पृथिवीमश्वो निर्जितामस्त्रतेजसा ।
चचार स महाराज यथादेशं च सत्तम ॥ २० ॥
महाराज! साधुशिरोमणे! पाण्डवोंने अपने अस्त्रके प्रतापसे जिस पृथ्वीको जीता था, उसके सभी देशोंमें वह अश्व क्रमशः विचरण करने लगा ॥ २० ॥
तत्र युद्धानि वृत्तानि यान्यासन् पाण्डवस्य ह ।
तानि वक्ष्यामि ते वीर विचित्राणि महान्ति च ॥ २१ ॥
वीर! उन देशोंमें अर्जुनको जो बड़े - बड़े अद्भुत युद्ध करने पड़े, उनकी कथा तुम्हें सुना रहा हूँ ॥ २१ ॥
स हयः पृथिवीं राजन् प्रदक्षिणमवर्तत ।
ससारोत्तरतः पूर्वं तन्निबोध महीपते ॥ २२ ॥
अवमृद्नन् स राष्ट्राणि पार्थिवानां हयोत्तमः ।
शनैस्तदा परिययौ श्वेताश्वश्च महारथः ॥ २३ ॥
पृथ्वीनाथ! वह घोड़ा पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करने लगा । सबसे पहले वह उत्तर दिशाकी ओर गया । फिर राजाओंके अनेक राज्योंको रौंदता हुआ वह उत्तम अश्व पूर्वकी ओर मुड़ गया । उस समय श्वेतवाहन महारथी अर्जुन धीरे - धीरे उसके पीछे - पीछे जा रहे थे ॥
तत्र संगणना नास्ति राज्ञामयुतशस्तदा ।
येऽयुध्यन्त महाराज क्षत्रिया हतबान्धवाः ॥ २४ ॥
महाराज! महाभारत - युद्धमें जिनके भाई- बन्धु मारे गये थे, ऐसे जिन-जिन क्षत्रियोंने उस समय अर्जुनके साथ युद्ध किया था, उन हजारों नरेशोंकी कोई गिनती नहीं है ॥ २४ ॥
किराता यवना राजन् बहवोऽसिधनुर्धराः ।
म्लेच्छाश्चान्ये बहुविधाः पूर्वं ये निकृता रणे ॥ २५ ॥
राजन्! तलवार और धनुष धारण करनेवाले बहुत से किरात, यवन और म्लेच्छ, जो पहले महाभारत- युद्धमें पाण्डवोंद्वारा परास्त किये गये थे, अर्जुनका सामना करनेके लिये आये ॥ २५ ॥
आर्याश्च पृथिवीपालाः प्रहृष्टनरवाहनाः ।
समीयुः पाण्डुपुत्रेण बहवो युद्धदुर्मदाः ॥ २६ ॥
हृष्ट- पुष्ट मनुष्यों और वाहनोंसे युक्त बहुत -से रणदुर्मद आर्य नरेश भी पाण्डुपुत्र अर्जुनसे भिड़े थे ॥ एवं वृत्तानि युद्धानि तत्र तत्र महीपते ।
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अर्जुनस्य महीपालैर्नानादेशसमागतैः ॥ २७ ॥
पृथ्वीनाथ! इस प्रकार भिन्न -भिन्न स्थानोंमें नाना देशोंसे आये हुए राजाओंके साथ अर्जुनको अनेक बार युद्ध करने पड़े ॥ २७ ॥
यानि तूभयतो राजन् प्रतप्तानि महान्ति च ।
तानि युद्धानि वक्ष्यामि कौन्तेयस्य तवानघ ॥ २८ ॥
निष्पाप नरेश! जो युद्ध दोनों पक्षके योद्धाओंके लिये अधिक कष्टदायक और महान् थे, अर्जुनके उन्हीं युद्धोंका मैं यहाँ तुमसे वर्णन करूँगा ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अर्जुनके द्वारा अश्वका अनुसरणविषयक तिहत्तरवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥
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चतुःसप्ततितमोऽध्यायः अर्जुनके द्वारा त्रिगर्तोंकी पराजय वैशम्पायन उवाच
त्रिगर्तैरभवद् युद्धं कुतवैरैः किरीटिनः ।
महारथसमाज्ञातैर्हतानां पुत्रनप्तृभिः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन्! कुरुक्षेत्रके युद्धमें जो त्रिगर्त वीर मारे गये थे, उनके महारथी पुत्रों और पौत्रोंने किरीटधारी अर्जुनके साथ वैर बाँध लिया था। त्रिगर्तदेशमें जानेपर अर्जुनका उन त्रिगर्तोंके साथ घोर युद्ध हुआ था ॥ १ ॥
ते समाज्ञाय सम्प्राप्तं यज्ञियं तुरगोत्तमम् ।
विषयान्तं ततो वीरा दंशिताः पर्यवारयन् ॥ २ ॥
रथिनो बद्धतूणीराः सदश्वैः समलंकृतैः ।
परिवार्य हयं राजन् ग्रहीतुं सम्प्रचक्रमुः ॥ ३ ॥
‘ पाण्डवोंका यज्ञसम्बन्धी उत्तम अश्व हमारे राज्यकी सीमामें आ पहुँचा है ' यह जानकर त्रिगर्तवीर कवच आदिसे सुसज्जित हो पीठपर तरकस बाँधे सजे - सजाये अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर निकले और उस अश्वको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया । राजन्! घोड़ेको घेरकर वे उसे पकड़नेका उद्योग करने लगे ॥ २-३ ॥
ततः किरीटी संचिन्त्य तेषां तत्र चिकीर्षितम् ।
वारयामास तान् वीरान् सान्त्वपूर्वमरिंदमः ॥। ४ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले अर्जुन यह जान गये कि वे क्या करना चाहते हैं । उनके मनोभावका विचार करके वे उन्हें शान्तिपूर्वक समझाते हुए युद्धसे रोकने लगे ॥ ४ ॥
तदनादृत्य ते सर्वे शरैरभ्यहनंस्तदा ।
तमोरजोभ्यां संछन्नांस्तान् किरीटी न्यवारयत् ॥ ५ ॥
किंतु वे सब उनकी बातकी अवहेलना करके उन्हें बाणोंद्वारा चोट पहुँचाने लगे । तमोगुण और रजोगुणके वशीभूत हुए उन त्रिगर्तोंको किरीटीने युद्धसे रोकनेकी पूरी चेष्टा की ॥ ५ ॥
तानब्रवीत् ततो जिष्णुः प्रहसन्निव भारत ।
निवर्तध्वमधर्मज्ञाः श्रेयो जीवितमेव च ॥ ६ ॥
भारत! तदनन्तर विजयशील अर्जुन हँसते हुए- से बोले – ' धर्मको न जाननेवाले पापात्माओ! लौट जाओ । जीवनकी रक्षामें ही तुम्हारा कल्याण है ' ॥ ६ ॥
स हि वीरः प्रयास्यन् वै धर्मराजेन वारितः ।
हतबान्धवा न ते पार्थ हन्तव्याः पार्थिवा इति ॥ ७ ॥
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वीर अर्जुनने ऐसा इसलिये कहा कि चलते समय धर्मराज युधिष्ठिरने यह कहकर मना कर दिया था कि ' कुन्तीनन्दन! जिन राजाओंके भाई- बन्धु कुरुक्षेत्रके युद्धमें मारे गये हैं, उनका तुम्हें वध नहीं करना चाहिये ' ॥ ७ ॥
स तदा तद् वचः श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः ।
तान् निवर्तध्वमित्याह न न्यवर्तन्त चापि ते ॥ ८ ॥
बुद्धिमान् धर्मराजके इस आदेशको सुनकर उसका पालन करते हुए ही अर्जुनने त्रिगर्तोंको लौट जानेकी आज्ञा दी तथापि वे नहीं लौटे ॥ ८ ॥
ततस्त्रिगर्तराजानं सूर्यवर्माणमाहवे ।
विचित्य शरजालेन प्रजहास धनंजयः ॥ ९ ॥
तब उस युद्धस्थलमें त्रिगर्तराज सूर्यवर्माके सारे अंगोंमें बाण धँसाकर अर्जुन हँसने लगे ॥ ९ ॥
ततस्ते रथघोषेण रथनेमिस्वनेन च ।
पूरयन्तो दिशः सर्वा धनंजयमुपाद्रवन् ॥ १० ॥
यह देख त्रिगर्तदेशीय वीर रथकी घरघराहट और पहियोंकी आवाजसे सारी दिशाओंको गुँजाते हुए वहाँ अर्जुनपर टूट पड़े ॥ १० ॥
सूर्यवर्मा ततः पार्थे शराणां नतपर्वणाम् ।
शतान्यमुञ्चद् राजेन्द्र लघ्वस्त्रमभिदर्शयन् ॥ ११ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर सूर्यवर्माने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक सौ बाणोंका प्रहार किया ॥ ११ ॥
तथैवान्ये महेष्वासा ये च तस्यानुयायिनः ।
मुमुचुः शरवर्षाणि धनंजयवधैषिणः ॥ १२ ॥
इसी प्रकार उसके अनुयायी वीरोंमें भी जो दूसरे- दूसरे महान् धनुर्धर थे, वे भी अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ १२ ॥
स तान् ज्यामुखनिर्मुक्तैर्बहुभिः सुबहून् शरान् ।
चिच्छेद पाण्डवो राजंस्ते भूमौ न्यपतंस्तदा ॥ १३ ॥
राजन्! पाण्डुपुत्र अर्जुनने अपने धनुषकी प्रत्यंचासे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंद्वारा शत्रुओंके बहुत - से बाणोंको काट डाला । वे कटे हुए बाण टुकड़े -टुकड़े होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १३ ॥
केतुवर्मा तु तेजस्वी तस्यैवावरजो युवा ।
युयुधे भ्रातुरर्थाय पाण्डवेन यशस्विना ॥ १४ ॥
( सूर्यवर्माके परास्त होनेपर ) उसका छोटा भाई केतुवर्मा जो एक तेजस्वी नवयुवक था, अपने भाईका बदला लेनेके लिये यशस्वी वीर पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा ॥ १४ ॥
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तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य केतुवर्माणमाहवे ।
अभ्यघ्नन्निशितैर्बाणैर्बीभत्सुः परवीरहा ॥ १५ ॥
केतुवर्माको युद्धस्थलमें धावा करते देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने अपने तीखे बाणोंसे उसे मार डाला ॥ १५ ॥
केतुवर्मण्यभिहते धृतवर्मा महारथः ।
रथेनाशु समुत्पत्य शरैर्जिष्णुमवाकिरत् ॥ १६ ॥
केतुवर्माके मारे जानेपर महारथी धृतवर्मा रथके द्वारा शीघ्र ही वहाँ आ धमका और अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ १६ ॥
तस्य तां शीघ्रतामीक्ष्य तुतोषातीव वीर्यवान् ।
गुडाकेशो महातेजा बालस्य धृतवर्मणः ॥ १७ ॥
धृतवर्मा अभी बालक था तो भी उसकी उस फुर्तीको देखकर महातेजस्वी पराक्रमी अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए ॥
न संदधानं ददृशे नाददानं च तं तदा ।
किरन्तमेव स शरान् ददृशे पाकशासनिः ॥ १८ ॥
वह कब बाण हाथमें लेता है और कब उसे धनुषपर चढ़ाता है, उसको इन्द्रकुमार अर्जुन भी नहीं देख पाते थे । उन्हें केवल इतना ही दिखायी देता था कि वह बाणोंकी वर्षा कर रहा है ॥ १८ ॥
स तु तं पूजयामास धृतवर्माणमाहवे ।
मनसा तु मुहूर्तं वै रणे समभिहर्षयन् ॥ १ ९ ॥
उन्होंने रणभूमिमें थोड़ी देरतक मन--ही- मन धृतवर्माकी प्रशंसा की और युद्धमें उसका हर्ष एवं उत्साह बढ़ाते रहे ॥ १ ९ ॥
तं पन्नगमिव क्रुद्धं कुरुवीरः स्मयन्निव ।
प्रीतिपूर्वं महाबाहुः प्राणैर्न व्यपरोपयत् ॥ २० ॥
यद्यपि धृतवर्मा सर्पके समान क्रोधमें भरा हुआ था तो भी कुरुवीर महाबाहु अर्जुन
प्रेमपूर्वक मुसकराते हुए युद्ध करते थे । उन्होंने उसके प्राण नहीं लिये ॥ २० ॥
स तथा रक्ष्यमाणो वै पार्थेनामिततेजसा ।
धृतवर्मा शरं दीप्तं मुमोच विजये तदा ॥ २१ ॥
इस प्रकार अमित तेजस्वी अर्जुनके द्वारा जानबूझकर छोड़ दिये जानेपर धृतवर्माने उनके ऊपर एक अत्यन्त प्रज्वलित बाण चलाया ॥ २१ ॥
स तेन विजयस्तूर्णमासीद् विद्धाः करे भृशम् ।
मुमोच गाण्डिवं मोहात् तत् पपाताथ भूतले ॥ २२ ॥
उस बाणने तुरन्त आकर अर्जुनके हाथमें गहरी चोट पहुँचायी। उन्हें मूर्च्छा आ गयी और उनका गाण्डीव धनुष हाथसे छूटकर पृथ्वीपर जा पड़ा ॥ २२ ॥