06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 1981–1990
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1981–1990
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अयमश्वोऽनुसर्तव्यः स शेषे किं महीतले ॥ १० ॥
‘ प्रभो! तुम्हें तो महाराज युधिष्ठिरके यज्ञ- सम्बन्धी अश्वके पीछे - पीछे जाना है; फिर यहाँ पृथ्वीपर कैसे सो रहे हो? ॥ १० ॥
त्वयि प्राणा ममायत्ताः कुरूणां कुरुनन्दन ।
स कस्मात् प्राणदोऽन्येषां प्राणात् संत्यक्तवानसि ॥ ११ ॥
' कुरुनन्दन! मेरे और कौरवोंके प्राण तुम्हारे ही अधीन हैं । तुम तो दूसरोंके प्राणदाता हो, तुमने स्वयं कैसे प्राण त्याग दिये? ' ॥ ११ ॥
उलूपि साधु पश्येमं पतिं निपतितं भुवि ।
पुत्रं चेमं समुत्साद्य घातयित्वा न शोचसि ॥ १२ ॥
( इतना कहकर वह फिर उलूपीसे बोली- ) ' उलूपी! ये पतिदेव भूतलपर पड़े हैं । तुम इन्हें अच्छी तरह देख लो । तुमने इस बेटेको उकसाकर स्वामीकी हत्या करायी है । क्या इसके लिये तुम्हें शोक नहीं होता? ॥ १२ ॥
कामं स्वपितु बालोऽयं भूमौ मृत्युवशं गतः ।
लोहिताक्षो गुडाकेशो विजयः साधु जीवतु ॥ १३ ॥
' मृत्युके वशमें पड़ा हुआ मेरा यह बालक चाहे सदाके लिये भूमिपर सोता रह जाय, किंतु निद्राके स्वामी, विजय पानेवाले अरुणनयन अर्जुन अवश्य जीवित हों — यही उत्तम ॥ १३ ॥
नापराधोऽस्ति सुभगे नराणां बहुभार्यता ।
प्रमदानां भवत्येष मा तेऽभूद् बुद्धिरीदृशी ॥ १४ ॥
‘ सुभगे! कोई पुरुष बहुत- सी स्त्रियोंको पत्नी बनाकर रखे, तो उनके लिये यह अपराध या दोषकी बात नहीं होती । स्त्रियाँ यदि ऐसा करें ( अनेक पुरुषोंसे सम्बन्ध रखें) तो यह उनके लिये अवश्य दोष या पापकी बात होती है । अतः तुम्हारी बुद्धि ऐसी क्रूर नहीं होनी चाहिये ॥ १४ ॥
सख्यं चैतत् कृतं धात्रा शश्वदव्ययमेव तु ।
सख्यं समभिजानीहि सत्यं सङ्गतमस्तु ते ॥ १५ ॥
‘ विधाताने पति और पत्नीकी मित्रता सदा रहनेवाली और अटूट बनायी है । ( तुम्हारा भी इनके साथ वही सम्बन्ध है । ) इस सख्यभावके महत्त्वको समझो और ऐसा उपाय करो जिससे तुम्हारी इनके साथ की हुई मैत्री सत्य एवं सार्थक हो ॥ १५ ॥
पुत्रेण घातयित्वैनं पतिं यदि न मेऽद्य वै ।
जीवन्तं दर्शयस्यद्य परित्यक्ष्यामि जीवितम् ॥ १६ ॥
' तुम्हींने बेटेको लड़ाकर उसके द्वारा इन पतिदेवकी हत्या करवायी है । यह सब करके यदि आज तुम पुनः इन्हें जीवित करके न दिखा दोगी तो मैं भी प्राण त्याग दूँगी ॥ १६ ॥
साहं दुःखान्विता देवि पतिपुत्रविनाकृता ।
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इहैव प्रायमाशिष्ये प्रेक्षन्त्यास्ते न संशयः ॥ १७ ॥
' देवि! मैं पति और पुत्र दोनोंसे वञ्चित होकर दुःखमें डूब गयी हूँ। अतः अब यहीं तुम्हारे देखते - देखते मैं आमरण उपवास करूंगी, इसमें संशय नहीं है ' ॥ १७ ॥
इत्युक्त्वा पन्नगसुतां सपत्नी चैत्रवाहनी ।
ततः प्रायमुपासीना तूष्णीमासीज्जनाधिप ॥ १८ ॥
नरेश्वर! नागकन्यासे ऐसा कहकर उसकी सौत चित्रवाहनकुमारी चित्रांगदा आमरण उपवासका संकल्प लेकर चुपचाप बैठ गयी ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो विलप्य विरता भर्तुः पादौ प्रगृह्य सा ।
उपविष्टाभवद् दीना सोच्छ्वासं पुत्रमीक्षती ॥ १ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर विलाप करके उससे विरत हो चित्रांगदा अपने पतिके दोनों चरण पकड़कर दीनभावसे बैठ गयी और लंबी साँस खींच-खींचकर अपने पुत्रकी ओर भी देखने लगी ॥ १ ९ ॥
ततः संज्ञां पुनर्लब्ध्वा स राजा बभ्रुवाहनः ।
मातरं तामथालोक्य रणभूमावथाब्रवीत् ॥ २० ॥
थोड़ी ही देरमें राजा बभ्रुवाहनको पुनः चेत हुआ । वह अपनी माताको रणभूमिमें बैठी देख इस प्रकार विलाप करने लगा- ॥ २० ॥
इतो दुःखतरं किं नु यन्मे माता सुखैधिता ।
भूमौ निपतितं वीरमनुशेते मृतं पतिम् ॥ २१ ॥
‘ हाय! जो अबतक सुखोंमें पली थी, वही मेरी माता चित्रांगदा आज मृत्युके अधीन होकर पृथ्वीपर पड़े हुए अपने वीर पतिके साथ मरनेका निश्चय करके बैठी हुई है । इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है? ॥ २१ ॥
निहन्तारं रणेऽरीणां सर्वशस्त्रभृतां वरम् ।
मया विनिहतं संख्ये प्रेक्षते दुर्मरं बत ॥ २२ ॥
‘ संग्राममें जिनका वध करना दूसरेके लिये नितान्त कठिन है, जो युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेवाले तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं, उन्हीं मेरे पिता अर्जुनको आज यह मेरे ही हाथों मरकर पड़ा देख रही है ॥ २२ ॥
अहोऽस्या हृदयं देव्या दृढं यन्न विदीर्यते ।
व्यूढोरस्कं महाबाहुं प्रेक्षन्त्या निहतं पतिम् । २३ ॥
दुर्मरं पुरुषेणेह मन्ये ह्यध्वन्यनागते ।
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'चौड़ी छाती और विशाल भुजावाले अपने पतिको मारा गया देखकर भी जो मेरी माता चित्रांगदा देवीका दृढ़ हृदय विदीर्ण नहीं हो जाता है । इससे मैं यह मानता हूँ कि अन्तकाल आये बिना मनुष्यका मरना बहुत कठिन है ॥ २३ ॥
यत्र नाहं न मे माता विप्रयुज्येत जीवितात् ॥ २४ ॥
हा हा धिक् कुरुवीरस्य संनाहं काञ्चनं भुवि ।
अपविद्धं हतस्येह मया पुत्रेण पश्यत ॥ २५ ॥
‘ तभी तो इस संकटके समय भी मेरे और मेरी माताके प्राण नहीं निकलते । हाय! हाय! मुझे धिक्कार है, लोगों! देख लो! मुझ पुत्रके द्वारा मारे गये कुरुवीर अर्जुनका सुनहरा कवच यहाँ पृथ्वीपर फेंका पड़ा है ' ॥ २४-२५ ॥
भो भो पश्यत मे वीरं पितरं ब्राह्मणा भुवि ।
शयानं वीरशयने मया पुत्रेण पातितम् ॥ २६ ॥
' हे ब्राह्मणो! देखो, मुझ पुत्रके द्वारा मार गिराये गये मेरे वीर पिता अर्जुन वीरशय्यापर सो रहे हैं ॥ २६ ॥
ब्राह्मणाः कुरुमुख्यस्य ये मुक्ता हयसारिणः ।
कुर्वन्ति शान्तिं कामस्य रणे योऽयं मया हतः ॥ २७ ॥
'कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके घोड़ेके पीछे - पीछे चलनेवाले जो ब्राह्मणलोग शान्तिकर्म करनेके लिये नियुक्त हुए हैं, वे इनके लिये कौन- सी शान्ति करते थे, जो ये रणभूमिमें मेरेद्वारा मार डाले गये! ॥ २७ ॥
व्यादिशन्तु च किं विप्राः प्रायश्चित्तमिहाद्य मे ।
सुनृशंसस्य पापस्य पितृहन्तू रणाजिरे ॥ २८ ॥
‘ब्राह्मणो! मैं अत्यन्त क्रूर, पापी और समरांगणमें पिताकी हत्या करनेवाला हूँ ।
बताइये, मेरे लिये अब यहाँ कौन -सा प्रायश्चित्त है? ॥ २८ ॥
दुश्चरा द्वादशसमा हत्वा पितरमद्य वै ।
ममेह सुनृशंसस्य संवीतस्यास्य चर्मणा ॥ २ ९ ॥
शिरःकपाले चास्यैव युञ्जतः पितुरद्य मे ।
प्रायश्चित्तं हि नास्त्यन्यद्धत्वाद्य पितरं मम ॥ ३० ॥
‘ आज पिताकी हत्या करके मेरे लिये बारह वर्षोंतक कठोर व्रतका पालन करना अत्यन्त कठिन है । मुझ क्रूर पितृघातीके लिये यहाँ यही प्रायश्चित्त है कि मैं इन्हींके चमड़ेसे अपने शरीरको आच्छादित करके रहूँ और अपने पिताके मस्तक एवं कपालको धारण किये बारह वर्षोंतक विचरता रहूँ । पिताका वध करके अब मेरे लिये दूसरा कोई प्रायश्चित्त नहीं है ॥ २ ९ -३० ॥
पश्य नागोत्तमसुते भर्तारं निहतं मया ।
कृतं प्रियं मया तेऽद्य निहत्य समरेऽर्जुनम् ॥ ३१ ॥
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‘नागराजकुमारी! देखो, युद्धमें मैंने तुम्हारे स्वामीका वध किया है । सम्भव है आज समरांगणमें इस तरह अर्जुनकी हत्या करके मैंने तुम्हारा प्रिय कार्य किया हो ॥ ३१ ॥
सोऽहमद्य गमिष्यामि गतिं पितृनिषेविताम् ।
न शक्नोम्यात्मनाऽऽत्मानमहं धारयितुं शुभे ॥ ३२ ॥
' परंतु शुभे! अब मैं इस शरीरको धारण नहीं कर सकता । आज मैं भी उस मार्गपर जाऊँगा, जहाँ मेरे पिताजी गये हैं ॥ ३२ ॥
सा त्वं मयि मृते मातस्तथा गाण्डीवधन्वनि ।
भव प्रीतिमती देवि सत्येनात्मानमालभे ॥ ३३ ॥
‘ मातः! देवि! मेरे तथा गाण्डीवधारी अर्जुनके मर जानेपर तुम भलीभाँति प्रसन्न होना । मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि पिताजीके बिना मेरा जीवन असम्भव है ' ॥ ३३ ॥
इत्युक्त्वा स ततो राजा दुःखशोकसमाहतः ।
उपस्पृश्य महाराज दुःखाद् वचनमब्रवीत् ॥ ३४ ॥
महाराज! ऐसा कहकर दुःख और शोकसे पीड़ित हुए राजा बभ्रुवाहनने आचमन किया और बड़े दुःखसे इस प्रकार कहा- ॥ ३४ ॥
शृण्वन्तु सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च ।
त्वं च मातर्यथा सत्यं ब्रवीमि भुजगोत्तमे ॥ ३५ ॥
‘ संसारके समस्त चराचर प्राणियो! आप मेरी बात सुनें । नागराजकुमारी माता उलूपी! तुम भी सुन लो । मैं सच्ची बात बता रहा हूँ ॥ ३५ ॥
यदि नोत्तिष्ठति जयः पिता मे नरसत्तमः ।
अस्मिन्नेव रणोद्देशे शोषयिष्ये कलेवरम् ॥ ३६ ॥
' यदि मेरे पिता नरश्रेष्ठ अर्जुन आज जीवित हो पुनः उठकर खड़े नहीं हो जाते तो मैं इस रणभूमिमें ही उपवास करके अपने शरीरको सुखा डालूँगा ॥ ३६ ॥
न हि मे पितरं हत्वा निष्कृतिर्विद्यते क्वचित् ।
नरकं प्रतिपत्स्यामि ध्रुवं गुरुवधार्दितः ॥ ३७ ॥
‘ पिताकी हत्या करके मेरे लिये कहीं कोई उद्धारका उपाय नहीं है । गुरुजन ( पिता ) - के वधरूपी पापसे पीड़ित हो मैं निश्चय ही नरकमें पढुँगा' ॥ ३७ ॥
वीरं हि क्षत्रियं हत्वा गोशतेन प्रमुच्यते ।
पितरं तु निहत्यैवं दुर्लभा निष्कृतिर्मम ॥ ३८ ॥
'किसी एक वीर क्षत्रियका वध करके विजेता वीर सौ गोदान करनेसे उस पापसे छुटकारा पाता है; परंतु पिताकी हत्या करके इस प्रकार उस पापसे छुटकारा मिल जाय, यह मेरे लिये सर्वथा दुर्लभ है ॥ ३८ ॥
एष एको महातेजाः पाण्डुपुत्रो धनंजयः ।
पिता च मम धर्मात्मा तस्य मे निष्कृतिः कुतः ॥ ३ ९ ॥
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‘ ये पाण्डुपुत्र धनंजय अद्वितीय वीर, महान् तेजस्वी, धर्मात्मा तथा मेरे पिता थे । इनका
वध करके मैंने महान् पाप किया है । अब मेरा उद्धार कैसे हो सकता है? ' ॥ ३ ९ ॥
इत्येवमुक्त्वा नृपते धनंजयसुतो नृपः ।
उपस्पृश्याभवत् तूष्णीं प्रायोपेतो महामतिः ॥ ४० ॥
नरेश्वर! ऐसा कहकर धनंजयकुमार परम बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहन पुनः आचमन करके आमरण उपवासका व्रत लेकर चुपचाप बैठ गया ॥ ४० ॥
वैशम्पायन उवाच
प्रायोपविष्टे नृपतौ मणिपूरेश्वरे तदा ।
पितृशोकसमाविष्टे सह मात्रा परंतप ॥ ४१ ॥
उलूपी चिन्तयामास तदा संजीवनं मणिम् ।
स चोपातिष्ठत तदा पन्नगानां परायणम् ॥ ४२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय! पिताके शोकसे संतप्त हुआ मणिपुरनरेश बभ्रुवाहन जब माताके साथ आमरण उपवासका व्रत लेकर बैठ गया, तब उलूपीने संजीवनमणिका स्मरण किया । नागोंके जीवनकी आधारभूत वह मणि उसके स्मरण करते ही वहाँ आ गयी ॥ ४१-४२ ॥
तं गृहीत्वा तु कौरव्य नागराजपतेः सुता ।
मनःप्रह्लादनीं वाचं सैनिकानामथाब्रवीत् ॥ ४३ ॥
कुरुनन्दन! उस मणिको लेकर नागराजकुमारी उलूपी सैनिकोंके मनको आह्लाद प्रदान करनेवाली बात बोली — ॥ ४३ ॥
उत्तिष्ठ मा शुचः पुत्र नैव विष्णुस्त्वया जितः ।
अजेयः पुरुषैरेष तथा देवैः सवासवैः ॥ ४४ ॥
‘ बेटा बभ्रुवाहन! उठो, शोक न करो! ये अर्जुन तुम्हारे द्वारा परास्त नहीं हुए हैं । ये तो सभी मनुष्यों और इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अजेय हैं ॥ ४४ ॥
मया तु मोहनी नाम मायैषा सम्प्रदर्शिता ।
प्रियार्थं पुरुषेन्द्रस्य पितुस्तेऽद्य यशस्विनः ॥ ४५ ॥
‘ यह तो मैंने आज तुम्हारे यशस्वी पिता पुरुषप्रवर धनंजयका प्रिय करनेके लिये मोहनी माया दिखलायी है ॥ ४५ ॥
जिज्ञासुर्ह्येष पुत्रस्य बलस्य तव कौरवः ।
संग्रामे युद्ध्यतो राजन्नागतः परवीरहा ॥ ४६ ॥
तस्मादसि मया पुत्र युद्धाय परिचोदितः ।
मा पापमात्मनः पुत्र शङ्केथा ह्यण्वपि प्रभो ॥ ४७ ॥
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‘ राजन्! तुम इनके पुत्र हो । ये शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कुरुकुलतिलक अर्जुन संग्राममें जूझते हुए तुम जैसे बेटेका बल- पराक्रम जानना चाहते थे । वत्स! इसीलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये प्रेरित किया है । सामर्थ्यशाली पुत्र! तुम अपनेमें अणुमात्र पापकी भी आशंका न करो ॥ ४६-४७ ॥
ऋषिरेष महानात्मा पुराणः शाश्वतोऽक्षरः ।
नैनं शक्तो हि संग्रामे जेतुं शक्रोऽपि पुत्रक ॥ ४८ ॥
'ये महात्मा नर पुरातन ऋषि, सनातन एवं अविनाशी हैं । बेटा! युद्धमें इन्हें इन्द्र भी नहीं जीत सकते ॥ ४८ ॥
अयं तु मे मणिर्दिव्यः समानीतो विशाम्पते ।
मृतान् मृतान् पन्नगेन्द्रान् यो जीवयति नित्यदा ॥ ४ ९ ॥
एनमस्योरसि त्वं च स्थापयस्व पितुः प्रभो ।
संजीवितं तदा पार्थं स त्वं द्रष्टासि पाण्डवम् ॥ ५० ॥
‘ प्रजानाथ! मैं यह दिव्यमणि ले आयी हूँ । यह सदा युद्धमें मरे हुए नागराजोंको जीवित किया करती है । प्रभो! तुम इसे लेकर अपने पिताकी छातीपर रख दो । फिर तुम पाण्डुपुत्र कुन्तीकुमार अर्जुनको जीवित हुआ देखोगे ' ॥ ४ ९ -५० ॥
इत्युक्तः स्थापयामास तस्योरसि मणिं तदा ।
पार्थस्यामिततेजाः स पितुः स्नेहादपापकृत् ॥ ५१ ॥
उलूपीके ऐसा कहनेपर निष्पाप कर्म करनेवाले अमित तेजस्वी बभ्रुवाहनने अपने पिता पार्थकी छातीपर स्नेहपूर्वक वह मणि रख दी ॥ ५१ ॥
तस्मिन् न्यस्ते मणौ वीरो जिष्णुरुज्जीवितः प्रभुः ।
चिरसुप्त इवोत्तस्थौ मृष्टलोहितलोचनः ॥ ५२ ॥
उस मणिके रखते ही शक्तिशाली वीर अर्जुन देरतक सोकर जगे हुए मनुष्यकी भाँति अपनी लाल आँखें मलते हुए पुनः जीवित हो उठे ॥ ५२ ॥
तमुत्थितं महात्मानं लब्धसंज्ञं मनस्विनम् ।
समीक्ष्य पितरं स्वस्थं ववन्दे बभ्रुवाहनः ॥ ५३ ॥
अपने मनस्वी पिता महात्मा अर्जुनको सचेत एवं स्वस्थ होकर उठा हुआ देख बभ्रुवाहनने उनके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ५३ ॥
उत्थिते पुरुषव्याघ्रे पुनर्लक्ष्मीवति प्रभो ।
दिव्याः सुमनसः पुण्या ववृषे पाकशासनः ॥ ५४ ॥
प्रभो! पुरुषसिंह श्रीमान् अर्जुनके पुनः उठ जानेपर पाकशासन इन्द्रने उनके ऊपर दिव्य एवं पवित्र फूलोंकी वर्षा की ॥ ५४ ॥
अनाहता दुन्दुभयो विनेदुर्मेघनिःस्वनाः ।
साधु साध्विति चाकाशे बभूव सुमहान् स्वनः ॥ ५५ ॥
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मेघके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाली देव- दुन्दुभियाँ बिना बजाये ही बज उठीं और आकाशमें साधुवादकी महान् ध्वनि गूँजने लगी ॥ ५५ ॥
उत्थाय च महाबाहुः पर्याश्वस्तो धनंजयः ।
बभ्रुवाहनमालिङ्ग्य समाजिघ्रत मूर्धनि ॥ ५६ ॥
महाबाहु अर्जुन भलीभाँति स्वस्थ होकर उठे और बभ्रुवाहनको हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघने लगे ॥ ५६ ॥
ददर्श चापि दूरेऽस्य मातरं शोककर्शिताम् ।
उलूप्या सह तिष्ठन्तीं ततोऽपृच्छद् धनंजयः ॥ ५७ ॥
उससे थोड़ी ही दूरपर बभ्रुवाहनकी शोकाकुल माता चित्रांगदा उलूपीके साथ खड़ी थी । अर्जुनने जब उसे देखा, तब बभ्रुवाहनसे पूछा— ॥ ५७ ॥
किमिदं लक्ष्यते सर्वं शोकविस्मयहर्षवत् ।
रणाजिरममित्रघ्न यदि जानासि शंस मे ॥ ५८ ॥
' शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर पुत्र! यह सारा समरांगण शोक, विस्मय और हर्षसे युक्त क्यों दिखायी देता है? यदि जानते हो तो मुझे बताओ ॥ ५८ ॥
जननी च किमर्थं ते रणभूमिमुपागता ।
नागेन्द्रदुहिता चेयमुलूपी किमिहागता ॥ ५ ९ ॥
'तुम्हारी माता किसलिये रणभूमिमें आयी है? तथा इस नागराजकन्या उलूपीका आगमन भी यहाँ किसलिये हुआ है? ॥ ५ ९ ॥
जानाम्यहमिदं युद्धं त्वया मद्वचनात् कृतम् ।
स्त्रीणामागमने हेतुमहमिच्छामि वेदितुम् ॥ ६० ॥
' मैं तो इतना ही जानता हूँ कि तुमने मेरे कहनेसे यह युद्ध किया है; परंतु यहाँ स्त्रियोंके आनेका क्या कारण है? यह मैं जानना चाहता हूँ' ॥ ६० ॥
तमुवाच तथा पृष्टो मणिपूरपतिस्तदा ।
प्रसाद्य शिरसा विद्वानुलूपी पृच्छ्यतामियम् ॥ ६१ ॥
पिताके इस प्रकार पूछनेपर विद्वान् मणिपुरनरेशने पिताके चरणोंमें सिर रखकर उन्हें प्रसन्न किया और कहा— ' पिताजी! यह वृत्तान्त आप माता उलूपीसे पूछिये' ॥ ६१ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे अर्जुनप्रत्युज्जीवने अशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वानुसरणके प्रसंगमें अर्जुनका पुनर्जीवनविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥
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एकाशीतितमोऽध्यायः उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुनः अश्वके पीछे जाना अर्जुनउवाच
किमागमनकृत्यं ते कौरव्यकुलनन्दिनि ।
मणिपूरपतेर्मातुस्तथैव च रणाजिरे ॥ १ ॥
अर्जुन बोले- कौरव्य नामके कुलको आनन्दित करनेवाली उलूपी! इस रणभूमिमें तुम्हारे और मणिपुरनरेश बभ्रुवाहनकी माता चित्रांगदाके आनेका क्या कारण है? ॥ १ ॥
कच्चित् कुशलकामासि राज्ञोऽस्य भुजगात्मजे ।
मम वा चपलापाङ्गि कच्चित् त्वं शुभमिच्छसि ॥ २ ॥
नागकुमारी! तुम इस राजा बभ्रुवाहनका कुशल- मंगल तो चाहती हो न? चंचल कटाक्षवाली सुन्दरी! तुम मेरे कल्याणकी भी इच्छा रखती हो न? ॥ २ ॥
कच्चित् ते पृथुलश्रोणि नाप्रियं प्रियदर्शने ।
अकार्षमहमज्ञानादयं वा बभ्रुवाहनः ॥ ३ ॥
स्थूल नितम्बवाली प्रियदर्शने! मैंने या इस बभ्रुवाहनने अनजानमें तुम्हारा कोई अप्रिय तो नहीं किया है? ॥ ३ ॥
कच्चिन्नु राजपुत्री ते सपत्नी चैत्रवाहनी ।
चित्राङ्गदा वरारोहा नापराध्यति किंचन ॥ ४ ॥
तुम्हारी सौत चित्रवाहनकुमारी वरारोहा राजपुत्री चित्रांगदाने तो तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया है? ॥ ४ ॥
तमुवाचोरगपतेर्दुहिता प्रहसन्निव ।
न मे त्वमपराद्धोऽसि न हि मे बभ्रुवाहनः ॥ ५ ॥
न जनित्री तथास्येयं मम या प्रेष्यवत् स्थिता ।
श्रूयतां यद् यथा चेदं मया सर्वं विचेष्टितम् ॥ ६ ॥
अर्जुनका यह प्रश्न सुनकर नागराजकन्या उलूपी हँसती हुई- सी बोली- ' प्राणवल्लभ! आपने या बभ्रुवाहनने मेरा कोई अपराध नहीं किया है । बभ्रुवाहनकी माताने भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा है । यह तो सदा दासीकी भाँति मेरी आज्ञाके अधीन रहती है । यहाँ आकर मैंने जो - जो जिस प्रकार काम किया है, वह बतलाती हूँ; सुनिये ॥ ५-६ ॥ न मे कोपस्त्वया कार्यः शिरसा त्वां प्रसादये ।
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त्वत्प्रियार्थं हि कौरव्य कृतमेतन्मया विभो ॥ ७ ॥
‘ प्रभो! कुरुनन्दन! पहले तो मैं आपके चरणोंमें सिर रखकर आपको प्रसन्न करना चाहती हूँ । यदि मुझसे कोई दोष बन गया हो तो भी उसके लिये आप मुझपर क्रोध न करें; क्योंकि मैंने जो कुछ किया है, वह आपकी प्रसन्नताके लिये ही किया है ॥ ७ ॥
यत्तच्छृणु महाबाहो निखिलेन धनंजय ।
महाभारतयुद्धे यत् त्वया शान्तनवो नृपः ॥ ८ ॥
अधर्मेण हतः पार्थ तस्यैषा निष्कृतिः कृता । ‘ महाबाहु धनंजय! आप मेरी कही हुई सारी बातें ध्यान देकर सुनिये । पार्थ! महाभारत- युद्धमें आपने जो शान्तनुकुमार महाराज भीष्मको अधर्मपूर्वक मारा है, उस पापका यह प्रायश्चित्त कर दिया गया ॥ ८३ ॥
न हि भीष्मस्त्वया वीर युद्ध्यमानो हि पातितः ॥ ९ ॥
शिखण्डिना तु संयुक्तस्तमाश्रित्य हतस्त्वया । ' वीर! आपने अपने साथ जूझते हुए भीष्मजीको नहीं मारा है, वे शिखण्डीके साथ उलझे हुए थे । उस दशामें शिखण्डीकी आड़ लेकर आपने उनका वध किया था ॥ ९ ३ ॥ तस्य शान्तिमकृत्वा त्वं त्यजेथा यदि जीवितम् ॥ १० ॥
कर्मणा तेन पापेन पतेथा निरये ध्रुवम् । ‘ उसकी शान्ति किये बिना ही यदि आप प्राणोंका परित्याग करते तो उस पापकर्मके प्रभावसे निश्चय ही नरकमें पड़ते ॥ १०१ ॥
एषा तु विहिता शान्तिः पुत्राद् यां प्राप्तवानसि ।
वसुभिर्वसुधापाल गङ्गया च महामते ॥ ११ ॥
'महामते! पृथ्वीपाल! पूर्वकालमें वसुओं तथा गंगाजीने इसी रूपमें उस पापकी शान्ति निश्चित की थी; जिसे आपने अपने पुत्रसे पराजयके रूपमें प्राप्त किया है ॥ ११ ॥
पुरा हि श्रुतमेतत् ते वसुभिः कथितं मया ।
गङ्गायास्तीरमाश्रित्य हते शान्तनवे नृप ॥ १२ ॥
' पहलेकी बात है, एक दिन मैं गंगाजीके तटपर गयी थी । नरेश्वर! वहाँ शान्तनुनन्दन भीष्मजीके मारे जानेके बाद वसुओंने गंगातटपर आकर आपके सम्बन्धमें जो यह बात कही थी, उसे मैंने अपने कानों सुना था ॥ १२ ॥
आप्लुत्य देवा वसवः समेत्य च महानदीम् ।
इदमूचुर्वचो घोरं भागीरथ्या मते तदा ॥ १३ ॥
'वसु नामक देवता महानदी गंगाके तटपर एकत्र हो स्नान करके भागीरथीकी सम्मतिसे यह भयानक वचन बोले— ॥ १३ ॥
एष शान्तनवो भीष्मो निहतः सव्यसाचिना । अयुध्यमानः संग्रामे संसक्तोऽन्येन भाविनि ।
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तदनेनानुषङ्गेण वयमद्य धनंजयम् ॥ १४ ॥
शापेन योजयामेति तथास्त्विति च साब्रवीत् । “ भाविनि! ये शान्तनुनन्दन भीष्म संग्राममें दूसरेके साथ उलझे हुए थे । अर्जुनके साथ युद्ध नहीं कर रहे थे तो भी सव्यसाची अर्जुनने इनका वध किया है । इस अपराधके कारण हमलोग आज अर्जुनको शाप देना चाहते हैं। " यह सुनकर गंगाजीने कहा - ' हाँ, ऐसा ही होना चाहिये ' ॥ तदहं पितुरावेद्य प्रविश्य व्यथितेन्द्रिया ॥ १५ ॥
अभवं स च तच्छ्रुत्वा विषादमगमत् परम् ।