श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1991–2000
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1991–2000
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amper अर्जुन अपने पुत्र बभ्रुवाहनको छातीसे लगा रहे हैं ।
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‘ उनकी बातें सुनकर मेरी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं और पातालमें प्रवेश करके मैंने अपने पितासे यह सारा समाचार कह सुनाया। यह सुनकर पिताजीको भी बड़ा खेद हुआ ॥ १५ ॥
पिता तु मे वसून् गत्वा त्वदर्थे समयाचत ॥ १६ ॥
पुनः पुनः प्रसाद्यैतांस्त एनमिदमब्रुवन् । 'वे तत्काल वसुओंके पास जाकर उन्हें बारंबार प्रसन्न करके आपके लिये उनसे
बारंबार क्षमा- याचना करने लगे । तब वसुगण उनसे इस प्रकार बोले- ॥ १६३ ॥
पुत्रस्तस्य महाभाग मणिपूरेश्वरो युवा ॥ १७ ॥
स एनं रणमध्यस्थः शरैः पातयिता भुवि ।
एवं कृते स नागेन्द्र मुक्तशापो भविष्यति ॥ १८ ॥
“ महाभाग नागराज! मणिपुरका नवयुवक राजा बभ्रुवाहन अर्जुनका पुत्र है । वह युद्ध- भूमिमें खड़ा होकर अपने बाणोंद्वारा जब उन्हें पृथ्वीपर गिरा देगा, तब अर्जुन हमारे शापसे मुक्त हो जायँगे ॥ १७-१८ ॥
गच्छेति वसुभिश्चोक्तो मम चेदं शशंस सः ।
तच्छ्रुत्वा त्वं मया तस्माच्छापादसि विमोक्षितः ॥ १ ९ ॥
"' अच्छा अब जाओ' वसुओंके ऐसा कहनेपर मेरे पिताने आकर मुझसे यह बात बतायी । इसे सुनकर मैंने इसीके अनुसार चेष्टा की है और आपको उस शापसे छुटकारा दिलाया है ॥ १ ९ ॥
न हि त्वां देवराजोऽपि समरेषु पराजयेत् ।
आत्मा पुत्रः स्मृतस्तस्मात् तेनेहासि पराजितः ॥ २० ॥
‘ प्राणनाथ! देवराज इन्द्र भी आपको युद्धमें परास्त नहीं कर सकते, पुत्र तो अपना आत्मा ही है, इसीलिये इसके हाथसे यहाँ आपकी पराजय हुई है ॥ २० ॥
न हि दोषो मम मतः कथं वा मन्यसे विभो ।
इत्येवमुक्तो विजयः प्रसन्नात्माब्रवीदिदम् ॥ २१ ॥
‘ प्रभो! मैं समझती हूँ कि इसमें मेरा कोई दोष नहीं है । अथवा आपकी क्या धारणा है? क्या यह युद्ध कराकर मैंने कोई अपराध किया है? '
उलूपीके ऐसा कहनेपर अर्जुनका चित्त प्रसन्न हो गया । उन्होंने कहा— ॥ २१ ॥
सर्वं मे सुप्रियं देवि यदेतत् कृतवत्यसि ।
इत्युक्त्वा सोऽब्रवीत् पुत्रं मणिपूरपतिं जयः ॥ २२ ॥
चित्राङ्गदायाः शृण्वत्याः कौरव्यदुहितुस्तदा । ' देवि! तुमने जो यह कार्य किया है, यह सब मुझे अत्यन्त प्रिय है । ' यों कहकर अर्जुनने चित्रांगदा तथा उलूपीके सुनते हुए अपने पुत्र मणिपुरनरेश बभ्रुवाहनसे कहा- ॥ २२३ ॥
युधिष्ठिरस्याश्वमेधः परिचैत्रीं भविष्यति ॥ २३ ॥
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तत्रागच्छेः सहामात्यो मातृभ्यां सहितो नृप ॥ २४ ॥
‘ नरेश्वर! आगामी चैत्रमासकी पूर्णिमाको महाराज युधिष्ठिरके यज्ञका आरम्भ होगा ।
उसमें तुम अपनी इन दोनों माताओं और मन्त्रियोंके साथ अवश्य आना' ॥
इत्येवमुक्तः पार्थेन स राजा बभ्रुवाहनः ।
उवाच पितरं धीमानिदमस्राविलेक्षणः ॥ २५ ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहनने नेत्रोंमें आँसू भरकर पितासे इस प्रकार कहा— ॥ २५ ॥
उपयास्यामि धर्मज्ञ भवतः शासनादहम् ।
अश्वमेधे महायज्ञे द्विजातिपरिवेषकः ॥ २६ ॥
‘ धर्मज्ञ! आपकी आज्ञासे मैं अश्वमेध महायज्ञमें अवश्य उपस्थित होऊँगा और ब्राह्मणोंको भोजन परोसनेका काम करूँगा ॥ २६ ॥
मम त्वनुग्रहार्थाय प्रविशस्व पुरं स्वकम् ।
भार्याभ्यां सह धर्मज्ञ मा भूत् तेऽत्र विचारणा ॥ २७ ॥
‘ इस समय आपसे एक प्रार्थना है— धर्मज्ञ! आज मुझपर कृपा करनेके लिये अपनी इन दोनों धर्मपत्नियोंके साथ इस नगरमें प्रवेश कीजिये । इस विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ २७ ॥
उषित्वेह निशामेकां सुखं स्वभवने प्रभो ।
पुनरश्वानुगमनं कर्तासि जयतां वर ॥ २८ ॥
' प्रभो! विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ! यहाँ भी आपका ही घर है । अपने उस घरमें एक रात सुखपूर्वक निवास करके कल सबेरे फिर घोड़ेके पीछे - पीछे जाइयेगा ' ॥ २८ ॥
इत्युक्तः स तु पुत्रेण तदा वानरकेतनः ।
स्मयन् प्रोवाच कौन्तेयस्तदा चित्राङ्गदासुतम् ॥ २ ९ ॥
पुत्रके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन कपिध्वज अर्जुनने मुसकराते हुए चित्राङ्गदाकुमारसे कहा— ॥ २ ९ ॥
विदितं ते महाबाहो यथा दीक्षां चराम्यहम् ।
न स तावत् प्रवेक्ष्यामि पुरं ते पृथुलोचन ॥ ३० ॥
' महाबाहो! यह तो तुम जानते ही हो कि मैं दीक्षा ग्रहण करके विशेष नियमोंके पालनपूर्वक विचर रहा हूँ । अतः विशाललोचन! जबतक यह दीक्षा पूर्ण नहीं हो जाती तबतक मैं तुम्हारे नगरमें प्रवेश नहीं करूँगा ॥ ३० ॥
यथाकामं व्रजत्येष यज्ञियाश्वो नरर्षभ ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि न स्थानं विद्यते मम ॥ ३१ ॥
‘नरश्रेष्ठ! यह यज्ञका घोड़ा अपनी इच्छाके अनुसार चलता है ( इसे कहीं भी रोकनेका नियम नहीं है ); अतः तुम्हारा कल्याण हो । मैं अब जाऊँगा । इस समय मेरे ठहरनेके लिये
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कोई स्थान नहीं है ' ॥ ३१ ॥
स तत्र विधिवत् तेन पूजितः पाकशासनिः ।
भार्याभ्यामभ्यनुज्ञातः प्रायाद् भरतसत्तमः ॥ ३२ ॥
तदनन्तर वहाँ बभ्रुवाहनने भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुष इन्द्रकुमार अर्जुनकी विधिवत् प की और वे अपनी दोनों भार्याओंकी अनुमति लेकर वहाँसे चल दिये ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे एकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वका अनुसरणविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥
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द्वयशीतितमोऽध्यायः मगधराज मेघसन्धिकी पराजय वैशम्पायन उवाच
स तु वाजी समुद्रान्तां पर्येत्य वसुधामिमाम् ।
निवृत्तोऽभिमुखो राजन् येन वारणसाह्वयम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इसके बाद वह घोड़ा समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके उस दिशाकी ओर मुँह करके लौटा, जिस ओर हस्तिनापुर था ॥ १ ॥
अनुगच्छंश्च तुरगं निवृत्तोऽथ किरीटभृत् ।
यदृच्छया समापेदे पुरं राजगृहं तदा ॥ २ ॥
किरीटधारी अर्जुन भी घोड़ेका अनुसरण करते हुए लौट पड़े और दैवेच्छासे राजगृह नामक नगरमें आ पहुँचे ॥ २ ॥
तमभ्याशगतं दृष्ट्वा सहदेवात्मजः प्रभो ।
क्षत्रधर्मे स्थितो वीरः समरायाजुहाव ह ॥ ३ ॥
प्रभो! अर्जुनको अपने नगरके निकट आया देख क्षत्रिय धर्ममें स्थित हुए वीर सहदेवकुमार राजा मेघसन्धिने उन्हें युद्धके लिये आमन्त्रित किया ॥ ३ ॥
ततः पुरात् स निष्क्रम्य रथी धन्वी शरी तली ।
मेघसन्धिः पदातिं तं धनंजयमुपाद्रवत् ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् स्वयं भी धनुष- बाण और दस्तानेसे सुसज्जित हो रथपर बैठकर नगरसे बाहर निकला । मेघसन्धिने पैदल आते हुए धनंजयपर धावा किया ॥ ४ ॥
आसाद्य च महातेजा मेघसन्धिर्धनंजयम् ।
बालभावान्महाराज प्रोवाचेदं न कौशलात् ॥ ५ ॥
महाराज! धनंजयके पास पहुँचकर महातेजस्वी मेघसन्धिने बुद्धिमानीके कारण नहीं, मूर्खतावश निम्नांकित बात कही— ॥ ५ ॥
किमयं चार्यते वाजी स्त्रीमध्य इव भारत ।
हयमेनं हरिष्यामि प्रयतस्व विमोक्षणे ॥ ६ ॥
‘ भरतनन्दन! इस घोड़ेके पीछे क्यों फिर रहे हो! यह तो ऐसा जान पड़ता है, मानो स्त्रियोंके बीच चल रहा हो । मैं इसका अपहरण कर रहा हूँ। तुम इसे छुड़ानेका प्रयत्न करो ॥ ६ ॥
अदत्तानुनयो युद्धे यदि त्वं पितृभिर्मम ।
करिष्यामि तवातिथ्यं प्रहर प्रहरामि च ॥ ७ ॥
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'यदि युद्धमें मेरे पिता आदि पूर्वजोंने कभी तुम्हारा स्वागत- सत्कार नहीं किया है तो आज मैं इस कमीको पूर्ण करूँगा । युद्धके मैदानमें तुम्हारा यथोचित आतिथ्य - सत्कार करूँगा । पहले मुझपर प्रहार करो, फिर मैं तुमपर प्रहार करूँगा' ॥ ७ ॥
इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं प्रहसन्निव पाण्डवः ।
विघ्नकर्ता मया वार्य इति मे व्रतमाहितम् ॥ ८ ॥
भ्रात्रा ज्येष्ठेन नृपते तवापि विदितं ध्रुवम् ।
प्रहरस्व यथाशक्ति न मन्युर्विद्यते मम ॥ ९ ॥
उसके ऐसा कहनेपर पाण्डुपुत्र अर्जुनने उसे हँसते हुए- से इस प्रकार उत्तर दिया —‘नरेश्वर! मेरे बड़े भाईने मेरे लिये इस व्रतकी दीक्षा दिलायी है कि जो मेरे मार्गमें विघ्न डालनेको उद्यत हो, उसे रोको । निश्चय ही यह बात तुम्हें भी विदित है । अतः तुम अपनी
शक्तिके अनुसार मुझपर प्रहार करो । मेरे मनमें तुमपर कोई रोष नहीं है ' ॥ ८- ९ ॥
इत्युक्तः प्राहरत् पूर्वं पाण्डवं मगधेश्वरः ।
किरन् शरसहस्राणि वर्षाणीव सहस्रदृक् ॥ १० ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर मगधनरेशने पहले उनपर प्रहार किया । जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार मेघसन्धि अर्जुनपर सहस्रों बाणोंकी झड़ी लगाने लगा ॥ १० ॥
ततो गाण्डीवभृच्छूरो गाण्डीवप्रहितैः शरैः ।
चकार मोघांस्तान् बाणान् सयत्नान् भरतर्षभ ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! तब गाण्डीवधारी शूरवीर अर्जुनने गाण्डीव धनुषसे छोड़े गये बाणोंद्वारा मेघसन्धिके प्रयत्नपूर्वक चलाये गये उन सभी बाणोंको व्यर्थ कर दिया ॥ ११ ॥
स मोघं तस्य बाणौघं कृत्वा वानरकेतनः ।
शरान् मुमोच ज्वलितान् दीप्तास्यानिव पन्नगान् ॥ १२ ॥
शत्रुके बाणसमूहको निष्फल करके कपिध्वज अर्जुनने प्रज्वलित बाणका प्रहार किया ।
वे बाण मुखसे आग उगलनेवाले सर्पोंके समान जान पड़ते थे ॥ १२ ॥
ध्वजे पताकादण्डेषु रथे यन्त्रे हयेषु च ।
अन्येषु च रथाङ्गेषु न शरीरे न सारथौ ॥ १३ ॥
उन्होंने मेघसन्धिकी ध्वजा, पताका, दण्ड, रथ, यन्त्र, अश्व तथा अन्य रथांगोंपर बाण मारे; परंतु उसके शरीर और सारथिपर प्रहार नहीं किया ॥ १३ ॥
संरक्ष्यमाणः पार्थेन शरीरे सव्यसाचिना ।
मन्यमानः स्ववीर्यं तन्मागधः प्राहिणोच्छरान् ॥ १४ ॥
यद्यपि सव्यसाची अर्जुनने जान - बूझकर उसके शरीरकी रक्षा की तथापि वह मगधराज इसे अपना पराक्रम समझने लगा और अर्जुनपर लगातार बाणोंका प्रहार करता रहा ॥ १४ ॥
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ततो गाण्डीवधन्वा तु मागधेन भृशाहतः ।
बभौ वसन्तसमये पलाशः पुष्पितो यथा ॥ १५ ॥
मगधराजके बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर गाण्डीवधारी अर्जुन रक्तसे नहा उठे । उस समय वे वसन्त- ऋतुमें फूले हुए पलाश-श- वृक्षकी भाँति सुशोभित हो रहे थे ॥ १५ ॥
अवध्यमानः सोऽभ्यघ्नन्मागधः पाण्डवर्षभम् ।
तेन तस्थौ स कौरव्य लोकवीरस्य दर्शने ॥ १६ ॥
कुरुनन्दन! अर्जुन तो उसे मार नहीं रहे थे, परंतु वह उन पाण्डवशिरोमणिपर बारंबार चोट कर रहा था । इसीलिये विश्वविख्यात वीर अर्जुनकी दृष्टिमें वह तबतक ठहर सका ॥ १६ । |
सव्यसाची तु संक्रुद्धो विकृष्य बलवद् धनुः ।
हयांश्चकार निर्जीवान् सारथेश्च शिरोऽहरत् ॥ १७ ॥
अब सव्यसाची अर्जुनका क्रोध बढ़ गया । उन्होंने अपने धनुषको जोरसे खींचा और मेघसन्धिके घोड़ोंको प्राणहीन करके उसके सारथिका भी सिर उड़ा दिया ॥ १७ ॥
धनुश्चास्य महच्चित्रं क्षुरेण प्रचकर्त ह ।
हस्तावापं पताकां च ध्वजं चास्य न्यपातयत् ॥ १८ ॥
फिर उसके विशाल एवं विचित्र धनुषको क्षुरसे काट डाला और उसके दस्ताने, पताका तथा ध्वजाको भी धरतीपर काट गिराया ॥ १८ ॥
स राजा व्यथितो व्यश्वो विधनुर्हतसारथिः ।
गदामादाय कौन्तेयमभिदुद्राव वेगवान् ॥ १ ९ ॥
घोड़े, धनुष और सारथिके नष्ट हो जानेपर मेघसन्धिको बड़ा दुःख हुआ। वह गदा हाथमें लेकर कुन्तीनन्दन अर्जुनकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा ॥ १ ९ ॥
तस्यापतत एवाशु गदां हेमपरिष्कृताम् ।
शरैश्चकर्त बहुधा बहुभिर्गृध्रवाजितैः ॥ २० ॥
उसके आते ही अर्जुनने गृध्रपंखयुक्त बहुसंख्यक बाणोंद्वारा उसकी सुवर्णभूषित गदाके शीघ्र ही अनेक टुकड़े कर डाले ॥ २० ॥
सा गदा शकलीभूता विशीर्णमणिबन्धना ।
व्याली विमुच्यामानेव पपात धरणीतले ॥ २१ ॥
उस गदाकी मूँठ टूट गयी और उसके टुकड़े - टुकड़े हो गये । उस दशामें वह हाथसे छूटी हुई सर्पिणीके समान पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २१ ॥
विरथं विधनुष्कं च गदया परिवर्जितम् ।
सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यमब्रवीत् कपिकेतनः ॥ २२ ॥
जब मेघसन्धि रथ, धनुष और गदासे भी वंचित हो गया, तब कपिध्वज अर्जुनने उसे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥
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पर्याप्तः क्षत्रधर्मोऽयं दर्शितः पुत्र गम्यताम् ।
बह्वेतत् समरे कर्म तव बालस्य पार्थिव ॥ २३ ॥
‘ बेटा! तुमने क्षत्रियधर्मका पूरा - पूरा प्रदर्शन कर लिया । अब अपने घर जाओ । भूपाल! तुम अभी बालक हो । इस समरांगणमें तुमने जो पराक्रम किया है, यही तुम्हारे लिये बहुत है ॥ २३ ॥
युधिष्ठिरस्य संदेशो न हन्तव्या नृपा इति ।
तेन जीवसि राजंस्त्वमपराद्धोऽपि मे रणे ॥ २४ ॥
‘ राजन्! महाराज युधिष्ठिरका यह आदेश है कि ' तुम युद्धमें राजाओंका वध न करना । ' इसीलिये तुम मेरा अपराध करनेपर भी अबतक जीवित हो ' ॥ २४ ॥
इति मत्वा तदात्मानं प्रत्यादिष्टं स्म मागधः ।
तथ्यमित्यभिगम्यैनं प्राञ्जलिः प्रत्यपूजयत् ॥ २५ ॥
अर्जुनकी यह बात सुनकर मेघसन्धिको यह विश्वास हो गया कि अब इन्होंने मेरी जान छोड़ दी है । तब वह अर्जुनके पास गया और हाथ जोड़ उनका समादर करते हुए कहने लगा— ॥ २५ ॥
पराजितोऽस्मि भद्रं ते नाहं योद्धुमिहोत्सहे ।
यद् यत् कृत्यं मया तेऽद्य तद् ब्रूहि कृतमेव तु ॥ २६ ॥
‘ वीरवर! आपका कल्याण हो । मैं आपसे परास्त हो गया । अब मैं युद्ध करनेका उत्साह नहीं रखता । अब आपको मुझसे जो-जो सेवा लेनी हो, वह बताइये और उसे पूर्ण की हुई ही समझिये ' ॥ २६ ॥
तमर्जुनः समाश्वास्य पुनरेवेदमब्रवीत् ।
आगन्तव्यं परां चैत्रीमश्वमेधे नृपस्य नः ॥ २७ ॥
तब अर्जुनने उसे धैर्य देते हुए पुनः इस प्रकार कहा - ' राजन्! तुम आगामी चैत्रमासकी पूर्णिमाको हमारे महाराजके अश्वमेधयज्ञमें अवश्य आना ' ॥ २७ ॥
इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा पूजयामास तं इयम् ।
फाल्गुनं च युधि श्रेष्ठं विधिवत् सहदेवजः ॥ २८ ॥
उनके ऐसा कहनेपर सहदेवपुत्रने ' बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और उस घोड़े तथा युद्धस्थलके श्रेष्ठ वीर अर्जुनका विधिपूर्वक पूजन किया ॥ २८ ॥
ततो यथेष्टमगमत् पुनरेव स केसरी ।
ततः समुद्रतीरेण वङ्गान् पुण्ड्रान् सकोसलान् ॥ २ ९ ॥
तदनन्तर वह घोड़ा पुनः अपनी इच्छाके अनुसार आगे चला । वह समुद्रके किनारे-किनारे होता हुआ वङ्ग, पुण्ड्र और कोसल आदि देशोंमें गया ॥ २ ९ ॥
तत्र तत्र च भूरीणि म्लेच्छसैन्यान्यनेकशः ।
विजिग्ये धनुषा राजन् गाण्डीवेन धनंजयः ॥ ३० ॥
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राजन्! उन देशोंमें अर्जुनने केवल गाण्डीव धनुषकी सहायतासे म्लेच्छोंकी अनेक सेनाओंको परास्त किया ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे मागधपराजये द्वयशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें मगधराजकी पराजयविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥
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त्र्यशीतितमोऽध्यायः दक्षिण और पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें होते हुए अश्वका द्वारका, पञ्चनद एवं गान्धार देशमें प्रवेश वैशम्पायन उवाच मागधेनार्चितो राजन् पाण्डवः श्वेतवाहनः दक्षिणां दिशमास्थाय चारयामास तं हयम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! मगधराजसे पूजित हो पाण्डुपुत्र श्वेतवाहन अर्जुनने दक्षिण दिशाका आश्रय ले उस घोड़ेको घुमाना आरम्भ किया ॥ १ ॥
ततः स पुनरावर्त्य हयः कामचरो बली ।
आससाद पुरीं रम्यां चेदीनां शुक्तिसाह्वयाम् ॥ २ ॥
वह इच्छानुसार विचरनेवाला अश्व पुनः उधरसे लौटकर चेदियोंकी रमणीय राजधानीमें जो शुक्तिपुरी ( या माहिष्मतीपुरी ) के नामसे विख्यात थी, आया ॥ २ ॥
शरभेणार्चितस्तत्र शिशुपालसुतेन सः ।
युद्धपूर्वं तदा तेन पूजया च महाबलः ॥ ३ ॥
वहाँ शिशुपालके पुत्र शरभने पहले तो युद्ध किया और फिर स्वागत - सत्कारके द्वारा उस महाबली अश्वका पूजन किया ॥ ३ ॥
ततोऽर्चितो ययौ राजंस्तदा स तुरगोत्तमः ।
काशीनगान् कोसलांश्च किरातानथ तङ्गणान् ॥ ४ ॥
राजन्! शरभसे पूजित हो वह उत्तम अश्व काशी, कोसल, किरात और तङ्गण आदि जनपदोंमें गया ॥ ४ ॥
पूजां तत्र यथान्यायं प्रतिगृह्य धनंजयः ।
पुनरावृत्य कौन्तेयो दशार्णानगमत् तदा ॥ ५ ॥
उन सभी राज्योंमें यथोचित पूजा ग्रहण करके कुन्तीनन्दन अर्जुन पुनः लौटकर दशार्ण देशमें आये ॥ ५ ॥
तत्र चित्राङ्गदी नाम बलवानरिमर्दनः ।
तेन युद्धमभूत् तस्य विजयस्यातिभैरवम् ॥ ६ ॥
वहाँ उस समय महाबली शत्रुमर्दन चित्रांगद नामक नरेश राज्य करते थे । उनके साथ अर्जुनका बड़ा भयंकर युद्ध हुआ ॥ ६ ॥
तं चापि वशमानीय किरीटी पुरुषर्षभः ।
निषादराज्ञो विषयमेकलव्यस्य जग्मिवान् ॥ ७ ॥