श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1971–1980
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1971–1980
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एष प्रसाद्य शिरसा प्रशमार्थमरिंदम ॥ ३८ ॥
याचते त्वां महाबाहो शमं गच्छ धनंजय । ‘ शत्रुदमन महाबाहु धनंजय! यह तुम्हारे चरणोंमें सिर रखकर तुम्हें प्रसन्न करके तुमसे
शान्तिके लिये याचना करता है । अब तुम शान्त हो जाओ ॥ ३८३ ॥
बालस्य हतबन्धोश्च पार्थ किंचिदजानतः ॥ ३ ९ ॥
प्रसादं कुरु धर्मज्ञ मा मन्युवशमन्वगाः । ‘ यह अबोध बालक है, कुछ नहीं जानता है । इसके भाई- बन्धु नष्ट हो चुके हैं। अतः
धर्मज्ञ अर्जुन! तुम इसके ऊपर कृपा करो। क्रोधके वशीभूत न होओ ॥ ३ ९ ३ ॥
तमनार्यं नृशंसं च विस्मृत्यास्य पितामहम् ॥ ४० ॥
आगस्कारिणमत्यर्थं प्रसादं कर्तुमर्हसि । ‘ इस बालकका पितामह (जयद्रथ ) अनार्य, नृशंस और तुम्हारा अपराधी था । उसको भूल जाओ और इस बालकपर कृपा करो ' ॥ ४० ॥
एवं ब्रुवत्यां करुणं दुःशलायां धनंजयः ॥ ४१ ॥
संस्मृत्य देवीं गान्धारीं धृतराष्ट्रं च पार्थिवम् ।
उवाच दुःखशोकार्तः क्षत्रधर्मं व्यगर्हयत् ॥ ४२ ॥
जब दुःशला इस प्रकार करुणायुक्त वचन कहने लगी, तब अर्जुन राजा धृतराष्ट्र और गान्धारी देवीको याद करके दुःख और शोकसे पीड़ित हो क्षत्रिय धर्मकी निन्दा करने लगे ॥ ४१-४२ ॥
यस्कृते बान्धवाः सर्वे मया नीता यमक्षयम् ।
इत्युक्त्वा बहु सान्त्वादिप्रसादमकरोज्जयः ॥ ४३ ॥
परिष्वज्य च तां प्रीतो विससर्ज गृहान् प्रति ॥ ४४ ॥
‘ उस क्षात्र - धर्मको धिक्कार है, जिसके लिये मैंने अपने सारे बान्धवजनोंको यमलोक पहुँचा दिया । ' ऐसा कहकर अर्जुनने दुःशलाको बहुत सान्त्वाना दी और उसके प्रति अपने कृपाप्रसादका परिचय दिया । फिर प्रसन्नतापूर्वक उससे गले मिलकर उसे घरकी ओर विदा किया ॥ ४३-४४ ॥
दुःशला चापि तान् योधान् निवार्य महतो रणात् ।
सम्पूज्य पार्थं प्रययौ गृहानेव शुभानना ॥ ४५ ॥
तदनन्तर सुमुखी दुःशलाने उस महान् समरसे अपने समस्त योद्धाओंको पीछे लौटाया और अर्जुनकी प्रशंसा करती हुई वह अपने घरको लौट गयी ॥ ४५ ॥
एवं निर्जित्य तान् वीरान् सैन्धवान् स धनंजयः ।
अन्वधावत धावन्तं हयं कामविचारिणम् ॥ ४६ ॥
इस प्रकार सैन्धव वीरोंको परास्त करके अर्जुन इच्छानुसार विचरने और दौड़नेवाले उस घोड़ेके पीछे - पीछे स्वयं भी दौड़ने लगे ॥ ४६ ॥
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ततो मृगमिवाकाशे यथा देवः पिनाकधृक् ससार तं तथा वीरो विधिवद् यज्ञियं हयम् ॥ ४७ ॥
जैसे पिनाकधारी महादेवजी आकाशमें मृगके पीछे दौड़े थे, उसी प्रकार वीर अर्जुनने उस यज्ञसम्बन्धी घोड़ेका विधिपूर्वक अनुसरण किया ॥ ४७ ॥
स च वाजी यथेष्टेन तांस्तान् देशान् यथाक्रमम् ।
विचचार यथाकामं कर्म पार्थस्य वर्धयन् ॥ ४८ ॥
वह अश्व यथेष्टगतिसे क्रमशः सभी देशोंमें घूमता और अर्जुनके पराक्रमका विस्तार करता हुआ इच्छानुसार विचरने लगा ॥ ४८ ॥
क्रमेण स हयस्त्वेवं विचरन् पुरुषर्षभ ।
मणिपूरपतेर्देशमुपायात् सहपाण्डवः ॥ ४ ९ ॥
पुरुषप्रवर जनमेजय! इस प्रकार क्रमशः विचरण करता हुआ वह अश्व अर्जुनसहित मणिपुर- नरेशके राज्यमें जा पहुँचा ॥ ४ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सैन्धवपराजये अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सैन्धवोंकी पराजयविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥
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एकोनाशीतितमोऽध्यायः अर्जुन और बभ्रुवाहनका युद्ध एवं अर्जुनकी मृत्यु वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तु नृपतिः प्राप्तं पितरं बभ्रुवाहनः ।
निर्ययौ विनयेनाथ ब्राह्मणार्थपुरःसरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! मणिपुरनरेश बभ्रुवाहनने जब सुना कि मेरे पिता आये हैं, तब वह ब्राह्मणोंको आगे करके बहुत सा धन साथमें लेकर बड़ी विनयके साथ उनके दर्शनके लिये नगरसे बाहर निकला ॥ १ ॥
मणिपूरेश्वरं त्वेवमुपयातं धनंजयः ।
नाभ्यनन्दत् स मेधावी क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥२ ॥
मणिपुर- नरेशको इस प्रकार आया देख परम बुद्धिमान् धनंजयने क्षत्रिय - धर्मका आश्रय लेकर उसका आदर नहीं किया ॥ २ ॥
उवाच च स धर्मात्मा समन्युः फाल्गुनस्तदा ।
प्रक्रियेयं न ते युक्ता बहिस्त्वं क्षत्रधर्मतः ॥ ३ ॥
उस समय धर्मात्मा अर्जुन कुछ कुपित होकर बोले — ' बेटा! तेरा यह ढंग ठीक नहीं है ।
जान पड़ता है, तू क्षत्रिय - धर्मसे बहिष्कृत हो गया है ॥ ३ ॥
संरक्ष्यमाणं तुरगं यौधिष्ठिरमुपागतम् ।
यज्ञियं विषयान्ते मां नायौत्सीः किं नु पुत्रक ॥ ४ ॥
' पुत्र! मैं महाराज युधिष्ठिरके यज्ञ सम्बन्धी अश्वकी रक्षा करता हुआ तेरे राज्यके भीतर आया हूँ । फिर भी तू मुझसे युद्ध क्यों नहीं करता? ॥ ४ ॥
धिक् त्वामस्तु सुदुर्बुद्धिं क्षत्रधर्मबहिष्कृतम् ।
यो मां युद्धाय सम्प्राप्तं साम्नैव प्रत्यगृह्णथाः ॥ ५ ॥
' तुझ दुर्बुद्धिको धिक्कार है, तू निश्चय ही क्षत्रियधर्मसे भ्रष्ट हो गया है, क्योंकि युद्धके लिये आये हुए मेरा स्वागत- सत्कार तू सामनीतिसे कर रहा है ॥
न त्वया पुरुषार्थो हि कश्चिदस्तीह जीवता ।
यस्त्वं स्त्रीवद् यथाप्राप्तं मां साम्ना प्रत्यगृह्णथाः ॥ ६ ॥
' तूने संसारमें जीवित रहकर भी कोई पुरुषार्थ नहीं किया । तभी तो एक स्त्रीकी भाँति तू यहाँ युद्धके लिये आये हुए मुझे शान्तिपूर्वक साथ लेनेके लिये चेष्टा कर रहा है ॥ ६ ॥
यद्यहं न्यस्तशस्त्रस्त्वामागच्छेयं सुदुर्मते ।
प्रक्रियेयं भवेद् युक्ता तावत् तव नराधम ॥ ७ ॥
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' दुर्बुद्धे! नराधम! यदि मैं हथियार रखकर खाली हाथ तेरे पास आता तो इस ढंगसे मिलना ठीक हो सकता था' ॥ ७ ॥
तमेवमुक्तं भर्त्रा तु विदित्वा पन्नगात्मजा ।
अमृष्यमाणा भित्त्वोर्वीमुलूपी समुपागमत् ॥ ८ ॥
पतिदेव अर्जुन जब अपने पुत्र बभ्रुवाहनसे ऐसी बात कह रहे थे, उस समय नागकन्या उलूपी उस बातको सुनकर उनके अभिप्रायको जान गयी और उनके द्वारा किये गये पुत्रके तिरस्कारको सहन न कर सकनेके कारण वह धरती छेदकर वहाँ चली आयी ॥ ८ ॥
सा ददर्श ततः पुत्रं विमृशन्तमधोमुखम् ।
संतर्ज्यमानमसकृत् पित्रा युद्धार्थिना प्रभो ॥ ९ ॥
ततः सा चारुसर्वाङ्गी समुपेत्योरगात्मजा ।
उलूपी प्राह वचनं धर्म्यं धर्मविशारदम् ॥ १० ॥
प्रभो! उसने देखा कि पुत्र बभ्रुवाहन नीचे मुँह किये किसी सोच -विचार में पड़ा हुआ है और युद्धार्थी पिता उसे बारंबार डाँट फटकार रहे हैं । तब मनोहर अंगोंवाली नागकन्या उलूपी धर्म- निपुण बभ्रुवाहनके पास आकर यह धर्मसम्मत बात बोली- ॥ ९ -१० ॥
उलूपीं मां निबोध त्वं मातरं पन्नगात्मजाम् ।
कुरुष्व वचनं पुत्र धर्मस्ते भविता परः ॥ ११ ॥
' बेटा! तुम्हें विदित होना चाहिये कि मैं तुम्हारी विमाता नागकन्या उलूपी हूँ । तुम मेरी आज्ञाका पालन करो । इससे तुम्हें महान् धर्मकी प्राप्ति होगी ' ॥ ११ ॥
युध्यस्वैनं कुरुश्रेष्ठं पितरं युद्धदुर्मदम् ।
एवमेष हि ते प्रीतो भविष्यति न संशयः ॥ १२ ॥
' तुम्हारे पिता कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर और युद्धके मदसे उन्मत्त रहनेवाले हैं । अतः इनके साथ अवश्य युद्ध करो । ऐसा करनेसे ये तुमपर प्रसन्न होंगे । इसमें संशय नहीं है ' ॥ १२ ॥
एवं दुर्मर्षितो राजा स मात्रा बभ्रुवाहनः ।
मनश्चक्रे महातेजा युद्धाय भरतर्षभ ॥ १३ ॥
भरतश्रेष्ठ! माताके द्वारा इस प्रकार अमर्ष दिलाये जानेपर महातेजस्वी राजा बभ्रुवाहनने मन- ही- मन युद्ध करनेका निश्चय किया ॥ १३ ॥
संनह्य काञ्चनं वर्म शिरस्त्राणं च भानुमत् ।
तूणीरशतसम्बाधमारुरोह रथोत्तमम् ॥ १४ ॥
सुवर्णमय कवच पहनकर तेजस्वी शिरस्त्राण ( टोप ) धारण करके वह सैकड़ों तरकसोंसे भरे हुए उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ ॥ १४ ॥
सर्वोपकरणोपेतं युक्तमश्वैर्मनोजवैः ।
सचक्रोपस्करं श्रीमान् हेमभाण्डपरिष्कृतम् ॥ १५ ॥
परमार्चितमुच्छ्रित्य ध्वजं सिंहं हिरण्मयम् ।
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प्रययौ पार्थमुद्दिश्य स राजा बभ्रुवाहनः ॥ १६ ॥
उस रथमें सब प्रकारकी युद्ध- सामग्री सजाकर रखी गयी थी । मनके समान वेगशाली घोड़े जुते हुए थे । चक्र और अन्य आवश्यक सामान भी प्रस्तुत थे । सोनेके भाण्ड उसकी शोभा बढ़ाते थे । सुवर्णसे ही उस रथका निर्माण हुआ था । उसपर सिंहके चिह्नवाली ऊँची ध्वजा फहरा रही थी । उस परम पूजित उत्तम रथपर सवार हो श्रीमान् राजा बभ्रुवाहन अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा ॥ १५-१६ ॥
ततोऽभ्येत्य हयं वीरो यज्ञियं पार्थरक्षितम् ।
ग्राहयामास पुरुषैर्हयशिक्षाविशारदैः ॥ १७ ॥
पार्थद्वारा सुरक्षित उस यज्ञसम्बन्धी अश्वके पास जाकर उस वीरने अश्वशिक्षाविशारद पुरुषोंद्वारा उसे पकड़वा लिया ॥ १७ ॥
गृहीतं वाजिनं दृष्ट्वा प्रीतात्मा स धनंजयः ।
पुत्रं रथस्थं भूमिष्ठः संन्यवारयदाहवे ॥ १८ ॥
घोड़ेको पकड़ा गया देख अर्जुन मन-ही- मन बहुत प्रसन्न हुए । यद्यपि वे भूमिपर खड़े थे तो भी रथपर बैठे हुए अपने पुत्रको युद्धके मैदानमें आगे बढ़नेसे रोकने लगे ॥ १८ ॥
स तत्र राजा तं वीरं शरसंघैरनेकशः ।
अर्दयामास निशितैराशीविषविषोपमैः ॥ १ ९ ॥
राजा बभ्रुवाहनने वहाँ अपने वीर पिताको विषैले साँपोंके समान जहरीले और तेज किये हुए सैकड़ों बाण- समूहोंद्वारा बींधकर अनेक बार पीड़ित किया ॥ १ ९ ॥
तयोः समभवद् युद्धं पितुः पुत्रस्य चातुलम् ।
देवासुररणप्रख्यमुभयोः प्रीयमाणयोः ॥ २० ॥
वे पिता और पुत्र दोनों प्रसन्न होकर लड़ रहे थे । उन दोनोंका वह युद्ध देवासुर- संग्रामके
समान भयंकर जान पड़ता था । उसकी इस जगत् में कहीं भी तुलना नहीं थी ॥ २० ॥
किरीटिनं प्रविव्याध शरेणानतपर्वणा ।
जत्रुदेशे नरव्याघ्रं प्रहसन् बभ्रुवाहनः ॥ २१ ॥
बभ्रुवाहनने हँसते- हँसते पुरुषसिंह अर्जुनके गलेकी हँसलीमें झुकी हुई गाँठवाले एक बाणद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ २१ ॥
सोऽभ्यगात् सह पुङ्खेन वल्मीकमिव पन्नगः ।
विनिर्भिद्य च कौन्तेयं प्रविवेश महीतलम् ॥ २२ ॥
जैसे साँप बाँबीमें घुस जाता है, उसी प्रकार वह बाण अर्जुनके शरीरमें पंखसहित घुस गया और उसे छेदकर पृथ्वीमें समा गया ॥ २२ ॥
स गाढवेदनो धीमानालम्ब्य धनुरुत्तमम् ।
दिव्यं तेजः समाविश्य प्रमीत इव सोऽभवत् ॥ २३ ॥
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इससे अर्जुनको बड़ी वेदना हुई । बुद्धिमान् अर्जुन अपने उत्तम धनुषका सहारा लेकर दिव्य तेजमें स्थित हो मुर्देके समान हो गये ॥ २३ ॥
स संज्ञामुपलभ्याथ प्रशस्य पुरुषर्षभः ।
पुत्रं शक्रात्मजो वाक्यमिदमाह महाद्युतिः ॥ २४ ॥
थोड़ी देर बाद होशमें आनेपर महातेजस्वी पुरुषप्रवर इन्द्रकुमार अर्जुनने अपने पुत्रकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा- ॥ २४ ॥
साधु साधु महाबाहो वत्स चित्राङ्गदात्मज ।
सदृशं कर्म ते दृष्ट्वा प्रीतिमानस्मि पुत्रक ॥ २५ ॥
‘ महाबाहु चित्रांगदाकुमार! तुम्हें साधुवाद । वत्स! तुम धन्य हो । पुत्र! तुम्हारे योग्य पराक्रम देखकर मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ २५ ॥
विमुञ्चाम्येष ते बाणान् पुत्र युद्धे स्थिरो भव ।
इत्येवमुक्त्वा नाराचैरभ्यवर्षदमित्रहा ॥ २६ ॥
‘ अच्छा बेटा! अब मैं तुमपर बाण छोड़ता हूँ । तुम सावधान एवं स्थिर हो जाओ । ' ऐसा कहकर शत्रुसूदन अर्जुनने बभ्रुवाहनपर नाराचोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २६ ॥
तान् स गाण्डीवनिर्मुक्तान् वज्राशनिसमप्रभान् ।
नाराचानच्छिनद् राजा भल्लैः सर्वांस्त्रिधा द्विधा ॥ २७ ॥
परंतु राजा बभ्रुवाहनने गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए वज्र और बिजलीके समान तेजस्वी उन समस्त नाराचोंको अपने भल्लोंद्वारा मारकर प्रत्येकके दो-दो, तीन-तीन टुकड़े कर दिये ॥ २७ ॥
तस्य पार्थः शरैर्दिव्यैर्ध्वजं हेमपरिष्कृतम् ।
सुवर्णतालप्रतिमं क्षुरेणापाहरद् रथात् ॥ २८ ॥
हयांश्चास्य महाकायान् महावेगानरिंदम ।
चकार राजन् निर्जीवान् प्रहसन्निव पाण्डवः ॥ २ ९ ॥
राजन्! तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने हँसते हुए- से अपने क्षुर नामक दिव्य बाणोंद्वारा बभ्रुवाहनके रथसे सुनहरे तालवृक्षके समान ऊँची सुवर्णभूषित ध्वजा काट गिरायी । शत्रुदमन नरेश! साथ ही उन्होंने उसके महान् वेगशाली विशालकाय घोड़ोंके भी प्राण ले लिये ॥ २८-२९ ॥
स रथादवतीर्याथ राजा परमकोपनः ।
पदातिः पितरं क्रुद्धो योधयामास पाण्डवम् ॥ ३० ॥
तब रथसे उतरकर परम क्रोधी राजा बभ्रुवाहन कुपित हो पैदल ही अपने पिता पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा ॥ ३० ॥
सम्प्रीयमाणः पार्थानामृषभः पुत्रविक्रमात् ।
नात्यर्थं पीडयामास पुत्रं वज्रधरात्मजः ॥ ३१ ॥
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कुन्तीपुत्रोंमें श्रेष्ठ इन्द्रकुमार अर्जुन अपने बेटेके पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हुए थे । इसलिये वे उसे अधिक पीड़ा नहीं देते थे ॥ ३१ ॥
स मन्यमानो विमुखं पितरं बभ्रुवाहनः ।
शरैराशीविषाकारैः पुनरेवार्दयद् बली ॥ ३२ ॥
बलवान् बभ्रुवाहन पिताको युद्धसे विरत मानकर विषधर सर्पोंके समान विषैले बाणोंद्वारा उन्हें पुनः पीड़ा देने लगा ॥ ३२ ॥
ततः स बाल्यात् पितरं विव्याध हृदि पत्रिणा ।
निशितेन सुपुङ्खेन बलवद् बभ्रुवाहनः ॥ ३३ ॥
उसने बालोचित अविवेकके कारण परिणामपर विचार किये बिना ही सुन्दर पाँखवाले एक तीखे बाणद्वारा पिताकी छातीमें एक गहरा आघात किया ॥ ३३ ॥
विवेश पाण्डवं राजन् मर्म भित्त्वातिदुःखकृत् ।
स तेनातिभृशं विद्धः पुत्रेण कुरुनन्दनः ॥ ३४ ॥
महीं जगाम मोहार्तस्ततो राजन् धनंजयः । राजन्! वह अत्यन्त दुःखदायी बाण पाण्डुपुत्र अर्जुनके मर्म -स्थलको विदीर्ण करके भीतर घुस गया । महाराज! पुत्रके चलाये हुए उस बाणसे अत्यन्त घायल होकर कुरुनन्दन अर्जुन मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ तस्मिन् निपतिते वीरे कौरवाणां धुरंधरे ॥ ३५ ॥
सोऽपि मोहं जगामाथ ततश्चित्राङ्गदासुतः । कौरव - धुरंधर वीर अर्जुनके धराशायी होनेपर चित्रांगदाकुमार बभ्रुवाहन भी मूर्च्छित हो गया ॥ ३५३ ॥
व्यायम्य संयुगे राजा दृष्ट्वा च पितरं हतम् ॥ ३६ ॥
पूर्वमेव स बाणौघैर्गाढविद्धोऽर्जुनेन ह ।
पपात सोऽपि धरणीमालिङ्ग्य रणमूर्धनि ॥ ३७ ॥
राजा बभ्रुवाहन युद्धस्थलमें बड़ा परिश्रम करके लड़ा था । वह भी अर्जुनके बाणसमूहोंद्वारा पहलेसे ही बहुत घायल हो चुका था । अतः पिताको मारा गया देख वह भी युद्धके मुहानेपर अचेत होकर गिर पड़ा और पृथ्वीका आलिंगन करने लगा ॥ ३६-३७ ॥
भर्तारं निहतं दृष्ट्वा पुत्रं च पतितं भुवि ।
चित्राङ्गदा परित्रस्ता प्रविवेश रणाजिरे ॥ ३८ ॥
पतिदेव मारे गये और पुत्र भी संज्ञाशून्य होकर पृथ्वीपर पड़ा है । यह देख चित्रांगदाने संतप्त हृदयसे समरांगणमें प्रवेश किया ॥ ३८ ॥
शोकसंतप्तहृदया रुदती वेपती भृशम् ।
मणिपूरपतेर्माता ददर्श निहतं पतिम् ॥ ३ ९ ॥
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मणिपुर- नरेशकी माताका हृदय शोकसे संतप्त हो उठा था! रोती और काँपती हुई चित्रांगदाने देखा कि पतिदेव मारे गये ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अर्जुनबभ्रुवाहनयुद्धे एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अर्जुन और बभ्रुवाहनका युद्धविषयक उनासीवाँअध्याय पूराहुआ ॥ ७९ ॥
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अशीतितमोऽध्यायः चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोद्गार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुनः जीवित होना वैशम्पायन उवाच
ततो बहुतरं भीरुर्विलप्य कमलेक्षणा ।
मुमोह दुःखसंतप्ता पपात च महीतले ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर भीरु स्वभाववाली कमलनयनी चित्रांगदा पतिवियोग- दुःखसे संतप्त होकर बहुत विलाप करती हुई मूर्च्छित हो गयी और पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ १ ॥
प्रतिलभ्य च सा संज्ञां देवी दिव्यवपुर्धरा ।
उलूपीं पन्नगसुतां दृष्ट्वेदं वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥
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कुछ देर बाद होशमें आनेपर दिव्यरूपधारिणी देवी चित्रांगदाने नागकन्या उलूपीको सामने खड़ी देख इस प्रकार कहा- ॥ २ ॥
उलूपि पश्य भर्तारं शयानं निहतं रणे ।
त्वत्कृते मम पुत्रेण बाणेन समितिंजयम् ॥ ३ ॥
' उलूपी! देखो, हम दोनोंके स्वामी मारे जाकर रणभूमिमें सो रहे हैं। तुम्हारी प्रेरणासे ही मेरे बेटेने समरविजयी अर्जुनका वध किया है ॥ ३ ॥
ननु त्वमार्यधर्मज्ञा ननु चासि पतिव्रता ।
यत्त्वस्कृतेऽयं पतितः पतिस्ते निहतो रणे ॥ ४ ॥
'बहिन! तुम तो आर्यधर्मको जाननेवाली और पतिव्रता हो । तथापि तुम्हारी ही करतूतसे ये तुम्हारे पति इस समय रणभूमिमें मरे पड़े हैं ॥ ४ ॥
किंतु सर्वापराधोऽयं यदि तेऽद्य धनंजयः ।
क्षमस्व याच्यमाना वै जीवयस्व धनंजयम् ॥ ५ ॥
‘ किंतु यदि ये अर्जुन सर्वथा तुम्हारे अपराधी हों तो भी आज क्षमा कर दो । मैं तुमसे
इनके प्राणोंकी भीख माँगती हूँ। तुम धनंजयको जीवित कर दो ॥ ५ ॥
ननु त्वमार्ये धर्मज्ञा त्रैलोक्यविदिता शुभे ।
यद् घातयित्वा पुत्रेण भर्तारं नानुशोचसि ॥ ६ ॥
' आर्ये! शुभे! तुम धर्मको जाननेवाली और तीनों लोकोंमें विख्यात हो । तो भी आज पुत्रसे पतिकी हत्या कराकर तुम्हें शोक या पश्चात्ताप नहीं हो रहा है, इसका क्या कारण है? ॥ ६ ॥
नाहं शोचामि तनयं हतं पन्नगनन्दिनि ।
पतिमेव तुतु शोचामि यस्यातिथ्यमिदं कृतम् ॥ ७ ॥
‘नागकुमारी! मेरा पुत्र भी मरा पड़ा है, तो भी मैं उसके लिये शोक नहीं करती । मुझे केवल पतिके लिये शोक हो रहा है, जिनका मेरे यहाँ इस तरह आतिथ्य - सत्कार किया गया' ॥ ७ ॥
इत्युक्त्वा सा तदा देवीमुलूपीं पन्नगात्मजाम् ।
भर्तारमभिगम्येदमित्युवाच यशस्विनी ॥ ८ ॥
नागकन्या उलूपीदेवीसे ऐसा कहकर यशस्विनी चित्राङ्गदा उस समय पतिके निकट गयी और उन्हें सम्बोधित करके इस प्रकार विलाप करने लगी- ॥ ८ ॥
उत्तिष्ठ कुरुमुख्यस्य प्रियमुख्य मम प्रिय ।
अयमश्वो महाबाहो मया ते परिमोक्षितः ॥ ९ ॥
' कुरुराजके प्रियतम और मेरे प्राणाधार! उठो । महाबाहो! मैंने तुम्हारा यह घोड़ा छुड़वा दिया है ॥ ९ ॥
ननु त्वया नाम विभो धर्मराजस्य यज्ञियः ।